अच्युतानंद मिश्र की कविताएं
भूमंडलीकरण के बाद धर्म, सत्ता और पूंजी के गठजोड़ से जो नई व्यवस्था सृजित हुई है वह जितनी निर्मम है उतनी ही हिंसक।पूरा विश्व आज एक ऐसे अघोषित युद्ध की आग में झुलस रहा है जिसमें हथियार ही सबकुछ है। मनुष्य के मारे जाने की न अब गिनती होती है न किसी को फर्क पड़ता है। सबकुछ एक खबर भर है जिसके बीच रंगीन और चमकदार विज्ञापन भी है उसके असर को कम करने के लिए। अच्युतानंद मिश्र की कविताएं इसी व्यवस्था के उभार और उसके बर्बर चेहरे को सामने रखती हैं।ये कविताएं हमें जितना अपने आसपास से जोड़ती हैं उतना ही उस विश्व से जिसकी शांति खतरे में है।
अच्युतानंद मिश्र की कविताएं
युद्ध कहीं नहीं था
यह बेतरह उदास होने का समय था,
और हमारे पास समय नहीं था
हमें अगली सुबह साफ-शफ्फाक कपड़ों में
हंसते हुए निकलना था
हमें जरूरी दवाइयां खानी थी
ताकि हमारा रक्त-चाप और कोलेस्ट्रोल नियंत्रित रहे
हमें समय पर बैंक की किस्तें अदा करनी थी।
हमें उन तोहफों के बारे में सोचना था
जो हमें आगामी जन्मदिन पर मिलने वाले थे
हमें अपने बच्चों को कान्वेंट स्कूलों में भेजना था
ताकि वे अव्वल आ सकें
और एक दिन हम से भी बड़ी किस्तें अदा कर सकें
यह हमारा सरल साधारण नागरिक जीवन था
इसमें युद्ध के लिए
मृत्यु के लिए
बम के लिए
टैंक के लिए
देश के लिए
कोई जगह नहीं थी
टी.वी. पर गाहे-बगाहे हमें खबरें
दिखाई देती थी,
उसे देख कर भी
ना देखने का हुनर
हमने सीख लिया था
हर क्षण चल रहा था कहीं युद्ध
कहीं बमबारी
कहीं मृतक बच्चों की टूटी हुयी खोपड़ी
निकली हुई आतें, टूटे हुए जबड़े
धूल में लिथड़े पैर
हवा में अटकी आखिरी सांस
वे कहीं से हमें छूती नहीं थीं
उनसे हमारा कोई रिश्ता नहीं था
हम सरल सादा जीवन बिताने वाले
हंसने हंसाने वाले नागरिक थे
युद्ध की शक्ल बैंक की किस्तों में
कभी-कभार दिखाई देती
और हम कुछ देर के लिए
मोबाइल के केलकुलेटर में उलझ जाते
हमारे भीतर बच्चों के लिए
मृतकों के लिए
चीत्कार के लिए
कोई भी जगह नहीं थी
अलबत्ता शेयर बाजार हमें परेशान करता
सोने की कीमतें हमारे दिमाग में उलझ जाती
और कार ड्राइव करते हुए
थोड़े परेशान से हम रेड-लाइट पर आगे बढ़ जाते
कोई अदृश्य कैमरा हमारी तस्वीर ले लेता
एक मोबाइल का संदेश हमें बताता
हमने ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन किया
हमारे भीतर का नागरिक थोड़ा शर्मिंदा होता
युद्ध, मृत्यु, चीत्कार बस इतना ही था
हमारे सरल सादा जीवन में
कभी-कभार एक लंबी खामोशी फैलती
वह छूने-छूने को होती हमारे दिलों को
बारूद से निकला एक अदना कांच का टुकड़ा
फंसने-फंसने को होता हमारी स्मृतियों में
जली हुई बरौनियों की कालिख
घुसने-घुसने को होती हमारी निगाहों में
तभी रेडियो पर एक तेज आवाज आती-
कुकड़ू-कूं
और हम सहज हो जाते
वॉल्यूम बढ़ाते -बढ़ाते
हमारी मांस-पेशियों का तनाव ढीला पड़ जाता
चाइनीस नूडल्स या इटालियन पास्ता
आर्डर करने का ख्याल हमें रोमांचित कर देता
शाम को पत्नी और बच्चों के साथ
सौदा -सुलुफ के लिए
स्मार्ट बाजार जाने के ख्याल की खुशी
स्मृतियों से बुहार देती
युद्ध का सारा मलवा
बच्चों की अधजली लाशें
हम नहीं सोच पाते
बच्चे कैसे मरते हैं
आखिरी चीत्कार में
वे किसे याद करते हैं
बम के गिरने से पहले
दुनिया के बारे में
देश के बारे में
उनकी मुसलसल राय क्या थी
दुनिया के मानचित्र में रंग भरना उन्हें भाता था
ब्लैकबोर्ड पर खडूस शिक्षक की
हास्यास्पद आकृतियाँ बनाने का खेल
उन्हें रास आने लगा था
सुबह उन्होंने क्या खाया था
शाम को क्या खाने की फरमाइश बताकर
वे स्कूल गये थे
आखिरी बार ठठाकर वे किस बात पर
हंस रहे थे
उनकी नाराजगी का सबब क्या था
बगल की बेंच पर बैठे दोस्त से
वे किस बात पर नाराज हो गए थे
हम नहीं सोच पाते
समय ही कहाँ था हमारे पास
कितना कुछ तो हमारे ही जीवन में
हर क्षण हर पल घट रहा था
युद्ध कहाँ था
कितना और क्यों था
एक टी.वी. के स्विच ऑन-ऑफ जितना था
चैनल बदलते हुए युद्ध एक खेल में बदल जाता
बिग-बॉस में युद्ध घटित होता
एक हंसी टीवी के पर्दे पर
अश्लील पाशविकता में बदल जाती
सस्ती कामुकता हमारे दिलों दिमाग पर
दिल्ली के प्रदूषण की तरह छा जाती
हमें किसी बात का अफसोस नहीं था
कोई दुख, कोई पश्चाताप
कोई उदासी भी नहीं थी
एक सरल-सादा जीवन था
रोज-रोज व्यतीत होता हुआ
अपनी दिनचर्या में हम इतने मशगूल थे कि
हमें उसके बाहर कुछ नहीं सुनाई देता
कुछ नहीं दिखाई देता
युद्ध कहीं नहीं था
बर्बर तानाशाहों , अश्लील राजनेताओं
और घृणित व्यापारियों के लिए
अगर कोई युद्ध था तो
हम उसमें शामिल नहीं थे
हम तो मोबाइल पर
ठीक ठीक कूपन कोड के साथ
कोई आर्डर प्लेस करने के लिए
चिंतित थे
हम चिंतित थे
ट्रैफिक का चालान कटने से
बैंक की बढ़ती हुयी किस्त को लेकर
परेशान थे
हम परेशान थे
कहीं शेयर बाजार का भाव गिर ना जाए
कहीं पेट्रोल की कीमतें बढ़ ना जाए
सोने के भाव गिरने-चढ़ने के अतिरिक्त
हमारे भीतर और कोई भाव नहीं था
यह बेतरह उदास होने का समय नहीं था
यह बेतरह, बे-भाव खाते-खाते
अनंत वस्तुओं से पटे समुद्र में
डूब मर जाने का समय था
और हमारे समय के बाहर भी कोई समय था
कोई दुनिया थी
कोई युद्ध था
सफ़ेद चादर में लिपटी
मृतक बच्चों की लाशें थी
जिनकी उँगलियाँ अभी तक गर्म थीं
और चेहरे पर दर्द ऐंठन और चीत्कार के निशान के बावजूद
एक निश्छल कोमलता बरकरार थी
भाषा जिसे कहने में सर्वथा
असमर्थ और बेकार थी
हम जानते हुए उससे अनजान थे
यह इक्कीसवीं सदी के आदमी का जानना था
जानने के दलदल में डूबे हुए हम
अलमस्त प्रसन्न और अघाए हुए थे
जानने के सारे दरवाजे
मोबाइल की स्क्रीन पर खुलते थे
शेयर बाजार का ग्राफ
हमारे दिल की धडकनों के उतार-चढ़ाव का
सीधा सदा बयान थी
बिस्तर पर जाते हुए
अगली सुबह की उम्मीद लिए
हम उदास नहीं
उत्सुक और किंचित रोमांचित थें
क्या सचमुच बढ़ने वाली है
पेट्रोल की कीमतें ?
