कल्लोल चक्रवर्ती की कविताएं

 

                            कल्लोल चक्रवर्ती 

कल्लोल चक्रवर्ती की कविताओं में हमारे समय की वह सच्चाई है जिसमें एक तरफ तो युद्ध के बीच जलती झुलसती मनुष्यता है तो दूसरी तरफ नरसंहार करने की उन्मत्त हिंसक प्रवृत्ति है जो किसी भी हालत में जीत के लिए लालायित है।यह प्रवृत्ति भूख और बीमारी के लिए जमीन तैयार करती है सिर्फ इसलिए कि लड़ने का हौसला एक दिन पस्त हो जाए।इन कविताओं में निर्वासन की पीड़ा है तो आवाज पर लगने वाली धीमी पाबंदियां भी हैं जो हर मोर्चे पर सक्रिय हैं और बोलने को चुप में बदल देना चाहती हैं। जड़ों से छूटने का दर्द हो या अपने होने को बचा लेने की जद्दोजहद।ये कविताएं अपनी आवाज बहुत मजबूती से दर्ज करती हैं।



बोलना

मेरे कुछ बोलने से पहले ही सहम जाती पत्नी,
जिन्होंने मुझे धैर्यपूर्वक बोलना सिखाया
वह माँ भी कहतीं कि बोलने से चुप रहना अच्छा,
कॉलेज में पढ़ने वाली बेटी मेरे कहे हुए पर ध्यान देती कि कहीं कुछ विवादस्पद तो नहीं है
मुझे पता भी नहीं चला एक दिन उसने बहुत सफाई से हटा दी वह किताब 'बोलना ही है'।

हालाँकि बोलने पर कोई पाबंदी नहीं थी
लोग बोल ही रहे थे बेरोकटोक इस तरह कि झूठ और बड़बोलेपन में फर्क करना मुश्किल था
वे लिख भी रहे थे ताबड़तोड़ जहाँ-तहाँ,
और इस मामले में तो स्वतंत्रता ऐसी थी कि गरिमा, संतुलन और सहिष्णुता वगैरह को देश निकाला दे दिया गया था
इन्हें नहीं मिलती थी चुप रहने की हिदायत,
उल्टे सड़क से सोशल मीडिया तक समर्थक मिलते थे चारों ओर,
वे तंदरुस्त थे और रातों को नींद भी अच्छी आती थी।
नजदीकियों का कहना था कि मैं खामख्वाह ही इधर ज्यादा शंकालु, असंतुष्ट और निराशावादी हो चुका था
और लोगों से उलझने में मुझे मजा आता था
जबकि अब शंका करने की कोई वजह नहीं थी
सच्चाई यह थी कि मैं इस बदलाव से चिंतित था दूसरे अनेक लोगों की तरह
कभी अन्याय, गैरबराबरी और उदारता की बातें करने वालों में भी उनकी आक्रामक और उद्दंड धार्मिकता को साफ-साफ देख सकता था।
जिन्हें खुद को और जीवन को अभी ठीक-ठीक समझना था
वे भी धर्म, देशभक्ति और घुसपैठियों पर घंटों विशेषज्ञ की तरह बोलते हुए
मेरी तरफ कनखियों से देखते थे।
मेरी मुश्किल यह थी कि मैं मौसम की खुशगवारी, लोगों की खुशहाली, महिलाओं की आजादी और सरकार की शक्ति से आगे बोलना चाहता था,
और घर से सड़क तक बार-बार चुप करा दिया जाता था।



कहाँ गयीं वे खिलखिलाती लड़कियाँ?

