अनिल गंगल की कविताएं
अनिल गंगल अनिल गंगल की कविताओं में हमारे समय का यथार्थ बहुत ठोस और खुरदरे रूप में दर्ज है।इन कविताओं में जीवन के अनेक रंग हैं लेकिन केंद्र में मनुष्य और उसकी संवेदना को कुरेद कर रख देने वाली वह बेचैनी है जो कसीदे लिखने से इनकार करती है। प्रतिरोध की ये ऐसी कविताएं हैं जहां फुसफुसाना चीख से ज्यादा कारगर है। अनिल गंगल की कविताएं क़सीदे क़सीदे लिखने वाले लोग अक्सर सच से थोड़ी दूरी पर बैठते हैं- इतनी दूरी पर जहाँ से चेहरा साफ़ दिखे पर झुर्रियाँ नहीं। वे शब्दों को इत्र की तरह छिड़कते हैं और इतिहास को एक चमकदार आईने की तरह दीवार पर टाँग देते हैं जिसमें हर चेहरा थोड़ा अधिक सुंदर दिखाई देता है। क़सीदे में राजा हमेशा उदार होता है हाकिम हमेशा न्यायप्रिय और विजेता हमेशा धर्मात्मा- भले ही गाँव के कुएँ में अब भी तलवार की जंग उतर रही हो। क़सीदे लिखने वाले जानते हैं कि वे सच को रेशमी कपड़े में लपेट रहे हैं लेकिन रेशम की सरसराहट सिक्कों की खनक से कम मोहक नहीं होती। और धीरे-धीरे क़सीदे इतने ऊँचे स्वर में गाए जाते हैं कि सच्चाई किसी अँधेरे कमरे में बैठी अपनी बारी का इंतज़ार करती रह जाती है। मगर इत...