सुभाष राय की कविताएं
सुभाष राय
इन दिनों मनुष्य और मनुष्यता को नियंत्रित करने के लिए जिस तरह की साज़िश बड़े पैमाने पर चल रही है उसे समझना बहुत मुश्किल है लेकिन समझने से इनकार करना अकेला हो जाना है और अकेला होना अंततः मारा जाना है।सुभाष राय की कविताएं हमारे समय की इन्हीं दुरभिसंधियों का पर्दाफाश करती हैं।वे एक तरफ तो उस ताकत को चिन्हित करते हैं जो वर्चस्व की नई नियमावली के तहत सबकुछ रौंदने पर आमादा है और दूसरी तरफ प्रतिरोध के उस स्वर को भी रेखांकित करते हैं जो शैतानी सल्तनतों के शीविर रौंदते हुए कैसी भी हवा को बदल सकती है।
सुभाष राय की कविताएं
यात्रा
यात्राओं में कभी-कभी
कोई चेहरा मिल जाता है जो
किसी भूले हुए दोस्त की
याद दिला देता है
वैसा ही कद, वैसा ही रूप-रंग
अचानक याद हो आती हैं
बहुत सारी घटनाएं
दोस्ती और संग-साथ की
लेकिन एक आकुल संशय मन को
रोक देता है उस अजनबी को
पुकारने से
यात्राओं में कभी-कभी सुनायी
पड़ती हैं सुनी हुई आवाजें
मन चिहुक उठता है
यह तो जोगिंदरा की आवाज है
पर उसकी शकल नहीं मिलती
परकायाप्रवेश में मेरा विश्वास नहीं
और अगर ऐसा होता तो वह
मुझे जरूर पहचान लेता
लपककर मिलता
उस आदमी का अपरिचित की तरह
चलते चले जाना मन को बेचैन कर देता है
दोस्त की याद में एक हूक
उठती है और तुरंत उसे गले लगाने
गांव जाने का मन करता है
यात्राओं में कभी-कभी छोटे
बच्चे मिल जाते हैं
जो आंखें चुराकर देखते हैं
हंसते हैं इस तरह जैसे
सदियों से परिचित हों
लेकिन अपनी मांओं के साथ चले जाते हैं
बार- बार मुड़-मुड़ कर पीछे देखते हुए
हृदय में धंस जाता है उनका इस
तरह देखना और अकेले छोड़ जाना
दुनिया भर के बच्चों की सलामती की
दुआ करने का मन होता है
यात्राओं में अक्सर मिल जाते है
कुछ अपंग, अंधे और असहाय लोग
उनकी ओर ज्यादातर लोग देखते नहीं
वे ठहरते हैं, हाथ फैलाते हैं, कातर आंखों से
कुछ पल प्रतीक्षा करते हैं
और घिसटते हुए आगे बढ़ जाते हैं
ज्यादातर लोग पसीजते नहीं,
उन्हें देखकर मुंह मोड़ लेते है
वे याद दिला जाते हैं कि हम
कैसी अंधी व्यवस्था में जी रहे हैं
कि लाखों लोगों को दो रोटी के लिए
लाखों बार अपमान का घूंट
पीना पड़ता है
यात्राओंं में उम्र देखकर
कुछ लोग हाथ भी बढ़ाते हैं
बैग थाम लेते हैं, हाथ पकड़कर
नीचे उतरने में मदद करना चाहते हैं
क्या पता उन्हें कहां जाना हो
कितना जरूरी हो उनका जल्दी निकलना
फिर भी उनका इस तरह एक क्षण
खड़े हो जाना आश्वस्त करता है
कि दुनिया अभी इतनी बुरी नहीं हुई है
जितनी हम समझते हैं
किसी भी यात्रा में बहुत सारी यात्राएं होती हैं
मन बदलता है, समझ भी बदलती है
देखने का सलीका बदलता है
ऐसे अनेक अवसर आते हैं
जब हम अपनी मनुष्यता की
परीक्षा कर सकते हैं
मरे हुए लोग यात्राएं नहीं करते
जो यात्राएं नहीं करते, वे मर जाते हैं
( पाब्लो नेरूदा और उदयप्रकाश से थोड़े उधार के प्रति आभार)
अरावली
अरावली ! कुछ कायरों को पसंद नहीं
तुम्हारा तनकर खड़ा होना
वे तुम्हें झुका नहीं सकते
इसलिए तुम्हारी जड़ें खोद रहे हैं
शिखर की ओर देखने का
साहस नहीं है तो झुककर
वार कर रहे हैं तुम्हारी
शिराओं पर
तुम्हारे सामने आते ही वे बौने हो जाते हैं
इसलिए तुम्हें गिराना चाहते हैं
सिर उठाये हुए तुम कितने अच्छे लगते हो
उन्हें किसी का इस तरह सिर उठाना पसंद
नहीं
तुम्हारी तरह निडर, निर्भीक, उन्नत माथ
जो लोग भी हैं, उनके पांवों पर
निरंतर प्रहार कर रहे हैं वे
बौने, दुष्ट और कायर कहीं के !
