उर्मिला शिरीष की कहानी

 

उर्मिला शिरीष 

उर्मिला शिरीष की कहानी 'हरा पत्ता' उत्तर आधुनिक समय की उस समस्या को दर्ज करती है जिसमें अंधाधुंध विकास के क्रम में एक तरफ तो आगे निकल जाने की होड़ है दूसरी तरफ अपनी जड़ों की याद भी रह रह कर टीसती है। रिश्ते खत्म हो रहे हैं, संबंध बिखर रहे हैं,आपसी सद्भाव और सहिष्णुता की जड़ें टूट रही हैं। ऐसे में भी एक चाह है जो वापस खींच लेना चाहती है।कहानी इस द्वंद को बहुत मार्मिक तरीके से दर्ज करती है।



हरा पत्ता


 ‘‘आपको ढेर सारी बधाईयाँ। आप भाग्यशाली हैं जो आपको पहली बार में ही ग्रीन कार्ड मिल गया है।‘‘
 ‘‘धन्यवाद।‘‘ गद्गद होकर अपनी खुशी उड़ेलकर बधाई देने वाले सज्जन को उन्होंने जवाब दिया। उन दोनों की खुशी और उत्साह देखकर उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि इसमें इतनी बड़ी खुशी की क्या बात है? लोग इतना खुश क्यों हो रहे हैं। ऐसी खुशी भरी बधाईयाँ तो उनके यहाँ शादी तय होने पर, बच्चे के जन्म लेने पर या किसी का बड़ी नौकरी में चयन होने पर दी जाती थी।
 ‘‘हम लोग तो चैथी बार ट्राय कर रहे हैं। इस बार भी पता नहीं वीजा मिलता है या नहीं। सालों हो गये हमारे बेटे को वहाँ रहते हुए। आधी जिंदगी लगा दी हमारे बेटे ने उनकी कंपनी में, पर हम लोगों को वहाँ रहने के लिए चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। जैसे हम कोई भिखारी हो।‘‘
 ‘‘टूरिस्ट वीजा क्यों नहीं ले लेते।‘‘
 ‘‘वो नहीं चाहिए।‘‘
 दोनों महिलाएँ आपस में बात कर रही थी।
 ‘‘हम तो सुबह तीन बजे ही आ गये थे। लाईन में सबसे पहले लग गये थे तब जाकर अब हमारी बारी आई है।‘‘
 उन्होंने देखा था सड़क के उस पार तीन-चार बजे से ही लोग इकट्ठा होना शुरू हो जाते हैं। जो लोग पहले आ चुके होते हैं वे पहले से ही सीधे आफिस के सामने लगने वाली लाईन में लग जाते। कुछ लोग सीधे हवाई अड्डे या रेल्वे स्टेशन से सीधे यहाँ आ जाते हैं। बूढ़े, बच्चे, महिलाएँ, नौजवान, कंपनी के लोग, छात्र, गाँव-देहात के लोग यानी एक लघु हिन्दुस्तान अपने सपनों के साथ यहाँ दिखाई दे रहा था। यहाँ आते ही उनकी चाल-ढाल में, खड़े होने में, भाव भंगिमा में विदेश जाने का, विशिष्ट होने का भाव जरूर झलक रहा था। वे चेहरे जिन्होंने अपनी ज़मीनें बेचकर, मकान तथा प्लाट बेचकर अपने बच्चों को विदेश में पढ़ाने का सपना देखा था और उनके सपनों को साकार होते देखकर ब्याज और कर्ज की चिंता को अपने अंदर छुपाये थे वे भी बाहर से मुस्कराते हुए दिखाई दे रहे थे। वे लोग जिनको अपने बच्चों से बिछुड़े हुए पाँच-पाँच साल से ज्यादा हो गये थे वे अपनी बैचेनी के साथ, उम्मीद लगाकर लाईन में आगे बढ़ते जा रहे थे। पानी की बोटल तथा दस्तावेजों की फाइलें थामे लोग थककर भी थकने का नाम नहीं ले रहे थे। अंदर बैग ले जाना अलाऊ नहीं था। जिनके सगे संबंधी साथ में थे, वे बाहर बैठे सामान की रखवाली कर रहे थे और जो नितान्त अकेले थे वे अपना सामान अंदर जमा करा रहे थे। फीस जमा करके टोकन मिल रहा था यानी कदम-कदम पर पैसा जमा करना पड़ता है। मोबाईल, चार्जर, बैटरी, पावर बैंक, घड़ी कोई भी चीज अंदर नहीं ले जा सकते थे। सिक्योरटी वाले सभी का वालेट, बेल्ट तथा पर्स ट्रे में रखवा रहे थे और कई लोगों का तो बैग खाली करवाकर बार-बार चैक कर रहे थे।
 ‘‘मैडम, ये नहीं जायेगा।‘‘
 ‘‘ये आक्सीमीटर है और ये छोटा सा शीशा...।‘‘
 ‘‘आप नहीं ले जा सकती।‘‘
 ‘‘पर....क्यो!‘‘
 ‘‘बाहर रखकर आईए।‘‘ पीछे वाले आदमी ने उन्हें सलाह दी क्योंकि आगे वाले आदमी की, गले में पहनी मालाएँ तक सिक्यूरिटी वालों ने उतरवा ली थी।


