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शचीन्द्र आर्य की कविताएं

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  शचीन्द्र आर्य  जीवन के बहुत मामूली लगते जटिल प्रश्नों और विषयों को कविता में बहुत सादगी और मार्मिकता से दर्ज करने वाले शचीन्द्र आर्य की कविताओं में एक तरफ प्रश्नाकुलता है तो दूसरी तरफ तंद्रा तोड़ देने वाली विकलता। पीछे छूटती चीजों और यादों के मोह की बेचैनी हो या कुछ न बता पाने की आत्मस्वीकृति।इन कविताओं एक अलग ही मानुष राग है जिसे पढ़ कर अपने समय को, विकास को,चकाचौंध को और उस चकाचौंध के पीछे छिपे गहन अन्धकार को महसूस किया जा सकता है। शचीन्द्र आर्य की कविताएं उनका कुछ न पूछना पता नहीं यह कैसे हुआ, उन्होंने कुछ भी पूछना लगभग बंद सा कर दिया ।   जो पहले सवाल हुआ करते थे, अब वह सवाल नहीं हैं । कहाँ गए थे, क्यों गए थे, आज क्या हुआ वहाँ ?   अब कुछ भी नहीं पूछा जाता । मैं अचानक से बड़ा नहीं हो गया हूँ, न मैं कहीं सराय में नहीं रह रहा हूँ । घर में माता-पिता के साथ रहता हूँ । उन्होंने कब से यह सवाल नहीं पूछे याद नहीं आता । उनका ख़ुद को इस भूमिका से पीछे कर लेना, दिख नहीं पाया ।   ख़ुद को देखता हूँ तो लगता है, एक वक़्त आया होगा, मैंने ही बताना  बंद कर दिय...

गार्गी मिश्रा की कविताएं

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  गार्गी मिश्रा   स्त्री की यातना और तकलीफ़ तब और बढ़ जाती है जब दोहरे चरित्र के पितृसत्तात्मक समाज में एक तरफ उसे माथे पर बिठाकर पूजा जाता है तो दूसरी तरफ वह पैरों की जूती बना दी जाती है या कहें तो रौंद दी जाती है।हम जिस समाज में रह रहे हैं वहां स्त्रियां कितनी सुरक्षित हैं यह जानना हो तो अख़बारों और चैनलों की ख़बरों को देखिए।उन लोगों की टीका-टिप्पणी देखिए जो हर मोर्चे पर फैसले सुनाने को आतुर हैं।गार्गी मिश्रा की कविताएं स्त्री की यातना के साथ उसके संघर्ष को भी चित्रित करती हैं और बहुत मार्मिकता से चित्रित करती हैं। प्रतिरोध का मौलिक और अद्भुत स्वर इन कविताओं की विशेषता है। गार्गी मिश्रा की कविताएं   मिट्टी की आँख   कुम्हारटोली का कारीगर  पुआल, नदी की मिट्टी और भूसी सानता है ताकि एक ऐसी अपलक दृष्टि गढ़ सके  जो बिना रोए अंधेरे को देख सके वह ऊंट के बालों वाली कूची को गीले कोयले में डुबोता है और ऐसी पुतलियाँ बनाता है  जो शहर की डामर वाली सड़कों को निगल सकें लेकिन बाँस के शामियाने के ठीक बाहर एक लड़की तेज़ कदमों से चलती है उसकी गर्दन दरांती की तरह झुकी हुई...