विजय कुमार की कविताएं
विजय कुमार की कविताओं में महानगरीय जीवन की चमक दमक और उसके बीच लुटती पिसती मनुष्यता का गहरा अवसाद गूंजता है और अपनी गिरफ्त में ले लेता है।इन कविताओं में उपेक्षित मनुष्य के साथ उसका ढहा, टूटा और उजाड़ संसार नहीं मिटने की जिद में अड़ा उन ताकतों से लड़ रहा है जो सब कुछ को लीलने को आतुर है।चकाचौंध के बीच गहराता यह अंधेरा लगातार गहराता जा रहा है और ये कविताएं उसी अंधकार को दर्ज कर रही हैं। इनमें शोकगीत की मार्मिकता है जो सिर्फ बेचैन नहीं करती, ठहर कर सोचने को विवश कर देती हैं। सबसे खास बात यह कि यहां प्रस्तुत दस कविताएं इसी दुनिया की कविताएं हैं।एक साथ इन्हें पढ़ने पर दृश्य और छवियों का ऐसा संसार उपस्थित होता है जो पूरे परिदृश्य से गायब कर दिया गया है।
एक छूटा हुआ मकान
नए नए बसते मोहल्ले में
वह उम्र दराज मकान है छोटा सा
बंद
अपनी अंतिम सांसें गिनता हुआ
क्यों इसे घूरती रहती है आसपास खड़ी
ये गगनचुंबी इमारते
मैं बारहा गुजरता हूं इस राह
हर बार बुलाती है एक पुरानी दुनिया
बुलाते हैं
दालान, खंभे , टूटे दरवाजे ,
खिड़की का एक पल्ला
कब्जे से लटका हुआ वह अब गिरा अब गिरा
काठ की एक झुकी हुई शहतीर
टूटे हुए जंगले
और एक शालीन खामोशी
एक गिलहरी
इस मकान की पलस्तर उखड़ी दीवारों पर
वहां उस ओर जख्म की तरह झांकती हुई ईंटें
कौन कब आया पिछली बार यहां
यह उसके जूतों के निशान
दहलीज की धूल पर अब भी
दरवाजे के सुराखों में
उसकी आहट बसी हुई है ।
नीम अंधेरे में
कौन टोह लेता हुआ
रोशनदान के मैले शीशे से
यह पाइप पर चढ़ी हरे-हरे पत्तों वाली एक नटखट बेल या उन बैंगनी फूलों का धीरज
या एक चिड़िया की छोटी सी उदास देह
कमरे में थोड़ा सा शोर मचा लेती हुई
जंग खाया यह पुराना ताला
यह अभी भूला नहीं है खुलना
यह अभी भी एक चाबी के इंतजार में
यह आराम कुर्सी यहां मरियल सी
इसकी चरमराहट में
अटकी हुई है किसी की एक आखिरी हिचकी
एक बंद घड़ी दीवार पर
प्रार्थना में हाथ जोड़े हुए पलंग के पैताने
और दीवार पर यह शीशा
किसी बीते हुए समय से कानाबाती करता हुआ
यह गुसलखाने का नल
यह जो सूख गया बरसों पहले
इसके बूंद बूंद टपकने का संस्मरण
फर्श की धूल के अलौकिक धीरज में
बसा हुआ है अब भी
छत की सीढ़ियों से
चांदनी रात
यह क्यों उतरती है यहां
एक शर्मीली लड़की सी दबे पांव
क्या अब भी
दादी मां की कहानी सुनते-सुनते
आंख मूंद लेती है?
जो लोग रहे यहां
अब उनकी परछाइयां हैं यहां
दुनिया के शोर से घिरी हुईं
स्वप्न में एक चित्र सी रची हुईं
शामिल होने मुझे बुलाती हैं हर रोज
नहीं बीता कुछ भी नहीं है
बीतेगा कुछ भी नहीं ।
सिर्फ हम बीत जाएंगे ।
वहां अब भी बचे रहने की
कोई जुगत
भीतर तमाम धड़कनें
अनटूटे स्वप्न
सारे मौसम
अच्छे बुरे की अनगिनत स्मृतियां
बहस मुबाहिसे
कुछ फैसले जो हुए या नहीं हुए
कुछ समाधान जो मिले या नहीं मिले
भीतर अब भी थोड़ा सा प्रेम
जो उलझता रहता है कदमों से
कुछ इच्छाएं
जो खत्म नहीं हुई कभी भी
कुछ थोड़े से अचरज ।
यहां से गुजरते
मैं किसी दिन आऊंगा यहां
मैं आऊंगा
एक आगंतुक सा नहीं
किसी हड़बड़ी में नहीं
मैं आऊंगा
और दरवाजा खुलेगा
और उम्मीद है
कौन है? कौन है ? का शोर उठेगा नहीं भीतर से...
अवशेष
(घर के ठीक सामने के दृश्य को देखकर)
सभ्यता के हाशिए पर खड़ी थीं
अधूरी रह गई प्रेम कथाओं की तरह उदास
कुछ अकेली अधबनी इमारतें
शोक था इनमें
अस्थि पंजर थे घायल
ईंट और पत्थरों के जख्मों से झांकता कोई समय
कबूतरों ने, चिड़ियों ने
घास फूस और लताओं ने
प्रेमी जोड़ों और नशेड़ियों ने
वहां खोजे अपने आशियाने
कुछ आए वहां रोने अकेले में
और वजहें कभी मालूम न हो सकीं
समय था वह कोई समय
धड़कनें जो दर्ज़ नहीं होती थी कहीं
किसी भी बहीखाते में
फिर भी आबाद थी यहां एक दुनिया
फिर बुलडोजर आए
ढाए जा रहे हैं ये ढांचे
कल मिटा दी जाएंगी निशानियां
बचा रहेगा बस एक संताप
सारे शोर गुल के बीच
स्मृति के किसी तहखाने में।
मैं उस शाम का गवाह था
वह न कोई चमकता हुआ समय था
न मेरे पास कोई उदास मनोहारी उजाला
और न भव्य निस्तब्धता
न एकांत का कोई फलसफा
न बादलों के तैरते हुए स्वप्न की आभा
न रचा गया जादुई किस्म का वह बीतना
वहां तो बस एक मटमैला पानी था
सभ्यता के पिछवाड़े
चीजों के टूटे हुए आईनों में
इस्तेमाल के बाद फेंके हुए सपनों के
अस्थि पंजर थे
जल की तरंगों पर बिखरे पड़े थे अवशेष
असहायताओं के कुछ बुझे हुए चीत्कार
फेंकी हुई उच्छिष्ट वस्तुओं ने
धीरे से कहा यह हमारा उत्तर समय है
हमारा यह होना
किसी भी उपयोग से बाहर
और वे रचती थीं समय के छूटे हुए कोनों को
हमारी इसी कामकाजी दुनिया में
वे निशानियां थीं अब
पहचान खोती हुई अपने अतीत की
क्या कोई अतीत होता है ?
