उमा शंकर चौधरी की कहानी
उमा शंकर चौधरी
हमारे यहां हर गांव में एक ऐसा पेड़ होता है जिस पर भूत रहते हैं. ऐसी जमुनी फुआ भी होती है और एक बिछिया भी. हम उन्हें कहां खोज पाते हैं. न उन्हें पहचान पाते हैं. भूतहा पेड़ की स्मृति बनी रहती है आजीवन.
मेरे जीवन में इन तीनों की सघन स्मृति है.
उमा भाई की कहानी पढ़ती रही हूँ.
मेरे जीवन में इन तीनों की सघन स्मृति है.
उमा भाई की कहानी पढ़ती रही हूँ.
कहानी के अंत तक पहुँचते -पहुँचते मैं बहनापे की उस आभा से भर गई जिसकी तलाश मेरा लक्ष्य है.
मैं बिछिया बनूँ न बनूँ… जामुनी फुआ ही बन जाऊँ या जीवन में एक ऐसी फुआ खोज पाऊँ जिसकी तलाश कहानियों में करती फिरती हूँ. यही काफ़ी है.
मैंने अपनी दोस्त से कहा था कि मेरे होते कोई स्त्री अकेली नहीं हो सकती. मैं साथ बनी रहूँगी. जामुनी फुआ जैसा पावरफुल किरदार बन जाना आसान नहीं. दो स्त्रियों का संग -साथ दुनिया का चेहरा बदल सकता है.
उमा भाई की कहानी लंबी है. सारे किरदारों के चरित्र को खूब विस्तार मिला है. पूरा परिवेश खुलता है और किरदार उभरते चले आते हैं.
जिन्हें लगता है, दुनिया नई हो गई है. बदल गई है, वो अपने संसार की असली हालत समझना चाहें तो इस कहानी में प्रवेश करें.
एक पिछड़े समाज की लड़की के लिए दुनिया कहाँ बदली. समाज कहाँ उदार हुआ? 23 बरस में पांच बच्चों की विधवा माँ , इसी समाज में आज भी संभव हो रहा है.
बेटा पैदा होने के इंतज़ार में सात -सात बेटियां पैदा होते देखा है मैंने.
बिछिया भी उसी व्यवस्था की शिकार है. एक स्त्री दूसरी स्त्री की बाँह थाम लेती है और उसे अहसास कराती है कि बिछिया एक मज़बूत औरत है. उसे अहसास दिलाती है कि स्त्री के शरीर और मन पर नियंत्रण भी उसी का होना चाहिए.
ये बात आश्वस्त करती है कि अपनी देह पर मालिकाना हक किसी पुरुष का नहीं, समाज का नहीं, स्त्री का अपना होना चाहिए. कहानी में ये डिस्कोर्स मजबूती से स्थापित होता है.
कहानी में स्त्री जीवन की बेचारगी के साथ -साथ उसकी मजबूती भी उभरती है.
एक अंश पढ़िए - “औरत का जीवन ऐसे ही मदद के भरोसे यह बाबू . पूरा जीवन में मदद के भरोसे ही चलती है . पहले बाप पालता-पोस्ता है, फिर बिना कुछ पूछे -पाछे , जब मन चाहे बिना शादी की उम्र देखें, ब्याह आता है दूसरे घर में. अपनी बला तो काट लेता है वह , लेकिन बेटी का क्या हुआ, कुछ पता नहीं . फिर बेटी अपने पति के जीवन से जोड़ लेती है अपना जीवन. पति ठीक मिल गया तो ठीक,नहीं तो फिर जीवन पहाड़ . लेकिन यह तो अनर्थ हो गया . अब कैसे कटेगा ई पहाड़-सा जीवन. जामुनी फुआ गोद में लेटी बिछिया के सिर पर हाथ फेरते हुए धीमे - धीमे कह रही थीं, तो इसमें उनका अपना दुख भी तारी हो रहा था. “
उमा भाई , पहली बार आपकी किसी रचना पर कुछ कहने का साहस कर रही हूँ. आप एक स्थापित और बहुचर्चित कथाकार हैं.
मेरे जैसा पाठक आपको पढ़े बिना कैसे रहता! बस लिख नहीं पाई . कई बार अपने छूट जाते हैं.
- गीताश्री
उमा शंकर चौधरी की कहानी
पाकड़ का पेड़, झोपड़ी और बिछिया
एक
वह कुएं में झांकती है। कुएं में पानी बहुत नीचे है। एकदम तल्ली में। कुएं के अंदर की दीवार पर लोहे की सीढ़ी लगी है, वह उस सीढ़ी पर संभलकर पैर रखती है और नीचे उतरने लगती है। वह नीचे उतर रही है और पानी उससे दूर भाग रहा है। वह उतरती जाती है और सीढ़ियां अंदर की तरफ बनती जाती हैं। सीढ़ी के हर कदम पर वह ऊपर देखती है, उसे लगता है वह बहुत नीचे उतर आयी है। उसे थकावट महसूस होती है। उसके जोड़ों में दर्द उठ रहा है। उसके कान के पीछे से पसीने की बूंदें चुहचुहा जाती हैं। वह थककर वहीं खड़ी हो जाती है और थोड़ी देर में अचानक ही पानी उसके तलुए को छूने लगता है। पानी की ठंडक उसे एक सुखद अहसास देती है। वह पानी को छूने के लिए हाथ बढ़ाती है और एक कछुआ सामने आ जाता है और वह अपने दोनों हाथों से उस पानी को समेट लेता है। वह कहता है, यह पानी उसका है। उसे यह लेने तभी देगा जब वह उसके साथी मेंढक को लेकर आयेगी। मेंढक कहां है? उसने कहा, कुएं से बाहर जो पेड़ है उसकी जड़ के पास वह मेंढक बैठा है। वह इस बात को सुनकर दुखी होती है कि उसे इतनी सीढ़ियां चढ़कर फिर से ऊपर जाना होगा और फिर इतनी सीढ़ियां चढ़कर नीचे उतरना होगा। उसने बहुत ही थके अंदाज में कुएं से ऊपर की ओर देखा वहां उसका पति विनायक खड़ा दिखा। वह बहुत खुश हुई। उसने विनायक को मेंढक लाने के लिए नहीं, कुएं में बाल्टी गिराने के लिए कहा। विनायक उसे देखकर बहुत खुश होता है और बाल्टी ढूंढने लगता है। बाल्टी लेकर वह उसे कुएं में डालने ही वाला था कि उसका पैर लड़खड़ा जाता है। वह गिरने वाला है यह देखकर वह धक रह जाती है। वह गिर रहा है और बिछिया का हाथ उस सीढ़ी से छूट जाता है। वह विनायक को पकड़ने जाती है और इस तरह दोनों कुएं में डूब जाते हैं।
दृश्य बदल जाता है। यह एक घना जंगल है। इस जंगल में वह तेज़-तेज़ चल रही है। उसके पैरों से लताएं लिपट रही हैं। चलते हुए उसका शरीर कई जगह से छील गया है। चलते-चलते वह इतना थक जाती है कि वह दौड़ने लगती है। दौड़ते हुए ही उसने झाड़ी में भागते हुए एक खरगोश को देखा। सामने से एक नेवला रास्ता पार कर जाता है। उसे लगता है यहीं कहीं एक सांप भी होगा। वह और तेज दौड़ने लगती है। वह थक जाती है और हांफती हुई बैठ जाती है। उसके गले में कांटे उग आते हैं। वह बिना सांप की चिंता किए एक पेड़ के नीचे बैठ जाती है। उसे वहीं से नदी दिखती है। उसका मन करता है वह नदी तक जाए और पानी पी आए। परन्तु उसका शरीर बेबस है। वह हिल नहीं पाती है। उसके शरीर में दर्द है। वह वहीं लेटकर अपने शरीर को ऐंठने लगती है। उसके पैर की उंगली को कोई धीरे-धीरे खा रहा है। उसे लगता है सांप है। परन्तु वह वही खरगोश है जो अभी-अभी झाड़ियों की तरफ भाग गया था। खरगोश उसके पैर को कुतर रहा है। उसके शरीर में इतनी ताकत नहीं है कि वह उस खरगोश को भगा सके। खरगोश धीरे-धीरे उसके पैर को कुतर कर खाए जा रहा है। उसके पैर खत्म होते जा रहे हैं। वह कुछ कर नहीं सकती है परन्तु वह चिल्लाती है। उसके चिल्लाने में उसका रोना है। उसका रुदन और बाहर जुमनी फुआ का रुदन एक हो जाते हैं। उसकी नींद खुल जाती है। वह चुप हो जाती है। उसने अपने पैर को देखा। सब सही सलामत है। लेकिन रोना अभी बंद नहीं हुआ है। उसने अपने माथे के पसीने को पोछा। दो पल उसे शांत होने और यह समझने में लगे कि वह सपना देख रही थी। लेकिन वह समझ नहीं पा रही थी कि उसके सपने से निकल कर यह रुदन जुमनी फुआ तक कैसे पहुंच गया है।
बिछिया सुबह से ही घर के काम में इतनी व्यस्त है कि उसे सांस लेने की फुरसत भी नहीं मिली। पति, ससुर और पांच बच्चों को संभालना कोई आसान बात नहीं है। सुबह से दोनों टाइम का खाना बनाकर बड़ी दोनों बेटियों को स्कूल के लिए तैयार करना। कपड़े धोना।
चार दिनों से इस घर में मातम ही छाया हुआ था। इन चार दिनों में घर पर तो वह ध्यान ही नहीं दे पाई। आज मंगलवार है तो पूरे घर को गोबर से लीपना भी जरूरी था। थककर एकदम चूर हो गयी वह। तीन साल की बेटी और डेढ़ साल का बेटा अपने दादा के साथ खेल रहे हैं। बीच में जो चार-पांच साल की बेटी है, वह कहां है बिछिया को पता नहीं। होगी यहीं कहीं खेलती हुई आस-पड़ोस में। वह काम करती रही और कब खाट पर लुढ़क गई और फिर कब नींद लग गई यह पता ही नहीं चला। नींद गहरी थी तो सपना भी गहरा था। उसे कुछ होश नहीं है कि वह कब सोने गई और कब वह इतनी गहरी नींद में चली गयी कि झकझोरने पर भी नींद नहीं खुल रही थी।
अपने-आप को नींद से बाहर लाने की कोशिश बिछिया ने कई बार की। जब उसे थोड़ा होश आया तब उसने देखा कि रोने की दो आवाजें आ रही हैं। एक जुमनी फुआ की, जो उसे रोते हुए झकझोर रही है और दूसरी उसकी चौथी बेटी सोनिया की। सोनिया वहीं उसकी खाट के पास ही बैठकर फुआ को रोते देखकर रोने लगी थी।
जुमनी फुआ की कहानी भी बहुत अजीब है। जुमनी फुआ का असली नाम क्या रहा होगा अब किसी को नहीं पता है। बचपन में मां-बाप ने जरूर कुछ नाम धरा होगा। परन्तु सांवली थी तो लोगों ने जामुनी बोलना शुरू किया। जामुनी से यह कब जुमनी में बदल गया यह किसी को पता नहीं चला। जुमनी फुआ का यह ससुराल नहीं, मायका है। दो भाई और तीन बहनें थीं। बहनां की शादी हो गयी। शादी तो जुमनी फुआ की भी हुई परन्तु शादी के कुछ महीने बाद ही पति ने उन्हें यहां लाकर छोड़ दिया। लोग कहते हैं कि जुमनी फुआ का पति अपनी जवानी में बहुत गोरा-चिट्टा था। जब उसने जुमनी फुआ को देखा तो बहुत निराश हुआ। अब तो जुमनी फुआ खुद हंसकर बताती है कि वह हमेशा कहता था ‘यह तो दिन में भी बहुत मुश्किल से दिखती है, रात में क्या दिखेगी।’ कुछ महीने तक तो किसी तरह बर्दाश्त करता रहा उनका पति उन्हें, लेकिन उसके बाद नहीं। जुमनी फुआ कहती है वो इतना नफरत करता था मुझसे कि उन महीनों में भी कभी उसने मुझे छुआ तक नहीं।
जुमनी फुआ को एक बार उसके घर पर छोड़ कर क्या गया वह, फिर कभी वापस नहीं आया। फुआ अपने माथे पर वर्शों तक सिन्दूर-टिकुली लगाती रही। लगाते-लगाते थक गई, फिर एक दिन खुद ही लगाना छोड़ दिया। पता नहीं चला कि कब वह शादीशुदा हुई। कभी विधवा हुई भी या नहीं। माता-पिता का निधन हो गया, बहनें अपने ससुराल चली गईं। दोनों भाइयों ने अपना अलग घर बना लिया। यह जो छोटा सा वास था, भाइयों ने उन पर यह एहसान किया कि इसे जुमनी फुआ से नहीं छीना। जुमनी फुआ ने अपना पूरा जीवन इसी झोपड़ीनुमा घर में बिता दिया। बस कुछ महीनों के लिए वह ससुराल गई थी। उसके बाद कहीं नहीं। अब जुमनी फुआ बूढ़ी हो चुकी है। बिछिया यह कहानी जब भी सुनती है वह बहुत ध्यान से फुआ को देखती है। उसे तो फुआ बहुत सुन्दर दिखती है। वह सोचती है, पता नहीं नसपीटों को क्या चाहिए होता है। जुमनी फुआ के चेहरे पर इतना ममत्व है कि वह जिससे भी बात करती हैं वह उनका हो जाता है। जुमनी फुआ का घर बिछिया के घर के बिल्कुल पास में है। फुआ बहुत प्यार करती है बिछिया को। कहती है उसको देखकर अपना बचपन याद आ जाता है। ऐसे ही उसकी भी शादी हुई थी। बिना कुछ जाने-समझे। कुछ पता नहीं। लेकिन फिर जुमनी फुआ बिछिया को अपने कलेजे से चिपका लेती है ‘पर भोले बाबा मेरा वाला किस्मत मत दिजिएगा इस फूल सी बच्ची को।’ जुमनी फुआ के भाई के बच्चां ने उन्हें फुआ बोलना शुरू किया तो सारे बच्चों ने फुआ ही बोलना ठीक समझा।
जब बिछिया को होश आया और उसने खाट से उठने की कोशिश की तब उसने देखा कि उसका बेटा किशन उसके स्तन से चिपटा हुआ है। उसे यह बिल्कुल भी याद नहीं है कि सोते हुए कब उसका बेटा उससे आकर चिपट गया था। किशन सो चुका था लेकिन उसने अपने मुंह में अपनी मां के स्तन को पकड़ा हुआ था। बिछिया ने उठने से पहले आहिस्ते से अपने आप को किशन से आजाद किया और जुमनी फुआ को कसकर पकड़ लिया।
‘अनर्थे हो गया कनिया। कैसे रहेंगे अब हम सब। बीच रास्ते ऐसे छोड़ के उ परलोक सिधार गया रे बाबू।’
परलोक शब्द सुनकर बिछिया एकदम से सन्न रह गयी। झोपड़ी से बाहर की तरफ भागी। बाहर खटिया खाली थी जिस पर ससुर लेटे-पटाये रहते थे। खटिया के बगल में फूल का लोटा रखा था जो इस घर का शायद सबसे मंहगा सामान था। बिछिया के मन में एक बार आया कि वह इतने मंहगे लोटे को पहले झोपड़ी के भीतर कर ले। परन्तु अंदर से फुआ की छाती पीटने की आवाज ज़ोर-ज़ोर से आ रही थी। अंदर आकर उसने फुआ को कसकर धर लिया।
‘ना रोओ फुआ! हम हैं ना। ऐतना रोओगी तो बाबू को भी तो बुरा लगेगा। उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी।’
‘बाबू का शरीर है कहां?’
