विजयशंकर चतुर्वेदी की कविताएं

 

                          विजयशंकर चतुर्वेदी 



समकालीन कविता में विजयशंकर चतुर्वेदी का स्थान महत्वपूर्ण है।वे कम लिखते हैं लेकिन उनकी कविताएं भीड़ में अलग से पहचानी जा सकती हैं। यहां प्रस्तुत उनकी दस नई कविताएं इसका उदाहरण हैं। मनुष्य के जीवन और संघर्ष को त्रासदी से भर देने वाली व्यवस्था इतनी मजबूत और विध्वंसक हो चुकी है कि हर उस चीज को लील लेने को आतुर है जो उसके विरोध में है। कायरों की तरह की उनकी भूमिका को विजयशंकर चतुर्वेदी इतनी बारीकी से देखते और रचते हैं कि कुछ भी उनकी आंखों से ओझल नहीं हो पाता।इन कविताओं में रिश्ते नाते, घर, परिवार से लेकर कवि की असफलता की तह तक वे पहुंचते हैं जहां परतों में छिपा गहन अन्धकार कुंडली मारकर बैठा हुआ है। फिर भी उन्हें उम्मीद है कि 'फुर्तीली चींटियों की कतार से फिर एक नया सूरज जन्म लेगा।'

इन कविताओं पर वरिष्ठ आलोचक सेवाराम त्रिपाठी की टिप्पणी भी कवि के परिचय के बाद है।




विजयशंकर चतुर्वेदी की कविताएं 



स्मृति का नरम घाव

पिता के लौटने से पहले
घर की साँस बदल जाती।
साँझ दरवाज़े पर ठहरती।
आहट भीतर तैर आती।

हम नन्हें हाथों से
पिता के थैले में उतर जाते—
जो अभी रास्ते में था।
केले की भुसावली गंध,
इलाहाबादी अमरूद का स्वाद,
पेठे के पारदर्शी पिरामिड 
कल्पनाओं में झिलमिलाते।

पिता मुस्कान पहनकर आते—
हल्की, धूसर मजबूरी की तरह
हम सबसे पहले थैले पर झपटते
और वह हर बार माफ़ कर देता।
कभी कुछ निकलता
तो आँगन भर जाता
कभी खाली मुंह खोलता
तो सीढ़ियां सुस्त पड़ जातीं।
माँ दाल में आँसू मिला देती
रोटी की भाप कम बोलती।
पिता देर तक बैठे रहते—
हथेली से धनरेखा की धूल छुड़ाते हुए। 

जब साँझ टूटी हमारी पीठ पर
थैला हमारे हाथ आया
बाज़ार ने आवाज लगाई—
खुरचन, सिंघाड़े, जलेबी ईईई—
जैसे यादें अब भी सजी हो ठेलों पर।
जिस दिन जेब चुक जाती—
घर लौटना धूमिल पड़ जाता
दरवाज़ा तपस्वी की तरह खुलता
बच्चे मुस्कुराते किताबों में छिपते हुए
भीतर कुछ दरक जाता।

जब बच्चे पहचान जाते हैं—
पिता के मन का रंग
वह अपनी नज़रों में छोटा हो जाता है,
और उसी क्षण थोड़ा बड़ा भी,
क्योंकि प्रेम
खाली हाथों में भी बचा रहता है।
हम बचे रहे—
कुछ थैलों से,
कुछ हाथों से,
कुछ अधूरी प्रतीक्षाओं से।

हर घर में
एक शाम ऐसी होती है
जब कोई बच्चा
पिता से पहले
उनकी जेब समझ लेता है
कुछ थैले हम भरते हैं
कुछ बच्चे हमें भर देते हैं। 

देहरी पर अब भी
एक बचपन बैठा है
जाते हाथों से
आने वाली हथेलियों तक
पिता की मुस्कान ले जाता हुआ।



दरार में रोशनी

वे कायरों की तरह चुपके आए
जैसे अंधकार झपटे दीपक की लौ पर
उन्होंने फेंक दिया अचानक—
कूड़े का एक वाक्य
इतिहास की खुली किताब पर। 
पानी उछाला गया
पर वह भीगना नहीं था,
वह असफल साज़िश थी—
शब्दों को डुबो देने की, 
वे भूल गए—
विचार काग़ज़ नहीं होते,
जो भीगकर गल जाएँ;
वे तो अग्नि के वे बीज हैं
जो अंकुरित हो जाते हैं हर जल में। 

