अनुराधा सिंह की कविताएं

 


अनुराधा सिंह 

अनुराधा सिंह अपनी कविताओं में समय और समाज के साथ स्त्री जीवन और उसकी विडंबनाओं को बहुत मार्मिक तरीके से दर्ज करती हैं।इस दर्ज करने में उनकी भाषा जादू की तरह असर करती हैं।यही कारण है कि ये कविताएं अपनी बुनावट में बहुत महीन और गझिन हैं। यहां प्रस्तुत कविताएं इसका उदाहरण हैं।

विरासत 


दुनिया में हवा पानी कम  

बालकनी में धूप कम  

गमलों में मिट्टी गुज़ारे लायक 

मुझे कम के पक्ष में खड़े रहना पड़ा है अब तक 

जानती भी हूँ कि कम से 

बहुत अधिक नहीं चला पाऊँगी मैं काम 

लज्जा और लिहाज़ तो होने ही चाहिए

आँख ढँकने लायक 

भले ही उघड़ी रहे आत्मा 


फिर कुछ तो छोड़ कर भी जाना है मुझे 

बच्चों की ख़ातिर पुरखों की इस ज़मीन पर 

विरासत जैसा महान विचार नहीं मेरा  

एक बेटी है 

जो रहेगी बची पृथ्वी पर मेरे बाद भी  

मंदिर की महंत नहीं जो दान पेटी की चाबी डोरी छोड़ जाऊँ

सात पीढ़ी बैठ कर खाएं ऐसा उद्यम नहीं नीयत में 

खून में हुनर नहीं कि गा बजाकर लोक ही निभाएँ  

घर के मर्द जुटे रहे दो जून की जुगाड़ में जीते जी 

कभी कभी औरतें भी भिड़ गयीं रोज़नदारी में 


इधर हमने निगल ली है हर पचाई जा सकने वाली चीज़ 

लकड़ी कोयला हवा पानी की बात नहीं  

भाषा को खा रहे हैं 

कितने ही शब्द हड़प गए, कितने क़तर ओछे कर दिए 

जो कहीं का रास्ता भी पूछे यह लड़की किसी से  

तो कम से कम एक हिफ़ाज़ती शब्द तो यह ओट दे   

कि वह धरती की लुप्तप्राय प्राणी है .

