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संजय अलंग की कविताएं

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  संजय अलंग  युद्ध की आग में न जाने कितनी बार यह दुनिया तबाह हुई है और आज भी यह तबाही जारी है। युद्ध की परिभाषा बदल गई,तरीका बदल गया, युद्ध के हथियार बदल गये लेकिन मरने वाले लोग और उजड़ने वाले घर आज भी वैसे ही निरीह, निर्दोष और निसहाय झुलस रहे हैं। सभ्यता के बसने में सदियां बीत जातीं हैं लेकिन उनके राख होने में एक पल नहीं लगता। यहां प्रस्तुत संजय अलंग की नई कविताएं इसी युद्ध को,युद्ध के पीछे की राजनीति को देखती और दिखातीं हैं। संजय अलंग की कविताएं  लाभ का समीकरण  जीते हैं वे  लाभ के लिए  बनाते हैं  साम्राज्य वे   जानते हैं वे   युद्ध त्रासद नहीं है न ही विध्वंसकारी और न ही अराजक  केवल वे ही जानते हैं  कि यह लाभ है  और  रचते रहते हैं वे   सर्वोच्च गणित लाभ का  लगातार  वे विजेता हैं वे लड़ते नहीं हैं  वे रण के मैदान में नहीं उतरते   वे युद्ध पर नियंत्रण रखते हैं वे दोनों पक्षों के साथ होते हैं  इसे वे अनिवार्यता में बदल देते हैं डर और भय  बने रहने से  युद्ध बना रहता है यु...

विजयशंकर चतुर्वेदी की कविताएं

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                            विजयशंकर चतुर्वेदी  समकालीन कविता में विजयशंकर चतुर्वेदी का स्थान महत्वपूर्ण है।वे कम लिखते हैं लेकिन उनकी कविताएं भीड़ में अलग से पहचानी जा सकती हैं। यहां प्रस्तुत उनकी दस नई कविताएं इसका उदाहरण हैं। मनुष्य के जीवन और संघर्ष को त्रासदी से भर देने वाली व्यवस्था इतनी मजबूत और विध्वंसक हो चुकी है कि हर उस चीज को लील लेने को आतुर है जो उसके विरोध में है। कायरों की तरह की उनकी भूमिका को विजयशंकर चतुर्वेदी इतनी बारीकी से देखते और रचते हैं कि कुछ भी उनकी आंखों से ओझल नहीं हो पाता।इन कविताओं में रिश्ते नाते, घर, परिवार से  लेकर कवि की असफलता की तह तक वे पहुंचते हैं जहां परतों में छिपा गहन अन्धकार कुंडली मारकर बैठा हुआ है। फिर भी उन्हें उम्मीद है कि 'फुर्तीली चींटियों की कतार से  फिर एक नया सूरज जन्म लेगा।' इन कविताओं पर वरिष्ठ आलोचक सेवाराम त्रिपाठी की टिप्पणी भी कवि के परिचय के बाद है। विजयशंकर चतुर्वेदी की कविताएं  स्मृति का नरम घाव पिता के लौटने से पहले घर की साँस बदल जाती। ...

नरेश चंद्रकर की कविताएं

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  नरेश चंद्रकर  नरेश चंद्रकर की कविताओं में मिटते हुए की जो टीस है वह बहुत गहरी है। स्मृति, जीवन, रिश्ते और श्रम के सौंदर्य के बीच आवाजाही करती उनकी कविताओं में दधीचि और मुक्तिबोध एक साथ उपस्थित हैं। नरेश चंद्रकर की कविताएं  ऋषि दधीचि की तस्वीर से प्रेरित बहुत शालीन नहीं है वह तस्वीर  राजसी ठाठ दिखाई नहीं देते हैं  ना रईसी नज़र आती है उनमें  हड्डियों को याद है वे हुए थे  रक्त और मज्जा में सुनाई देती है आज भी  उनकी रुकती हुई सांसे  धड़कनों का हिसाब  भुजा की शिराओं में  एक अति प्राचीन लिपि में लिखा  फड़क रहा है  महसूस करने पर उन पर लिखा  पूरा शिलालेख हमारी नसों में  बांचा जा सकता है  यूं पूर्णतः अनुपलब्ध नहीं हुए हैं वे  अभी भी जब कोई हारने लगता है  हारती है आंखें  हारते हैं हाथ  हार मान लेती है किसी की तकलीफ  पिशाची ताकत से हिलती है उनकी तस्वीर आंखों में  वे सामने होते हैं  अपना पूरा शरीर त्यागते हुए आख़िर तो वे मेरे पूर्वज हैं  परन्तु देखो मेरे काम सब की तरफ पीठ किए बै...

उमा शंकर चौधरी की कहानी

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            उमा शंकर चौधरी  हमारे यहां हर गांव में एक ऐसा पेड़ होता है जिस पर भूत रहते हैं. ऐसी जमुनी फुआ भी होती है और एक बिछिया भी. हम उन्हें कहां खोज पाते हैं. न उन्हें पहचान पाते हैं. भूतहा पेड़ की स्मृति बनी रहती है आजीवन.  मेरे जीवन में इन तीनों की सघन स्मृति है. उमा भाई की कहानी पढ़ती रही हूँ.  कहानी के अंत तक पहुँचते -पहुँचते मैं बहनापे की उस आभा से भर गई जिसकी तलाश मेरा लक्ष्य है.  मैं बिछिया बनूँ न बनूँ… जामुनी फुआ ही बन जाऊँ या जीवन में एक ऐसी फुआ खोज पाऊँ जिसकी तलाश कहानियों में करती फिरती हूँ. यही काफ़ी है.  मैंने अपनी दोस्त से कहा था कि मेरे होते कोई स्त्री अकेली नहीं हो सकती. मैं साथ बनी रहूँगी. जामुनी फुआ जैसा पावरफुल किरदार बन जाना आसान नहीं. दो स्त्रियों का संग -साथ दुनिया का चेहरा बदल सकता है.  उमा भाई की कहानी लंबी है. सारे किरदारों के चरित्र को खूब विस्तार मिला है. पूरा परिवेश खुलता है और किरदार उभरते चले आते हैं.  जिन्हें लगता है, दुनिया नई हो गई है. बदल गई है, वो अपने संसार की असली हालत समझना चाहें त...