प्रिया वर्मा की कविताएं
प्रिया वर्मा
प्रिया वर्मा की कविताओं में जीवन के अनेक रंग हैं।इन रंगों के केंद्र में स्त्री है। प्रेम है देह है पतझड़ है तो तलाक भी है।इन कविताओं में जीवन की जद्दोजहद के बीच वह तकलीफ़ भी है जो होकर भी नहीं होने का दर्द झेलने के लिए मजबूर करती है।कुल मिलाकर ये कविताएं ध्यान खींचती हैं।बेचैन करती हैं।
अभी का दुःख
इंतज़ार करती हूं
दुःख के छोटे होने का
मिटने का नहीं
मिटता नहीं, सिमटता है
उजाले की बिंदी-सा
धब्बे की तरह, सिकुड़कर
मिटने का भरम देकर
अंधेरा लगने लगता है उजला
जब तक नहीं होता उजाला
फिर एक दिन
एक नया दुःख
धंसने आ जाता है पसली में।
और अभी का दुःख
सीने से बाहर
निकल जाता है।
कांटा ही निकालता है
कांटे को।
न होना
न होने की नदी में
होने का खेल खेलते हुए ही
सारे पुल बनाए जा सके।
न होने के रास्तों पर
बार-बार उठाए जा सके
होने के कदम-
हर बार निकले हम
नई यात्रा के लिए।
मिलते रहे हम
न होने में होते
नए लोगों से
भावुकता में गर्म होते लोहे की आस लगाए
सुंदर प्रेमियों की सूरतों में
अपना न होना संवारते हुए
न होने में होने की इच्छा को
हमेशा लगा
कि शायद
उस ओर के खालीपन में भी हो
घाटी के खालीपन का जादू
कि होने में अपना ही नाम लेकर पुकारेंगे हम
और न होने की आवाज़ के लौटने में
अपना ही नाम सुन कर संतोष कर लेंगे।
प्यार में लगाई एक टेर की तरह
जो टकराती पहाड़ी-सी आसमान की छाती से
और फट पड़ती
जैसे बादल
बचती- अनुनाद में
पत्तियों की सरसराहटों में
अपने होने में
हवा की परतों में बैठ कर चुप हो जाती
न होने की तरह
न होने का नाद बजता
हर शाम
संगीत बनता वकील
करता होने की पैरवी
न होने के लिए।
तलाक की अर्ज़ी पर
क्योंकि तलाक औरत को तन्हा बना देता है
यह होता है जवाब
तलाक की एक अर्ज़ी पर
जब औरत अकेली रहना चाहती है
वकील जानना चाहता है
इस तरह कि
क्या वह वजह
जान सकता है वह
जिस की बिनाह पर
तलाक चाहती है वह
औरत के इस जवाब पर
कि वह नहीं होता ज़रूरत के वक़्त उसके पास
वक़ील सीधा कहता है
यह कोई वजह नहीं है कानून में अलग होने की
जैसे ईश्वर के साथ न होने का यक़ीन
एक आस्तिक को नास्तिक में बदलता है
वैसे नहीं होता
'ना होना' नहीं हो सकता
अलग होने की वजह
यद्यपि कि वह वजह है।
पर कानून में जो दर्ज़ हैं वजहें
वे हैं पागलपन या बेवफ़ाई या नाइंसाफ़ी
अनदेखी भी नहीं होती जब
अलग होने की वजह
तो न होना किसी के खिलाफ
कैसे हो सकती है
वजह!
