अच्युतानंद मिश्र की कविताएं

 


अच्युतानंद मिश्र


भूमंडलीकरण के बाद धर्म, सत्ता और पूंजी के गठजोड़ से जो नई व्यवस्था सृजित हुई है वह जितनी निर्मम है उतनी ही हिंसक।पूरा विश्व आज एक ऐसे अघोषित युद्ध की आग में झुलस रहा है जिसमें हथियार ही सबकुछ है। मनुष्य के मारे जाने की न अब गिनती होती है न किसी को फर्क पड़ता है। सबकुछ एक खबर भर है जिसके बीच रंगीन और चमकदार विज्ञापन भी है उसके असर को कम करने के लिए। अच्युतानंद मिश्र की कविताएं इसी व्यवस्था के उभार और उसके बर्बर चेहरे को सामने रखती हैं।ये कविताएं हमें जितना अपने आसपास से जोड़ती हैं उतना ही उस विश्व से जिसकी शांति खतरे में है।

अच्युतानंद मिश्र की कविताएं 




युद्ध कहीं नहीं था 
                                                                               
यह बेतरह उदास होने का समय था, 
और हमारे पास समय नहीं था
हमें अगली सुबह साफ-शफ्फाक कपड़ों में 
हंसते हुए निकलना था
हमें जरूरी दवाइयां खानी थी 
ताकि हमारा रक्त-चाप और कोलेस्ट्रोल नियंत्रित रहे
हमें समय पर बैंक की किस्तें अदा करनी थी। 
हमें उन तोहफों के बारे में सोचना था 
जो हमें आगामी जन्मदिन पर मिलने वाले थे 
हमें अपने बच्चों को कान्वेंट स्कूलों में भेजना था 
ताकि वे अव्वल आ सकें 
और एक दिन हम से भी बड़ी किस्तें अदा कर सकें
यह हमारा सरल साधारण नागरिक जीवन था 
इसमें युद्ध के लिए 
मृत्यु के लिए 
बम के लिए 
टैंक के लिए 
देश के लिए 
कोई जगह नहीं थी 

टी.वी. पर गाहे-बगाहे हमें खबरें 
दिखाई देती थी, 
उसे देख कर भी 
ना देखने का हुनर 
हमने सीख लिया था 

हर क्षण चल रहा था कहीं युद्ध 
कहीं बमबारी 
कहीं मृतक बच्चों की टूटी हुयी खोपड़ी 
निकली हुई आतें, टूटे हुए जबड़े 
धूल में लिथड़े पैर 
हवा में अटकी आखिरी सांस 
वे कहीं से हमें छूती नहीं थीं
उनसे हमारा कोई रिश्ता नहीं था
हम सरल सादा जीवन बिताने वाले 
हंसने हंसाने वाले नागरिक थे
 
युद्ध की शक्ल बैंक की किस्तों में 
कभी-कभार दिखाई देती 
और हम कुछ देर के लिए 
मोबाइल के केलकुलेटर में उलझ जाते 
हमारे भीतर बच्चों के लिए 
मृतकों के लिए 
चीत्कार के लिए 
कोई भी जगह नहीं थी
अलबत्ता शेयर बाजार हमें परेशान करता 
सोने की कीमतें हमारे दिमाग में उलझ जाती 
और कार ड्राइव करते हुए 
थोड़े परेशान से हम रेड-लाइट पर आगे बढ़ जाते 
कोई अदृश्य कैमरा हमारी तस्वीर ले लेता 
एक मोबाइल का संदेश हमें बताता 
हमने ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन किया 
हमारे भीतर का नागरिक थोड़ा शर्मिंदा होता 
युद्ध, मृत्यु, चीत्कार बस इतना ही था 
हमारे सरल सादा जीवन में 