सुरंग
भीतर की ओर खुलती है
एक गहरी सुरंग
उसमें प्रवेश का
कोई सीधा मार्ग नहीं है
वह बाहर कहीं खुलती है इसका
भी पता नहीं
उसमें जगह-जगह स्वर्ण भंडार हैं
झीलें हैं मुहाने तक
मोतियों से भरी हुई
नीलम, पन्ने के पहाड़ हैं
वहां अंधेरा भी चमकता हुआ
सामने आता है
भटकने के बहुत सारे खतरे है
आप सीधे रास्ते जा पायेंगे
या नहीं, यह इस बात पर
निर्भर करता है कि
आप को चाहिये क्या
स्वर्ण भंडार? मोती, नीलम, पन्ना
या इनका अजस्र स्रोत,
इनकी सर्जना का मूल?
सुरंग का दूसरा छोर
अनंत आकाश में खुलता है
अनंत उड़ान में, मुक्ति में
यह मुक्ति चेतना को जोड़ देती है
समूची सृष्टि से
अपने भीतर दाखिल होते ही
कोई भी सबके भीतर
दाखिल हो जाता है
सबके सुख-दुख में शामिल हो
जाता है
कोई दर्शन, कोई युक्ति
कोई छल-बल, कोई वैभव इस सुरंग
में नहीं ले जा सकता
तलवार से साम्राज्य
जीते जा सकते हैं लेकिन
वह भी अंतःपुर का रास्ता नहीं
बना सकती
रास्ता उन्हें ही मिलता है जो
रास्ते के आकर्षणों में नहीं फंसते
जिसे कुछ नहीं चाहिये
उसके कंधे पर पंख लग जाते हैं
सुरंग के उस पार की उड़ान
के लिए
सुरंग को पार करने वाले
कभी लौटते नहीं
उनकी छायाएं रह
जाती हैं इस पार
एक नये संसार की झिलमिल
स्वप्न कल्पना के साथ
जो भी अनन्य पीड़ा सहकर
इस यात्रा पर गये
अब तक कह नहीं
पाये अपनी पूरी बात
कहना बाकी रहा, इसीलिए
बुद्ध के बाद भी बुद्ध के आने की
संभावना भी बची रही।
बियाबान
जोरों की प्यास है मगर
बादलों का दूर-दूर तक पता नहीं
नदियां ललचा रही हैं, उनकी नाभि से निकले
कमल खिले हैं तटों पर, लेकिन सतह पर
मरी हुई मछलियां नजर आ रहीं
ये नदियां पहाड़ों से नहीं आ रहीं
समुद्र की ओर नहीं जा रहीं
इनका उद्गम धरती का
चाक हुआ सीना है
जैसे बेवजह मारे गये
लोगों का खून बह रहा हो
समुद्र के हृदय में उड़ेला जा रहा है
इतिहास का विष, उसके बर्दाश्त की एक
सीमा है
वह उबल रहा है मृत्यु घट बनकर
किसी अनहोनी की प्रतीक्षा में पृथ्वी के होठ
सूख रहे हैं
अब और कोई रास्ता नहीं बचा है
आने दो इन ज्वाल लहरों को
शैतानी सल्तनतों के शीविर रौंदते हुए।
अकेलापन
मैं कुछ समय के लिए
अकेला होना चाहता हूं
पर हो नहीं पाता
मैंने लॊगों से
मिलना- जुलना
कम कर दिया है
पढ़ना- लिखना, आना-जाना भी
मैंने प्रेम करना स्थगित कर दिया है
ईर्ष्या, घृणा, द्वेष से कह दिया है, 'मेरे घर में
जगह नहीं है, चले जाओ कहीं और'
पुराने मित्रों को भूल रहा हूँ
नये परिचय से बचने की कोशिश करता हूँ
पत्नी, बच्चे थोड़े-थोड़े
अजनबी लगने लगे है
पेड़, पौधे, नदियां, समंदर सब
समाते जा रहे हैं मेरे भीतर
घर के दरवाजे, खिड़कियां, दीवारें
सब मैंने गिरा दिया है
सड़कें, चौराहे, बाजार, बस्तियां
सारे दृश्य मिटा देना चाहता हूँ
फिर भी कोई पीछा करता रहता है
मैं जब भी अकेला होता हूँ
अनजानी आवाजें, जिन्हें
कभी सुना नहीं गया
मुझसे बतियाना चाहती हैं
किसी के रोने, चीखने की
देह में चाकुओं के उतरने की