मेरे भी दो ही हाथ हैं सबकी तरह 

कितना सँवारूँ अपना आज कि बिगड़े नहीं उसका कल  

कितनी छोड़ जाऊँ यह पृथ्वी उसके लिए 

जो बिना धक्का खाए खड़ी हो सके एक जगह।



वहाँ जाना तो है 


एक ट्रेन जो चलती थी सही समय 

सवा तीन घंटे देरी से आ खड़ी हुई है प्लैटफ़ार्म पर 

लोग हैरान परेशान हैं 

बस मैं ही चल रही हूँ उसकी ओर अविकल 

कि वहाँ जाना तो है पर जाने की जल्दी नहीं है 

जिस शहर में अब माँ नहीं है 


बहुत शहरों में बहुत कुछ नहीं होता 

बने रहें वे भी, भला मैं कर क्या सकती हूँ 

मुझे भी तो वहीं जाना है 

उसी शहर का टिकट है 

जहाँ अब माँ नहीं है 


समुंदर के ऊष्ण शहर से आ रही है मेरी गाड़ी 

और ठंडा होने लगा है यह मैदानी शहर सुबह शाम  

ऊनी कपड़े दो ही चार हैं मेरे पास 

किससे पूछूँ 

कि उसकी भस्म हुई देह से विकरित ऊष्मा 

स्टेशन पर उतरते ही ठिठुरने से बचा सकती है क्या मुझे 


वह पहाड़ वहीं खड़ा है 

वह नदी चलती ही जा रही है 

सरसों सी कुछ चमक रही है विरल वृक्षों की आड़ से 

बुंदेलखंड गुज़र रहा है यहीं ट्रेन के आसपास 

जहाँ से भादों गुज़र चुका है दो महीने पहले 

सूखा नहीं अब भी हरा है उनका रास्ता 

पर किसे बताऊँ उसके रास्ते के ये हाल 

कैसे बढ़ाऊँ उसी नम्बर की ओर उंगली 

जिसके पीछे माँ की आवाज़ नहीं है 


वह पहाड़ रहे आयुष्मान 

वह नदी रहे अशेष 

बुंदेलखंड भी बना रहे जहाँ था हमेशा 

भादों आए और रहे हर साल हरा 

सरसों रहे फूलती विरल या सघन वृक्षों की ओट में 

भले तुम ही न रहो बस अपने ठियाँ अम्मा 

तुम्हारी ओर जाता रास्ता बना रहे  


और कुछ ऐसा करो कि 

कोई सुनता रहे तुम्हारे नंबर पर

तुम्हारे रास्ते के सब हाल ।



रसोई


रसोई में अलमारियों के पल्ले

ठीक मेरे सिर की ऊँचाई पर लगे हैं

कोई बेध्यानी में खुला छोड़ दे

तो उनका तीखा कोना 

बेध देता है मेरे ज़हन को


मुझे याद नहीं किस रोज़ मैंने खोल दिये थे 

अपने दिल के दरवाज़े तुम्हारे लिए

अब, मेरी आत्मा तार- तार हो जाती है

जब तुम बेध्यानी में खुला छोड़ जाते हो इन्हें 


हमारी रसोई की अलमारियों में

यह ऊपर वाला खन

किसने बनाया होगा 

किसने सोचा होगा कि दाल और चीनी भी

इतनी ऊँचाई पर रखे जा सकते है

किसने तय किया होगा कि वे मामूली चीज़ें भी

हमारी पहुँच से बाहर रखी जायें 

जिन्हें पाकर ज़रूरतों

और विलासिताओं के फ़र्क़ से 

लगातार चलनेवाली हमारी लड़ाई

ज़रा छोटी हो जाती है


दुनिया ने सबसे अधिक हथियार औरत को दिये 

बस इस्तेमाल के तरीके अपने हक़ में कर लिए

हम अलग- अलग चाकुओं से

गोश्त मिर्ची टमाटर कटहल और आलू

काटती रहीं

हम अलग- अलग बहानों से ज़िबह होती रहीं

रसोईघरों प्रायद्वीपों महाद्वीपों में


अपनी लड़ाई में कब थी ज़रूरत 

हमें तुम्हारी धार और लोहे की

दाँतों से ही काट लेती थीं 

हम उधड़े कपड़ों और ज़ख्मों के धागे

ग़ुलाबी नाखूनों से छील लेती थीं 

भभकते गर्म आलू और 

खींच लेती थीं अपनी आत्मा के 

चाक तलवों से सख्तजान कांटे


फिर भी तमाम असलहे

हमारी ही आग के एन नीचे

रसोई की दराज़ों में सहजाये गए

फिर भी हमारी आग जला पायी बस लोगों की भूख

वासना और थर्ड डिग्री तक अपनी देह

फिर भी हमारे चाकू काट पाए बस गोश्त सब्जियाँ

और कभी- कभी अपनी बाईं कलाई की एक नस, मसलेहतन।


रसोई से लिखने की मेज

साढ़े छह योजन दूर है

जाते हुए नहीं लगता

एक भी क्षण

मेज तक लौटने में

उम्र बीत जाती है।



चलो, न लौटें अब 


उतनी ही जाऊँ 

कि एक खींच में लौट सकूँ 

उतनी ही लौटूँ 

