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मनोज कुमार झा की कविताएं

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  मनोज कुमार झा   मनोज कुमार झा की कविताएं इस मायने में अलग और महत्वपूर्ण हैं कि उनके यहां मनुष्य और जीवन के वे दृश्य और बिंब हैं जो लगभग अलक्षित हैं।वैसी ही जीवटता उनकी कविताओं में है जो हाशिए पर जी रहे थके,हारे,टूटे और रोज रौंदे जा रहे निरीह और निर्बल मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। उनके यहां दुःख है,शोक है,करुणा है लेकिन पराजय लगभग अनुपस्थित है। मनोज कुमार झा की कविताएं  पथिको के साथ कोई घर से निकलता है                     उग आता है जंगलों में घर के सांकल पर                    छूटी हुई हस्तरेखाएं । मह मह करने लगा है आत्म-वन               अश्रुओं में वनफूलों का रस । एक देह जो कि दुर्बल मां की कोख में बढ़ा था घूमता है रक्तस्नात वन में अगोरता बीजों से भरा घड़ा याद आते गए अकस्मात वे लोग  जो पथिको के साथ पार करते थे चक्करदार रास्ते बतियाते रुकते पानी पीते गाते किसी पक्षी के कंठ से फूटा प्रेमगीत। आशा   एक शब्द लिखा - वृक्ष  उड़ते आए...