हरि मृदुल की कविताएं
हरि मृदुल
महानगरीय जीवन की विडंबनाएं और मध्य वर्गीय चरित्र के द्वंद्व को जिन कवियों ने अपनी कविताओं में प्रमुखता से चित्रित किया है उनमें हरि मृदुल का स्थान महत्वपूर्ण है।इस चकाचौंध से भरे जीवन के अंधेरे की छोटी छोटी बारीकियां उनकी कविताओं में इस तरह ध्यान खींचती है कि उनसे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।
हरि मृदुल की कविताएं
आवाज
एक पत्ता गिरता है
पचासों पत्ते गिरते हैं
इस तरह हजारों पत्ते छितरते चले जाते हैं
परंतु कोई आवाज नहीं सुनाई देती
कितना बड़ा झूठ है यह कहना कि
एक पत्ता गिरता है, तो भी
आवाज सुनाई देती है
कभी सुनाई भी देती रही होगी तो
यह गुजरे जमाने की बात है
अब ऐसी कोई आवाज नहीं सुनाई देती
एक शिशु भूख से बिलबिलाता हुआ रोता दिखता है
एक मां अपने बेटे के लिए विलाप करती रहती है
एक पिता बुझ चुकी आंखों की जोत में से
निथारता रहता है आंसू
भुखमरी के दृश्य आम हैं
सिलसिलेवार हुए बम विस्फोटों में चिथड़े उड़ रहे हैं
नौकरी के पहले दिन गया बेटा
शाम को घर नहीं लौट पाया
आश्चर्य कि सबको सबकुछ दिखाई
दे रहा है
लेकिन सुनाई कुछ नहीं दे रहा
ऐसे में एक पत्ते के गिरने की आवाज किसी को
कैसे सुनाई दे सकती है?
मैं बाजार में
मैं तो जगा हुआ था भाई
ना जाने कब हुआ उनींदा
कब आईं मुझे झपकियां
कब नींद आ गई एकदम गहरी
नींद में चलने की बीमारी भी
पता नहीं कब लगी मुझे
गहन नींद में ही उठ अक्सर
कहां-कहां तक जा पहुंचा हूं
पता नहीं किन-किन रस्तों से
इस खाई तक आ पहुंचा हूं
अब की नींद खुली तो पाया
चकाचौंध के बीच खड़ा मैं
चमकीली चीजों के पीछे
जाने कब से गिरा पड़ा मैं
पूरी तरह अब घिरा हुआ हूं
फिर-फिर खाली जेब देखता
बीच बाजार में
मैं बाजार में।
चलते हुए अचानक
ऐसा क्या हुआ कि चलते हुए अचानक
जैसे आंखों से मेरा चश्मा खिसका
और मेरे ही पांवों से कुचल गया
लंबी सड़क
जो कल तक ऊबड़-खाबड़ थी
अब इतनी चिकनी हो गई है
कि बिना चार पहिए के चलने की
इच्छा ही नहीं होती
दिमाग चक्कर खा रहा है
सब कुछ धुंधला-धुंधला नजर आ रहा है
जो विचारधारा मैंने ओढ़ी और बिछाई
जिसके सहारे अभी तक का जीवन
बिना किसी झंझट के गुजर गया
अब उसी को बदलने की सोच
रहा हूं
जैसे धूल भरी दरी और चीकट चादर
मेरे घर के पिछवाड़े
एक नया मॉल खुल गया है
शीशे का बना चमचमाता
पूरी तरह वातानुकूलित
वहीं से खरीदी जाएगी नई दरी और
नई चादर
ऐसा क्या हो गया है कि
जिन रास्तों पर मैं बेझिझक चलता
चला गया हूं
अब वे बियाबान की ओर जाते लगने
लगे हैं