कभी-कभार एक लंबी खामोशी फैलती 
वह छूने-छूने को होती हमारे दिलों को 
बारूद से निकला एक अदना कांच का टुकड़ा 
फंसने-फंसने को होता हमारी स्मृतियों में 
जली हुई बरौनियों की कालिख  
घुसने-घुसने को होती हमारी निगाहों में 
तभी रेडियो पर एक तेज आवाज आती- 
कुकड़ू-कूं
और हम सहज हो जाते
वॉल्यूम बढ़ाते -बढ़ाते 
हमारी मांस-पेशियों का तनाव ढीला पड़ जाता 
चाइनीस नूडल्स या इटालियन पास्ता 
आर्डर करने का ख्याल हमें रोमांचित कर देता 
शाम को पत्नी और बच्चों के साथ 
सौदा -सुलुफ के लिए 
स्मार्ट बाजार जाने के ख्याल की खुशी
स्मृतियों से बुहार देती 
युद्ध का सारा मलवा 
बच्चों की अधजली लाशें 

हम नहीं सोच पाते 
बच्चे कैसे मरते हैं 
आखिरी चीत्कार में 
वे किसे याद करते हैं 
बम के गिरने से पहले 
दुनिया के बारे में 
देश के बारे में 
उनकी मुसलसल राय क्या थी 
दुनिया के मानचित्र में रंग भरना उन्हें भाता था
ब्लैकबोर्ड पर खडूस शिक्षक की 
हास्यास्पद आकृतियाँ बनाने का खेल 
उन्हें रास आने लगा था   
सुबह उन्होंने क्या खाया था
शाम को क्या खाने की फरमाइश बताकर
वे स्कूल गये थे  
आखिरी बार ठठाकर वे किस बात पर 
हंस रहे थे
उनकी नाराजगी का सबब क्या था
बगल की बेंच पर बैठे दोस्त से 
वे किस बात पर नाराज हो गए थे
हम नहीं सोच पाते 
समय ही कहाँ था हमारे पास 
कितना कुछ तो हमारे ही जीवन में 
हर क्षण हर पल घट रहा था 

युद्ध कहाँ था 
कितना और क्यों था 
एक टी.वी. के स्विच ऑन-ऑफ जितना था
चैनल बदलते हुए युद्ध एक खेल में बदल जाता
बिग-बॉस में युद्ध घटित होता 
एक हंसी टीवी के पर्दे पर 
अश्लील पाशविकता में बदल जाती 
सस्ती कामुकता हमारे दिलों दिमाग पर 
दिल्ली के प्रदूषण की तरह छा जाती

हमें किसी बात का अफसोस नहीं था
कोई दुख, कोई पश्चाताप 
कोई उदासी भी नहीं थी
एक सरल-सादा जीवन था
रोज-रोज व्यतीत होता हुआ 
अपनी दिनचर्या में हम इतने मशगूल थे कि 
हमें उसके बाहर कुछ नहीं सुनाई देता 
कुछ नहीं दिखाई देता 

युद्ध कहीं नहीं था 
बर्बर तानाशाहों , अश्लील राजनेताओं 
और घृणित व्यापारियों के लिए 
अगर कोई युद्ध था तो 
हम उसमें शामिल नहीं थे 
हम तो मोबाइल पर 
ठीक ठीक कूपन कोड के साथ 
कोई आर्डर प्लेस करने के लिए 
चिंतित थे 
हम चिंतित थे 
ट्रैफिक का चालान कटने से 
बैंक की बढ़ती हुयी किस्त को लेकर
परेशान थे 

हम परेशान थे 
कहीं शेयर बाजार का भाव गिर ना जाए
कहीं पेट्रोल की कीमतें बढ़ ना जाए
सोने के भाव गिरने-चढ़ने के अतिरिक्त 
हमारे भीतर और कोई भाव नहीं था 

यह बेतरह उदास होने का समय नहीं था 
यह बेतरह, बे-भाव खाते-खाते 
अनंत वस्तुओं से पटे समुद्र में 
डूब मर जाने का समय था 