फिर से लंबी लाईन में लगना होगा। होटल वाले ने कहा भी था, मैडम बैग मत ले जाइए पर मैडम कहाँ सुनने वाली थी। आक्सीमीटर और छोटा सा शीशा कौन सा नुकसान पहुँचा देगा। बड़े-बड़े हमले तो रोक नहीं पाते हैं। दुनिया के एक चैथाई देश युद्ध, हमलों और आतंक की आग में झुलस रहे हैं और ये एक छोटे से शीशे और आक्सीमीटर न ले जाने पर अड़े हुए हैं। वे मन ही मन भनभना रही थी। 
 ‘‘कोई बात नहीं। नियम तो मानने ही चाहिए।‘‘
 ‘‘ये एम्बेसी का आफिस है। यहाँ के नियम सख्त होते हैं।‘‘
 दस साल पहले भी इसी तरह लंबी लाईन में लगना पड़ा था। तब मई का महिना था। चिलचिलाती धूप में बाहर खड़े-खड़े पूरा शरीर पसीने से भींग गया था। पर महादेश जाने की, वहाँ घूमने की और वहाँ रहने की जो खुशी थी उसने गरमी को यूँ ही सर के ऊपर से निकाल दिया था। बचपन में डिज़नीलैण्ड के बारे में जो पढ़ा था, उसके कैरेक्टर्स और कार्टूनों को टी.वी. पर जिस तरह देखा था उन सबको सामने से देखने का उत्साह तथा उल्लास मन को रोमाचिंत कर रहा था और उस जादुई संसार का आकर्षण अपनी तरफ खींच रहा था। डालर खर्च करके सबके लिए कोई न कोई गिफ्ट लाने का जो गुमान था उसने गर्मी, तपिश और थकान को हवा में उड़ा दिया था। लेकिन आज न वो उल्लास था, न उत्साह था, न वो हवाई जहाज में बैठकर बादलों की हजारों बनती बदलती आकृतियों, आकाश और बादलों पर बनते थिरकते, चमकते रंगों को देखने की रोमांचक अनुभूति थी। बस लाईन के साथ बेमन से आगे बढ़ते जा रहे थे। इस समय पता नहीं क्यों बार-बार मलाल हो रहा था कि कैसे तो बेटा और बेटी को बाहर पढ़ने के लिए भेज दिया था। एक की उच्च शिक्षा के लिए मकान गिरवी रखा था।दूसरे की पढ़ाई के लिए प्लाट। उन दोनों पर ऐजुकेशन का भारी-भरकम लोन और उसकी ब्याज की किश्तों का दबाव था और इन दोनों पर मकान तथा प्लाट का। बुजुर्गों की सीख दरकिनार करके कि ‘जितनी चादर हो उतने पाँव पसारना चाहिए‘, भूलकर सब कुछ प्राप्त करने, सोचे हुए को साकार करने की उसी धुन में करते गये थे। हाँ बच्चे पढ़ते गये, वहीं उनकी नौकरी भी लग गयी। धीरे-धीरे उन दोनों को वहाँ की आवोहवा, वहाँ का साफ-सुथरा वातावरण, वहाँ की जीवन शैली, वहाँ की भाषा, वहाँ के लोग, उनका रंग रूप, मौसम, सड़कें, पेड़, समन्दर, कुत्ते, बिल्ली पसंद आते गये, और यहाँ की सारी चींजे पीछे छूटती गई। लड़की के दोस्त बन गये थे। लड़का और उसकी दोस्त साथ में रह रहे थे। जब भी वे डाॅलर भेजकर रुपयों में कन्वर्ट करवाते तो उनके हाथ गिड्डियों से भर जाते और बैंक का लोन भी धीरे-धीरे कम होने लगा था। बच्चे अपने लिए नये, सुंदर, शानदार मकान तलाशने लगे थे। उनके सपनों में माता-पिता को घुमाना भी शामिल था। माता-पिता का पुराना मकान नये में बदल जाना चाहिए, यह सपना अब भी बच्चों की फेहरिस्त में जुड़ा हुआ था। धीरे-धीरे विदेशी सामान से उनका घर भरता गया था लेकिन वे दोनों भीतर से अकेलेपन से भरते गये थे। हर कदम पर उन्हें बच्चों की कमी अखरने लगी थी, खासकर बीमार पड़ने पर अस्पताल जाते हुए। तीज, त्यौहारों पर उन्हें कुछ भी बनाने का, सजाने का, मन नहीं करता। सारे रिश्तेदार परिचय करवाते समय यह जरूर जोड़ देते, कि इनके दोनों बच्चे अमेरिका में हैं। तब उनका सिर अभिमान से ऊँचा हो जाता था। उनकी ड्रेसे भी लोगों का ध्यान आकर्षित करती थी। उनका पर्स पैसों से कम, विदेशी वस्तुओं से भरा इतराता, इठलाता, कंधों पर झूलता नज़र आता था। एयरपोर्ट से लेकर एयरलाइन्स का, वहाँ की सड़कों का, बाज़ारों का, समन्दर का, झरनों का, झूलों का, पर्यटन स्थलों का, उनकी चाल-ढाल का जादू लिए, चर्चा करते वे अधाते न थे और पत्नी तो उस नशे से बाहर ही न आती थी। वहाँ के किस्से सुना-सुनाकर अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को वे दोनो अच्छे खासे बोर कर चुके थे। लोग उन दोनों को देखते ही आपस में कहते ‘अब अमेरिका पुराण सुनने को तैयार हो जाओ।‘ कब वे साड़ी से सूट पर फिर सूट से जींस पर और जींस से स्कर्ट पर आ गयी थी उन्हें पता ही नहीं चला था और वे भी लोअर, हाफ पेंट और टी शर्ट पहनकर बाजार और रिश्तेदारों के बीच जाने लगे थे। उन दोनों की बातें अमेरिका से शुरू होकर अमेरिका पर ही समाप्त होती थी।
 लेकिन आज, आज वे दोनों लंबी लाईन में खड़े-खड़े लंबी-लंबी श्वास भर रहे थे। गेट के अंदर पहुँचकर जब ए.सी. की हवा मिलीतब कहीं जाकर उनको राहत मिली। वहाँ उपस्थित स्टाॅफ की एक महिला ने उन्हें कोने वाले काउन्टर पर जाने का इशारा किया।
 ‘‘आपकी भाषा?‘‘ खिड़की के अन्दर बैठी महिला ने पूछा।
 ‘‘अंग्रेजी! नहीं हिन्दी।‘‘ हालांकि हिन्दी बोलते हुए उन दोनों को झेंप महसूस हुई। आसपास वाले क्या सोचेंगे कि जा रहे हैं अमेरिका और अंग्रेजी तक नहीं आती है।
 उन्होंने सुना बहुत सारे लोग हिन्दी के अलावा गुजराती तथा दूसरी भाषाओं का विकल्प ले रहे थे।
 ‘‘पानी... प्यास लग रही है।‘‘
 ‘‘साईड में मिल रहा है।‘‘
 ‘‘मॅहगा होगा!‘‘
 ‘‘तो? मॅहगा होगा तो पानी नहीं पिओगी? जाकर ले आओ।‘‘
 पत्नी थके कदमों से पानी की बोटल लेने चली गयी।
 ‘‘आप कहाँ से आई है?‘‘ एक महिला जो अकेली थी उनकी पत्नी से पूछ रही थी।
 ‘‘आपका क्या नंबर (टोकन) है? कैसे पता चलेगा कि हमारा नंबर आ गया है? क्या आवाज लगायेंगे।‘‘ वो असमंजस में थी और घबरायी हुई भी।
 ‘‘स्क्रीन पर आयेगा। आप स्क्रीन पर देखते रहिए।‘‘
 न वे हिन्दी जानती थी न अंग्रेजी। उन्होंने सीधे पल्लू की साड़ी पहन रखी थी। पेंट शर्ट, प्लाजो, जींस, टी शर्ट पहने महिलाओं के बीच वे अपनी सीधे पल्लू की साड़ी में अलग ही नज़र आ रही थी। सफेद बाल, साधारण रंग रूप। चारों तरफ घूमती जिज्ञासु निगाहें।



