प्रिया वर्मा की कविताएं
प्रिया वर्मा प्रिया वर्मा की कविताओं में जीवन के अनेक रंग हैं।इन रंगों के केंद्र में स्त्री है। प्रेम है देह है पतझड़ है तो तलाक भी है।इन कविताओं में जीवन की जद्दोजहद के बीच वह तकलीफ़ भी है जो होकर भी नहीं होने का दर्द झेलने के लिए मजबूर करती है।कुल मिलाकर ये कविताएं ध्यान खींचती हैं।बेचैन करती हैं। अभी का दुःख इंतज़ार करती हूं दुःख के छोटे होने का मिटने का नहीं मिटता नहीं, सिमटता है उजाले की बिंदी-सा धब्बे की तरह, सिकुड़कर मिटने का भरम देकर अंधेरा लगने लगता है उजला जब तक नहीं होता उजाला फिर एक दिन एक नया दुःख धंसने आ जाता है पसली में। और अभी का दुःख सीने से बाहर निकल जाता है। कांटा ही निकालता है कांटे को। न होना न होने की नदी में होने का खेल खेलते हुए ही सारे पुल बनाए जा सके। न होने के रास्तों पर बार-बार उठाए जा सके होने के कदम- हर बार निकले हम नई यात्रा के लिए।...