Posts

प्रिया वर्मा की कविताएं

Image
                                प्रिया वर्मा   प्रिया वर्मा की कविताओं में जीवन के अनेक रंग हैं।इन रंगों के केंद्र में स्त्री है। प्रेम है देह है पतझड़ है तो तलाक भी है।इन कविताओं में जीवन की जद्दोजहद के बीच वह तकलीफ़ भी है जो होकर भी नहीं होने का दर्द झेलने के लिए मजबूर करती है।कुल मिलाकर ये कविताएं ध्यान खींचती हैं।बेचैन करती हैं। अभी का दुःख   इंतज़ार करती हूं  दुःख के छोटे होने का  मिटने का नहीं  मिटता नहीं, सिमटता है  उजाले की बिंदी-सा  धब्बे की तरह, सिकुड़कर  मिटने का भरम देकर  अंधेरा लगने लगता है उजला  जब तक नहीं होता उजाला फिर एक दिन  एक नया दुःख  धंसने आ जाता है पसली में। और अभी का दुःख  सीने से बाहर  निकल जाता है। कांटा ही निकालता है कांटे को। न होना न होने की नदी में होने का खेल खेलते हुए ही सारे पुल बनाए जा सके।  न होने के रास्तों पर  बार-बार उठाए जा सके  होने के कदम-  हर बार निकले हम  नई यात्रा के लिए।...

हेमंत देवलेकर की कविताएं

Image
हेमंत देवलेकर  हेमंत देवलेकर की कविताओं में मनुष्य और उसकी जीने की जद्दोजहद के साथ प्रेम की चिंता भी मौजूद है।एक अंधी दौड़ में बदल चुके इस समय में मनुष्यता खतरे में है। भरोसा, समर्पण और प्रतिरोध जैसे शब्दों के अर्थ बदल दिए गए हैं।इन कविताओं में हमारा धड़कता है। मालगाड़ियों का नेपथ्य  रेलवे स्टेशन की समय सारणी में कहीं लिखा नहीं होता उनका नाम प्लेटफार्म पर लगे स्पीकरों को उनकी सूचना देना कतई पसंद नहीं स्टेशन के बाहर खड़े साइकल रिक्शा, ऑटो, तांगे वालों को कोई फर्क नहीं पड़ता उनके आने - जाने से चाय- नमकीन की पहिएदार गुमठियां कोने में कहीं उदास बैठी रहती हैं वजन बताने की मशीनों के लट्टू भी कहां उनके लिए धडका करते हैं आधी नींद और आधे उपन्यास में डूबा बुकस्टॉल वाला अचानक चौक नहीं पड़ता किताबों पर जमी धूल हटाने के लिए कौन उनके लिए प्लेटफॉर्म टिकट निकालता है - हाथों में फूल - माला लिए आता है? माल गाड़ियों के आने - जाने के वक़्त पूरा स्टेशन और पूरा शहर तकरीबन पूरी तरह याददाश्त खोए आदमी- सा हो जाता है इतनी बड़ी उपेक्षा का ज़ख्म पसीने से छुपाए भारी भरकम माल असबाब के साथ वे ढोती हैं दुनि...

अशोक वाजपेयी से पीयूष दईया की बातचीत

Image
  अशोक वाजपेयी   अन्तर्ध्वनिहीन कविता टिकाऊ नहीं हो सकती (समादृत कवि,आलोचक,चिंतक और संस्कृति कर्म सहित विभिन्न कलाओं से गहरे और अभिन्न रूप से जुड़े अशोक वाजपेयी से पीयूष दईया की यह बातचीत उनके द्वारा बोले-लिखे जा रहे आत्म-वृत्तान्त का एक अंश है।) मटमैली सच्चाई दिल्ली में देरिदा ने “झूठ” पर एक व्याख्यान दिया था। अम्बर्तो ईको ने एक लम्बा निबन्ध लिखा है जिसमें बताया है कि इतिहास में कैसे-कैसे झूठ बोले गये हैं—बावजूद इसके कि सच का पता था, झूठ का ही वर्चस्व बना रहा। कई उदाहरण हैं। मसलन, यह बात पता थी कि पृथ्वी गोल है, लेकिन इसके बावजूद यह नहीं माना गया और गैलेलियो जैसे वैज्ञानिक को दण्डित किया गया। महाभारत में भी, धर्मयुद्ध जीतने के लिए, अर्धसत्य का इस्तेमाल किया गया है। अन्ततः ‘सत्यमेव जयते’ जैसा सुभाषित स्वप्न ही रहेगा—कभी पूरी तरह से सच नहीं हो पाएगा। साहित्य और कविता में भी यह लागू होगा, हालाँकि, साहित्य में हार-जीत की पदावली में सोचा नहीं जाता। सपने और सच के बीच की दूरी बनी रहेगी : सपने पर सच की छाया है, सच पर सपने की छाया है। सच्चाई मटमैली है—न पूरी तरह से सत्य है, न कभी पूरी...

विजय राही की कविताएं

Image
  विजय राही   विजय राही की कविताओं में मनुष्य की उन कोमल भावनाओं की गंध महसूस की जा सकती है जो जीने के लिए जरूरी हैं। जीवन और मृत्यु के बीच प्रेम की अलग रंगत लिए ये कविताएं देर तक स्मृति में गूंजती हैं। चाह दुनिया मतलब से प्रेम करती है पर मुझे तुमसे कोई मतलब नहीं  दुनिया धन से प्रेम करती है मुझे तुम्हारे धन की भी लालसा नहीं मेरे घर में किसी चीज़ की कमी नहीं   मुझे कोई काया रोग भी नहीं  फिर मैं क्यों रोती हूँ। फूल-दिल  जब तक गुलशन में रहते हैं खिले-खिले रहते हैं डाली से अलग होते ही मुरझा जाते हैं मर जाते हैं फूल-दिल लोग। स्मृतियाँ बीत जाते हैं दिन-महीने साल दर साल गुज़र जाते हैं आते-जाते रहते हैं मौसम गर्मी आती है चली जाती है बारिशें आती हैं चली जाती हैं  हाड़ कँपाने वाली सर्दियाँ आकर चली जाती हैं  परन्तु मैं इनसे बाहर नहीं निकल पाता गर्मियों के बाद किसी से बिछड़ने का ताप सताता है  बारिश के बाद तक होती‌ रहती है अनवरत इन आँखों से बारिश  और सर्दियों के बाद भी कँपकँपाती है किसी के बदन की छुअन मुझे । यात्रा बच्चा बस की सीट नीचे मिट्टी खा...