आवाजें
फंदे बहुत सारे झूलने लगते हैं दिमाग में
उनके पास उन गलों के सारे ब्योरे हैं
जिन पर वे कसे गये
जिनका कहीं किसी
एफ आई आर में जिक्र नहीं हुआ
भूख अपना इतिहास सुनाना चाहती है
कोड़े बहुत थक गये हैं
खुली पीठों पर गिरते-गिरते
वे किसी हाथ में आने से
इनकार करने की अपनी
तैयारी पर चर्चा करना चाहते हैं
मैं इन सबसे बचना चाहता हूं
बिलकुल अकेला हो जाना चाहता हूँ
जब भी ऐसी कोशिश करता हूँ
मेरा अकेलापन ही करने लगता है मेरा पीछा
घिर जाता हूँ अकेली कर दी गयी आवाजों से
अकेले कर दिये गये इतिहास से
अकेले कर दिये गये दुख से
मारने के पहले अकेला कर देने
की रीति सदियों से चली आयी है
अगर आप अकेले पड़ रहे हैं
तो समझ लीजिये कोई आप को मारने
की तैयारी में है।
स्त्री
एक स्त्री किसी बड़े
स्कूल में पढ़ाती है
वह स्त्री विमर्श के बड़े मंचो पर बैठती है
उसे स्त्रियों पर जुल्म का
भयावह इतिहास मालूम है
वह भाषण करती है कि स्त्रियों को
बराबरी का अधिकार मिलना चाहिये
वह बहुत सक्रिय है लेकिन
जल्दी घर पहुंचना चाहती है
उसे बच्चों को भी देखना है
और पति की खुशी का भी ध्यान
रखना है
उसे मालूम है कि स्त्री विमर्श
अक्सर घर के विमर्श से मेल नहीं खाता
एक स्त्री है जो नाटक खेलती है
बहुत मशहूर है, उसे नृत्य भी आता हैं
पुरुषों के साथ अक्सर उसका दिन बीतता है
उसका पति भी रंगकर्मी है
उसका दिन स्त्रियों के साथ बीतता है
दोनों स्त्री स्वातंत्र्य के पक्षधर है
दोनों एक दूसरे को शक से देखते हैं
एक स्त्री है, जो वैज्ञानिक है
वह दुनिया की बेहतरी के लिए
हमेशा कुछ न कुछ करती रहती है
घर लौटकर भी वह जागती रहती है
उसके पति की सलाह है कि
वह कोई और नौकरी कर ले
ताकि पत्नी की भूमिका भी निभा सके
एक स्त्री है जो सज-धजकर कमरे
के बाहर खड़ी रहती है
आते- जाते लोगों को आंखों से इशारा
करती है, कभी-कभी हाथ भी पकड़ लेती है
उसे कुछ रुपये चाहिये
ताकि वह इस निर्मम दुनिया में जी सके
एक स्त्री पूरे दिन घरों में झाड़ू लगाती है
खाना पकाती है, डस्टिंग करती है
वह पति और बच्चों के साथ
किसी झोपड़ी में रहती है
जो एक कमरे के बराबर भी नहीं है
बच्चे कई बार अपने मां-बाप को
नंगे भी देख लेते हैं
फिर वे वैसा ही खेल आपस में खेलते हैं
वह जहां काम पर जाती है
वहां भी उसे बहुत सावधान रहना पड़ता है
कोई नोट दिखाता है, कोई प्रशंसा करता है
कोई घूर कर देखता है कपड़ों के भीतर
एक स्त्री फूल बेचती है
एक ढाबे पर रोटी बेलती है
एक गुलगप्पे की दुकान चलाती है
एक पान की दुकान पर बैठती है
एक मुहल्ले में घूम- घूम भूजा बेचती है
काम करते हुए उन्हें चलना भी पड़ता हैं
हाथ ऊपर नीचे उठते हैं
देह के पुर्जे- पुर्जे हिलते हैं
घंटों काम करते हुए कपड़े भी
अस्त-व्यस्त हो जाते हैं
उनका ध्यान भले न हो लेकिन
लोगों का ध्यान रहता है
पुरुष जो पैसे देकर ले जाता है
उससे ज्यादा बिना पैसे के पाना चाहता है
इनके यहां भीड़ ज्यादा जुटती है
इनका धंधा अच्छा चलता है