कि फिर- फिर आने का कौल न हो


दुआ करो 

कि लौट सकना बहानों से बिद्ध हो

मसलन राह भूल जाऊँ मैं अपनी ही देह तक जाने की 

चप्पलें घिस जाएँ जो कभी थीं नहीं मेरे तलवों पर 

एक अथाह नदी बहने लगे अचानक हमारे बीच 

और नाव न बनायें 

मेरे पार के लोग 

चलो, न लौटें अब और


तुम्हारी ओर प्रस्थान के लिए 

दूरियों में डुबाऊँ पाँव 

सिहरूँ, रुक जाऊँ 

रोज़ कल पर टालूँ 

रोज़ यह भूल जाऊँ 

कि आज 

उसी कल को होना था 

जिस कल में मिलना तय है हमारा


यह जिसमें गैरहाजिर हो तुम

अपने इसी क्षण में खड़े होकर 

देखूँ तुम्हारे उस निमिष को 

जहाँ उपस्थित नहीं अब मैं 


आओ तय करें कि हम हैं अकेले 

आओ तय करें कि होना भर नहीं था प्रेम 

तय करें कि न होना प्रेम है कितना।



उसे व्यर्थ होते देख रही थी


उसने बताया कि अक्सर मेरी कविता

फ़लाँ पत्रिका में पढ़ता रहता है

मैं हँसी बाआवाज़

यूँ कि आँख में पानी आ गया

कितना अच्छा है कवि होना

कितना सुंदर, स्त्री होना


वह खुश हुआ

उसे मेरे मन के चोर दरवाजे की

आसान चाबी

मिल गयी थी

मैं जो हँस देती हूँ अपनी कविताएँ

पढ़े़ भर से

कल्पना में देख रही थी उसे

अपनी कविता उस पत्रिका में

 पढ़ते हुए

जिसमें वह छपी नहीं थी


मैं उसे खा़मख्वाह होते देख रही थी

मोम होते देख रही थी

पिघलते देख रही थी

फिर जमते और पत्थर होते देख रही थी

मैं उसे व्यर्थ होते देख रही थी

और हँस रही थी.....


अव्यक्त 


कह रहे थे 

तुम अपने प्रेम की गाथा 

पूरे उद्वेग , पीड़ा और सुख के साथ 


सुन रही थी मैं  

एक साधक सी  

उदार 

तल्लीन 


निचले होंठ मे दाबे

अपना पूरा प्रेम, 

सुख, पीड़ा  

और एक सिसकी।


डरो


डरो जब वह तुम पर से हटा ले 

अपना हाथ धीरे से 

डरो उस दिन से 

जब कोई उलाहना बाकी न रहे 

लहजे और ख़तों में

छोड़ दे वह सारी तितलियाँ एक साथ

एक मक़बरे के उजाड़ में 

लौट आए फ़कीर सी खाली हाथ 

अलमस्त

तुम्हें बार बार गुम जाने की आदत है 

डरो 

जब वह न डरे एक शाम  

तुम्हारे घर न लौटने से 


कभी नहीं डरे तुम

उसकी बेख़्वाब करवटों से 

पर डरना 

जब तुम्हारी रात के 

दोनों तरफ दीवार हो 

और खिड़की पर टंगी हो 

उसकी उखड़ी हुई नींद ।



अनुराधा सिंह

जन्म 16अगस्त 1971 को ओबरा जलविद्युत पावर प्लांट, उत्तरप्रदेश में हुआ।

इनकी शिक्षा दयालबाग शिक्षण संस्थान आगरा में हुई । इन्होंने मनोविज्ञान और अंग्रेजी साहित्य में स्नात्तकोत्तर किया है।

कुछ समय तक केन्द्रीय विद्यालय, भोपाल और गुना में अध्यापन कार्य किया।

’क्वांटम कांसेप्ट्स एण्ड सोल्यूशन’ नामक संस्था का संचालन।

विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में कविता और अनुवाद कार्य प्रकाशित।

‘ईश्वर नहीं नींद चाहिए’ और उत्सव का पुष्प नहीं हूँ (कविता संग्रह) तथा 'ल्हासा का लहू' और 'बचा रहे स्पर्श' आदि पुस्तकें प्रकाशित.

शीला सिद्धान्तकर सम्मान (2019) हेमन्त स्मृति सम्मान (2020) और केदार सम्मान (2024) से सम्मानित।

ईमेल : anuradhadei@yahoo.co.in










Comments

  1. बहुत अच्छी कविताएं ।

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  2. अच्छी कविताओं की उम्दा प्रस्तुति
    स्वप्निल श्रीवास्तव

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  3. नरेश चन्द्रकर
    यह अनुराधा जी की बहुत बढ़िया कविताएं लगी मुझे । दुनिया में हवा पानी कम, बालकनी में धूप कम के संदर्भ से शुरू हुई कविता अपने सम्पूर्ण स्वरूप में एक विशाल संदर्भ खोल रही है।