और फिर उसे याद आया विनायक है कहां? यह समय तो विनायक के दारू के गैलन को अपनी साइकिल पर लटकाकर अपने ठीये पर ले जाने का था। शाम के लगभग तीन बज रहे थे। यह उसका लगभग रोज़ का काम था। कच्ची दारू लाकर बेचना। बस यह काम तब कुछ दिनों के लिए बन्द हो जाता, जब पुलिसवाले उसकी इस बैठकी को तोड़ देते थे।
उसने फुआ को कसकर पकड़े ही बोला ‘लेकिन लक्ष्मी के बाबू हैं कहां। साफ-साफ तो बताइये कि हुआ क्या?’ लक्ष्मी उसकी बड़ी बेटी का नाम है, जो अभी बामुश्किल आठ-नौ साल की होगी। जमुनी फुआ को अब समझ आ गया था कि कनिया गलत समझ रही है। उन्होंने बिछिया की पकड़ से अपने आप को मुक्त किया और उसके दोनों हाथ को पकड़ कर उसी खाट की पट्टी पर दे मारा। बाएं हाथ में चूड़ी टूटने से कलाई में खून छलछला आया। लेकिन बिछिया ने उस पर ध्यान नहीं दिया। उसने अब समझ लिया था इस घटना को। फुआ ने अपने हाथ को उसके माथे तक पहुंचाया। अभी सिंदूर माथे से पुंछा भी नहीं था कि वह वहीं धड़ाम से गिर गयी। फुआ ने समझ लिया, कनिया को दांती लग गयी है। उसने अपना रोना छोड़कर पानी का गिलास लाकर छींटा मारा और अपनी उंगली को उसके जबड़े के बीच ठूंस दिया।
दो
भूंति की सबसे छोटी बेटी है बिछिया। भूंति ड्राइवरी करता था वह भी बड़े-बड़े ट्रकों की। वह ट्रक लेकर निकलता तो कई-कई दिनों तक घर नहीं लौटता। भले ही घर वह कई दिनों के अंतराल पर आता हो लेकिन बच्चे उसके छः हुए। ऐसा नहीं है कि भूंति के घर में बेटे के इंतजार में छः बेटियों का जन्म हुआ था। बेटे का जन्म तो तीसरे और पांचवे नम्बर पर हुआ ही था। भूंति के साथ सबसे बड़ी दिक्कत समय की थी। उसे घर आने का समय कम ही मिलता था। वह जितने दिन के लिए घर आता था उस बीच अपनी पत्नी को ले जाकर वह ऑपरेशन करवा लाए, सोच नहीं पाता था। यह तो भला हो उस मनहूस दिन का जब उसकी अपने ट्रक के मालिक से बहस हो गयी और वह नाराज होकर अपने घर आ गया। तब वह लगभग तीन महीने तक घर पर बैठा रहा बगैर किसी काम-धाम के। यह वह समय था जब वह अंदर से टूट चुका था। यह वह समय था जब तक उसे पांच बच्चे हो चुके थे। इन छुटिट्यों में दो-ढाई महीने अपनी पत्नी और परिवार के साथ रहने के बाद जब वह पूरी तरह ऊब गया तब वह एक दिन अस्पताल में अपना ही ऑपरेशन करवा आया था। फैमिली प्लानिंग ऑपरेशन। उसके ऑपरेशन का जब उसकी पत्नी को पता चला तो वह नाराज हुई। उसने कहा वह इसके लिए तैयार थी। मर्द इस ऑपरेशन से कमजोर हो जाता है। उस दिन भूंति की मां फूट-फूट कर रोई थी। ‘इ महरानी को अपना शरीर में कोई कश्ट ना उठाना पड़े तो हमारे बेटे को लील लिया इसने। अब बेचारा कैसे नौकरी करेगा। कैसे इ कमजोर शरीर से इत्ता बड़ा ट्रक खींचेगा।’
भूंति को भी तब यह लगने लगा था कि अब उसे कोई काम मिलने से रहा और मिल भी जाए तो शायद इस कमजोर शरीर से अब उससे कोई काम हो भी ना पाए। लेकिन धीरे-धीरे चीजें ठीक होने लगीं और फिर एक दिन उसके लिए नौकरी पर बुलावा आ भी गया। वह नौकरी पर गया तो बहुत खुश हुआ तभी एक दिन उसे पत्नी के फिर से गर्भवती होने की खबर मिली। बिछिया वही छठी संतान थी जो पिता के ऑपरेशन से पहले ही अपनी मां के गर्भ में आ चुकी थी।
अब भूंति के पास कुल मिलाकर चार बेटियां और दो बेटे थे। भूंति के बच्चे ज्यों-ज्यों बड़े होने लगे उसे उनकी शादियों की चिंता होने लगी। उसे हमेशा इस बात की चिंता लगी रहती थी कि वह दिन बहुत दूर नहीं है जब वह बूढ़ा होने लगेगा और अशक्त हो जाएगा, फिर वह इन ट्रकों को चला नहीं पाएगा। वह अपने काम-धाम के चलते रहने के बीच में ही बेटियों की शादी कर लेना चाहता था। भूंति एक जिम्मेदार पिता था इसलिए उसने अपनी व्यस्तता भरे जीवन से समय निकाल कर बराबर लड़का ढूंढा और फिर पहली दो बेटियों की और फिर दो बेटियों की शादी सम्पन्न की। उसने अपने समय और पैसों की फिक्र करते हुए पहली दोनों बेटियों की शादी एक ही मंडप पर निपटायीं। पहली दोनों बेटियों में यह दिक्कत कम आयी क्योंकि दोनां में महज एक-डेढ़ साल का फर्क था परन्तु बिछिया और उससे ठीक बड़ी बहन में उम्र का अंतर तीन वर्श का था। बिछिया और उससे ठीक बड़ी बहन पायल के बीच एक भाई था।
भूंति के मन में तो था ही कि दोनों बेटियों के लिए एक साथ ही लड़का मिल जाए तो वह बेटियों के बोझ से फारिग हो जाए। पायल के होने वाले दुल्हे के मामा ने अपने दूर के रिश्ते में विनायक के बारे में बतलाया था। यह जानकर तब बहुत सुखद आश्चर्य हुआ था कि विनायक भुवनेश्वर में रहता है और किसी पांच सितारा टाइप होटल में नौकरी करता है। पांच सितारा होटल क्या होता है यह भूंति को नहीं पता था लेकिन इस जानकारी ने उसके अंदर झुरझुरी पैदा कर दी थी कि वहां नहाने के लिए पूल भी होता है और वहां खाने के साथ-साथ शराब भी परोसी जाती है।
जब इस शादी को तय करके भूंति घर लौटा था, तब काफी खुश था। रात में खूब गहरी नींद आयी और नींद में एक गहरे ख्वाब़ में वह उतर गया था।
उसने देखा, एक खूबसूरत तालाब है। तालाब के चारों ओर खूबसूरत सुगन्धित पेड़-पौधे लगे हुए हैं। तालाब में वह नहा रहा है और साथ में बत्तख तैर रही हैं। वह ऊपर की ओर देखता है। लीची के पेड़ जो तालाब पर झुके हुए हैं उनमें लीची लदी हुई हैं। वह पानी से कूदता है और लीचियों को अपनी मुट्ठी में भींच लेता है। वह पानी में डुबकी लगाता है और वह आश्चर्यचकित रह जाता है कि पानी के भीतर दो लोग सिर्फ उसके लिए शराब की बोतल लिए खड़े हैं। उनमें से एक, बोतल से शराब गिलास में उड़ेल रहा है। वह अपना गिलास पकड़ता है और पानी के बाहर आ जाता है। तालाब के चारों ओर बाग है। बाग में हरियाली है। बाग में बिछिया हंसती हुई दौड़ रही है और उसके पीछे विनायक उसे पकड़ने के लिए दौड़ रहा है। भूंति अपनी बेटी को खुश देखता है और अपने हाथ के गिलास को अपने गले में उड़ेल लेता है।
तीन
जब बिछिया की शादी हुई तब उसकी उम्र तेरह वर्श पूरा होने में अभी तीन महीने बाकी थे। भूंति की आखिरी दोनों बेटियों की शादी एक मंडप पर हुई। विनायक की उम्र जब बीस-इक्कीस वर्श की होगी। विनायक के पिता वंशी कुछ खास करते नहीं थे। मजदूरी करके ही जीवन बिताया था। विनायक की तीन बहनें थीं और वह अकेला बेटा था। और सबसे छोटा। विनायक की जब शादी हुई तब तक सारी बहनों की शादी हो चुकी थी। यही कारण है कि जब बिछिया ब्याहकर इस घर में आयी तो शादी की भीड़ छंटने के बाद घर में अकेली हो गयी। सास का निधन हुए चार-पांच साल हो चुके थे।
यहां एक कमरा खपरे का था और उसके साथ में एक झोंपड़ी। ससुर को बंद जगह में लेटने-पटाने में घुटन होती थी इसलिए प्रायः वे खाट पर बाहर ही होते। कड़ाके की ठंड में वे अपनी खाट को उस झोपड़ी के भीतर घुसा लेते थे। खपरे का घर काफी पुराना था। बिछिया को लगा, यह घर कम से कम सौ साल पुराना है। घर सौ साल पुराना तो नहीं था परन्तु उस घर को इतनी बेतरतीबियत से रखा गया था कि वह सौ साल पुराना होने का अहसास दे रहा था। बिछिया जब इस घर में आयी तो घर एकदम तबेला बना हुआ था। पूरे घर को देखकर ऐसा लगता था जैसे इस घर में कोई बड़ा जानवर घुस आया हो। उसने बहुत मेहनत करके इस घर को घर बनाया।
शुरू के छः महीने, जो बिछिया ने अपने पति के साथ बिताए थे, वे बहुत खुशनुमा थे। वह बिछिया के लिए सखुआ के पत्ते में जामुन लेकर आता था। बिछिया उससे कहती थी कि उसे मीठा खाने का मन है तो वह उसके लिए जलेबी भी लाता था। बिछिया के इस घर में आने के दिन ही विनायक को यह समझ में आ गया था कि उसे नहाने की यहां दिक्कत होने वाली है। सरकारी चापाकल थोड़ा दूर, सड़क के पास था। विनायक उसके लिए बाल्टी भरकर पानी लाता था। उसके नहाने के लिए उसने एक खपरैल वाले घर के किनारे में टाट की एक आड़ बनायी। बिछिया खाना बनाती तो वह साथ बैठा उसे देखता रहता। खाना बन जाता तो अपने पिता को वह खाना पहुंचा आता। बिछिया को वह देखता और उसकी आंखों में डूब जाता। बिछिया भी विनायक को देखती और उसमें खो जाती। विनायक शाम की गोधूलि बेला में एक दिन गांव से बाहर सड़क के उस पार नदी किनारे उसे लेकर गया। नदी में पानी शांत था। किनारे पर एक-दो नाव खूंटे से बंधी थीं। नाव पर बिछिया बैठी थी। विनायक वहीं ज़मीन पर बैठा था। विनायक ने उसके पांव को वहां चूम लिया था। और चूमते हुए उसने अपनी जेब से दो बिछिया निकाली थीं और बिछिया के पांवों की उंगलियों में उन्हें पहना दिया था। उसने कहा था ‘मेरी बिछिया के लिए यह बिछिया।’ फिर उसने बताया कि यह मेरी मां की बिछिया है अब वह नहीं हैं लेकिन अब तुम उनका ही रूप हो।
वहां से चलते हुए विनायक ने बबूल की टूसी को तोड़कर उसके बालों में खांस दिया था। विनायक ने नदी किनारे रेत पर चलते हुए बिछिया के बालों को छूते हुए उसके कान में कहा था ‘यह रेशम है। इसी रेशम से मुझे जिन्दगी भर बांधे रखना।’
