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अंशु मालवीय की कविताएं

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                                    अंशु मालवीय की कविताएं हमारे समय के हिंसा,उन्माद और बर्बरता की जिंदा  गवाही हैं।हम जिस चकाचौंध में जी रहे हैं उसके आसपास ही एक गहरा अंधकार रचा जा रहा है और यह कोशिश अनवरत जारी है।यह अंधकार सबकुछ लील रहा है और इसका एहसास तक होने नहीं दिया जा रहा।सांड की तरह उन्मत्त पूंजी और अजेय ताकत मिल कर जो रौंद रहे हैं वह और कुछ नहीं लहलहाता हुआ भविष्य है।ये कविताएं इसी क्षत विक्षत भविष्य के बारे में सोचने के लिए विवश करती हैं। अंशु मालवीय की कविताएं  अग्नि उपदेश भिख्खुओ सब कुछ जल रहा है ...! मठ जल रहा है सुत्त जल रहे हैं त्रिपिटक जल रहा है जल रहे हैं शब्द अर्थ जल रहे हैं उनके प्रेम जल रहा है,करुणा जल रही है सद्गुण जल रहे हैं, मैत्री जल रही है जल रहा है ज्ञान,तर्क जल रहा है पिघल कर बह रहा है विवेक का लावा शांति जल रही है, प्रज्ञा जल रही है जीवन जल रहा है                       निर्वाण जल रहा है जल रहे हैं अंतःवासी...

संजय अलंग की कविताएं

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  संजय अलंग  युद्ध की आग में न जाने कितनी बार यह दुनिया तबाह हुई है और आज भी यह तबाही जारी है। युद्ध की परिभाषा बदल गई,तरीका बदल गया, युद्ध के हथियार बदल गये लेकिन मरने वाले लोग और उजड़ने वाले घर आज भी वैसे ही निरीह, निर्दोष और निसहाय झुलस रहे हैं। सभ्यता के बसने में सदियां बीत जातीं हैं लेकिन उनके राख होने में एक पल नहीं लगता। यहां प्रस्तुत संजय अलंग की नई कविताएं इसी युद्ध को,युद्ध के पीछे की राजनीति को देखती और दिखातीं हैं। संजय अलंग की कविताएं  लाभ का समीकरण  जीते हैं वे  लाभ के लिए  बनाते हैं  साम्राज्य वे   जानते हैं वे   युद्ध त्रासद नहीं है न ही विध्वंसकारी और न ही अराजक  केवल वे ही जानते हैं  कि यह लाभ है  और  रचते रहते हैं वे   सर्वोच्च गणित लाभ का  लगातार  वे विजेता हैं वे लड़ते नहीं हैं  वे रण के मैदान में नहीं उतरते   वे युद्ध पर नियंत्रण रखते हैं वे दोनों पक्षों के साथ होते हैं  इसे वे अनिवार्यता में बदल देते हैं डर और भय  बने रहने से  युद्ध बना रहता है यु...

विजयशंकर चतुर्वेदी की कविताएं

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                            विजयशंकर चतुर्वेदी  समकालीन कविता में विजयशंकर चतुर्वेदी का स्थान महत्वपूर्ण है।वे कम लिखते हैं लेकिन उनकी कविताएं भीड़ में अलग से पहचानी जा सकती हैं। यहां प्रस्तुत उनकी दस नई कविताएं इसका उदाहरण हैं। मनुष्य के जीवन और संघर्ष को त्रासदी से भर देने वाली व्यवस्था इतनी मजबूत और विध्वंसक हो चुकी है कि हर उस चीज को लील लेने को आतुर है जो उसके विरोध में है। कायरों की तरह की उनकी भूमिका को विजयशंकर चतुर्वेदी इतनी बारीकी से देखते और रचते हैं कि कुछ भी उनकी आंखों से ओझल नहीं हो पाता।इन कविताओं में रिश्ते नाते, घर, परिवार से  लेकर कवि की असफलता की तह तक वे पहुंचते हैं जहां परतों में छिपा गहन अन्धकार कुंडली मारकर बैठा हुआ है। फिर भी उन्हें उम्मीद है कि 'फुर्तीली चींटियों की कतार से  फिर एक नया सूरज जन्म लेगा।' इन कविताओं पर वरिष्ठ आलोचक सेवाराम त्रिपाठी की टिप्पणी भी कवि के परिचय के बाद है। विजयशंकर चतुर्वेदी की कविताएं  स्मृति का नरम घाव पिता के लौटने से पहले घर की साँस बदल जाती। ...