उमा शंकर चौधरी की कहानी
उमा शंकर चौधरी हमारे यहां हर गांव में एक ऐसा पेड़ होता है जिस पर भूत रहते हैं. ऐसी जमुनी फुआ भी होती है और एक बिछिया भी. हम उन्हें कहां खोज पाते हैं. न उन्हें पहचान पाते हैं. भूतहा पेड़ की स्मृति बनी रहती है आजीवन. मेरे जीवन में इन तीनों की सघन स्मृति है. उमा भाई की कहानी पढ़ती रही हूँ. कहानी के अंत तक पहुँचते -पहुँचते मैं बहनापे की उस आभा से भर गई जिसकी तलाश मेरा लक्ष्य है. मैं बिछिया बनूँ न बनूँ… जामुनी फुआ ही बन जाऊँ या जीवन में एक ऐसी फुआ खोज पाऊँ जिसकी तलाश कहानियों में करती फिरती हूँ. यही काफ़ी है. मैंने अपनी दोस्त से कहा था कि मेरे होते कोई स्त्री अकेली नहीं हो सकती. मैं साथ बनी रहूँगी. जामुनी फुआ जैसा पावरफुल किरदार बन जाना आसान नहीं. दो स्त्रियों का संग -साथ दुनिया का चेहरा बदल सकता है. उमा भाई की कहानी लंबी है. सारे किरदारों के चरित्र को खूब विस्तार मिला है. पूरा परिवेश खुलता है और किरदार उभरते चले आते हैं. जिन्हें लगता है, दुनिया नई हो गई है. बदल गई है, वो अपने संसार की असली हालत समझना चाहें त...