और हमारे समय के बाहर भी कोई समय था 
कोई दुनिया थी 
कोई युद्ध था
सफ़ेद चादर में लिपटी 
मृतक बच्चों की लाशें थी
जिनकी उँगलियाँ अभी तक गर्म थीं
और चेहरे पर दर्द ऐंठन और चीत्कार के निशान के बावजूद 
एक निश्छल कोमलता बरकरार थी 
भाषा जिसे कहने में सर्वथा 
असमर्थ और बेकार थी     

हम जानते हुए उससे अनजान थे
यह इक्कीसवीं सदी के आदमी का जानना था
जानने के दलदल में डूबे हुए हम 
अलमस्त प्रसन्न और अघाए हुए थे
जानने के सारे दरवाजे 
मोबाइल की स्क्रीन पर खुलते थे
शेयर बाजार का ग्राफ 
हमारे दिल की धडकनों के उतार-चढ़ाव का 
सीधा सदा बयान थी 

बिस्तर पर जाते हुए 
अगली सुबह की उम्मीद लिए
हम उदास नहीं 
उत्सुक और किंचित रोमांचित थें  
क्या सचमुच बढ़ने वाली है 
पेट्रोल की कीमतें ?
अपार्टमेंट की खिड़की से 
देर रात दिखाई देती 
गाड़ियों की जगमग रोशनी सबूत थी 
कहीं कोई युद्ध नहीं था 

बुरी खबरें थीं 
और उससे बचे हुए थे 
हम 
हमारे बच्चे 
हमारा पड़ोस 
हमारा शहर 
और हमारा देश 
सचमुच चिंता की कोई बात नहीं थी

सबकुछ शांत सरल 
बचे हुए लोगों के चेहरे 
मोबाइल- स्क्रीन की तरह 
उम्मीदों और संभावनाओं की 
असीमित रौशनी से लबरेज़ थे
 
दुनिया के बारे में अब भी किताबें लिखी जा रही थी 
धरती अब भी मनुष्य का ठिकाना बनी हुयी थी।



वेरावल के समुद्र में उठती है कोई लहर 

कोई उदासी है कि 
डूबता जाता है दिल 
गर्क हुए उम्मीद के सूरज 
हौलनाक दरियाओं में 
सफ़र का सलीब है 
फकत हासिल 
 
कितने कदम चले थें 
कि बनी थी उम्मीद  
कितनी आखों में चमके थे ख्वाब 

ये वही सड़क है कि जहाँ 
उम्मीद की लाश पे चलता हूँ 
ये वही रास्ता है, 
ये उसी रास्ते की हवा है
जैसे सब जानता हूँ
जैसे सब जानना 
बनाता है 
बेगाना 

दो स्टेशन के बीच रेलगाड़ी 
लटका हवा में कोई पत्ता 
साँस के बीच 
स्मृति का कोई झोंका 
नदी में डगमगाती कोई नाव

वे तीन लौट रहे हैं,
उम्मीद के दरवाज़े से 
खाली हाथ 
भारी क़दमों से देते हैं थपक 
जैसे पीटते हो माथा 
धरती की छाती पर

हाथों के पोरों में थिड़क रही 
उम्मीद की दस्तक अब तक 

वे तीन लौट रहे हैं 
वेरावल के समुद्र में 
उठती है कोई लहर
बरसने को आतुर 
आँखों का नमक 
पेरुम्बावूर के आकाश में 

वो हवा जो छूकर गुजरी है 
उसका माथा 
चीर दे आदमी का सीना 

लौट रहा है बच्चा 
आड़े-तिरछे क़दमों से 
मोटरी उठाये घिसट रही है स्त्री 
सर झुकाए लौटता है पिता

जैसे लौटता है पराजित युद्ध 
का अंतिम सिपाही 
वे तीन लौट रहे हैं 

वेरावल के समुद्र में 
डूब रही है लहर
पेरुम्बावूर की सड़क पर
कौन सहलाता है 
उम्मीद का माथा ?