 ‘‘आपका वहाँ कौन है?‘‘
 ‘‘बेटा-बेटी?‘‘
 ‘‘क्या दोनों।‘‘ उन्हें आश्चर्य हुआ।
 ‘‘आपका...?‘‘
 ‘‘मेरी बेटी है। सात साल से वहीं पर रह रही है। अब वो मुझे बुला रही है।‘‘
 ‘‘अच्छा।‘‘ इस समय उनका मन किसी से बात करने को नहीं हो रहा था।
 ‘‘टिकिट करवा लिया?‘‘ उस महिला ने फिर पूछा।
 ‘‘अभी नहीं। सामने स्क्रीन पर देखिए आपका नंबर आ गया है। विंडो नम्बर (?) पर जाना है आपको।‘‘
 वे कागजात संभालती, साड़ी का पल्लू ठीक करती कुछ-कुछ लंगड़ाती विंडो की तरफ जाने लगी। लेकिन वे अपनी विंडो पर ना जाकर दूसरी विंडो पर जा पहुँची। तब वहाँ घूम रही (स्टाफ) की लड़की उन्हें तय विंडो पर ले गयी। उनका कद छोटा था इसलिए वे पाँव उचकाकर बात कर रही थी। उन दोनों की निगाहें उसी विंडो पर टिकी थी। उन्होंने ने देखा वो महिला अपना एक हाथ ऊपर उठाकर दिखा रही थी फिर फिंगर प्रिंट दे रही थी।
 उनका टोकन नंबर जी 1273 था। उफ यहाँ बैठकर और लंबा इंतजार करना पड़ेगा। पूरी रात ठीक से सो भी नहीं पाये थे। कागज संभालते और तरतीबी से लगाते हुए घण्टों निकल गये थे। बेटा बार-बार समझा रहा था कि आप दोनों को क्या-क्या बोलना है। उन्हें अपने पिता की याद आ रही थी जब वे गाँव छोड़कर शहर आ रहे थे पढ़ने के लिए,तब उनके पिता भी इसी तरह से समझाते थे। ‘देखो पढ़ाई पर ध्यान देना, बुरी संगत में मत पड़ना। खेती से मुश्किल से पैसा निकलता है। जब तुम नौकरी में आ जाओगे तो दुबारा खेत खरीद लेंगे। किसानों की असली ताकत और धन उनके खेत-खलिहान होते हैं पर तुम्हारी पढ़ाई भी जरूरी है।‘ उन्होंने गाँव छोड़ा था क्योंकि उनके लायक गाँव में कोई काम धंधा नहीं था फिर वे पढ़ते गये, एक के बाद एक डिग्रियाँ बढ़ती गयी। उनका गाँव जाना कम होता गया और उधर खेत भी कम होते गये थे। नौकरी के बाद शहर में ही उन्होंने मकान बना लिया था। पिता का दो-तीन खेत खरीदने का सपना वहीं कहीं दफन होता गया था। अब वहाँ जायेगा कौन? देखभाल कौन करेगा? का तर्क ही सबसे बड़ा बहाना बनता गया था।
 माता-पिता आते थे। दो-चार हफ्ते रुकते थे और लौट जाते थे।
 ‘‘कितना पैसा खर्च हो जाता है विनोद।‘‘
 ‘‘हम तो गाँव में आधे खेत में धनिया मिर्च उगा लेते हैं। सब्जियाँ घर की हो जाती हैं। यहाँ तो चालीस रूपये किलो टमाटर मिलते हैं। बीस रूपये किलो प्याज! राम-राम मुँह में रखते हुए स्वाद ही बदल जाता है।‘‘
 ठीक वैसा ही एहसास उन्हें अपने बेटे के पास जाकर होता था। कितने डालर की कौन सी सब्जी आ रही है। पूरे हफ्ते के फल और सब्जियाँ कितने डालर यानी रुपयों में आती है। रुपयों का मूल्य सुनकर वे फल की प्लेट खिसका देते हैं। ओह, इतनी मँहगी! बेटा झल्लाता, ‘पापा डालर और रूपये का यह खेल बंद कर दो। यहाँ के हिसाब से देखो! यहाँ के हिसाब से नहीं चलोगे तो पानी तक नहीं पी पाओगे। यहाँ पानी भी खरीदकर पीना पड़ता है।‘ रातभर उन्हें पिता याद आते रहे थे। पिता की स्मृति उन्हें रूला रही थी या खींच रही थी वे समझ नहीं पा रहे थे।
 ‘‘वैसे तो आपका ग्रीन कार्ड हो जायेगा फिर भी....।‘‘ फिर भी! पर उन सबका मन अटका हुआ था। उनका मन तो उसी समय उदास और निरूत्साहित हो गया था जिस समय दोनों की मेडीकल जाँच और वैक्सीनेशन में अस्सी-नब्बे हजार रुपये खर्च हो गये थे। क्या जरूरत है इसकी उन्होंने पूछा था! ये अमेरिका है वहाँ जाने के लिए आपको पूरी तरह से निरोगी होना चाहिए। अगर आप लोग जाना चाहते हैं तो इन सारी जाँचों और वैक्सीनेशन का सर्टीफिकेट आपके पास होना ही चाहिए।‘‘
 डाक्टर ने दो टूक कह दिया था। झक मारकर चार-चार वैक्सीनें लगवायी थी और रिपोर्ट में लग्स में हल्का सा कोई स्पाॅट दिखा था तो सीटी स्कैन और एक्सरे करवाकर डाक्टर से सर्टीफिकेट लेना पड़ा था।
 ‘‘बहुत पैसा खर्च हो रहा है बेटा।‘‘ उन्होंने दबी ज़वान से कहा था।
 ‘‘तो कब तक वहाँ अकेले पड़े रहोगे? हमारी जान आप दोनों में अटकी रहती है। कभी तबियत खराब हो जाये तो कौन आयेगा। माँ के आॅपरेशन के समय क्या हुआ था और मेरे आने के बाद उनकी क्या हालत हो गयी थी? कौन आया था उनकी देखभाल के लिए। नर्स और केयरटेकर आपको रखनी नहीं है। आप हमेशा पैसों की बात क्यों करते हो। कब तक पैसे की रट लगाये रहोगे पापा? प्लीज अपने दिमाग से सारा हिसाब-किताब निकाल दो। हम लोग कमा किसलिए रहे हैं, आप लोगों के लिए ना।‘‘
