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हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएं

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  हरीश चन्द्र पाण्डे हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताओं की सबसे बड़ी खासियत उनकी भाषा,उनके मुहावरे और बेध देने वाली सादगी है जो बेचैन कर देती है।उनकी कविताएं एक तरफ तो मानवीय मूल्यों की पक्षधर हैं तो दूसरी तरफ सत्ता, व्यवस्था और पूंजी के प्रपंच के मकड़जाल को भी चिन्हित करती हैं।सीधे,सरल और मामूली विषयों पर लिखी उनकी कई कविताएं समकालीन कविता में अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं। यहां प्रस्तुत कविताएं भी इसी का उदाहरण हैं। हरीश चन्द्र पाण्डे की नई कविताएं  सुनना और दीगर बातें  वह सुनने का असीम धैर्य लिए बैठा है  सबको सुनता है उनके चुक जाने तक  पक्षियों को पर फड़फड़ाने से लेकर  परों के भीतर चोंच समो लेने तक सुनता है  सरीसृपों को बिल के भीतर पूंछ सिमटाने तक  उसे आवाज़ें चाहिए बस वह चुप्पी को श्मशान की बुझी राख कहता है  कोई आवाज़ नहीं आएगी तो - वह नल की टोंटी थोड़ी ढीली कर देगा  उसकी सकारात्मकता कहती है ऊपर टंकी का खाली हो जाना  नीचे किसी पात्र का भर जाना भी हो सकता है  इधर अचानक सुनने के विरुद्ध उसने यूं टर्न ले लिया है  कहता है बहुत हो...

अनिल गंगल की कविताएं

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  अनिल गंगल अनिल गंगल की कविताओं में हमारे समय का यथार्थ बहुत ठोस और खुरदरे रूप में दर्ज है।इन कविताओं में जीवन के अनेक रंग हैं लेकिन केंद्र में मनुष्य और उसकी संवेदना को कुरेद कर रख देने वाली वह बेचैनी है जो कसीदे लिखने से इनकार करती है। प्रतिरोध की ये ऐसी कविताएं हैं जहां फुसफुसाना चीख से ज्यादा कारगर है। अनिल गंगल की कविताएं  क़सीदे क़सीदे लिखने वाले लोग अक्सर सच से थोड़ी दूरी पर बैठते हैं- इतनी दूरी पर जहाँ से चेहरा साफ़ दिखे पर झुर्रियाँ नहीं। वे शब्दों को इत्र की तरह छिड़कते हैं और इतिहास को एक चमकदार आईने की तरह दीवार पर टाँग देते हैं जिसमें हर चेहरा थोड़ा अधिक सुंदर दिखाई देता है। क़सीदे में राजा हमेशा उदार होता है हाकिम हमेशा न्यायप्रिय  और विजेता हमेशा धर्मात्मा- भले ही गाँव के कुएँ में अब भी तलवार की जंग उतर रही हो। क़सीदे लिखने वाले जानते हैं कि वे सच को रेशमी कपड़े में लपेट रहे हैं लेकिन रेशम की सरसराहट सिक्कों की खनक से कम मोहक नहीं होती। और धीरे-धीरे क़सीदे इतने ऊँचे स्वर में गाए जाते हैं कि सच्चाई किसी अँधेरे कमरे में बैठी अपनी बारी का इंतज़ार करती रह जाती है। मगर इत...

अरुण आदित्य की कविताएं

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  अरुण आदित्य   समकालीन कविता में जिन कवियों की पहचान उनकी भाषा और अर्जित मुहावरों से होती है उनमें अरुण आदित्य भी हैं। उनकी कविताएं जीवन के उन छोटे-छोटे अनुभवों,वस्तुओं और दृश्यों से निर्मित हैं जिनके बिना जीवन असंभव सा है। अरुण आदित्य की कविताएं  डर किसी उदास दोपहर में बिल्कुल बुझे मन के साथ हम बोर हो रहे होते हैं थोक में आए ग्रीटिंग कार्ड्स को देखकर कि अचानक हमारे हाथ में आता है एक ऐसा कार्ड जिसे देखने के बाद हम ठीक वही नहीं रह पाते जो इसे देखने से पहले थे कितना अद्भुत है यह कार्ड कि एक अच्छे ब्लॉटिंग पेपर की तरह सोख लेता है सारी ऊब और उदासी इसमें छपे फूलों की खुशबू कार्ड से बाहर निकल तैरने लगती है हवा में शिशिर ऋतु में अचानक आ जाता है बसंत हम भूल जाते हैं सारी चिड़चिड़ाहट आ जाती है इतनी उदारता की अपनी गलती न होने के बावजूद माफ़ी मांग लेते हैं कुछ देर पहले झगड़ चुके सहकर्मी से इतना विशाल हो जाता है हृदय कि वाकई क्षुद्र लगने लगती हैं अपनी क्षुद्रताएँ इतना कुछ बदल जाता है अचानक कि ग्रीटिंग कार्ड भेजने की औपचारिकता के खिलाफ सदा रहा आया मैं सोचने लगता हूँ कि दुनिया के हर आ...