    स्त्री-सामर्थ्य और उसके महत्व को सामान्य जीवन-कार्य कलाओं में रखकर देखने की अद्भुत क्षमता इन कविताओं में नजर आती है। अनुराधा जी इन कविताओं में सामान्य संदर्भों में प्रवेश करते हुए भी असामान्य अर्थ दे जाती है । अनूठी शैली।

    अभिनंदन कवि अनुराधा।

    9:51 pm

    ReplyDelete
  4. रुचि बहुगुणा उनियाल4 October 2025 at 20:09

    बेहद शानदार कविताएँ ।
    कम के पक्ष में खड़ा होना 👌👌

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  5. नरेंद्र पुण्डरीक9 December 2025 at 20:07

    कविता की नई जमीन।

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  6. उमेश शर्मा9 December 2025 at 20:07

    बहुत बेहतरीन।

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  7. गरिमा श्रीवास्तव29 December 2025 at 17:02

    गद्य मेरी रुचि और पठन -पाठन का क्षेत्र है,कविता से उतना ही नाता है ज्यों कोई राही चलते हुए किसी सुगंधित पुष्प से आकर्षित हो कुछ पल उसके सौन्दर्य और गन्ध में सरोबार हो जाये।अनुराधा सिंह की कविता विरासत पढ़ी तो कुछ पंक्तियां आपकी नज़र
    "विरासत"
    ------------

    दुनिया में हवा पानी कम
    बालकनी में धूप कम
    गमलों में मिट्टी गुज़ारे लायक
    मुझे कम के पक्ष में खड़े रहना पड़ा है अब तक
    जानती भी हूँ कि कम से
    बहुत अधिक नहीं चला पाऊँगी मैं काम
    लज्जा और लिहाज़ तो होने ही चाहिए
    आँख ढँकने लायक
    भले ही उघड़ी रहे आत्मा

    फिर कुछ तो छोड़ कर भी जाना है मुझे
    बच्चों की ख़ातिर पुरखों की इस ज़मीन पर
    विरासत जैसा महान विचार नहीं मेरा
    एक बेटी है
    जो रहेगी बची पृथ्वी पर मेरे बाद भी
    मंदिर की महंत नहीं जो दान पेटी की चाबी डोरी छोड़ जाऊँ
    सात पीढ़ी बैठ कर खाएं ऐसा उद्यम नहीं नीयत में
    खून में हुनर नहीं कि गा बजाकर लोक ही निभाएँ
    घर के मर्द जुटे रहे दो जून की जुगाड़ में जीते जी
    कभी कभी औरतें भी भिड़ गयीं रोज़नदारी में

    इधर हमने निगल ली है हर पचाई जा सकने वाली चीज़
    लकड़ी कोयला हवा पानी की बात नहीं
    भाषा को खा रहे हैं
    कितने ही शब्द हड़प गए, कितने क़तर ओछे कर दिए
    जो कहीं का रास्ता भी पूछे यह लड़की किसी से
    तो कम से कम एक हिफ़ाज़ती शब्द तो यह ओट दे
    कि वह धरती की लुप्तप्राय प्राणी है .
    मेरे भी दो ही हाथ हैं सबकी तरह
    कितना सँवारूँ अपना आज कि बिगड़े नहीं उसका कल
    कितनी छोड़ जाऊँ यह पृथ्वी उसके लिए
    जो बिना धक्का खाए खड़ी हो सके एक जगह।

    - अनुराधा सिंह
    अनुराधा सिंह की 'विरासत' कविता वस्तुत: समकालीन हिंदी कविता में एक बेहद महत्वपूर्ण इकोफेमिनिस्ट रचना है। इसमें पितृसत्तात्मक समाज की आलोचना के साथ-साथ स्त्री की अपनी अस्मिता की खोज और पर्यावरण के प्रति गहरी चिंता दिखाई देती है। कविता पारंपरिक विरासत के विचार को चुनौती देती है और माँ-बेटी के रिश्ते को केंद्र में रखकर एक नई विरासत कल्पित करती है। पर्यावरण और स्त्री के शोषण को एक-दूसरे से जोड़ कर देखने की गुज़ारिश करती इस कविता को इको-फेमिनिज्म को पुष्ट करने वाली रचना के रूप में पढ़ा जाना चाहिए.



