फ़रीद ख़ाँ की कविताएं
फ़रीद ख़ाँ फ़रीद ख़ाँ की कविताओं में हमारे समय का वह यथार्थ है जो जटिल और उन्माद से भरा हुआ है। यहां सब कुछ इतना विकृत और विद्रूप है कि पहचाने हुए चेहरे को भी पहचान पाना असंभव प्रतीत होता है। यहां हर चेहरे पर मुखौटा है और व्यवस्था इसी मुखौटे के सहारे एक तरफ तो मारने के उपाय करती है तो दूसरी तरफ बचा लेने का दिखावा करते हुए मसीहा बन जाना चाहती है। धर्म और पूंजी के गठजोड़ से जो नया समाज रचा जा रहा है उसमें सारी हिदायतें और सारे सुझाव कमजोर लोगों के लिए हैं जो हाशिए के भी हाशिए पर धकेल दिए गए हैं। बाकी जगह वे ताकतवर लोग लूट चुके हैं जो नीति नियंता हैं और हर अवसर का फायदा उठाने के लिए घात लगाकर बैठे हुए हैं। फ़रीद ख़ाँ की कविताएं हमारे नायक एक साथ सैकड़ों इस्तरी किए चेहरों को देखना मेरे लिए किसी यातना से कम नहीं था। इसलिए भाग आया मैं पार्टी से बाहर सांस लेने के लिए। वहाँ कई चेहरों पर धातु के मज़बूत मुखौटे कसे थे। मैं ज़्यादातर लोगों को पहचान ही नहीं पा रहा था। वे मेकअप करके आते तो शायद मैं जान पाता कि वे हमारे नायक हैं और जिन्होंने कु...