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लाल्टू की कविताएं

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                                    लाल्टू    अपने समय के प्रतिरोध और उसके लिए बेचैनी को दर्ज करने वाली जो भाषा जो लाल्टू के पास है वह चकित करती है।इन कविताओं में हम समकालीन हिन्दी कविता के बने बनाए मुहावरे से अलग एक नया तेवर देख सकते हैं और यह तेवर बहुत पुराना है।जैसे जैसे समय बदल रहा है, समाज बदल रहा है उसी अंदाज में कविता भी बदल रही है।ये कविताएं इसी बदले हुए समय की कविताएं हैं। बिल्कुल अपने समय के नब्ज पर हाथ रखती हुई। लाल्टू की कविताएं प्रतिरोध अनजान कोई नहीं, यहाँ हर कोई मेरा माँ-जाया है अनगिनत शिकवे मेरी माँ के आँचल में आ पसरते हैं , तितलियाँ हैं चुपचाप रंग बिखेरती, यहाँ प्यार की लहरें हैं , कि हर कोई इंसान है। मेरे आँसू पोंछती औरत निरंतर तालियाँ बजाती है कि ज़माना बदलेगा। यहाँ सड़कों पर घूमते हुए देखता हूँ हर कोई चीखता कह रहा कि मार लो जितना मार सकते हो हर कोई कीड़ा कहलाता नाच रहा है हर कोई किसी और को खाना खिला रहा है यहाँ सभी खेल दुरुस्त हैं कि हर कोई खेल में शामिल है हर कोई साथ ...

अश्विनी कुमार की कविताएँ

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                              अश्विनी कुमार  बाज़ार के बढ़ते दबाव के बीच जीवन की जटिलताओं और विडंबनाओं ने मनुष्य को स्वार्थी, कठोर,एकाकी और तटस्थ बना दिया है।वह हर जगह एक सुरक्षित किनारा खोजता है जहां कछुए की तरह खुद को एक खोल में छिपा सके। अश्विनी कुमार की कविताएं ऐसे ही समय और समाज की कविताएं हैं जहां युद्ध एक रोमांच है और हत्या एक खबर।ये कविताएं नई भाषा, शैली और नए बिंब के माध्यम से अपने समय की गवाही देती हैं। अश्विनी कुमार की कविताएं  शहर में जंगल मेरे शहर के बीचोबीच एक जंगल था। धीरे-धीरे पेड़ कम होते गए, लेकिन उनके ठूँठों पर आज भी कभी-कभी बूढ़े गिद्ध उतर आते हैं। वे अपनी चोंच से कुरेदते हैं बचे हुए जंगल की अस्थियों का स्वाद। कहते हैं, सभ्यता के विकास के लिए सबसे पहले जंगलों का ख़त्म होना ज़रूरी है, फिर नदियों का सूख जाना, और सपनों का आँकड़ों में बदल जाना। रात को जब सायरनों की आवाज़ फ़र्नीचर बाज़ार की गलियों में खो जाती है, मैं अपनी मेज़ पर झुका हुआ पुराने नक्शों में खोजता रहता हूँ— थोड़ी-बहुत हरिया...

विनय सौरभ की कविताएं

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                                विनय सौरभ  बाजार की चमक और अंधाधुंध विकास के बीच संबंधों की छीजती ऊष्मा ने मनुष्य को बिल्कुल अकेला और असहाय बना दिया है।ये और बात है कि इसका एहसास करने की भी फुर्सत किसी के पास नहीं है। विनय सौरभ की कविताएं इस एहसास को मजबूत करने वाली हैं। इनमें अपनी जड़ों से टूटने का दुःख है तो रिश्तों को बचाए रखने की विकलता भी है। मनुष्य और उसके जीवन से जुड़ी हुई जिन जिन चीजों को बहुत चालाक तरीके से नष्ट किया जा रहा है, उनकी बहुत मार्मिक उपस्थिति विनय सौरभ की कविताओं की विशेषता है। विनय सौरभ की कविताएं  घर मैं चलता हूँ  या अब मुझे चलना चाहिए कहता हुआ आता हूँ  घर के दरवाज़े पर फ़िर कब आ पाऊँगा या फ़िर मुझे जल्दी आ जाना चाहिए मेरा झोला ठीक करते हुए  माँ कहती थी, जब वह थी  और दरवाज़े से आँख भर मेरा जाना देखती थी इस तरह से अपनी नौकरी पर जाने को निकलता हूँ घर से और थोड़ा घर पर ही छूट जाता हूँ रूलाई बाहर आने से रोकता हूँ बड़े भाई को कहता हूँ - फलाँ काम देख लीजिएगा...