देवेश पथ सारिया की कविताऍं

 

देवेश पथ सारिया 



छीजे हुए सपनों से भरे हुए समय में निगाह का साफ होना उम्मीद का बच जाना है। देवेश पथ सारिया की कविताएं इसी साफ निगाह से दुनिया को देखने और दिखाने की एक खूबसूरत कोशिश है।इन कविताओं में कोई शोर नहीं है फिर भी इनकी गूंज देर तक पीछा करती है।



देवेश पथ सारिया की कविताऍं 


छीजे सपने के बाद

मैं अठारह साल का होने वाला था
मैं क़स्बे में पढ़ता था
और मेरा छोटा भाई जयपुर में
वहाॅं किसी पुस्तक मेले से
वह मेरे लिए ले आया था एक क़िताब
जिस पर लिखा था—
'क़ुरआन शरीफ़ का हिंदी तर्जुमा'

घर में पहले से थी
हिंदी में श्रीमद्भागवत गीता
मैं क़ुरआन और गीता
दोनों को ख़ूब पढता
उस कच्ची उम्र में
जितनी समझ सकता था
उस हद तक कोशिश करता

क़दम रखा मैंने उम्र के 
अट्ठारहवें दरवाज़े पर
इस सपने के साथ
कि मैं ढूँढ निकालूँगा
सामंजस्य के सूत्र
आयतों और श्लोकों में

इस बीच भी होते रहे दंगे
छीजता गया मेरा सपना
टूट गया मेरा चश्मा

एक दिन साफ़ हो गई मेरी निगाह 
मैं यह समझने लायक़ परिपक्व हो गया
कि धार्मिक टकरावों का समाधान 
धर्म की क़िताबों में नहीं मिलेगा।


गीत के बदले अर्थ  

गुदगुदाता था मेरा मन
गीत वह
आवाज़ थी जिसमें
अधकच्चे मटके पर मारी
तुम्हारी नाज़ुक थाप की

अब
सपाट पड़ते हैं
हथोड़े से बोल
कानों और दिल पर

ढांप लिया है मुझे
तुम्हारे सुलगाये कोहरे ने
वाष्पित होती सूरज में 
विलीन हो रही हो तुम।



तुम्हारे फैसले 

मेरे जीवन में आना तुम्हारा फ़ैसला था 
चार बजे तक जगाना तुम्हारा फ़ैसला था
नींद खुलने से पहले ग़ायब हो जाना 
भी तुम्हारा ही फ़ैसला था 

इस बीच के मेरे सारे फ़ैसले 
कविताएं सुनाने भर के रहे

यदि मेरी चलती
तो हमारी अंतिम बातचीत में 
तुम्हारी वह ग़ुस्से भरी चीख़ न‌ होती
वह हमारी अंतिम बातचीत न होती

मैं तुम्हें सुनाता एक कविता 
फिर एक और
फिर एक और...।


आटे की गोली

सुनहली मछलियों के बीच इकलौती मटमैली
निशाना बांधकर फेंकी हुई आटे की गोली
जाकर गिरी उसी मछली के मुँह में
या उसकी किसी सुनहली पड़ोसन के
या पानी में पड़ी, बह गई, खो गई?



छठी इंद्रिय कविता

जब कविता आप पर होती है कृपालु 
आप सोचते हैं
क्यों हैं दुनिया में इतनी तादाद में बुरी कविताएँ?
क्यों रूह को झुलसाती हैं गर्म हवाएँ?
बुरी कविता कोई कैसे लिख सकता है?

जब वह रूठ जाती है आपसे
मानो छठी इंद्रिय को साँप सूँघ गया हो
ताज्जुब करते हैं आप
कोई भी कविता आख़िर लिख कैसे लेता है? 