हर साल दसवीं-बारहवीं में लड़कों को पछाड़तीं
तस्वीरों में हँसती-खिलखिलाती, नाचती लड़कियाँ
कहाँ चली जाती हैं?
वे लड़कियाँ कहाँ हैं जो सबसे प्रतिष्ठित नौकरी की परीक्षा में पुरुषों को पीछे छोड़ती हैं?
उनके परिश्रम, जज्बा और प्रतिभा पर दो दिन चर्चा
फिर हारी हुई लड़कियों की करुण गाथाओं से भरा रहता है समय

हँसती हुई वे लड़कियाँ अच्छे कॉलेजों में एडमिशन कराने के बाद पढ़ाई के बोझ से झुकी हुई हैं
प्रतिष्ठित नौकरी हासिल करने के बाद वे नौकरी के बोझ और दाँवपेच में उलझी हैं
तस्वीर में सबसे बायीं ओर हवा में दुपट्टा उड़ाते हुए खिलखिलाती लड़की की शादी हो चुकी है और वह
ससुराल में सास-ससुर और देवर-ननद की कड़ी निगरानी में है
खबरदार कोई पत्रकार पहुँच न जाये उस कामयाब लड़की का इंटरव्यू लेने
सास तभी बम फोड़ देगी, 'खाना बनाना नहीं आता,
माँ ने कुछ नहीं सिखाया
सिर्फ पढ़ने और नंबर लाने से कुछ नहीं होता
हमारी होनहार बेटी भी तीन साल से घर में बैठी है'।


दाल

मैं दाल के दौर का हूँ
जब यही जाता कहा था, 'इतना कमा लो
इज्जत से दाल-रोटी चलती रहे.'

यह इज्जत से दाल-रोटी चलाने का दौर नहीं है
न ही 'यह मुँह और मसूर की दाल' से  
लोगों का कद मापा जाता है.
शानदार दावतों में दाल मखनी और मुरादाबादी दाल भी
शायद ही बचा पाती है दाल की इज्जत.
नई पीढ़ी दाल को पहचानती है उसके काले-पीले रंग से।

किसी परम संतुष्ट प्राणी ने ही कभी कहा होगा
'दाल-रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ'
इसी से प्रेरित होकर पत्रकार दोस्त सुधीर गोरे
सिर्फ रोटी और दाल का होटल खोलने की बात करते थे
किस्म-किस्म की दाल और तरह-तरह की रोटियों की...
पर पनीर और चिकन के बगैर ऐसे होटलों का भविष्य अब कहाँ है!
... मैं दाल के जमाने का आदमी हूं
और यह दाल का दौर नहीं है।



दिल्ली में शेख हसीना और तसलीमा नसरीन  

शेख हसीना दिल्ली में हैं और
कभी-कभी ही मुँह खोलती हैं,
दिल्ली में कभी इतनी खामोश नहीं रहीं शेख हसीना,
उनके बेटे फोन पर नियमित उनका हालचाल पूछते हैं,
पार्टी के लोग भी दुआ करते हैं उनके लिए
लेकिन दिल्ली में सूनापन उन्हें काट खाता है
पंडारा पार्क, आकाशवाणी भवन और इंडिया गेट में पहले की तरह आवाजाही के बारे में वह सोच भी नहीं सकतीं
उनका हालचाल लेने वाले प्रणब और शुभ्रा मुखर्जी भी अब इस दुनिया में नहीं हैं।

दिल्ली में कई साल से रहती हैं तसलीमा नसरीन भी
वह शेख हसीना से ज्यादा सौभाग्यशाली हैं
और अक्सर दिख जाती हैं पुस्तक मेलों और साहित्य समारोहों में,
लेकिन दोस्तों-परिचितों के साथ कभी-कभी दिखने के बावजूद सुबह से देर रात तक निपट अकेली ही होती हैं तसलीमा नसरीन भी।
उन्हें पता है कि जिस शेख हसीना ने उन्हें
ढाका में घुसने नहीं दिया, वह खुद भी अब
जान बचाकर पड़ी हैं दिल्ली के किसी कोने में।
तसलीमा सोचती हैं शेख हसीना के बारे में
उन्होंने शेख हसीना पर लिखा है लेकिन
मानना मुश्किल है कि वह उन्हें फोन करेंगी या मिलने चली जाएंगी उनसे।
क्या पता शेख हसीना को भी याद आती हों तसलीमा नसरीन!
जानती तो होंगी वह कि इसी दिल्ली शहर में कहीं रहती होंगी तसलीमा नसरीन भी,
तसलीमा नसरीन के लिए ढाका का रास्ता बंद करते हुए क्या कभी सोचा होगा शेख हसीना ने कि एक दिन उनके लिए भी ढाका पराया हो जाएगा और
मिटा दिया जाएगा धानमंडी का अस्तित्व?