ट्रेन भूल गयी है रास्ता 
भटकती वीराने में   

मरा हुआ क़स्बा और मरता है 
एक उबकाई घेरती है पूरे वजूद को 
वीरान सड़क पर खून का 
कोई नामोनिशान नहीं 
डूबी हुयी नाव की आखिरी चमक 
कौंधती है 
वेरावल के समुद्र के सीने में 
ख़ामोशी गूंजती है वीराने में  
टूटे दिलों के आशियाने में।




स्मृति

सोचने की हद के 
पार जाकर कहना था –
भूल जाना भी स्मृति है 
मिट जाना प्रमाण 
डूबना उपस्थिति
छूट जाना पुकार 

विस्मृति के गुहा-गृह में  
सन्नाटे की कौंध के पार
धुंधले शब्दों में दर्ज 
बर्बरों की दास्तान

सभ्यता की जीवनदायनी नदी ने 
मिटा दिए लहू के अंतिम साक्ष्य
आत्मा की पीठ पर 
घृणा के नुकीले हथियारों से 
उकेरे गये शब्द 
कहाँ गये ?

लाओ साक्ष्य दिखाओ प्रमाण 
सचमुच खुदाई से मिलता है
कोई सबूत ?

वहां तो बस 
दिखते हैं कुछ
निशान मिटे हुए 
कटी हुयी जिह्वा
टूटे हुए बर्तन
आततायी का पंजा  
मृत मनुष्य की जीवित खोपड़ी 
चीख-पुकार और हाहाकार की
असंख्य ध्वनियाँ 
जो समा गयीं रेत के कण-कण में 
 
अग्नि जला देती है सबकुछ
समुद्र निगल लेता है सबको 
सारे देवता बौने पड़ जाते हैं 
आकाश की ऊंचाई के सामने 
तूफ़ान मिटा देती है 
सारे क्रूर निशान 

रह जाती है बस 
मिटने की स्मृति 
अमिट बनकर ।



पृथ्वी का कारोबार 

पत्थरों के बीच ठहरे पानी में
चमकता है  
नन्हें पौधे का उन्नत माथा
ठहरा हुआ सारा संसार है वहां

असंख्य पलों से चक्कर लगाता सोचता 
जटिल प्रश्न सृष्टि के 
हल करने की कोशिश करता 
रेंग रहा एक कीड़ा

एक बहुत ही छोटे कंकड़ 
पर टिका हज़ार बून्द पानी का वज़न

पूरा साम्राज्य चीटियों का, 
उन्हें दम भर की फुरसत नहीं
दाने का टुकड़ा मुंह में दबाए
वे कहीं से चली आ रही हैं
कहीं दूर जाने के लिए

नन्हीं चिड़िया उड़कर आयी अभी
पानी में डुबाती है चोंच
उड़ गई उस कीड़े को लेकर

जीवन से जीवन जुड़ रहा है यहां 
जीवन बचा रहा जीवन को 
एक जीवन को खोलो तो 
उसमें मौजूद हैं असंख्य जीवन 

पत्थरों के सख्त चेहरे पर 
कितनी आकृतियों की यादें
असंख्य धमनियां 
रक्त, हवा, जल और 
आँसुओं के नमक से लबरेज़ माथा

खामोशी के भीतर मौजूद 
इतनी सारी उथल पुथल
उल्लास भरी हवा के भीतर 
दुख की असंख्य नदियों का जल 

उड़कर आ गया है 
कागज़ का टुकड़ा कहीं से 
वृक्ष की आत्मा पर
होकर सवार 
कई कीड़े चले जाएंगे उस पार

डूबने से पहले नन्हीं पत्ती 
आखिरी बार देखेगी संसार

ऐसे ही चलता है पृथ्वी का कारोबार।



न्याय 

यह पीड़ा मृत्यु को देखती है
कान सुनते हैं
देह पाती है स्पर्श

यह मृत्यु की देह है
आ रही है इधर भारी कदमों से 
मृत्यु के चेहरे पर कुछ भी तो नहीं
न घृणा न प्रेम
न अवसाद न आवेग