ऐसा कौन सा अन्न खाने लगा हूं कि
मेरा मन इसकदर बदलने लगा है
जिन पर मुझे गहरा विश्वास था
उन्हीं से विश्वासघात करने की सोचने लगा हूं
जिनकी उंगली पकड़ मैं यहां तक पहुंचा
उन पर ही मैं उंगली उठाने लगा हूं
जो कुछ मैं कर रहा हूं
पूरे होशोहवास में कर रहा हूं
फिर भी मुझे पता नहीं है कि मैं
क्या कर रहा हूं
और क्यों कर रहा हूं
मेरे चश्मे का नंबर बदल चुका है
फिलहाल में अपनी आंखों को
हथेलियों से ढके हुए हूं।
अपना काम बनता
जिस रास्ते तुम बढ़ रहे हो
वह कहीं नहीं जाता
अगर जाता है
तो सिर्फ बर्बादी की ओर जाता है
- बाप ने जीवन भर के अनुभवों को आधार बनाकर कहा
बेटे ने अपनी आगे की जिंदगी की रूपरेखा को
सामने रखकर जवाब दिया -
जिस रास्ते मैं आगे बढ़़ रहा हूं
उस रास्ते ही गाडिय़ां हैं, बंगले हैं
दौलत है, ताकत है
जो मुझे चाहिए, वह सब कुछ है
बर्बादी का यही मतलब है, तो मुझे यह मंजूर है
आपकी जेब में नोट हैं
तो सब सैट हो जाता है
हद है कि आप नोटों में भी खोट देख रहे हैं
हथौड़े जैसी चोट देख रहे हैं
बड़बड़ाते बाप ने जवाब में फिर कुछ कहने के लिए
मुंह खोला ही था कि बेटे ने एक ही किक में
मोटर साइकिल स्टार्ट की और जाते-जाते जोरों से बोला -
अपना काम बनता
भाड़ में जाए जनता।
मैं यही कहना चाह रहा हूं
माता जी मंदिर जा रही थीं
मोटर साइकिल पर दो छोकरे आए
माता जी नमस्ते कहा
माता जी जवाब में नमस्ते कहतीं
मंगलसूत्र टूट चुका था
माता जी कुछ समझ पातीं
छोकरे ये गए - वो गए
अस्सी की स्पीड में भाग गए
सचमुच ऐसी खबरों में
अब कुछ खास बात नहीं
ये घटनाएं तो आम हैं
यही तो मैं कहना चाह रहा हूं कि
भरे पेटों की तुलना में
भूखे पेटों के अपराध कम हैं
नया समाज है, नई व्यवस्था है
हजार रोते हैं, एक हंसता है।
मि. लैपटॉप
कंधे पर बड़ा खूबसूरत बैग
अच्छा तो यह लैपटॉप है!
मेरे पास कागज है, कलम है
मोटी फाइल है, मोटर साइकिल है
तेरे पास क्या है?
मेरे पास ऑफिस से मिला यह लैपटॉप है!
चेहरे पर अजब खुशी है
होठों में मासूम हंसी है
काम करना आसान हुआ है
घर बैठे ही काम हुआ है
हम दोनों दोस्त खूब हंसे हैं
इस हंसने पर मन ही मन दोस्त ने मुझे
मूर्ख समझा है
मैं उसे मूर्ख समझ रहा हूं!!
तुम्हारा नया नाम मि. लैपटॉप रख दूं
क्या खयाल है?
वह फिर हंसा है
फिलहाल कई किलो का लैपटॉप पाकर
निहाल है
आज मि. लैपटॉप दो महीने बाद मिला है
बुरा हाल है
कंधा दुखा हुआ है
सिर झुका हुआ है -
‘सालों ने चौबीस घंटे का
नौकर समझ लिया है’ –
एकदम निढाल है।
तन
तो क्या थैला है तन
और जीवन यह टिकाऊपन?