और फिर एक दिन मौत तो होती ही है
अपने आप कर देती है अलग
इधर औरत सोचती है
कि क्या उसे मरने की दुआएं माँगनी आसान हैं
या कानूनी वजहें खंगालना
वह लौट जाती है
नहीं बची शादी में
बची-खुची शादी खोजते हुए
और बनी रहती है शादीशुदा।
पतझड़ को सुख होता है
पतझड़ के पास अपनी बोली है
मगर वह चुपचाप बिता देता है
सहता हुआ - अपने आप को
वह कभी नहीं कहता
कि उदासी उसकी बयार है
या साज संवार।
वह करता है भूरी पीली सूखी पत्तियों से धरती का सिंगार
जब कोई चलता है झरते हुए मौसम पर
पतझड़ को सुख होता है
अकेले में बात करने का
देवता के माथे पर रखने का
पतझड़ के पास नहीं कोई फूल
परिधि में गूंजता सूनापन
पग-यष्टि में हरसिंगार ।
दिखना
उन्हें निष्पक्ष दिखना है उन्हें रहना भी है
उन्हें काम नहीं करना उन्हें काम करते दिखना भी है
उन्हें सब कुछ चाहिए उन्हें कुछ नहीं चाहिए वाली भंगिमा में छुपना भी है
उन्हें कहती हूँ तो तमाम उन्हें याद आने लगते हैं
राजनीति से बचती हूँ
और दाहिना पांव उठाकर कहीं और रखती हूँ
राजनीति में ही धंसती हूँ
नहीं बच सकती मैं उनसे
कहीं से भी आ जाते हैं उनके नुमाइंदे
मैं कोई शैतान हूँ जैसे और वे समाज के ईश्वर
मेरा वध करके उन्हें महान दिखना भी है।
देह तो हाड़-मांस है
गीली धरती पर
ख़ुश्क ढेले को रखती हूँ।
ढेला घुल कर मिट जाता है।
जैसे जल में कुम्भ कुम्भ में जल
वैसे मिट्टी से मिट्टी का फ़र्क़ मिट जाता है
ध्यान नहीं आता
अभी कहाँ रखा था पांव
कहाँ छुआ था त्वचा ने भूमि को!
लेकिन जब सीली हुई देह पर रखती हूँ छाती तुम्हारी,
छाती तुम्हारी पत्थर ही रहती है।
दो क्षण में गल जाती है सृष्टि
हवा से लोहा भी क्षय होने लगता है
पर एक मनुष्य नहीं भीगता
दूसरे मनुष्य की वेदना से
स्त्री के आँसू पुरुष की आँख से नहीं बहते
झूठी कहावत है कि देह माटी है
देह तो हाड़-मांस है।
और तो और
देह के सुख-दुख भी
हाड़ मांस के होते हैं
जब मैं और तुम प्रेम में होते हैं।
ए आई को सब नहीं है पता
घर से निकली हूँ और वापसी का ब्यौरा बना कर जेब के हवाले कर दिया है
लौटूंगी तो फिल्म देखूंगी असली नकली
बड़ा उत्पात मचाते थे बंदर पिछले दोनों घरों पर
मैंने लोहे का पिंजड़ा बनवा लिया था। उनके लिए नहीं। अपने लिए।
फिर मैं यहाँ चली आई राजधानी क्षेत्र में
लेकिन राजधानी मेरे भीतर नहीं आई। न आएगी।
मैं आई उससे पहले इस शहर में आ चुका था ए आई
ए आई से पहले कोई गूगल था कोई याहू था
याहू से शमी कपूर याद आते हैं जंगली
शमी कपूर से याद आता है बदन पे सितारे लपेटे होने का दावा
मुझसे कभी नहीं लिपट सके सितारे
मुझसे मेरे झंझट लिपटे रहे। तुम से भी।
बीच में इतने झंझट हों तो ए आई के आ बसने की वजह बनती चली आई
चली आई तुमसे दूर तो संसार अधिक कुरूप लगता है
दर्पण की सीमाएं बढ़ गईं हैं
मेरे सारे रिश्तेदार बूढ़े हो गए हैं। एक एक दिन करके वे नहीं रहेंगे
एक दिन मैं सचमुच में अकेली हो जाऊंगी।
शब्दशः।
कोई नहीं होगा बताने वाला कि मैं कैसी थी सीधी थी कि शैतान या मुसीबत की मारी या दुखियारी
मेरे फोन नंबर का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा
ग़ैर ज़िम्मेदार हरकतें ज़िम्मेदार होंगी
नेहरू की तरह का जेलखाना नहीं हुआ है मेरा नसीब
जेल की चौहद्दी ज़्यादा फैली फूली है मेरे लिए
बिना जाने मैं किसी पर भी बोल रही हूँ
डर रही हूँ।
कंगना राणावत भारत देश की महान नेता हैं - ए आई कहीं ऐसा न बोल दे।
गीत की गलती नहीं है
दुख में रहना दुखी रहना नहीं है
और दुखी रहना दुखी दिखना नहीं है
माँ जैसी एक स्त्री मुझ पर विचार के बोझ का लांछन रख देती है
कहती हुई कि मस्त रहा करो
मस्त?
