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सुभाष राय की कविताएं

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  सुभाष राय  इन दिनों मनुष्य और मनुष्यता को नियंत्रित करने के लिए जिस तरह की साज़िश बड़े पैमाने पर चल रही है उसे समझना बहुत मुश्किल है लेकिन समझने से इनकार करना अकेला हो जाना है और अकेला होना अंततः मारा जाना है।सुभाष राय की कविताएं हमारे समय की इन्हीं दुरभिसंधियों का पर्दाफाश करती हैं।वे एक तरफ तो उस ताकत को चिन्हित करते हैं जो वर्चस्व की नई नियमावली के तहत सबकुछ रौंदने पर आमादा है और दूसरी तरफ प्रतिरोध के उस स्वर को भी रेखांकित करते हैं जो शैतानी सल्तनतों के शीविर रौंदते हुए कैसी भी हवा को बदल सकती है। सुभाष राय की कविताएं  यात्रा   यात्राओं में कभी-कभी कोई चेहरा मिल जाता है जो किसी भूले हुए दोस्त की याद दिला देता है वैसा ही कद, वैसा ही रूप-रंग अचानक याद हो आती हैं बहुत सारी घटनाएं दोस्ती और संग-साथ की लेकिन एक आकुल संशय मन को रोक देता है उस अजनबी को पुकारने से यात्राओं में कभी-कभी सुनायी पड़ती हैं सुनी हुई आवाजें मन चिहुक उठता है यह तो जोगिंदरा की आवाज है पर उसकी शकल नहीं मिलती परकायाप्रवेश में मेरा विश्वास नहीं और अगर ऐसा होता तो वह मुझे जरूर पहचान लेता लपककर मिलत...

हरि मृदुल की कविताएं

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                                    हरि मृदुल   महानगरीय जीवन की विडंबनाएं और मध्य वर्गीय चरित्र के द्वंद्व को जिन कवियों ने अपनी कविताओं में प्रमुखता से चित्रित किया है उनमें हरि मृदुल का स्थान महत्वपूर्ण है।इस चकाचौंध से भरे जीवन के अंधेरे की छोटी छोटी बारीकियां उनकी कविताओं में इस तरह ध्यान खींचती है कि उनसे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। हरि मृदुल की कविताएं  आवाज एक पत्ता गिरता है पचासों पत्ते गिरते हैं इस तरह हजारों पत्ते छितरते चले जाते हैं परंतु कोई आवाज नहीं सुनाई देती कितना बड़ा झूठ है यह कहना कि  एक पत्ता गिरता है, तो भी आवाज सुनाई देती है कभी सुनाई भी देती रही होगी तो यह गुजरे जमाने की बात है अब ऐसी कोई आवाज नहीं सुनाई देती एक शिशु भूख से बिलबिलाता हुआ रोता दिखता है एक मां अपने बेटे के लिए विलाप करती रहती है एक पिता बुझ चुकी आंखों की जोत में से  निथारता रहता है आंसू भुखमरी के दृश्य आम हैं सिलसिलेवार हुए बम विस्फोटों में चिथड़े उड़ रहे हैं नौकरी के पहले दिन गया बेटा  श...

अच्युतानंद मिश्र की कविताएं

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  अच्युतानंद मिश्र भूमंडलीकरण के बाद धर्म, सत्ता और पूंजी के गठजोड़ से जो नई व्यवस्था सृजित हुई है वह जितनी निर्मम है उतनी ही हिंसक।पूरा विश्व आज एक ऐसे अघोषित युद्ध की आग में झुलस रहा है जिसमें हथियार ही सबकुछ है। मनुष्य के मारे जाने की न अब गिनती होती है न किसी को फर्क पड़ता है। सबकुछ एक खबर भर है जिसके बीच रंगीन और चमकदार विज्ञापन भी है उसके असर को कम करने के लिए। अच्युतानंद मिश्र की कविताएं इसी व्यवस्था के उभार और उसके बर्बर चेहरे को सामने रखती हैं।ये कविताएं हमें जितना अपने आसपास से जोड़ती हैं उतना ही उस विश्व से जिसकी शांति खतरे में है। अच्युतानंद मिश्र की कविताएं  युद्ध कहीं नहीं था                                                                                  यह बेतरह उदास होने का समय था,  और हमारे पास समय नहीं था हमें अगली सुबह साफ-शफ्फाक कपड़ों में  हंसत...

मनोज कुमार झा की कविताएं

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  मनोज कुमार झा   मनोज कुमार झा की कविताएं इस मायने में अलग और महत्वपूर्ण हैं कि उनके यहां मनुष्य और जीवन के वे दृश्य और बिंब हैं जो लगभग अलक्षित हैं।वैसी ही जीवटता उनकी कविताओं में है जो हाशिए पर जी रहे थके,हारे,टूटे और रोज रौंदे जा रहे निरीह और निर्बल मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। उनके यहां दुःख है,शोक है,करुणा है लेकिन पराजय लगभग अनुपस्थित है। मनोज कुमार झा की कविताएं  पथिको के साथ कोई घर से निकलता है                     उग आता है जंगलों में घर के सांकल पर                    छूटी हुई हस्तरेखाएं । मह मह करने लगा है आत्म-वन               अश्रुओं में वनफूलों का रस । एक देह जो कि दुर्बल मां की कोख में बढ़ा था घूमता है रक्तस्नात वन में अगोरता बीजों से भरा घड़ा याद आते गए अकस्मात वे लोग  जो पथिको के साथ पार करते थे चक्करदार रास्ते बतियाते रुकते पानी पीते गाते किसी पक्षी के कंठ से फूटा प्रेमगीत। आशा   एक शब्द लिखा - वृक्ष  उड़ते आए...

जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताएं

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  जितेन्द्र श्रीवास्तव   समकालीन कविता में जितेन्द्र श्रीवास्तव की उपस्थिति इस मायने में महत्वपूर्ण है कि उनकी कविताएं लोक के 'मन के व्याकरण' को बड़ी बारीकी से चित्रित करती हैं।इन कविताओं में एक तरफ मानुष राग है तो दूसरी तरफ अपनी जड़ों से बिछड़ने का विह्वल कर देने वाला दुःख। जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताएं  जीवन भेंट की गई किताबें एक दिन मिलती हैं उदास सी रद्दी के ढेर में कुछ तो इस कदर कोरी होती हैं जैसे उन्हें पलट कर देखा भी न गया हो उन पर नहीं होता कोई चिह्न छुवन का सघन स्पर्श से वंचित इन किताबों को देखते-पलटते सोचता हूँ: जो लोग मुझे भूल गए उनको याद करता हूँ जो मुझे याद करते हैं पता नहीं उनमें से कितनों को मिलने पर पहचान लूँगा  बिना किसी कोशिश के कैसी विडंबना है स्नेह की अपेक्षा में आईं उपेक्षित रह गई किताबों की तरह बीत जाता है अधिसंख्य लोगों का जीवन! सुंदरता सुंदर चीजें नहीं होतीं एक जैसी अलग-अलग होती है सबकी सीरत चीन्हना पड़ता है हर सुंदर का मन  उसके ढंग से सुंदर हैं पहाड़ उतर आते हैं पुतलियों में खींचती है सुंदरता समुद्र की रोम-रोम खिल उठता है हृदय की देह ...