पुराने घरों की स्मृतियां
 
पुराने घरों की स्मृतियाँ हैं
और वे पुराने लोगों की स्मृतियों से कम नहीं हैं।

एक आदमी कितने घर बदलता है,
और एक साथ रहता है कितने घरों में।
पिता ग्यारह की उम्र में एक घर छोड़ आये थे
और सड़सठ की उम्र तक कई घरों में रहे
हालाँकि मृत्यु के समय बचपन के घर को याद कर रहे थे।
मैं एक घर में रहता हूँ और मेरे अंदर रहते हैं कई घर।
बचपन में किराये के एक घर की छत से दिखता था कब्रिस्तान
मिट्टी के फर्श वाली एक छोटे से घर की स्मृति है
रेलवे के कई घरों में रहना हुआ जो वीरान हैं अब और कई बार दिख जाते हैं यात्राओं में
दो कमरे के घर में रहते थे हम चार भाई-बहन और मां-पिता, बड़े होकर उससे ज्यादा बड़े घरों में रहा लेकिन छह लोग कभी नहीं हुए फिर एक छत के नीचे।
...एक बंद घर से रात में अचानक निकलती हैं स्मृतियाँ,
छोटे-से रेलवे स्टेशन के एक कोने का घर देर रात इंतजार करता है,
पिता लौटेंगे काम से और खटखटायेंगे दरवाजा।
जिस घर से विदा लेते हुए कभी रोई थी माँ उसका बरामदा दशकों से
हमारे स्पर्श की प्रतीक्षा में हैं।
एक घर में इस बार भी आम फलेंगे और हम न होंगे...



कूड़ा

पृथ्वी के एक हिस्से को साफ करने के लिए दूसरे हिस्से में भरा जा रहा है कूड़ा,
शहर का एक हिस्सा चकाचक है
दूसरे हिस्से में जमा हो रहा है कूड़ा।
दिवाली की रात आसमान धूल-धुएँ से और
सड़कें पटाखों के कूड़े से भर गई हैं
...देर रात कूड़े की गाड़ी लेकर लौट रही है एक अकेली औरत।
एक गंदे लड़के की पीठ पर कूड़े से भरा थैला है
हम उसे कहते हैं कूड़ेवाला,
जैसे यह सारा कूड़ा उसी ने फैलाया हो।
वे जो सुसज्जित फ्लैटों में रहते हैं,
वे जो कारों में चलते हैं
वे जो टेनिस और बैडमिंटन खेलते हैं,
शॉपिंग करते हैं,
सजे-धजे रहते हैं,
उन सबके घरों का कूड़ा है वह,
लेकिन यह मान लिया जाता है कि पृथ्वी का सारा कूड़ा उसी ने फैलाया है।

