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जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताएं

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  जितेन्द्र श्रीवास्तव   समकालीन कविता में जितेन्द्र श्रीवास्तव की उपस्थिति इस मायने में महत्वपूर्ण है कि उनकी कविताएं लोक के 'मन के व्याकरण' को बड़ी बारीकी से चित्रित करती हैं।इन कविताओं में एक तरफ मानुष राग है तो दूसरी तरफ अपनी जड़ों से बिछड़ने का विह्वल कर देने वाला दुःख। जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताएं  जीवन भेंट की गई किताबें एक दिन मिलती हैं उदास सी रद्दी के ढेर में कुछ तो इस कदर कोरी होती हैं जैसे उन्हें पलट कर देखा भी न गया हो उन पर नहीं होता कोई चिह्न छुवन का सघन स्पर्श से वंचित इन किताबों को देखते-पलटते सोचता हूँ: जो लोग मुझे भूल गए उनको याद करता हूँ जो मुझे याद करते हैं पता नहीं उनमें से कितनों को मिलने पर पहचान लूँगा  बिना किसी कोशिश के कैसी विडंबना है स्नेह की अपेक्षा में आईं उपेक्षित रह गई किताबों की तरह बीत जाता है अधिसंख्य लोगों का जीवन! सुंदरता सुंदर चीजें नहीं होतीं एक जैसी अलग-अलग होती है सबकी सीरत चीन्हना पड़ता है हर सुंदर का मन  उसके ढंग से सुंदर हैं पहाड़ उतर आते हैं पुतलियों में खींचती है सुंदरता समुद्र की रोम-रोम खिल उठता है हृदय की देह ...

फ़रीद ख़ाँ की कविताएं

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  फ़रीद ख़ाँ  फ़रीद ख़ाँ की कविताओं में हमारे समय का वह यथार्थ है जो जटिल और उन्माद से भरा हुआ है। यहां सब कुछ इतना विकृत और विद्रूप है कि पहचाने हुए चेहरे को भी पहचान पाना असंभव प्रतीत होता है। यहां हर चेहरे पर मुखौटा है और व्यवस्था इसी मुखौटे के सहारे एक तरफ तो मारने के उपाय करती है तो दूसरी तरफ बचा लेने का दिखावा करते हुए मसीहा बन जाना चाहती है। धर्म और पूंजी के गठजोड़ से जो नया समाज रचा जा रहा है उसमें सारी हिदायतें और सारे सुझाव कमजोर लोगों के लिए हैं जो हाशिए के भी हाशिए पर धकेल दिए गए हैं। बाकी जगह वे ताकतवर लोग लूट चुके हैं जो नीति नियंता हैं और हर अवसर का फायदा उठाने के लिए घात लगाकर बैठे हुए हैं। फ़रीद ख़ाँ की कविताएं हमारे नायक  एक साथ सैकड़ों इस्तरी किए चेहरों को देखना  मेरे लिए किसी यातना से कम नहीं था।   इसलिए भाग आया मैं पार्टी से बाहर सांस लेने के लिए।  वहाँ कई चेहरों पर धातु के मज़बूत मुखौटे कसे थे।  मैं ज़्यादातर लोगों को पहचान ही नहीं पा रहा था।  वे मेकअप करके आते तो शायद मैं जान पाता  कि वे हमारे नायक हैं और जिन्होंने  कु...

हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताएं

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  हरे प्रकाश उपाध्याय   समकालीन कविता में हरे प्रकाश उपाध्याय की उपस्थिति इस मायने में महत्वपूर्ण और अलग से रेखांकित करने योग्य है कि वे अपनी कविताओं के माध्यम से लगातार अपने ही रचे मुहावरों में तोड़फोड़ करते रहे हैं।हाल के वर्षों में उन्होंने छंद के सहारे समय और समाज की विडंबनाओं को एक नए मुहावरे में चित्रित करना शुरू किया है।यह चित्रण सटीक,बेधक और तिलमिला देने वाला है। यहां प्रस्तुत कविताएं इसी का उदाहरण हैं। हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताएं   यहीं हूँ कहीं नहीं हूँ यहीं हूँ सही हूँ जहाँ हूँ बस हूँ वहीं हूँ सब जगह नहीं हूँ इधर हूँ तो इधर ही हूँ उधर नहीं हूँ आपकी नजर में माना माना कहीं नहीं हूँ पर इधर ही हूँ जहाँ हूँ वहाँ जैसा भी हूँ हूँ और सही हूँ कहीं नहीं हूँ पर यहाँ हूँ और कोई शिकायत नहीं सही हूँ यहीं हूँ यहाँ भी दुखता हूँ गड़ता हूँ सबको पर फिलहाल यहीं हूँ जब तक बदले न जग का हाल तब तक मै भी बेहाल सही हूँ! जीने के लिए  जीने के लिए आदमी क्या नहीं करता अल्ल सुबह पार्क में जाकर देखा कोई मुर्गा है बनता कोई बंदर सा उछलता हर किसी के बदन से पसीना टपकता एक भारी सेठ मिला एक...

अंशु मालवीय की कविताएं

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                                    अंशु मालवीय की कविताएं हमारे समय के हिंसा,उन्माद और बर्बरता की जिंदा  गवाही हैं।हम जिस चकाचौंध में जी रहे हैं उसके आसपास ही एक गहरा अंधकार रचा जा रहा है और यह कोशिश अनवरत जारी है।यह अंधकार सबकुछ लील रहा है और इसका एहसास तक होने नहीं दिया जा रहा।सांड की तरह उन्मत्त पूंजी और अजेय ताकत मिल कर जो रौंद रहे हैं वह और कुछ नहीं लहलहाता हुआ भविष्य है।ये कविताएं इसी क्षत विक्षत भविष्य के बारे में सोचने के लिए विवश करती हैं। अंशु मालवीय की कविताएं  अग्नि उपदेश भिख्खुओ सब कुछ जल रहा है ...! मठ जल रहा है सुत्त जल रहे हैं त्रिपिटक जल रहा है जल रहे हैं शब्द अर्थ जल रहे हैं उनके प्रेम जल रहा है,करुणा जल रही है सद्गुण जल रहे हैं, मैत्री जल रही है जल रहा है ज्ञान,तर्क जल रहा है पिघल कर बह रहा है विवेक का लावा शांति जल रही है, प्रज्ञा जल रही है जीवन जल रहा है                       निर्वाण जल रहा है जल रहे हैं अंतःवासी...