अपार्टमेंट की खिड़की से
देर रात दिखाई देती
गाड़ियों की जगमग रोशनी सबूत थी
कहीं कोई युद्ध नहीं था
बुरी खबरें थीं
और उससे बचे हुए थे
हम
हमारे बच्चे
हमारा पड़ोस
हमारा शहर
और हमारा देश
सचमुच चिंता की कोई बात नहीं थी
सबकुछ शांत सरल
बचे हुए लोगों के चेहरे
मोबाइल- स्क्रीन की तरह
उम्मीदों और संभावनाओं की
असीमित रौशनी से लबरेज़ थे
दुनिया के बारे में अब भी किताबें लिखी जा रही थी
धरती अब भी मनुष्य का ठिकाना बनी हुयी थी।
वेरावल के समुद्र में उठती है कोई लहर
कोई उदासी है कि
डूबता जाता है दिल
गर्क हुए उम्मीद के सूरज
हौलनाक दरियाओं में
सफ़र का सलीब है
फकत हासिल
कितने कदम चले थें
कि बनी थी उम्मीद
कितनी आखों में चमके थे ख्वाब
ये वही सड़क है कि जहाँ
उम्मीद की लाश पे चलता हूँ
ये वही रास्ता है,
ये उसी रास्ते की हवा है
जैसे सब जानता हूँ
जैसे सब जानना
बनाता है
बेगाना
दो स्टेशन के बीच रेलगाड़ी
लटका हवा में कोई पत्ता
साँस के बीच
स्मृति का कोई झोंका
नदी में डगमगाती कोई नाव
वे तीन लौट रहे हैं,
उम्मीद के दरवाज़े से
खाली हाथ
भारी क़दमों से देते हैं थपक
जैसे पीटते हो माथा
धरती की छाती पर
हाथों के पोरों में थिड़क रही
उम्मीद की दस्तक अब तक
वे तीन लौट रहे हैं
वेरावल के समुद्र में
उठती है कोई लहर
बरसने को आतुर
आँखों का नमक
पेरुम्बावूर के आकाश में
वो हवा जो छूकर गुजरी है
उसका माथा
चीर दे आदमी का सीना
लौट रहा है बच्चा
आड़े-तिरछे क़दमों से
मोटरी उठाये घिसट रही है स्त्री
सर झुकाए लौटता है पिता
जैसे लौटता है पराजित युद्ध
का अंतिम सिपाही
वे तीन लौट रहे हैं
वेरावल के समुद्र में
डूब रही है लहर
पेरुम्बावूर की सड़क पर
कौन सहलाता है
उम्मीद का माथा ?
ट्रेन भूल गयी है रास्ता
भटकती वीराने में
मरा हुआ क़स्बा और मरता है
एक उबकाई घेरती है पूरे वजूद को
वीरान सड़क पर खून का
कोई नामोनिशान नहीं
डूबी हुयी नाव की आखिरी चमक
कौंधती है
वेरावल के समुद्र के सीने में
ख़ामोशी गूंजती है वीराने में
टूटे दिलों के आशियाने में।
स्मृति
सोचने की हद के
पार जाकर कहना था –
भूल जाना भी स्मृति है
मिट जाना प्रमाण
डूबना उपस्थिति
छूट जाना पुकार
विस्मृति के गुहा-गृह में
सन्नाटे की कौंध के पार
धुंधले शब्दों में दर्ज
बर्बरों की दास्तान
सभ्यता की जीवनदायनी नदी ने
मिटा दिए लहू के अंतिम साक्ष्य
आत्मा की पीठ पर
घृणा के नुकीले हथियारों से
उकेरे गये शब्द
कहाँ गये ?
लाओ साक्ष्य दिखाओ प्रमाण
सचमुच खुदाई से मिलता है
कोई सबूत ?
वहां तो बस
दिखते हैं कुछ
निशान मिटे हुए
कटी हुयी जिह्वा
टूटे हुए बर्तन
आततायी का पंजा
मृत मनुष्य की जीवित खोपड़ी
चीख-पुकार और हाहाकार की
असंख्य ध्वनियाँ
जो समा गयीं रेत के कण-कण में
अग्नि जला देती है सबकुछ
समुद्र निगल लेता है सबको
सारे देवता बौने पड़ जाते हैं
आकाश की ऊंचाई के सामने
तूफ़ान मिटा देती है
सारे क्रूर निशान
रह जाती है बस
मिटने की स्मृति
अमिट बनकर ।
पृथ्वी का कारोबार
पत्थरों के बीच ठहरे पानी में
चमकता है
नन्हें पौधे का उन्नत माथा
ठहरा हुआ सारा संसार है वहां
असंख्य पलों से चक्कर लगाता सोचता
जटिल प्रश्न सृष्टि के
हल करने की कोशिश करता
रेंग रहा एक कीड़ा
एक बहुत ही छोटे कंकड़
पर टिका हज़ार बून्द पानी का वज़न
पूरा साम्राज्य चीटियों का,
उन्हें दम भर की फुरसत नहीं
दाने का टुकड़ा मुंह में दबाए
वे कहीं से चली आ रही हैं
कहीं दूर जाने के लिए
नन्हीं चिड़िया उड़कर आयी अभी
पानी में डुबाती है चोंच
उड़ गई उस कीड़े को लेकर
जीवन से जीवन जुड़ रहा है यहां
जीवन बचा रहा जीवन को
एक जीवन को खोलो तो
उसमें मौजूद हैं असंख्य जीवन
पत्थरों के सख्त चेहरे पर
कितनी आकृतियों की यादें
असंख्य धमनियां
रक्त, हवा, जल और
आँसुओं के नमक से लबरेज़ माथा
खामोशी के भीतर मौजूद
इतनी सारी उथल पुथल
उल्लास भरी हवा के भीतर
दुख की असंख्य नदियों का जल
उड़कर आ गया है
कागज़ का टुकड़ा कहीं से
वृक्ष की आत्मा पर
होकर सवार
कई कीड़े चले जाएंगे उस पार
डूबने से पहले नन्हीं पत्ती
आखिरी बार देखेगी संसार
ऐसे ही चलता है पृथ्वी का कारोबार।
न्याय
यह पीड़ा मृत्यु को देखती है
कान सुनते हैं
देह पाती है स्पर्श
यह मृत्यु की देह है
आ रही है इधर भारी कदमों से
मृत्यु के चेहरे पर कुछ भी तो नहीं
न घृणा न प्रेम
न अवसाद न आवेग
बर्फ सा सफेद - मृत्यु का चेहरा
जीवन द्रव्य में ही घुली हुई थी मृत्यु
उनके हाथ में तलवारें थी
उनके पास थी बीमा की पालिसी
बैंक में खाते थे उनके
दुर्घटना से साफ़ बचा लेने वाली गाड़ियां
सेवक थे जान हथेली पर लिए घूमते
लकड़ी के विशाल दरवाजे थे
लोहे की मजबूत जंजीरों से जकड़े
आदमकद खिड़कियां थीं
पूछकर जिनसे आती थी रोशनी और हवा
वहां कैसे पहुंच गई मृत्यु !