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  8. गरिमा श्रीवास्तव29 December 2025 at 17:04

    कविता के प्रारंभिक अंश में संसाधनों के अपरिमित दोहन और लगातार होती जा रही कमी का ज़िक्र है। दुनिया में हवा-पानी कम है, बालकनी में धूप कम है और गमलों में मिट्टी भी बस गुजारे लायक है। वे कहती हैं कि उन्हें अब तक इसी कमी के साथ खड़ा रहना पड़ा है। कवि जानती है कि इतने अभाव में वह ज्यादा कुछ नहीं कर पाएगी। यह कमी सिर्फ बाहर की नहीं, बल्कि स्त्री के पूरे जीवन को प्रतीकित करती है। समाज ने स्त्री को हमेशा सीमित संसाधनों में जीने को मजबूर किया है।परम्परा से वह सामाजिक -आर्थिक रूप से अमूमन पिता, पति, पुत्र आदि पर निर्भर रहती आई है और आज भी अपनी क्षमताओं का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पाती।

    कविता में पितृसत्तात्मक विरासत की सोच को कवि साफ-साफ नकारती प्रतीत होती है। वह कहती है कि उसके पास विरासत जैसा कुछ नहीं है। पुरखों की जमीन या संपत्ति पुरुषों के लिए होती है जो दो जून की रोटी जुटाने में लगे रहते हैं। स्त्री कभी-कभी ही मजबूरी में बाहर काम करने निकलती है। वह न तो मंदिर के महंत की तरह दान-पेटी की चाबी विरासत में छोड़ना चाहती है और न ही सात पीढ़ियों को खिलाने वाला कोई बड़ा कारोबार। उसकी विरासत सिर्फ उसकी बेटी है जो उसके बाद इस बची हुई धरती पर रहेगी। इस तरह वह विरासत को पुरुषों की संपत्ति से हटाकर माँ-बेटी के रिश्ते में बदल देती है। कृष्णा सोबती ने 'ऐ लड़की' में लिखा है कि बेटी को जन्म देकर मां अमरत्व की दिशा में अग्रसर हो जाती है.कविता में आई लज्जा और आत्मा वाली पंक्तियाँ समाज की दोहरी सोच पर तीखा व्यंग्य करती हैं। समाज चाहता है कि स्त्री बाहर से ढकी-छिपी रहे, लज्जा और लिहाज बनाए रखे, भले ही उसकी आत्मा कितनी ही खुली और आजाद क्यों न हो। यह व्यंग्य इसलिए है कि पितृसत्तात्मक में समाज स्त्री की आत्मा की स्वतंत्रता ख़तरे की घंटी है। कविता स्त्री के बाहरी बंधनों और आंतरिक स्वातंत्र्य की कामना की बात कह डालती है।

    अनुराधा जी की कविता का सबसे मजबूत पक्ष पर्यावरण और स्त्री के बीच के गहरे नाते की पहचान है। हमने लकड़ी, कोयला, हवा, पानी सब कुछ निगल लिया है। अब तो भाषा के शब्दों को भी हड़प लिया जा रहा है। कई शब्द छोटे-ओछे कर दिए गए हैं। कवि चाहती है कि कम से कम कुछ सुरक्षित शब्द तो बचे रहें जो उसकी बेटी को ओट दे सकें। वह बेटी को धरती की लुप्तप्राय प्राणी कहती है। इसमें प्रकृति और स्त्री दोनों का शोषण एक जैसा होता दिखाया गया है। दोनों ही आज खतरे में हैं। पितृसत्तात्मक और पूंजीवादी व्यवस्था ने दोनों को नुकसान पहुँचाया है।

    अंत में कवि अपनी सीमा स्वीकार करती है कि उसके भी तो सबकी तरह सिर्फ दो हाथ हैं। वह अपने आज को सँवारना चाहती है ताकि बेटी का कल न बिगड़े। वह धरती को इस तरह छोड़ना चाहती है कि बेटी बिना धक्के खाए एक जगह मजबूती से खड़ी हो सके। यह माँ की जिम्मेदारी और चिंता है जो निज से लेकर पूरी धरती तक फैली हुई है।