बर्फ सा सफेद - मृत्यु का चेहरा
जीवन द्रव्य में ही घुली हुई थी मृत्यु

उनके हाथ में तलवारें थी
उनके पास थी बीमा की पालिसी
बैंक में खाते थे उनके 
दुर्घटना से साफ़ बचा लेने वाली गाड़ियां 
सेवक थे जान हथेली पर लिए घूमते
लकड़ी के विशाल दरवाजे थे
लोहे की मजबूत जंजीरों से जकड़े
आदमकद खिड़कियां थीं
पूछकर जिनसे आती थी रोशनी और हवा
वहां कैसे पहुंच गई मृत्यु !
क्या कहीं से चलकर आयी मृत्यु या
जीवन के साथ चलती रही 
और जवान हो गयी 
कौन जाने
 
डॉक्टरों ने तो आश्वासन दिया था
कि छू नहीं सकती कोई बीमारी
क्या कोई भी नही पढ़ पाया 
मृत्यु की लकीर को?

अब चेहरे की ऐंठन
निस्तेज हो चली आंख
निढाल पलकों में 
कितनी स्पष्ट है मृत्यु 
कैसे घात लगाए बैठी थी

ताकत के सारे नियम 
झुठला दिये मृत्यु ने 
इतनी साधारण मृत्यु
धन- वैभव
बचने के सारे उपक्रम
एकदम झूठे पड़ गए
कैसे हुआ यह सब
कैसी सच्ची और निष्पाप थी मृत्यु

वह जो हर क्षण हर पल 
जलता रहा प्रतिशोध की अग्नि में 
क्या वह ले सकेगा प्रतिशोध मृत्यु का
 
अब सारे तनाव मिट चुके हैं.
रात जो दस्तखत किया 
वह ही है आखिरी चेक 
दस्तखत की स्याही से उड़ चुका है जीवन 

दरवाजे पर अब भी लटक रहा है 
उसका नाम 
उस पर बैठी मक्खी 
कभी भी उड़ सकती है ।



स्किजोफ्रेनिया -1


अच्युतानंद मिश्र 
अनथक देख रहे हो आकाश में 
देखता हूँ तुम्हें
तुम्हारे होंठ बुदबुदाते हैं, 
कहते हो तुम – “वे देवता हैं”.

आकाश में बादल और सितारे  
वे सब देवता हैं 
मुझे दिखाई देती हैं आकृतियाँ 
वे देवता हैं ?

प्रश्नवाचक चिन्ह की तरह घूमती है आँखें 
पीछा करती हैं तुम्हारी आँखों का 
चेहरे से तुम्हारे छलक रही है आगाध करुणा
एकटक देखते हो आकाश 
आँखों से बह रहे हैं आंसू
दवाएं कर रही हैं उत्पात रक्त में ह्रदय में
 
एक अँधेरे कुंएं में गिर रहे हो तुम 
सख्त होता जा रहा है चेहरा 
ऐंठ रही हैं मांसपेशियां
कुंएं के जगत को पकड़ कर बचने की 
आखिरी कोशिश 

छपाक से बंद होता है रात का दरवाजा 
रस्सी का आखिरी सिरा खो गया 
उलट गयी है बाल्टी 
अन्धकार में युद्ध करेंगे देवता
 
हर तरफ होगा अट्टहास 
हर तरफ होंगे रक्त के छींटे 
बादल और सितारे उतर आयेंगे 
कुंएं के अंधकार में।



स्किजोफ्रेनिया -2

भूल जाते हो तुम सबकुछ 
खाना, पहनना, हंसना, बोलना 
भूल जाते हो सोना 
बिस्तर पर लेटे लेटे
याद आता है बचपन 
घर माँ बाप दोस्त
 
भूल जाते हो काम पर जाना
लोगों से मिलना और बातें करना  
कितना कठिन है रहना इच्छाओं के बगैर 
खाली निर्वात सा जीवन और चलते रहना
 
तुम देते हो जीवन को धोखा 
उतार कर जीवन का लबादा
टांग दिया है बाहर तार पर 
अलिफ़ नंगे बैठकर बाहर धूप में 
देखते हो जीवन का सूखना

