Posts

Showing posts from 2026

विजयशंकर चतुर्वेदी की कविताएं

Image
                            विजयशंकर चतुर्वेदी  समकालीन कविता में विजयशंकर चतुर्वेदी का स्थान महत्वपूर्ण है।वे कम लिखते हैं लेकिन उनकी कविताएं भीड़ में अलग से पहचानी जा सकती हैं। यहां प्रस्तुत उनकी दस नई कविताएं इसका उदाहरण हैं। मनुष्य के जीवन और संघर्ष को त्रासदी से भर देने वाली व्यवस्था इतनी मजबूत और विध्वंसक हो चुकी है कि हर उस चीज को लील लेने को आतुर है जो उसके विरोध में है। कायरों की तरह की उनकी भूमिका को विजयशंकर चतुर्वेदी इतनी बारीकी से देखते और रचते हैं कि कुछ भी उनकी आंखों से ओझल नहीं हो पाता।इन कविताओं में रिश्ते नाते, घर, परिवार से  लेकर कवि की असफलता की तह तक वे पहुंचते हैं जहां परतों में छिपा गहन अन्धकार कुंडली मारकर बैठा हुआ है। फिर भी उन्हें उम्मीद है कि 'फुर्तीली चींटियों की कतार से  फिर एक नया सूरज जन्म लेगा।' इन कविताओं पर वरिष्ठ आलोचक सेवाराम त्रिपाठी की टिप्पणी भी कवि के परिचय के बाद है। विजयशंकर चतुर्वेदी की कविताएं  स्मृति का नरम घाव पिता के लौटने से पहले घर की साँस बदल जाती। ...

नरेश चंद्रकर की कविताएं

Image
  नरेश चंद्रकर  नरेश चंद्रकर की कविताओं में मिटते हुए की जो टीस है वह बहुत गहरी है। स्मृति, जीवन, रिश्ते और श्रम के सौंदर्य के बीच आवाजाही करती उनकी कविताओं में दधीचि और मुक्तिबोध एक साथ उपस्थित हैं। नरेश चंद्रकर की कविताएं  ऋषि दधीचि की तस्वीर से प्रेरित बहुत शालीन नहीं है वह तस्वीर  राजसी ठाठ दिखाई नहीं देते हैं  ना रईसी नज़र आती है उनमें  हड्डियों को याद है वे हुए थे  रक्त और मज्जा में सुनाई देती है आज भी  उनकी रुकती हुई सांसे  धड़कनों का हिसाब  भुजा की शिराओं में  एक अति प्राचीन लिपि में लिखा  फड़क रहा है  महसूस करने पर उन पर लिखा  पूरा शिलालेख हमारी नसों में  बांचा जा सकता है  यूं पूर्णतः अनुपलब्ध नहीं हुए हैं वे  अभी भी जब कोई हारने लगता है  हारती है आंखें  हारते हैं हाथ  हार मान लेती है किसी की तकलीफ  पिशाची ताकत से हिलती है उनकी तस्वीर आंखों में  वे सामने होते हैं  अपना पूरा शरीर त्यागते हुए आख़िर तो वे मेरे पूर्वज हैं  परन्तु देखो मेरे काम सब की तरफ पीठ किए बै...

उमा शंकर चौधरी की कहानी

Image
            उमा शंकर चौधरी  हमारे यहां हर गांव में एक ऐसा पेड़ होता है जिस पर भूत रहते हैं. ऐसी जमुनी फुआ भी होती है और एक बिछिया भी. हम उन्हें कहां खोज पाते हैं. न उन्हें पहचान पाते हैं. भूतहा पेड़ की स्मृति बनी रहती है आजीवन.  मेरे जीवन में इन तीनों की सघन स्मृति है. उमा भाई की कहानी पढ़ती रही हूँ.  कहानी के अंत तक पहुँचते -पहुँचते मैं बहनापे की उस आभा से भर गई जिसकी तलाश मेरा लक्ष्य है.  मैं बिछिया बनूँ न बनूँ… जामुनी फुआ ही बन जाऊँ या जीवन में एक ऐसी फुआ खोज पाऊँ जिसकी तलाश कहानियों में करती फिरती हूँ. यही काफ़ी है.  मैंने अपनी दोस्त से कहा था कि मेरे होते कोई स्त्री अकेली नहीं हो सकती. मैं साथ बनी रहूँगी. जामुनी फुआ जैसा पावरफुल किरदार बन जाना आसान नहीं. दो स्त्रियों का संग -साथ दुनिया का चेहरा बदल सकता है.  उमा भाई की कहानी लंबी है. सारे किरदारों के चरित्र को खूब विस्तार मिला है. पूरा परिवेश खुलता है और किरदार उभरते चले आते हैं.  जिन्हें लगता है, दुनिया नई हो गई है. बदल गई है, वो अपने संसार की असली हालत समझना चाहें त...