हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएं
हरीश चन्द्र पाण्डे
हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताओं की सबसे बड़ी खासियत उनकी भाषा,उनके मुहावरे और बेध देने वाली सादगी है जो बेचैन कर देती है।उनकी कविताएं एक तरफ तो मानवीय मूल्यों की पक्षधर हैं तो दूसरी तरफ सत्ता, व्यवस्था और पूंजी के प्रपंच के मकड़जाल को भी चिन्हित करती हैं।सीधे,सरल और मामूली विषयों पर लिखी उनकी कई कविताएं समकालीन कविता में अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं। यहां प्रस्तुत कविताएं भी इसी का उदाहरण हैं।
हरीश चन्द्र पाण्डे की नई कविताएं
सुनना और दीगर बातें
वह सुनने का असीम धैर्य लिए बैठा है
सबको सुनता है उनके चुक जाने तक
पक्षियों को पर फड़फड़ाने से लेकर
परों के भीतर चोंच समो लेने तक सुनता है
सरीसृपों को बिल के भीतर पूंछ सिमटाने तक
उसे आवाज़ें चाहिए बस
वह चुप्पी को श्मशान की बुझी राख कहता है
कोई आवाज़ नहीं आएगी तो - वह
नल की टोंटी थोड़ी ढीली कर देगा
उसकी सकारात्मकता कहती है
ऊपर टंकी का खाली हो जाना
नीचे किसी पात्र का भर जाना भी हो सकता है
इधर अचानक सुनने के विरुद्ध उसने यूं टर्न ले लिया है
कहता है बहुत हो गए हैं शब्द, आवाज़ें और ध्वनियां
मुझे अपने बोलने को चुप्पी में समझाओ
मुझे माफ़ी मांगने और माफ़ करने की भाषाएं नहीं मुद्राएं चाहिए
देखो! शब्दों के ढेर म्यूनिसिपल कूड़े की तरह खड़े हैं
बहार है कूड़ा बीनने वालों की
वह कहता है - पल भर में अमन बिगाड़ देने की वारंटी लिए
घटे दर पर उपलब्ध हैं शब्द
संपादित होने के बजाय अग्रसित हो रहे हैं।
किसी ने नहीं
उन्नत बीज को अपने पेड़ पर गर्व था
पेड़ को अपनी शाखों पर
आंधियां उलझ कर रह जाती थीं उनमें
पक्षियों के झुंड के झुंड उतर आते एक साथ
सघनता ऐसी
कि सूर्य का आतप हरित जाल में उलझ कर रह जाए
उसी पेड़ की एक शाख तड़क गई है आज जबकि उस पर लटकी काया एकदम इकहरी थी
सारे तमाशबीन उचक उचक अंदाज़ते रहे उस शरीर का वजन
उस पर लदे सूद - बोझ को किसी ने नहीं देखा।
लाइट हाउस
(केप ओटवे लाइट हाउस,ग्रेट ओसन रोड से गुजरते हुए)
विशाल जलराशि पर निविड़ अंधकार की चादर
सारी अमावसें आकर यहां इकट्ठा हो गई हैं
जुगनू सारे अवकाश पर चले गए हैं
भयावह नीरवता में ये लहरों के नाद-थपेड़े
और रह रह कर दूधियाते हुए तट
(या फिर कोई राक्षस रह रह कर दांत चियार रहा है)
शत्रु पोतो!
तुम्हें चीन्ह लिया गया है अच्छी तरह
कहां छुपोगे
मित्र पोतो!
