स्मिता सिन्हा की कविताएं
स्मिता सिन्हा पूरी दुनिया आज जिस युद्ध, संघर्ष और तनाव से गुजर रही है उसमें स्त्रियों और बच्चों की जिंदगी बद से बदतर हो गई है। एक घने हाहाकार के बीच सब कुछ झुलस रहा है। स्वप्न हो या उम्मीद , नींद हो या न्याय सब ख़तरे में है।जो आंदोलन और प्रदर्शन हो रहे हैं वे हक के लिए हैं और हक की किसी को परवाह नहीं है। स्मिता सिन्हा की कविताओं में हमारे समय का यह धूसर सच बिना किसी लाग लपेट के दर्ज है। स्मिता सिन्हा की कविताएं इतना कि हम उसे जीवन कह सकें क्या है यह कि हर बार सब कुछ ख़त्म होने के बाद भी कुछ न कुछ बचा रहता है इतना कि हम उसे जीवन कह सकें कैसा समय है यह कि शहर के गिर जाने के बाद भी उसका नाम बचा रहता है नक्शे पर खिंची रेखाएँ काँपती नहीं सीमाएँ अपनी जगह अड़ी रहती हैं कैसी जिद है यह कि धुएँ से ढँके आकाश के...