 तब पत्नी ने उनको टोका था- ‘‘मत कहो न।‘‘ पलकें बंद किए वे अपनी बारी का इंतजार कर ही रहे थे कि तभी किसी लड़की के रोने की आवाज सुनाई दी, क्या हुआ? सबका ध्यान उसी खिड़की की तरफ चला गया।
 ‘‘प्लीज मैडम, हैल्प मी! मेरे हसबैण्ड वहाँ हैं। मैं तीन साल से उनके बिना यहाँ रह रही हूँ। मैं उनके पास जाना चाहती हूँ।‘‘ वह लगातार रोते हुए आफीसर के सामने गिड़गिड़ा रही थी। पर खिड़की के पीछे से आधे अधूरे वाक्य और अंतिम शब्द ‘साॅरी‘ सुनाई दे रहा था। उन दोनों ने बल्कि आसपास वालों ने अपने-अपने कागज दुबारा देखे। दूसरी विंडो से एक साउथ इंडियन जोड़ा चेहरा लटकाकर, निराशा में डूबा, नज़रें झुकाकर जा रहा था मानो वीजा रिजेक्ट न हुआ हो आपितु युद्ध के मैदान से पराजित होकर लौट रहे हो। 
 ‘‘नहीं हुआ?‘‘ पीछे से किसी की आवाज सुनाई दी! 
 एक दूसरी खिड़की पर माँ बेटी इंटरव्यू के लिए खड़ी थी। एकाएक उस लड़की ने उछलकर अपनी बेटी को गले लगा लिया और दोनो हाथ आकाश की तरफ उठाकर बोली ‘थैक्यू गाड‘ यानी उनको वीजा मिल गया था।
 एक और लड़का थके कदमों से उनके बगल से गुजरा। उसके चेहरे पर चिंता, उदासी तथा निराशा की परतें उतर आई थी। 
 ‘‘क्या हुआ?‘‘ प्रतीक्षारत एक अन्य युवक ने पूछा!
 ‘‘नहीं दिया?‘‘ उसने रुंआसी आवाज़ में कहा।
 ‘‘नहीं दिया, क्यों!‘‘
 ‘‘उनकी मरजी! वो राजा हैं, जो चाहे सो करें। तीसरी बार रिजक्ट कर दिया।‘‘ लग रहा था वो सबके सामने रो ही न पड़े।
 ‘‘कितना पैसा खर्च हो गया?‘‘ सचमुच वह किसी से उधार पैसा लेकर आया था। उन्हें याद आया उनके बेटे के दोस्त का वीजा जब तीसरी बार रिजेक्ट हो गया था तब वह भी फूट-फूटकर रोया था। उम्र निकली जा रही है। ऐजुकेशन लोन का पैसा चुकाना है। यहाँ कोई नौकरी मिल नहीं रही है। अब क्या होगा?‘‘ सचमुच जैसे काम की तलाश में उन्होंने अपना गाँव, घर, माता-पिता को छोड़ा था वैसे ही उनका बेटा काम की तलाश में सब कुछ देश, शहर, घर, परिवार छोड़ने को तैयार था। कैसे चीजें छूटती जाती हैं। कैसे हम अपनी जन्मभूमि से दूर और दूर होते जाते हैं और एक दिन ऐसा आता है जब स्मृतियों में बसे घर-परिवार, नाते-रिश्ते आँसू की बारिश करते नज़र आते हैं। फिर हम उनके पास लौटना भी चाहें तो नहीं लौट पाते हैं। हमारी सरकारें और उनकी बनायी योजनाएँ, उनके दिखाये सपने, उनके किये वायदे, उनके द्वारा छीनी गयी चीजें, सपने, भावनाएँ सब दर्द की विरासत में बदलते जाते हैं।
 ‘‘मेरी लड़की ने वहीं के लड़के से शादी की है। चार साल हो गये शादी को। न वो आई है न दामाद। हम तो आज तक नहीं मिले हैं। अब वो फैमिली बनाना चाहते हैं। हम दोनों की कोई आय नहीं है। वहाँ की सरकार को लगता है हम उन पर लायविल्टी बन जायेंगे शायद इसीलिए हमारा वीजा भी बार-बार रिजेक्ट हो जाता है। ऐसा पैसा, ऐसी नौकरी किस काम की कि हम मिल ही न पायें। आज देखिए क्या होता है। भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं कि बस एक बार वीजा मिल जाये वरना मैं तो इस जन्म में उससे मिल ही नहीं पाऊँगी।‘‘ कहते-कहते उस महिला की आँखों में आँसू छलक आये।
 ‘‘उसको आना चाहिए।‘‘
 ‘‘कहती है किराया बहुत ज्यादा है। पति साथ में आयेगा और जो कुत्ते, बिल्ले पाल रखे हैं उनको भी कहीं रखना होगा।‘‘
 ‘‘जितने में हमारा पूरे महिने का खर्च चलता है उतने में तो उनका एक हफ्ते का सामान ही आता है।‘‘ बेटी कहती है तुमको यहाँ आकर सारा काम खुद ही करना पड़ेगा। खाना बनाना, सफाई करना, कपड़े धोना। मैंने कभी कोई काम किया नहीं, सो आदत भी नहीं है। अब कहती है फैमिली बढ़ाना है तो आप दोनों को आना ही पड़ेगा। दोनों जाब करते हैं। बहुत ज्यादा व्यस्त रहते हैं।‘‘
 वह महिला लगातार बोले जा रही थी। वहाँ लगभग सभी इसी चिंता और प्रतीक्षा में बैठे थे। हरेक की कहानियाँ भी लगभग इसी तरह की थी। पिछली बार उन्होंने देखा था भारतीय महिलाओं को वहाँ के स्टोर्स पर काम करते हुए। उनकी फुर्ती, कार्य-कुशलता देखकर वे आश्चर्य चकित रह गये थे। वहाँ जाकर मन ही नहीं तन भी बदल जाता है। डालर में कमाया पैसा जब वे अपने घरवालों को भेजते हैं तो उनका जीवन ही नये रंग-रूप में जाता होगा लेकिन उनका मान, सम्मान, आत्म-सम्मान और पहचान उसका क्या?
 ‘‘क्या सोच रहे हो?‘‘ पत्नी ने टोका।
 ‘‘तमाशा देख रहा हूँ।‘‘
 ‘‘इसमें तमाशे की क्या बात है।‘‘
 ‘‘वो देखो।‘‘