क्या कोई जादू होता है?
पूछा लावारिस चीजों ने
एक टूटी हुई रस्सी ने मुझसे पूछा
जानना चाहा कीचड़ से सने बेकार पड़े पहियों ने
वहां
उस घाट की दीवार पर
फेंका हुआ कुछ कचरा था
कुछ बोतलें कुछ कनस्तर
कुछ सीढ़ियां अपनी अनगिनत शामों पर बिसुरती हुई
टूटी हुई चप्पलें थके हुए पांवों की स्मृतियों में
और रस्सियां थी वहां टूटी हुई नावों की
जो अब कहीं नहीं ले जातीं
मैंने देखा नश्वरता के सामने
टिका रह गया यह थोड़ा सा जिद्दीपन था
और नश्वरता के गाल पर एक रुका हुआ आंसू
मैंने उन सारे महान कथाकारों से क्षमा मांग ली
जो किसी समयहीनता की दिलकश किस्सागोई
करते रहे उम्र भर
अपने अंत की ओर बढ़ रहा था कुछ
वह कूड़ादान रहेगा एक ठहरे हुए अवसाद का
कल की खत्म हो चुकी उम्मीदें
और बचे हुए वजूद
लौटने के बंद हो चुके रास्तों पर
चीजों की प्रचुरता से भरा यह संसार
और उपयोग के बाद
अनदेखे कोनों में छिप रही थीं फेंकी हुई चीजें
बचे हुए जीवन की शर्म अपना अकेलापन
और अपनी क्षत विक्षत सिकुड़न
कोई नहीं था आश्रय स्थल
वे परिवार विहीन
इस शोर से भरी दुनिया में
वे छोड़ दी गईं थीं बस यूं ही
एक सुकुमार
काव्यमय अवसाद का सौंदर्य भी तो नहीं था वहां
वे बस थीं वहां
सुबकती तिरस्कृत एकाकी
और वे रहेंगी वहां कुछ समय तक
कुछ बीत जाने की निशानियां
कुछ समय तक दिखाई देती रहेगी यह विच्छिन्नता
फिर कुछ भी नहीं होगा
वहां मैं क्या खोजता था
वह क्या है जो बचा रह जाता है मेरे भीतर...
आईने
यह आईने किसने बनाये, क्यों बनाए
देखा था जिसने पहली बार आईने में अपना चेहरा
क्या वह अपने से बाहर निकल आया था
देखा उसने शायद पहली बार
किसी और निगाह से खुद को
कोई और था
अब उसके अपने वजूद से बाहर
उसे एकटक देखता हुआ
खुद की पहचान की
क्या वह कोई पहली जमीन थी?
वह एक फासला
एक उजाड़ फैला हुआ
अपने होने और दिखाई पड़ने के बीच
इत्मीनान से परे
खुशामदों
झूठे आश्वासनों को एक तरफ रख देती हुई
तसल्लियों के बाहर
दिलासाओं और आत्मतुष्टियों को
गैर जरूरी सामान समझ
एक अशांत समय के भीतर
अपने यकीन पर
कई कई संशय , दुविधाएं ,सवाल
जितनी देर देखा उसने
एक आईना
दिमाग के सबसे भीतरी इलाकों में
वह एक सामना था
पता नहीं किससे ।
बहसों से थक कर
लौटने की जगह थे आईने ।
ये आईने
जो एक सरोवर के ठहरे हुए जल में थे
ये कभी आकाश के उदास तनहा सितारों में
सड़क की भीड़ में चलते पचास गुमनाम चेहरों की
खोई खोई सी आंखों में
यह आईने
जो अक्सर ले गये
अनुत्तरित सवालों की तरफ
बीतते वक्त में
जब भी देखी
कई आईनों में कई शक्लें अपनी
क्यों वह सहसा इतना खामोश रहा कुछ देर
बेसबब
एकदम अकेला था
और
वह इस दुनिया में सबके साथ था ।
सोते समय की प्रार्थना
अपने काम से काम रखना
भूल-चूक लेनी-देनी
जिन्होंने दिल दुखाया
उन्हें भुला देना
जो काम आएँगे
उनका ध्यान रखना
किसी अजनबी का यक़ीन मत करना
संगीत को संगीत की तरह लेना
भटकना मत स्मृतियों में
समय ख़राब है
उलझी हुई छवियों के जंगल हैं
लौट ज़रूर आना समय से
करने हैं अभी कई काम
यह जो मकान है
जिसमें तुम रहते हो
इसमें कोई तलघर नहीं है
इसमें आईने नहीं हैं
इसमें प्रतिध्वनियाँ नहीं हैं
इसमें कोई पिछवाड़ा नहीं है
हँसी ख़ुशी अवसाद अकेलापन
कविता के रूपक हैं
महापुरुषों ने कहा है कि दीन से प्यार करना
पर ताक़तवर को मत टोकना
क्रोध आए तो आपा मत खोना
पछताना मत
उदास मत रहना
मुश्किलें यूँ ही बढ़ती जाती हैं जहाँ
मेज़ को मेज़ कहना
चाक़ू को चाक़ू
मृत्यु हमेशा मृत्यु है
कुछ बेवक़ूफ़ इनके भेद खोलने में लगे रहते हैं
कुछ जिज्ञासु बेमतलब रोते रहते हैं
तुम रहस्य मत ढूँढ़ना
पक्षियों के उड़ने में कोई नई बात नहीं है
घास के हिलने का कोई अर्थ नहीं है
कहीं नहीं मिलते धरती और आकाश
नदियों को बहना है तो वे तो बहेंगी ही
यह क्षितिज सपाट है
यह एक दीवार है
और दूसरी दीवारों की तरह
