गार्गी मिश्रा की कविताएं
गार्गी मिश्रा स्त्री की यातना और तकलीफ़ तब और बढ़ जाती है जब दोहरे चरित्र के पितृसत्तात्मक समाज में एक तरफ उसे माथे पर बिठाकर पूजा जाता है तो दूसरी तरफ वह पैरों की जूती बना दी जाती है या कहें तो रौंद दी जाती है।हम जिस समाज में रह रहे हैं वहां स्त्रियां कितनी सुरक्षित हैं यह जानना हो तो अख़बारों और चैनलों की ख़बरों को देखिए।उन लोगों की टीका-टिप्पणी देखिए जो हर मोर्चे पर फैसले सुनाने को आतुर हैं।गार्गी मिश्रा की कविताएं स्त्री की यातना के साथ उसके संघर्ष को भी चित्रित करती हैं और बहुत मार्मिकता से चित्रित करती हैं। प्रतिरोध का मौलिक और अद्भुत स्वर इन कविताओं की विशेषता है। गार्गी मिश्रा की कविताएं मिट्टी की आँख कुम्हारटोली का कारीगर पुआल, नदी की मिट्टी और भूसी सानता है ताकि एक ऐसी अपलक दृष्टि गढ़ सके जो बिना रोए अंधेरे को देख सके वह ऊंट के बालों वाली कूची को गीले कोयले में डुबोता है और ऐसी पुतलियाँ बनाता है जो शहर की डामर वाली सड़कों को निगल सकें लेकिन बाँस के शामियाने के ठीक बाहर एक लड़की तेज़ कदमों से चलती है उसकी गर्दन दरांती की तरह झुकी हुई...