हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएं

 

हरीश चन्द्र पाण्डे


हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताओं की सबसे बड़ी खासियत उनकी भाषा,उनके मुहावरे और बेध देने वाली सादगी है जो बेचैन कर देती है।उनकी कविताएं एक तरफ तो मानवीय मूल्यों की पक्षधर हैं तो दूसरी तरफ सत्ता, व्यवस्था और पूंजी के प्रपंच के मकड़जाल को भी चिन्हित करती हैं।सीधे,सरल और मामूली विषयों पर लिखी उनकी कई कविताएं समकालीन कविता में अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं। यहां प्रस्तुत कविताएं भी इसी का उदाहरण हैं।


हरीश चन्द्र पाण्डे की नई कविताएं 



सुनना और दीगर बातें 

वह सुनने का असीम धैर्य लिए बैठा है 
सबको सुनता है उनके चुक जाने तक 

पक्षियों को पर फड़फड़ाने से लेकर 
परों के भीतर चोंच समो लेने तक सुनता है 
सरीसृपों को बिल के भीतर पूंछ सिमटाने तक 

उसे आवाज़ें चाहिए बस
वह चुप्पी को श्मशान की बुझी राख कहता है 

कोई आवाज़ नहीं आएगी तो - वह
नल की टोंटी थोड़ी ढीली कर देगा 
उसकी सकारात्मकता कहती है
ऊपर टंकी का खाली हो जाना 
नीचे किसी पात्र का भर जाना भी हो सकता है 

इधर अचानक सुनने के विरुद्ध उसने यूं टर्न ले लिया है 
कहता है बहुत हो गए हैं शब्द, आवाज़ें और ध्वनियां 
मुझे अपने बोलने को चुप्पी में समझाओ 
मुझे माफ़ी मांगने और माफ़ करने की भाषाएं नहीं मुद्राएं चाहिए 
देखो! शब्दों के ढेर म्यूनिसिपल कूड़े की तरह खड़े हैं 
बहार है कूड़ा बीनने वालों की

वह कहता है - पल भर में अमन बिगाड़ देने की वारंटी लिए 
घटे दर पर उपलब्ध हैं शब्द 
संपादित होने के बजाय अग्रसित हो रहे हैं।





किसी ने नहीं 

उन्नत बीज को अपने पेड़ पर गर्व था 
पेड़ को अपनी शाखों पर 

आंधियां उलझ कर रह जाती थीं उनमें 
पक्षियों के झुंड के झुंड उतर आते एक साथ 
सघनता ऐसी
कि सूर्य का आतप हरित जाल में उलझ कर रह जाए

उसी पेड़ की एक शाख तड़क गई है आज जबकि उस पर लटकी काया एकदम इकहरी थी 

सारे तमाशबीन उचक उचक अंदाज़ते रहे उस शरीर का वजन 
उस पर लदे सूद - बोझ को किसी ने नहीं देखा।




लाइट हाउस 

(केप ओटवे लाइट हाउस,ग्रेट ओसन रोड से गुजरते हुए)

विशाल जलराशि पर निविड़ अंधकार की चादर 

सारी अमावसें आकर यहां इकट्ठा हो गई हैं 
जुगनू सारे अवकाश पर चले गए हैं 

भयावह नीरवता में ये लहरों के नाद-थपेड़े 
और रह रह कर दूधियाते हुए तट 
(या फिर कोई राक्षस रह रह कर दांत चियार रहा है)

शत्रु पोतो!
तुम्हें चीन्ह लिया गया है अच्छी तरह 
कहां छुपोगे 

मित्र पोतो!
रुक जाओ वहीं 
आगे, दुश्मन के मित्र सा एक चट्टान है।



सुनना 

कभी कभी अपने से ही कुछ कहना हो जाता है 
स्वयं संबोधित वाक्यों का भी एक दूसरा सिरा होता है 
भले ही यह एक अंतर्यात्रा हो

उस वाक्य का क्या 
जो बोला तो गया हो दूसरे से 
पर सुनने के पूर्व ही चला गया हो संबोधित 