डिग्री वाला दिन

बाक़ी बची थीं
यूनिवर्सिटी के
बेपरवाह जीवन की
आख़िरी बूँदें
जिन्हें समेटने को
हमने हवा में उछाल दीं
एक जैसी अपनी टोपियां

चूँकि उछालने के कोंण
उत्साह के हिसाब से थे—
बेहिसाब;
गिरने पर
किसी के हिस्से में नहीं आई 
उसकी अपनी टोपी

रीत रहे उल्लास का था
वह आखिरी अट्टहास
अंतिम बेपरवाह बूँदों का स्वाद  

डिग्री सबकी अपनी थी
हवा से लौट आई टोपी
थी जाने किसकी।



फिर भी

लंबी छुट्टियों के बाद खुली थी यूनिवर्सिटी
कई ऋतुओं के बाद लौट आया था वसंत

वे कुछ लड़कियाँ थी
संख्या में ऋतुओं जितनी ही
जो वसंत का पर्याय हो सकती थीं

लौट आया था मेरा कवि, जिसने सोचा-
कितने लड़कों के अधूरे ख़्वाब जा रहे‌ हैं

थोड़ी देर बाद
वे रुकी कहीं
उनसे आगे निकल गया मैं
देखता हुआ
लड़कियों के चेहरों पर मास्क
जिनमें खिलखिला रही थीं वे

मुझे याद आए दिन
दोस्तों के साथ तफ़रीह के
मैंने ख़ूब ज़ोर से कहा :
‘ख़ुश रहो तुम सब’

मैं नहीं मानता ख़ुद को
आशीर्वाद देने लायक उम्रदराज़
फिर भी...।



मेरी, तुम्हारी बैठने की जगह

तुमने रख छोड़े हैं पुराने कपड़े मेरी कुर्सी पर
मैंने भी पटक दिए मैले कपड़े तुम्हारी कुर्सी पर
अब हम पसोपेश में हैं कि बैठें कहाॅं।



मंत्रविद्ध

कोई लड़की
यूरोप जैसी कला-प्रेमी
पहनी हुई सफ़ेद लंबा गाउन

उसने राह चलते सुना
किसी कवि के घर
प्रदर्शनी लगी है कविताओं की
कविताओं की प्रदर्शनी?
हम्म्म्म ...
वह घुस जाती है भीतर

दरवाज़े से लगता बग़ीचा
और बग़ीचे के बाद
उतना ही चौड़ा हॉल
हॉल में रखी अर्द्ध-पारदर्शी बाल्टियाँ 
सफ़ेद कॉटन के कपड़े से ढँकी हुईं

लड़की ने कपड़ा उघाड़ा
और बाल्टी के भीतर से निकलीं
कविता की चार पंक्तियाँ

लड़की पर एक टोना-सा हुआ
वह दूसरी बाल्टी की ओर बढ़ी
वही चार पंक्तियाँ
तीसरी, चौथी, पांचवीं 
हर बाल्टी में वही चार पंक्तियाँ
फिर भी लड़की उकताई नहीं
और हर बाल्टी से निकाल कर
उसी जोश से पढ़ती रही
उन्हीं पंक्तियों को फिर-फिर 

जब सारी बाल्टियों का अर्द्ध-पारदर्शीपन
बाक़ी आधा सच भी उंडेल चुका
वह जाने के लिए मुड़ी वापस
तभी हवा में गूंजने लगी
कवि की आवाज़ :
कहाँ छुपी थीं तुम, आई हो आज

आवाज़ गूँजती रही
सुनाती रही कविताएँ तमाम
जो कवि ने लिखी थीं अधूूरी-पूरी

लड़की जो बौरा सी गयी थी
चार ही पंक्तियों के जादू में
अब देख रही थी जादू का पोर-पोर
मंत्रविद्ध रोम-रोम

उन कॉटन के कपड़ों को
बाल्टियों से हटाते समय
नहीं पढ़ा था उसने
कपड़ों पर अंकित
चार पंक्तियों के कवि का जीवन-काल
कवि सात वर्ष पहले ही मर चुका था।


बातें जो लड़कियों ने कहीं 

(1)

मैं जब सो रहा था 
अपने अंतिम सन्देश में उसने मुझे भेजीं
कुछ किताबों की तस्वीरें 
साथ में लिखकर 
कि वह जा चुकी होगी 
मेरे जागने तक  

मैं सोचता हूँ बारहा-
कौनसी किताबें 
पढ़ती होगी वह
क्या किसी किताब में होगा 
वापसी का नक़्शा?



