कल्लोल चक्रवर्ती की कविताएं
कल्लोल चक्रवर्ती कल्लोल चक्रवर्ती की कविताओं में हमारे समय की वह सच्चाई है जिसमें एक तरफ तो युद्ध के बीच जलती झुलसती मनुष्यता है तो दूसरी तरफ नरसंहार करने की उन्मत्त हिंसक प्रवृत्ति है जो किसी भी हालत में जीत के लिए लालायित है।यह प्रवृत्ति भूख और बीमारी के लिए जमीन तैयार करती है सिर्फ इसलिए कि लड़ने का हौसला एक दिन पस्त हो जाए।इन कविताओं में निर्वासन की पीड़ा है तो आवाज पर लगने वाली धीमी पाबंदियां भी हैं जो हर मोर्चे पर सक्रिय हैं और बोलने को चुप में बदल देना चाहती हैं। जड़ों से छूटने का दर्द हो या अपने होने को बचा लेने की जद्दोजहद।ये कविताएं अपनी आवाज बहुत मजबूती से दर्ज करती हैं। बोलना मेरे कुछ बोलने से पहले ही सहम जाती पत्नी, जिन्होंने मुझे धैर्यपूर्वक बोलना सिखाया वह माँ भी कहतीं कि बोलने से चुप रहना अच्छा, कॉलेज में पढ़ने वाली बेटी मेरे कहे हुए पर ध्यान देती कि कहीं कुछ विवादस्पद तो नहीं है मुझे पता भी नहीं चला एक दिन उसने बहुत सफाई से हटा दी वह किताब 'बोलना ही है'। हालाँक...