संजय अलंग की कविताएं
संजय अलंग युद्ध की आग में न जाने कितनी बार यह दुनिया तबाह हुई है और आज भी यह तबाही जारी है। युद्ध की परिभाषा बदल गई,तरीका बदल गया, युद्ध के हथियार बदल गये लेकिन मरने वाले लोग और उजड़ने वाले घर आज भी वैसे ही निरीह, निर्दोष और निसहाय झुलस रहे हैं। सभ्यता के बसने में सदियां बीत जातीं हैं लेकिन उनके राख होने में एक पल नहीं लगता। यहां प्रस्तुत संजय अलंग की नई कविताएं इसी युद्ध को,युद्ध के पीछे की राजनीति को देखती और दिखातीं हैं। संजय अलंग की कविताएं लाभ का समीकरण जीते हैं वे लाभ के लिए बनाते हैं साम्राज्य वे जानते हैं वे युद्ध त्रासद नहीं है न ही विध्वंसकारी और न ही अराजक केवल वे ही जानते हैं कि यह लाभ है और रचते रहते हैं वे सर्वोच्च गणित लाभ का लगातार वे विजेता हैं वे लड़ते नहीं हैं वे रण के मैदान में नहीं उतरते वे युद्ध पर नियंत्रण रखते हैं वे दोनों पक्षों के साथ होते हैं इसे वे अनिवार्यता में बदल देते हैं डर और भय बने रहने से युद्ध बना रहता है यु...