रुक जाओ वहीं
आगे, दुश्मन के मित्र सा एक चट्टान है।
सुनना
कभी कभी अपने से ही कुछ कहना हो जाता है
स्वयं संबोधित वाक्यों का भी एक दूसरा सिरा होता है
भले ही यह एक अंतर्यात्रा हो
उस वाक्य का क्या
जो बोला तो गया हो दूसरे से
पर सुनने के पूर्व ही चला गया हो संबोधित
अधर में लटके ही रह जाते हैं कुछ वाक्य
वांछित कान नहीं मिलते उन्हें
इससे तो बेहतर वे वाक्य
जिन्हें सुनकर अनसुना कर दिया गया
यह बात दीगर है
अनसुनी कर दी गई आवाज़ों का भी एक कब्रिस्तान होता है
चाहे करोड़ों करोड़ आवाज़ें चीत्कार कर क्यों न कहें कुछ
यह बहरा होना कतई नहीं है
जो संकेतों को सुनने की बैशाखी बना लेते हैं।
फूलदेई
वृक्षों की देहरी से निकल आए हैं ये फूल
अब कोई देहरी ही
अपने अंकवार में समो सकती है इन्हें
गांव में देहरी देहरी घूम रहे हैं फूल से बच्चे
फूलदेई छम्मादेई उच्चरित करते हुए
और यह कहते हुए -
सूप भरे हमारा
और तुम्हारा बकार
लघुता की महत् कामनाएं तो देखो.....
(फूलदेई उत्तराखंड में चैत्र मास की संक्रांति को वसंत के स्वागत में मनाया जाने वाला लोकपर्व है जिसमें बच्चे घर घर जाकर देहरी में बुरांश आदि फूल चढ़ाते हुए मंगलकामना करते हैं।)
बंजरपन
जैसे ही बंद करता हूं आंखें
फसल लहलहाने लगती है खेत में
इसीलिए देर तक आंखें बन्द किए रहता हूं
शायद इसीलिए आंखें खुलने तक
कोई फसल काट कर ले गया होता है...
अब यहां
कोठा ख़ाली कराया जा रहा है
घुंघरुओं की छम छम न धिनाधिन तबले की
सारंगी की तान न हारमोनियम के स्वर
अब कुछ न होगा यहां
कोठा ख़ाली कराया जा रहा है
साज़िंदे उतर रहे हैं साज़ों के साथ
अदब और अदाएं लिए गणिकाएं
रसिक सब उल्टे पांव लौट रहे हैं
कोठा ख़ाली कराया जा रहा है
भारी मन लिए उतर रहे पांवों के बरक्स
सीढ़ी फलांगते चढ़ रहे हैं कुछ और पांव
तिलचट्टों से दलाल तदर्थ दरारों में छुप गए हैं आसपास
उनके कान कोठे की जानिब लगे हैं
जहां से दबंग अनुगूंजें आ रही हैं
लो- कोठा एकदम ख़ाली हो गया है
हां,अब यहां राज होगा एक दल का
नीति की नथ उतराई होगी।
नग्नता
आवरणों के ईजाद के बाद ही आई होंगी सारी गुप्तांग शब्दावलियां
जानवरों के लिए आज भी इनके कोई मायने नहीं
अंगों के वर्गीकरण - खेल ने रच डाला एक अलग ही समाज
जबकि पशु पशु ही रहे कोई नया समाज नहीं रचा
वहां कोई मुख से पैदा हुआ न पैरों से
मूल्यांकन के इसी कूट - खेल में
कुछ अंग इज्ज़त के पर्याय हो गए कुछ हेयता के
और इज्ज़त को चाहिए था आवरण सबसे पहले
जबकि सोच को पहले बचाना था नंगा होने से
हां, नग्नता का भी अपना एक अलग महात्म्य है
पेड़ों, और पदाकांक्षियो को बसंत-प्रवेश के पूर्व कपड़े उतारने होते हैं
और यह कथित इज्ज़त भी कम बहुलार्थी नहीं है
एक तार-तार तंगहाल गणिका कहती है
- गाहक आते रहते थे तो इज्ज़त बची रहती थी। *
*शैलेश मटियानी के उपन्यास ' बावन नदियों का संगम ' की एक वेश्या पात्र का कथन।
अस्पताल में बिल्ली
एक स्वस्थ बिल्ली सामने की दीवार फांद ओझल हो गई है
अब नेपथ्य से हवा में तैर रही है उसकी 'म्याऊं'
म्याऊं के ध्वनि-स्केल और टोन को तीमारदार
मरीज़ के भविष्यत् से जोड़ रहे हैं
अब ओट से आ रही झगड़ने की आवाज़ बता रही है
कि एक के लिए झगड़ती वे एकाधिक हैं
यूं तो कूद-फांदकर निकल ही जाती हैं इधर उधर
जहां ऐसा संभव नहीं
दबे पांव अपनी ज़ान बचा कर निकलती हैं आर से पार
पर लोग कहते हैं - हमारा रास्ता काट दिया है
एक मरीज़ स्वस्थ होकर लौट रहा है अपने घर
संतुष्ट तीमारदारों ने यह बात छुपा ली है
कि बिल्ली ने उनका भी रास्ता काटा था...