अधर में लटके ही रह जाते हैं कुछ वाक्य 
वांछित कान नहीं मिलते उन्हें 
इससे तो बेहतर वे वाक्य 
जिन्हें सुनकर अनसुना कर दिया गया 

यह बात दीगर है 
अनसुनी कर दी गई आवाज़ों का भी एक कब्रिस्तान होता है 
चाहे करोड़ों करोड़ आवाज़ें चीत्कार कर क्यों न कहें कुछ 

यह बहरा होना कतई नहीं है 
जो संकेतों को सुनने की बैशाखी बना लेते हैं।





फूलदेई 

वृक्षों की देहरी से निकल आए हैं ये फूल 
अब कोई देहरी ही 
अपने अंकवार में समो सकती है इन्हें 

गांव में देहरी देहरी घूम रहे हैं फूल से बच्चे 
फूलदेई छम्मादेई उच्चरित करते हुए 
और यह कहते हुए -
सूप भरे हमारा
और तुम्हारा बकार 

लघुता की महत् कामनाएं तो देखो.....

(फूलदेई उत्तराखंड में चैत्र मास की संक्रांति को वसंत के स्वागत में मनाया जाने वाला लोकपर्व है जिसमें बच्चे घर घर जाकर देहरी में बुरांश आदि फूल चढ़ाते हुए मंगलकामना करते हैं।)



बंजरपन 

जैसे ही बंद करता हूं आंखें 
फसल लहलहाने लगती है खेत में 

इसीलिए देर तक आंखें बन्द किए रहता हूं 

शायद इसीलिए आंखें खुलने तक 
कोई फसल काट कर ले गया होता है...





अब यहां 

कोठा ख़ाली कराया जा रहा है 

घुंघरुओं की छम छम न धिनाधिन तबले की
सारंगी की तान न हारमोनियम के स्वर 
अब कुछ न होगा यहां 
कोठा ख़ाली कराया जा रहा है 

साज़िंदे उतर रहे हैं साज़ों के साथ 
अदब और अदाएं लिए गणिकाएं 
रसिक सब उल्टे पांव लौट रहे हैं 
कोठा ख़ाली कराया जा रहा है 

भारी मन लिए उतर रहे पांवों के बरक्स 
सीढ़ी फलांगते चढ़ रहे हैं कुछ और पांव

तिलचट्टों से दलाल तदर्थ दरारों में छुप गए हैं आसपास 
उनके कान कोठे की जानिब लगे हैं 
जहां से दबंग अनुगूंजें आ रही हैं 

लो- कोठा एकदम ख़ाली हो गया है 

हां,अब यहां राज होगा एक दल का 
नीति की नथ उतराई होगी।






नग्नता 

आवरणों के ईजाद के बाद ही आई होंगी सारी गुप्तांग शब्दावलियां
जानवरों के लिए आज भी इनके कोई मायने नहीं 

अंगों के वर्गीकरण - खेल ने रच डाला एक अलग ही समाज 
जबकि पशु पशु ही रहे कोई नया समाज नहीं रचा 
वहां कोई मुख से पैदा हुआ न पैरों से 

मूल्यांकन के इसी कूट - खेल में 
कुछ अंग इज्ज़त के पर्याय हो गए कुछ हेयता के 
और इज्ज़त को चाहिए था आवरण सबसे पहले 
जबकि सोच को पहले बचाना था नंगा होने से 

हां, नग्नता का भी अपना एक अलग महात्म्य है 
पेड़ों, और पदाकांक्षियो को बसंत-प्रवेश के पूर्व कपड़े उतारने होते हैं 

और यह कथित इज्ज़त भी कम बहुलार्थी नहीं है 
एक तार-तार तंगहाल गणिका कहती है
- गाहक आते रहते थे तो इज्ज़त बची रहती थी। *

*शैलेश मटियानी के उपन्यास ' बावन नदियों का संगम ' की एक वेश्या पात्र का कथन।





अस्पताल में बिल्ली 

एक स्वस्थ बिल्ली सामने की दीवार फांद ओझल हो गई है 

अब नेपथ्य से हवा में तैर रही है उसकी 'म्याऊं'
म्याऊं के ध्वनि-स्केल और टोन को तीमारदार 
मरीज़ के भविष्यत् से जोड़ रहे हैं 

