विनय सौरभ की कविताएं
विनय सौरभ बाजार की चमक और अंधाधुंध विकास के बीच संबंधों की छीजती ऊष्मा ने मनुष्य को बिल्कुल अकेला और असहाय बना दिया है।ये और बात है कि इसका एहसास करने की भी फुर्सत किसी के पास नहीं है। विनय सौरभ की कविताएं इस एहसास को मजबूत करने वाली हैं। इनमें अपनी जड़ों से टूटने का दुःख है तो रिश्तों को बचाए रखने की विकलता भी है। मनुष्य और उसके जीवन से जुड़ी हुई जिन जिन चीजों को बहुत चालाक तरीके से नष्ट किया जा रहा है, उनकी बहुत मार्मिक उपस्थिति विनय सौरभ की कविताओं की विशेषता है। विनय सौरभ की कविताएं घर मैं चलता हूँ या अब मुझे चलना चाहिए कहता हुआ आता हूँ घर के दरवाज़े पर फ़िर कब आ पाऊँगा या फ़िर मुझे जल्दी आ जाना चाहिए मेरा झोला ठीक करते हुए माँ कहती थी, जब वह थी और दरवाज़े से आँख भर मेरा जाना देखती थी इस तरह से अपनी नौकरी पर जाने को निकलता हूँ घर से और थोड़ा घर पर ही छूट जाता हूँ रूलाई बाहर आने से रोकता हूँ बड़े भाई को कहता हूँ - फलाँ काम देख लीजिएगा...