जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताएं
जितेन्द्र श्रीवास्तव समकालीन कविता में जितेन्द्र श्रीवास्तव की उपस्थिति इस मायने में महत्वपूर्ण है कि उनकी कविताएं लोक के 'मन के व्याकरण' को बड़ी बारीकी से चित्रित करती हैं।इन कविताओं में एक तरफ मानुष राग है तो दूसरी तरफ अपनी जड़ों से बिछड़ने का विह्वल कर देने वाला दुःख। जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताएं जीवन भेंट की गई किताबें एक दिन मिलती हैं उदास सी रद्दी के ढेर में कुछ तो इस कदर कोरी होती हैं जैसे उन्हें पलट कर देखा भी न गया हो उन पर नहीं होता कोई चिह्न छुवन का सघन स्पर्श से वंचित इन किताबों को देखते-पलटते सोचता हूँ: जो लोग मुझे भूल गए उनको याद करता हूँ जो मुझे याद करते हैं पता नहीं उनमें से कितनों को मिलने पर पहचान लूँगा बिना किसी कोशिश के कैसी विडंबना है स्नेह की अपेक्षा में आईं उपेक्षित रह गई किताबों की तरह बीत जाता है अधिसंख्य लोगों का जीवन! सुंदरता सुंदर चीजें नहीं होतीं एक जैसी अलग-अलग होती है सबकी सीरत चीन्हना पड़ता है हर सुंदर का मन उसके ढंग से सुंदर हैं पहाड़ उतर आते हैं पुतलियों में खींचती है सुंदरता समुद्र की रोम-रोम खिल उठता है हृदय की देह ...