नरेश चंद्रकर की कविताएं
नरेश चंद्रकर नरेश चंद्रकर की कविताओं में मिटते हुए की जो टीस है वह बहुत गहरी है। स्मृति, जीवन, रिश्ते और श्रम के सौंदर्य के बीच आवाजाही करती उनकी कविताओं में दधीचि और मुक्तिबोध एक साथ उपस्थित हैं। नरेश चंद्रकर की कविताएं ऋषि दधीचि की तस्वीर से प्रेरित बहुत शालीन नहीं है वह तस्वीर राजसी ठाठ दिखाई नहीं देते हैं ना रईसी नज़र आती है उनमें हड्डियों को याद है वे हुए थे रक्त और मज्जा में सुनाई देती है आज भी उनकी रुकती हुई सांसे धड़कनों का हिसाब भुजा की शिराओं में एक अति प्राचीन लिपि में लिखा फड़क रहा है महसूस करने पर उन पर लिखा पूरा शिलालेख हमारी नसों में बांचा जा सकता है यूं पूर्णतः अनुपलब्ध नहीं हुए हैं वे अभी भी जब कोई हारने लगता है हारती है आंखें हारते हैं हाथ हार मान लेती है किसी की तकलीफ पिशाची ताकत से हिलती है उनकी तस्वीर आंखों में वे सामने होते हैं अपना पूरा शरीर त्यागते हुए आख़िर तो वे मेरे पूर्वज हैं परन्तु देखो मेरे काम सब की तरफ पीठ किए बै...