शाम को इन्हें अपने नालायक पतियों को
पूरा हिसाब देना पड़ता है
उनके हाथ केवल थकान लगती है
एक स्त्री नंगी चौराहे पर बैठी रहती है
एक बड़बड़ाती हुई तेज कदमों से चलती है
कभी हंसती, कभी रोती है
कभी पत्थर लेकर किसी का पीछा करती है
एक बाजार में घूम भीख मांगती है
एक बीमार अस्पताल के बाहर पड़ी है
पुरुषों की निगाहें इन सब पर है
सरकारें स्त्रियों के लिए बहुत कुछ कर रही हैं
स्त्रियां भी स्त्रियों के लिए बहुत कर रही हैं
समाजसेवी संगठन, बाबाओं के बड़े-बड़े
आश्रम स्त्रियों की कायापलट में लगे है
पर स्त्रियों की दुनिया बदल नहीं पा रही
स्त्रियों को पगली से कुछ सीखना चाहिए
जिह्वा पर शब्द के साथ हाथ में पत्थर
भी रखना चाहिए।
हवाएं
हवाओं पर किसी का वश नहीं चलता
जब हवाएं खिलाफ हो जातीं हैं
बड़े-बड़ों की हवा निकल जाती है
जो हवाओं के पुल बनाते हैं
हवाओं को दीवारों में चुन देना चाहते हैं
हवाओं पर चाबुक चलाने की कोशिश करते हैं
हवाओं को मोड़ देने का दावा करते हैं
वे हवाओं का रुख पहचानने में अक्सर गलती करते हैं
और एक न एक दिन हवाओं के ही
शिकार बन जाते हैं।
ट्रेन
मैं ट्रन के एक डिब्बे में हूँ
यह एक छोटी दुनिया की तरह है
एक बच्चा दौड़ रहा है
उसे इस बात सॆ कोई मतलब नहीं
कि डिब्बा कितनी तेज
भाग रहा है
भीतर की गतिहीनता में
वह इस पार से उस पार पहुंचकर
जैसे ट्रेन की गति को
चुनौती दे रहा है
उसकी मां उसके पीछे
भाग रही है
बच्चे किसी की नहीं सुनते
वे मनमानी करना चाहते हैं
इसी तरह वे कुछ नया सीख पाते हैं
पर मांओं का क्या
वे बच्चों को जल्द से जल्द
आदमी बना देना चाहती है
वे चाहती है कि वह अपने से कुछ न सीखे
जो मां सिखाये वही सीखे
मसलन वह किस घर,
किस जाति में जन्मा
उसका धर्म क्या है
उसे किससे प्रेम करना चाहिये
किससे घृणा, उसे कौन सी भाषा
बोलनी चाहिये
एक आदमी लगातार
फोन पर बात कर रहा है
वह ठेकेदार जैसा लगता है
सौदेबाजी में जुटा हुआ
लाभ-हानि का गणित ठीक करने में जुटा
जैसे डिब्बा उसका दफ्तर हो
उसके बक-वक से आस-पास
के लोग परेशान हैं लेकिन उसे चिंता नहीं
बातूनियों की बड़ी संख्या है मुल्क में
वे इतने आत्मविश्वास से झूठ
बोलते हैं कि विश्वास करने का मन
करता है
जब सचमुच बोलने का वक्त
आता है, उनकी घिग्घी बंध जाती है
एक सज्जन अपना
कम्प्यूटर खोले हुए कोई
गंभीर पहेली सुलझा रहे हैं
किसी कंपनी के प्रोफेशनल लगते हैं
कंपनी को फायदा पहुंचाने
में ही उनका फायदा है
ये बिके हुए लोग हैं
चन्द पैसे और मिलते ही वे किसी
और के हाथ बिक जाते हैं
आज कुछ कह रहे थे, कल
कुछ और कहने लगते हैं
सत्ताएं चाहे छोटी हों या बड़ी
वे लोगों को खरीदकर
इस्तेमाल करती हैं और चुक जाने पर
मरने के लिए जाना छोड़ देती हैं
कुछ लोग मोबाइल पर युद्ध
की खबरें सुन रहे हैं
युद्ध हमारे घरों तक आ गया है
यह ढिबरी युग के आगमन का संकेत है
पाषाण युग की याद दिलायी जा रही है
सभी चिंतित हैं कि गैस कब तक
मिल पायेगी?