क्या कहीं से चलकर आयी मृत्यु या
जीवन के साथ चलती रही
और जवान हो गयी
कौन जाने
डॉक्टरों ने तो आश्वासन दिया था
कि छू नहीं सकती कोई बीमारी
क्या कोई भी नही पढ़ पाया
मृत्यु की लकीर को?
अब चेहरे की ऐंठन
निस्तेज हो चली आंख
निढाल पलकों में
कितनी स्पष्ट है मृत्यु
कैसे घात लगाए बैठी थी
ताकत के सारे नियम
झुठला दिये मृत्यु ने
इतनी साधारण मृत्यु
धन- वैभव
बचने के सारे उपक्रम
एकदम झूठे पड़ गए
कैसे हुआ यह सब
कैसी सच्ची और निष्पाप थी मृत्यु
वह जो हर क्षण हर पल
जलता रहा प्रतिशोध की अग्नि में
क्या वह ले सकेगा प्रतिशोध मृत्यु का
अब सारे तनाव मिट चुके हैं.
रात जो दस्तखत किया
वह ही है आखिरी चेक
दस्तखत की स्याही से उड़ चुका है जीवन
दरवाजे पर अब भी लटक रहा है
उसका नाम
उस पर बैठी मक्खी
कभी भी उड़ सकती है ।
स्किजोफ्रेनिया -1
अच्युतानंद मिश्र
अनथक देख रहे हो आकाश में
देखता हूँ तुम्हें
तुम्हारे होंठ बुदबुदाते हैं,
कहते हो तुम – “वे देवता हैं”.
आकाश में बादल और सितारे
वे सब देवता हैं
मुझे दिखाई देती हैं आकृतियाँ
वे देवता हैं ?
प्रश्नवाचक चिन्ह की तरह घूमती है आँखें
पीछा करती हैं तुम्हारी आँखों का
चेहरे से तुम्हारे छलक रही है आगाध करुणा
एकटक देखते हो आकाश
आँखों से बह रहे हैं आंसू
दवाएं कर रही हैं उत्पात रक्त में ह्रदय में
एक अँधेरे कुंएं में गिर रहे हो तुम
सख्त होता जा रहा है चेहरा
ऐंठ रही हैं मांसपेशियां
कुंएं के जगत को पकड़ कर बचने की
आखिरी कोशिश
छपाक से बंद होता है रात का दरवाजा
रस्सी का आखिरी सिरा खो गया
उलट गयी है बाल्टी
अन्धकार में युद्ध करेंगे देवता
हर तरफ होगा अट्टहास
हर तरफ होंगे रक्त के छींटे
बादल और सितारे उतर आयेंगे
कुंएं के अंधकार में।
स्किजोफ्रेनिया -2
भूल जाते हो तुम सबकुछ
खाना, पहनना, हंसना, बोलना
भूल जाते हो सोना
बिस्तर पर लेटे लेटे
याद आता है बचपन
घर माँ बाप दोस्त
भूल जाते हो काम पर जाना
लोगों से मिलना और बातें करना
कितना कठिन है रहना इच्छाओं के बगैर
खाली निर्वात सा जीवन और चलते रहना
तुम देते हो जीवन को धोखा
उतार कर जीवन का लबादा
टांग दिया है बाहर तार पर
अलिफ़ नंगे बैठकर बाहर धूप में
देखते हो जीवन का सूखना
दूर जाती हुयी स्त्री की पीठ
अस्फुट से स्वर गूंजते हैं कान में अनवरत –
“तुम्हें जीवन की कोई कद्र नहीं”।
स्किजोफ्रेनिया -3
तुमने बायाँ हाथ उठा रखा है
तुम्हारी मांसपेशियों की खराबी
या रक्त के प्रवाह की समस्या
या धडकन की गति धीमी हो जाने का सवाल
डॉक्टर नहीं समझ सकते
देवता भी नहीं
माँ बहन पत्नी
पड़ोसी दोस्त कोई नहीं
तुम जानते हो इस हाथ का
सीधा होना नामुमकिन
वे तो इतना भी नहीं समझते
कि जब तक ऊपर उठा है तुम्हारा हाथ
कोई असुर
तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता
डॉक्टर के भीतर कोई असुर है
चाहता है हाथ सीधा करना
वह खेल रहा है तुम्हारी शक्तियों से
बुराइयों से बचने के लिए
बचने को असुरों से तुम करते हो साधना
मंत्रोच्चार में उठते हैं होंठ
फड़कते हैं कान
तुम वहां देख रहे हो बार-बार
जो किसी को दिखाई नहीं देता ।
स्किजोफ्रेनिया -4
तुम चल रहे और उससे कर रहे हो बातें
मैं चाहता हूँ तुम चुप न रहो
मुझसे करो बात
तुम किसे देख रहे हो
किससे मिल रहे हो
मैं हूँ मगर मैं नहीं हूँ
वो है मगर भाषा में उपस्थित
और अनुपस्थित वह
जिससे तुम कर रहे हो बातें
भाषा में होना देता है एक अर्थ
जीवन में होना दूसरा
तुम भाषा में देखते हो जीवन
मैं जीवन में ढूँढ़ रहा हूँ भाषा
कितने प्रश्न हैं तुम्हारे पास अ-संबोधित
तुम मुझे देख कर भी नहीं देख रहे
मैं तुम्हें देख कर भी नहीं समझ पा रहा
हम दो हैं
मगर वह तीसरा कर रहा है बातें
तुम्हारे प्रश्नों के ऐवज में
ढूँढ़ता हूँ उत्तरों के प्रश्न
मगर भाषा स्थगित
अर्थ गुमसुम बैठें है दृष्टि के उस पार
भाषा के उस तरफ तुम
शब्दों के उस पार मैं
तीसरा अर्थ हर तरफ मौजूद
मैं उसे देख नहीं पा रहा
तुम कर रहे हो उससे बातें
नींद में और नींद के बाद
और नींद के लिए ।
स्किजोफ्रेनिया -5
तुम्हारी चुप्पी में कितने प्रश्न
इस घर की दीवार में उग आयें हैं
इस घर की दीवारें इतनी सख्त
और उलझनों से भरा तुम्हारा चेहरा खामोश
तुम कर रहे हो मंत्रोच्चार
अस्पष्ट शब्दों से उकेरते हो आकृतियाँ
दीवार पर दिखाई देते हैं चेहरे
घर के मन के
तुम एकटक देख रहे हो दीवार को
मगर दीवार गिरेगी नहीं
और प्रश्न फ़ैल जायेंगे सब ओर
पड़ोसियों की खोजती आखें
छिप कर देखेंगी दीवार की दरारों से
तुम हंसोगे और कहोगे
देवताओं ने बचा लिए तुम्हें
वे चाहते थे तुम्हारी मृत्यु
और पा गये मृत्यु ।
अच्युतानंद मिश्र
कविता और आलोचना दोनों में समान रूप से सक्रिय अच्युतानंद मिश्र का जन्म बोकारो (झारखंड) में हुआ।
दो कविता संग्रह चिड़िया की आंख भर रोशनी में और आँख में तिनका ।उत्तर मार्क्सवादी चिंतकों पर केंद्रित विचार और आलोचना की पुस्तक बाज़ार के अरण्य में प्रकाशित। कविता पर केंद्रित आलोचना की पुस्तक कोलाहल में कविता की आवाज़ ।
प्रेमचंद: साहित्य संस्कृति और राजनीति शीर्षक से प्रेमचंद के प्रतिनिधि निबंधों का संकलन। साहित्य की समकालीनता शीर्षक के अंतर्गत साहित्य और समय के अन्तर्सम्बन्धों पर केन्द्रित लेखों का संकलन एवं संपादन. कबीर की कविता पर लेखों का संकलन-संपादन तथा प्रसिद्ध अफ्रीकी उपन्यासकार चिनुआ अचेबे के उपन्यास Arrow Of God का हिंदी में देवता का बाण शीर्षक से अनुवाद।