दूर जाती हुयी स्त्री की पीठ 
अस्फुट से स्वर गूंजते हैं कान में अनवरत –
“तुम्हें जीवन की कोई कद्र नहीं”।



स्किजोफ्रेनिया -3

तुमने बायाँ हाथ उठा रखा है
तुम्हारी मांसपेशियों की खराबी 
या रक्त के प्रवाह की समस्या 
या धडकन की गति धीमी हो जाने का सवाल  
डॉक्टर नहीं समझ सकते 
देवता भी नहीं 
माँ बहन पत्नी 
पड़ोसी दोस्त कोई नहीं
  
तुम जानते हो इस हाथ का 
सीधा होना नामुमकिन 
वे तो इतना भी नहीं समझते 
कि जब तक ऊपर उठा है तुम्हारा हाथ 
कोई असुर 
तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता
 
डॉक्टर के भीतर कोई असुर है 
चाहता है हाथ सीधा करना 
वह खेल रहा है तुम्हारी शक्तियों से 

बुराइयों से बचने के लिए 
बचने को असुरों से तुम करते हो साधना 
मंत्रोच्चार में उठते हैं होंठ  
फड़कते हैं कान 

तुम वहां देख रहे हो बार-बार 
जो किसी को दिखाई नहीं देता ।



स्किजोफ्रेनिया -4

तुम चल रहे और उससे कर रहे हो बातें 
मैं चाहता हूँ तुम चुप न रहो 
मुझसे करो बात 

तुम किसे देख रहे हो 
किससे मिल रहे हो 
मैं हूँ मगर मैं नहीं हूँ 
वो है मगर भाषा में उपस्थित 
और अनुपस्थित वह 
जिससे तुम कर रहे हो बातें
 
भाषा में होना देता है एक अर्थ 
जीवन में होना दूसरा 
तुम भाषा में देखते हो जीवन 
मैं जीवन में ढूँढ़ रहा हूँ भाषा 

कितने प्रश्न हैं तुम्हारे पास अ-संबोधित 
तुम मुझे देख कर भी नहीं देख रहे 
मैं तुम्हें देख कर भी नहीं समझ पा रहा 

हम दो हैं
मगर वह तीसरा कर रहा है बातें 
तुम्हारे प्रश्नों के ऐवज में 
ढूँढ़ता हूँ उत्तरों के प्रश्न 
मगर भाषा स्थगित 
अर्थ गुमसुम बैठें है दृष्टि के उस पार 

भाषा के उस तरफ तुम 
शब्दों के उस पार मैं 
तीसरा अर्थ हर तरफ मौजूद 
मैं उसे देख नहीं पा रहा
 
तुम कर रहे हो उससे बातें
नींद में और नींद के बाद 
और नींद के लिए ।



स्किजोफ्रेनिया -5

तुम्हारी चुप्पी में कितने प्रश्न 
इस घर की दीवार में उग आयें हैं 
इस घर की दीवारें इतनी सख्त 
और उलझनों से भरा तुम्हारा चेहरा खामोश 

तुम कर रहे हो मंत्रोच्चार 
अस्पष्ट शब्दों से उकेरते हो आकृतियाँ 
दीवार पर दिखाई देते हैं चेहरे 
घर के मन के 

तुम एकटक देख रहे हो दीवार को 
मगर दीवार गिरेगी नहीं 

और प्रश्न फ़ैल जायेंगे सब ओर 
पड़ोसियों की खोजती आखें 
छिप कर देखेंगी दीवार की दरारों से 
   
तुम हंसोगे और कहोगे 
देवताओं ने बचा लिए तुम्हें 
वे चाहते थे तुम्हारी मृत्यु 
और पा गये मृत्यु ।












अच्युतानंद मिश्र 

कविता और आलोचना दोनों में समान रूप से सक्रिय अच्युतानंद मिश्र का जन्म बोकारो (झारखंड) में हुआ।
दो कविता संग्रह चिड़िया की आंख भर रोशनी में और आँख में तिनका ।उत्तर मार्क्सवादी चिंतकों पर केंद्रित विचार और आलोचना की पुस्तक बाज़ार के अरण्य में प्रकाशित। कविता पर केंद्रित आलोचना की पुस्तक कोलाहल में कविता की आवाज़ ।

