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विनय सौरभ की कविताएं

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                                विनय सौरभ  बाजार की चमक और अंधाधुंध विकास के बीच संबंधों की छीजती ऊष्मा ने मनुष्य को बिल्कुल अकेला और असहाय बना दिया है।ये और बात है कि इसका एहसास करने की भी फुर्सत किसी के पास नहीं है। विनय सौरभ की कविताएं इस एहसास को मजबूत करने वाली हैं। इनमें अपनी जड़ों से टूटने का दुःख है तो रिश्तों को बचाए रखने की विकलता भी है। मनुष्य और उसके जीवन से जुड़ी हुई जिन जिन चीजों को बहुत चालाक तरीके से नष्ट किया जा रहा है, उनकी बहुत मार्मिक उपस्थिति विनय सौरभ की कविताओं की विशेषता है। विनय सौरभ की कविताएं  घर मैं चलता हूँ  या अब मुझे चलना चाहिए कहता हुआ आता हूँ  घर के दरवाज़े पर फ़िर कब आ पाऊँगा या फ़िर मुझे जल्दी आ जाना चाहिए मेरा झोला ठीक करते हुए  माँ कहती थी, जब वह थी  और दरवाज़े से आँख भर मेरा जाना देखती थी इस तरह से अपनी नौकरी पर जाने को निकलता हूँ घर से और थोड़ा घर पर ही छूट जाता हूँ रूलाई बाहर आने से रोकता हूँ बड़े भाई को कहता हूँ - फलाँ काम देख लीजिएगा...

राजेश जोशी की कविताएं और बातचीत

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                                राजेश जोशी  ' कौशिकी' का लगभग एक वर्ष पूरा हो रहा है और यह अवसर खास है। पचासवीं पोस्ट के रूप में इस सप्ताह पढ़िए वरिष्ठ कवि राजेश जोशी की बारह कविताएं और ताजा बातचीत जिसे संभव किया है अजय महताब ने।समकालीन कविता को जीवन से जोड़ने और इसके मुहावरे को रचने और बदलने में जिन कवियों ने अपनी उम्र लगा दी उनमें राजेश जोशी का नाम प्रमुख है।आज भी उतनी ही सक्रियता से वे मुस्तैद हैं और उनकी कविताएं अपने समय की तमाम चुनौतियों से सीधे मुठभेड़ करती हुई उनकी आवाज़ बनी हुई हैं जिनकी आवाज को दबाने की तमाम कोशिशें व्यवस्था की तरफ से अलग-अलग मोर्चे पर जारी है। राजेश जोशी की कविताएं  मैं अलक्षित हूँ कवि कह गया है  मैंने निराला को नहीं देखा , बहुत पास होते हुए भी मैं निराला से नहीं मिल पाया ! नहीं देखे को देखने की कोशिश के इस वृत्तांत में  मैं भटक रहा हूँ बरसों से ! 26 जनवरी 1961 की सुबह उस कड़़कती सर्दी में ,  मैं इलाहाबाद में ही था ,  मेरे बड़े भाई की शादी थी  और ज़ी...

सुभाष राय की कविताएं

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  सुभाष राय  इन दिनों मनुष्य और मनुष्यता को नियंत्रित करने के लिए जिस तरह की साज़िश बड़े पैमाने पर चल रही है उसे समझना बहुत मुश्किल है लेकिन समझने से इनकार करना अकेला हो जाना है और अकेला होना अंततः मारा जाना है।सुभाष राय की कविताएं हमारे समय की इन्हीं दुरभिसंधियों का पर्दाफाश करती हैं।वे एक तरफ तो उस ताकत को चिन्हित करते हैं जो वर्चस्व की नई नियमावली के तहत सबकुछ रौंदने पर आमादा है और दूसरी तरफ प्रतिरोध के उस स्वर को भी रेखांकित करते हैं जो शैतानी सल्तनतों के शीविर रौंदते हुए कैसी भी हवा को बदल सकती है। सुभाष राय की कविताएं  यात्रा   यात्राओं में कभी-कभी कोई चेहरा मिल जाता है जो किसी भूले हुए दोस्त की याद दिला देता है वैसा ही कद, वैसा ही रूप-रंग अचानक याद हो आती हैं बहुत सारी घटनाएं दोस्ती और संग-साथ की लेकिन एक आकुल संशय मन को रोक देता है उस अजनबी को पुकारने से यात्राओं में कभी-कभी सुनायी पड़ती हैं सुनी हुई आवाजें मन चिहुक उठता है यह तो जोगिंदरा की आवाज है पर उसकी शकल नहीं मिलती परकायाप्रवेश में मेरा विश्वास नहीं और अगर ऐसा होता तो वह मुझे जरूर पहचान लेता लपककर मिलत...

हरि मृदुल की कविताएं

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                                    हरि मृदुल   महानगरीय जीवन की विडंबनाएं और मध्य वर्गीय चरित्र के द्वंद्व को जिन कवियों ने अपनी कविताओं में प्रमुखता से चित्रित किया है उनमें हरि मृदुल का स्थान महत्वपूर्ण है।इस चकाचौंध से भरे जीवन के अंधेरे की छोटी छोटी बारीकियां उनकी कविताओं में इस तरह ध्यान खींचती है कि उनसे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। हरि मृदुल की कविताएं  आवाज एक पत्ता गिरता है पचासों पत्ते गिरते हैं इस तरह हजारों पत्ते छितरते चले जाते हैं परंतु कोई आवाज नहीं सुनाई देती कितना बड़ा झूठ है यह कहना कि  एक पत्ता गिरता है, तो भी आवाज सुनाई देती है कभी सुनाई भी देती रही होगी तो यह गुजरे जमाने की बात है अब ऐसी कोई आवाज नहीं सुनाई देती एक शिशु भूख से बिलबिलाता हुआ रोता दिखता है एक मां अपने बेटे के लिए विलाप करती रहती है एक पिता बुझ चुकी आंखों की जोत में से  निथारता रहता है आंसू भुखमरी के दृश्य आम हैं सिलसिलेवार हुए बम विस्फोटों में चिथड़े उड़ रहे हैं नौकरी के पहले दिन गया बेटा  श...