 पत्नी ने सामने देखा दो बच्चे रो-रोकर ज़मीन पर लोट लगा रहे थे। चीख, चीखकर उनका गला भर्रा गया था। कभी माँ संभालती तो कभी पिता। पर बच्चों को भी न जाने क्या हो गया था कि उनका रोना थम ही नहीं रहा था। दोनों के चेहरों पर शर्मिंदगी झलक रही थी। वहाँ घूमने वाली स्टाफ की लड़की भी दोनों को चुप करवा रही थी। जब उन दोनों की बारी आई तो उसी लड़की ने उनको संभाला। अगर इनका वीजा हो गया तो ये दोनों एयरपोर्ट से लेकर हवाई जहाज तक में ऐसे ही रोते, चीखते, मचलते हुए जायेंगे, क्योंकि यह उनकी (बच्चो) मर्जी नहीं है। यह माता-पिता की मर्जी का परिणाम है जिसकी यातना वे भुगत रहे थे। उन्हें याद आया पिछले साल जब वे लौट रहे थे तब एक लड़की बमुश्किल छः-सात महिने का बच्चा अपने साथ में लिए थी। वह बच्चा भी लगातार रो रहा था। एयरहोस्टेस लगातार आकर पूछ रही थी। चुप करवा रही थी। बीच-बीच में वो उसको समझा भी रही थी। टेकआफ के बाद उसने एक छोटा सा बिस्तरनुमा बाॅक्स या बास्केट सामने लगा दिया था। लड़की ने बच्चे को उसमें लिटाया, तब भी वह बच्चा चुप नहीं हुआ था। तब उन्होंने देखा वो गुस्से में उसे टायलेट में ले गयी थी शायद वो उसे पीट रही थी। बच्चे की रोने, सांस रुकने, सांस खींचने की आवाजों से उन दोनों का कलेजा फटने लगा था। पता नहीं वो किस तरह की मनःस्थिति में थी और सारा गुस्सा बच्चे पर ही क्यों निकाल रही थी। जब वो बाहर आई तो बच्चा सहमा हुआ था। लंबी गहरी-गहरी सांसे ले रहा था। लड़की का चेहरा गुस्से में तमतमा रहा था। आँखों से आँसू बह रहे थे। क्या पता किस मजबूरी में गयी होगी और क्यों अकेली वापस आ रही है?
 ‘‘लगता है तुम थक गयी हो। बुरा न मानों तो मैं बच्चे को ले लूँ।‘‘ उसने बिना कुछ सोचे बच्चे को उनकी गोदी में पटक दिया था। उन्होंने तब बच्चे को कंधे पर चिपकाकर, उसकी पीठ थपथपाकर, घूमते हुए उसे सुलाया था। विमान के आसपास के यात्री हालांकि ईयर बड लगाये पिक्चर देख रहे थे। कईयों ने आँखों पर चश्मेनुमा कपड़ा डाला हुआ था। पर बच्चा अंदर ही अंदर सिसक रहा था।
 ‘‘क्या हुआ?‘‘
 ‘‘भूखा तो नहीं है?‘‘
 ‘‘अपने पापा को याद कर रहा है।‘‘ लड़की ने आँसू पोंछते हुए कहा था।
 उन्होंने अपनी छाती में महसूस किया था कि बच्चा हल्की-हल्की उसांसे भरकर सिसक रहा था। वो किसी बड़ी मानसिक और भावनात्मक यातना से गुजर रहा था। वह बिस्तर पर सीधे लेटना चाहता होगा, हाथ पाँव फेंकना चाहता होगा। जमीन पर बैठना या खेलनाा चाहता होगा। लेकिन यहाँ जहाज में एक बाॅक्सनुमा झूले में फॅसा बच्चा एडजस्ट नहीं कर पा रहा था। और जगह होती तो वे लड़की से सारे हालचाल पूछ लेती, पर जहाज में बैठे यात्रियों से बात करने में एक दूरी स्वाभाविक ढंग से बन ही जाती है। अजीब सा संकोच ज़वान को जकड़ लेता है।
 थोड़ी देर बाद जब बच्चा सो गया तो लड़की ने राहत की सांस ली थी। ‘‘थैक्यू आंटी। थैंक्स अंकल। साॅरी आपको परेशान होना पड़ा।‘‘ ‘‘इसमें परेशानी की कोई बात नहीं है।‘‘
 ‘‘कहाँ जा रही हो?‘‘
 ‘‘दिल्ली वहाँ से जोधपुर।‘‘
 ‘‘कोई आयेगा लेने!‘‘
 ‘‘नहीं। मैनेज हो जायेगा।‘‘
 ‘‘हस्बैण्ड वहीं जाब करते हैं?‘‘ पति ने उनका हाथ दबाया था कि मत पूछो।
 ‘‘क्यों! क्यों न पूछूं।‘‘
 ‘‘तुम हर एक से व्यक्तिगत बातें क्यों पूछने लगती हो। ‘‘
 ‘‘मैं गई तो रहने के लिए थी पर...।‘‘ लड़की ने दबी ज़वान से कहा। दर्द अपमान और अनिश्चय का भाव उसकी आँखों में देख जा सकता था।
 ‘‘फिर!‘‘
 ‘‘वापस आ गयी। वहाँ मेरे लिए कुछ नहीं था सिवा परेशानियों के।‘‘ लड़की का चेहरा भावशून्य था।
 ‘‘मैं अकेली बच्चे के साथ गयी थी। वहाँ जाकर एहसास हुआ कि वह (पति) चाहता ही नहीं है कि मैं उसके साथ रहूँ।‘‘ लड़की की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे थे।
 ‘‘क्यों!‘‘
 ‘‘मेरे साथ धोखा हुआ है..।‘‘ लड़की सिसक रही थी।
 आज तक वे उस लड़की का चेहरा, आँसूभरी आँखें और अवसाद से भरी आवाज भूल नहीं पाये हैं।
 ‘‘हम अपनी सफलता की आँधी में पता नहीं कितनी बार गिरते हैं, चोट-खाते हैं, रोते हैं मगर ऊपर से हँसते खिलखिलाते रहते हैं।‘‘
 ‘‘कितना रो रही थी वो लड़की, याद है।‘‘
 ‘‘क्या पता उसका पति उसे बुलाना भी चाहता है या नहीं। या यूं बहला रहा है।‘‘
 ‘‘पता नहीं।‘‘ पत्नी ने लंबी सांस भरते हुए कहा।
 ‘‘न बुलाना चाहता होता तो इतना पैसा ही खर्च क्यों करता।‘‘ पति ने अपना तर्क रखते हुए कहा। उन्होंने घड़ी देखी तीन घण्टे हो चुके थे। पता नहीं कितना समय और लगेगा।