कविता के लिए वर्ष 2012 में शब्द साधक युवा सम्मान एवं वर्ष 2017 में भारतभूषण अग्रवाल सम्मान।
आलोचना के लिए दिया जाने वाला प्रतिष्ठित देवीशंकर अवस्थी सम्मान वर्ष 2021में कोलाहल में कविता की आवाज़ को।
सम्प्रति: श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय कालडी में सहायक आचार्य ।
मो.-9213166256
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अच्युतानंद विलक्षण कवि हैं, संवेदना और विचार के समरस रसायन से नयी निर्मिति करने वाले निपुण कवि।आँख में तिनका से बढ़ते हुए अपने समय की नाड़ी पकड़ने वाले विशिष्ट कवि।
ReplyDeleteअच्युतानंद मिश्र की कविताएं आज के बर्बर और जटिल समय का चेहरा दिखाती हैं। वे ऐसे समय के बीच पसरी उदासी को भी लक्षित करती हैं। वरिष्ठ अग्रज कवि -गद्यकार अरुण कमल सही लिखते हैं कि ये हमारे दौर के एक विशिष्ट कवि हैं। अच्छे कवियों और उनकी महत्वपूर्ण कविताओं की प्रस्तुति के लिए आपका हार्दिक आभार।
ReplyDeleteचंद्रेश्वर, लखनऊ
बेहतरीन कविताएं।
ReplyDeleteजीवन से जीवन जुड़ रहा है यहां
ReplyDeleteजीवन बचा रहा जीवन को
जीवन की, जीजिविषा की कविताएँ
अच्युतानंद मिश्र की इन कविताओं में एक टूटे-फूटे भयावह समय में एक ओर जहां आत्मकेंद्रित, घोर स्वार्थी , मध्य वर्गीय निष्क्रियता का एक खौफनाक संसार अपने पूरे विवरणों और कागुजारियों के साथ परिभाषित हुआ है ,वही दूसरी ओर " सिजोफ्रेनिया ":शीर्षक के अंतर्गत लिखी गईं कुछ कविताएं तो लगभग हतप्रभ कर देती हैं । यहां कवि एक दूसरे स्तर पर जाकर इस समय को देखता है। सिजोफ्रेनिया की असामान्य अवस्था यहां एक रूपक की तरह प्रस्तुत हुई है । खंडित चेतनाओं के इस परिपार्श्व में वह हरहराता हुआ छिन्न- भिन्न, आत्म विस्मृति ,मतिभ्रम और क्रमभंगताओं का एक निष्करुण डरावना संसार है जहां वास्तविकता और कल्पना के सारे बोध एक दूसरे में विलयित हो गए हैं। यह वजूद की एक "प्रतिस्थिति" कही जाएगी । चेतना के अलग-अलग स्तरों के बीच मौजूद ये अंतराल जब भाषा में इस तरह से उतरते हैं तो एक रचना अस्तित्व बोध की सारी बाह्य परतों और दिगभ्रमों को भेद देती है। देखे - अनदेखे, भ्रमों , स्मृति लोप, भटकावों, मायाजाल के भीतर प्रवेश करती हुई कविता भय ,क्रंदन , अकेलेपन ,असहायता और करुणा के उस अलक्षित संसार को रूपायित करती है जिसे रचना हमेशा संभव नहीं रहा है। इन कविताओं में व्यथा की वह दुनिया उभरी है जिसमें समय, स्थान और लोगों से तालमेल गड़बड़ा गए हैं । व्यथा का अनचिह्ना संसार जिस तरह से सामने आया है , उसे रचनात्मकता की एक उपलब्धि कहा जायेगा। साथ ही यह समकालीनता के बने हुए अनेक स्टीरियोटाइप खांचों को ध्वस्त करता है ।एक लंबे समय के बाद सृजन का यह सघन संसार देखने को मिला है। कवि को बधाई ।
ReplyDeleteबहुत सुन्दर कविताएँ।
ReplyDeleteबहुत अच्छी कविताएँ
ReplyDeleteअच्युतानन्द मिश्र की कविताओं में
ReplyDeleteइस संसार में मनुष्य की गति और मति क्या है? इसके गणित का समीकरण मिलता है वो भी संष्लेषित होकर कई - कई कोणों से उपजाया हुआ। शायद वो चाहते हैं कि कविता पूरी तरह पाठकों के अंतस तक पंहुच जाये।
जब वे कहते हैं ' युद्ध कहीं नहीं था' दरअसल उस आम आदमी पर कटाक्ष करते हैं और उसकी असलियत भी समक्ष रखते हैं कि- कहीं वो व्यस्त है, कहीं मस्त है और कहीं त्रस्त। उसकी अपनी दुनिया में
जब टी वी का स्विच ऑन -ऑफ करने की सुविधा हो तब वो क्यों अपना निजत्व ख़राब करने पर आमादा हो।
या फिर खाए,पिए,अघाए लोगों को इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि -' युद्ध कहां था
कितना और क्यों था'
मनुष्य, मनुष्य का मन और मनोदशा। मनुष्य की इच्छाएं, संघर्ष,महत्वकांक्षाएं और उसका प्राणांत
कविता के केन्द्रीय स्वर हैं। मनुष्य की चेतना ही है जो आख़री सांस तक पीछा नहीं छोड़ती तथा इसी चेतना से जाने कितनी चेतावनियां और चैलेंज,पल प्रतिपल मनुष्य को आशान्वित व आशंकित रखते हैं।
'स्किज़ोफ्रेनिया' के पांच भाग, सामान्य व्यक्ति के असंमज,डर,कुंठा, दमित आकांक्षाओं और अनचाहे विचारों का समुच्चय है जो ऐसे किसी को भी विचलित रखने के लिए पर्याप्त है जिनसे घिरा हुआ वो स्वयं को महसूस करता है।
अच्युतानंद मिश्र की कविताएँ आज के इस दिखावटी, बन्तू दौर में एक राहत से कम नहीं. कवि के बतौर वे ख़ुद को पीछे रख पाते हैं, इसलिए ‘कविता’ को बोलने का मौक़ा मिलता है! ‘ युद्ध कहीं नहीं था ‘ या शिजोफ़्रेनिया नामक कविता में वे एक टीले पर खड़े हो सिर्फ़ सिस्टम को नहीं कोसते बल्कि ख़ुद को भी को दाँव पर लगाते हैं, कटघरे में खड़ा करते हैं. और यही इन कविताओं को मारक बनाता है. ‘पृथ्वी का कारोबार’ , स्मृति आदि कविताओं का मिजाज़ बहुत नाज़ुक है – एक क्षणभंगुर एहसास को इतनी ही नाज़ुक मिजाज़ी से पकड़ा जा सकता था ☘️ कवि को हृदय से बधाई☘️☘️
ReplyDeleteअच्युतानंद मिश्र की कविताएं व्याख्यात्मक होते हुए भी कविताएं,कविता की ज़मीन पर ही अपना घर बसाए हुए लगी मुझे। यह समय को लेकर उदासी की कविताएं भी लगी।स्किजोफ्रेनिया शृंखला की कविताएं ऐसी लगी कि जैसे स्किजोफ्रेनिया बीमारी में प्रवेश करके रची गई है,इतनी सघन लगी ये कविताएं । अद्भुत। अभिनंदन कवि अच्युतानंद।
ReplyDeleteबहुत ही शानदार कविताएं हैं।
ReplyDeleteभाई अच्युतानंद को बहुत-बहुत बधाई।
अच्युत की कविताएँ व्यक्तिगत जीवी समाज का बहुत ही विरल चित्र खीचा है। रचना की सघनता भी उतनी ही विरल है।