जब नहीं मिलेगी तो खाना कैसे पकेगा
जब तेल नहीं होगा
तो गाड़ियों का क्या होगा?
महंगाई बढ़ेगी तो घर के बजट
का क्या होगा?
इंडक्शन कूकर बाजार की चांदी है
लोगों को शायद पता नहीं कि
तेल के बिना बिजली का क्या होगा?
गाड़ी बेचने वाली कंपनियां जल्द से जल्द
अधिक से अधिक गाड़ियां
बेच देना चाहती हैं
लेकिन उनके दफ्तरों में सन्नाटा है
खरीदार भी चालाक हो गये हैं
उन्हें भी तेल की धार का पता है
ट्रेन में सवार कुछ लोग चुप हैं
वे बाहर की भागती दुनिया को देख रहे हैं
पिछले क्षण जो दृश्य था, वह अब नहीं हैं
जो अभी है, वह भी अगले
पल नहीं रहने वाला है
उन्होंने कान में मोबाइल का तार लगा रखा है
वे कभी- कभी बेवजह हंसते हैं
कभी गंभीर हो जाते हैं
अक्सर पत्थर की तरह खामोश रहते हैं
खामोशी में आदमी सर्वज्ञानी लगता है
भले ही वह असल में मूर्ख ही
क्यों न हो
कुछ लोग जोर- जोर से बातें कर रहे हैं
शोर में इतना ही पता चल रहा है
कि कोई ईरान के साहस की
प्रशंसा कर रहा है तो कोई
चीख रहा है कि इनको मरने दो
ये सारी दुनिया में तबाही मचाये हुए हैं
शोर इतना है जैसे ट्रेन हार्मुज के
पास से गुजर रही है
ट्रेन अभी तो चल रही है
पर ट्रेन का भी क्या
किसे पता कि कौन सी पटरी कहां ढीली है
जब सरकारें पटरी से उतर चुकी हैं
तो ट्रेनों का क्या भरोसा
पुल आते हैं तो डरा देते हैं
उनके ढहने का भी वक्त मुकर्रर नहीं
कोई गुमसुम है, कोई बतकही में व्यस्त है
कोई बीमार है, बार- बार टायलेट
की ओर भाग रहा है
कोई अपने बच्चों की
उछल-कूद से परेशान है
कोई घर की लड़ाई यहां तक ले आया है
कोई मोदी और ट्रम्प को शाबाशी दे रहा है
कोई इन्हें नाकारा बता रहा है
एक आदमी चंग पर कोई गीत गा रहा है
वह गाते हुए भी बहुत उदास है
बीच बीच में अपनी ओर देखने वालों की
तरफ हाथ भी बढ़ा रहा है
उसके साथ एक छोटी बच्ची है
वह अपना बचपन भूल चुकी है
कुछ लोग गाने से खुश होकर नहीं बल्कि
दयार्द्र होकर कुछ सिक्के दे रहे हैं
बच्ची उसे इकट्ठा कर रही है
वह अनुग्रह का जवाब अपनी
पथरा गयी आंखों से दे रही है
किसी के पास फुरसत नहीं कि पूछे
यहां कोई सरकार है भी या नहीं
अगर है तो इतने लोग भीख मांगने को
मजबूर क्यों हैं?