अब ओट से आ रही झगड़ने की आवाज़ बता रही है 
कि एक के लिए झगड़ती वे एकाधिक हैं 

यूं तो कूद-फांदकर निकल ही जाती हैं इधर उधर 
जहां ऐसा संभव नहीं 
दबे पांव अपनी ज़ान बचा कर निकलती हैं आर से पार
पर लोग कहते हैं - हमारा रास्ता काट दिया है 

एक मरीज़ स्वस्थ होकर लौट रहा है अपने घर 
संतुष्ट तीमारदारों ने यह बात छुपा ली है 
कि बिल्ली ने उनका भी रास्ता काटा था...









हरीश चंद्र पांडे 

जन्म - 28 दिसंबर 1952

प्रकाशित कृतियां:- कुछ भी मिथ्या नहीं है, एक बुरुंश कहीं खिलता है, भूमिकाएं खत्म नहीं होतीं, असहमति तथा कछार - कथा ( कविता संग्रह)कलैंडर पर औरत तथा अन्य कविताएं, मेरी चुनिंदा कविताएं (चयन),दस चक्र राजा ( कहानी संग्रह),संकट का साथी (बाल कथा-संग्रह) कविता महाराजिन बुआ की पृष्ठभूमि में एक लघु वृत्तचित्र 'महाराजिन' निर्मित।

कविताओं के कुछ अनुवाद बांग्ला, तेलुगू, ओड़िया, मराठी, पंजाबी, अंग्रेजी, मैथिली आदि भाषाओं में प्रकाशित। कुछ कथेतर गद्य पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित।

शमशेर सम्मान,केदार सम्मान, सोमदत्त सम्मान, ऋतुराज सम्मान, मीरा स्मृति सम्मान, हरिनारायण व्यास हिन्दी काव्य पुरस्कार और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से पुरस्कृत।

भारतीय लेखा तथा लेखा परीक्षा विभाग से सेवानिवृत्त 

मोबाइल - 9455623176
Harishchandrapande@gmail.com




सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।



















Comments

  1. अरुण कमल4 April 2026 at 18:39

    हरीश चन्द्र पाण्डे विलक्षण कवि हैं।निरंतर जीवन संधान में सन्नद्ध,एकांत साधक।

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  2. भूपेंद्र कुमार4 April 2026 at 18:39

    हरीश चन्द्र पाण्डे साहब को साधुवाद। उन्होंने "अब यहाँ " के माध्यम से सत्ता के निर्मम स्वरूप का सजीव चित्रण किया है।
    कोठा यहाँ लोकतंत्र का रूपक लगता है जहाँ सभी समुदाय के लोग आते रहे हैं। इसको खाली कराना एकदलीय व्यवस्था कायम करने की प्रवृति को दर्शाता है।

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  3. नीलम शंकर4 April 2026 at 18:40

    "वह चुप्पी को श्मशान की बुझी राख कहता है "

    नग्नता
    बंजरपन
    सभी कविताएं अच्छी।
    बधाई पाण्डे जी।

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  4. पवन करण4 April 2026 at 18:50

    शानदार।

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  5. यश मालवीय4 April 2026 at 20:56

    बहुत अद्भुत कविताएं हैं।

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  6. पढीं कविताएं आँखें बंद किये बिना और बंद करके, दिखी देश-दुनिया में तडपती मानवता और उत्तर की खोज में निकले वीरों की निराशा महसूस की। बधाई

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  7. नेहल शाह4 April 2026 at 23:48

    अच्छी कविताएं!