ReplyDeleteये कवितायें हमारे समय के समाज और आहत-अनाहत समय की सूक्ष्मतम धड़कनों,हलचलों और चेतन-अवचेतन में जगह बनाते तत्वों की एम आर आई है।
ReplyDeleteये एक अमूर्त कोलाज है-जीवन -मृत्यु के बीच घातों-अनाघातों का और नामुराद अप्रासंगिक बना दी गयी दुनिया का जिसमें मरते हुए जीना बचा हुआ है।भीतर का अदृश्य अनुभूत्यात्मक संसार बाहर की भयावह असहायताओं में बमुश्किल सांस खींचता हुआ।कार्बन डाइऑक्साइड म़े आक्सीजन की कमी का शिकार मानो कुत्ते की बाहर लटकती जीभ पानी को बेतरह तरसती और मानुष जिंदगी के यथार्थ को पढ़ने में पल-पल चूकती ।बैचेन करने वाली कविताओं का ये स्वर भूकंप की तरह रिकॉर्ड हुआ।
अपने समय के सच को अभिव्यक्त करती बेहद जरूरी कविताएं।
ReplyDeleteप्रिय कवि को बधाई।
कौशिकी टीम का आभार।
जीवन की अनिश्चितताओं के बीच जीवन के बारे में सोंचती हुई अच्छी कविताएं! लोगों ने स्वयं जीवन को नष्ट करने की सारी जुगत बना ली है, किंतु स्मृतियाँ हैं कि मनुष्यत्व को बचा ही लेती हैं. सभी कविताएं अच्छी हैं, जिनके केंद्र में एक सकारात्मक व कोमल विचार है, जिसके लिए कवि को बधाई 💐
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ReplyDeleteआपकी इन कविताओं को लखनऊ में पढ़ा और सच कहूँ तो विस्मय से भर गया। आपकी कविताओं के अनुभव मौजूदा समय की ऐसी विडंबनाओं से रू ब रू कराते हैं जिनकी तल्खी को हम अजाने इग्नोर करते रहे हैं।सबसे बड़ी बात यह कि यह अंतस को उद्वेलित ही नहीं करती बल्कि हमें सोचने को एकदम से विवश कर देती है।मनुष्य की बेबसी,पीड़ा और विवशता के समानांतर, मौजूदा समय की बेरहम,बेआवाज क्रूरता और ठंडी निर्ममता अंदर तक दहला देती है।पाठक सन्न हो जाता है।सिजोफ्रेनिया को पढ़कर तो मैं बुरी तरह डिस्टर्ब हो गया।आपकी काव्य भाषा निखरी हुई, उसकी प्रभावमयता और साफ-सफ्फाकपन जो कविता को सहज बोध तक इस तरह पहुँचाती है कि पाठक जब कविता खत्म करता है तो एक निष्करुण पैथाॅस से भरा हुआ महसूस करता है।वह खुद को एक न खत्म होने वाले द्वन्द्व में पाता है।यह कविता की बहुत बड़ी उपलब्धि है।
ReplyDeleteसभी कविताएं पढ़ीं। इनमें वि–मानवीयकरण के बेचैन करने वाले चित्र हैं हृदयवेधी! एकसाथ इतनी कविताओं ने लंबे समय बाद आपको खुलकर देखने–समझने का मौका दिया है।
अच्युतानंद मिश्र की लगभग सभी कविताएं बेहद पठनीय और महत्वपूर्ण है।
ReplyDeleteअच्युतानंद जी की कविताएं पढ़ी। बहुत ही विचलित करने वाली कविताएं हैं , खासकर स्कीजोफ्रेनिरया सीरिज की और युद्ध की।
ReplyDelete"भाषा में होना देता है एक अर्थ
जीवन में होना दूसरा
तुम भाषा में देखते हो जीवन
मैं जीवन में ढूँढ़ रहा हूँ भाषा ...
बेचैनी, खोज और संवेदना को बहुत सधे हुए ढंग से व्यक्त करती हुई सारी कविताएं हैं।
अच्युतानंद मिश्र की ये कविताएं वृद्ध पूंजीवाद के दौर के मनुष्य के मन का जैसे हाइ रिजोल्यूशन कैमरे से लिए गये चित्र हैं। स्किज़ोफ्रेनिया शीर्षक कविताएं बार बार रोकती हैं ,डिस्टर्बिंग छवियों के द्वारा और उस गठन के द्वारा भी जो इन छवियों के प्रभाव को और प्रभावी बनाती हैं।
ReplyDeleteअच्युतानंद मिश्र की कविताएं पढ़ते हुए एक संवेदनशील व्यक्ति सहज रह ही नहीं सकता।ये भयानक तरीके से हमारे संवेदन तंत्र में उथल-पुथल मचाती हैं।
ReplyDeleteपहली कविता पढ़ते हुए ही विद्रूप समय का दृश्य उभर कर सामने आ गया।
इसी तरह स्किजोफ्रेनिया की पीड़ा को इतनी गहराई से महसूस करना सामान्य बात नहीं है। शायद कोई चिकित्सक भी इस रोग को इस ढंग से न देख पाए।बात अन्तर्दृष्टि की है।जब यह नहीं हो तो कविता अधूरी सी लगती है। अधूरी कविता अधूरे जीवन की तरह कचोटती है।ये कोई साधारण कविताएं तो हैं नहीं कि दो-चार पंक्तियों में इन्हें समेट दूं। इनमें पूरा समय है और बतौर पाठक इन पर समय देना चाहता हूं।
फिलहाल इतना ही।मेरी शुभकामनाएं कवि तक पहुंचे।
अच्चुतानंद मिश्र की कविताएं साफ साफ उद्घोषित करती हैं कि विश्व समाज का बड़ा हिस्सा, पढ़ा-लिखा, ओहदेदार, दौलतवान, हम, आप सब स्किजोफ्रेनिया के शिकार हैं। भावों की अभिव्यक्ति में, व्यवहार में, स्मृतियों में, निर्णयों में, धारणाओं में स्किजोफ्रेनिया हावी है। जो मूढ़ हैं, जड़ हैं, वे अवचेतन में होने से हड़बोंग में शामिल हैं। जिनके पास भाषा है, वो जीवन का अनादर सबसे ज़्यादा कर रहे हैं। युद्ध जैसी भयानक, विनाशक और पीड़क स्थिति में हमारा 'इग्नोरेंस' कहीं अधिक क्रूर है। मौत के खेल में रौंदी जा रही जिंदगी पर महज एक टिप्पणी कर, एक पोस्ट डालकर पर अपनी जिम्मेदारियों की इतिश्री मानकर ज़मीन, फ्लैट, निवेश, सिनेमा, पोडकास्ट, स्टैंड कॉमेडी, राजनीति, कर्मकांड में रम जाना स्किजोफ्रेनिया नहीं तो और क्या है? विद्रूप समय में सामूहिक काइयांपन के त्रासद का रोआं-रोआं अच्युतानंद ने विच्छेदित कर दिया है।
ReplyDeleteआत्म संतुष्टि और आत्म सुख में रत व्यक्तिवादी उपभोग की जबरदस्त गिरफ्त में आ चुकी मध्यवर्गीय सुप्त नागरिक चेतना को एक गहरी और सांन्द्र अभिव्यंजक ध्वनि के साथ झकझोरती अच्युतानंद जी कविता "युद्ध कहीं नहीं था " बहुत बड़े फलक को रेखांकित करती है, सच में हमारी पूरी संवेदनाएं जिस तरह से मृतप्राय हो चुकी है उस पर यह कविता एक तरफ बहुत ही करिने से वार करती है जहाँ मरते बच्चे हों, तो दूसरी तरफ इसी वर्ग के अपने रोजमर्रा जिंदगी के कई तरह के युद्ध की तरफ भी ध्यान खींचती है, चाहे वह मकान किश्त हो, बच्चे की फीस हो!