प्रेमचंद: साहित्य संस्कृति और राजनीति शीर्षक से प्रेमचंद के प्रतिनिधि निबंधों का संकलन। साहित्य की समकालीनता शीर्षक के अंतर्गत साहित्य और समय के अन्तर्सम्बन्धों पर केन्द्रित लेखों का संकलन एवं संपादन. कबीर की कविता पर लेखों का संकलन-संपादन तथा प्रसिद्ध अफ्रीकी उपन्यासकार चिनुआ अचेबे के उपन्यास Arrow Of God का हिंदी में देवता का बाण शीर्षक से अनुवाद।

कविता के लिए वर्ष 2012 में शब्द साधक युवा सम्मान एवं वर्ष 2017 में भारतभूषण अग्रवाल सम्मान। 
आलोचना के लिए दिया जाने वाला प्रतिष्ठित देवीशंकर अवस्थी सम्मान वर्ष 2021में कोलाहल में कविता की आवाज़ को।
 
सम्प्रति: श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय कालडी में सहायक आचार्य ।

मो.-9213166256
Email : anmishra27@gmail.com




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Comments

  1. अरुण कमल12 June 2026 at 20:45

    अच्युतानंद विलक्षण कवि हैं, संवेदना और विचार के समरस रसायन से नयी निर्मिति करने वाले निपुण कवि।आँख में तिनका से बढ़ते हुए अपने समय की नाड़ी पकड़ने वाले विशिष्ट कवि।

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  2. अच्युतानंद मिश्र की कविताएं आज के बर्बर और जटिल समय का चेहरा दिखाती हैं। वे ऐसे समय के बीच पसरी उदासी को भी लक्षित करती हैं। वरिष्ठ अग्रज कवि -गद्यकार अरुण कमल सही लिखते हैं कि ये हमारे दौर के एक विशिष्ट कवि हैं। अच्छे कवियों और उनकी महत्वपूर्ण कविताओं की प्रस्तुति के लिए आपका हार्दिक आभार।
    चंद्रेश्वर, लखनऊ

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  3. कृति बहुमत12 June 2026 at 23:19

    बेहतरीन कविताएं।

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    Replies
    1. ये कवितायें हमारे समय के समाज और आहत-अनाहत समय की सूक्ष्मतम धड़कनों,हलचलों और चेतन-अवचेतन में जगह बनाते तत्वों की एम आर आई है।
      ये एक अमूर्त कोलाज है-जीवन -मृत्यु के बीच घातों-अनाघातों का और नामुराद अप्रासंगिक बना दी गयी दुनिया का जिसमें मरते हुए जीना बचा हुआ है।भीतर का अदृश्य अनुभूत्यात्मक संसार बाहर की भयावह असहायताओं में बमुश्किल सांस खींचता हुआ।कार्बन डाइऑक्साइड म़े आक्सीजन की कमी का शिकार मानो कुत्ते की बाहर लटकती जीभ पानी को बेतरह तरसती और मानुष जिंदगी के यथार्थ को पढ़ने में पल-पल चूकती ।बैचेन करने वाली कविताओं का ये स्वर भूकंप की तरह रिकॉर्ड हुआ।

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  4. जीवन से जीवन जुड़ रहा है यहां
    जीवन बचा रहा जीवन को

    जीवन की, जीजिविषा की कविताएँ

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  5. विजय कुमार13 June 2026 at 03:35

