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गार्गी मिश्रा की कविताएं

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  गार्गी मिश्रा   स्त्री की यातना और तकलीफ़ तब और बढ़ जाती है जब दोहरे चरित्र के पितृसत्तात्मक समाज में एक तरफ उसे माथे पर बिठाकर पूजा जाता है तो दूसरी तरफ वह पैरों की जूती बना दी जाती है या कहें तो रौंद दी जाती है।हम जिस समाज में रह रहे हैं वहां स्त्रियां कितनी सुरक्षित हैं यह जानना हो तो अख़बारों और चैनलों की ख़बरों को देखिए।उन लोगों की टीका-टिप्पणी देखिए जो हर मोर्चे पर फैसले सुनाने को आतुर हैं।गार्गी मिश्रा की कविताएं स्त्री की यातना के साथ उसके संघर्ष को भी चित्रित करती हैं और बहुत मार्मिकता से चित्रित करती हैं। प्रतिरोध का मौलिक और अद्भुत स्वर इन कविताओं की विशेषता है। गार्गी मिश्रा की कविताएं   मिट्टी की आँख   कुम्हारटोली का कारीगर  पुआल, नदी की मिट्टी और भूसी सानता है ताकि एक ऐसी अपलक दृष्टि गढ़ सके  जो बिना रोए अंधेरे को देख सके वह ऊंट के बालों वाली कूची को गीले कोयले में डुबोता है और ऐसी पुतलियाँ बनाता है  जो शहर की डामर वाली सड़कों को निगल सकें लेकिन बाँस के शामियाने के ठीक बाहर एक लड़की तेज़ कदमों से चलती है उसकी गर्दन दरांती की तरह झुकी हुई...

राजाराम भादू का लेख

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                                  राजाराम भादू  सृजन और सृजन प्रक्रिया जैसे कठिन और जटिल विषय पर  जयशंकर के वक्तव्य 'सृजन का संसार' के बाद इस सप्ताह पढ़िए वरिष्ठ लेखक राजाराम भादू का लेख 'सृजन-प्रक्रिया और प्रतिफलन'।यह लेख सृजन और सृजनात्मकता के उन पहलुओं पर विचार करने में मदद करता है जो उसे प्रभावित भी करते हैं और उसके लिए जमीन भी तैयार करते हैं। राजाराम भादू का लेख    सृजन- प्रक्रिया और प्रतिफलन बीसवीं शताब्दी में ही शिक्षाविदों और मनोवैज्ञानिकों के बीच इस पर सहमति बन गयी थी कि बच्चों में सृजनशीलता की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से होती है, जैसी कि कल्पना, प्रश्नाकुलता और सहकार जैसी कुछ अन्य प्रवृत्तियाँ जन्मजात रूप से पायी जाती हैं। लेकिन इन्हें विकसित करने के लिए अनुकूल परिवेश और उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, अन्यथा ये मुरझाकर सूख जाती हैं। किन्तु रचनाकारों, विशेषकर हिन्दी क्षेत्र के कलाकारों- संस्कृति कर्मियों की आरंभिक जीवन कथाओं से पता चलता है कि सृजन के रास्ते का चयन करने ...

संजय भिसे की कविताएं

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                                    संजय भिसे  इस क्रूर और नृशंस समय में सबसे गहरे संकट में मनुष्य और मनुष्यता के साथ वे तमाम जीव हैं जो जीवन की मामूली और मूलभूत आवश्यकताओं और सुविधाओं के लिए निरंतर संघर्ष कर रहे हैं।हिंसा से कोई जगह नहीं बच पा रही। ऐसे में बुद्ध और स्त्री की याद आना स्वाभाविक है।संजय भिसे की कविताएं चीजों को अलग नजरिए से दिखाती हैं जिनमें स्थानीयता भी है और प्रासंगिकता भी।बुद्ध भी हैं और स्त्री भी। जीवन के द्वंद्व की एक अद्भुत लय इन कविताओं में है। संजय भिसे की कविताएं  इलहाम             अनेक व्याधियों से त्रस्त दवाईयां खाकर परेशान पत्नी के सिरहाने बैठ दबा रहा था उसका सिर  कनपटी की पिराती हुई नसें रक्ताल्पता के बावजूद न जाने क्या भरा था उनमें   हल्के छूते ही तड़पकर जाग उठता था दर्द  गृहस्थ जीवन के इन वर्षों में थोड़ा बहुत हाथ ही बंटाता आया हूं मैं  वही ढोती होती है गृहस्थी का समूचा भार गृहस्थी के लिए ढोना शब्द अवश्य ...

जयशंकर का वक्तव्य

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                                      जयशंकर   सृजन का संसार जितना रहस्यमय होता है उतना ही रोमांचक भी। महत्वपूर्ण कथाकार जय शंकर ने अपने इस वक्तव्य में सृजन के संसार के उसी रहस्य और रोमांच को शब्दों में व्यक्त किया है जो देश और काल से की सीमा से परे बहुत कुछ सोचने को बाध्य करता है। जयशंकर का वक्तव्य         सृजन का संसार सृजन की दुनिया उतनी ही पुरानी है जितनी हमारी यह दुनिया। मनुष्य जब तक इस सृष्टि में रहेगा, सृजन की दुनिया भी बनी-बनती रहेगी, बसती-उजड़ती रहेगी। सृजन की इस दुनिया का आदि काल से चले आना, इसे इतना महत्वपूर्ण, मार्मिक और दिलचस्प  बनाता है, तभी इसको जोखिम ली हुई, लहूलुहान दुनिया भी। बरसों-बरसों से साहित्य और कला का यह व्यापक संसार, सृष्टि में फैली बुराइयों, हिंसा और अराजकता से संवाद करता आया है, संघर्ष करता आया है। हमारे अपने क्लासिक हों या हमारे देश के बाहर के क्लासिक, हर जगह हमें बुराइयों और अच्छाइयों के बीच सतत चला आ रहा द्वंद्व और संघर्ष दिखता ...

मोहन कुमार डहेरिया की कविताएं

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                            मोहन कुमार डहेरिया   राजनीति,मीडिया और धर्म ने मनुष्य को निर्मम तरीके से नियंत्रित और निर्देशित करना शुरू कर दिया है। यही कारण है कि अब नतीजों और निर्णयों को प्रभावित करना जटिल नहीं रह गया है। मोहन कुमार डहेरिया की कविताएं इस गणित को समझाती हैं कि कैसे सबकुछ धीरे धीरे हाथ से रेत की तरह फिसलता जा रहा है और हम बस अवाक् अकबकाया हुआ सब कुछ घटित होता हुआ देख रहे हैं।जिनकी भूमिका निर्णायक होनी थी वे अब मूकदर्शक बना दिए गए हैं।ये कविताएं एक बेचैन मन की मजबूत और स्पष्ट अभिव्यक्ति है। मोहन कुमार डहेरिया की कविताएं  बेटी   बेटी नहीं  अब वह एक स्त्री है एक समय था   पैर पटक-पटककर करती थी चीजों की मांग मेरी अँगुली पकड़कर विद्यालय जाती मुझे घोड़ा बनाकर कहती भूख लगी है घास खा ले नदी आ गई पानी पी ले आ रहे राजा के सिपाही पकड़ने भाग, तेज भाग कड़बस----कड़बस--- तो कभी खुद को महारानी समझ  पैरों को उठाकर सलाम करने को कहती अच्छी अदाकारी पर कागज या पत्तों के नोटों का पुरस्कार देती झुक...