डिब्बा युद्ध के मैदान की तरह है
सबके अपने- अपने युद्ध हैं
अमेरिका और ईरान की तरह
कोई हारना नहीं चाहता
एनाउंसर कई बार कह चुकी है
कि आप की यात्रा मंगलमय हो
लेकिन मंगलकामनाएं अक्सर युद्ध के
मैदानों में बेअसर हो जाती हैं।
सुभाष राय
जन्म जनवरी 1957 में उत्तर प्रदेश के एक गांव बड़ागांव (मऊ) में ।
प्रारंभिक पढ़ाई-लिखाई गांव की पाठशाला में। आगरा विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध साहित्य संस्थान के.एम.आई. से हिंदी भाषा और साहित्य में स्रातकोत्तर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। वहीं से विधि की पढ़ाई पूरी की और उत्तर भारत के विख्यात संत कवि दादूदयाल के रचना संसार पर डाक्टरेट पूरी की। आपातकालीन ज्यादतियों के खिलाफ आंदोलन, जेलयात्रा। चार दशकों से पत्रकारिता। कई प्रतिष्ठित दैनिक समाचारपत्रों में शीर्ष जिम्मेदारियां संभालने के बाद इस समय लखनऊ में जनसंदेश टाइम्स के प्रधान संपादक के रूप में कार्यरत। मासिक साहित्यिक पत्रिका 'समकालीन सरोकार' का एक वर्ष तक संपादन।
दो कविता संग्रह 'सलीब पर सच' और 'मूर्तियों के जंगल में', एक निबंध संग्रह 'जाग मछन्दर जाग' और संस्मरण एवं आलोचनात्मक लेखों का एक संग्रह 'अंधेरे के पार' प्रकाशित। ' दिगम्बर विद्रोहिणी अक्क महादेवी' और 'आत्मसंभवा आंडाल' का प्रकाशन।
नयी धारा रचना सम्मान, माटी रतन सम्मान एवं देवेन्द्र कुमार बंगाली स्मृति कविता सम्मान, कृति स्पंदन आलोचना सम्मान से सम्मानित।
निवास डी -1 /109 , विराज खंड, गोमतीनगर , लखनऊ। संपर्क -94550 8 1 8 9 4
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बहुत दिन बाद सुभाष जी की एक साथ इतनी
ReplyDeleteअच्छी कविताएं पढ़ने को मिली.
आप दोनों को बधाई।
उद्भट विद्वान और प्रतिरोध के कवि सुभाष राय की कविताएँ अपने समय की तफ़तीश और आलोचना हैं।
ReplyDeleteबहुत अच्छी यथार्थ की कविताएं।
ReplyDeleteसुभाष राय की कविताए गम्भीर विमर्श को आमंत्रित करती है.अफसोस वे आडाल की कविताए के अनुवाद पर ज्यादातर ध्यान केंद्रित करते है.
ReplyDeleteबढ़िया कविता। सच।आपको अकेले करना हत्यारों की रण नीति है।
ReplyDeleteयात्राएं सच का सामना कराती हैं। अनेक दृश्यों, योग्यताओं, मान्यताओं, जरूरतों, चाहतों, खुशियों और अनहोनियों से रूबरू कराती हैं। भीड़ में चलना अलग स्वाद देता है, यात्राओं में मिली भीड़ की अलग कहानी होती है। यात्राएं और ट्रेन कविताओं में सुभाष राय की सजग दृष्टि दिखाई देती है जो जीवन की विविधताओं को उसकी अर्थवत्ता के साथ पकड़ लेती है। अनेकानेक या कहें कि अनगिनत भूमिकाएं निभा रही स्त्री अंतत: एक घरेलू सहायक ही साबित होती है और उस भूमिका के प्रति सजग और प्रस्तुत भी रहती है। आकाश-पाताल एक करके भी पुरुषों की 'नजर' और 'बोल' से पीछा नहीं छूटता। जो गति स्त्री की है, वही प्रकृति की है। पर्यावरण से छेड़छाड़ करने वालों, अकारण ही युद्ध छेड़ने वालों और बचपन से खिलवाड़ करने वालों की अच्छी खबर लेते हैं सुभाष राय। वर्चस्व के खिलाफ प्रतिरोध करती ये कविताएं पर्याप्त असर छोड़ती हैं।