यह वही चीज़ है न! शब्द!
तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त …
मुझे कभी पसंद नहीं आया यह गीत
बचपन में भी नहीं। जवानी के दिनों में भी करती रही खुद के चीज़ होने से इंकार
मुझ पर कोई प्रेम राजनीति की तरह उतरा
मैं रोई तो अकेली रही। हालांकि इच्छा रही हमेशा कि कोई मेरे रूठने पर मुझे मना ले
और मैं न मानूं
पर मैं मानती रही बग़ैर मनाए भी
मैं खुद को प्यार करने जैसे भ्रम में कभी पड़ी
ऐसा मुझे याद नहीं है
शायद कभी किया हो। या शायद नहीं।
शायद की दीवार कहां है नहीं पता
लेकिन यह आड़ न होती तो सब कितना असली होता
कितना डरावना! कितना मस्त!
मस्त हो जाऊंगी तो जैसे इस देश के बाहर कहीं बना लूंगी ठिकाना
पर क्या फ़ायदा
एक दिन वापस यहीं धकेल दी जाऊंगी
अपने देश अपने हाल अपनी धींगामुश्ती में
मुझे पहचानने से हर कोई कर देगा इंकार
इस देश में रहना दुखी रहना नहीं है
और भला दुखी रहना क्या है
अचानक किसी को मेरी बातों में सियासत दिखने लगेगी
शायद मैं उस वक्त जवाब में ठोस बात नहीं कह पाऊं
पर अगले ही दिन कोई मिलकर पूछ लेगा
मस्त हूँ —कह नहीं पाऊंगी।
कबीर पंथी की तरह
उस घास फूल को नहीं आता गश
जिसे देख रहा है कोई पर नहीं याद रख रहा
उस अनाम घास में उगे को
जिसका नाम मुझे नहीं है पता।
किसी अभी-अभी जन्मे शिशु की तरह
कुमुनाई सी देह लिए
नन्ही टहनी पर
किसी मोटिवेशनल यूट्यूबर से नहीं है उसकी चुनौती।
यह उसकी तारीफ़ नहीं है कि वह खिला है
वह खिला है क्योंकि भाग्यवशात उसे वहीं खिलना पड़ा।
संयोगवश कोई बीज आ गिरा सड़क किनारे
और साजिशन उसी शाम हुई बारिश ने उसके पैदा होने की पूरी संभावना बनाई।
फिर धूप ने सीढ़ी तैयार कर दी।
अब तो उसे खिलना ही था सड़क के किनारे
नाले की मुंडेर पर
गुलदाऊदी के पीले रंग और झालरदार पंखुड़ियों वाला
मगर छोटा
पढ़ाई लिखाई और सभ्यता की निराई छंटाई से कोसों दूर
पारिस्थितिकी में युवा होते
किसी कवि की तरह
सामाजिकता और पढ़ाई लिखाई के विशेषाधिकार
के दायरे से ठीक बाहर
कबीर पंथी की तरह।
बस एक बार
दर्पण पर कविता लिखने की क्या ज़रूरत है
बस झांक लो दर्पण में
जैसे पोखर में देख लेते हो
जल अंदर अपनी हिलती- डुलती काया
जैसे झरते हुए पत्ते देख लेते हो
आती हुई सर्दियों में बारिश की तरह
जैसे देख लेते हो देवानंद को नहीं खुद को राजू गाइड में
बदलते नहीं ढलते नहीं
होते हुए बस
दर्पण में खुद को होते हुए देख लेने से ही पूरी हो जाती है
एक दुनिया
कल्पना और सचाई की आँख मिचौली के खेल की शुरुआत में
दर्पण में ही देख लेती होगी वह स्त्री
पहले
इतवार के ढलने के पहले तक की बैठक में जाने से पहले
अपनी लिखी कविताओं के पन्ने अपने झोले में भरने के बाद
एक घूंट पानी पीने और घर से निकलने और
कविता पढ़ते हुए खुद को सोचने के पहले भी
