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कल्लोल चक्रवर्ती की कविताएं

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                              कल्लोल चक्रवर्ती  कल्लोल चक्रवर्ती की कविताओं में हमारे समय की वह सच्चाई है जिसमें एक तरफ तो युद्ध के बीच जलती झुलसती मनुष्यता है तो दूसरी तरफ नरसंहार करने की उन्मत्त हिंसक प्रवृत्ति है जो किसी भी हालत में जीत के लिए लालायित है।यह प्रवृत्ति भूख और बीमारी के लिए जमीन तैयार करती है सिर्फ इसलिए कि लड़ने का हौसला एक दिन पस्त हो जाए।इन कविताओं में निर्वासन की पीड़ा है तो आवाज पर लगने वाली धीमी पाबंदियां भी हैं जो हर मोर्चे पर सक्रिय हैं और बोलने को चुप में बदल देना चाहती हैं। जड़ों से छूटने का दर्द हो या अपने होने को बचा लेने की जद्दोजहद।ये कविताएं अपनी आवाज बहुत मजबूती से दर्ज करती हैं। बोलना मेरे कुछ बोलने से पहले ही सहम जाती पत्नी, जिन्होंने मुझे धैर्यपूर्वक बोलना सिखाया वह माँ भी कहतीं कि बोलने से चुप रहना अच्छा, कॉलेज में पढ़ने वाली बेटी मेरे कहे हुए पर ध्यान देती कि कहीं कुछ विवादस्पद तो नहीं है मुझे पता भी नहीं चला एक दिन उसने बहुत सफाई से हटा दी वह किताब 'बोलना ही है'। हालाँक...

प्रिया वर्मा की कविताएं

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                                प्रिया वर्मा   प्रिया वर्मा की कविताओं में जीवन के अनेक रंग हैं।इन रंगों के केंद्र में स्त्री है। प्रेम है देह है पतझड़ है तो तलाक भी है।इन कविताओं में जीवन की जद्दोजहद के बीच वह तकलीफ़ भी है जो होकर भी नहीं होने का दर्द झेलने के लिए मजबूर करती है।कुल मिलाकर ये कविताएं ध्यान खींचती हैं।बेचैन करती हैं। अभी का दुःख   इंतज़ार करती हूं  दुःख के छोटे होने का  मिटने का नहीं  मिटता नहीं, सिमटता है  उजाले की बिंदी-सा  धब्बे की तरह, सिकुड़कर  मिटने का भरम देकर  अंधेरा लगने लगता है उजला  जब तक नहीं होता उजाला फिर एक दिन  एक नया दुःख  धंसने आ जाता है पसली में। और अभी का दुःख  सीने से बाहर  निकल जाता है। कांटा ही निकालता है कांटे को। न होना न होने की नदी में होने का खेल खेलते हुए ही सारे पुल बनाए जा सके।  न होने के रास्तों पर  बार-बार उठाए जा सके  होने के कदम-  हर बार निकले हम  नई यात्रा के लिए।...

हेमंत देवलेकर की कविताएं

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हेमंत देवलेकर  हेमंत देवलेकर की कविताओं में मनुष्य और उसकी जीने की जद्दोजहद के साथ प्रेम की चिंता भी मौजूद है।एक अंधी दौड़ में बदल चुके इस समय में मनुष्यता खतरे में है। भरोसा, समर्पण और प्रतिरोध जैसे शब्दों के अर्थ बदल दिए गए हैं।इन कविताओं में हमारा धड़कता है। मालगाड़ियों का नेपथ्य  रेलवे स्टेशन की समय सारणी में कहीं लिखा नहीं होता उनका नाम प्लेटफार्म पर लगे स्पीकरों को उनकी सूचना देना कतई पसंद नहीं स्टेशन के बाहर खड़े साइकल रिक्शा, ऑटो, तांगे वालों को कोई फर्क नहीं पड़ता उनके आने - जाने से चाय- नमकीन की पहिएदार गुमठियां कोने में कहीं उदास बैठी रहती हैं वजन बताने की मशीनों के लट्टू भी कहां उनके लिए धडका करते हैं आधी नींद और आधे उपन्यास में डूबा बुकस्टॉल वाला अचानक चौक नहीं पड़ता किताबों पर जमी धूल हटाने के लिए कौन उनके लिए प्लेटफॉर्म टिकट निकालता है - हाथों में फूल - माला लिए आता है? माल गाड़ियों के आने - जाने के वक़्त पूरा स्टेशन और पूरा शहर तकरीबन पूरी तरह याददाश्त खोए आदमी- सा हो जाता है इतनी बड़ी उपेक्षा का ज़ख्म पसीने से छुपाए भारी भरकम माल असबाब के साथ वे ढोती हैं दुनि...

अशोक वाजपेयी से पीयूष दईया की बातचीत

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  अशोक वाजपेयी   अन्तर्ध्वनिहीन कविता टिकाऊ नहीं हो सकती (समादृत कवि,आलोचक,चिंतक और संस्कृति कर्म सहित विभिन्न कलाओं से गहरे और अभिन्न रूप से जुड़े अशोक वाजपेयी से पीयूष दईया की यह बातचीत उनके द्वारा बोले-लिखे जा रहे आत्म-वृत्तान्त का एक अंश है।) मटमैली सच्चाई दिल्ली में देरिदा ने “झूठ” पर एक व्याख्यान दिया था। अम्बर्तो ईको ने एक लम्बा निबन्ध लिखा है जिसमें बताया है कि इतिहास में कैसे-कैसे झूठ बोले गये हैं—बावजूद इसके कि सच का पता था, झूठ का ही वर्चस्व बना रहा। कई उदाहरण हैं। मसलन, यह बात पता थी कि पृथ्वी गोल है, लेकिन इसके बावजूद यह नहीं माना गया और गैलेलियो जैसे वैज्ञानिक को दण्डित किया गया। महाभारत में भी, धर्मयुद्ध जीतने के लिए, अर्धसत्य का इस्तेमाल किया गया है। अन्ततः ‘सत्यमेव जयते’ जैसा सुभाषित स्वप्न ही रहेगा—कभी पूरी तरह से सच नहीं हो पाएगा। साहित्य और कविता में भी यह लागू होगा, हालाँकि, साहित्य में हार-जीत की पदावली में सोचा नहीं जाता। सपने और सच के बीच की दूरी बनी रहेगी : सपने पर सच की छाया है, सच पर सपने की छाया है। सच्चाई मटमैली है—न पूरी तरह से सत्य है, न कभी पूरी...