हरीश चंद्र पांडे
जन्म - 28 दिसंबर 1952
प्रकाशित कृतियां:- कुछ भी मिथ्या नहीं है, एक बुरुंश कहीं खिलता है, भूमिकाएं खत्म नहीं होतीं, असहमति तथा कछार - कथा ( कविता संग्रह)कलैंडर पर औरत तथा अन्य कविताएं, मेरी चुनिंदा कविताएं (चयन),दस चक्र राजा ( कहानी संग्रह),संकट का साथी (बाल कथा-संग्रह) कविता महाराजिन बुआ की पृष्ठभूमि में एक लघु वृत्तचित्र 'महाराजिन' निर्मित।
कविताओं के कुछ अनुवाद बांग्ला, तेलुगू, ओड़िया, मराठी, पंजाबी, अंग्रेजी, मैथिली आदि भाषाओं में प्रकाशित। कुछ कथेतर गद्य पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित।
शमशेर सम्मान,केदार सम्मान, सोमदत्त सम्मान, ऋतुराज सम्मान, मीरा स्मृति सम्मान, हरिनारायण व्यास हिन्दी काव्य पुरस्कार और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से पुरस्कृत।
भारतीय लेखा तथा लेखा परीक्षा विभाग से सेवानिवृत्त
मोबाइल - 9455623176
Harishchandrapande@gmail.com
सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।







हरीश चन्द्र पाण्डे विलक्षण कवि हैं।निरंतर जीवन संधान में सन्नद्ध,एकांत साधक।
ReplyDeleteहरीश चन्द्र पाण्डे साहब को साधुवाद। उन्होंने "अब यहाँ " के माध्यम से सत्ता के निर्मम स्वरूप का सजीव चित्रण किया है।
ReplyDeleteकोठा यहाँ लोकतंत्र का रूपक लगता है जहाँ सभी समुदाय के लोग आते रहे हैं। इसको खाली कराना एकदलीय व्यवस्था कायम करने की प्रवृति को दर्शाता है।
"वह चुप्पी को श्मशान की बुझी राख कहता है "
ReplyDeleteनग्नता
बंजरपन
सभी कविताएं अच्छी।
बधाई पाण्डे जी।
शानदार।
ReplyDeleteबहुत अद्भुत कविताएं हैं।
ReplyDeleteपढीं कविताएं आँखें बंद किये बिना और बंद करके, दिखी देश-दुनिया में तडपती मानवता और उत्तर की खोज में निकले वीरों की निराशा महसूस की। बधाई
ReplyDeleteअच्छी कविताएं!