दीपक जलता रहा—
जैसे कोई नदी
पत्थरों के अपमान से विचलित नहीं होती,
जैसे एक शिक्षक
संयम की ज्योति बना लेता है
अपनी वाणी को।
अज्ञान का हमला
केवल एक ज्ञानी पर नहीं था—
भाषा की गरिमा पर था,
विवेक की प्रतिष्ठा पर,
और उस स्वप्न पर
जिसे हम कहते हैं- विश्वविद्यालय।
उन्होंने सोचा होगा—
इतिहास झुक जाएगा अपमान से,
विचार कांप उठेंगे भयातुर ;
पर इतिहास का कंधा
इतना हल्का नहीं होता,
और विचार इतने अकेले नहीं होते।
हर डस्टबिन के पार
एक पुस्तकालय खड़ा होता है,
हर गंधैले छींटे के पार
एक वाक्य चमकता है,
और हर हिंसा के पार प्रतिरोध
खोज लेता है—
अपनी सबसे अहिंसक भाषा।
हम वहीं खड़े मिलेंगे—
जहाँ शब्द पड़े हैं लहूलुहान,
हम उन्हें फिर से रोपेंगे,
जैसे कोई किसान
बीजमारी के बाद भी बोता है अनाज
धरती में और गहरे।
हम अंकुरित होंगे
एक उज्ज्वल वन की तरह,
रोशनी लौटेगी
अंधकार में दरार बनाती हुई, 
फुर्तीली चींटियों की कतार से
फिर एक नया सूरज जन्म लेगा।




असफल कवि

वह छटपटा रहा था ढूँढ़ने को कोई संपूर्ण अक्षर,
कोई गुँजायमान शब्द, कोई अकार-मकार, 
और इनसे बना ऐसा अर्थपूर्ण वाक्य
जो करीने से ढो सके उसकी व्याकुलता का भार।

क्षितिज पर उसके हाथ कुछ भी नहीं लगा
धुएँ में उड़ते पंख से वह इतना ही लिख सका- 
‘आसमान से अनगढ़ शिलाखंड बनकर
एक गिद्ध गिर रहा था सीधे धरती पर।’

असंतुष्ट होकर उसने ली बड़ी गहरी साँस
और जा बैठा बूढ़े बरगद की जड़ों के पास-
‘मुझे ले चलो उधर, जिधर व्याप्त है गहन अंधकार
जहाँ बेख़ौफ़ विचरण करते हैं नराधम, निर्विकार।’

उसके दिमाग़ को इन पंक्तियों ने जकड़ लिया
अकबका कर उसने समंदर का रुख़ कर लिया
जहाँ अब भी खड़ा था एक टाँग पर ऊर्ध्वगामी विचार
जिसके साये में जारी था शब्द-साधना का कारोबार।

वहाँ कितनी ही लहरें, कितने ही जलपोत
कितनी ही बुलबुलें, कितने ही खद्योत
खनखना दिया करते थे कवि का शब्द भंडार!
लेकिन दग़ा दे रहा है कवित्व का कार्य व्यापार!

चारों तरफ जमी हुई थी उच्चारणों की बरफ़
वह निकल गया माजी के खंडहरों की तरफ़
लेकिन दूर-दूर तक दिखा नहीं कोई शाहकार
साबुत नहीं बचा था भाषा का कोई कछार।

शायद वह बीज बो देता यादों और घटनाओं के
जो गीत बन जाते उत्खनन से प्राप्त सभ्यताओं के
वह ग़रीबी की आदी किसी गृहिणी के उदास स्वर में
लौट गया काग़ज़ समेट कर अपने ही परित्यक्त घर में।

तभी एक सार्थक-सा वाक्य हवा में तैरता हुआ आया
लेकिन वह उसे कभी भी कहीं दर्ज़ नहीं कर पाया!



आप कौन से चर हैं?

काले, पीले, ताम्बई और असंख्य मुरदार चेहरे
फिर उतार दिए गए हैं ग़रीबी के दलदल में।
वे खा रहे हैं भात में पानी मिलाकर
बिछा रहे हैं आपके लिए सुविधाएँ
अंतहीन सड़कें खोद कर, पाट कर, फिर खोद कर
कुचले जा रहे हैं गाड़ियों के नीचे दिन दहाड़े
मसले जा रहे हैं फुटपाथों पर चूज़ों की तरह।

क्या वे सिर्फ भात और पानी के लिए आए हैं घर बार त्यागकर?
क्या बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण से इसका कोई मेल नहीं?
या उनके बल और पराक्रम को सभ्यता ने दे रखा है बनवास?
आप किस निगाह से देखते हैं इन ख़ानाबदोश मतदाताओं को?

