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उर्मिला शिरीष की कहानी

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  उर्मिला शिरीष   उर्मिला शिरीष की कहानी 'हरा पत्ता' उत्तर आधुनिक समय की उस समस्या को दर्ज करती है जिसमें अंधाधुंध विकास के क्रम में एक तरफ तो आगे निकल जाने की होड़ है दूसरी तरफ अपनी जड़ों की याद भी रह रह कर टीसती है। रिश्ते खत्म हो रहे हैं, संबंध बिखर रहे हैं,आपसी सद्भाव और सहिष्णुता की जड़ें टूट रही हैं। ऐसे में भी एक चाह है जो वापस खींच लेना चाहती है।कहानी इस द्वंद को बहुत मार्मिक तरीके से दर्ज करती है। हरा पत्ता  ‘‘आपको ढेर सारी बधाईयाँ। आप भाग्यशाली हैं जो आपको पहली बार में ही ग्रीन कार्ड मिल गया है।‘‘  ‘‘धन्यवाद।‘‘ गद्गद होकर अपनी खुशी उड़ेलकर बधाई देने वाले सज्जन को उन्होंने जवाब दिया। उन दोनों की खुशी और उत्साह देखकर उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि इसमें इतनी बड़ी खुशी की क्या बात है? लोग इतना खुश क्यों हो रहे हैं। ऐसी खुशी भरी बधाईयाँ तो उनके यहाँ शादी तय होने पर, बच्चे के जन्म लेने पर या किसी का बड़ी नौकरी में चयन होने पर दी जाती थी।  ‘‘हम लोग तो चैथी बार ट्राय कर रहे हैं। इस बार भी पता नहीं वीजा मिलता है या नहीं। सालों हो गये हमारे बेटे को वहाँ रहते हु...

बाबुषा कोहली की कविताएं

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  बाबुषा कोहली  'फूल,कविता,प्रेम और युद्ध के इर्द-गिर्द' बाबुषा कोहली की इन तेरह छोटी कविताओं में हमारे समय का वह स्याह सच है जो मनुष्य और मनुष्यता का सबसे बड़ा दुश्मन है।युद्ध उनमें से एक है जो इन दिनों दुनिया के अधिकांश हिस्से को अपनी चपेट में ले चुका है। ऐसे कठिन समय में ये कविताएं प्रेम, कविता और मनुष्यता पर अखंड विश्वास की कविताएं हैं। फूल, कविता, प्रेम और युद्ध के इर्द-गिर्द   १. जब दो देश लड़ रहे होते हैं  तब पूरी दुनिया युद्ध में होती है  जब नहीं लड़ रहे होते  तब भी  २. एक आजीवन चल रहे युद्ध में  शरणार्थी शिविर है  कविता  ३ . उन्हें फूलों को बरतना नहीं आता  वे कविता का तेज नहीं सह पाते  उनके भीतर भरा हुआ है ग़ुस्सा  प्रेम कभी उन पर मेहरबान नहीं हुआ  वे वेध्य हैं उपयुक्त हैं उपलब्ध हैं  युद्ध बड़ी आसानी से उनका शिकार कर लेगा  ४ . युद्ध पर विमर्श-विलास के लिए होना चाहिए  बहुत थोड़े से शब्दों या वाक्यों का सम्यक दोहराव  और एक गहन मूर्च्छा जबकि युद्ध के विरुद्ध खड़े होने के लिए  काफ़ी है ए...

कल्लोल चक्रवर्ती की कविताएं

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                              कल्लोल चक्रवर्ती  कल्लोल चक्रवर्ती की कविताओं में हमारे समय की वह सच्चाई है जिसमें एक तरफ तो युद्ध के बीच जलती झुलसती मनुष्यता है तो दूसरी तरफ नरसंहार करने की उन्मत्त हिंसक प्रवृत्ति है जो किसी भी हालत में जीत के लिए लालायित है।यह प्रवृत्ति भूख और बीमारी के लिए जमीन तैयार करती है सिर्फ इसलिए कि लड़ने का हौसला एक दिन पस्त हो जाए।इन कविताओं में निर्वासन की पीड़ा है तो आवाज पर लगने वाली धीमी पाबंदियां भी हैं जो हर मोर्चे पर सक्रिय हैं और बोलने को चुप में बदल देना चाहती हैं। जड़ों से छूटने का दर्द हो या अपने होने को बचा लेने की जद्दोजहद।ये कविताएं अपनी आवाज बहुत मजबूती से दर्ज करती हैं। बोलना मेरे कुछ बोलने से पहले ही सहम जाती पत्नी, जिन्होंने मुझे धैर्यपूर्वक बोलना सिखाया वह माँ भी कहतीं कि बोलने से चुप रहना अच्छा, कॉलेज में पढ़ने वाली बेटी मेरे कहे हुए पर ध्यान देती कि कहीं कुछ विवादस्पद तो नहीं है मुझे पता भी नहीं चला एक दिन उसने बहुत सफाई से हटा दी वह किताब 'बोलना ही है'। हालाँक...

प्रिया वर्मा की कविताएं

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                                प्रिया वर्मा   प्रिया वर्मा की कविताओं में जीवन के अनेक रंग हैं।इन रंगों के केंद्र में स्त्री है। प्रेम है देह है पतझड़ है तो तलाक भी है।इन कविताओं में जीवन की जद्दोजहद के बीच वह तकलीफ़ भी है जो होकर भी नहीं होने का दर्द झेलने के लिए मजबूर करती है।कुल मिलाकर ये कविताएं ध्यान खींचती हैं।बेचैन करती हैं। अभी का दुःख   इंतज़ार करती हूं  दुःख के छोटे होने का  मिटने का नहीं  मिटता नहीं, सिमटता है  उजाले की बिंदी-सा  धब्बे की तरह, सिकुड़कर  मिटने का भरम देकर  अंधेरा लगने लगता है उजला  जब तक नहीं होता उजाला फिर एक दिन  एक नया दुःख  धंसने आ जाता है पसली में। और अभी का दुःख  सीने से बाहर  निकल जाता है। कांटा ही निकालता है कांटे को। न होना न होने की नदी में होने का खेल खेलते हुए ही सारे पुल बनाए जा सके।  न होने के रास्तों पर  बार-बार उठाए जा सके  होने के कदम-  हर बार निकले हम  नई यात्रा के लिए।...