संजय भिसे की कविताएं
संजय भिसे इस क्रूर और नृशंस समय में सबसे गहरे संकट में मनुष्य और मनुष्यता के साथ वे तमाम जीव हैं जो जीवन की मामूली और मूलभूत आवश्यकताओं और सुविधाओं के लिए निरंतर संघर्ष कर रहे हैं।हिंसा से कोई जगह नहीं बच पा रही। ऐसे में बुद्ध और स्त्री की याद आना स्वाभाविक है।संजय भिसे की कविताएं चीजों को अलग नजरिए से दिखाती हैं जिनमें स्थानीयता भी है और प्रासंगिकता भी।बुद्ध भी हैं और स्त्री भी। जीवन के द्वंद्व की एक अद्भुत लय इन कविताओं में है। संजय भिसे की कविताएं इलहाम अनेक व्याधियों से त्रस्त दवाईयां खाकर परेशान पत्नी के सिरहाने बैठ दबा रहा था उसका सिर कनपटी की पिराती हुई नसें रक्ताल्पता के बावजूद न जाने क्या भरा था उनमें हल्के छूते ही तड़पकर जाग उठता था दर्द गृहस्थ जीवन के इन वर्षों में थोड़ा बहुत हाथ ही बंटाता आया हूं मैं वही ढोती होती है गृहस्थी का समूचा भार गृहस्थी के लिए ढोना शब्द अवश्य ...