देखिए, वे एक घेरे के बीच होलिका दहन कर
नाच रहे हैं तालियाँ बजाते हुए
स्त्रियाँ झूम रही हैं शिशुओं को पीठ पर बाँधे हुए
गा रही हैं अपनी ही बोली में कोई गीत
या रो रही हैं अपने बिछड़े फागुन की याद में!

आप छाँट रहे हैं उन्हीं में से उबलता सौंदर्य
जो उभरा है श्रम और शक्ति के रक्तबीज से
जिसके दम पर आपका नगर
होता जाता है सुंदर से सुंदरतम्‌
लेकिन काम निकल जाने पर वही सौंदर्य
आपको नज़र आने लगता है अवांछित और अपराधी!

आप निकाल देना चाहते हैं उन्हें अपने सुगंधित साम्राज्य से
भूल जाते हैं कि उनके ही पुरखे
काँटों का मुकुट धारण करके
आपके लिए ढाल रहे थे इतिहास के राजपथ
पैदल सेना के सिपाही बनकर 
शत्रु के सामने तान देते थे अपना भीष्म-सीना
युद्ध के मैदानों में घायल आपके पुरखों को
सुरक्षित निकाल लाते थे संगीनों के बीच से
अपने घावों की परवाह किए बिना
लगाते थे संजीवनियों के लेप
अंगों को अंगों से जोड़ देते थे अपनी विद्या से।
गिट्टी-मिट्टी का टोकरा थामे खड़ी उस स्त्री का बच्चा
बिलख रहा है भूख से
लेकिन आपकी पारखी नज़र गड़ी हुई है
उसके उभरे स्तन पर
उसकी पीठ पर बँधे बच्चे की रुलाई
आपके दिमाग़ में अपनी औलाद का चेहरा नहीं कौंधाती
आपके लिए तो उस निर्माणाधीन संकुल में
साक्षात्‌ रम्भा खड़ी हुई है।

कौन जाने इस मंजर की भी कोई कलाकृति बन जाए
जो देस-विदेश में ऊँचे दामों बिक जाए
पर यह आपकी कैसी निगाह है मनुष्यता की
मुझे शक है आपके मनुष्य ही होने पर
आप जलचर हैं, थलचर हैं, नभचर हैं या उभयचर?



मयार

जब राह चलते कोई गिरता है गड्ढे में
तो गड्ढे को बेहद अफ़सोस होता है
यों तो राह में गड्ढे का अस्तित्व
स्वयं ही पतन की पराकाष्ठा है
लेकिन यह गड्ढे की सदाशयता है
कि वह मनुष्य को उसके पतन का मयार बताता है।
जब कोई पत्ता डाल को छोड़ता है
तो धरती चूम लेने की उसकी खास अदा होती है
कोई फूल डाली से तोड़ा जाता है
तो उसके तड़पने की एक सदा होती है
लेकिन यह हवा की सदाशयता है
कि वह सृष्टि के हिल उठने का मंजर दिखाती है।
जब कोई पेड़ उदास होता है
तो राही के लिए उसकी बेचैनी बढ़ जाती है
फिर भी हम बैठे रहते हैं उसकी छाँव में
और फलों का आनंद लेते हैं
यह पेड़ की सदाशयता है
कि वह मनुष्य और प्रकृति के रिश्ते सह जाता है।
हमारी अच्छाइयों-बुराइयों के धागे
जुड़े हुए हैं भूत-वर्तमान-भविष्य से
लेकिन जब आत्मा का पतन होता है
तो खंडहरों में भी बज उठती हैं घंटियाँ
ये हमारे पुरखों की सदाशयता है
कि वे रगों में बहती क्रूरता के गुणसूत्र सुलझाते हैं।

हमारी नैतिकता जब गोते खाने लगती है घाटियों में
तो कोई बेकल परिंदा चोटियों पर फड़फड़ाता है
और गौरैया के बच्चे की तरह गरदन दबोचकर
हमें हमारे गुंबदों पर छोड़ जाता है
यह आसमानी उड़ान की सदाशयता है
लेकिन हमारी गिरावट का कोई मयार ही नहीं है।



हर पायदान पर एक चेहरा छूटता है

दोस्ती दो आत्माओं के बीच थरथराता वह जल है
जिसे कोई नाम नहीं दिया जाता
प्यास के समय दोनों हथेलियाँ साथ झुकती हैं
और एक-दूसरे की छाया पी ली जाती है