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  8. मनोज कुमार झा4 April 2026 at 23:49

    हरीश चंद्र पाण्डेय की कविताएं अद्भुत हैं, काव्य- विवेक से खोजी गई जीवन- सत्यों की भूमि से समकालीन यथार्थ पर रौशनी फेंकती। सुगठित, एक भी वर्ण अतिरिक्त नहीं।कवि और कौशिकी को धन्यवाद।
    मनोज कुमार झा

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  9. जय प्रकाश5 April 2026 at 00:14

    बहुत सुन्दर कविताएं।

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  10. ख़ुदेजा खा़न5 April 2026 at 00:23

    गहन संवेदना और सघन वैचारिकी का अद्भुत संयोजन हरीश पाण्डेय जी की कविताओं को विशेष बनाता है।

    कविता यदि प्रथम पाठ में ही सम्प्रेषित हो जाए तो यह कवि की अद्भुत क्षमता और समझ की परिचायक है।

    बधाई 🙏

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  11. अपने अनूठे कहन शैली में विचारणीय बातों को सार्थक शब्दों में सहज ढंग से पिरोने वाले प्रतिष्ठित कवि श्री पाण्डेय जी की महत्वपूर्ण कविताएं बरबस ध्यानाकर्षित करने की क्षमता से भरपूर हैं।किसी ने नहीं कविता में उन्होंने वास्तविकता को देखने का अच्छा आग्रह किया है बोलने और सुनने की प्रतिक्रियाओं पर केन्द्रित कविता सुनना अद्भुत अनुभव से पूर्ण है जहां सचमुच क ई बार अधर में लटके वाक्यों को कान नहीं मिल पाते इससे अच्छे वे वाक्य तो बेशक हैं जो सुनकर अनसुना कर दिये जाते हैं।
    बंजर पन कविता बंद आंखों में लगातार आ और जा रहे दृश्यों के उल्लेख की कविता है वहीं अब यहां कविता समय के निरंतर प्रवाह में जीवन में बदलाव के पलों को रेखांकित करने वाली रचना है।सभी महत्वपूर्ण रचनाओं के लिए आदरणीय श्री पांडेय जी को बहुत बहुत शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं।

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  12. सभी अद्भुत कविताएं लगी मुझे।चाहे वह अस्पताल में बिल्ली कविता हो कि वह सुनना और दीगर बातें कविता हो ।

    हरीश चन्द्र पाण्डे की यहां प्रस्तुत सभी कविताएं अथवा संग्रहों की उनकी सभी कविताओं में किसी काव्य विषय में कभी भी क्या हुआ से हटकर ,कैसा लगा की बात पर कविता होती है इसीलिए मुझे उनकी कविताएं मन को छू लेती है ।

    अब जैसे सुनना और दीगर बातें
    कविता में बहुत अच्छा सुनता है कहने के लिए कविता में वे कहते है कि वह
    सबको सुनता है उनके चुक जाने तक / पक्षियों को पर फड़फड़ाने से लेकर /परों के भीतर चोंच समो लेने तक सुनता है
    इन पंक्तियों में हरीश जी की अद्भुत रचनाशीलता चकित कर गई मुझे।

    इस प्रकार के क्राफ्ट को रचने हुए कविता नए नए शब्द बुन लेती है जैसे यह पढ़कर नया शब्द अंदाज़ते बना है

    तमाशबीन उचक उचक अंदाज़ते रहे उस शरीर का वजन

    हरीश जी की कविता का कर्म है कि वह अपने आसपास की जीवन पदछाप को अनदेखा होने नहीं देती है इसलिए हरीश पाण्डे फूलदेई कविया लिखते हैं ताकि बच्चे अलक्षित नहीं रह जाएं कविता की नज़र से ।

    यह कविता फूलदेई की भावना को उजागर करने लिखी गई है।यह कविता उत्तराखंड में चैत्र मास की संक्रांति को वसंत के स्वागत में मनाया जाने वाला लोकपर्व है जिसमें बच्चे घर घर जाकर देहरी में बुरांश आदि फूल चढ़ाते हुए मंगलकामना करते हैं।

    सृजनात्मकता सीखने की पाठशाला जैसी प्रतीत हुई मुझे ।

    अभिनंदन कवि हरीश चन्द्र पाण्डे ।

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  13. कुमार विजय गुप्त5 April 2026 at 07:07

    हरीश चंद्र पांडे सर की कविताओं से यह मेरा प्रथम परिचय है. किन्तु इस पहली मुलाक़ात ने मुझे उनकी कविताओं में एक आश्वस्ति नजर आई. सभी कविताएं अपने अर्थ लिए अपनी साफगोई के साथ पाठकों से रूबरू है. कविता *अब यहाँ* व *अस्पताल में बिल्ली* काफ़ी अच्छी लगी. इन कविताओं का आस्वाद अल्हदा है. कवि को बधाई 💐

