सविता सिंह की दस कविताएं
सविता सिंह समकालीन हिंदी कविता में जिन कवियों की पहचान उनकी कविताओं से आसानी से की जा सकती है उनमें सविता सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।उनकी कविताएं भाषा के स्तर पर जितनी कोमल दिखती हैं भाव और भंगिमा के स्तर पर उतनी ही वे ठोस होती हैं। यहां प्रस्तुत कविताएं इसका उदाहरण हैं। सविता सिंह की कविताएं जिधर स्वप्न है जिधर स्वप्न है उधर ही प्यास है उधर एक खाली मैदान है पथरीला कहते हैं उधर पहले घास का साम्राज्य था उसमें रहने वाले जीवों का एक बार आसमान से ढेर सारा जल उतरा महीनों हरियाली को खुद में डुबोए रखा फिर उसे नष्ट कर दिया जीवन की प्यास बची रही उसे ही समझने तमाम जीवों ने फिर जन्म लिया तब से वे अब तक ऐसे ही हैं प्यासे गला सूखा हुआ स्वप्न जगा चलता हुआ। विकट इच्छा उड़ती हुई सी एक प्यास आकर गले में बस गई वह महज पानी के लिए नहीं आई थी मेरे पास उसे पता था मुक्ति का कोई एक रास्ता मुझसे होकर जाता है वह मेरे साथ ही चलना चाहती थी पानी ढूंढना मेरा काम था उसे तो बस चलना था दग्ध मेरी आत्मा के साथ उसे अंदाजा कहां था उन कंकड़ों पत्थरों का जो रास्ते मे...