कभी-कभी
एक मनुष्य इस सरोवर के किनारे आता है
अपनी थकान उतारता है
और पत्थरों को जोड़कर
बनाने लगता है सीढ़ियाँ
किसी अदृश्य ऊँचाई की ओर
पत्थर धड़कते हैं
उनमें उँगलियों की गरमाहट रहती है
जिन्होंने कभी विश्वास से उन्हें छुआ था

वह ऊपर चढ़ता है
हर पायदान पर एक चेहरा पीछे छूटता है
जैसे खिड़कियाँ धीरे-धीरे बंद होती जाती हों
और भीतर दीपक जलता रह जाए
बेआवाज़

ऊपरी हवा में किसी दूसरी ऊँचाई की ठंडक होती है
आवाज़ें लौट-लौट कर दीवारों से टकराती रहती हैं
जैसे कोई अदृश्य पक्षी
अपनी ही गूँज को देर तक
आकाश में थामे रहता हो
और अकेलापन एक पारदर्शी वस्त्र की तरह
कंधों पर उतर आता है

फिर एक दिन
वह मुड़कर देखता है
जिन रास्तों से गुज़रा था
वे अब पीली घास से ढँक चुके हैं
और जिन लोगों को उसने पुकारा था कभी
वे अपने-अपने आकाश में व्यस्त
शांत और दूर टिमटिमा रहे हैं

दो मन
एक-दूसरे को सीढ़ी नहीं बनाते—
धरती की तरह थामे रहते हैं
जहाँ खड़े होकर गिरने से पहले
कोई अपना नाम सुन सके
कुछ बातें
ओठों तक आते-आते धूप हो जाती हैं
और चुप्पी की तहों में रखी रहती हैं
जैसे पुरानी किताब में दबा कोई पत्ता
जिसकी गंध
बिना बोले भी साथ चलती है

शिखर की हवा में एक क्षण ठहरकर
वह अपने ही पाँवों की थरथराहट सुनता है
नीचे से आती कोई प्राचीन पुकार
धुंध की तरह उसके चारों ओर फैलती है
और दूर घाटियों में
अब भी कोई हथेली उठती है उसकी ओर—
वह ठहरता है
और पहली बार
नीचे की ओर मुड़ता है।



नश्वरता की अनंत स्याही

शब्द चट्टान नहीं,
नदी हैं—
अपने ही अक्षरों को घिसते,
अपनी ही बुनावट को तोड़ते,
अपने ही कछारों को त्यागते।
कभी उँगलियों की स्याही में बसते,
कभी ताड़पत्र की नसों में काँपते,
कभी छापाख़ाने की धड़कन पर दौड़ते,
कभी स्क्रीन की रोशनी में बिना देह के चमकते।
मनुष्य कहता रहा—
लिखा हुआ अमर है,
और काल मुस्कराता रहा
अमरता की हर लिपि को नई लिपि में अनुवाद करते हुए।
कहाँ हैं वे आवाज़ें
जो पत्थरों पर खुदी थीं?
कहाँ हैं वे हाथ
जो हर सुबह अक्षरों को पवित्र जल से धोते थे?
कहाँ हैं वे नगर
जहाँ एक पांडुलिपि के लिए जीवन दाँव पर लग जाता था?
सब बदल जाता है—
जैसे हल बदल गया,
जैसे चूल्हे की आँच बदल गई।
एक दिन हाथ ने लिखना छोड़ा,
मशीन ने लिखना शुरू किया।
एक दिन मशीन ने छापना छोड़ा,
पिक्सल ने छापना शुरू किया।
एक दिन पिक्सल ने चमकना छोड़ा,
किसी अदृश्य तरंग ने अर्थ को सीधे मस्तिष्क में बो दिया।
और हर बार
मनुष्य ने कहा—
यही अंतिम है,
यही शाश्वत है,
यही बिना जिसके जीना असंभव।
पर आदतें भी देह की तरह नश्वर,
स्मृतियाँ भी मौसम की तरह चलायमान,
पूर्वजों की भाषा
अबूझ कोड की तरह पढ़ी जाती है।
कभी समाचार बिना काग़ज़ के,
कभी शब्द बिना ध्वनि के—
और फिर भी
कहीं कोई लिखता रहा—
उँगली से धूल पर,
नाख़ून से दीवार पर,
पलक से हवा पर—
सिर्फ इसलिए
कि बदलना मनुष्य की नियति है,
और मिटाकर फिर बनाना भी।
अमरता कोई गुण नहीं—
एक क्षणिक भ्रम,
जैसे दीपक सोचता है कि लौ स्थिर है,
जैसे नदी सोचती है कि जल एक ही है।
तकनीक हर बार आई
और आदतों की नस्लें बदल दीं,
भाषाओं की जीभें बदल दीं,
इतिहास की पीठ पर नया हाथ रख दिया।
टाइपराइटर की टंकार
संग्रहालय की खामोशी में सोती है,
प्रेस की सूखी स्याही
पुरानी अलमारी में बंद है,
काग़ज़ की चरमराहट
नई पीढ़ी के लिए अजनबी ध्वनि।
आगे एआई की आँखें भी पुरानी लगेंगी,
स्मृति को भी किसी दीगर यंत्र की ज़रूरत होगी,
जहाँ मनुष्य अपना ही लिखा पहचानने में देर करेगा—
वहाँ भी कोई कहेगा,
शब्द अमर हैं…
और काल फिर मुस्कराएगा।
अमर कुछ नहीं—
सिवाय परिवर्तन के।
और लिखा हुआ शब्द भी
बस एक पड़ाव,
एक अभ्यास,
दिमाग़ की देह पर उभरा एक ख़ूबसूरत दाग़
जो मिटेगा—
जैसे हड़प्पा मिटा,
जैसे देवताओं के नाम बदले,
साम्राज्य गिरे —
धर्म भी चोला बदलते रहे।
और फिर किसी अगले दौर में
मनुष्य बिना काग़ज़,
बिना पुस्तक,
बिना स्क्रीन,
बिना अक्षर भी
अर्थ से भरा हुआ होगा—
लिखे बिना भी रचता हुआ,
पढ़े बिना भी सीखता हुआ,
नश्वरता की अनंत कूची से
अपनी ही क्षणभंगुर अमरता दर्ज़ करता हुआ।