शादी के बाद के इन छः महीनां तक तो विनायक का यूं साथ रहना बिछिया को बहुत अच्छा लगा लेकिन धीरे-धीरे उसके मन में डर होने लगा। विनायक भुवनेश्वर के होटल में नौकरी करता तो था परन्तु वह एक मामूली सा होटल था जिससे उसे मामूली सी ही तनख्वाह मिलती थी। विनायक को बिछिया इतनी अच्छी लगती थी कि उसका बिल्कुल भी मन नहीं था कि वह फिर से वहां होटल में जूठे बर्तन उठाने जाए। वंशी को मजदूरी का जितना काम मिल जाता था उससे फिलहाल यह घर चल रहा था। पिता की यह मजदूरी उम्र के कारण लम्बी खिंचने वाली नहीं थी। वंशी धीरे-धीरे बुजुर्ग हो रहे थे लेकिन विनायक अपनी पत्नी के प्रेम में ऐसा बंधा कि उसने दोबारा उस होटल की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखा जिस होटल को बिछिया के पिता अपने ख्वाब में बसा चुके थे। बिछिया का मन कई बार हुआ कि वह विनायक से पूछे कि वह पांच सितारा होटल कहां है जिसके ख्वाब के सहारे उसके पिता ने उसे यहां बांध दिया है। लेकिन विनायक अपनी पत्नी को प्यार करता था। और पत्नी उसके प्यार के इस सिलसिले को तोड़ने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी।
बिछिया का पेट जब बाहर से दिखने लगा तब जुमनी फुआ ने उससे बात की और इसे घोशित किया कि वह गर्भवती हो गयी है। बिछिया को तब न तो गर्भवती होने के बारे में पता था और न ही यह कि कैसे पता चल जाता है कि एक स्त्री गर्भवती हो गयी है। बिछिया की पहली बेटी का जब जन्म हुआ तब बिछिया की उम्र चौदह वर्श पूरा होने में अभी एक महीना कम था। विनायक के पिता हमेशा यह चाहते थे कि विनायक काम पर जाए, परन्तु वे अपने बेटे को कुछ कह नहीं पाते थे। लेकिन विनायक जब खुद पिता बना तब उसे अहसास हुआ कि उसे कुछ काम करना चाहिए। और तब उसने शराबबंदी वाले इस राज्य में देशी शराब बेचने का काम शुरू किया।
चार
बिछिया जिस घर में रहती है उसके ठीक पीछे एक परती जमीन है। उसके बाद दूर-दूर तक लोगों के खेत हैं। दूर कहीं-कहीं दो-चार घर दिखते हैं। उस परती जमीन में जंगली पेड़-पौधे उगे हुए हैं। जमीन के घर से सटे वाले हिस्से में थोड़ी बहुत सब्जी उगा ली जाती है। यहां कुछ केले, नींबू और टाभ के पेड़ हैं। लेकिन आगे जाने की मनाही है। जमीन के आखिर में पाकड़ का एक बड़ा सा पेड़ है। यह पाकड़ का पेड़ बहुत पुराना और घना है। दूर से देखने पर यह पेड़ बिछिया को सम्मोहित करता था। वह विनायक से कहती इस पाकड़ के पेड़ पर एक झूला डालकर वह उस पर उसे झुलाए। परन्तु विनायक सख्त हिदायत देता कि उस पेड़ के पास कभी नहीं जाना है। ना खुद, ना ही बच्चों को वहां जाने देना है।
बिछिया अपने ससुर को पूछती है कि यह परती जमीन किसकी है? यह पाकड़ का पेड़ किसका है? पाकड़ के इस पेड़ में ऐसा क्या है कि वहां जाना नहीं है? ससुर ने सिर पकड़ लिया। ‘इसी पाकड़ के गाछ ने तो पूरा घर उजाड़ दिया कनिया।’ बिछिया कहती है लेकिन भूत तो पीपल के पेड़ पर होता है पाकड़ के पेड़ पर कहां? ‘अब इ भूत का भी कोई पक्का ठिकाना थोड़े ना होता है।’ अब यह भूत है या कोई हवा, पता नहीं लेकिन बहुत अनर्थ तो किया है इसने। वह जमीन तो अपनी ही है। यह बाप-दादा की जमीन है। वर्शों से ऐसे ही पड़ी है, कोई इसमें हिस्सा लेने ही नहीं आया। पहले यहां इस जमीन पर कभी घर था। फिर पता नहीं कहां से यह पाकड़ का पौधा उग आया। पहले लोगों ने समझा नहीं फिर धीरे-धीरे यह विशाल पेड़ हो गया। पहले तो सबको अच्छी ही लगती थी उसकी हरियाली, उसकी छाया और उसके फल। लोग इस पेड़ की छाल को उतारकर अपने घर ले जाते थे। पीसकर पीते थे और निरोग रहते थे। लोगों ने देखा तो नहीं लेकिन कहते हैं कि जब खुंटिया वाली दादी एक दिन पेड़ की छाल निकाल रही थी तो इस पेड़ की टहनियों ने उन्हें लपेटकर वहीं पटक दिया और फिर वहीं उनकी मौत हो गयी। लोगों ने तो सिर्फ उन्हें वहां मरा हुआ ही देखा। मुंह से लार निकली हुई थी और पेट फूल के एकदम तुम्बा।
‘अब तो यह जमीन ग्रह ही है। करें भी तो क्या करें। पेड़ को काट सकते नहीं और उसके पास जाना मौत को बुलावा देना है। भगवान साथ देते तो हम अपना घर भी कहीं और ले जाते। लेकिन इ भोला बाबा भी तो परीक्षा ही ले रहे हैं। अब जो लिखा है वही तो होगा।’ फिर एक लम्बी सांस लेकर अपनी खाट पर लेटते हुए वंशी कहते हैं - ‘लोग कहते हैं भूत तो रात में खूंखार होता है लेकिन इसने भरी दुपहरिया में कौन सा छोड़ दिया।’
वंशी ने बिछिया को जितना बतलाया, वह सच था। परन्तु इस गांव के लोगों को पूछेंगे तो सच उतना ही नहीं है। गांव के बड़े-बुजुर्ग कहते हैं इसी वंशिया के चाचा के कई बेटियां हो गयीं तो उसने अनर्थ कर दिया। यही खुंटिया वाली दादी ही तो सबका बच्चा पैदा करवाती थी। बेटी को नून चटा के मारा भी तो था उसी बुढ़िया ने। और फिर वंशिया का चाचा उसी रात के घुप्प अंधेरे में घर से निकलकर इसी पाकड़ के पेड़ के जड़ में गाड़ दिया था उ फूल सी बच्ची को। आप ये देखो ना सबसे पहले मारा भी तो उसी बुढ़िया को।
पाँच
वंशी की पहली पत्नी से दो बेटियां थीं। वैसे तो आसपास की कई औरतों को इसी पेड़ से बुरी हवा लगी और फिर वे धीरे-धीरे खत्म हो गयीं। लेकिन वंशी के जीवन में इस गझिन पेड़ ने बहुत दुख दिया है। पहली पत्नी दूसरी बार गर्भवती थी और चली गई रात को टहलते हुए पेड़ के नीचे सुस्ताने। उस दिन गर्मी भी तो बहुत थी। मन एकदम से अकुला रहा था। रात को नींद नहीं आ रही थी और मन गर्मी से बेचैन हो रहा था तब वह मन शांत करने चली गई वहीं। बस फिर क्या था, हो गया काम। सिर्फ एकाध हफ्ता ही बचा होगा, बस उसी दिन से धीरे-धीरे सुस्त पड़़़़ती गई और फिर दूसरी बेटी को जन्म देते ही प्राण त्याग दिए। दो-तीन साल बाद वंशी की दूसरी शादी हुई और एक बेटी और फिर यह विनायक। विनायक की मां का निधन तब हुआ जब विनायक पंद्रह-सोलह साल का था। उनका निधन भी इसी पेड़ से जुड़ा है। बात विनायक की शादी से चार-पांच साल पहले की है। विनायक की मां को ललचा गया यह पाकड़ का फल। अगस्त का महीना था इसी खपरैल वाले घर की खिड़की से देखती रहती थी इस पेड़ की हरियाली को। फल से लदा पड़ा था पेड़। फल अभी कच्चे थे। फल देखकर मन ललचा गया विनायक की मां का। भरी दुपहरिया चली गयी फल तोड़ने। अभी फल कच्चा था तो थोड़ा खट्टेपन का अहसास था उसमें। कहते हैं भरी दुपहरिया उस पेड़ से फल तोड़ते ही पेड़ के उन गझिन पत्तों के बीच से हवा सी निकली और उसने लपेट लिया विनायक की अम्मा को। पूरे शरीर में गर्मी और सर्दी एक साथ। गर्मी भी उतनी ही और ठंड से शरीर के सारे रोंएं खड़े। वहां से गिरते-पड़ते क्या भागी विनायक की अम्मा, फिर कभी उठ नहीं पाई। शाम से ही खून की उल्टी शुरु।
जब से पाकड़ के इस पेड़ के बारे में बिछिया ने सुना है, बहुत डर गई है। उसके कमरे में जो खिड़की है जिसके बगल में उसने एक आइना दीवार पर टांग रखा है, बाल संवारते हुए वह वहां से बाहर उस पेड़ को देखती है। वह विशाल पेड़ है। उसके पत्ते इतने गझिन हैं कि उसके भीतर देखने की कई बार वह कोशिश कर चुकी है, पर कुछ दिखता नहीं। भरी दुपहर जब प्रचंड गर्मी रहती है तब बिछिया को उन पत्तों के बीच से हवा के सहारे एक आकृति बनती दिखती है। उसकी बहुत सारी जटाएं, जड़ें लटकी हुई हैं। रात के घुप्प अंधेरे में उसे कई बार ऐसा लगता था कि पेड़ से आत्माएं लटकी हुई हैं। वह डर जाती है और अपने बच्चे को अपने कलेजे से चिपका लेती है।
छः
यह गांव नेशनल हाइवे से बहुत दूर नहीं है। मतलब, लगभग तीन से चार किलोमीटर अंदर। नेशनल हाइवे पर एक चौराहा है, उस चौराहे पर एक पीपल का पेड़ है, एक हनुमान मंदिर है और दो-चार चाय-पानी की गुमटियां। इस चौराहे से जब अंदर की तरफ आते हैं तब एक सीधा रास्ता है। रास्ते के दोनों तरफ पेड़-पौधे हैं। पेड़-पौधों के बाद खेत हैं। इस रास्ते से कई और रास्ते फूटते हैं जो अलग-अलग गांवों को जाते हैं। इस मुख्य सड़क के किनारे भले ही जगह खाली हों लेकिन सड़क से दूर हटकर दोनों ही तरफ बसावट बहुत है। दोनों तरफ कई गांव हैं। इसी रास्ते से चलते हुए लगभग तीन-साढ़े तीन किलोमीटर पर जो गांव आता है उसी के अंत में विनायक का घर है। रास्ते पर आते हुए यह गांव अर्धचन्द्राकार दिखता है। बस उस चांद का अंदर की तरफ पेट ज्यादा खींचा हुआ है। इस उल्टे चांद के अंत में ही विनायक का घर है। उसके घर के पीछे की परती जमीन पर जो पाकड़ का विशाल पेड़ है वह दूर से ही इस रास्ते से दिखता है। मतलब इस रास्ते कोई जाना चाहे तो तिरछा चलते हुए खेत के रास्ते पाकड़ के पेड़ तक जा सकता है।
नेशनल हाइवे पर जो चौराहा बना है वहां इस गांव के विपरीत यानि दूसरी तरफ जो रास्ता जाता है उसमें चौराहे के कुछ दूर से ही गांव शुरू हो जाता है। चौराहे से एक किलोमीटर तक जाते-जाते गांव खत्म भी हो जाता है। गांव खत्म होने के बाद गंगा नदी है। यह वही नदी है जहां शादी के बाद अपने भावुक क्षणों में विनायक बिछिया को लेकर शाम में आया था। इस नदी से अपने घर की तरफ लौटते हुए पहले नदी के बाद वाले गांव को फिर इस नेशनल हाइवे को पार करना पड़ा होगा।
एक-सवा साल बैठे रहने के बाद और पहली संतान के पैदा होने के बाद जब विनायक ने बाहर ना जाकर यहीं रहकर काम करने का निर्णय लिया तब इसी चौराहे से आने वाले रास्ते पर उसने अपना ठिकाना ढूंढा था। चौराहे से अपने गांव की तरफ आने वाले रास्ते में एक-डेढ़ किलोमीटर अंदर आने पर उसने एक बरगद के पेड़ के नीचे एक छप्पर डाल कर देशी शराब पिलाना शुरू किया था। उस दुकान पर कुछ खास था नहीं। आड़ बनाने के लिए एक चौकी को उल्टा रख दिया गया था और एक-दो बेंच। विनायक चौराहे के दूसरी तरफ के गांव को पार कर नदी किनारे पहुंचता था, यह देशी शराब यहीं किनारे पर बनती थी। रोज विनायक साइकिल से दो गैलन शराब लेकर आता था। पहले उसने एक गैलन से ही शुरू किया था फिर खपत दो गैलन तक पहुंच गयी। वैसे ही देशी शराब बेचना वैधानिक नहीं है उस पर मुसीबत यह कि यह राज्य शराबबंदी का राज्य था। दबाव बहुत था। अक्सर पुलिस वाले आते थे। विनायक भाग जाता था। पुलिस वाले गैलन उठाकर ले जाते थे। छप्पर गिरा जाते थे। कुछ दिन सब बंद रहता था। विनायक फिर से छप्पर टांग लेता था। कई बार वह थाने जा चुका है। कई बार वह थाने में कई-कई दिनों तक बंद हो चुका है। लेकिन विनायक इसे गलत नहीं मानता है। वह मानता है उसके पास यही एक हुनर है और इसी हुनर से वह अपना घर चला सकता है।
