बलराम कांवट की कविताएं
बलराम कांवट महानगरीय जीवन की चकाचौंध और मीडिया के साथ साथ चौबीस घंटे मनोरंजन के अनगिनत चैनल के मायाजाल से पूरा परिदृश्य आक्रांत है।जो खबर में है उसका सच संदेहास्पद है और जो यथार्थ है वह खबर से दूर है।ऐसे समय में बलराम कांवट की कविताएं मनुष्य के विकट जीवन की ऐसी तस्वीर दिखाती हैं जो सुनियोजित तरीके से दृश्य से बाहर कर दिया गया है। कविताओं के साथ जो तस्वीर है वह भी उन्हीं के सौजन्य से है और कविताओं के रंग और प्रभाव को वह और गाढ़ा और असरदार बनाती है। बलराम कांवट की कविताएं बाढ़ में चूल्हा पहले सुख के दिनों में जब चूल्हा हँसता था किसी अनजान राहगीर के अचानक आने का संकेत पाकर चूल्हे के चहुँओर बैठी आँखें दीपदीप देखने लगती थीं देहरी के पार इस आकाश से गिरते समुद्र में जब सारे नक्षत्र बुझ गए हैं और आकाश घुस आया है चूल्हे तक चूल्हे की भीतरी दीवारों पर चटक रही हैं टिमटिम तारों और नक्षत्रों जैसी अग्नि कणिकाएं और आँखें देखती हैं खाली पड़ा कनस्तर ना जाने कौन कितनी दूर से आयेगा इतनी रात गए भू...