हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताएं
हरे प्रकाश उपाध्याय समकालीन कविता में हरे प्रकाश उपाध्याय की उपस्थिति इस मायने में महत्वपूर्ण और अलग से रेखांकित करने योग्य है कि वे अपनी कविताओं के माध्यम से लगातार अपने ही रचे मुहावरों में तोड़फोड़ करते रहे हैं।हाल के वर्षों में उन्होंने छंद के सहारे समय और समाज की विडंबनाओं को एक नए मुहावरे में चित्रित करना शुरू किया है।यह चित्रण सटीक,बेधक और तिलमिला देने वाला है। यहां प्रस्तुत कविताएं इसी का उदाहरण हैं। हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताएं यहीं हूँ कहीं नहीं हूँ यहीं हूँ सही हूँ जहाँ हूँ बस हूँ वहीं हूँ सब जगह नहीं हूँ इधर हूँ तो इधर ही हूँ उधर नहीं हूँ आपकी नजर में माना माना कहीं नहीं हूँ पर इधर ही हूँ जहाँ हूँ वहाँ जैसा भी हूँ हूँ और सही हूँ कहीं नहीं हूँ पर यहाँ हूँ और कोई शिकायत नहीं सही हूँ यहीं हूँ यहाँ भी दुखता हूँ गड़ता हूँ सबको पर फिलहाल यहीं हूँ जब तक बदले न जग का हाल तब तक मै भी बेहाल सही हूँ! जीने के लिए जीने के लिए आदमी क्या नहीं करता अल्ल सुबह पार्क में जाकर देखा कोई मुर्गा है बनता कोई बंदर सा उछलता हर किसी के बदन से पसीना टपकता एक भारी सेठ मिला एक...