बस एक बार ।
प्रिया वर्मा
जन्मतिथि- २३ नवंबर १९८३
निवास - लखनऊ
कविता, कहानी, कला व सम-सामयिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन, आलोचना, अनुवाद तथा स्वतंत्र विचार। दो संग्रह प्रकाशित - स्वप्न के बाहर पाँव, एक पंक्ति के लिए। कुछ कविताओं का उर्दू, बांग्ला, पंजाबी और मराठी भाषा में अनुवाद प्रकाशित।
प्रथम कविता संग्रह *स्वप्न के बाहर पाँव* को भारत भूषण अग्रवाल वर्ष २०२३ प्राप्त।
संप्रति - प्राथमिक शिक्षक।
सभी पेंटिंग्स: वाज़दा ख़ान










अच्छी कविताएं। प्रिया वर्मा इधर लगातार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं और उनकी कविताओं ने सुधी पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। 'कौशिकी' में आईं कविताएं भी प्रभावित करती हैं। उनको और आपको भी बधाई एवं शुभकामनाएं। उनकी कविताओं में बात कहने का एक सलीका है और भाषा की सादगी भी देखी जा सकती है।
ReplyDeleteलाजवाब।
ReplyDeleteबहुत खूब।
ReplyDeleteअच्छी हैं कविताएं।
ReplyDeleteअच्छी कविताए ।
ReplyDeleteबहुत बहुत बधाई।
पहली बार इन कविताओं को पढ़ रहा हूं।
ReplyDeleteबहुत अच्छी लगीं। साझा करने के लिए धन्यवाद।
अच्छी कविताए
ReplyDeleteबहुत बहुत बधाई ।
कविताओं की भाषा अत्यंत आत्मीय, सहज और संप्रेषणीय है और भावभूमि गहरी और बहुस्तरीय लगी।
ReplyDeleteकवि प्रिया वर्मा अभिनंदन।
प्रिया वर्मा जी की दो अलग - अलग कविताओं की स्वतंत्र पंक्तियां एक दूसरे को परिभाषित करती है -
ReplyDeleteदुख में रहना दुखी रहना नहीं है
और दुखी रहना दुखी दिखना नहीं है...
…वह लौट जाती है
नहीं बची शादी में
बची-खुची शादी खोजते हुए
और बनी रहती है शादीशुदा। ...
सारी कविताएँ अच्छी हैं। लेकिन इन्हें थोड़ा ठहर कर पढ़नी चाहिए।
सुंदर।
: पद्मराग मणि
समकालीन हिंदी कविता की चर्चित कवयित्री प्रिया वर्मा की महत्वपूर्ण कविताएं हर बार व्यवस्था के विरुद्ध आक्रोश उत्पन्न करते हुए कठिन जीवन की विसंगतियों को बहुत शिद्दत से व्यक्त करती हैं उस पर अपना पक्ष रखती हैं । वर्तमान समय में जो कुछ घटित हो रहा है वह किस तरह अन्यायपूर्ण है किस तरह न्यायसंगत नहीं है इन बातों को यह कविता बहुत शिद्दत के साथ पाठकों के समक्ष रखकर सोचने को बाध्य करती है । प्रभावी प्रस्तुति के लिए आपको साधुवाद ज्ञापित करता हूं बहुत बहुत धन्यवाद प्रेषित करता हूं । कवयित्री प्रिया वर्मा जी को महत्वपूर्ण कविता के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं।
ReplyDeleteहर कविता एक खास और गहरे अर्थ को लेकर अपने पाठक के पास आती है। बहुत ही कम कवि उनके पास या कहूँ नजदीक नजर आते हैं।
ReplyDeleteबेहतरीन कविताएँ
ReplyDeleteबधाई।
अच्छी कविताएं।
ReplyDelete