    यह कविता पुरानी विरासत की परिकल्पना को एक नई सशक्त विरासत से रिप्लेस करती है। इसमें स्त्री की सीमित शक्ति के बावजूद संघर्ष और उम्मीद दोनों के लिए प्रेरणा और संभावना है। पर्यावरण संकट और जेन्डर को लेकर भेदभाव वाले आज के सत्यातीत (पोस्ट ट्रुथ) दौर में यह रचना बेहद प्रासंगिक है। अनुराधा सिंह ने निजी अनुभव को सामाजिक और पर्यावरणीय आलोचना में बदलकर हिंदी स्त्री कविता की परंपरा को और समृद्ध किया है।
    'विरासत' कविता की सुगठित संरचना को इको-फेमिनिज्म के नज़रिए से देखें तो यह हिंदी कविता की उन चुनिंदा रचनाओं में से एक है जो इस विचारधारा को बहुत सहज और गहरे तरीके से व्यक्त करती है। इको-फेमिनिज्म का मूल विचार यह है कि प्रकृति और स्त्री का शोषण एक ही पितृसत्तात्मक और पूंजीवादी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। दोनों को 'कमजोर', उपयोग की वस्तु' और 'नियंत्रण में रखने योग्य' समझा जाता है। इस कविता में यह जुड़ाव इतने स्वाभाविक तरीके से आता है कि लगता है जैसे एक आम माँ अपनी रोज़मर्रा की चिंता में ही पूरी विचारधारा बयान कर रही हो।

    कविता की आरंभिक पंक्तियाँ पर्यावरण के संकट को सामने लाती हैं – “दुनिया में हवा पानी कम / बालकनी में धूप कम / गमलों में मिट्टी गुज़ारे लायक”। यह सिर्फ बाहर की कमी नहीं है, बल्कि एक स्त्री के जीवन की भी कमी है। इको-फेमिनिज्म में कहा जाता है कि स्त्री प्रकृति के सबसे करीब होती हैं क्योंकि पानी लाना, ईंधन जुटाना, खेती-बाड़ी और घर चलाना – ये सब काम सीधे प्रकृति पर निर्भर हैं। जब प्रकृति नष्ट होती है तो सबसे पहले और सबसे ज्यादा नुकसान स्त्री का होता है। कवि यहाँ ठीक यही बात कह रही है – कमी के बीच जीते-जीते वह खुद भी कमज़ोर पड़ गई है, और अब उसे डर है कि उसकी बेटी के लिए और भी कम बचेगा। जैसे कोई माँ अपनी बेटी को देखकर सोचती है कि यह धरती अब कितनी थकी और सूखी हो गई है, जैसे उसकी अपनी देह।

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  9. गरिमा श्रीवास्तव29 December 2025 at 17:07

    कविता का सबसे महत्वपूर्ण अंश है जहाँ कवि कहती है कि हमने “हर पचाई जा सकने वाली चीज़” निगल ली है – लकड़ी, कोयला, हवा, पानी के बाद अब भाषा को भी खा रहे हैं। शब्दों को हड़पना और ओछा करना भी एक तरह का सांस्कृतिक शोषण है। इको-फेमिनिज्म में भाषा और संस्कृति को भी प्रकृति का हिस्सा माना जाता है। जैसे जंगल काटे जा रहे हैं, वैसे ही स्त्री की आवाज़ और उसकी भाषा को दबाया या छोटा किया जा रहा है। कवि चाहती है कि कम से कम कुछ 'हिफाज़ती शब्द' तो बचे रहें जो उसकी बेटी को ओट दे सकें। यह बहुत गहरा विचार है – भाषा भी एक तरह की सुरक्षा है, एक तरह का आश्रय, जैसे पेड़ की छाँव या नदी का किनारा।

    कविता की सबसे मार्मिक और इको-फेमिनिस्ट नज़रिए से सशक्त वह पंक्ति है जहाँ बेटी को 'धरती की लुप्तप्राय प्राणी' कहा गया है। यहाँ प्रकृति और स्त्री को पूरी तरह एक कर दिया गया है। दोनों ही आज खतरे में हैं, दोनों लुप्त होने की कगार पर हैं। पितृसत्तात्मक समाज और विकास की दौड़ ने दोनों को एक साथ नुकसान पहुँचाया है। बेटी और धरती – दोनों के लिए माँ की चिंता एक ही है। वह दोनों को बचाना चाहती है, दोनों को सुरक्षित जगह देना चाहती है जहाँ 'बिना धक्का खाए खड़ी हो सके एक जगह'। यहाँ कविता की नाजुकी में एक गहरा दर्द है – जैसे कोई माँ अपनी बेटी को गले लगाकर आश्वस्त कर रही हो।