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  14. शिवांगी गोयल5 April 2026 at 18:12

    बहुत अच्छी कविताएँ हैं उनकी।

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  15. स्वप्निल श्रीवास्तव6 April 2026 at 07:10

    हरीशचंद्र पाण्डेय मेरे प्रिय कवि हैं
    उनकी कविताएं ध्यान से पढ़ता हूं
    समकालीन कविता में उनका अलग स्थान है. सुनना और दीगर बात. किसी ने नही. सुनना. अब यहां. अस्पताल में बिल्ली उनकी यादगार कविताएं हैं. कौशिकी के माध्यम से आप उन हिंदी कवियों को प्रस्तुत कर रहे हैं जिन्होंने कविता के वितान को विस्तृत किया है।

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  16. भगवान थावराणी6 April 2026 at 07:11

    बहुत सुंदर कविताएं।

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  17. उद्भ्रांत शर्मा6 April 2026 at 07:13

    सुन्दर कविताएँ।

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  18. चंद्रेश्वर6 April 2026 at 08:13

    नवें दशक के प्रमुख कवियों में अपनी अलग पहचान के लिए जाने जाते हैं कवि हरीश चंद्र पाण्डे। उनकी कविताओं में विस्तार नहीं,मितकथन देखने को मिलता है। वे अपनी बात में प्रतीकों, रूपकों के ज़रिए तीक्ष्णता पैदा करते हैं। वे अपने समय को ईमानदारी से बिम्बित करते हैं। उनकी कविताओं में कला सरलता और सादगी के साथ होकर प्रस्तुत होती है। वे हमारे मित्र कवि हैं। हमारी शुभकामनाएं उनके कवि कर्म के लिए।

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  19. नरसिंह मिश्रा6 April 2026 at 08:16

    बहुत अच्छी लगी कविताएँ।

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  20. हिंदी में अलग तरह की कविताई, हमेशा इंतज़ार रहता है इन की कविताओं का।

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  21. भावना झा6 April 2026 at 18:16

    बहुत अच्छी कविताएं हैं पढ़ी थी।

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  22. पद्मराग मणि6 April 2026 at 19:59

    सुंदर

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  23. सेवाराम त्रिपाठी7 April 2026 at 09:40