पता नहीं विनायक के द्वारा इस धंधे को चुनने के पीछे कारण क्या रहा होगा। लेकिन वह समझता है कि चूंकि उसने होटल में शराब पिलाने का काम किया हुआ है इसलिए उसे इसका बेहतर अनुभव है। विनायक के ससुर को जब यह पता चला तो उन्हें काफी धक्का लगा। वैसे जब विनायक शुरु के साल-डेढ़ साल तक घर बैठा हुआ था तभी उसके ससुर ने समझ लिया था कि शादी का यह निर्णय बहुत ठीक नहीं है। इसलिए जब विनायक ने यह काम शुरु किया तो उन्हें सुकून ही मिला कि चलो किसी तरह परिवार का पेट तो पाल लेगा अब।
बिछिया ने कभी विनायक की दुकान को देखा नहीं था लेकिन उसे अच्छा लगता था कि विनायक काम करने लगा है। विनायक साइकिल से रात को घर लौटता था तो वह बादल के ढेर सारे फाहों से उसका स्वागत करती थी। वह तितली बन जाती थी और विनायक उसे साइकिल की सीट पर थोड़ी देर के लिए बिठा लेता था।
विनायक के शरीर से शराब की बदबू आती थी। बिछिया जानती थी वह शराब बेचकर अपना घर चलाता है। लेकिन क्या मजाल कि विनायक ने कभी एक घूंट शराब भी अपने गले के अंदर उतारी हो। बिछिया, विनायक के गले लग जाती थी और सारी बदबू खत्म।
सात
घर में बेटे का जन्म हो इसका इंतजार सिर्फ विनायक के पिता वंशी को ही नहीं था, विनायक भी चाहता था कि एक बेटा तो जरूर हो। आखिर बुढ़ापे का सहारा तो बेटा ही होगा। आज अपने पिता की देखभाल वही तो कर रहा है जबकि उसकी बहनें अपने-अपने ससुराल जा चुकी हैं। यह चिंता तब और बढ़ने लगी थी जब लगातार बेटियों ने घर में जन्म लेना शुरू कर दिया था।
विनायक को यह पता नहीं था कि दो बच्चों के बीच अंतराल रखने के लिए सावधानी कैसे बरती जाती है। वह इतना शर्मीला भी था कि किसी से यह पूछ भी नहीं सकता था। उसे सिर्फ इतना पता था कि बच्चा पैदा होने से रोकने का सिर्फ एक ही रास्ता है और वह है एक ऑपरेशन। लेकिन वहां तक वह तब तक जा नहीं सकता था जब तक कि उसे एक पुत्र की प्राप्ति न हो जाए। उसे एक बच्चा पैदा होता। वह कुछ दिनों की सावधानी के बाद बिछिया के पास जाता और कुछ ही महीने में बिछिया फिर से गर्भवती हो जाती। तीसरी बेटी तक आते-आते विनायक काफी हताश हो गया था। लेकिन जब चौथी बेटी का जन्म हुआ तब वह अंदर से टूट गया था।
बिछिया को बेटा-बेटी से बहुत मतलब नहीं था। वह बहुत सोचती नहीं थी। हां उसे यह अवश्य लगता था कि अगर विनायक को एक बेटा चाहिए तो जरूर ऐसा हो जाए। बिछिया विनायक को प्यार करती थी।
जब पांचवी बार बिछिया गर्भवती हुई तब विनायक उम्मीद छोड़ चुका था। लेकिन इस नाउम्मीदी में भी कहीं एक उम्मीद छिपी थी कि क्या पता इस बार चमत्कार हो जाए। और इस बार सचमुच चमत्कार हो गया था।
विनायक ने बेटे के जन्म के साथ ही, पत्नी के थोड़ा सा स्वस्थ होते ही ऑपरेशन करवा दिया। अब बिछिया भी खुश थी। विनायक भी और विनायक के पिता वंशी भी। विनायक जैसे भी सही, अपना काम करता था और अपना परिवार चलाता था। वह अपने बच्चों से प्यार करता था। उसे कंधों पर बैठाकर घुमाता था। बच्चे उसे बाबू कहते थे।
लेकिन इस हंसी-खुशी वाले परिवार में एक झटका तब लगा जब यह पता चला कि दूसरी बेटी फुनगी एक सहमी हुई बच्ची हो गई। सहमी हुई मतलब, सहमी हुई। पत्ते की सरसराहट की आवाज भी आ जाए तो वह डर जाती थी। उसके जन्म के एक-दो वर्श में ही यह समझ आ गया था। घर में एक कटोरी भी गिर जाती तो वह डर कर अपने मां-पिता या फिर अपने से महज एक-डेढ़ वर्श बड़ी बहन से चिपक जाती थी। अब उस दिन क्या हुआ, बस थोड़ी हवा तेज थी। झोपड़ी वाले घर की छत पर एक चदरा रखा था। यह चदरा वंशी को यहां से जो लगभग तीन किलोमीटर दूर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है उसके पास पुराना फेंका हुआ मिला। यह पोलियो का प्रचार था। वंशी इसे उठा लाया अपने घर। टाट के ऊपर वहां रख दिया जहां से पानी टपकता था। तेज हवा से वह चदरा का बोर्ड गिरा तो नीचे साइकिल खड़ी थी। आवाज तेज तो थी लेकिन इतनी नहीं कि बेहोश हो जाए। फुनगी जब बेहोश हुई तो उसकी आंखों की पुतलियां उलट गयीं। आंख की काली डिबरी दाएं-बाएं, बाएं-दाएं। बिछिया घंटों उसे अपनी गोद में समेटे रही।
यही कारण है कि बिछिया कोशिश करती थी कि उस बेटी को अपने आस-पास ही रखे। चूंकि वह हमेशा उस बेटी को अपने साथ रखती थी और उसे उसका अतिरिक्त ध्यान रखना पड़ता था तो वह और बच्चों का ध्यान कम रख पाती थी। ज्यादातर समय तो वह गर्भवती ही रहती थी और जो समय बचता था वह बहुत हद तक फुनगी की देखरेख में चला जाता था। ऐसी स्थिति में बड़ी बेटी लक्ष्मी उस छोटी सी उम्र में ही अपनी छोटी बहनों और भाई को गोद में लिए यहां-वहां घूमती रहती।
खैर जैसे-तैसे यह मामला यहां खत्म हुआ कि चार बेटियों के बाद विनायक को एक बेटा पैदा हुआ। बिछिया का परिवार नियोजन ऑपरेशन हो गया। बिछिया स्वस्थ हो गयी। विनायक का भी काम किसी तरह कई तरह के अवरोधों के साथ चल ही रहा था। एक तरह से विनायक और बिछिया के जीवन में शांति आ गयी थी। बिछिया और विनायक में वैसा ही प्यार अब भी बना हुआ था। विनायक के काम से लौटने का बिछिया इंतजार करती थी। विनायक बाहर से उसके लिए ढेर सारी मुस्कान लाता था।
लेकिन फिर एक दिन इस खुशी को किसी की नज़र लग गयी।
आठ
यह दिन और दिनों की तरह सामान्य दिन के रूप में शुरू नहीं हुआ था बल्कि आज का दिन ज्यादा खुशनुमा था। पिछले तीन-चार दिन इस परिवार के लिए फिर से कठिन गुजरे थे। पिछले बृहस्पतिवार को फिर से दबिश हो गयी थी। फिर से तोड़-फोड़ हुई थी। और सिर्फ तोड़-फोड़ ही नहीं, पुलिस विनायक को भी साथ लिए चली गयी थी। भाग नहीं पाया था विनायक। थाने में चार दिन तक बन्द रहा। शुक्रवार को कुछ निपटारा हो भी जाता लेकिन दरोगा जी कहीं और दबिश पर निकल गए। फिर शनिवार-रविवार को वह अपने घर चले गए। सोमवार को पैसों की डील हुई। घर से थाने की दूरी लगभग आठ-दस किलोमीटर होगी। बिछिया खाना बना देती, पिता वंशी पहुंचा आते। बिछिया पूछती, कब छूटेंगे। वंशी कहते ‘अब इ तो सिर्फ दरोगा साहिब ही बतला सकते हैं।’ चार दिन से ज्यादा थाने में क्या रखते दरोगा भी। और केस बनाकर जेल भेजने में दरोगा का अपना कोई फायदा था नहीं। तो सोमवार शाम को छूटे विनायक बाबू।
फुनगी की दवाई प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र से चलती थी तो सुबह अपनी साइकिल पर बैठाकर विनायक उसे वहां से दवा दिलवा लाया। और दिलवा लाया क्या, उसे वहीं से स्कूल छोड़ आया। फिर वह साइकिल से अपने ठीये पर जाकर उसकी थोड़ी मरम्मत और साफ-सफाई कर आया था। फिर नहा-धोकर, खाना खाकर साइकिल के कैरियर में दोनों तरफ दो गैलन लटकाकर कच्ची दारू लेने चला गया था। चलने से पहले उसने बिछिया को कमरे में खाट पर बिठाकर कहा था - ‘ईश्वर ने हमारी सारी मनोकामनाएं पूरी कर दी हैं। हम लोग अब एक दिन ठकुरवारी चलेंगे प्रसाद चढ़ाने। फिर उसने कहा था आज शाम को तुम दलपुड़ी और खीर बनाना। मैं शाम को थोड़ा सा गमकौआ चावल ले आउंगा खीर के लिए। तुम कहो तो थोड़ी जलेबी भी ले आउं।’ बिछिया ने मुस्कुराकर हां भर दी थी।
रोज दोपहर के बारह बजे के करीब विनायक साइकिल लेकर निकलता। उसे लगभग दो घण्टे के आस-पास दारू लेकर लौटने में लगते थे। दो-ढाई के आसपास वह अपने ठीये पर पहुंच जाता था। आज थोड़ा ज्यादा वक्त लगा। दारू की भट्ठी पर सबने उसके थाने की कहानी पूछना शुरु कर दिया था। तूं भाग क्यों नहीं पाया? यहां के बारे में बता तो नहीं दिया? कितने पैसे में छूटे तुम, तुम्हें पीटा तो नहीं, आदि-आदि।
विनायक गैलन लेकर साइकिल से आ रहा था तो वह काफी खुश था। उसकी आंखों के सामने उसका प्यारा परिवार था। उसे अचानक याद आया कि शाम को जलेबी लेकर घर चलना है तो उसके चेहरे पर मुस्कुराहट तारी हो गयी। वह अपने में खोया था। फिर उसे याद आया कि उसके अपने ठीये पर कुछ भी चखना तो बचा नहीं है। लेकिन फिर उसे याद आया कि पैसे भी तो नहीं हैं। सोचा, उधार ले लिया जाए। उसने चौराहा पार करते हुए दूर से ही चौराहे के इस पार की उल्लास की दुकान के बारे में सोचा। और सोचा ही नहीं बल्कि देखा भी। और उसी देखने के क्रम में उसे वहां एक पुलिस वाला खड़ा दिखा। खड़ा क्यों था, पता नहीं। परन्तु विनायक को ऐसा लगा कि वह उसी के लिए आया है। वह उसी की ताक में है। विनायक अचानक घबरा गया और घबराहट में ही सड़क पार कर लिया। वह बस बहुत तेजी में उस चौराहे को पार कर जाना चाह रहा होगा।
बहुत तेज आवाज आयी थी। पलक झपकते ही सब खत्म। साइकिल दूर गिरी थी। दोनों गैलन के ढक्कन खुल गए थे तो सड़क पर दारू बह रही थी। बस का पिछला पहिया विनायक के ऊपर से होते हुए बहुत तेज गति से भाग गया था। भीड़ जुटी। लेकिन सब खत्म।
नौ