इसके पीछे से
मरे हुए बुज़ुर्गों की फुसफुसाहटें नहीं आती
किसी याचना
किसी पुकार
किसी उत्तेजना
किसी घोषणा का कोई मतलब नहीं है
जो बीत गया
कोई और युग था
जो नहीं बीता
वह पूरे काग़ज़ पर ख़ाली जगह है
शब्द लिखने के बाद भी वह भरेगी नहीं
पिछले साल की ग़लतियों से सीखना
जीवन और जीवन नहीं है
साँस और साँस नहीं है
नींद एक विस्मृति है
सोते समय दरवाज़ा बंद कर लेना ठीक से
सुबह का आगमन एक नियम है
दरवाज़ा कल भी खुलेगा रोज़ की तरह
घड़ी कभी ख़राब नहीं होगी
बाहर सीढ़ियाँ होंगी रोज़ की तरह
रोज़ की तरह मील के पत्थर
रोज़ की तरह चेहरे
बाहर सूचनाएँ होंगी रोज़ की तरह
नियम
तालिकाएँ
गणित
चेतावनियाँ
शेयर बाज़ार के उछलते गिरते भावों की लुकाछिपी
लुच्चे-लफ़ंगे, उठाईगीरे, हत्यारे और दलाल
बाहर रोज़ की तरह महापुरुष होंगे
रोज़ की तरह सड़क पर खुले हुए गटर के मेनहोल
तुम्हें तो अपना ब्लड-ग्रुप तक याद नहीं
तो कल भी
रोज़ की तरह कुछ आवाज़ों के पीछे जाना
जल्दी-जल्दी दौड़ना
क़तार में खड़े हो जाना
सूचनापट्ट को भविष्य की तरह पढ़ना
देखना मत यहाँ वहाँ
पर्स कँघी रूमाल मोबाइल और चाबी सभी की हिफ़ाज़त ज़रूरी है
जूतों पर रोज़-रोज़ पालिश की अहमियत है
रोज़ की तरह सड़कें सीधी और सपाट
पीछे क़तार में कई लोग
लगातार आगे बढ़ने को कहते रहेंगे
जीवन में हर चीज़ ग़ौरतलब
बस अब आँखें मूंदो और सो जाओ
रोज़ की तरह।
रुके हुए फैसलों का समय
नकली मेधा थक गई काम करते करते
कस्टमर सर्विस हांफने लगीं पसीना सुखाने लगीं
रोबोट पलंग पर लेट गए थे
चादर ओढ ली गुणफलों ने
चिप्स और नेटवर्क को सन्निपात हो गया
दुनिया भर में उथल-पुथल मच गई
इस कोहराम में
याद आया कितना खूबसूरत नाम था
वह साइबर सिक्योरिटी प्लेटफार्म
जो कहलाता था "क्राउड स्ट्राइक "
रूठ गया था बेचारा प्लेटफार्म
...और सॉफ्टवेयर ने नाराज हो
सहसा ठप कर दिए दुनिया भर के तमाम उद्योग
हवाई अड्डों की लाचार अफरा तफरी,
स्थगित उड़ानें
और
अस्पतालों के इमरजेंसी ऑपरेशनों पर विराम,
डॉक्टरों के कौशल बौने हो गये एक स्क्रीन के आगे
कल्पना की जा सकती थी
ऑपरेशन टेबलों पर आँखें फैलाए पड़े
सैकड़ों लाचार जिस्म
भुगतान बाकी थे
और बैंकों से पैसा न निकल सका न कोई भेज सका।
रुक गईं थीं बोर्ड रूम की सारी मीटिंगें ,
सारी स्पर्धाएं,
सारी रणनीतियां
सारे टारगेट
सारे मुनाफे
बस दीवार पर टंगी घड़ियां मुंह चिढ़ा रही थीं
और
शेयर मार्केट की थम गई हलचलों से भी बड़ी थी
कोई और भी चीज
21वीं सदी की त्वरित धमाचौकड़ी
कुछ भी समझ नहीं पाई
स्थगनों , लाचारियों , मुद्राओं में बंधे हुए ये तनाव
उड़ता हुआ संचार घायल होकर जमीन पर पड़ा था
छटपटाती हुई अधूरी डिलीवरी
और परिणामोन्मुख माहौल
किससे शिकायत करते
खाली सफेद स्क्रीन पर
तेज तेज स्याह धारियां थीं
एक अहंकारी मस्तिष्क कुछ कहना चाहता था बेबस
पर कल्पना ने एक ठोकर मारी
और हंसी
एक विकराल हंसी
मुझे याद आई एक कविता जो मेरे कंप्यूटर में पड़ी हुई थी
इसी स्थगित समय में
मैंने उसे दोबारा पढा
इसका रचयिता अज्ञात था।
पुल पर अम्मा
क्या उन औरतों के चेहरे दिखाई देते हैं कभी
जो अब दीवारों के बाहर हैं
कैदखाने क्या वहीं तक थे
थोड़ी सी दया ,थोड़े से रहम
थोड़ी सी उदारतावाली दुनियाओं का अर्थ नहीं
आगे हैं येअंतराल
रिक्तता का एक राक्षसी जबड़ा फैला हुआ
कोई अंतिम मुकाम नहीं होता
जहां पटक जाए कोई लाकर किसी को
उसके बाद फिर भी एक दुनिया है
कभी दिख जाती ,कभी नहीं
खामोशियां
भीतर की ओर मुड़ी हुईं
भारी ढक्कनों से ढके हुए तहखाने
अपनी ख़ुदपरस्ती के इन रास्तों पर
तलाश
आखिर हमें किस बात की तलाश
क्या खोजते हैं हम ?
क्या हाशिए पर बिखरे हुए दृश्यों का कोई अर्थ होता है?
और कौन कहने लगता है पास आकर धीरे से
भाषा व्यर्थ है
शब्द बेमानी
कौन सुनना चाहता है रास्ते में बिखरी हुई अज्ञात कथाओं को?
