मोहन कुमार डहेरिया की कविताएं
मोहन कुमार डहेरिया राजनीति,मीडिया और धर्म ने मनुष्य को निर्मम तरीके से नियंत्रित और निर्देशित करना शुरू कर दिया है। यही कारण है कि अब नतीजों और निर्णयों को प्रभावित करना जटिल नहीं रह गया है। मोहन कुमार डहेरिया की कविताएं इस गणित को समझाती हैं कि कैसे सबकुछ धीरे धीरे हाथ से रेत की तरह फिसलता जा रहा है और हम बस अवाक् अकबकाया हुआ सब कुछ घटित होता हुआ देख रहे हैं।जिनकी भूमिका निर्णायक होनी थी वे अब मूकदर्शक बना दिए गए हैं।ये कविताएं एक बेचैन मन की मजबूत और स्पष्ट अभिव्यक्ति है। मोहन कुमार डहेरिया की कविताएं बेटी बेटी नहीं अब वह एक स्त्री है एक समय था पैर पटक-पटककर करती थी चीजों की मांग मेरी अँगुली पकड़कर विद्यालय जाती मुझे घोड़ा बनाकर कहती भूख लगी है घास खा ले नदी आ गई पानी पी ले आ रहे राजा के सिपाही पकड़ने भाग, तेज भाग कड़बस----कड़बस--- तो कभी खुद को महारानी समझ पैरों को उठाकर सलाम करने को कहती अच्छी अदाकारी पर कागज या पत्तों के नोटों का पुरस्कार देती झुक...