अरुण आदित्य की कविताएं
अरुण आदित्य
समकालीन कविता में जिन कवियों की पहचान उनकी भाषा और अर्जित मुहावरों से होती है उनमें अरुण आदित्य भी हैं। उनकी कविताएं जीवन के उन छोटे-छोटे अनुभवों,वस्तुओं और दृश्यों से निर्मित हैं जिनके बिना जीवन असंभव सा है।
डर
किसी उदास दोपहर में बिल्कुल बुझे मन के साथ हम
बोर हो रहे होते हैं थोक में आए ग्रीटिंग कार्ड्स को देखकर
कि अचानक हमारे हाथ में आता है एक ऐसा कार्ड
जिसे देखने के बाद हम ठीक वही नहीं रह पाते
जो इसे देखने से पहले थे
कितना अद्भुत है यह कार्ड
कि एक अच्छे ब्लॉटिंग पेपर की तरह
सोख लेता है सारी ऊब और उदासी
इसमें छपे फूलों की खुशबू
कार्ड से बाहर निकल तैरने लगती है हवा में
शिशिर ऋतु में अचानक आ जाता है बसंत
हम भूल जाते हैं सारी चिड़चिड़ाहट
आ जाती है इतनी उदारता
की अपनी गलती न होने के बावजूद
माफ़ी मांग लेते हैं
कुछ देर पहले झगड़ चुके सहकर्मी से
इतना विशाल हो जाता है हृदय
कि वाकई क्षुद्र लगने लगती हैं अपनी क्षुद्रताएँ
इतना कुछ बदल जाता है अचानक
कि ग्रीटिंग कार्ड भेजने की औपचारिकता के खिलाफ
सदा रहा आया मैं
सोचने लगता हूँ
कि दुनिया के हर आदमी को
मिलना ही चाहिए एक ऐसा कार्ड
सोचता हूँ
और अपने इस सोच पर डर जाता हूँ
कि कार्ड बनाने वाली कोई कंपनी
मेरी कविता की इन पंक्तियों को
अपने विज्ञापन का स्लोगन न बना ले
और बाद में मैं सफाई देता फिरूँ
कि कार्ड बेचने वाले की नहीं
भेजने वाले की ख़ुसूसियत बयान करना चाहता था मैं।
कालीन
गर्व की तरह होता है इसका बिछा होना
छुप जाती है बहुत सारी गंदगी इसके नीचे
आने वाले को दिखती है
सिर्फ आपकी संपन्नता और सुरुचि
इस तरह बहुत कुछ दिखाने
और उससे ज्यादा छिपाने के काम आता है क़ालीन
आम राय है कि क़ालीन बनता है ऊन से
पर जहीर अंसारी कहते हैं,
ऊन से नहीं जनाब, खून से
ऊन दिखता है
चर्चा होती है, उसके रंग की
बुनाई के ढंग की
पर उपेक्षित रह जाता है ख़ून
बूँद-बूँद टपकता
अपना रंग खोता, काला होता चुपचाप
आपकी सुरुचि और संपन्नता के बीच
इस तरह खून का आ टपकना
आपको अच्छा तो नहीं लगेगा
पर क्या करूँ, सचमुच वह खून ही था
जो कबीर, अबीर, भल्लू और मल्लू की अँगुलियो से
टपका था बार-बार
इस खूबसूरत क़ालीन को बुनते हुए
पश्चापात के ताप में इस तरह क्यों झुलसने लगे जनाब?
आप अकेले नहीं हैं
सुरुचि संपन्नता के इस खेल में
साक्षरता अभियान के मुखिया के घर में भी
दीवार पर टंगा है एक ख़ूबसूरत क़ालीन
जिसमें लूम के सामने खड़ा है एक बच्चा
और तस्वीर के ऊपर लिखा है...
मुझे पढ़ने दो, मुझे बढ़ने दो
वैष्णव कवि और क्रांति-कामी आलोचक के
घरों में भी बिछे हैं खूबसूरत क़ालीन
जिनसे झलकता है उनका सौंदर्य बोध
कवि को मोहित करते हैं
क़ालीन में कढ़े हुए फूल पत्ते
जिनमें तलाशता है वह वानस्पतिक गंध
और मानुष गंध की तलाश करता हुआ आलोचक
उतरता है कुछ और गहरे
और उछालता है एक वक्तव्यनुमा सवाल -
जिस समय बुना जा रहा था यह कालीन
घायल हाथ, कुछ सपने भी बुन रहे थे साथ-साथ
कालीन तो बन-बुन गया
पर सपने जहाँ के तहाँ हैं
ऊन-खून और खंडित सपनों के बीच
हम कहां हैं?