ReplyDeleteस्मृति कविता में कवि ने भुलाने की तमाम आधुनिक चालबाजियों की कोशिशों के बावजूद अमिट स्मृतियों के बचे रह जाने की बात करती है :-
रह जाती है बस
मिटने की स्मृति,
अमिट बनकर!
स्कीजोफ्रेनिया श्रृंखला की कविताओं में इस मनोरोग की चेतना में अवस्थित द्वँद को मनोविज्ञान के साथ पकड़ कर लिखने की कोशिश की गई है !
कवि व स्तम्भकर को शुभकामनायें!
युवा कवि अच्युतानंद मिश्र के लिए जीवन की किसी घटना या क्षण को देखना महज़ आँखों से देखना नहीं बल्कि कविता के जरिये गहरे महसूसना है। वे चीजों को उदासीन या तटस्थ भाव से नहीं देखते बल्कि उन्हें कविता के जरिये आत्मसात करते हैं। इसी कारण वह घटना मात्र भौतिक जगत की घटना न रह कर काव्य का एक जीवंत घटक बन हमारे समक्ष उपस्थित होती है -- एक भिन्न स्वरूप में। इन्हीं कविताओं में आपको यदि विवशता, उदासी, बेचैनी और भयावहता दिखती है तो कविता के इन दृश्य बंधों के परे उम्मीद के स्वर और संघर्ष भी दिखाई देंगे। " जीवन द्रव्य में ही घुली हुई है मृत्यु " जैसी दार्शनिक - सी लगती पंक्ति को यदि डिकोड करेंगे तो वहाँ एक मानवीय वस्तुस्थिति का दृश्य मिलेगा।
ReplyDeleteपहली ही कविता की इन पंक्तियों को देखें :
बिस्तर पर जाते हुए
अगली सुबह की उम्मीद लिए
हम उदास नहीं
उत्सुक और किंचित रोमांचित थें
क्या सचमुच बढ़ने वाली है
पेट्रोल की कीमतें ?
अपार्टमेंट की खिड़की से
देर रात दिखाई देती
गाड़ियों की जगमग रोशनी सबूत थी
कहीं कोई युद्ध नहीं था
यह चौतरफ़ा युद्ध से घिरे मनुष्य का मानो हलफनामा हो। अच्युतानंद ऐसे दृश्यों को एक झीने - से आवरण से ढंक देते हैं ताकि उस पारदर्शिता से आप भीतर तक झाँक सकें। स्किनोफ्रीजिया श्रृंखला की सभी कविताओं में कवि ने फैंटसी को एक चाक्षुष संवेदना प्रदान की है। ये कविताएं आपको एक भयावह बेचैनी, अर्द्धनिद्रा, दुःस्वप्न और जाग के बीच डूबती - उतराती है। जब तक किसी समर्थ कवि की संवेदना चित्रित किये जा रहे जीवन की अंतर्धारा से तदाकार नहीं होती , ऐसी कविताएँ लिख पाना दुष्कर है क्योंकि कविता एक प्रेक्षण से कुछ अधिक होती है। अच्युतानंद ऐसे प्रज्ञावान युवा कवि हैं जिनके पास जीवन को कविता के थ्रू देखने की तमीज़ है। यह ज़रूरी तमीज़ हर कवि में नहीं होती।
बहुत अच्छी कविताएँ । इन कविताओं पर जो कहना चाहिए था, वह कहा जा चुका है । चिड़िया की आँख भर रोशनी में ही समय की इतनी गहरी परतें दिख सकती हैं । हमारे समय की सचाई, बेबसी, बैचेनी और सब कुछ ठीक है कि भयावह त्रासदी को उकेरती कविताएँ । ऐसी कविताएँ हमसे बधाई नहीं माँगती, बल्कि वो हमसे दृष्टि की दरकार रखती हैं ।
ReplyDeleteझकझोरने और परेशान करने वाली कविताएं हैं। एक तरफ खाए पिए अघाए मध्य वर्ग की आत्मकेंद्रिकता है, दूसरी तरफ़ व्यक्ति के भंजित भीतर का कोलाहल है। बीच में जीवन की संवेदन-संपन्न धड़कन लिए हुए पृथ्वी का कारोबार है।
ReplyDeleteअच्युत का लिखा हुआ पढ़ना हमेशा ही एक तरह की गर्माहट का एहसास कराता है।
'युद्ध कहीं नहीं था' जैसी कविता उपभोक्तावादी जीवन की आत्ममुग्धता को जिस सूक्ष्मता से उद्घाटित करती है, वह समकालीन हिंदी कविता की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनी जा सकती है। ‘जानने के दलदल में डूबे हम’ शर्मिंदा हैं कि हमारे ये अतिसाधारण जीवन इसी धरती के पड़ोसी टुकड़ों पर खेली जाती ख़ून को होली से बिल्कुल निस्संग हुए बीत रहे हैं।
ReplyDelete'स्किज़ोफ्रेनिया' श्रृंखला मानसिक विखंडन को एक रोग की तरह नहीं, बल्कि अनुभव की भाषा में प्रस्तुत करने का सफल प्रयोग है।
चीरने और हँफाने वाली कविताएं हैं।अभिव्यक्ति के सारे मेयार तोड़तीं और भाषा को नयेपन से भर देने वाली।मैं अक्सर प्रतिक्रिया देने से चूक जाता हूँ और देखते देखते लोग मैदान मार लेते हैं।मेरी वक्रताओं को उतनी ही सहजता से लेते रहो।अलबत्ता यह कहूँगा कि एक ही कगार पर खड़े होने के नाते कविताओं में जहाँ तहाँ पुनरुक्ति की बास आती है।शुभकामनाएं।
ReplyDeleteअच्युतानंद की कविताओं को एक साथ पढ़ना अलग अनुभव है। मध्यवर्ग सामाजिक राजनीतिक स्थितियों की भयावहता के प्रति इम्यून होता जा रहा है। संवेदना का यह क्षरण भयावह है।
ReplyDeleteसीजोफ्रेनिया वाली श्रृंखला भी बहुत विचलित करती है।
कविता चित्र नहीं होती, न फोटो, यह कहते तो बहुत लोग हैं लेकिन इसे कविता में साधना अक्सर बहुत मुश्किल होता है। इसी तरह कविता को वक्तव्य या नारा या आवाहन बनने से रोक पाना भी बहुत बड़े कवियों को भी नहीं आता। कविता जिस समय में शुरू होती है, उसे उस समय के बाहर जाना होता है। यह खासियत इन कविताओं में है। युद्ध है लेकिन जो प्रत्यक्ष युद्ध है उसके अलावा कितने युद्ध हमारे जीवन में चल रहे हैं, आगे यह युद्ध बंद हो जाने के बाद भी कितने घरों में युद्ध चलता रहेगा, यह कह पाना, वह भी एक कविता में, बहुत सरल नहीं है। आप की कविता इसमें सफल हुई है। बहुत बधाई इन कविताओं के लिए।