    हरीशचंद्र पांडेय की कविताओं में जीवनानुभवों की तहें

    -सेवाराम त्रिपाठी

    कौशिकी ने हरीश जी की नई कविताओं से रूबरू कराया। वे एक लंबे अरसे से निर्बाध लिख रहे हैं। उनकी कविताओं का फलक बहुत व्यापक है। उनकी कविताओं में प्रतिरोध आरंभ से ही विद्यमान रहा है। उनकी कविता की उड़ान अत्यंत विश्वसनीय है। कविताओं में जीवंतता और एक अजीब तरह की थरथराहट भी देखी जा सकती है। कौशिकी में उनकी जो कविताएँ प्रकाशित हैं जैसे - सुनना और दीगर बातें, किसी ने नहीं, लाइट हाउस, सुनना, फूलदेई , बंजरपन, अब यहाँ , नग्नता, और अस्पताल में बिल्ली आदि।हरीश जी वरिष्ठ, गरिष्ठ और वरेण्य कवि हैं। उनका काव्य एकदम सधा है। छोटी - छोटी कविताओं में भी समय की सच्चाइयों के आईने हैं।उनकी कविताएं यथार्थ यानी मंच में और नेपथ्य में आवाजाही करती हैं ।तथ्य यह है कि उनकी रचनात्मकता का मुहावरा अलहदा है। उनकी सादगी, विषय की अन्वितियों में प्रवेश करती है और उनका ट्रीटमेंट भी औरों से थोड़ा भिन्न होता है। हर कवि का काव्य मुहावरा अलहदा होता है और विषय का निर्वाह भी। फिर भी कुछ चीज़ें आ ही जाती हैं। हरीशचंद्र जी में विषय की पकड़,अनुभवों की लंबी शृंखला, सामाजिक -सांस्कृतिक गतिविधियों और उनका संश्लेष भी भिन्न है। उनकी सृजनात्मक संवेदना सक्रियता को दर्शाती है और छिपाई जा रही सच्चाई को भी गंभीरता से दर्ज़ करती है और वे उन तथ्यों को भी उजागर भी करती है, जो लोग छिपा जाते हैं। वो समय की पदचापों की वस्तुगत शिनाख्त भी करते हैं,कहन में कोई पैंतरेबाज़ी नहीं , सीधा - सादा बर्ताव लेकिन एक हुलास के साथ कौतूहल की संरचना कथ्य के नए आयाम रचती है।उनमें सादगी का सौंदर्य है तो उसके साथ पक्षधरता की सहजता भी शिद्दत के साथ देखी जा सकती है ।और उसमें एक विशेष प्रकार की प्रांजलता भी है। झूठ बोलने के बढ़ते महारोग में राजनीतिक परिस्थितियों ने महारत हासिल कर ली है तो दूसरी तरफ सामाजिक - सांस्कृतिक, धार्मिक कर्मकांडो, विडंबनाओं - प्रपंचों ने उसे पूरी तरह से ग्रस लिया है। लेखकों- कलाकारों के यहाँ भी फतवेबाज़ी और बाज़ार को साधने का उद्यम एक विशेष उद्योग की तरह बढ़ा हुआ देखा जा सकता है जो उनकी रचनात्मक भूमिकाओं को छलनी कर रहा है और उन्हें अविश्वसनीय भी बना रहा है।

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  24. सेवाराम त्रिपाठी7 April 2026 at 09:40