आलोचक खुश होता है
कि उत्तर से दक्षिण तक
दक्षिण से वाम तक
वाम से अवाम तक
गू़ँज रहा है उसका सवाल
अब तो नहीं होना चाहिए
कबीर, अबीर, भल्लू और मल्लू को कोई मलाल।
डायरी
पंक्ति-दर-पंक्ति तुम मुझे लिखते हो
पर जिन्हें नहीं लिखते, उन पंक्तियों में
तुम्हें लिखती हूँ मैं
रोज-रोज देखती हूँ कि लिखते-लिखते
कहाँ ठिठक गई तुम्हारी कलम
कौन-सा वाक्य लिखा और फिर काट दिया
किस शब्द पर फेरी इस तरह स्याही
कि बहुत चाह कर भी कोई पढ़ न सके उसे
और किस वाक्य को काटा इस तरह
कि काट दी गई इबारत ही पढ़ी जाए सबसे पहले
रोज तुम्हें लिखते और काटते देखते हुए
एक दिन चकित हो जाती हूँ
कि लिखने और काटने की कला में
किस तरह माहिर होते जा रहे हो तुम
कि अब तुम कागज से पहले
मन में ही लिखते और काट लेते हो
मुझे देते हो सिर्फ संपादित पंक्तियां
सधी हुई और चुस्त
इन सधी हुई और चुस्त पंक्तियों में
तुम्हें ढूंढ़ते हैं लोग
पर तुम खुद कहाँ ढूँढ़ोगे खुद को
कि तुमसे बेहतर जान सकता है कौन
कि जो तस्वीर तुम कागज पर बनाते हो
खुद को उसके कितना करीब पाते हो?
झोपड़ी के हिस्से में किस्से
पता नहीं झोपड़ी का दर्द जानने की आकांक्षा थी
या महज एक शगल
कि झोपड़ी में एक रात गुजारने को आ गया महल
झोपड़ी फूली नहीं समा रही
उमंग से भर गया है जंग लगा हैंडपंप
प्यार से रंभा रही है मरियल गाय
कदम चूम कर धन्य है उखड़ा हुआ खड़ंजा
अपनी किस्मत पर इतरा रही है टुटही थाली
गर्व से तन गई है झिलँगा खटिया
अभिमान से फूल गई है कथरी
अति उत्साह में कुछ ज्यादा ही तेल पी रही है ढिबरी
आग से ठिठोली कर रहा है चूल्हा
उम्मीद से नाचने लगी है चक्की
ऐसे खुशगवार माहौल में पुलकित महल ने
हुलसित झोपड़ी से पूछा, बताओ तुम्हें कोई दुख तो नहीं
झोपड़ी को लगा कि उसके दुख से बड़ा है आज का यह सुख
और उसने यह भी सुना था कि महल के आने से
अपने आप ही दूर हो जाते हैं सब दुख
महल ने फिर पूछा
फिर-फिर पूछा, इस राज में कोई तकलीफ तो नहीं तुम्हें
वह कहना चाहती थी कि कई दिनों से ठंडा पड़ा है चूल्हा
पर चूल्हे की उमंग देख उसे लगा कि ऐसा कहना
रंग में भंग करने जैसा अपराध होगा
सवाल पूछते-पूछते थक गया महल
थके हुए महल को गर्व से तनी खटिया
और मान से फूली कथरी पर मिला चेंज
और रोज से ज्यादा आई नींद
इधर झोपड़ी जागती रही रात भर
कि उसके सोने से कहीं सो न जाए उम्मीद
सुबह महल झोपड़ी से निकला
और सबके देखते ही देखते खबर बन गया
झोपड़ी के हिस्से में अब सिर्फ किस्से हैं
जिन्हें वह आने-जाने वालों को रोक-रोककर सुनाती है
कि किस तरह महल ने यहां गुजारी थी एक रात।
झूठ
झूठ एक पहाड़ है
जिसे हम ही बनाते हैं
और अपनी कनिष्ठिका पर उठाए रखते हैं
यह सोचकर आत्ममुग्ध होते हुए
कि हमारे ही कारण बचा हुआ है गोकुल
अपनी उपलब्धियों, सफलताओं
इच्छाओं, कुंठाओं, मुगालतों और दंभ के
इस पहाड़ की चोटी पर बैठे हुए हम
नीचे देखते हैं तो हर आदमी
बौना नजर आता है
आपको आश्चर्यजनक लग सकता है
कि एक आदमी
जिस पहाड़ की चोटी पर बैठा हुआ है
उसे ही अपनी कनिष्ठिका पर कैसे उठाए हुए है वह
पर जिसके पास झूठ का पहाड़ है
उसके लिए यह बहुत छोटा-सा जुगाड़ है।
आँखें
इनमें जो सपने हैं
वे पानी से बने हैं
इनमें जो पानी है
उसकी भी अजब कहानी है
यूँ तो एक आँख में तैरती दिखती है सिर्फ एक बूँद
पर थाह नहीं मिलती कि इस बूँद में हैं कितने समुद्र
कि एक बूँद टपकती है तो उसकी जगह
झिलमिलाने लगती है दूसरी
दूसरी टपकी नहीं कि तीसरी
और फिर टपाटप चौथी, पाँचवीं...