उस दिन बिछिया को कम से कम चार से पांच बार दांती आयी। अगल-बगल के गोतिया-दियाद और थोड़ी देर बाद ननदें सब लोग जुट गए लेकिन साये की तरह साथ रहीं जुमनी फुआ। जुमनी फुआ ने अपने बच्चे की तरह उसे गोद में लिटाए रखा। उसके माथे को सहलाती रहीं। जब बिछिया को होश आया तब उसे चिंता फुनगी की हुई। कैसे वह यह सदमा बर्दाश्त कर पाएगी।
पिता का निश्प्राण शरीर वहां सामने ज़मीन पर रखा हुआ था और चारों तरफ रुदन छाया हुआ था। जुमनी फुआ ने मन में सोचा, अंततः उनकी परछाई पड़ ही गई इस फूल सी बच्ची के जीवन में। बड़ी बेटी अपनी उम्र से पहले ही बहुत समझदार हो चुकी थी। उसने फुनगी को संभाला। तीसरी बेटी भी कुछ समझ रही थी। लेकिन चौथी बेटी और बेटा चारों तरफ पसरे इस रुदन को देखकर लगातार रोए जा रहे थे। ऐसा लगा जैसे आसमान फट आया हो।
बिछिया ने कपड़े को हटाकर विनायक को देख लेना चाहा लेकिन लोगों ने रोक दिया। जुमनी फुआ ने पकड़ लिया। ‘देख ना पाओगी बेटी। ना जाने कौन जनम के पाप का भगवान ने यह बदला लिया।’ बिछिया ससुर के पैर पर गिर पड़ी। ‘बाबू इ तो उ पाकड़ के गाछ के पास भी ना गए। तब इ क्या हो गया! अब कौन से भूत ने हमारी जिन्दगी बरबाद कर दिया।’ पिता वंशी खुद होश में नहीं थे।
जब घर से अर्थी उठी तो एक विकराल खामोशी पीछे छूट गयी। अर्थी उठी तब टाट के साथ विनायक की साइकिल खड़ी थी। साइकिल को देखकर कोई कह नहीं सकता था कि इसी साइकिल पर सवार व्यक्ति की मौत हो गयी है। साइकिल को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे अभी विनायक आएगा और साइकिल निकाल कर उस पर चढ़ बैठेगा। ऐसे जैसे अभी विनायक उस साइकिल की सीट पर बिछिया को बिठा लेगा। बिछिया तितली है लेकिन इस तितली को प्यार करने वाला अब इस दुनिया से चला गया था।
औरतें नहीं जाती हैं घाट पे, लेकिन बिछिया को जाना पड़ा। आग तो बेटा ही देगा और बेटा तो महज डेढ़ साल का है। बिछिया गयी, बेटे को संभालने और जुमनी फुआ गयी, बिछिया को संभालने। घर पर बड़ी बेटी लक्ष्मी ने और बच्चों को संभाला। अगल-बगल की सारी महिलाओं ने कहा, करम ही फूट गया इस औरत का तो। अभी तो सारा जीवन पहाड़ सा पड़ा है। बिना मरद के पांच बच्चों के साथ जीवन बिताना तो श्राप है। मरद के बिना तो ऐसे ही औरत का जीवन मुश्किल है उस पे चार लक्ष्मी जी और हैं। अब तो भगवाने मालिक हैं।
विनायक की अर्थी उठ जाने के बाद जो एक खामोशी पीछे छूट गयी थी उसने बिछिया के जीवन में तूफान ला दिया।
बिछिया की उम्र इस समय लगभग बाइस वर्श थी। वह तेइसवें में प्रवेश करने वाली थी। वह तेइसवें में प्रवेश करने वाली थी अपने पांच बच्चों के साथ। वह तेइसवें में प्रवेश करने वाली थी और उसका पति अब उसके जीवन में नहीं था।
दस
दुख चाहे जितना भी बड़ा हो, जीना तो पड़ता ही है। और तब तो जरूर जीना पड़ता है जब आपका जीवन सिर्फ आपका ना हो। बिछिया के साथ पांच बच्चों की जिन्दगी जुड़ी हुई थी।
मुश्किल से तीन-चार महीने ही गुजरे होंगे कि स्थिति बहुत खराब होने लगी।
बिछिया एकदम चुप्प हो गयी थी। वह खाना बनाती थी। खाती थी। खिलाती थी। घर को लीपती थी। बच्चे को पालती थी। ससुर की देखभाल करती थी। वह घंटों अपने कमरे की खिड़की से खड़े होकर पाकड़ के उस विशाल पेड़ को देखती थी। उसे लगता था जरूर इस भूतहा पेड़ ने उसके जीवन में इतना बड़ा दुख लाकर खड़ा कर दिया है। वह उस पेड़ को देखती थी और उसे लगता था जरूर एक दिन पेड़ से लटकने वाली ये जड़ें कुछ बतलाएंगी। पेड़ की वे गझिन पत्तियां एक दिन उसकी गलतियां गिनाएंगी।
जुमनी फुआ घण्टों बिछिया को रुई के फाहे की तरह अपनी गोद में समेटे रखती थी। बिछिया भी उन्हें बिल्कुल अपनी मां मानती हुई उनकी गोद में समा जाती थी।
‘औरत का जीवन तो ऐसे ही मरद के भरोसे है बाबू। पूरा जीवन वह मरद के भरोसे ही चलती है। पहले बाप पालता-पोसता है फिर बिना कुछ पूछे-पाछे जब मन चाहे, बिना शादी की उमर देखे, ब्याह आता है दूसरे घर में। अपनी बला तो काट लेता है वह, लेकिन बेटी का क्या हुआ कुछ पता नहीं। फिर बेटी अपने पति के जीवन से जोड़ लेती है अपना जीवन। पति ठीक मिल गया तो ठीक, नहीं तो फिर जीवन पहाड़। लेकिन यह तो अनर्थ हो गया। अब कैसे कटेगा इ पहाड़ सा जीवन।’ जुमनी फुआ गोद में लेटी बिछिया के सिर पर हाथ फेरते हुए धीमे-धीमे कह रही थी तो इसमें उनका अपना दुख भी तारी हो रहा था।
‘एक तो अपना जीवन पहाड़ उस पर इ पांच बच्चों की जिम्मेदारी। आजकल के बदले जमाने में तो इ उमर में लड़कियों की शादी भी नहीं होती है। और इ फूल सी बच्ची पर इतनी बड़ी मुसीबत। इतनी उमर में ही क्या-क्या ना देख लिया बच्ची ने।’
बिछिया जानती है कि वह बहुत गहरे संकट में फंस गयी है। लेकिन उसे अपने विनायक से कोई शिकायत नहीं है। वो तो बेचारा इस परिवार के लिए खटते-खटते मर गया।
जुमनी फुआ ऊपर देखती है और लम्बी सांस लेते हुए कहती है ‘लेकिन भगवान है बाबू, वही सबकी रक्षा करते हैं। जिस भी प्राणी को जनम दिए हैं, उसको जिलाते भी वही हैं और बचाते भी वही हैं।’
विनायक के जाने के बाद आर्थिक संकट विकराल रूप में सामने मुंह बाए खड़ा हो गया था। बिछिया के पिता ने उसे कुछ पैसे पकड़ाए थे। वे पैसे बहुत थोड़े थे लेकिन बिछिया उन पैसों को बहुत संभालकर खर्च करना चाहती थी। उसे ऐसा लगता था जैसे इन पैसों के खत्म होने के साथ ही जिन्दगी भी खत्म हो जाएगी। बिछिया के ससुर वंशी की काम करने की आदत अब छूट चुकी थी। वंशी की उम्र अब पैंसठ के आसपास की होगी। लेकिन तब भी यह घर अभी उसी बूढ़े व्यक्ति की मजदूरी पर चल रहा था। बिछिया उन्हें सुबह खाना खिलाती। उनके लिए खाना बांध कर देती। लेकिन अक्सर एक-दो घंटे में वंशी लौट आते। मजदूरी के लिए एक बूढ़े को कौन चुनता। वंशी घर लौट कर आते तो उनका मुंह लटका होता। बिछिया उन्हें देखती तो ऐसे लगता वह अभी धरती में समा जाए। जिस दिन काम मिल जाता, शाम को लौटते हुए वंशी के चेहरे पर एक संतुश्टि होती। लेकिन उनका थका चेहरा बिछिया को दुखी कर देता। वंशी बूढ़ा हो चुका था और शरीर अब जर्जर हो रहा था। और उस पर यह दमा। दमा उठता तो बंद होने का नाम नहीं लेता। बिछिया का बहुत मन करता कि वह अपने बूढ़े ससुर का और अपने बच्चों का सारा दुख हर ले। परन्तु कैसे, पता नहीं।
पैसों का संकट इतना था कि बच्चों को भर पेट खाना कभी नहीं मिलता। बच्चे कमजोर हो रहे थे। इस घर में सात प्राणी थे। सात प्राणी को खाना खिलाना आसान नहीं था।
जुमनी फुआ बहुत चाहती थी कि वह मदद करे परन्तु वह सांत्वना के अलावा क्या दे सकती थी।
बिछिया के पिता भूंति भी अब काम छोड़ चुके थे। उनके दोनों बेटों की शादी हो गयी थी। उन दोनों बेटों के भरोसे ही बिछिया के माता-पिता का जीवन चल रहा था। बिछिया भाई के घर एक-दो दिन के लिए जा तो सकती थी परन्तु उसको आधार बनाकर आगे के लिए कुछ सोच नहीं सकती थी। बिछिया के पास इसके सिवा और कोई चारा नहीं था कि वह यहीं रहे और यहीं अपने बच्चों की देखभाल करे। लेकिन यहां रहना संभव कैसे था! उसने यह भी कई बार सोचा था कि वह मजदूरी करने जाए लेकिन उस पर पांच बच्चों की जिम्मेदारी थी।
ग्यारह
यह दृश्य महज तीन-चार महीने में ही संभव हो गया। बाहर आंगन में खाट पर बिछिया के ससुर वंशी बैठे हैं और सामने चौकी पर बिछिया के पिता भूंति।
बिछिया अपने कमरे के भीतर दरवाजे पर कान लगाए बैठी है। वह जमीन में नजरें गड़ाए हुए है। पैर की उंगलियों से वह मिट्टी खुरच रही है।
‘भगवान हमको ही उठा लिए होते। भाग्य ही फूटा है कि जवान बेटा चला गया।’ वंशी की आवाज कांप रही थी।
‘भगवान की मरजी के आगे किसकी चलती है वंशी बाबू। जिसकी जितनी उमर है उतना ही रहना है। सबका मन मोहकर चला गया वह। जो पीछे बचा रह गया रोने के लिए उसका क्या होगा?’ भूंति बाबू ने ढांढस बंधाने के साथ समस्या को भी सामने रखना चाहा।
‘हम क्या कहें, आप जो निर्णय लें।’
‘अरे ऐसा ना कहिए, अब हम कुछ नहीं हैं। बेटी आपकी है अब। अब सब कुछ आप ही हैं। जब वह ब्याह कर यहां आयी तो यही घर है उसका।’
‘देखिए हमारी तो उमर हो गयी। उस बेचारी के सामने तो पूरा जीवन पड़ा है। अभी उमर ही क्या है। जो आपको ठीक लगे आप करें, कनिया की भलाई के लिए मैं सबमें तैयार हूं।’
भूंति उम्र में वंशी बाबू से कम से कम दस साल तो छोटे होंगे ही। इसलिए उन्होंने उम्र का ख्याल रखते हुए भी कहा - ‘अगर आप आदेश दें तो दुबारा घर बसा दें बेटी का।’ फिर थोड़ा रुककर उन्होंने कहा- ‘बिना किसी मर्द के सहारे जीवन चलाना संभव भी कहां है औरत के लिए! कोई ना कोई सहारा तो चाहिए ही। किसी के साथ तो बांधना ही होगी बेटी को।’
वंशी बाबू थोड़ी देर चुप रहे और ऊपर आसमान की ओर देखते रहे फिर भूंति बाबू की तरफ देखकर कहा ‘ठीक है हमें क्या ऐतराज! अब हम हैं ही कितने दिन और। कब हैं कब नहीं, क्या पता! यह बात तो आप बिल्कुल ठीक कहते हैं समाज में अकेले औरत जात का रहना आसान थोड़े ना है।’
बिछिया यह सुन रही थी। अचानक उसे लगा जैसे वह घर से निकलकर दौड़ना शुरू कर दे। उसे लगा बाहर विनायक खड़ा है। वह दौड़ेगी और वह उसे गले लगा लेगा।
लेकिन वंशी बाबू ने थोड़ा रुककर एक बात कही, जिसे सुनकर बिछिया सिहर गयी।
‘लेकिन यह भी सोचिए भूंति बाबू कि हम भी तो अकेले हो जाएंगे। हमारे बुढ़ापे के लिए, जीने के लिए कोई मकसद तो छोड़ दीजिए।’
भूंति बाबू समझे नहीं। ‘आपका जो भी आदेश हो।’
