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अनिल गंगल की कविताएं

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  अनिल गंगल अनिल गंगल की कविताओं में हमारे समय का यथार्थ बहुत ठोस और खुरदरे रूप में दर्ज है।इन कविताओं में जीवन के अनेक रंग हैं लेकिन केंद्र में मनुष्य और उसकी संवेदना को कुरेद कर रख देने वाली वह बेचैनी है जो कसीदे लिखने से इनकार करती है। प्रतिरोध की ये ऐसी कविताएं हैं जहां फुसफुसाना चीख से ज्यादा कारगर है। अनिल गंगल की कविताएं  क़सीदे क़सीदे लिखने वाले लोग अक्सर सच से थोड़ी दूरी पर बैठते हैं- इतनी दूरी पर जहाँ से चेहरा साफ़ दिखे पर झुर्रियाँ नहीं। वे शब्दों को इत्र की तरह छिड़कते हैं और इतिहास को एक चमकदार आईने की तरह दीवार पर टाँग देते हैं जिसमें हर चेहरा थोड़ा अधिक सुंदर दिखाई देता है। क़सीदे में राजा हमेशा उदार होता है हाकिम हमेशा न्यायप्रिय  और विजेता हमेशा धर्मात्मा- भले ही गाँव के कुएँ में अब भी तलवार की जंग उतर रही हो। क़सीदे लिखने वाले जानते हैं कि वे सच को रेशमी कपड़े में लपेट रहे हैं लेकिन रेशम की सरसराहट सिक्कों की खनक से कम मोहक नहीं होती। और धीरे-धीरे क़सीदे इतने ऊँचे स्वर में गाए जाते हैं कि सच्चाई किसी अँधेरे कमरे में बैठी अपनी बारी का इंतज़ार करती रह जाती है। मगर इत...

अरुण आदित्य की कविताएं

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  अरुण आदित्य   समकालीन कविता में जिन कवियों की पहचान उनकी भाषा और अर्जित मुहावरों से होती है उनमें अरुण आदित्य भी हैं। उनकी कविताएं जीवन के उन छोटे-छोटे अनुभवों,वस्तुओं और दृश्यों से निर्मित हैं जिनके बिना जीवन असंभव सा है। डर किसी उदास दोपहर में बिल्कुल बुझे मन के साथ हम बोर हो रहे होते हैं थोक में आए ग्रीटिंग कार्ड्स को देखकर कि अचानक हमारे हाथ में आता है एक ऐसा कार्ड जिसे देखने के बाद हम ठीक वही नहीं रह पाते जो इसे देखने से पहले थे कितना अद्भुत है यह कार्ड कि एक अच्छे ब्लॉटिंग पेपर की तरह सोख लेता है सारी ऊब और उदासी इसमें छपे फूलों की खुशबू कार्ड से बाहर निकल तैरने लगती है हवा में शिशिर ऋतु में अचानक आ जाता है बसंत हम भूल जाते हैं सारी चिड़चिड़ाहट आ जाती है इतनी उदारता की अपनी गलती न होने के बावजूद माफ़ी मांग लेते हैं कुछ देर पहले झगड़ चुके सहकर्मी से इतना विशाल हो जाता है हृदय कि वाकई क्षुद्र लगने लगती हैं अपनी क्षुद्रताएँ इतना कुछ बदल जाता है अचानक कि ग्रीटिंग कार्ड भेजने की औपचारिकता के खिलाफ सदा रहा आया मैं सोचने लगता हूँ कि दुनिया के हर आदमी को मिलना ही चाहिए एक ऐसा ...

उर्मिला शिरीष की कहानी

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  उर्मिला शिरीष   उर्मिला शिरीष की कहानी 'हरा पत्ता' उत्तर आधुनिक समय की उस समस्या को दर्ज करती है जिसमें अंधाधुंध विकास के क्रम में एक तरफ तो आगे निकल जाने की होड़ है दूसरी तरफ अपनी जड़ों की याद भी रह रह कर टीसती है। रिश्ते खत्म हो रहे हैं, संबंध बिखर रहे हैं,आपसी सद्भाव और सहिष्णुता की जड़ें टूट रही हैं। ऐसे में भी एक चाह है जो वापस खींच लेना चाहती है।कहानी इस द्वंद को बहुत मार्मिक तरीके से दर्ज करती है। हरा पत्ता  ‘‘आपको ढेर सारी बधाईयाँ। आप भाग्यशाली हैं जो आपको पहली बार में ही ग्रीन कार्ड मिल गया है।‘‘  ‘‘धन्यवाद।‘‘ गद्गद होकर अपनी खुशी उड़ेलकर बधाई देने वाले सज्जन को उन्होंने जवाब दिया। उन दोनों की खुशी और उत्साह देखकर उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि इसमें इतनी बड़ी खुशी की क्या बात है? लोग इतना खुश क्यों हो रहे हैं। ऐसी खुशी भरी बधाईयाँ तो उनके यहाँ शादी तय होने पर, बच्चे के जन्म लेने पर या किसी का बड़ी नौकरी में चयन होने पर दी जाती थी।  ‘‘हम लोग तो चैथी बार ट्राय कर रहे हैं। इस बार भी पता नहीं वीजा मिलता है या नहीं। सालों हो गये हमारे बेटे को वहाँ रहते हु...