अशोक वाजपेयी से पीयूष दईया की बातचीत
अशोक वाजपेयी अन्तर्ध्वनिहीन कविता टिकाऊ नहीं हो सकती (समादृत कवि,आलोचक,चिंतक और संस्कृति कर्म सहित विभिन्न कलाओं से गहरे और अभिन्न रूप से जुड़े अशोक वाजपेयी से पीयूष दईया की यह बातचीत उनके द्वारा बोले-लिखे जा रहे आत्म-वृत्तान्त का एक अंश है।) मटमैली सच्चाई दिल्ली में देरिदा ने “झूठ” पर एक व्याख्यान दिया था। अम्बर्तो ईको ने एक लम्बा निबन्ध लिखा है जिसमें बताया है कि इतिहास में कैसे-कैसे झूठ बोले गये हैं—बावजूद इसके कि सच का पता था, झूठ का ही वर्चस्व बना रहा। कई उदाहरण हैं। मसलन, यह बात पता थी कि पृथ्वी गोल है, लेकिन इसके बावजूद यह नहीं माना गया और गैलेलियो जैसे वैज्ञानिक को दण्डित किया गया। महाभारत में भी, धर्मयुद्ध जीतने के लिए, अर्धसत्य का इस्तेमाल किया गया है। अन्ततः ‘सत्यमेव जयते’ जैसा सुभाषित स्वप्न ही रहेगा—कभी पूरी तरह से सच नहीं हो पाएगा। साहित्य और कविता में भी यह लागू होगा, हालाँकि, साहित्य में हार-जीत की पदावली में सोचा नहीं जाता। सपने और सच के बीच की दूरी बनी रहेगी : सपने पर सच की छाया है, सच पर सपने की छाया है। सच्चाई मटमैली है—न पूरी तरह से सत्य है, न कभी पूरी...