(2)

उसने मुझे घोषित किया 
सबसे उजला 

पर उसकी पसंद थे
धूसर क़िरदार।  


(3)

उसने बताया 
कि उसे नहीं समझ आती कविता 
वह नहीं चाहती 
कि मैं समझ जाऊं उसे 

मुझे समझ आया 
उसका मंतव्य। 


(4)

उसने कहा-
तुम एक नुकीले कांटे हो 

यह बात चुभी बहुत 
मुझसे ज़्यादा उसे 

वह नौकरी छोड़
फूल उगाने वाली 
बाग़वान थी। 





देवेश पथ सारिया 

प्रकाशित पुस्तकें : 
कविता संकलन : अदृश्य आत्मीय की टोह में (2025), नूह की नाव (2022)। 
कहानी संग्रह : स्टिंकी टोफू (2025) । 
कथेतर गद्य : छोटी आँखों की पुतलियों में (2022)।
अनुवाद : यातना शिविर में साथिनें (2023), हक़ीक़त के बीच दरार (2021)।
अन्य भाषा में पुस्तकें : A Toast to Winter Solstice (अंग्रेज़ी अनुवाद : शिवम तोमर, 2023) ।

कविता अनुवाद : कविताओं का अनुवाद अंग्रेज़ी, स्पेनिश, मंदारिन, रूसी, नेपाली, बांग्ला, मराठी, पंजाबी, भोजपुरी, गढ़वाली और राजस्थानी भाषा-बोलियों में हो चुका है।  

पुरस्कार/सम्मान : भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार, स्नेहमयी चौधरी सम्मान।

विशेष : 
1. ताइवान के संस्कृति मंत्रालय की योजना के अंतर्गत 'फॉरमोसा टीवी' पर कविता पाठ (2022)।
2. काओशोंग वर्ल्ड पोएट्री फेस्टिवल (2023), ताइवान में शिरकत।
3. रज़ा न्यास के 'आज कविता' कार्यक्रम में कविता पाठ (अप्रैल 2025)। 

सम्पादन:गोलचक्कर वेब पत्रिका (www.golchakkar.org) 

फ़ोन:9784972672 
ईमेल : deveshpath@gmail.com 

















सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।




















Comments

  1. डॉ उर्वशी14 August 2026 at 15:00

    देवेश पथ सारिया की कविताएं अपने समय की जटिलताओं, निजी स्मृतियों, प्रेम, विरह और मनुष्य की भीतर तक उतरती बेचैनी को बहुत सहज लेकिन गहरे प्रभाव के साथ अभिव्यक्त करती हैं। इन कविताओं की सबसे बड़ी शक्ति उनकी साफ निगाह और संयत भाषा है, जो बिना किसी वैचारिक शोर के बड़े सवालों को हमारे सामने रखती है। ‘छीजे सपने के बाद’ धर्म और सांप्रदायिकता के प्रश्न को निजी अनुभव से उठाकर उस निष्कर्ष तक ले जाती है कि धार्मिक टकरावों का समाधान धर्मग्रंथों में नहीं, मनुष्य की परिपक्व दृष्टि में तलाशना होगा। ‘तुम्हारे फैसले’, ‘मेरी, तुम्हारी बैठने की जगह’ और ‘बातें जो लड़कियों ने कहीं’ जैसी कविताओं में प्रेम की अनिश्चितता, दूरी और स्मृति का सूक्ष्म संसार है, जबकि ‘डिग्री वाला दिन’ और ‘फिर भी’ जीवन के बीतते समय, युवावस्था और मानवीय आत्मीयता को मार्मिक ढंग से पकड़ती हैं। ‘मंत्रविद्ध’ में कविता, स्मृति और मृत्यु का अद्भुत सम्मिलन दिखाई देता है। कवि छोटी-छोटी घटनाओं और साधारण वस्तुओं में ऐसे अर्थ खोजता है जो पाठ के बाद भी भीतर बने रहते हैं। कहीं व्यंग्य की महीन धार है, कहीं उदासी की पारदर्शी परत, तो कहीं प्रेम की बची हुई गर्माहट। इन कविताओं में कथ्य और शिल्प का संतुलन उन्हें सहज पठनीय होने के साथ-साथ विचारोत्तेजक भी बनाता है। देवेश पथ सारिया की कविता अंततः मनुष्य की उस संवेदना को बचाने की कविता है, जो लगातार कठोर होते समय में सबसे अधिक संकटग्रस्त है।

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  2. दीपक कांडपाल14 August 2026 at 15:50

    समय की लय में बहती बढ़िया कविताएं, बधाई और शुभकामनाएं 💐

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  3. अमेय कांत14 August 2026 at 20:34

    बढ़िया कविताऍं, देवेश जी। हार्दिक बधाई!