वे नुची हुई ज़िंदगियां
और ये
तुम्हारे खूबसूरत लफ़्ज़ों के लिबास में लिपटे हुए आख्यान
एक बेचैनी
वह किसी घायल चिड़िया के
फड़फड़ाते हुए पंखों की तरह
रिसती रहेगी भीतर बस कुछ ही देर
क्यों
कोई रहम कोई करुणा कोई कसक
लौट लौट आती है
हर बार
कुछ इलाकों को छू कर
क्या
इस घुमड़न को लिखा जाना चाहिए
इस तरतीबदार दुनिया में
क्या होगा उससे
भूलना चाहिए
कि आगे एक दृश्य है...फिर एक दृश्य..फिर एक दृश्य
अम्मा तुम यह किस पुल पर बैठी हो ?
और पास से गुज़र जाते हैं सैकड़ों हज़ारों कदम।
तुम्हारी और मेरी दुनियाओं के बीच
क्यों टूट हुए हैं सारे पुल ?
शीर्षकहीन
सड़क किनारे बैठी एक अकेली बूढी औरत
अपनी अंटी से निकाल कर
कुछ सिक्के हथेली पर गिनती हुई
बहुत शोर है इस दुनिया में
होगा
जो उसके किसी काम का नहीं
क्या चल रहा है उसके भीतर फिलवक्त
यह तुम कभी जान नहीं पाओगे
यहीं पर
हां , यहीं पर तो छिपा है सबसे बड़ा रहस्य
इस कायनात का
उसका चेहरा तुम देख नहीं पाओगे
क्योंकि
उसकी देह से अलग उसका अब कोई चेहरा नहीं
उसकी भूख सिग्नल पर खींचती है तुम्हारा ध्यान
पल भर को
फिर तुम आगे बढ़ जाते हो
और छूटी रह जाती है उसकी वह अचिह्नित
एक गहरी तल्लीनता
तुम्हारे समूचे वजूद को बेमतलब बनाती हुई
क्योंकि उसके पास अभी कुछ सांस हैं
और जीना है
उसे जीना है अभी
तुम्हारी इसी दुनिया में
कहा था मेरे उस अग्रज शायर ने कभी -
" भूख और प्यास की मारी हुई इस दुनिया में
मेरे जज़्बात की कीमत क्या है!"
कोई जगह खाली नहीं
पीछा करती हैं
वस्तुएं
दृश्य
घटनाएं
सड़क पर पीछे से तेज दौड़ती आती कारों की तरह ।
वे पल भर को डरा देती हैं
फिर बगल से सर्र से गुजर जाती हैं ।
फिर एक घटना
दूसरे दिन कोई एक दूसरा दृश्य
दूसरा हादसा
ठहरता कुछ भी नहीं
बाहर या भीतर ।
फूट-फूट कर रोने के लिए नहीं बचे हैं
अब शमशान कब्रिस्तान मज़ार दरगाह देव स्थल
या
समाधियां
घुप्प अंधेरे में
पुकार की कोई एक मद्धम आवाज थी
कहीं एक अटकी हुई सांस थी
किसी एक गली में औंधे पड़े आदमी का चीत्कार था उसके केश से घास के गीले तिनके चिपके हुए थे
बदन में उठी एक झुरझुरी
कि उसके जीने का कोई मकसद था
बस में बगल में बैठे एक हमसफर के
गले से निकली थी एक अजीब सी कराह
शक्ल मैं देख नहीं पाया
एक कोहराम था कल प्लेटफार्म पर
एक सामूहिक विलाप यहां मेरे पड़ोस में
शायद कल
या
मैं भूलता हूं शायद परसों
या शायद पिछले हफ्ते
या पिछले बरस
फिर भी इतनी चुप्पी इतनी चुप्पी
लापता हुए
मार दिए गए
भुला दिए गए
इस तरह नामहीन
सबसे अबूझ रहस्य थे
धुंधले पड़ते जाते चित्रों में।
सड़कों पर बिखरे हुए सिक्कों की तरह
पड़े हुए हैं दिन
कोई इन्हें बटोरता नहीं
सब तारीखें
बेमतलब पुराने रद्दी अखबारों की तरह
जीवन से निकल जाता है सब
याद आया कि मनो चिकित्सकों ने कहा था
याद मत रखो कि कितनी सूचियां हैं
और मैं और आप स्तब्ध रह गए थे
कल किसी बात से
फिर भी नमकीन काजू के साथ शराब जारी रही
चुटकुलों पर हम हंसते भी रहे
पिछली घटना के शून्य को
हमेशा भर दिया है एक नई वारदात ने
ज्वार ग्रस्त ललाट और रात इतनी शांत
स्वप्न में अपने-अपने वृतांत बनते हैं
एक से दूसरे तक जाते-जाते
बदल जाता है सब ।
फुटपाथ पर नींद
वह अब कहीं शामिल नहीं है
यह देह किन्हीं कंदराओं में दुबक गई अनावृत
ठहरो कि कोई अंतिम परिणति नहीं है
निष्कर्षों की ओर मत जाओ
एक बेसबब होने की जिद धरती पर फैली हुई है
सतरंगी आसमान की कोमलताओं ने
दो घड़ी गपशप करने बुलाया है उसे
तोड़ लिए हैं रिश्ते उसने अब तुमसे
पीठ फेर ली है
लो संभालो तुम अपनी ये दुनिया
अपनी ये चौहद्दियां
तुम्हारे किसी खाते में
दर्ज नहीं अब उसका नाम
सैकड़ों वाहन वहां से गुजर जाएं बेमतलब
अफरा-तफरी और शोर-शराबे से बाहर
उसकी पस्ती
भूख की एक तनी हुई रस्सी पर
छम छमाछम नाच रही है
नींद के भी पहिए होते हैं
छूट गईं हैं पीछे तार तार चिंताएं चिथड़े उम्मीद जिल्लत हसरतें खलिश
सांस की धौंकनी पर यह जो कंपन है
जिंदगी भर की एक बची हुई नामालूम लय
एक वार्तालाप शब्दहीन आहिस्ता आहिस्ता
खुले गटर के पास देवत्व की कोमलता
मंथर कंपन
किस्से कथाएं चुपचाप दाखिल वहां
रात जो बज रही है
हर चीज के जीने और मरने में
जिस्म ने बचा रखी है अभी कुछ ताकत
झुके हुए ज़ख़्मी सितारे
वे बढ़ी हुई हथेलियों की तरह
तपते हुए माथे को सहलाने उतर आए हैं
अनसुनी आहट वहां कुछ फरिश्तों के आगमन की
और बतकही
बहती हवाएं बिखर देती हैं उनके संगीत को
सबसे गहन अंधेरों में।