‘कनिया का घर बसा दीजिए इ तो बहुत बड़ा अहसान होगा आपका हमारे ऊपर। पोता हमको दे दीजिए। किशन इस घर का और मेरा सहारा होगा। उसी को देखकर जी लेंगे बचा-खुचा जीवन।’
बिछिया सुनकर धक्क रह गई।
‘लेकिन अभी तो मुश्किल से दो साल का है’ भूंति ने कोई सवाल नहीं किया था बस यह एक जिज्ञासा थी।
‘अरे लड़का-फड़का तो पल ही जाता है। अभी तो जुमनी दीदी है, थोड़ा बहुत तो संभाल ही देगी।’
‘आप ही सोचिए ना कनिया का दूसरा घर बस जाए तो हमारा कुल तो खतम ही हो जाएगा ना।’
भूंति ने समझा था कि बिछिया के लिए यह एक कठिन निर्णय होगा लेकिन वंशी बाबू भी गलत तो नहीं हैं।
तो निर्णय यही हुआ कि बिछिया के घर बसाने की कोशिश भूंति बाबू शुरू करेंगे। बिछिया दरवाजे के पीछे बैठी थी और वह दरवाजे के पीछे ही बैठी रह गयी, भूंति उठकर वहां से चल दिए।
बारह
अब फिर से एक बार भूंति अपनी बेटी बिछिया का घर बसाने की कोशिश में जुट गए। वह यह जानते थे कि यह बहुत कठिन काम है। एक तो विधवा और उस पर भी पांच बच्चों की मां। स्थिति को समझते हुए वे बिछिया के लिए कोई उसकी उमर का लड़का भी नहीं ढूंढ रहे थे। बल्कि बिछिया से उम्र में बहुत अधिक उम्र के आदमी को ज्यादा ध्यान में रखा उन्होंने। लेकिन वे जितना कठिन इसे समझते थे उससे कई गुणा ज्यादा कठिन काम था यह।
बिछिया से दस-पंद्रह साल बड़ी उम्र के आदमी के लिए यह बहुत बड़ा मुद्दा था कि उसके चार बच्चों को कौन संभाले। भूंति हर जगह चार बच्चों के बारे में ही बतलाते। एक तो चार बच्चे और वह भी चारों बेटियां। लेकिन बिछिया का दुबारा घर बसने में जो सबसे बड़ा संकट था वह तो भूंति के दिमाग में आया ही नहीं था। कई लोगां ने, जिनसे बिछिया की शादी की बात हुई सबके सामने सवाल यह तो था ही कि चार-चार बेटियों की जिम्मेदारी लेनी होगी। वे इसके लिए तैयार हो भी जाते लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह था कि बिछिया अब तो बच्चा पैदा कर नहीं सकती है, तब क्या हम सिर्फ दूसरों के जनमाए बच्चों का बाप कहलाएं।
वे लोग जिनकी पत्नियां मर चुकी थीं जिनके घर में दो-चार बच्चे पहले से थे वह भी यह सवाल सामने रखते थे कि अरे भाई कम से कम उसके साथ एक बच्चा तो हमारा हो। ऐसा कैसा ब्याह कि एक भी बच्चा पैदा ही ना हो। लोगों ने सबसे ज्यादा प्रतिवाद इस पर किया कि वह उसे अपने घर में बिठा भी ले, वह उसकी चार बेटियों की जिम्मेदारी ले भी लें लेकिन एक बच्चा तो अपना हो। ऐसे थोड़े ना कोई इतनी बड़ी जिम्मेदारी लेगा भाई। सबने यह कहा कि कृतार्थ करने के लिए पूरी दुनिया में हमीं नहीं ना बचें हैं भाई। परिवार नियोजन ना किया होता तो घर में बिठा भी लेते।
भूंति को भटकते हुए छः-आठ महीने गुज़र गए और सभी जगह से एक ही जवाब। वे समझ गए कि कुछ नहीं हो सकता है।
भूंति यह समस्या वंशी बाबू को सुना आए और हार मानकर घर बैठ गए। उनकी हिम्मत नहीं हुई कि वे अपनी बेटी और नाती-नातिनों से आंख मिला सकें। उन्होंने कनखियों से देखा, वे बच्चे सूख कर कांटा होते जा रहे हैं। उन्होंने किशन को देखा, उसका चेहरा एकदम से मुरझा गया था। वह दर्द में था और रो रहा था। भूंति वहां से उलटे पांव लौट आए।
तेरह
पिता के निधन से दो-चार महीने बाद से ही बिछिया का बेटा किशन लगातार रोता ही रहता था। वह रोता तो ऐसा लगता जैसे वह तड़पकर मर जाएगा। अब वह लगभग दो वर्श का हो रहा था लेकिन उसके शरीर में फुर्ती एकदम से खत्म हो गयी थी। वह या तो बैठा रहता या फिर जमीन पर लोट-पोट कर रोता रहता। बिछिया को यह समझ में आ रहा था कि बच्चों का पेट भर नहीं रहा है। वह किशन को अपने से चिपटा कर दूध पिलाना चाहती थी लेकिन अब वहां भी दूध कहां। किशन उससे दूध खींचने की कोशिश करता और बिछिया तड़प जाती।
कभी भी ऐसा नहीं होता था कि खाना सभी की थाली में पूरा पड़ जाए। वह थाली में खाना निकालती और बच्चे उस पर झपट्टा मार देते। दो मिनट में खाना खत्म। बिछिया दुबारा खाना पूछ नहीं पाती बच्चों को।
अंततः वह एक दिन फुनगी और किशन को लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र गयी। वहां डॉक्टर सिर्फ दो दिन ही आते थे। मंगलवार और शुक्रवार। कम्पाउंडर ने किशन को देखा और कहा आंत में सूजन आ गयी है। उसने फुनगी की दवा छोड़ देने पर भी बिछिया को बहुत डांटा। उसने कहा अगर दवा नहीं खिलाओगी तो वह एक दिन पागल हो जाएगी। बिछिया ने अस्पताल से दवा मिलने की बात कही, लेकिन कम्पाउंडर ने उसे डांटकर भगा दिया। बिछिया के पास दवा खरीदने के पैसे नहीं थे।
बिछिया के पिता ने जब उसके दोबारा घर बसाने की बात की थी तो उसे बुरा लगा था लेकिन धीरे-धीरे उसे यह समझ आ गया था, अकेले रहना इस जीवन में बहुत कठिन है। वह जानती थी कि उसके दुबारा घर बसने में सबसे बड़ा दुख यह था कि उसे अपने बेटे को अपने से अलग करना पड़ेगा, लेकिन उसने अपने मन मन को समझा लिया था। उसे लगने लगा था कि इस रास्ते से कम से कम उसके बच्चे जिंदा तो रह पाएंगे। उसने यह मान लिया था अब यही एक रास्ता उसके पास बचा रह गया है। वह अपनी आंखों के सामने बच्चों को तड़पते देखना नहीं चाहती थी। वह अपने सामने बूढ़े ससुर को भी मजदूरी करते-करते मर जाते नहीं देखना चाहती थी। बिछिया को रात-रात भर चिंता में नींद नहीं आती थी। उसे दिन में अंधेरा दिखने लगा था। उसने सोचा अगर बच्चों की चिंता में वह मरने के बारे में ना भी सोचे तब भी कहीं इस तरह चिंता में घुलकर मर न जाए और तब उसके बच्चों का क्या होगा। वह घबरा जाती थी और घबराहट में ऐसा लगता था कि उसका हृदय काम करना बंद कर चुका है। वह उठती और टहलने लगती। वह अपने छाती पर जोर-जोर से मुक्का मारती और उसे जगाने की कोशिश करती। बड़ी बेटी लक्ष्मी इसे देखती और मां को कसकर पकड़ लेती।
लेकिन जिस दिन उसके पिता ने हार मानकर यह स्वीकार कर लिया था कि दुबारा उसका घर बसाना अब संभव नहीं है। तब पहले तो उसे इस परिवार नियोजन के ऑपरेशन पर गुस्सा आया था। परन्तु रात में सोते हुए उसने बहुत सोचा और फिर उसे लगा क्या पता ईश्वर ने जो दिया है वही हमारी ताकत हो। उसने अपने मन में कुछ दृढ़ संकल्प किया। मन में ही विनायक को याद किया। मन में ही विनायक से बात की। मन में ही उसने विनायक से कहा, हमारे बच्चे भूख से नहीं मरेंगे। विनायक का चेहरा खुश था। विनायक बिछिया के निर्णय के साथ था।
चौदह
बिछिया सुबह उठी तो उसके चेहरे पर एक आत्मविश्वास था। वह सबसे पहले उस टाट वाली झोपड़ी में गयी, वहां विनायक की साइकिल रखी थी। उसने उस साइकिल को बाहर निकाला और उसकी सफाई की। साइकिल को कुछ भी नुकसान नहीं हुआ था बस उसके टायर में हवा नहीं थी। जो थोड़ा बहुत घर में था बिछिया ने खाना बनाया। ससुर को खाना दिया। जुमनी फुआ आकर बैठी तब उसने ससुर से बात छेड़ी। बिछिया ने पहले ससुर का आशीर्वाद लिया। फिर अपने मन की बात की।
उसने सीधे मुद्दे पर आते हुए कहा ‘लक्ष्मी के बाबू वाला काम शुरू कर रहे हैं आपका आशीर्वाद चाहिए।’ वंशी सन्न रह गए।
‘यह क्या पागलपन है।’ विनायक का काम एक औरत के वश का है क्या! वंशी घर के हालात को बूझते थे। ‘मैं जानता हूं घर के हालात बहुत खराब हैं। मुझसे भी यह नहीं देखा जाता। लेकिन कनिया, औरत जात यह काम कैसे करेगी! एक तो दारू का काम उस पर भी यहां तो यह गैरकानूनी भी है।’ ‘रोज थाना पुलिस का चक्कर है इसमें। जेल भी जाना पड़ता है। यह समाज कितना गिरा हुआ है, तुम नहीं जानती हो। औरत जात के ताक में तो बाहर सारे राक्षस बैठे हैं। कुछ और सोच लो बाबू। हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।’
‘बाबू हमें करने दीजिए यह काम, आप विश्वास कीजिए कोई थाना कचहरी नहीं होगा। वे मर्द थे तो हम भी औरत हैं। औरत भी सब कर सकती है बाबू। औरत भी पूलिस का डंडा खा सकती है। औरत भी थाना-कचहरी कर सकती है। हमारा बच्चा पल जाएगा बाबू। नहीं तो सब तड़प-तड़प के मर जाएगें। और हमको कुछ आता भी तो नहीं। जो कुछ उनसे सुने-समझे थे, वह यही है। कर लेने दो बाबू। एक धक्का मार लेने दो। ना करेंगे तो भी तो सब धीरे-धीरे मर ही रहे हैं। लड़ लेने दो बाबू। क्या पता हम सब जी जाएं।’ बिछिया ने आज तक कभी अपने ससुर से इतनी बात नहीं की थी।
वंशी को बिछिया के काम करने से दिक्कत नहीं थी। लेकिन वे जानते थे कि इस काम में कितना जोखिम है।
‘औरत को लड़ लेने दे वंशी। औरत लड़ेगी तो गुस्से में लड़ेगी। जुनून में लड़ेगी। वंशी इ सिर्फ किसी की औरत नहीं, कइयों की मां भी है। और मां अपने बच्चे के लिए खूखांर शेरनी होती है। बाहर सारे राक्षस बैठे हैं तो क्या औरत निकलना छोड़ दे! ताक में रहने दो सबको, औरत तो सिर्फ अपनी मर्जी की मालिक होगी। इन मर्दों के चक्कर में क्या औरत घुट-घुट कर मरती रहे!’ जुमनी फुआ का चेहरा एकदम तमतमा रहा था।
बिछिया ने जुमनी फुआ की इस सत्तर-बहत्तर की उम्र में भी सौन्दर्य को देखा। जुमनी फुआ का चेहरा दिपदिपा रहा था। बिछिया ने फिर से अपने मन में सोचा, मर्द को पता नहीं कौन सा सौन्दर्य चाहिए?
वंशी के मन में शंका थी परन्तु उसने हामी भर दी।
‘आप उस पाकड़ के पेड़ के नीचे एक झोपड़ी बना दो बाबू। झोपड़ी बनते ही शुरू करते हैं काम।’
शंका के बाद भी वंशी ने जो सहमति दी थी उसमें एक गजब का झटका लगा।
‘कैसी बात करती हो कनिया? वहां तो भूत का डेरा है। वहां कैसे?’