ReplyDeleteअर्थगर्भी और सम्प्रेष्य कविताएं..पढ़ने का सुख मिला..शानदार।
ReplyDeleteअपने समय को जितनी व्यापकता,गहराई और जटिलताओं के साथ गूंथा जा सकता है,वह सब इन कविताओं में है।इतनी संवदेनशीलता और सोच-समझ के साथ आज काव्य सृजन करना विरल है।कवि भाषा में जीवन नहीं खोजता वरन जीवन में भाषा खोज़ता है।यही उनकी कविता को आज के अन्य कवियों से अलग करता है। बहुत ठहरकर मुक्तिबोध की तरह पढ़ने वाली कविताएं।
ReplyDeleteये कविताएं जीवन के सूक्ष्म, संघर्षशील और परस्पर जुड़े हुए संसार का अत्यंत संवेदनशील चित्र प्रस्तुत करती हैं। आपने प्रकृति और सामान्य जीवन के छोटे-छोटे दृश्यों के माध्यम से गहरे दार्शनिक अर्थों को व्यक्त किया है। पत्थरों के बीच चमकते पानी, छोटे पौधों, चींटियों, कीड़े और चिड़िया जैसे साधारण बिंबों को बखूबी उकेरा है।
ReplyDeleteकविता में “एक बहुत ही छोटे कंकड़ पर टिका हजार बूँद पानी का वजन” जैसी पंक्तियाँ जीवन की नाजुकता और संतुलन का प्रतीक हैं। वहीं चींटियों का निरंतर चलना श्रम, अनुशासन और जीवन-यात्रा की अनवरत गति को दर्शाता है। चिड़िया द्वारा कीड़े को पकड़ लेना प्रकृति के उस कठोर सत्य को सामने लाता है जहाँ “जीवन से जीवन जुड़ा” हुआ है—अर्थात एक जीवन दूसरे जीवन पर आश्रित है।
आपने बहुत ही सुंदर शब्दों में आधुनिक मनुष्य की मानसिक स्थिति को भी व्यक्त किया है।
सभी कविताएँ लाजवाब हैं। लंबे समय बाद आपकी कविताएँ पढ़ने को मिलीं।
ReplyDelete'युद्ध कहीं नहीं था' कविता हमारे समय को देखने दृष्टि देती है। आम आदमी खासकर मध्यवर्ग के लोगों का व्यवहार युद्ध की स्थिति में 'फ़र्क नहीं पड़ता' वाली हो गई है। लोग अपनी ही चिंताओं और सुखों में डूबे हुए हैं। डिस्ट्रैक्शन की कितनी चीज़ें हैं हमारे बीच...!
'स्किजोफ्रेनिया' कविता के सभी खंड पढ़े जाने चाहिए। मुझे व्यक्तिगत तौर पर यह कविता बहुत पसंद आई। यह भी सोच रहा हूँ कि इतनी गहराई से चीजें आपके अनुभव में कैसे आई होंगी!
कविताएं पढ़ीं । हमारे समय का मंजर इन कविताओं में बहुत ही ईमानदारी और संजीदगी से अभिव्यक्त हुआ है।
ReplyDeleteबहुत अच्छी, वेधक कविताएँ हैं। स्किज़ोफ़्रेनिया वाली तो बिल्कुल अलग तरह की कविताएँ हैं। इस ज़मीन पर शायद ही कोई और कविता मिले। आप कम लेकिन प्रभावी ही लिखते हैं: कविता हो या आलोचना।पढ़ कर समृद्ध हुआ।
ReplyDeleteअच्युतानंद मिश्र की कविताएं समकालीन साहित्य में प्रतिरोध की सशक्त आवाज़ हैं।
ReplyDeleteउनकी हालिया कविताएँ हमारे समय की गहरी और आवश्यक आलोचना प्रस्तुत करती हैं। पूंजीवादी तंत्र केवल भू-राजनीतिक स्तर पर ही युद्ध नहीं रचता, बल्कि मानवीय चेतना को क्षत-विक्षत कर देता है। ये निर्मम ताकतें आम आदमी को यथार्थ से उठाकर एक 'स्किज़ोफ्रेनिक' स्थिति में धकेल देती हैं। कवि आधुनिक मनुष्य के गहरे अजनबीपन को बेहद शानदार ढंग से पकड़ते हैं।
रेखा सेठी
पृथ्वी का कारोबार, न्याय और स्किजोफ्रेनिया - बहुत बढ़िया !
ReplyDeleteकविता पढ़ी । यह सिर्फ तारीफ के लिए नहीं कह रहा हूँ लेकिन यह सच है कि उसके प्रभाव से अभी तक मुक्त नहीं हो पाया हूँ ।युद्ध कविताओं का प्रभाव तब अधिक बढ़ जाता है जब कवि अपनी भावुकता का गीलापन उसमें से हटा लेता है और एक जरूरी संवेदन और दायित्व बोध के साथ कविता में दाखिल होता है । इस कविता को पढ़ने का अनुभव इन बातों से कुछ और भी आगे का है । लगभग स्तब्ध कर देने का , दहला देने का अनुभव ! लेकिन यह प्रभाव और अनुभव सिर्फ युद्ध को लेकर शब्दों की आक्रामकता या निरर्थक विलाप निर्मिति के बचाव में नहीं आया है । इसमें मानवीय मार्मिकता की उपस्थिति के लिए तात्कालिकता से एक जरूरी दूरी बनाई है । आपकी इस कविता में विचार और संवेदन संतुलन इस कविता का एक्सिस है । आपने जिस तरह आक्रोश की आक्रामकता और संवेदन तीव्रता की विकलता को नियंत्रित किया है , इसी धैर्य और भाषा सजगता ने कविता को भी बचाया है । और इसी धैर्य ने करुणा और सरोकार के लिए जगह बनाई है ।
ReplyDeleteबहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएँ !
अच्युतानंद की कविताएँ अपने समय की यूनिक (बेजोड़) और रेयर कविताएँ हैं!
ReplyDeleteकई स्तरों पर यथार्थ को ऐसे रखती हैं कि हठात् लगता है कि कवि की अंतर्दृष्टि कितनी गहरी है!
बधाई कवि को!
इन कविताओं को पढ़वाने के लिए कौशिकी और कवि संपादक शंकरानंद का आभार!