विजय कुमार
11 नवम्बर 1948 मुम्बई में जन्म और शिक्षा- दीक्षा मुंबई विश्विद्यालय से।प्रारम्भ में " नवभारत टाइम्स" मुंबई में पत्रकारिता । बाद में बैंक में हिन्दी अधिकारी । 2005 में आई डी बी आई बैंक के प्रधान कार्यालय मुंबई में महाप्रबंधक पद से स्वैच्छिक अवकाश ।
कविता संग्रह -"अदृश्य हो जायेंगी सूखी पत्तियां" , " चाहे जिस शक्ल से " , "रात पाली " ," चयनित कविताएं " ।
आलोचना :" साठोत्तरी हिन्दी कविता की परिवर्तित दिशायें , ‘कविता की संगत ‘ , कवि-आलोचक मलयज के कृतित्व पर साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित मोनोग्राफ़, " कविता के पते -ठिकाने "।
वैचारिक निबन्ध -‘अंधेरे समय में विचार ‘ ,
(बीसवीं सदी के युद्धोत्तर यूरोपीय विचारकों पर पुस्तक) ," खिडकी के पास कवि “
(विश्व के 18 प्रमुख कवियोँ पर समीक्षात्मक निबन्ध ),
एडवर्ड सईद : जन बौद्धिक की भूमिका ,
"शहर जो खो गया" ( मुंबई महानगर का शहरनामा)।
कवितायें ,समीक्षायेँ, लेख , अनुवाद हिन्दी की सभी महत्वपूर्ण पत्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित ।
पाकिस्तानी शायर अफ़ज़ाल अहमद , समकालीन अफ़्रीकी साहित्य , जर्मन चिंतक वाल्टर बेन्जामिन तथा फिलीस्तीनी विचारक एडवर्ड सईद पर पत्रिकाओं के विशेष अंकों का संयोजन- सम्पादन ।"उद्भावना ‘ पत्रिका के चर्चित कविता विशेषांक ‘ सदी के अंत में कविता ‘ का अतिथि सम्पादन ।
कविताओं / लेखों का अंग्रेज़ी, मराठी, बांग्ला , कन्नड़, मलयालम,पंजाबी, गुजराती उर्दू आदि भाषाओं में अनुवाद |
सम्मान और पुरस्कार - ' शमशेर सम्मान ,देवीशंकर अवस्थी सम्मान " ,प्रियदर्शिनी अकादमी सम्मान,महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी सम्मान,डॉ. शिवकुमार मिश्र स्मृति सम्मान,डॉ धनंजय वर्मा स्मृति सम्मान।
इन दिनों स्वतन्त्र लेखन।
मोबाईल : 9820370825
ई -मेल : vijay1948ster@gmail.com
पेंटिंग: सुधीर पटवर्धन
सुधीर पटवर्धन का संसार
आधुनिक भारतीय कला- परिदृश्य में प्रख्यात कलाकार सुधीर पटवर्धन की एक विलक्षण किस्म की उपस्थिति रही है । पांच दशकों की अपनी सृजन- यात्रा में उन्होंने देश,काल और परिस्थितियों को बेजोड़ तरीके से अपने भीतर आत्मसात किया है। अपनी स्थानिकता से उनका अंतरंग लगाव महानगरीय जीवन की जटिल सामाजिक -आर्थिक संरचना, बदलते हुए भू - दृश्यों, सामाजिक अंतर विरोधों , गति और यांत्रिकता के साथ उलझी हुई मानव देहों, श्रमजीवी जनसाधारण के मनोविज्ञान ,सामूहिक अवचेतन की अनसुनी आवाजों व अकथ वेदनाओं के तमाम संदर्भों के साथ उभरा है।
सुधीर पटवर्धन पेशे से रेडियोलॉजिस्ट रहे हैं।उनके बारे में कहा जाता है कि ठाणे में अपनी क्लीनिक में उन्होंने अपने मरीजों के ही एक्स-रे नहीं निकाले हैं ,पिछले 5 दशकों में उन्होंने इस शहर की आत्मा का एक्स-रे भी अपनी कला में उतारा है।
सड़क,चौराहे ,रेलगाड़ियां,प्लेटफार्म ,बस स्टॉप, पुल, बाजार ,फुटपाथ ,सीढ़ियां, कारखाने, वर्कशॉप,अहाते, कमरे, बरामदे- हर जगह इन ' लोकेशन्स ' की अपनी अपनी चारित्रिक विशेषताएं रही हैं।मनुष्य हर जगह समूह में हैं और अकेले हैं। कोनो- अन्तरों के वे रहस्य लोक इस कला में रचे गये हैं जिनमें दैनंदिन स्थितियों और मनुष्य के बचे रहने का एक नाजुक सा संतुलन दिखाई देता है। नगर -बोध की यह चाक्षुष संवेदना ,उसकी अनेक परतें ,कौतुक और विडंबनाएं, सांकेतिकता और अनुगूंजें - वह सब जो एक दृश्य में है और उसके परे भी हैं -- वह सुधीर पटवर्धन का संदर्भ जगत रहा है। स्थिति ,समय और मनोभावों में निहित अजीब सी विकलताओं का यह एक 'इंटेंस ' संसार है।
अंग्रेजी के कवि और सुप्रसिद्ध कला मर्मज्ञ रंजीत होस्कोटे का यह कथन सुधीर की कला के बारे में बहुत सही है कि " मनुष्य की स्वायत्तता और गरिमा के लिए अनिश्चितताओं से भरे इस युग में सुधीर पटवर्धन के कॉस्मिक लैंडस्केप मानवीय संभावयताओं को कम नहीं करते, बल्कि किसी उम्मीद के लिए उसके आधार को और अधिक स्पष्ट कर देते हैं।"
-विजय कुमार











जीवंत,सजीव कविताएं। बधाई विजय जी।
ReplyDeleteअच्छी कविताएं। शुभकामनाएं।
ReplyDeleteमहानगरीय जीवन के गुमसुम अतः स्थलों को विजय कुमार जी की ये कविताएं - या इसके अलावा भी दूसरी कविताएं- जिस तरह से बुनती हैं, वह हमारी देखने की समझ को और समृद्ध करती है।
ReplyDeleteऐन जीवन के बीचोंबीच लिखी गयी जीवन से भरपूर कविताएं।
ReplyDeleteबहुत मार्मिक!
