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मोहन कुमार डहेरिया की कविताएं

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                            मोहन कुमार डहेरिया   राजनीति,मीडिया और धर्म ने मनुष्य को निर्मम तरीके से नियंत्रित और निर्देशित करना शुरू कर दिया है। यही कारण है कि अब नतीजों और निर्णयों को प्रभावित करना जटिल नहीं रह गया है। मोहन कुमार डहेरिया की कविताएं इस गणित को समझाती हैं कि कैसे सबकुछ धीरे धीरे हाथ से रेत की तरह फिसलता जा रहा है और हम बस अवाक् अकबकाया हुआ सब कुछ घटित होता हुआ देख रहे हैं।जिनकी भूमिका निर्णायक होनी थी वे अब मूकदर्शक बना दिए गए हैं।ये कविताएं एक बेचैन मन की मजबूत और स्पष्ट अभिव्यक्ति है। मोहन कुमार डहेरिया की कविताएं  बेटी   बेटी नहीं  अब वह एक स्त्री है एक समय था   पैर पटक-पटककर करती थी चीजों की मांग मेरी अँगुली पकड़कर विद्यालय जाती मुझे घोड़ा बनाकर कहती भूख लगी है घास खा ले नदी आ गई पानी पी ले आ रहे राजा के सिपाही पकड़ने भाग, तेज भाग कड़बस----कड़बस--- तो कभी खुद को महारानी समझ  पैरों को उठाकर सलाम करने को कहती अच्छी अदाकारी पर कागज या पत्तों के नोटों का पुरस्कार देती झुक...

पायल भारद्वाज की कविताएँ

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                                पायल भारद्वाज   अपने समय के स्याह सच को दर्ज करने वाली पायल भारद्वाज की कविताओं में प्रतिरोध और जिजीविषा एक साथ मौजूद है।इसमें स्त्री की सशक्त उपस्थिति नए समय के नए मुहावरों को अपनी बुलंद आवाज़ में दर्ज करती है। व्यवस्था के दमन और अन्याय को इन कविताओं में बहुत गहराई से महसूस किया जा सकता है। पायल भारद्वाज की कविताएं  धूर्तता से आगे  कमीनेपन की कोई हद नहीं होती, वह हर बार अपनी ही बनाई हुई एक और हद लाँघ जाता है उसके पास हर क्रूरता के लिए एक नया तर्क होता है, हर छल के लिए एक नया चेहरा वह पहले भाषा को घायल करता है, फिर सच को, फिर मनुष्यता को मुस्कुराते हुए पीठ में खंजर उतारता है, और सबसे आगे खड़ा मिलता है मरहम बाँटने वालों की कतार में सत्ता का चरित्र बना कमीनापन क़ानून की धार लिए होता है  व्यवस्था का मुखौटा लगाकर  राजदंड की तरह उठता है और जन-गण-मन को घायल करने का हथियार बन जाता है। अँधेरे के बीच  उनसे लड़ना कैसे संभव हो जिनके लड़ने के कोई नि...

बलराम कांवट की कविताएं

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                            बलराम कांवट   महानगरीय जीवन की चकाचौंध और मीडिया के साथ साथ चौबीस घंटे मनोरंजन के अनगिनत चैनल के मायाजाल से पूरा परिदृश्य आक्रांत है।जो खबर में है उसका सच संदेहास्पद है और जो यथार्थ है वह खबर से दूर है।ऐसे समय में बलराम कांवट की कविताएं मनुष्य के विकट जीवन की ऐसी तस्वीर दिखाती हैं जो सुनियोजित तरीके से दृश्य से बाहर कर दिया गया है। कविताओं के साथ जो तस्वीर है वह भी उन्हीं के सौजन्य से है और कविताओं के रंग और प्रभाव को वह और गाढ़ा और असरदार बनाती है। बलराम कांवट की कविताएं   बाढ़ में चूल्हा पहले सुख के दिनों में जब चूल्हा हँसता था किसी अनजान राहगीर के अचानक आने का संकेत पाकर चूल्हे के चहुँओर बैठी आँखें दीपदीप देखने लगती थीं देहरी के पार इस आकाश से गिरते समुद्र में जब सारे नक्षत्र बुझ गए हैं और आकाश घुस आया है चूल्हे तक चूल्हे की भीतरी दीवारों पर चटक रही हैं टिमटिम तारों और नक्षत्रों जैसी अग्नि कणिकाएं और आँखें देखती हैं खाली पड़ा कनस्तर ना जाने कौन कितनी दूर से आयेगा इतनी रात गए भू...

