शचीन्द्र आर्य की कविताएं
शचीन्द्र आर्य जीवन के बहुत मामूली लगते जटिल प्रश्नों और विषयों को कविता में बहुत सादगी और मार्मिकता से दर्ज करने वाले शचीन्द्र आर्य की कविताओं में एक तरफ प्रश्नाकुलता है तो दूसरी तरफ तंद्रा तोड़ देने वाली विकलता। पीछे छूटती चीजों और यादों के मोह की बेचैनी हो या कुछ न बता पाने की आत्मस्वीकृति।इन कविताओं एक अलग ही मानुष राग है जिसे पढ़ कर अपने समय को, विकास को,चकाचौंध को और उस चकाचौंध के पीछे छिपे गहन अन्धकार को महसूस किया जा सकता है। शचीन्द्र आर्य की कविताएं उनका कुछ न पूछना पता नहीं यह कैसे हुआ, उन्होंने कुछ भी पूछना लगभग बंद सा कर दिया । जो पहले सवाल हुआ करते थे, अब वह सवाल नहीं हैं । कहाँ गए थे, क्यों गए थे, आज क्या हुआ वहाँ ? अब कुछ भी नहीं पूछा जाता । मैं अचानक से बड़ा नहीं हो गया हूँ, न मैं कहीं सराय में नहीं रह रहा हूँ । घर में माता-पिता के साथ रहता हूँ । उन्होंने कब से यह सवाल नहीं पूछे याद नहीं आता । उनका ख़ुद को इस भूमिका से पीछे कर लेना, दिख नहीं पाया । ख़ुद को देखता हूँ तो लगता है, एक वक़्त आया होगा, मैंने ही बताना बंद कर दिय...