ReplyDeleteबहुत ही भावपूर्ण, विचारपरक और प्रासंगिक कविताएं।
ReplyDeleteबहुत अच्छी कविता।
ReplyDeleteविजय कुमार जी हमारे शहर के और हमारे समय के बेहद महत्वपूर्ण रचनाकार हैं।
ReplyDeleteउनकी कविताएं नारेबाज़ी से दूर अत्यंत संवेदनशील अनुभूतियों का जीवंत दस्तावेज़ हैं।
भाषा पर उनका अधिकार असाधारण है।
विजय कुमार सघन संवेदना के कवि हैं।शहरी जीवन की निम्नता, उसमें व्याप्त क्रूरता, हिंसा, अमानवीयता और विद्रूपता को विजय कुमार ने जिस तरह से अपनी कविताओं में दर्ज किया है , वह हिंदी कविता की एक अप्रतिम उपलब्धि है। इन कविताओं में जीवन, जीवन बोध अपनी संपूर्णता में उजागर होता है। कवि अपने आस पड़ोस के यथार्थ को जीवन संवेदना में घोलकर काव्य संवेदना में रूपांतरित करता है। विजय कुमार की सामाजिक प्रतिबद्धता इस रूपांतरण को सहज और स्वाभाविक बनाती है।बनावटी न होना इन कविताओं को अधिक आकर्षक और बोधगम्य बनाता है। इतनी सुंदर कविताओं को यहां प्रस्तुत करने के लिए कवि का और कौशिकी दोनों के प्रति आभार।
ReplyDeleteसही कहा।बहोत कम कविताएं होती हैं जो हमारे दुखों ,विडंबनाओं, अधूरी ज़िंदगियों का समर्थन करते हुए साथ बनी रहतीं और संघर्ष के साथ खड़ी रहती हैं।वे लोकेल विशेष में महदूद नहीं रहतीं बल्कि हर सरहद का अतिक्रमण करती हैं।विजय कुमार के लोकेल में कई जीवन ,,कई कला कर्मों में
Deleteअंतःप्रवाहित सच्चाईयां आमदरफ़्त हैं और उनके सरोकार।वे आदमी की दरकन-टूटन को वैश्विक चेतना के केनवस पर अंकित करते हैं।अदृश्य हो जाएंगी सूखी पत्तियां से रातपाली तक की कविताएं और उसके बाद भी उनकी कविताओं में सूक्ष्मश्रवा काव्यबोध है।अदेखे को देखने की सलाहियत के कवि हैं विजय कुमार।वे मूलतः कवि हैं।कविता से ही वे अन्य विधाओं में जाते है।फिल्म,चित्रकला, संगीत और नाट्यकला को पाने-समझने के रास्ते और ठिकाने काव्य संवेदना से होकर गुज़रते हैं।समाज के दुख-सुख में समरसता की जुगलबंदी को अगर हम पाते हैं तो पोएटिक सेंसेबिलिटी के कारण।इन कविताओं में बीते हुए समय की रूह में आज की भैरवी है।
विजय कुमार जी की ये कविताएं हमारे समय की सभ्यता के बीच छूट जा रही जिंदगी को साकार करती हैं। उनकी दृश्यावलियां, पात्र, उनके मनोभाव; यह परित्यक्त सा वास्तु; गहरी संलग्नता से कभी सिनेमा की तरह, कभी चित्रकृतियों की तरह हमारे भीतर उतरता चला जाता है।
ReplyDeleteविजय कुमार की कविताएँ महानगरीय जीवन की चकाचौंध के भीतर लगातार गहराते अंधेरे की कविताएँ हैं, जहाँ विकास, तकनीक और गति के शोर में मनुष्य, स्मृति और करुणा चुपचाप हाशिए पर धकेल दिए गए हैं। ये कविताएँ किसी तात्कालिक प्रतिक्रिया या वैचारिक घोषणाओं से नहीं, बल्कि देखे-भोगे यथार्थ की गहरी आंतरिक गवाही से उपजती हैं—उजड़ते घरों, फेंकी हुई वस्तुओं, फुटपाथ पर सोती देहों, रुके हुए फैसलों और आत्मा से सवाल करते आईनों के माध्यम से कवि अपने समय की अमानवीयता, असहायता और अकेलेपन को दर्ज करता है। यहां शोक है, पर विलाप नहीं; अवसाद है, पर निराशा का आत्मसमर्पण नहीं—बल्कि मनुष्य के बचे रहने की जिद, स्मृति की जड़ता और करुणा की अनिवार्यता है। भाषा संयत, पारदर्शी और नारेबाज़ी से मुक्त है, जिसमें दृश्य और विचार एक-दूसरे में घुलकर पाठक को केवल विचलित नहीं करते, बल्कि ठहरकर सोचने को विवश करते हैं। इस अर्थ में विजय कुमार की कविताएँ समकालीन हिंदी कविता में महानगरीय अनुभव, नैतिक बेचैनी और मानवीय संवेदना का एक सघन, ईमानदार और अत्यंत प्रासंगिक दस्तावेज़ बनकर उपस्थित होती हैं।
ReplyDeleteविजय जी कविताएँ पूंजी से उपजे अंधकार के प्रतिरोध की कविताएँ हैं।
ReplyDeleteशोर उठेगा
ReplyDeleteभीतर से.... क्या बात 🙏
विजय कुमार जी कविता में कम बोलने वाले एक महीन अर्थवान कवि हैं। उनकी दृष्टि में महानगरीय व्यथा और उस व्यथा की सम्यक् आलोचना स्वतः सम्मिलित रहती है!