हत्यारों का हुनर बचाने के लिए

सूरज उगने की कोई ख़ुशी नहीं,
चाँद ढल जाने का कोई ग़म नहीं,
चाय में कोई ज़ायक़ा नहीं रहा,
औलाद को चूमने का कोई मन नहीं।

मिलने-बिछड़ने की मिट गई है हर आस,
आपके अभिवादन का कोई जवाब नहीं है मेरे पास,
दरवाज़े पर खिला फूल मेरे मन को बुझा रहा है,
मैं मुतमईन नहीं कि कौन आ रहा है, कौन जा रहा है,
ये इल्म नहीं है कि हुक़ूमत को बदले अभी कितना वक़्त हुआ है,
ये अहसास है कि औक़ात में रखने का इंतजाम बड़ा सख़्त हुआ है। 

आम मौतों के बीच उदास हैं जघन्य हत्याएँ,
महामारी शर्मिंदा कर रही है उन्हें काली माँ का खप्पर छीनकर,
हुक़ूमत व्याकुल है अपनी कला के कुंद हो जाने के डर से,
उसे नहीं मिल पा रही है हत्या की रचनात्मक संतुष्टि,
वह ख़ुफ़िया निगाहों से कर रही है हमारी देशभक्ति की पुष्टि,
और आवाहन करती है कि देश बलिदान माँगता है!

हुक़ूमत की पहली प्राथमिकता है- कलाओं का संरक्षण,
फिर चाहे वह हत्या की कला ही क्यों न हो!
चलिए, हुक़ूमत का इस नेक और तारीख़ी काम में हाथ बँटाएँ,
इस नाशाद-ओ-नाकारा ज़िंदगी को देश के काम लाएँ,
इसके पहले कि इंक़लाबी कविताएँ हम पर नाज़िल होना शुरू हों,
आइए, हत्यारों का हुनर बचाएँ!