प्रतापराव कदम की कविताएं

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                                प्रतापराव कदम  जीवन की जटिलताओं और विडंबनाओं को प्रतापराव कदम की कविताएं उस आशा के साथ जोड़ती हैं जिसमें मिट्टी से जुड़ना उम्मीद से जुड़ना है।इन कविताओं में जो खास है वह कहन शैली है। बिना किसी शोर के ये कविताएं अपनी बात पुरजोर तरीके से रखती हैं। धीमी मगर बेहद ठोस आवाज में। प्रतापराव कदम की कविताएं  बर्फ     बर्फ से वाहियात दूसरी चीज नहीं  लाश के अनुकूल  जिंदगी के बर-खिलाफ।  कैसी खामोश बिछी है  तलहटी से शिखर तक  जड़ का तो पता नहीं  झाड़ के छोर तक है बालिश्त भर।  कैसा जड़ यह संसार  जिंदगी की गरमाहट नहीं  एकरस, नीरस बेजान  कब्रस्तान की तरह एकदम।  सारी जद्दोजहद बर्फ न बनने की  बर्फ न जमने देने की  बतरस, भुज-भर गरमाहट  झाड़ देते संबंधों पर जमी  आंखों में तैरती एक उम्मीद  बर्फ जमी झील में  नजर आती आखिर एक  किश्ती। गंध   गंध के आधार पर  तय करना मुश्किल कि  देह जो ज...

केतन यादव की कविताएं

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                                  केतन यादव  संबंधों की ऊष्मा से भरी हुई केतन यादव की कविताएं मित्रता को नए कोण से देखती और दिखाती हैं। इनमें मिलने की विकलता है तो हिसाब चुकता कर लेने का जिगर भी है।इन कविताओं में आपसी संबंध, निजता, रचनात्मकता और सामाजिक सरोकार का धूसर रंग गहरे रूप में मौजूद है। केतन यादव की कविताएं  फिर मिलेंगे  तुम क्या हो ?  तुम्हारी आवाज़ तुम हो या तुम्हारा देखना  तुम्हें छूना तुम हो या एक अनबिसरे दुख की गंध  संपूर्णता में तुम बस अनुपस्थिति में ही मिले छिपाए हुए ग़लती के ठीक पीछे ।  मैंने हमेशा चाहा मुझे कुछ कहना ही न पड़े मुझे कुछ समझाना ही न पड़े  मेरी चुप्पी ही भाषा हो मेरा चेहरा ही विवरण हो भरोसा ही मेरा दोस्त हो  हम आखिरी तक दोस्त रहेंगे  उसने कहा ।  मैं सोचता था मैं मर जाऊँगा  तो तुम यह खबर सुनते ही मेरी लाश के पास लौट आओगे  लेकिन मैं झूठा बहाना भी तो नहीं कर सकता था  कहीं अगली बार तुम सचमुच न आओ ... हम कल्पन...

देवेश पथ सारिया की कविताऍं

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  देवेश पथ सारिया  छीजे हुए सपनों से भरे हुए समय में निगाह का साफ होना उम्मीद का बच जाना है। देवेश पथ सारिया की कविताएं इसी साफ निगाह से दुनिया को देखने और दिखाने की एक खूबसूरत कोशिश है।इन कविताओं में कोई शोर नहीं है फिर भी इनकी गूंज देर तक पीछा करती है। देवेश पथ सारिया की कविताऍं  छीजे सपने के बाद मैं अठारह साल का होने वाला था मैं क़स्बे में पढ़ता था और मेरा छोटा भाई जयपुर में वहाॅं किसी पुस्तक मेले से वह मेरे लिए ले आया था एक क़िताब जिस पर लिखा था— 'क़ुरआन शरीफ़ का हिंदी तर्जुमा' घर में पहले से थी हिंदी में श्रीमद्भागवत गीता मैं क़ुरआन और गीता दोनों को ख़ूब पढता उस कच्ची उम्र में जितनी समझ सकता था उस हद तक कोशिश करता क़दम रखा मैंने उम्र के  अट्ठारहवें दरवाज़े पर इस सपने के साथ कि मैं ढूँढ निकालूँगा सामंजस्य के सूत्र आयतों और श्लोकों में इस बीच भी होते रहे दंगे छीजता गया मेरा सपना टूट गया मेरा चश्मा एक दिन साफ़ हो गई मेरी निगाह  मैं यह समझने लायक़ परिपक्व हो गया कि धार्मिक टकरावों का समाधान  धर्म की क़िताबों में नहीं मिलेगा। गीत के बदले अर्थ   गुदगुदात...