हाथ में रहा या कंधे पर
थैला घिसता जरूर रहा
हालांकि धूल तो नहीं ही जमने दी
जब तब धो लिया या ढंग से झाड़ दिया
गले-गले जब कभी भरा ही नहीं
फटने का डर क्यों लगता
फिर भी हो गया यह ढीला-ढाला, पस्त-एकदम झीना
खैर, आखिर में यह गत तो होनी ही थी
लेकिन अब डर है बेहद डर
भरे बाजार कहीं यह फट ना जाए
भरा सब सामान बिखर ना जाए
फिर तो बात बनेगी ही
लोग कहेंगे -
थैला था उसका तन
इतना जमा किया अगड़म-बगड़म
फटना ही था और फट गया।
रंगीन चश्मा
आंख का एक इशारा
कहर बरपा जाता है
हालांकि एक इशारे से
संवर भी सकता है जीवन
दरअसल आंख-आंख में फर्क है
आंख के इशारों में फर्क है
वह जब रोया तो
लोगों ने देखा कि
खून के आंसू रो रहा है
हालांकि उसने कहा
ये खुशी के आंसू हैं…
आंखें फट पड़ी थीं
उस बाइस मंजिला बिल्डिंग को देखकर
तब वाचमैन ने खैनी फटकारते हुए कहा था -
‘ऐसे क्या देख रहे हो
साल भर पहले यहां
एक बड़ी झोपड़पट्टी थी’
अब आंखें आदेश देती हैं
नाक से साधा जाता है निशाना
लेकिन असल समस्या तो
हिंसक आंखों को पहचानने की है
उन्हें समझने-जानने की है
मुश्किल यह कि ऐसी हरेक आंख में
रंगीन चश्मा है।
हरि मृदुल
उत्तराखंड में चंपावत जिले के बगोटी गांव में 4 अक्टूबर, 1969 को जन्म। अब तक पांच कविता संग्रह ‘सफेदी में छुपा काला’, ‘जैसे फूल हजारी’, 'बदले वक्त के मापक यंत्र', 'चयनित कविताएं', अंग्रेजी में अनूदित एक कविता संग्रह ‘You Are Worth Millions Sir’ (जनाब आप करोड़ों के हैं) और एक कहानी संग्रह 'हंगल साहब, जरा हँस दीजिए' प्रकाशित। इसके अलावा बाल साहित्य की दो पुस्तकों 'सपना एक मछली का' और 'चतुर बाज' का नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया से कुमाउँनी अनुवाद प्रकाशित। आईसीएसई और सीबीएसई बोर्ड के विद्यालयों में एक कविता कक्षा 2 और एक कविता कक्षा 5 के बच्चों को पढ़ाई जा रही है। एक व्यंग्य आलेख 'अतिथि कब बतियाओगे' केरल राज्य के हायर सेकंडरी स्कूलों में पढ़ाया जा रहा है। विभिन्न रचनाओं के मराठी, पंजाबी, उर्दू, कन्नड़, नेपाली, असमिया, बांग्ला, अंग्रेजी, रूसी और स्पेनिश आदि भाषाओं में अनुवाद हो चुके हैं।
सम्मान और पुरस्कार : महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का संत नामदेव पुरस्कार (2008), हेमंत स्मृति कविता सम्मान (2007), ‘कथादेश’ पत्रिका का अखिल भारतीय लघुकथा पुरस्कार (2009), कादंबिनी अखिल भारतीय लघुकथा पुरस्कार (2010), वर्तमान साहित्य कमलेश्वर कहानी पुरस्कार (2012), प्रियदर्शिनी पुरस्कार (2018), हिमांशु राय फिल्म पत्रकारिता पुरस्कार (2011), रामप्रसाद पोद्दार पत्रकारिता पुरस्कार (2019) , Afternoon Voice Best journalist Award (2023), डॉ. हरिवंश राय बच्चन कविता पुरस्कार (2024) और महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार (2024-25) प्राप्त हो चुके हैं।
संप्रति : नवभारत टाइम्स, मुंबई में सहायक संपादक हैं।
harimridul@gmail.com
मो. 9867011482
सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।






सभी कविताएं शानदार है।आवाज कविता लाजबाब है।सहज भाषा में लिखी कविताएं आकर्षित करती है।
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