 ‘‘तुम रह सकोगी वहाँ?‘‘ पति ने पत्नी से पूछा।
 ‘‘जब मन होगा वापस आ जायेंगें।‘‘
 ‘‘आज तक हमने यही तो किया है। किराये में, मेडीकल चैकअप में, दूसरी चीजों में, लाखों रूपये खर्च कर दिए हैं। जमा पूँजी के नाम पर क्या है हमारे पास?‘‘
 ‘‘ये सब अब क्यों सोच रहे हो।‘‘
 ‘‘तुम्ही बताओं आज हमारे हाथ में क्या बचा है?‘‘
 ‘‘सब कुछ तो है...।‘‘
 ‘‘बेटा-बेटी, दोनों चाहते हैं कि हम यहाँ की बची-खुची प्रापर्टी भी बेच दें।‘‘
 ‘‘ ठीक तो कहते हैं। हमारे बाद कौन देखेगा?‘‘
 ‘‘तुम तो पागल हो गयी हो। कुछ दिखाई नहीं देता है तुम्हें।‘‘
 ‘‘गाँव में जो कुछ था वो सब बिक गया और हमने जो कुछ बनाया वो भी हम बेटी और बेटे के कहने पर बेंच दें? कब तक हम अपनी चीजों को छोड़ते रहेंगे। जिनको अपने गाँव, घर और लोगों के पास जाकर कुछ करना चाहिए, जब वे ही नहीं करेंगे तो सब कुछ यूँ ही उजड़ता जायेगा।‘‘
 ‘‘आजकल तुम इस तरह की बातें बहुत करने लगे हो।‘‘
 ‘‘जो गलतियाँ करते आये हैं अब उनका पछतावा होता है। किससे कहें? बच्चे समझते नहीं है। हमने समझा नहीं। हमें ग्रीन कार्ड मिल गया तो हम वहाँ के रेजीडेंट हो जायेंगे और वहाँ ना रहने का बहाना भी खतम हो जायेगा।‘‘
 ‘‘बच्चों के पास रहना तुम्हें बुरा लग रहा है!‘‘
 ‘‘नहीं। हमने जितना पैसा वहाँ आने-जाने और रहने में खर्च कर दिया है, उतना पैसा अपने गाँव में खर्च किया होता तो हमारा जर्जर घर नया हो गया होता। हम अपने खेत बचा सकते थे। मैं अपने पिता का एक छोटा सा सपना भी पूरा नहीं कर पाया।‘‘ कहते-कहते उनका गला रूँध गया।
 ‘‘पागल हो गये क्या? बच्चे क्या कहेंगे? उनको कितना बुरा लगेगा? कितना पैसा खर्च हो गया है? ऐसे तो कोई कहीं जायेगा ही नहीं। दुनिया के लोग पागल हैं, जो अपना गाँव, अपना शहर छोड़कर दूसरे शहर और दूसरे देश में जाकर बस जाते हैं।‘‘
 ‘‘वे पागल हैं या नहीं मुझे नहीं पता पर अब मुझे समझ में आ गया है, कि हम अवश्य पागल हैं। हम हर साल अमेरिका जाते हैं पर एक भी बार गाँव गये क्या? अपने रिश्तेदारों के पास गये? हमने कभी जानने की कोशिश की है कि पिताजी की बहिनें किस हाल में हैं? उनके भाई किस तरह का जीवन जी रहे हैं?‘‘
 ‘‘यहाँ आकर सबकी याद आ रही है! चलो नंबर आ गया है। स्क्रीन पर नंबर देखो।‘‘ पत्नी ने फायलें उठाते हुए कहा।
 वे निरूत्साह से उठकर विंडो के सामने जा खड़े हुये। गोरे रंग की खूबसूरत महिला ने नमस्ते बोला। कम्प्यूटर पर वह उनके कागज चैक कर रही थी।
 ‘‘आपका वीजा कभी रिजेक्ट हुआ है?‘‘
 ‘‘नहीं।‘‘
 ‘‘आप इससे पहले भी अमेरिका जा चुके हैं।‘‘
 ‘‘जी, पाँच बार।‘‘
 ‘‘अन्य देशों की यात्रा भी कर चुकी हैं?‘‘
 ‘‘जी।‘‘
 ‘‘बैठिए, आपको दुबारा बुलाती हूँ इंटरव्यू के लिए।‘‘
 ‘‘जी।‘‘ वे दोनों फाइलों के साथ दुबारा अपनी जगह आकर बैठ गये।
 ‘‘आपका ग्रीन कार्ड के लिए इंटरव्यू है।‘‘
 ‘‘हाँ।‘‘
 ‘‘शपथ दिलवायेंगे, हो ही जायेगा, समझो।‘‘ साथ बैठा आदमी बता रहा था।
 ‘‘जी।‘‘
 ‘‘अरे जी, ग्रीन कार्ड के लिए लोग पागल रहते हैं। लाखो रुपये लोग खर्च करते हैं। आप तो भाग्यशाली हैं।‘‘
 ‘‘जी...।‘‘
 वे खुश-नाखुश, आशा-निराशा, अपने-पराये के बीच झूल रहे थे। स्वयं से ज्यादा सरदार जी की खुशी में उन्हें रतिभर दिलचस्पी नहीं थी।
 यही मौका था चुनने का। निर्णय लेने का! वहाँ का स्थाई निवासी क्यों होना? अपना देश, अपना शहर, अपना गाँव, अपना घर-मकान और रिश्तेदार स्मृतियों का हिस्सा क्यों बनें। तन-मन-धन सबको दांव पर लगाते हुए भागते रहना! न ये घर छोड़ सकते हैं ना बच्चों को। बच्चों को अपनी यात्रा वैसे ही करनी चाहिए जैसे मैंने की थी। अकेले! अपने दम पर!
 ‘‘उठो।‘‘ उन्होंने पत्नी से कहा।
 ‘‘क्या हुआ?‘‘
 ‘‘चलो! हमे नहीं देना है इंटरव्यू।‘‘
 ‘‘क्यों नहीं देना! पागल हो गये हो क्या?‘‘
 ‘‘नहीं देना है।‘‘
 ‘‘बच्चे नाराज हो जायेंगे।‘‘
 ‘‘हमें नहीं चाहिए ग्रीन कार्ड।‘‘
 ‘‘क्यों...। क्यों नहीं चाहिए।‘‘ महिनों की भागदौड़ और पैसा बेकार चला जायेगा। एकाएक क्यों पलट रहे हो।‘‘
 ‘‘क्योंकि हमने खून-पसीना से जो कमाया था और जितना कुछ बचा है उसे हम अपने ही देश में, अपने गाँव में खर्च करेंगे।‘‘
 ‘‘जानते हो सब कुछ कैंसिल हो जायेगा। पता नहीं कभी जाने का मौका मिलेगा भी या नहीं।‘‘
 ‘‘दस साल का वीजा मिला था ना। हमें ग्रीन कार्ड नहीं चाहिए।‘‘ ‘‘बच्चे! पैसा? वापस लौटना!‘‘ पत्नी स्तब्ध सी खड़ी थी।