    इको-फेमिनिज्म में देखभाल (care) और संरक्षण की नैतिकता पर जोर दिया जाता है, न कि विजय या नियंत्रण पर। कविता में देखभाल की यही चेतना है। माँ कोई बड़ा कारोबार या संपत्ति नहीं छोड़ना चाहती। वह सिर्फ़ अपनी बेटी के लिए एक सुरक्षित, संतुलित धरती छोड़ना चाहती है। वह जानती है कि उसके पास भी 'सबकी तरह दो ही हाथ हैं', फिर भी वह अपने आज को इस तरह संभाल रही है कि बेटी का कल न बिगड़े। यह देखभाल की वही नैतिकता है जो 'चिपको आंदोलन' में स्त्रियों ने दिखाई थी – अपनी संतान की तरह पेड़ों को गले लगाकर बचाना। विदित है कि गौरा देवी और अन्य स्त्रियां जंगल को अपनी माँ कहती थीं, और खुद को उसकी बेटियाँ – ठीक वैसे ही जैसे यहाँ कवि माँ बेटी को धरती की आखिरी संतान मान रही है।

    एक अन्य काव्यात्मक उदाहरण अनुराधा सिंह की ही एक और रचना से लिया जा सकता है जहाँ वे कबूतरों की बात करती हैं: "मैंने कबूतरों से सब कुछ छीन लिया / उनका जंगल / उनके पेड़ / उनके घोंसले / उनके वंशज / यह आसमान...”। यहाँ भी प्रकृति का हक छीना जाना स्त्री की तरह ही दिखाया गया है – जैसे शहर की बालकनी में खड़ी स्त्री खुद को मुक्त समझती है, लेकिन वह भी तो उसी छीने हुए आसमान में साँस ले रही है। यह इको-फेमिनिज्म की उस भावना का कलेजा चाक कर देनेवाला स्पर्श है जहाँ स्त्री और पक्षी दोनों की उड़ान सीमित कर दी गई है।

    कविता पुरानी विरासत (संपत्ति, ज़मीन, कारोबार) को साफ़ नकारती है और एक नई विरासत की कल्पना करती है – माँ से बेटी तक जाने वाली देखभाल, सुरक्षा और संरक्षण की विरासत। यह इको-फेमिनिज्म का मूल सपना है – एक ऐसी दुनिया, जहाँ न स्त्री पर और न प्रकृति पर कोई नियंत्रण करे, बल्कि दोनों एक-दूसरे के साथ संतुलन में रहें, जैसे नदी और उसकी लहरें, जैसे माँ और उसकी बेटी।

    'विरासत' इको-फेमिनिज्म पर वंदना शिवा की किसी किताब या सिद्धांत से नहीं, बल्कि एक साधारण माँ के दिल से पुनर्नरचित की गई कविता है। वह पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर प्रयुक्त भारी भरकम शब्दों के बिना ह्रदय की भाषा में बता देती है कि अगर धरती मर रही है तो स्त्री भी मर रही है, और जब स्त्री कमज़ोर है तो धरती को बचाना मुश्किल है। इसीलिए माँ की सबसे बड़ी विरासत यही है कि वह अपनी बेटी को एक ऐसी धरती दे जाए जहाँ वह मज़बूती से, बिना डर के खड़ी रह सके – जैसे कोई पुराना बरगद अपनी जड़ों से धरती को थामे रहता है। यह कविता आज के जलवायु संकट और स्त्री-असमानता के दौर में इको-फेमिनिज्म की संभवत: सबसे सशक्त, संवेदनशील और काव्यात्मक अभिव्यक्ति है।
    अनुराधा सिंह को इस श्रेष्ठ कविता के लिए धन्यवाद और ढेर सारी शुभकामनाएँ।

    गरिमा श्रीवास्तव

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