नया ईंधन

मैं अघोरी नहीं,
न कोई तांत्रिक—
मैं तो बस
अपने महान देश का
एक
राख में डूबा बालक हूँ, 
जिसका चूल्हा
भूख से मारा गया है।

पेड़ एक-एक कर गए,
कुछ कुल्हाड़ियों के साथ,
कुछ सौदों में,
कुछ उन हाथों में
जो छाँव नहीं,
बस क़ीमत पहचानते थे।

हर तरह का ईंधन
सबसे पहले घर से गया,
फिर गाँव से,
फिर जंगल से—
और आख़िर में
स्मृति से भी मिट गया।

जीना ख़ुद-ब-ख़ुद
मुझे वहाँ ले गया
जहाँ आदमी
अपनी आख़िरी आग में
स्नान करता है।

घर आकर चुपचाप
माँ के सामने रख देता हूँ
चिता से जुटाया ईंधन—
आग बुझाकर,
हड्डियाँ छाँट,
अधजला कोयला चुनकर।

वो भी कुछ नहीं पूछती,
बस उन कोयलों में
धीरे-धीरे फूँक मारती है
जिनमें किसी की अंतिम साँसें 
अभी भी दहक रही हैं।

रोटी पकती है
और हम दोनों खाते हैं,
उस आग के स्वाद में—
जिसमें
अंतिम बार देह
अपना मैल छुड़ाती है,
अब यही हमारा ईंधन है।


यह स्वाद हमारा नहीं

पाँच सितारा होटल की रोशनी में
सजी हुई एक चमकदार दुनिया।
पहला कौर मुँह में गया
और हमने कहा—
“वाह! अद्भुत!”
“यह तो स्वर्ग का स्वाद है…”
थाली में सब कुछ परिपूर्ण—
मापा हुआ, सजाया हुआ।
तोते की जीभ जैसा चावल का दाना
हमारी जीभ तक आने से पहले
एक झुकी हुई पीठ था।
दाल में घुला स्वाद
सूखी हथेलियों की दरारों से निकला था।
सब्ज़ी की हरियाली
किसी और की थाली से गायब थी।
हमारी प्लेट की सजावट,
मसालों का संतुलन,
शेफ की कला—
क़ाबिल-ए-तारीफ़।
जब बिल आया—
हमने सिर्फ रकम देखी,
जबकि स्वाद अकेला नहीं आया था।
खेत के पसीने तक
कोई टिप नहीं पहुँची।
मेन्यू में
किसी हाथ का एहसास दर्ज नहीं।
फिर भी
हमने चुप्पी चुनी।
क्योंकि सच
हमारी भूख से बड़ा नहीं था,
और तृप्ति—
हमारी नैतिकता से ज़्यादा तात्कालिक।
यह जो स्वाद है—
हमारा नहीं है।
अब हम “वाह” कहें—
तो यह दृश्य
हमारे भीतर उठे—
धूप में झुलसा एक बच्चा,
अपने पिता के पीछे-पीछे
खेत की मेड़ों पर चलते हुए कहता है—
“बाबा, एक मुट्ठी चावल अपने लिए रख लूँ?”






विजयशंकर चतुर्वेदी 

हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि, पत्रकार और वैचारिक लेखक हैं। उनका लेखन साहित्य, राजनीति और समाज के अंतर्संबंधों की पड़ताल करता है। उनका मानना है कि तरल नागरिक विवेक को सूक्ष्मता से सक्रिय रखना, साहित्य का वास्तविक कार्य है।
मध्यप्रदेश के सतना जिले की नागौद तहसील के ग्राम आमा में 15 जून 70 को जन्मे विजयशंकर ने अभिव्यक्ति के सभी आयामों को कुशलता से स्पर्श किया है। विविध समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, स्तंभों, टीवी, रेडियो, उपन्यास, कहानी, कविता, पुस्तक-संपादन जैसे कई माध्यमों एवं विधाओं में वह प्रखरता से व्यक्त हुए हैं। उन्होंने नया सिनेमा, जनसत्ता, प्लस चैनल, रिलायंस कम्युनिकेशंस, टारगेट पब्लिकेशंस आदि संस्थानों को अपनी दीर्घ लेखकीय-पत्रकारीय सेवाएं दीं।
प्रमुख कार्य:
उपन्यास: 'विदूषक', जनसत्ता की सबरंग पत्रिका में धारावाहिक प्रकाशित (1995-96)। 
कविता संग्रह: 'पृथ्वी के लिए तो रुको', राधाकृष्ण प्रकाशन (2009)।
पुस्तक संपादन: 'समय के सुलगते सरोकार'- लोकभारती प्रकाशन, लेखक: डा. सेवाराम त्रिपाठी (2019), 'देशनामा-गांवनामा'- राधाकृष्ण प्रकाशन, लेखक: देवीशरण‌ सिंह ग्रामीण (2023).