    अच्युतानंद मिश्र की इन कविताओं में एक टूटे-फूटे भयावह समय में एक ओर जहां आत्मकेंद्रित, घोर स्वार्थी , मध्य वर्गीय निष्क्रियता का एक खौफनाक संसार अपने पूरे विवरणों और कागुजारियों के साथ परिभाषित हुआ है ,वही दूसरी ओर " सिजोफ्रेनिया ":शीर्षक के अंतर्गत लिखी गईं कुछ कविताएं तो लगभग हतप्रभ कर देती हैं । यहां कवि एक दूसरे स्तर पर जाकर इस समय को देखता है। सिजोफ्रेनिया की असामान्य अवस्था यहां एक रूपक की तरह प्रस्तुत हुई है । खंडित चेतनाओं के इस परिपार्श्व में वह हरहराता हुआ छिन्न- भिन्न, आत्म विस्मृति ,मतिभ्रम और क्रमभंगताओं का एक निष्करुण डरावना संसार है जहां वास्तविकता और कल्पना के सारे बोध एक दूसरे में विलयित हो गए हैं। यह वजूद की एक "प्रतिस्थिति" कही जाएगी । चेतना के अलग-अलग स्तरों के बीच मौजूद ये अंतराल जब भाषा में इस तरह से उतरते हैं तो एक रचना अस्तित्व बोध की सारी बाह्य परतों और दिगभ्रमों को भेद देती है। देखे - अनदेखे, भ्रमों , स्मृति लोप, भटकावों, मायाजाल के भीतर प्रवेश करती हुई कविता भय ,क्रंदन , अकेलेपन ,असहायता और करुणा के उस अलक्षित संसार को रूपायित करती है जिसे रचना हमेशा संभव नहीं रहा है। इन कविताओं में व्यथा की वह दुनिया उभरी है जिसमें समय, स्थान और लोगों से तालमेल गड़बड़ा गए हैं । व्यथा का अनचिह्ना संसार जिस तरह से सामने आया है , उसे रचनात्मकता की एक उपलब्धि कहा जायेगा। साथ ही यह समकालीनता के बने हुए अनेक स्टीरियोटाइप खांचों को ध्वस्त करता है ।एक लंबे समय के बाद सृजन का यह सघन संसार देखने को मिला है। कवि को बधाई ।

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  6. ज्योति मोदी13 June 2026 at 03:35

    बहुत सुन्दर कविताएँ।

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  7. बहुत अच्छी कविताएँ

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  8. ख़ुदेजा़ ख़ान13 June 2026 at 04:59

    अच्युतानन्द मिश्र की कविताओं में
    इस संसार में मनुष्य की गति और मति क्या है? इसके गणित का समीकरण मिलता है वो भी संष्लेषित होकर कई - कई कोणों से उपजाया हुआ। शायद वो चाहते हैं कि कविता पूरी तरह पाठकों के अंतस तक पंहुच जाये।
    जब वे कहते हैं ' युद्ध कहीं नहीं था' दरअसल उस आम आदमी पर कटाक्ष करते हैं और उसकी असलियत भी समक्ष रखते हैं कि- कहीं वो व्यस्त है, कहीं मस्त है और कहीं त्रस्त। उसकी अपनी दुनिया में
    जब टी वी का स्विच ऑन -ऑफ करने की सुविधा हो तब वो क्यों अपना निजत्व ख़राब करने पर आमादा हो।
    या फिर खाए,पिए,अघाए लोगों को इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि -' युद्ध कहां था
    कितना और क्यों था'

    मनुष्य, मनुष्य का मन और मनोदशा। मनुष्य की इच्छाएं, संघर्ष,महत्वकांक्षाएं और उसका प्राणांत
    कविता के केन्द्रीय स्वर हैं। मनुष्य की चेतना ही है जो आख़री सांस तक पीछा नहीं छोड़ती तथा इसी चेतना से जाने कितनी चेतावनियां और चैलेंज,पल प्रतिपल मनुष्य को आशान्वित व आशंकित रखते हैं।

    'स्किज़ोफ्रेनिया' के पांच भाग, सामान्य व्यक्ति के असंमज,डर,कुंठा, दमित आकांक्षाओं और अनचाहे विचारों का समुच्चय है जो ऐसे किसी को भी विचलित रखने के लिए पर्याप्त है जिनसे घिरा हुआ वो स्वयं को महसूस करता है।

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