    हरीशचंद पांडेय की कविताओं का आस्वाद अलग है और उनकी कहन - भंगिमा भी। विषय प्रवेश और उसके निर्वाह बने बनाए फार्मूलों से बाहर पड़ते हैं।’ सुनना और दीगर बातें ‘ की ये पंक्तियाँ पढ़िए - “इधर अचानक सुनने के विरुद्ध उसने यूँ टर्न ले लिया है/ कहता है बहुत हो गए हैं शब्द, आवाज़ें और ध्वनियां/ मुझे अपने बोलने को चुप्पी में समझाओ/ मुझे माफ़ी मांगने और माफ़ करने की भाषाएं नहीं मुद्राएं चाहिए/ देखो! शब्दों के ढेर म्युनिसिपल कूड़े की तरह खड़े हैं/ बहार है कूड़ा बीनने वालों की/ वह कहता है - पल भर में अमन बिगाड़ देने की वारंटी लिए / घटे दर पर उपलब्ध हैं शब्द/ संपादित होने के बजाय अग्रसित हो रहे हैं/”
    इसमें जो प्रश्न उठाये गए हैं वो कुछ अलग प्रसंग बयां करते हैं और कई प्रकार के नक्शे भी बनाते हैं। अच्छा कवि अपना घर डिजाइन और नक्शे के साथ बनाता है।एक कविता है ‘ सुनना’ इसमें समय समाज की अनगिन पेचीदगियां हैं। है यह यूँ तो छोटी लेकिन इसकी अर्थग्राहिता के रूप अनेक रूपाकारों में दिखाई देते हैं।पूरी कविता पढ़िए - “कभी-कभी अपने से ही कुछ कहना हो जाता है/ स्वयं संबोधित वाक्यों का भी एक दूसरा सिरा होता है/ भले ही यह एक अंतर अंतर्यात्रा हो /उस वाक्य का क्या/ जो बोला तो गया हो दूसरे से /पर सुनने के पूर्व ही चला गया हो संबोधित/ अधर में लटके ही रह जाते हैं कुछ वाक्य /वांछित कान नहीं मिलते उन्हें/ इससे तो बेहतर वे वाक्य/जिन्हें सुनकर अनसुना कर दिया गया/ यह बात दीगर है /अनसुनी कर दी गई आवाज़ों का भी एक कब्रिस्तान होता है /चाहे करोड़ों करोड़ आवाज़ें चीत्कार कर क्यों न कहें कुछ/ यह बहरा होना कतई नहीं है /जो संकेतों को सुनने की बैशाखी बना लेते हैं/”
    उन्हें कब कौन चीज़ दिखाई दे जैसे अस्पताल में बिल्ली या नग्नता।इतिहास और नृतत्व शास्त्र का वे उत्खनन करते हैं।”आवरणों के ईजाद के बाद ही आई होंगी सारी गुप्तांग/ शब्दावलियां/ जानवरों के लिए आज भी इनके कोई मायने नहीं/ अंगों के वर्गीकरण - खेल ने रच डाला एक अलग ही समाज /जबकि पशु पशु ही रहे कोई नया समाज नहीं रचा /वहाँ कोई मुख से पैदा हुआ न पैरों से/”
    मेरी समझ में वे विचारवान कवि हैं। विचार और संवेदनाएं घुल मिल जाती हैं।उनकी कविताओं में उनके मुहावरे अनुस्यूत हैं।वो उम्मीदों से लबालब कवि हैं ।उनकी संवादनुमा कविताएं पाठकों को अपनी ओर सतत आकर्षित करती हैं।वे सब कुछ ठहरकर खोजते हैं, रचते हैं और विश्वसनीयता के साथ कहते हैं। यहाँ उनकी कुछ कविताओं का ही ज़िक्र है।वे किसी भी सूरत में हड़बड़ी के कवि नहीं है।उनकी दृष्टि संपन्नता में वस्तुबोध, अनुभव बोध और जीवन बोध एक साथ यात्रा करते हैं।मैं उनकी कुछ अच्छी कविताओं का स्मरण कर रहा हूँ जैसे उत्खनन, पानी, तलवारों की प्रशस्ति और गुल्लक ।
    कौशिकी में प्रकाशित - ‘ अब यहाँ कविता’ का अंश पढ़ें ।”कोठा खाली कराया जा रहा है.. तिलचट्टों से दलाल तदर्थ दरारों में छुपे गए हैं आसपास/उनके कान कोठे की जानिब लगे हैं/जहाँ से दबंग अनुगूँजे आ रही हैं/लो कोठा एकदम खाली हो गया/हाँ , अब यहाँ राज होगा एक दल का/नीति की नथ उतराई होगी/”
    ये कविताएं हमें आश्वस्त करती हैं और एक नई यात्रा के लिए आमंत्रित करती हैं।ऐसी धैर्यवान कविताएं स्वागत योग्य हैं।
    000

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  25. कस्तूरी लाल तागड़ा7 April 2026 at 09:43

    अच्छी कविताएँ ।

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  26. मुकेश तिड़पुरे7 April 2026 at 19:39

    अपने अनूठे कहन शैली में विचारणीय बातों को सार्थक शब्दों में सहज ढंग से पिरोने वाले हिंदी के प्रतिष्ठित कवि आदरणीय श्री पांडेय जी की यह महत्वपूर्ण कविताएं बरबस ध्यानाकर्षित करने की क्षमता से भरपूर हैं।
    किसी ने नहीं कविता में उन्होंने वास्तविकता को देखने का अच्छा आग्रह किया है बोलने और सुनने की प्रतिक्रियाओं पर केन्द्रित कविता सुनना अद्भुत अनुभव से पूर्ण है जहां सचमुच क ई बार अधर में लटके वाक्यों को कान नहीं मिल पाते इससे अच्छे वे वाक्य तो बेशक अच्छे होते हैं जो सुनकर अनसुना कर दिये जाते हैं । बंजर पन कविता बंद आंखों में लगातार आ और जा रहे दृश्यों के उल्लेख की कविता है वहीं अब यहां कविता समय के निरंतर प्रवाह में जीवन में राजनीति की प्रतिष्ठा को जीवंत रुप में सामने उपस्थित करने वाली रचना है।
    पटल पर प्रभावी प्रस्तुति के लिए आपको और इन महत्वपूर्ण रचनाओं के लिए आदरणीय श्री पांडेय जी को बहुत बहुत शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं।

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  27. हर एक कविता अनेक विचारों और भावों को जन्म देती सी हैं सभी कविताएं पसंद आई

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