अश्विनी कुमार की कविताएँ
अश्विनी कुमार बाज़ार के बढ़ते दबाव के बीच जीवन की जटिलताओं और विडंबनाओं ने मनुष्य को स्वार्थी, कठोर,एकाकी और तटस्थ बना दिया है।वह हर जगह एक सुरक्षित किनारा खोजता है जहां कछुए की तरह खुद को एक खोल में छिपा सके। अश्विनी कुमार की कविताएं ऐसे ही समय और समाज की कविताएं हैं जहां युद्ध एक रोमांच है और हत्या एक खबर।ये कविताएं नई भाषा, शैली और नए बिंब के माध्यम से अपने समय की गवाही देती हैं। अश्विनी कुमार की कविताएं शहर में जंगल मेरे शहर के बीचोबीच एक जंगल था। धीरे-धीरे पेड़ कम होते गए, लेकिन उनके ठूँठों पर आज भी कभी-कभी बूढ़े गिद्ध उतर आते हैं। वे अपनी चोंच से कुरेदते हैं बचे हुए जंगल की अस्थियों का स्वाद। कहते हैं, सभ्यता के विकास के लिए सबसे पहले जंगलों का ख़त्म होना ज़रूरी है, फिर नदियों का सूख जाना, और सपनों का आँकड़ों में बदल जाना। रात को जब सायरनों की आवाज़ फ़र्नीचर बाज़ार की गलियों में खो जाती है, मैं अपनी मेज़ पर झुका हुआ पुराने नक्शों में खोजता रहता हूँ— थोड़ी-बहुत हरिया...