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  4. सत्यनारायण14 August 2026 at 20:35

    अच्छी कविताऍं।

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  5. योगेश ध्यानी14 August 2026 at 20:35

    सुन्दर कविताएं भाई, इनका मद्धम स्वर मोहता है।

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  6. अशोक अग्रवाल14 August 2026 at 20:39

    देवेश पथसरिया की सुंदर कविताएं।

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  7. ख़ुदेजा़ ख़ान17 August 2026 at 09:45


    -गीत के बदले अर्थ
    -तुम्हारे फ़ैसले
    -फिर भी
    -मेरी तुम्हारी बैठने की जगह
    -मंत्रविद्ध
    -बातें जो लड़कियों ने कही
    देवेश पथसारिया अपनी इन कविताओं में स्त्रियों से जुड़े प्रसंगों, स्मृतियों, मनोभावों को बहुत शिद्दत से व्यक्त करते हैं। इनमें अतीत की कुछ छवियां चित्रात्मक रूप से उभरती हैं तो कुछ वर्तमान की अनुभूतियां संग-संग लिए चलती हैं। स्त्रीलिंग के प्रति पुरुष का सहज आकर्षण इन भावाभिव्क्तियों में प्रकट हुआ है। ये संबंध जितने सहज होते हैं इनकी संरचना समय के साथ सरल होने के बजाय जटिल होने लगती है, ये एक विचारणीय बिन्दु है।
    यहां बहुत हद तक उस मनोविज्ञान को समझने की कोशिश की गई है जिसकी महीन रेखा दो लोगों को आपस में विभाजित करती है।

    कविता ' आटे की गोली' एक रूपक गढ़ती है।भोजन मिलना, ग्रहण करना या उससे वंचित रह जाना ये सबके लिए निश्चित भी है, अनिश्चित भी।

    धर्म को लेकर जिस तरह की कट्टरता देखने को मिल रही है वो असहज करने वाली है इनका समाधान धार्मिक पुस्तकें नहीं कर सकतीं तो इतने धार्मिक होने का औचित्य क्या, इससे तो अच्छा नास्तिक हो जाएं और मनुष्य को मनुष्य के रूप में स्वीकार करें।
    'छीजे सपने के बाद'
    कवि का मन तुलनात्मक अध्ययन के बाद इस निष्कर्ष पर पंहुचने को विवश हो जाता है।

    कविता लिखना आसान नहीं,इस तथ्य को हर कविता लिखने वाला नहीं समझता, ये सत्य है।

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  8. सत्यकेतु17 August 2026 at 09:45

    देवेश पथ सारिया सूक्ष्म भावों में गहरे अर्थों को पिरोने की शब्दकारी करते हैं। जीवन को, साहचर्य को, संतुलन को तरजीह देते हैं और इस दिशा में बाधा पहुंचाने वाले कारकों को अलग कर देने, तज देने की वकालत करते हैं। जो सुंदर है, वह अंदर है। बाहर की कोई रस्म या मीमांसा वह अनुभूति नहीं दे सकती जिसकी मनुष्य को तलाश होती है। बाहर के भरोसे रहने वाला, उसी की ज़िद पर अड़ा रहने वाला या असेंबलिंग पर लहराने वाला वस्तुत: मनुष्य के पायदान से नीचे उतर चुका होता है। यह बात प्रेम पर भी लागू होता है, कलम पर भी और धर्म पर भी। इस हक़ीक़त को देवेश पथ सारिया ने अपनी कविताओं में बड़ी सजगता से अंकित किया है।

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