ReplyDeleteपुनश्च
ReplyDeleteविजय कुमार की इन कविताओं मे व्यतीत के बाद का संसार है।वह हाशिया है, जो केंद्र से बिछुड़ कर अपने हाशिये होने की स्मृति भी मिटा चुका है। बीता हुआ समय क्या केवल बीता हुआ समय भर होता है? उसके बीतने की एक अंतः कथा होती है।वह कथा जो समय के बोध को समय से बाहर हो जाने की पीड़ा को गहरे अवसाद तक ले जाती है।यहां कोई प्रेमी है जो बिछोह के बाद अपने अतः संसार की जकड़न से कभी मुक्त नहीं हो सकेगा। वह प्रसन्नता और खुशी के संसार को अलविदा कह चुका है।वह अपने असफल रह जाने, छूट जाने अर्थ और व्यर्थ की सीमाओं के पार चले जाने में ही अपना प्रति संसार रचता है।उसकी स्मृति सदा के लिए उसी के साथ इस दुनिया से मिट जाएगी । एक दिन वह अचानक इस दुनिया से चला जाएगा। उसका जाना इस संसार में, किसी की स्मृति में ,कोई खलल पैदा नहीं करेगा।यह हमारे समय की क्रूरता का, हिंसा का, अनकही बर्बरता का, वर्चस्व का, दमन का कितना सूक्ष्म और बारीक प्रसंग है। इसके बगैर हमारा आत्म कितना खाली निचाट और आसमान की तरह अर्थहीन है!
विजय कुमार की इन कविताओं का हासिल है कि आप इन्हें पढ़कर बेतरह उदास होते है। मगर अपने बीत जाने, अनुपयोगी रह जाने, निरर्थक हो जाने के अपराध से मुक्त हो जाते हैं। ये कविताएं छूट गए लोगों की, बीत गए संसार की मार्मिक कथा कहती है। इस कथा में हमारी आत्मा की परछाईं साफ और धवल दिखाई देती है। आत्मा पर उभरे समय के निशान भी साफ दिखाई देते हैं। ये कविताएं हमें अधिक मानवीय, अधिक मनुष्य बनाती हैं।
बेहतरीन कविताएँ, जो भीतर तक दस्तक देती हैं और पाठक मन को झकझोर कर रख देती हैं।
ReplyDeleteये केवल दृश्यों की कविताएं नहीं हैं दृश्यों के भीतर जो जीवन है उदासी है संघर्ष है विगत है अवसन्नता है उसकी कविताएं हैं।
ReplyDeleteतलस्पर्शी पीड़ा का आख्यान।
ReplyDeleteकिसी छूट चुके समय,किसी अवशेष ,किसी की याद ,अच्छी कविताएं हैं!
ReplyDeleteहर कविता कितनी संपूर्ण, बल्कि हर ठहराव पर कैसा उदास सौंदर्य ठहरा है! पंक्तियां चोट करती हैं, सहलाती हैं, शब्द चयन संभालता है, हाथ हाथ आगे बढ़ा लिए जाता है। विजय कुमार जी की कविताएं पढ़ने का सौभाग्य मिला कौशिकी के माध्यम से। इतनी संक्षिप्त टिप्पणी मुझे इन कविताओं के हर ठहराव पर शर्म से भर देगी। सुबह से इन्हें दो बार पढ़ा। हर बार ठिठकते हुए सोचा कि इस पंक्ति से शानदार क्या होगा!, लेकिन आगे उतनी ही धारदार और तेज़ खरोंचती हुई पंक्ति फिर आ ठहरती रही। विजय कुमार हमारे वरिष्ठ हैं और उनकी वरीय वरिष्ठता उनकी इन ताज़ा कविताओं की गवाही में इस चुप्पे, अंधेरे, सीले हुए समय के दरिया में एक नया प्रकाश स्तंभ खड़ा करती समझ आती हैं। सुधीर पटवर्धन जी के चित्रों से भेंट विजय जी की ही पुस्तक शहर जो खो गया के रास्ते हो चुकी थी, यह दूसरी मुलाकात हुई, विजय जी के ही माध्यम से। विजय जी की और और कविताएं पढ़ने की आकांक्षा बनी रहेगी। शुक्रिया।
ReplyDeleteठहरकर पढ़ी जाने वाली मार्मिक कविताएँ हैं सभी। विजय जी को कौशिकी के माध्यम से बार पढ़ा है। उन्हें बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएँ पहुंचे। शंकरानन्द जी का आभार 🌼
ReplyDeleteइन कविताओं के शीर्षक ही सीधे हमें कवि के सरोकारों और चिंताओं के सम्मुख ले जाते हैं। मध्यवर्गीय नागरिक जीवन की विडम्बनाएं ही नहीं समय को साक्षी की तरह देखने वाले प्रबुद्ध चित्त का कलात्मक तनाव इन कविताओं को अतुलनीय बना देता है।
ReplyDeleteऐसी कविताएँ बिना ऊँचे स्वर, बिना भावुक आग्रह और बिना किसी नायकत्व के मनुष्य को बचाए रखने का काम करती हैं। यहाँ कविता न तो सौंदर्य का प्रदर्शन है, न क्रांति का नारा, बल्कि एक सजग, नैतिक और आत्मचेतस दृष्टि है, जो साधारण भाषा में असाधारण सच कह देती है। कविता के ये काम बड़े हैं, आज्ञाओं और नियमों की भाषा को हूबहू अपनाकर उसकी अमानवीयता को उजागर कर देना, इस तकनीक-पूजक समय के अहंकार को एक क्षणिक ठहराव से हास्यास्पद और नश्वर सिद्ध कर देना, और करुणा को किसी आदर्श या समाधान में बदलने के बजाय उसकी असहज, बार-बार लौट आने वाली उपस्थिति को स्वीकार करना, यह तीनों आयाम कविता को एक ऐसी दुर्लभ संवेदनात्मक जगह रचते हैं जहाँ पाठक खुद से टकराता है; सबसे अनोखी बात यह है कि ये कविताएँ अर्थ देने के बजाय अर्थ खोजने की नैतिक ज़िम्मेदारी पाठक पर छोड़ देती हैं, और यही समकालीन कविता में विजय जी का सबसे विरल और मूल्यवान गुण है।
सही कहा।बहोत कम कविताएं होती हैं जो हमारे दुखों ,विडंबनाओं, अधूरी ज़िंदगियों का समर्थन करते हुए साथ बनी रहतीं और संघर्ष के साथ खड़ी रहती हैं।वे लोकेल विशेष में महदूद नहीं रहतीं बल्कि हर सरहद का अतिक्रमण करती हैं।विजय कुमार के लोकेल में कई जीवन ,,कई कला कर्मों में
ReplyDeleteअंतःप्रवाहित सच्चाईयां आमदरफ़्त हैं और उनके सरोकार।वे आदमी की दरकन-टूटन को वैश्विक चेतना के केनवस पर अंकित करते हैं।अदृश्य हो जाएंगी सूखी पत्तियां से रातपाली तक की कविताएं और उसके बाद भी उनकी कविताओं में सूक्ष्मश्रवा काव्यबोध है।अदेखे को देखने की सलाहियत के कवि हैं विजय कुमार।वे मूलतः कवि हैं।कविता से ही वे अन्य विधाओं में जाते है।फिल्म,चित्रकला, संगीत और नाट्यकला को पाने-समझने के रास्ते और ठिकाने काव्य संवेदना से होकर गुज़रते हैं।समाज के दुख-सुख में समरसता की जुगलबंदी को अगर हम पाते हैं तो पोएटिक सेंसेबिलिटी के कारण।इन कविताओं में बीते हुए समय की रूह में आज की भैरवी है।
सुंदर व निहायत गठी हुई मन को रिझाती और अपने समय को अभिव्यक्त करती कवितायें। पढ़वाने के लिए हार्दिक आभार!