ReplyDeleteहरीश चंद्र पाण्डेय की कविताएं अद्भुत हैं, काव्य- विवेक से खोजी गई जीवन- सत्यों की भूमि से समकालीन यथार्थ पर रौशनी फेंकती। सुगठित, एक भी वर्ण अतिरिक्त नहीं।कवि और कौशिकी को धन्यवाद।
ReplyDeleteमनोज कुमार झा
बहुत सुन्दर कविताएं।
ReplyDeleteगहन संवेदना और सघन वैचारिकी का अद्भुत संयोजन हरीश पाण्डेय जी की कविताओं को विशेष बनाता है।
ReplyDeleteकविता यदि प्रथम पाठ में ही सम्प्रेषित हो जाए तो यह कवि की अद्भुत क्षमता और समझ की परिचायक है।
बधाई 🙏
अपने अनूठे कहन शैली में विचारणीय बातों को सार्थक शब्दों में सहज ढंग से पिरोने वाले प्रतिष्ठित कवि श्री पाण्डेय जी की महत्वपूर्ण कविताएं बरबस ध्यानाकर्षित करने की क्षमता से भरपूर हैं।किसी ने नहीं कविता में उन्होंने वास्तविकता को देखने का अच्छा आग्रह किया है बोलने और सुनने की प्रतिक्रियाओं पर केन्द्रित कविता सुनना अद्भुत अनुभव से पूर्ण है जहां सचमुच क ई बार अधर में लटके वाक्यों को कान नहीं मिल पाते इससे अच्छे वे वाक्य तो बेशक हैं जो सुनकर अनसुना कर दिये जाते हैं।
ReplyDeleteबंजर पन कविता बंद आंखों में लगातार आ और जा रहे दृश्यों के उल्लेख की कविता है वहीं अब यहां कविता समय के निरंतर प्रवाह में जीवन में बदलाव के पलों को रेखांकित करने वाली रचना है।सभी महत्वपूर्ण रचनाओं के लिए आदरणीय श्री पांडेय जी को बहुत बहुत शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं।
सभी अद्भुत कविताएं लगी मुझे।चाहे वह अस्पताल में बिल्ली कविता हो कि वह सुनना और दीगर बातें कविता हो ।
ReplyDeleteहरीश चन्द्र पाण्डे की यहां प्रस्तुत सभी कविताएं अथवा संग्रहों की उनकी सभी कविताओं में किसी काव्य विषय में कभी भी क्या हुआ से हटकर ,कैसा लगा की बात पर कविता होती है इसीलिए मुझे उनकी कविताएं मन को छू लेती है ।
अब जैसे सुनना और दीगर बातें
कविता में बहुत अच्छा सुनता है कहने के लिए कविता में वे कहते है कि वह
सबको सुनता है उनके चुक जाने तक / पक्षियों को पर फड़फड़ाने से लेकर /परों के भीतर चोंच समो लेने तक सुनता है
इन पंक्तियों में हरीश जी की अद्भुत रचनाशीलता चकित कर गई मुझे।
इस प्रकार के क्राफ्ट को रचने हुए कविता नए नए शब्द बुन लेती है जैसे यह पढ़कर नया शब्द अंदाज़ते बना है
तमाशबीन उचक उचक अंदाज़ते रहे उस शरीर का वजन
हरीश जी की कविता का कर्म है कि वह अपने आसपास की जीवन पदछाप को अनदेखा होने नहीं देती है इसलिए हरीश पाण्डे फूलदेई कविया लिखते हैं ताकि बच्चे अलक्षित नहीं रह जाएं कविता की नज़र से ।
यह कविता फूलदेई की भावना को उजागर करने लिखी गई है।यह कविता उत्तराखंड में चैत्र मास की संक्रांति को वसंत के स्वागत में मनाया जाने वाला लोकपर्व है जिसमें बच्चे घर घर जाकर देहरी में बुरांश आदि फूल चढ़ाते हुए मंगलकामना करते हैं।
सृजनात्मकता सीखने की पाठशाला जैसी प्रतीत हुई मुझे ।
अभिनंदन कवि हरीश चन्द्र पाण्डे ।
हरीश चंद्र पांडे सर की कविताओं से यह मेरा प्रथम परिचय है. किन्तु इस पहली मुलाक़ात ने मुझे उनकी कविताओं में एक आश्वस्ति नजर आई. सभी कविताएं अपने अर्थ लिए अपनी साफगोई के साथ पाठकों से रूबरू है. कविता *अब यहाँ* व *अस्पताल में बिल्ली* काफ़ी अच्छी लगी. इन कविताओं का आस्वाद अल्हदा है. कवि को बधाई 💐
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