वह गंदा है, गरीब है काला है इसीलिए
पूरे मोहल्ले का कूड़ेवाला है।  



गजा में मौत

मेरी दादी कहती थीं खाते हुए दुश्मन पर भी
हाथ नहीं उठाते,
गजा में रोटी बाँटने वाले बमबारी कर रहे हैं
जिन्होंने गजा को श्मशान बनाया वे अब राहत दे रहे हैं।
वह जो रफाह का युवक भोजन लाने गया था नहीं लौटा, उसकी मां तड़प रही है,
एक युवक मारा गया और सुबक रही उसकी स्त्री
बेटे को मालूम नहीं पिता कहां चला गया।
बममारी, धुआँ, मौत और बर्बादी के बीच भी पैदा हुए हैं कुछ बच्चे,
हालाँकि इलाके पर इलाके खाली हो गये हैं,
ध्वस्त हो गयी हैं बस्तियाँ फिर भी ठीक से साँस नहीं ले पा रहे नवजात और कोई नहीं जानता कब तक जियेंगे वे क्योंकि भूखी
माताओं की छातियों में दूध नहीं हैं,
बैसाखी के सहारे लोग दो-ढाई किलोमीटर तक चलने का जोखिम उठाते हैं,
दो ही विकल्प हैं तंबू में रहकर
भूख और बीमारी का सामना करें या पेट
भरने के लिए घर से निकलने का जोखिम उठायें। जितने थके लोग राशन लेकर शिविरों में लौटते हैं उससे ज्यादा लोग घायल होकर अस्पतालों में जाते हैं  
परिजनों के लिए ये तीन-चार घंटे कयामत के होते हैं क्योंकि पता नहीं,
आटे की किस बोरी में मौत लिखी है।
जहां कुछ दलिया और खिचड़ी बांटी जाती है वहां बर्तनों की भीड़ में चेहरे छिप जाते हैं,
कई घंटे की मशक्कत के बाद बड़े-से बर्तन में एक-दो कलछुल खिचड़ी रखी जाती है,
आटे के ट्रकों का इंतजार जब ज्यादा हो जाता है तब उतावली हो जाती है भीड़।
खंडहर बन गये गजा में सिर्फ भूख बची हुई है जो घायलों को दौड़ाती है राहत शिविरों में लेकिन उतना राशन नहीं है।
घाव, पीड़ा, बदबू और बीमारी से भरे तंबुओं में एक किलो आटा चाहिए...
कम से कम एक किलो आटा ताकि सब खा सकें नमक के साथ एक एक रोटी।
वे भूखे हैं और उदास भी,
वे चुप हैं और स्तब्ध भी कि गजा से बाहर की सभ्य दुनिया भी चुप है।

गजा के लोगों को मरना होगा,
अगर वे बमबारी से नहीं मरते तो
जरूर मरेंगे भूख और बीमारी से।











कल्लोल चक्रवर्ती 

पत्रकारिता, कविता और अनुवाद के क्षेत्रों में सक्रिय।
तसलीमा नसरीन के लेखों के अनुवाद की दो पुस्तक, ‘दूसरा पक्ष’ और ‘एकला चलो’ तथा राजकमल प्रकाशन से कविताओं का अनुवाद, 'यदि प्यार करो' प्रकाशित।
विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के उपन्यास ‘आरण्यक’ और 'पथेर पाँचाली', तथा साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत बांग्ला उपन्यास ‘सेई निखोंज मानुषटा’ का हिंदी अनुवाद, ‘वह लापता आदमी’ और बाल कथा संग्रह, 'चार-पाँच दोस्त' प्रकाशित।
एक कविता संग्रह, ‘कतार में अंतिम’।

संप्रति 'प्रभात खबर', दिल्ली से संबद्ध। 
संपर्क-9910500352





Comments

  1. पंकज चौधरी28 February 2026 at 03:49

    कल्लोल चक्रवर्ती मेरे प्रिय कवि हैं। इस पटल पर भी उनकी बेहतरीन कविताएं पढ़ने को मिलीं। उन्हें बहुत बहुत बधाई।

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  2. प्रभा मुजुमदार28 February 2026 at 03:49

    लाजवाब।

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  3. सुदीप ठाकुर28 February 2026 at 03:57

    वाह... कल्लोल जी। शानदार कविता।

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  4. चंद्रेश्वर28 February 2026 at 04:52

    कल्लोल चक्रवर्ती की कविताएं अपने आसपास के जीवन,निजी एवं पारिवारिक जीवन
    की सादी, मार्मिक सच्चाइयों से बुनी गई हैं। वे एक तरह से लघु आख्यानों की तरह हैं। कल्लोल की कविताएं हाड़ मांस और मज्जा से बनी हैं। उनमें बिम्बों और प्रतीकों की दुरूहता नहीं है। एक अरसे बाद उनको पढ़ कर अच्छा लगा।

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  5. नितेश व्यास28 February 2026 at 08:01

    बढ़िया प्रभावी कविताएं।

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  6. स्वप्निल श्रीवास्तव28 February 2026 at 08:03

    कल्लोल मेरे प्रिय कवि और मित्र हैं
    वे विलक्षण कविताएं लिखते हैं.
    दिल्ली में शेख हसींना और तसलीमा नसरीन. बोलना. कहां गयी खिलखिलाती हुई लड़कियां. और पुराने घर की स्मृतियां
    बहुत अच्छी कविताएं हैं।

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