ReplyDeleteसभी कविताएं मानीखेज हैं।यात्रा,सुरंग,अरावली और अकेलापन मुझे बहुत अच्छी लगीं।यात्रा और अकेलापन जैसे मेरी भोगी हुई सी लगती है।कविता से पहले टिप्पणी महत्वपूर्ण है।
ReplyDeleteबेहतरीन कविताएं पढ़ने को मिली ।बधाई।
ReplyDeleteएक से बढ़कर एक कविताएँ। कोई जबाब नहीं। 🙏🙏🙏
ReplyDeleteइस समय की ज़रुरी कविताएं।
ReplyDeleteसुभाष राय की कविताएँ हमारे समय के सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय संकटों का गहन और निर्भीक दस्तावेज़ हैं। वे केवल यथार्थ का चित्रण नहीं करतीं, बल्कि उसके भीतर छिपी अमानवीय शक्तियों, सत्ता की हिंसा, युद्ध, असमानता, स्त्री-अस्मिता, पर्यावरण और मनुष्य के अकेलेपन जैसे प्रश्नों से गहरे स्तर पर मुठभेड़ करती हैं। उनकी भाषा सरल, संवादधर्मी और बिंबात्मक है, किंतु उसके भीतर तीखा वैचारिक ताप और मानवीय करुणा निरंतर प्रवाहित होती है। 'यात्रा', 'अकेलापन', 'सुरंग' और 'ट्रेन' जैसी कविताएँ जीवन के सामान्य दृश्यों से असाधारण अर्थ रचती हैं, जबकि 'स्त्री' और 'अरावली' प्रतिरोध की नई संवेदना को स्वर देती हैं। कुल मिलाकर, ये कविताएँ अपने समय की आलोचनात्मक चेतना को सशक्त रूप में अभिव्यक्त करते हुए पाठक को केवल संवेदनशील ही नहीं, बल्कि सजग और प्रतिरोधशील बनने के लिए भी प्रेरित करती हैं।
ReplyDeleteजब कोई अनुभवी आंख, जब कोई संवेदनशील हृदय,मनुष्यता के प्रति सजग दृष्टि बोध से दैनिक जीवन में उन्मुख होकर अवलोकन करता है तो यात्रा और ट्रेन जैसी कविताएं जन्म लेती हैं।
ReplyDeleteसुभाष राय यहां बिम्ब व प्रतीकों का सहारा लिए बिना उस मर्म को स्पर्श करते हैं जो आम नज़रों से अनदेखा-अनछुआ रह जाता है।
एक ही यात्रा या ट्रेन में अनेक अनुभवों से गुज़रकर, स्वयं को थोड़ा और मनुष्य बनने की ओर अग्रसर किया जा सकता है।
अरावली, सुरंग, बियाबान, हवाएं
इन कविताओं में चिंता है, चिंतन है,चेतना है।
व्यवस्था के प्रति, स्वयं के प्रति, सर्वहारा के प्रति।
कवि अनेक आयामों में स्थित - परिस्थिति को व्यक्त
करता है।
अकेलापन इस कविता में मौजूद कारण प्रत्यक्ष से अधिक परोक्ष में सक्रिय हैं ये स्थिति अधिक विस्फोटक है।
अदृश्य,अप्रिय जो कुछ भी है अधिक प्रभावी व घातक है।
'अगर आप अकेले पड़ रहे हैं
तो समझ लीजिए कोई आपको मारने की तैयारी में है'
अकेलापन कब त्रासदी में बदल जाता है,पता भी नहीं चलता।
आधी आबादी आज हर मोर्चे पर दिखाई दे रही है फिर भी -
'स्त्री विमर्श
अक्सर घर के विमर्श से मेल नहीं खाता '
स्त्री जीवन की विसंगतियां इस कविता में ख़ूब उजागर हुई हैं।
अर्बन या रूरल हर जगह उसके समक्ष चुनौतियों का संकट कभी निरापद और निष्क्रिय नहीं होता।
सुभाष राय की कविताओं में अन्तर्निहित सूक्ष्म किन्तु तीक्ष्ण विचार, शूल सी चुभन से लैस हैं।