‘बाबू हमें बच्चों को जिंदा भी रखना है और उन्हें संभालना भी है।’
‘उ मार देगा तुमको, बहुत खतरनाक है।’
‘अभी कौन सा जिंदा रह गए हैं। जब बाहर ताक में बैठे सारे मर्दों से लड़ ही लेंगे तो भूत क्या चीज है बाबू। आप निश्चिंत रहो। कुछ नहीं होगा। जिंदा भी रहेंगे और खाना भी खाएंगे। बस आप एक छप्पर छान दो बाबू वहां पे। यहां बाहर सड़क पर जो भूत खुले आम घूम रहे हैं उससे तो कम ही भूत होगा वह।’ बिछिया आज नहीं मानने वाली थी।
‘लेकिन यहां इस भुतहा पेड़ के नीचे कौन दारू पीने आएगा।’ यह आखिरी शंका थी वंशी की।
‘बाबू! हम दारू की दुकान खोल रहे हैं किराना की नहीं कि लोग आएंगे नहीं। लोग आएंगे भी और हम बेचेंगें भी। बस आप अपने आशीर्वाद से आज से ही छप्पर बांधना शुरू कर दो।’
‘आशीर्वाद दे दे वंशी, यह अब रुकने वाली नहीं है।’
जुमनी फुआ के चेहरे पर आज संतुश्टि थी, ऐसा लग रहा था जैसे वर्शों का कोई बदला आज पूरा हो रहा है।
‘लेकिन कुछ तो पैसा चाहिए ही होगा छप्पर बांधने के लिए।’
ऐसा लग रहा था कि आज बिछिया सारी तैयारी करके बैठी है। उसने ससुर की इस शंका का भी समाधान कर दिया। वह खपरैल वाले अपने कमरे में गयी, अपने पिता के दिए पैसों में से आखिरी के बचे हुए पैसों को उसने निकाला, उसे देखा, वे बहुत थोड़े थे। बाहर आकर उसने उन रुपयों को ससुर के हाथ में थमाया। फिर उसने खड़े-खड़े अपने पैरों की ओर देखा। दोनों पैरों में चांदी की बिछिया अभी बाकी थी, विनायक की निशानी। बिछिया ने मन में सोचा, सांस लेने के लिए अभी यह काफी है। उसे याद आया विनायक के गुजर जाने के बाद भी बिछिया ने उसकी इस निशानी को कभी अपने से अलग नहीं किया था। उसने पैरों की उंगलियों से बिछिया निकालना चाहा, बिछिया उंगली में फंसी हुई थी। बिछिया ने बहुत आराम से जमीन पर बैठ कर धीरे-धीरे उन्हें उंगली से निकाला। उसने ऊपर देखा और विनायक के लिए अपने मन में बुदबुदाया ‘तुमको मन में बसाए रखने के लिए बिछिया का बंधन जरूरी नहीं है।’ फिर अपने चेहरे पर एक आत्मविश्वास लाते हुए उसने विनायक से कहा ‘जिन्दा रहने के लिए तो इस बिछिया को उंगलियों से निकालना ही पडे़गा।’ फिर उसने साइकिल को घसीटते हुए बाहर की ओर चलना शुरु कर दिया। चांदी की दोनों बिछिया तब उसके हाथ में थीं।
पंद्रह
बचपन में बिछिया ने साइकिल चलायी हुई थी इसलिए उसे साइकिल चलाने के लिए बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ी। एक-दो दिन थोड़ा अटपटा लगा। एक-दो दिन बेटी ने साइकिल को पीछे से थामा। लेकिन फिर सारा डर निकल गया। साइकिल पर बैठकर वह चलने लगी तो ऐसा लगा जैसे हवा से बातें कर रही है। साइकिल पर वह चल रही थी और पेड़-पौधे, सड़क, घर, सड़क किनारे ऊपर तक धोती समेटे बैठे लोग, सब पीछे छूटते जा रहे थे। साड़ी में साइकिल चलाने में बिछिया को शुरु में कुछ दिन थोड़ी परेशानी हुई। उसने पल्ले को सिर से उतार कर उसे आगे से घुमाकर कमर में खोंस लिया।
वह साइकिल पर बैठती तो उसके घुटने के नीचे का हिस्सा दिखता। पहले एक-दो दिन जब वह आस पास में ही साइकिल चलाने का अभ्यास कर रही थी तब उसकी परेशानी साड़ी में साइकिल पर बैठने की थी। लेकिन उसके बाद परेशानी का सबब बना उसका घुटने के नीचे का दिखने वाला हिस्सा। बहुत शर्म आ रही थी उसे। उसने साड़ी को बहुत नीचे तक खींचने की कोशिश की। साड़ी को चाहे जितना भी नीचे खींचने की वह कोशिश करती उसकी टांगों का थोड़ा हिस्सा दिखता। उसे लगा वह हार जाएगी। उससे नहीं हो पाएगा यह। वह साइकिल पर बैठती तो ऐसा लगता जैसे आते-जाते सारे मर्दों की निगाह उसकी टांगों के उसी हिस्से पर है। वह हार रही थी।
उसने अपना पुराना वाला बक्सा निकाला, उसमें विनायक के मौजे थे, जिन्हें विनायक ने शादी में पहना था। शादी में पहना हुआ उसका सारा कपड़ा उस बक्से में जस का तस पड़ा हुआ था। बिछिया ने उन मौजों को पहन लिया। टांग में जहां तक साड़ी थी और जहां तक मौजे थे उस बीच में बहुत कम ही जगह बच रही थी। वह बहुत आश्वस्त हुई। उसने इस तरह साइकिल चलाना शुरु किया।
दो-तीन दिनों में ही वंशी ने पाकड़ के पेड़ के नीचे छप्पर छार दिया था। सिर्फ छप्पर नहीं, पूरी एक झोपड़ी। तीन तरफ से दीवार और सामने बंद करने के लिए टाट भी बनाया। टाट को बंद कर दो तो झोपड़ी बंद। वंशी छप्पर छारते हुए काफी डरा हुआ था। झोपड़ी बनाकर एक बार क्या लौटा वंशी कि दोबारा देखने जाने की हिम्मत भी नहीं हुई उसकी। वह अपने घर में बैठता-लेटता और बच्चों की निगरानी करता।
जब पहले दिन साइकिल के कैरियर में एक गैलन लटकाकर अपने काम पर निकली बिछिया तो उसे डर तो लगा था। शुरु में उसने सोचा था कि वह एक गैलन ही माल लाए। डर उस चौराहे पर भी लगा था जहां उसका विनायक उससे बिछुड़ गया था। उसने साइकिल से उतर कर उस चौराहे को पार किया था। इसमें कोई शक नहीं है कि पहले दिन से लेकर कई दिनों तक उसके लिए यह सब कुछ अजीब था। वह दारू की भट्ठी पर अकेली औरत थी और इस नाते वह अजीब सी स्थिति को झेल रही थी।
वह खोजती-ढ़ूंढती दारू की भट्ठी तक पहुंची। जब तक वह वहां पहुंची नहीं थी उसके अंदर आत्मविश्वास था। उसने मन में ठान लिया था कि मर्दों की इस दुनिया को वह तहस-नहस कर देगी। लेकिन व्यावहारिकता में यह इतना आसान नहीं था। उसने भट्ठी से पहले ही अपनी साइकिल रोक ली। जहां वह खड़ी थी वहां से भट्ठी दिख रही थी। चिल्ल-पों मचा हुआ था। गालियों का शोर यहां तक आ रहा था। बिछिया सहमी खड़ी रही। वहां सारे जवान लड़के ही दिख रहे थे जो पूरी तरह से अपनी रौ में थे। वह कुछ देर तक वहीं खड़ी रही। उसके सामने नदी थी। नदी में अभी पानी बढ़ा हुआ था, हिलोरें मार रहा था। वह बहुत देर तक उसे देखती रही। दिल धक-धक कर रहा था। कान के पीछे से पसीने की धार बह रही थी। बहुत देर तक एकटक उस नदी की हिलोर को देखते रहने से उसका मन और घबराने लगा। ऐसा लगा जैसे अभी एक बहुत तेज हिलोर आएगी और उसे खींच लेगी। वह घबरा गई और सतर्क हो गयी। उसने भट्ठी की तरफ आगे बढने की सोचा। एकदम पास आ जाने पर शोर अचानक से तेज हो गया।
दो जवान लड़के आपस में इसलिए भिड़ गए थे कि वे एक दूसरे के ग्राहकों को तोड़ रहे हैं। दोनों एक दूसरे से गुत्मगुत्था थे। ऐसा लग रहा था कि दोनों एक दूसरे की जान ले लेंगे। भट्ठी का मालिक उन्हें बहुत ध्यान से देख नहीं रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे यह सब यहां रोज का काम है। वह अपनी मुंडी नीचे किए अपने काम में व्यस्त था। उसने ज्यां ही अपनी मुंडी उठायी सामने एक स्त्री को खड़ा पाया।
भट्ठी का मालिक, जिसका नाम खंखर था, की उम्र पचास-पचपन के करीब होगी। लेकिन वह अपनी उम्र के हिसाब से काफी हट्टा-कट्टा था। उसने उठकर उस स्त्री के पास आने से पहले उन लड़कों की तरफ जाने का निर्णय लिया। उसने दोनों को डपटते हुए कहा, दोनों को आज से दस दिनों तक माल नहीं मिलेगा। बस फिर एक था, दोनों एक मिनट में उठ खडे़ हुए। अब वह बिछिया के पास आया और उससे पूछा, ‘क्या आप यहां किसी को ढूंढ रही हैं?’
‘नहीं’ बिछिया ने घबराकर कहा।
‘क्या आप हमें पुलिस से पकड़वाने आयी हैं?’ अपने व्यवहार में खंखर काफी विनम्र था। लेकिन तब तक में उसकी निगाह उस साइकिल और उस गैलन पर गयी। वह उस गैलन और उस साइकिल से परिचित था। अगर सामान्य बात होती तो शायद उसे याद नहीं भी रहता लेकिन चूंकि ये चीजें एक दर्दनाक हादसा से जुड़ी थीं, इसलिए उसे यह याद था।
‘आप विनायक की पत्नी हैं?’ बिछिया ने बिना कुछ कहे सहमति में अपना सिर हिलाया। खंखर ने सब समझ लिया। उसने तुरंत लड़के को गैलन भरने के लिए कहा। गैलन में शराब लेकर बिछिया ने अपने आंचल के छोर से पैसे निकालकर दिए। वह बहुत कम थे। उसने कहा, कोई बात नहीं आगे हिसाब हो जाएगा।
लड़के ने गैलन को साइकिल में टांग दिया। बिछिया ने ज्यों ही साइकिल को अपने हाथ में थामना चाहा साइकिल जिस तरफ बोझ था उस तरफ गिरने लगी। खंखर, जो अभी वहीं पास में ही खड़ा था उसने तुरंत साइकिल को थाम लिया। उसने कहा, आप एक गैलन को नहीं ले जा पाएंगी इससे साइकिल का संतुलन बिगड़ जाएगा। बिछिया के पास लेकिन अभी एक ही गैलन था। खंखर ने अपने लड़के को एक खाली गैलन लाकर इस माल को दोनों गैलन में बराबर बांटने को कहा। दोनों गैलन को साइकिल के दोनों तरफ लटकाया गया। साइकिल के संतुलन को बनाकर तब खंखर ने बिछिया को साइकिल थमाया। बिछिया सकुचायी हुई थी। वह उन्हें धन्यवाद कहना चाहती थी, लेकिन हलक से आवाज नहीं निकली।
‘आप बहुत हिम्मती हैं। औरतों को हिम्मती ही होना चाहिए। अपने बच्चों का जीवन चलाने के लिए जो आप कर रही हैं, यह हिम्मत एक औरत ही कर सकती है। हमसे जो मदद बन पड़ेगा, हम पीछे नहीं हटेंगे।’
बिछिया की आंखों से आंसू की बूंदें टपक गयीं। बिछिया ने उसे खंखर से छुपा लिया।
पहले दिन जब दोनों गैलन भरकर बिछिया अपने घर पहुंची तो उसके स्वागत के लिए जुमनी फुआ दरवाजे पर खड़ी थी। फुआ ने उसकी बलाएं लीं। और उसे अपने कलेजे से लगा लिया। उन्होंने वहीं खेल रहे बिछिया के बच्चों की तरफ देखा और मुस्कुरा दी।
सोलह
आज काम का पहला दिन है, बिछिया ने ससुर से आशीर्वाद लिया। जुमनी फुआ का आशीर्वाद लिया। बच्चों को प्यार किया। उसने पाकड़ के पेड़ के पास जाकर उसके नीचे खड़े होकर उसे गौर से देखा। उसने अभी तक इस पेड़ को दूर से अपने कमरे से देखा था। अभी वह इसे ठीक उसके नीचे खड़े होकर देख रही थी। इस पेड़ के एक तरफ से एक झुग्गी बना दी गयी थी। पेड़ की ढेर सारी जड़ जैसी लताएं चारों तरफ लटक रहीं थीं। उस पुराने पेड़ की जड़ इतना मोटी थी कि उससे चारों तरफ बैठने की व्यवस्था बन गयी थी। बिछिया ने उस पेड़ को देखा, उसे छुआ। उसे अपने ससुर के द्वारा सुनाई गई कहानी याद आ गयी। अचानक उसकी आंखों के आगे उसके बच्चों के चेहरे आ गए। एक पल को उसे डर तो लगा। उसने पेड़ के ठीक नीचे खड़े होकर अपने मन में बुदबुदाया - ‘मेरे बच्चों के जीवन का सवाल है, तुम्हें मेरा साथ देना ही होगा।’ फिर उसने पेड़ से लटक रही जड़ों में से एक जड़ को पकड़कर उसे चूम लिया।
बिछिया ने गैलन को खोलकर उसे परोसा तो एक गंध वहां फैल गयी। वह इस गंध से बहुत करीब से परिचित है। बिछिया ने जब पहले ग्राहक से पाए हुए पैसों को छुआ तो उसके हाथ में सिहरन आ गयी। उसने उसे अपने माथे से लगा लिया।
शाम को जब वह अपने काम से घर लौटी तो ससुर खाट पर लेटे थे। उनके अंदर एक जिज्ञासा थी यह जानने की कि इतनी मेहनत और हिम्मत से शुरु किया गया काम कितना सफल हुआ। ससुर को खाट पर लेटे देख बिछिया ने अपने कमर में खुंसे हुए पल्लू को निकालकर सिर पर रख लिया। वंशी ने बहू के सिर पर हाथ फेरा। ‘हम गलत थे बाबू। औरत चाह ले तो सब कुछ कर सकती है। इस बुढापा में तुम तो वो सहारा बने जो एक बेटा भी नहीं बन पाता। बहुत लम्बी जिनगी मिले तुमको। हमारा आशीर्वाद साथ है तुम्हारे।’
बिछिया ससुर के चेहरे की संतुश्टि से बहुत खुश हुई लेकिन उसके मन में डर बहुत था।
कमरे के भीतर जुमनी फुआ बैठी है। बेटा चौकी पर सो रहा है। उसकी सांसें बहुत तेज थी। उसने सिर्फ हाफ पैंट पहना हुआ था। बिछिया ने उसे गौर से देखा वह एकदम कंकाल जैसा लग रहा था। उसके फेफड़े की सारी हड्डियां दिख रही थीं। बिछिया बेटे के करीब गई और उसके गाल को सहलाया।