 ‘‘बच्चों को मिलना होगा तो वे अपने आप आयेंगे। अन्यथा उनका शहर और देश वैसे ही छूटता जायेगा जैसे हमसे हमारा गाँव छूटता गया था। अगर हम यहाँ रहेंगे तो वे हमारी खातिर आते रहेंगे। उनका यहाँ आना जरूरी है। हम तो चाहते हैं कि वे नौकरी पूरी करके अपने देश वापस आ जाये।‘‘
 वे उठे और पत्नी का हाथ पकड़कर बाहर निकल आये। पत्नी को लग रहा था कि पति को किसी ने बहका दिया है। या वे डर गये हैं। उन्हें यह सोचकर ही घबराहट हो रही थी कि वे बच्चों से दूर हो जायेंगी! बच्चे उन दोनों से नाराज हो जायेंगे। माता-पिता को साथ में रखने का सपना टूट जायेगा। उन्हें हमारी जरूरत है।जबकि इन सबसे अलग उन्हें यानी विनोद को लग रहा था वे अपने गाँव और अपने लोगों के पास (भले ही वर्षों बाद) लौट रहे हैं।









उर्मिला शिरीष 


जन्म तिथि - 19 अप्रैल 1959
शिक्षा - एम.ए., पी.एच.डी., डी.लिट्

प्रकाशित लेखन - कहानी संग्रह-मै उन्हें नहीं जानती, नानी की डायरी, दस प्रतिनिधि कहानियाँ, ऐ देश बता तुझे हुआ क्या है, नाचगान, उर्मिला शिरीष की लोकप्रिय कहानियाँ, बिवाईयाँ तथा अन्य कहानियाँ, दीवार के पीछे, मेरी प्रिय कथाएँ, ग्यारह लम्बी कहानियाँ, कुर्की और अन्य कहानियाँ, लकीर तथा अन्य कहानियाँ, पुनरागमन, निर्वासन, रंगमंच, शहर में अकेली लड़की, सहमा हुआ कल, केंचुली, मुआवजा, वे कौन थे।
उपन्यास - खैरियत है हुजूर, चाँद गवाह, कोई एक सपना।
जीवनी - बयावाँ में बहार (गोविन्द मिश्र की जीवनी)।
साक्षात्कार - शब्दों की यात्रा के साथ (साहित्यकारों के साक्षात्कार)।
आलोचना - रचना के आस-पास।
संपादित कहानी संकलन- खुशबू, धूप की स्याही, जीवन-मृत्यु । (अस्पताल जीवन की कहानियाँ) छाया- प्रति छाया, पिता और सिर्फ पिता।