अच्युतानंद मिश्र की ये कविताएं मनुष्यता और संवेदना के छीजते जाने का जीवंत दस्तावेज है। ये कविताएं वर्तमान समय की विसंगतियों पर ठहर कर सोचने को विवश करती हैं।
ReplyDeleteजैसे लौटता है पराजित युद्ध का कोई सिपाही वे तीनो लौट रहे थे। निराला की -"लौटे युगदल पृथ्वी टलमल ..." की याद आ जाती है। युद्ध में पराजय ही बचती है, वही जीतती है बाकी सब हारते हैं ।जैसे" हाउस आलवेज विन्स", जुआघर ही आखिर को जीतता है,बाकी सब दांव हारते ही हारते हैं। लेकिनयह कविता कहती है अंतिम सत्य यह नहीं है , अंतिम सत्य है समानता बहुलता और मुक्ति का सुखी संसार - कविता इस भाव को हमारे अंतर्मन में अपनी तरह से जगाती है, जैसे भुजा उठाकर हमें "युद्ध " के खिलाफ खड़े होने के लिए कोंचती है,उकसाती है, प्रेरित करती है ।पहली दोनो कविताओं के पाठ की प्रतिध्वनि, याने जो कविता की देर तक बनी रहने वाली गूंज है , वह उसी "पराजय", हिंसा,अन्याय,छद्म और पतन की एन्ट्रापी को रेखांकित करती है जो हिंसक एकाधिकार वाली सत्ताओं का स्वभाव है। यह कविताएं गुएर्निका की तरह ही हमारे समय की भयंकरता को चित्रित करती हैं और इस तरह हमारी चेतना और संवेदना का पुनर्जागरण करती हैं।
ReplyDelete# युद्ध कहीं नहीं था : कविता बताती है कि युद्ध केवल रणभूमि में नहीं होता बल्कि मनुष्य के विचारों,संबंधों और समाज के भीतर भी लगातार चलता रहता है। हिंसा और संघर्ष की मानसिकता ही वास्तविक युद्ध का रूप है।
ReplyDelete# वेरावल के समुद्र में उठती है कोई लहर : समुद्र की लहरों के माध्यम से कवि जीवन की निरंतर गति, स्मृतियों की तरंगों और समय के परिवर्तनशील स्वभाव को व्यक्त करता है। हर लहर जीवन के नए अनुभव और संवेदनाओं का प्रतीक बन जाती है।
# स्मृति : इस कविता में स्मृतियों को मनुष्य की अमूल्य धरोहर के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अतीत के अनुभव वर्तमान को प्रभावित करते हैं और व्यक्ति की पहचान तथा संवेदनशीलता को बनाए रखते हैं।
# पृथ्वी का कारोबार : यह कविता पृथ्वी पर चल रही प्राकृतिक और मानवीय गतिविधियों का चित्रण करती है। कवि संकेत करता है कि जीवन,श्रम, प्रकृति और मनुष्य के संबंधों से ही संसार का संतुलन बना रहता है।
# न्याय : कविता सामाजिक व्यवस्था में न्याय की वास्तविक स्थिति पर प्रश्न उठाती है। कवि दिखाता है कि न्याय तभी सार्थक है जब वह सभी लोगों के लिए समान रूप से उपलब्ध हो और कमजोर वर्गों को भी संरक्षण दे।
# स्किज़ोफ्रेनिया : यह कविता आधुनिक जीवन की जटिलताओं से उत्पन्न मानसिक विभाजन और अस्थिरता को व्यक्त करती है। व्यक्ति अपने भीतर अनेक विरोधी भावनाओं और परिस्थितियों के बीच संघर्ष करता हुआ दिखाई देता है।
अच्युतानंद मिश्र की कविताओं में आधुनिक जीवन-बोध, मानवीय संवेदना, सामाजिक चेतना,प्रतीकात्मकता,बिम्ब विधान तथा मुक्तछंद शैली का सुंदर समन्वय मिलता है। उनकी भाषा सरल,सहज, प्रभावपूर्ण और विचारोत्तेजक है।
आपको और अच्युतानंद मिश्र जी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।
🙏🌸🙏
सभी कविताएं पढ़ीं.
ReplyDeleteस्किजोफ्रेनिया एक अलग तनाव और बेचैनी की कविता है.
युद्ध हर कहीं है वह अलग अलग रूपों में हर दिन चलता है. यह कविता बड़ा कैनवास रचती है.
बधाई.
बहुत अच्छी कविताएँ हैं।
ReplyDeleteअच्युतानंद मिश्र की कविताएँ समकालीन सभ्यता के संकट, युद्ध, बाज़ारवाद, स्मृति, मृत्यु और मनुष्य के भीतर घटते मानसिक विघटन की गहन पड़ताल करती हैं। वे हमारे समय की आत्मकेंद्रित संवेदनहीनता, उपभोक्तावादी जीवन और सत्ता-पूँजी के गठजोड़ की तीखी आलोचना करते हुए पाठक को आत्मावलोकन के लिए विवश करती हैं। 'युद्ध कहीं नहीं था' जैसी कविता आधुनिक मध्यवर्ग की नैतिक उदासीनता का सशक्त दस्तावेज़ बन जाती है, जबकि 'स्किज़ोफ्रेनिया' शृंखला मनुष्य की टूटती चेतना और आंतरिक त्रासदी को अत्यंत मार्मिक कलात्मकता के साथ रूपायित करती है। उनकी भाषा विचारप्रधान होते हुए भी संवेदना से संपृक्त है तथा बिंबों और प्रतीकों के माध्यम से गहरे दार्शनिक अर्थ अर्जित करती है। समग्रतः ये कविताएँ अपने समय की भयावह वास्तविकताओं का निर्भीक साक्ष्य होने के साथ-साथ मनुष्य की करुणा, स्मृति और प्रतिरोध की संभावनाओं को भी जीवित रखती हैं।
ReplyDeleteगहन, संवेदनशील कविताएँ! कवि की बेचैनी जायज है और सब कुछ समझ कर, बूझ कर हरेक कारण के बावजूद कुछ न कर पाने की विवशता उन्हें भीतर-भीतर सालती रहती है। कोई कसक टीस बन कर कविता की भाषा में उपजती है। भीतर की अथाह करुणा बहती है किंतु सब कह कर भी रिक्त रह जाना खलता है उसे बार-बार।
ReplyDeleteस्किजोफ्रेनिया कविता के सभी भाग भीतर के उपद्रव को कई कोणों से खींचती हैं जैसे सच और भ्रम का आवरण छाया हो। कविताओं की सघन अभिव्यक्ति पाठक पर देर तक असर करने वाली है।
कविताऍं पढ़ लीं।
ReplyDeleteपहले की कविताओं से आगे की लगीं।
जटिल विधान वाली, अपेक्षित विस्तार लिए।
बेचैनी आपकी कविताओं में पहले भी थी, अब बढ़ी हुई दिख रही है।
अक्सर यह बेचैनी या तो अवसाद की तरफ़ ले जाती है या अग्रेसिव कन्फ्रंटेशन की तरफ़।
आपकी कविताएँ इन दोनों की तरफ़ न ले जाकर बोधन या दृष्टि-अर्जन की ओर ले जाती हैं, स्थितियों के मध्य लाकर खड़ा कर देती हैं।
सारी कविताएं पढ़ गया ।
ReplyDeleteस्किज़ोफ्रेनिया 5 अंश को पढ़ते हुए परेशानी हुई।
आपकी कविताओं में दुःख की प्रकृति थोड़ी बौद्धिक है! जो तकलीफें हैं आसपास हमारे , उन्हें ठीक से पहचानने की दृष्टि कविता से भी मिल सकती है, यह बड़ी बात है आपकी कविता में।
रुदन और मार्मिकता जैसे भाव कविताओं के सबसे कमजोर पक्ष रहे हैं अनादि काल से। पर सिसकियां ज्ञान की गहराई से लगातार बढ़ती जाएं, ऐसा आपकी कविता पढ़कर ही हुआ। भय, सिहरन के बारे में भी यही कहूंगा।