संपर्क -9967354059



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विजय शंकर चतुर्वेदी की काव्य - संवेदना 

                                           -सेवाराम त्रिपाठी 

आज लिखी जा रही कविताओं का कैनवास बहुआयामी है। कई कवियों की कविताओं प्रतिरोध के स्वर हैं और असहमति का रचनात्मक साहस भी विद्यमान है। जिनमें बेचैनियां और चिंताएं काफ़ी खुलकर व्यक्त हो रही हैं। वहाँ स्मृतियां भी हैं और यथार्थ भी। कविताएं व्यंजना के भीतर और बाहर से समय के घमासानों से हमें रूबरू कराती हैं। कभी कभी वो छापामार कार्रवाई भी करती सी लगती हैं।
जब विजयशंकर चतुर्वेदी की कविताओं को देखता - पढ़ता हूँ, तो सबसे पहले मुझे उनमें एक गहरी नैतिक बेचैनी और अपने समय में पनप रही स्थितियों से तीखी असहमति की उपस्थिति दिखाई देती है। उनकी कविताएं समय - समाज और संस्कृति के तापमान की कविताएं हैं। कवि इसमें बिंधा हुआ है। ये कविताएं दरअसल उनकी सृजनात्मक संवेदना और वैचारिकी की सघन प्रतिक्रियाएं हैं।ज़ाहिर है कि ये कविताएँ किसी सुरक्षित काव्य-आश्रय में नहीं ठहरतीं, न कोई विशेष प्रकार का ठीहा ही बनातीं बल्कि हिंसा, असमानता और विडंबना के बीच सीधे उतरकर बोलती - बतियाती और संवाद करती हैं। जो संवाद एकदम निर्वीर्य कर दिए गए हैं, उन्हीं को गंभीरता से कायम करती हैं।
‘ हत्यारों का हुनर बचाने के लिए ‘ में व्यंग्य एक धारदार औज़ार बन जाता है, जो सत्ता की क्रूरता को उसकी ही भाषा में उजागर करता है। ‘ नफ़रत से नफ़रत’ कविता नफ़रत को एक फैलती हुई संरचना की तरह पकड़ती है, जो भीतर और बाहर दोनों जगह विश्वसनीयता से काम करती है। ‘ असफल कवि’ में सृजन का संकट दरअसल भाषा और अर्थ के संकट में बदल जाता है।एक पंक्ति उद्वेलित करती है - दगा दे रहा है कवित्व का कार्य व्यापार ‘।जबकि ‘ आप कौन से चर हैं?’ कविता श्रम और मनुष्यता के प्रश्न को इस तरह सामने रखती है कि पाठक की नैतिक स्थिति अस्थिर हो उठती है। उसे जीवन यथार्थ की स्थितियों से संबद्ध किया जाए।वह प्रश्न भी करती है कि - ‘आप किस निगाह से देखते हैं इन खानाबदोश मतदाताओं को। कवि व्यवस्था की नब्ज़ पकड़ लेता है।
‘मयार’ में प्रकृति के बिंबों के माध्यम से नैतिक गिरावट का दार्शनिक विस्तार मिलता है और ‘ हम सबके दर्शक होते हैं’ जीवन को एक सतत दृश्य और आत्म-परीक्षण में बदल देती है। ‘ हर पायदान पर एक चेहरा छूटता है’ संबंधों और महत्वाकांक्षा के बीच के सूक्ष्म क्षरण को पकड़ती है, वहीं ‘ स्मृति का सबसे नरम घाव’ निजी अनुभव को सामूहिक भावबोध में रूपांतरित करती है। ‘ नश्वरता की अनंत स्याही’ समय और तकनीक के बीच भाषा की अस्थिरता पर एक गहरी टिप्पणी है। ‘ दरार में रोशनी’ प्रतिरोध की संभावना को स्थापित करती है। उसी प्रकार ‘ नया ईंधन’ जीवन की भयावह विडंबना को भीतर तक झकझोर देता है, और ‘ यह स्वाद हमारा नहीं’ उपभोग और शोषण के रिश्ते को एक मार्मिक दृश्य में बदल देती है।
ये कविताएँ अपने समय का मात्र प्रतिलेख नहीं, बल्कि उसकी अंत:रचना में धँसकर उसे उद्‌घाटित करने वाली गंभीर नैतिक दृष्टि हैं—जहाँ शब्द साक्ष्य भी हैं और प्रतिरोध भी, और कविता अपने ही समय के विरुद्ध एक गंभीर साक्षात्कार में बदल जाती है।
यहाँ भाषा अलंकार नहीं, एक जोखिमपूर्ण चेतना का व्याकरण है—जो सुविधा और मौन के विरुद्ध खड़ी होकर मनुष्य, इतिहास और अन्याय के बीच एक अस्थिर किंतु अनिवार्य सेतु निर्मित करती है। इन कविताओं की सबसे बड़ी ताकत उनका संश्लेष और बिना किसी हिचक का द्वंद्वात्मक स्वर है—एक ओर सीधी, प्रहारक और लगभग गद्यात्मक भाषा, दूसरी ओर रूपकों और बिंबों की गहरी परत। यह संयोजन कविता को पठनीय और प्रभावी बनाता है, लेकिन कहीं-कहीं यही विस्तार कविता की तीव्रता को थोड़ा ढीला भी कर देता है। कुछ कविताओं में बिंबों की अधिकता अर्थ को सघन करने के बजाय फैलाती हुई भी अनुभव की जा सकती है।
इसके बावजूद, इन कविताओं की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वे अपने समय के नैतिक संकट से कभी मुँह नहीं मोड़तीं, बल्कि उसे भाषा में दर्ज़ करती हैं—एक बेचैन, ईमानदार और जोखिम उठाने वाली काव्य-दृष्टि के साथ। इन कविताओं में कवि की संवेदना,तड़प, और सामर्थ्य को समझा जा सकता है।