संपादित पुस्तकें -
   01. बबूलमेज: (शशांक की सृजनशीलता पर केन्द्रित) अमन प्रकाशन, कानपुर, वर्ष 2022
   02. चित्रा मुदगलः सृजन के विविध आयाम (खण्ड दो) अमन प्रकाशन, कानपुर, वर्ष 2019
   03. प्रभाकर श्रोत्रिय: आलोचना की तीसरी परम्परा, नेशनल पब्लिशिंग हाऊस, नई दिल्ली, वर्ष 2006
   04. हिन्दी भाषा एवं समसामयिकी, मध्य प्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी भोपाल, वर्ष 2002
   05. सृजनयात्राः गोविंद मिश्र, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, भोपाल, वर्ष 2001

पुरस्कार/सम्मान- मध्यप्रदेश शासन संस्कृति विभाग का राज्य शिखर सम्मान, अखिल भारतीय मुक्तिबोध पुरस्कार, वागीश्वरी पुरस्कार, कमलेश्वर कथा सम्मान, कृष्ण प्रताप कथा सम्मान, विजय वर्मा कथा सम्मान, निर्मल पुरस्कार, भारत सरकार की सीनियर फैलोशिप, धर्मपाल फैलोशिप, कुसुमांजलि फाउण्डेशन फैलोशिप।

अनुवाद - कई कहानियों तथा उपन्यासों का भारतीय भाषाओं- अंग्रेजी, उर्दू, बांग्ला, सिंधी, मैथिली, मलयालम, कन्नड़, ओड़िया, आदि भाषाओं में अनुवाद।
अन्य - कई कहानियों का नाट्यमंचन, दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म, आकाशवाणी से कहानियों का प्रसारणभारत के कई विश्वविद्यालयों में ‘उर्मिला शिरीष के कथा साहित्य‘ पर पी.एच.डी. एवं एम.फिल. की उपाधि तथा अनेक शोधार्थी शोध कार्यरत।

सम्प्रति - स्पंदन संस्था भोपाल की अध्यक्ष एवं संयोजक।
    केन्द्रीय साहित्य अकादमी नई दिल्ली की जनरल कांउसिल की मेम्बर।

    प्राध्यापक, उच्च शिक्षा, मध्यप्रदेश शासन, के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृति के पश्चात् स्वतंत्र लेखन।

पता - उर्मिला शिरीष
    503, आर्चिड, रूचिलाईफ स्केप, जाटखेड़ी
    होशंगाबाद रोड़ भोपाल, म.प्र. (भारत)
    पिन कोड-462047
मो.नं. - 9303132118
ईमेल-आईडी - urmilashirish@hotmail-com





Comments

  1. अरुण होता14 March 2026 at 08:52

    कथा-सृजन में निरंतरता उर्मिला शिरीष की कथा-यात्रा की सबसे बड़ी खूबी है। अपने इस वैशिष्ट्य के
    कारण अब तक उनके बीस कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनके तीन उपन्यासों में से ‘चाँद गवाह’ को
    विशेष प्रसिद्धि मिली। बहरहाल, उर्मिला की ‘हरा पत्ता’ कहानी के आधार पर एक संक्षिप्त चर्चा समीचीन
    प्रतीत होती है। हरा पत्ता विभिन्न संदर्भों में महत्वपूर्ण अर्थ का संकेतक है। धार्मिक अर्थ में यह जीवनी
    शक्ति, स्वास्थ्य और सौंदर्य का प्रतीक है तो सांस्कृतिक अर्थ में नवीनीकरण, समृद्धि, शांति आदि के
    अर्थ में प्रयुक्त होता है। कहानी का सरसरी पाठ कोई करे तो हरा पत्ता को ‘ग्रीन कार्ड’ भी समझ सकता
    है। इसलिए, सबसे पहले शीर्षक ‘हरा पत्ता’ पाठक को लुभाता है और कहानी पाठ करने के लिए उत्सुकता
    उत्पन्न करता है। इस कहानी का ‘काल’ महज़ कुछ घंटों की है। भारत में अमेरिकी एंबसी में बिताए गए
    कुछ घंटों की अवधि है। लेकिन स्मृतियों में तीन पीढ़ियों और दो महादेशों की कथा कही गई है। यानी
    कहानी का बड़ा वितान है। वृद्ध माता-पिता अपनी संतान से मिलने अमेरिकन एंबसी में वीज़ा के लिए
    आए हुए हैं। उनका ‘ग्रीन कार्ड स्वीकृत हो चुका है। वहाँ तमाम भाषा-भाषी लोग भी इंटर्व्यू के लिए आए
    हुए हैं। अमेरिका के जादुई आकर्षण से खींचे चले आए हैं। खेत-खलिहान बेचकर अपने बेटों को अमेरिका
    में शिक्षा के लिए भेजे जाते हैं तो वे वहाँ सेटल हो जाते हैं। वहीं नौकरी ले लेते हैं। अमेरिकी रंग से अपने
    को रंग लेते हैं और उसकी जीवन शैली अपना लेते हैं। एक बेटी की मां अपनी बेटी के साथ पति से
    अमेरिका मिलने जाती है तो पति से उसे धोखा मिलता है। अपनी संतान से मिलने बुजुर्ग माता-पिता जाते
    हैं। बेटों के लिए समय नहीं कि वे आकर पिता-माता से मिलें। दरअसल, भारतीय और अमेरिकी
    जीवनमूल्यों के टकराव की कहानी है ‘हरा पत्ता’। कहानी का चरमोत्कर्ष संवेदनशील पाठक को चमत्कृत
    करता है जब पिता विनोद ग्रीन कार्ड, वीज़ा लेने से इनकार कर देते हैं। अपना देश और अपनी माटी से
    प्रेम की जीत होती है। प्रसंगतया भारत की बेरोज़गारी, सरकारी गलत नीतियों का सामान्य उल्लेख भी
    मिल जाता है। संक्षेप में, ‘हरा पत्ता’ एक बहुत अच्छी कहानी है।

    - अरुण होता

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