ReplyDeleteये कविताएं पीछे छूट गए , शहर के कोने अंतरे में अदृश्य उपस्थितियों की तरह मौजूद लोगों, दृश्यों पर रौशनी फेंकती है और उन्हें उस तरह सम्मुख करती हैं कि हमें इस दुनिया को देखने का एक नया सलीका दस्तियाब होता है। इन कविताओं की अनुगूंजें देर तक साथ रहने वाली है।
ReplyDeleteबहुत अच्छी और अलग तरह की कविताएँ ।
ReplyDeleteविजय कुमार जी हिन्दी की आलोचना में सबसे चमकता हुआ नाम है, परन्तु सबसे पहले इलियट की तरह के बैंक खातों से निकल कर जीवन की सच्चाइयों से भी जूझते हुए कवि हैं,यह जैसे कविताएं नहीं कवि का वेस्ट लेंड भी है,,,,,,
ReplyDeleteविजय कुमार की कविताएं पढ़ना अपने हाथ से फिसलती रेत की तरह समय को छूटते हुए देखना है। ये कविताएं हमारे समय की गवाह भी हैं।
ReplyDeleteकई बार पढ़ीं। एक कवि कैसे देखता है अपने समय को, समय की घुड़दौड़ में छूट चुकी ज़िंदगियों को, उन ज़िंदगियों के अंधेरे को जिसे सामान्य ऑंखें नहीं देख पा रहीं या देखकर भी अनदेखा कर देती हैं, क्योंकि महानगरीय शोर में इतना दिख जाना गहरी संवेदना के बग़ैर सम्भव नहीं।
ReplyDeleteशुक्रिया पढ़वाने के लिए।
विजय कुमार जी कविताएं असाधारण है। सभ्यता ,महानगरीय जीवन के लिए बहुत कुछ हमारे सामने दिखा कर जाती है। मुझे अंतिम तीन लाइन में बहुत कुछ सीखने को मिला : बचा रहेगा बस एक संताप......"
ReplyDeleteवाह ! ईंट पत्थरों के ज़ख़्मों से झाँकता समय।
ReplyDeleteस्पर्शी कविताएं जो दृश्य के साथ उसके पार्श्व को भी दिखाती हैं।
ReplyDeleteमहानगरीय जीवन के विषाद और संत्रास को समूची सम्वेदनशीलता के साथ व्यक्त करतीं विजय कुमार की ये कविताएँ स्तब्ध कर देती हैं. बहुत दिनों बाद ऐसी जीवंत कविताएँ पढ़ने को मिलीं. सुधीर पटवर्धन की अद्भुत paintings से सजी इन कविताओं का प्रभाव दूरगामी है. इस प्रस्तुति के लिए "कौशिकी ' को हार्दिक साधुवाद और विजय कुमार को अशेष बधाइयां.
ReplyDeleteविजय कुमार जी की कविताओं में
ReplyDeleteआज का समय ध्वनित होता है
महानगर की यातना उनकी कविताओं में
दिखाई देती है।
ReplyDeleteइस तरह की कविताएँ आदमी और शहर के बीच एक पुल का निर्माण करती हैं, जहाँ से हम ज़िंदगी के उन पहलुओं को भी देख पाते हैं, जिन्हें देखने में हम असमर्थ रहते हैं। ये कविताएँ सामाजिक सरोकारों की कविताएँ हैं, जिनके केंद्र में मनुष्य है। अपनी दुर्लभ बातों को सरलता से कहना ही इन कविताओं को खास बनाता है।
विजय कुमार जी जितने उत्कृष्ट आलोचक -चिंतक हैं उतने ही या कहें कि उससे भी अधिक एक सिद्ध कवि हैं। इन नई कविताओं से इस बात की तस्दीक होती है। चीजों को विस्मृति की खाइयों में धकेल देने की साजिशों के खिलाफ़ ये मजबूती से खड़ी कविताएं हैं। यहाँ "कौन है...कौन है?" की अपरिचित और निष्ठुर ध्वनियां नहीं बल्कि तमाम उदासियों के बीच हमराही की आत्मीय तलाश है। इस स्क्रीनमय नकली-दिखावटी दुनिया का एक ज़बरदस्त सर्जनात्मक प्रतिरोध है ये कविताएँ । विजय कुमार जी को तो बधाई है ही , उससे ज़्यादा शंकरानन्द का साधुवाद जो विजय जी की एकदम नई कविताओं को हमारे आस्वाद का अंग बना सके।
ReplyDeleteउम्दा कविताएं , एक शहर में अनेकों शहर की गाथा , पीड़ा और मशक्कत उकेरी गई है । विजय कुमार एक मजबूत और विचारशील कवि हैं ।
ReplyDeleteइस तरह की कविताएँ आदमी और शहर के बीच एक पुल का निर्माण करती हैं, जहाँ से हम ज़िंदगी के उन पहलुओं को भी देख पाते हैं, जिन्हें देखने में हम असमर्थ रहते हैं। ये कविताएँ सामाजिक सरोकारों की कविताएँ हैं, जिनके केंद्र में मनुष्य है।
ReplyDeleteअपनी दुर्लभ बातों को सरलता से कहना ही इन कविताओं को खास बनाता है।