अच्युतानंद मिश्र की कविताएं
अच्युतानंद मिश्र भूमंडलीकरण के बाद धर्म, सत्ता और पूंजी के गठजोड़ से जो नई व्यवस्था सृजित हुई है वह जितनी निर्मम है उतनी ही हिंसक।पूरा विश्व आज एक ऐसे अघोषित युद्ध की आग में झुलस रहा है जिसमें हथियार ही सबकुछ है। मनुष्य के मारे जाने की न अब गिनती होती है न किसी को फर्क पड़ता है। सबकुछ एक खबर भर है जिसके बीच रंगीन और चमकदार विज्ञापन भी है उसके असर को कम करने के लिए। अच्युतानंद मिश्र की कविताएं इसी व्यवस्था के उभार और उसके बर्बर चेहरे को सामने रखती हैं।ये कविताएं हमें जितना अपने आसपास से जोड़ती हैं उतना ही उस विश्व से जिसकी शांति खतरे में है। अच्युतानंद मिश्र की कविताएं युद्ध कहीं नहीं था यह बेतरह उदास होने का समय था, और हमारे पास समय नहीं था हमें अगली सुबह साफ-शफ्फाक कपड़ों में हंसत...