जुमनी फुआ जमीन पर बैठी है। बिछिया की चौथी बेटी फुआ के बगल में लेटी है। उसकी आंखें खुली है, वह खपरैल की छत को देख रही है। फुनगी उस चौकी से सटकर एकदम डरी हुई बैठी है। कहीं कोई आवाज नहीं थी लेकिन वह पता नहीं क्यों डरी हुई थी।
जुमनी फुआ ने बिछिया को देखा तो वह जमीन से खड़ी हो गयीं। बिछिया ने अपने आंचल में बंधे पैसों को निकाल कर जुमनी फुआ के पैर पर रख दिया। जुमनी फुआ ने बिछिया को उठाकर गले से लगा लिया। फुआ ने बिछिया के शरीर से निकलने वाली गंध को महसूस किया। कुछ देर तक उन्होंने उसे गले रखाए रखा। फुआ का कंधा भीगने लगा तब उन्होंने बिछिया को जमीन पर बिठाया और खुद भी फिर से जमीन पर बैठ गईं।
‘हम तो ऐसी किस्मत लेके आए फुआ कि मर भी नहीं सकते। इ जो थोड़ी सी सांस बची है बस इसको बचाना है फुआ।’ बिछिया ने बेटे और बेटी की ओर इशारा करते हुए कहा।
‘हम क्यों मरें बाबू? मर्दों की इस दुनिया में हम हमेशा मरते ही क्यों रहें। वह हमें छोड़ न दे, इस डर में हम मरें। वह हमारी ताक में बैठा है, इस डर में हम मरें। वह कहीं हमारे साथ कुछ ऊंच-नीच न कर दे, इस डर में हम मरें।’
‘यह दुनिया-समाज मर्दों ने अपने लिए बनाई है इसलिए ताकि वह आराम से यहां राज कर सके। यहां सब कुछ उनका है, सब लोग भी उनके हैं ताकि कोई सवाल उठाए ही नहीं। गलत तो हम हैं जो वे इस तरह दुनिया बनाते रहे और हम चुपचाप देखते रहे। हमने कुछ पूछा नहीं, कुछ टोका नहीं। पूरा जीवन इस पश्चाताप में काट दिया कि काली थी। अपने बारे में कभी सोचा ही नहीं। उसने कहा कि तू काली है और मैंने मान लिया। लोग कहेंगे तुम कमजोर हो, तुम मत मानना। लोग कहेंगे बिना मरद के सहारा के तुम कैसे काटोगी जीवन, तुम मत मानना। लोग कहेंगे यह औरतों का काम नहीं है, तुम मत मानना। ये कहने वाले वे हैं कौन? यह दुनिया, सड़क, हवा, पानी, दारू सिर्फ उनका नहीं है बाबू। हम भी यहीं रहेंगे, यहीं जीएंगे।’
बिछिया बस सुनती रही। बिछिया के मन में आत्मविश्वास बहुत है परन्तु वह जानती है कि इस काम को शुरु करना जितना मुश्किल था उससे कई गुणा पहाड़ सामने खड़ा है।
‘उ लोग करने देंगे तब ना फुआ। मर्द लोग तो भाग-छिपकर यह काम कर रहे थे। उ तो थाना में बंद भी हो जाते थे। हम कैसे टकराएंगे इनसे।’
‘देखो बाबू अपनी सोच और अपनी देह के मालकिन तुम खुद हो। याद रखना यह काम चल रहा है तो बच्चों का जीवन है। नहीं तो सब मर जाएंगे भूखों। इन बच्चों की भूख की तड़प दिखती है ना तुमको। तुम्हें बस इस भूख से पार पाना है।’
‘मर्दों ने इस दुनिया को अपने लिए बनाया और औरतों को उसमें तमाम तरह के बंधनों में बांध दिया। लेकिन एक बात याद रखना कि अपनी इस दुनिया में सबसे ज्यादा परास्त वह औरतों से ही है। बस औरतों ने उसे कितनी बार परास्त किया और किस तरह परास्त किया उसे याद नहीं रखा। औरत परास्त करती है और भूल जाती है। जैसे औरत सबकुछ को रचती-बचाती है और अपना मान करना भूल जाती है। औरत, औरत होने के कारण यदि आज समाज में किनारे पर फेंक दी गयी है तो वह अगर चाह ले तो औरत होने के खातिर ही राज भी कर सकती है। बस उसे इतना करना है कि उसे खुद को अपने मन और शरीर का मालिक मान लेना है। बस उसे अपनी इज्ज़त करनी है। बस उसे अपना मान करना है।’
बिछिया ने जुमनी फुआ के चेहरे को देखा, वहां एक गजब का ठहराव था। बिछिया ने सोचा जुमनी फुआ इतना सब कैसे सोचती है।
जुमनी फुआ ने बिछिया के ललाट को चूम लिया।
सत्रह
धीरे-धीरे सब सामान्य होने लगा। बिछिया का काम सही चलने लगा। लोगों के लिए यह और आसान हो गया कि वह इस गांव में प्रवेश किये बिना ही मुख्य रास्ते से कोना-कोनी इस पाकड़ के पेड़ तक पहुंच जाएं। बिछिया ने कुछ ही दिनों में मौजा पहनना छोड़ दिया था। अब साइकिल चलाते हुए बिछिया को कभी ध्यान भी नहीं रहता कि उसकी टांगे साड़ी के बाहर दिख रही हैं।
लोगों तक कैसे पहुंचेगी इस दुकान की खबर, इस बात की चिंता बिछिया को कभी भी नहीं हुई। शुरुआत में ही खंखर का इस तरह का साथ मिल जाने से बिछिया के अंदर आत्मविश्वास पैदा हो गया। बिछिया के घर के बगल से रास्ता था वहां पहुंचने का। वह वहां जाती, काम करती और बीच-बीच में समय रहते बच्चे भी देख लेती। बिछिया इतना कमाने लगी कि उसका घर चलने लगा। उनके बच्चे जिंदा बच गए। बिछिया रोज विनायक को याद करती। विनायक उससे अलग कहां था, वह तो हमेशा उसके साथ ही था।
घर में रुपये आने लगे तो बच्चों के चेहरे पर थोड़ी-थोड़ी खुशी लौटने लगी थी। बिछिया समय निकालकर बच्चों को प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर दिखा भी लाती और दवाई भी खरीद लेती। बिछिया के बेटे की हड्डियां मांस से अब छुपने लगी थीं।
सबसे बड़ा फर्क फुनगी के व्यवहार में आया था। फुनगी थोड़ी बड़ी हो रही थी और वह अपनी मां को समझने लगी थी। वह अपनी मां को इस तरह के कठिन और कठोर निर्णय लेते हुए देख रही थी तो उसके अंदर भी आत्मविश्वास आ रहा था। उसके चेहरे पर अब थोड़ी-थोड़ी मुस्कुराहट आने लगी थी। फुनगी ने उस दिन अपनी मां के पुराने बक्से में से टिकुली निकाली थी और अपनी मां के माथे पर चिपका दिया था। उसने कहा - ‘तुम इसे रोज लगाया करो। ऐसे चेहरा सूना-सूना लगता है। बाबू नहीं रहे, तो क्या हम सब भी नहीं हैं? तुम टिकुली लगाती हो तो तुम्हारा चेहरा हंसता है।’ और फिर ऐसा कहते हुए फुनगी ने अपनी मां के गाल पर एक चुम्मी ले ली थी। मां का चेहरा खिल गया था।
अठारह
आज जब इस कहानी को लिखा जा रहा है तब इस ठीये को खुले हुए लगभग एक वर्ष से ऊपर हो गया है। तब, अब सवाल यह है कि जिस धंधे के लिए विनायक को इतने संकट झेलने पड़ते थे तो उस काम में बिछिया को कभी संकट का सामना क्यां नहीं करना पड़ा। क्यों इस एक वर्श में बिछिया को कभी थाने में बंद नहीं होना पड़ा। और बंद होना तो छोड़ दिया जाए, क्यों कभी पुलिस वालों ने उसके इस ठीहे को तोड़ नहीं दिया।
गांव में कई तरह की बातें हैं। कुछ लोग कहते हैं कि बिछिया धीरे-धीरे इतनी दबंग हो गई कि किसी की क्या मजाल कि उसे छू भी दे। आग है पूरी आग। बिछिया औरत होके सारे काम खुद करती है। लेकिन राह चलते या दारू की भट्ठी पर या फिर इस ठीये पर आज तक किसी की हिम्मत नहीं हुई कि उसे गन्दी निगाह से देख भी ले।
एक बार यह हिमाकत भुवली ने की थी। यह खबर बहुत दूर तक फैली कि भुवली ने दो गिलास पीने के बाद बिछिया के साड़ी के बीच से दिखने वाले पेट के हिस्से पर हाथ फेर दिया था। बस फिर क्या था। बिछिया बाज की तरह झपट्टा मारकर, पलटकर उसकी छाती पर बैठ गई थी। उसके हाथ में उसी गिलास का टुकड़ा था उसने उस टुकड़े को उसके गले पर सटा दिया था। गले पर खून उतर आया था। सारा नशा एक बार में झन्न से उड़ गया। यह खबर आग की तरह फैल गई। बस उसके बाद किसी की मजाल कि उसकी तरफ आंख उठाकर भी देख ले। कहते हैं भुवली ने पैर पर नाक रगड़-रगड़ कर माफी मांगी।
कहते हैं कि एक बार पुलिस वालां ने दबिश कर दी। बिछिया ने भागने का कोई प्रयास भी नहीं किया। वह कहती है समस्या का इलाज भागने से नहीं निकलेगा। पुलिस वाले अंदर झोपड़ी में घुसे कि बिछिया ने अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए। पुलिस वाले भाग खड़े हुए। और फिर कभी इस तरफ देखने की जुर्रत भी नहीं की।
कुछ लोग कहते हैं उस पेड़ पर जो भूत है वह जो चाहता था वही तो कर रही है बिछिया। तुम बेटी को गाड़ आए थे न जमीन में तो लो उसी जमीन पर एक औरत तुम सब की छाती पर चढ़कर राज कर रही है। कहते हैं जितने लोग यहां दारू पीने आते हैं उसे कोई दिक्कत नहीं लेकिन अगर कोई यहां बिछिया को परेशान करने की कोशिश भी करे तो यह भूत उसे वहीं पटक देता है। जिस भुवली को पटक कर छाती पर चढ़ने की खबर बाहर फैली थी वह भुवली नहीं, पुलिस वाले की कहानी है। और उसे बिछिया ने नहीं, उस भूत ने पटका था। कहते हैं वह सिपाही अभी बिछिया की तरफ बढ़ ही रहा था कि धड़ाम से गिरा। ऐसा लगा जैसे किसी ने जोर से पटक दिया हो और उसकी छाती पर कोई बैठा हो। उसकी सांसें बस रुकने ही वाली थी कि वह गायत्री मंत्र का जाप करते हुए यहां से उलटे पांव भागा।
कुछ लोग यह भी कहते हैं कि बिछिया दबंग तो है परन्तु क्या कोई पुलिस वाले के सामने दबंग हो सकता है। लोग कहते हैं पुलिस वाले आते तो हैं लेकिन उसके ठीये को तोड़ नहीं पाते हैं। ठीये को तोड़ने की नौबत आने से पहले ही बिछिया उनकी भूख को शांत कर देती है। झोपड़ी का टाट वाला दरवाजा बंद हो जाता है और फिर दारू का यह धंधा पूरी तरह वैधानिक दिखने लगता है।
बात चाहे जो भी हो लेकिन बिछिया अपने बच्चों को पाल रही है। अपने ससुर को पाल रही है। जुमनी फुआ और बूढ़ी होती जा रही है। जुमनी फुआ को बिछिया बहुत प्यार करती है। कई बार बिछिया जुमनी फुआ की गोद में सिर रखकर रोती है। जुमनी फुआ उसके सिर पर हाथ रखती है और कहती है, ‘अपना बच्चा पालना हर मां का धर्म होता है बाबू। और बच्चा पालने के लिए किया जाने वाला कोई भी काम अधर्म का नहीं होता है। अपने मन पर बोझ मत रखो बाबू। तुमने अपने बच्चों को दोबारा जीवन दिया है। तुमने सबसे बड़ा पुण्य का काम किया है। तुम्हारा किया कोई भी काम अधर्म का हो ही नहीं सकता। और यह तुम्हारा दिल अगर तुम्हारा है तो तुम्हारा यह शरीर भी तो तुम्हारा ही है। तुम्हारे मन और तुम्हारे इस शरीर पर सबसे पहला हक तुम्हारा है बाबू। इसके मालिक तो तुम ही हो। तुमने जो निर्णय लिया, वह तुम्हारा है और यह निर्णय सिर्फ तुम ही ले भी सकती हो। तुम प्यारी बेटी हो। प्यारी मां हो। प्यारी बहू हो और सबसे अधिक एक मजबूत औरत हो।’ बिछिया ने जुमनी फुआ को कसकर पकड़ लिया। और मन में कहा, अगले जनम में जुमनी फुआ की कोख से ही मुझे जन्म देना।
उमा शंकर चौधरी
चर्चित लेखक।
प्रकाशन- चार कविता संग्रह ‘कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे’, ‘चूंकि सवाल कभी खत्म नहीं होते’, ‘वे तुमसे पूछेंगे डर का रंग’ और ‘कुछ भी वैसा नहीं’ तीन कहानी संग्रह ‘अयोध्या बाबू सनक गए हैं’, ‘कट टु दिल्ली और अन्य कहानियां’, और ‘दिल्ली में नींद’ एक उपन्यास ‘अंधेरा कोना’ प्रकाशित।
सम्मान - साहित्य अकादमी युवा सम्मान, भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन सम्मान, रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार, अंकुर मिश्र स्मृति सम्मान और पाखी का जनप्रिय लेखक सम्मान।
कहानियों, कविताओं का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद। कविता संग्रह ‘कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे’ का मराठी अनुवाद साहित्य अकादमी से प्रकाशित। कविताएं कई विश्वविद्यालयों के स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में शामिल। विभिन्न महत्वपूर्ण श्रृंखलाओं में कहानियां और कविताएं संकलित।
संपर्कः-
मो0- 9810229111
umashankarchd@gmail.com
सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।














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