Comments

  1. चंद्रेश्वर24 April 2026 at 18:21

    वाकई विजय शंकर चतुर्वेदी कम लिखते हैं, परंतु वे एक ज़रूरी समकालीन हिंदी कवि हैं। उनकी कविताओं में कथ्य सामाजिक चेतना से जुड़ कर और छनकर आते हैं। उनकी कविताओं में जो पक्षधरता दिखाई देती है वह साधारण को लेकर है। उनकी कविताओं में आए शब्द चट्टान नहीं,नदी सदृश हैं। बेशक, उनके यहां शब्द संवेदनाओं की नदी में बदल जाते हैं। इतनी अच्छी कविताएं पढ़वाने के लिए 'कौशिकी' और सुचर्चित युवा कवि और ब्लॉगर शंकरानन्द का आभार।

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  2. लंबे अंतराल के पश्चात् विजय शंकर चतुर्वेदी जी की कविताओं को पढ़कर मन तृप्त हो गया। हालांकि कोई कविता पूर्ण नहीं होती लेकिन यहां तो पूर्णता की प्रतीति होने लगी।पहली कविता पढ़ते ही मन‌ आर्द्र हो गया।बाद की कविताओं में तो कवि ने पूरा संसार ही समेट लिया है।देर तक इन कविताओं को गुनता रहा। निर्मल वर्मा के गद्य को पढ़ते हुए जो आनन्द मिलता है,वही आनन्द इन कविताओं में मिला।इन कविताओं की व्यापकता अंग्रेजी में कहूं तो इनमें वाइड रेंज है।ये कविताएं दृश्यों से बनी है। जैसे कोई चित्रकार समय का उदास चेहरा अपनी कूंची से उतार देता है,वही काम कवि की लेखनी ने किया है।यह महज संक्षिप्त प्रतिक्रिया है जिसे व्यक्त करते हुए अपना ही मन संतुष्ट नहीं हो पा रहा है। इन कविताओं पर आलेख लिखने योग्य है।
    भाई, शंकरानन्द जी का आभार। अच्छी कविताएं लाते रहें।

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  3. आनंद बहादुर24 April 2026 at 19:59

    कविताएं पढ़ गया। अच्छा चयन है। स्मृति का नरम घाव, और नया इंधन जैसी मार्मिक कविताएं हैं जो याद रहेंगी। 🙏

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  4. आपकी कविताओं के भावात्मक है ,जैसे आप खुद एक पिता है अभी ,फिर भी आप बहुत सुंदर लिखे हैं।आगे आने वाली पीढ़ी जैसे आपके पुत्र को अपने पिता के के लिए सकारात्मक सोच रखना चाहिए, और प्रेम बनकर रखा चाहिए आपकी कविताएं यही शिक्षा देती हैं

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  5. मांघीलाल यादव24 April 2026 at 21:17

    सचमुच विजयशंकर जी लीक से हटकर लिखते हैं।
    आपने अच्छी कविताओं का चयन किया है।
    टिप्पणी सारगर्भित और स्तरीय है।
    हार्दिक शुभकामनाएं।
    🙏🌸🙏

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  6. अरुण कमल24 April 2026 at 22:16

    बहुत सुंदर,मार्मिक।

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