पहली बार जब किसी आँख में
कोई सपना डबडबाया होगा
तब से अब तक
इतना पानी बहा चुकी हैं ये
कि वह सब एक साथ बहता
तो कई-कई बार बह जाती दुनिया
धार-धार बरस रही हैं वे
पर नहीं उठ रही कहीं कोई लहर
कि नीचे लगा है बॉटलिंग प्लांट
जहाँ भरी जा रही हैं बोतलें लगातार
टूट रही है सपने की साँस
पर टूट नहीं रही है जलधार
ज़रा और तेज रो धरती मां
कि इतने से नहीं बुझ रही बाजार की प्यास।
लोटे
देवताओं को जल चढ़ाने के काम आते रहे कुछ
कुछ ने वुज़ू कराने में ढूँढ़ी अपनी सार्थकता
प्यासे होठों का स्पर्श पाकर ही खुश रहे कुछ
कुछ को मनुष्यों ने नहाने या नित्यकर्म का पात्र बना लिया
बहुत समय तक अपनी अपनी भूमिका में सुपात्र बने रहे सब
पर आजकल बदल गई हैं इनकी भूमिकाएँ
जल चढ़ाने और वुज़ू कराने वाले लोटे
अब अकसर लड़ते-झगड़ते हैं
और बाद में शांति अपीलें जारी करते हैं
काफी सुखी हैं ये लोटे
पर सबसे ज़्यादा सुखी हैं वे
जो बिना पेंदी के हैं
परेशान और दुखी हैं वे
जो किसी की प्यास बुझाना चाहते हैं
आजकल पात्रों की सूची से
गायब होता जा रहा है उनका नाम
जग-मग के इस दौर में लोटों का क्या काम?
राष्ट्रीय लुढ़कन के इस दौर में
जब गेंद की तरह इस पाले से उस पाले में
लुढ़क रही हैं अंतरात्माएँ
कितना आसान है वोटों का लोटों में तब्दील हो जाना
ये जो आसानी है
कितनी बड़ी परेशानी है।
यह भी कोई बात हुई
यह भी कोई बात हुई
कि तुमने कहा रोटी
और रोटी सेंकने में जुट गया समूचा तंत्र
कहा पानी
और झमाझम बरस पड़े बादल
कहा खुशबू
तो हवा दौड़ी चली आई
फूलों के गाल सहलाते हुए
कहा प्रेम
तो प्रेयसी प्रकट हो गई समक्ष
कहा फासिज्म
तो अट्टहास कर उठा फासिस्ट
यह भी कोई बात हुई
कि तुमने लिखा खून को खून
और लोग किसी की कमीज पर
ढूँढ़ने लगे उसके दाग।
एक फूल का आत्मवृत्त
अपने बारे में बात करना बिलकुल अच्छा नहीं लगता
पर लोगों की राय है कि मैं एक विशिष्ट फूल हूँ
85 प्रतिशत मधुमक्खियों का मानना है
कि सबसे अलहदा है मेरी खुशबू
और 87 प्रतिशत भौंरों की राय है
कि औरों से अलग है मेरा रंग
टहनी से तोड़ लिए जाने के बाद भी
बहुत देर तक बना रह सकता हूँ तरोताजा
किसी भी रंग के फूल के साथ
किसी भी गुलदस्ते की शोभा में
लगा सकता हूं चार चाँद
मुझे चढ़ाने से प्रसन्न हो जाते हैं देवता
और मेरी माला पहनते ही वशीभूत हो जाते हैं नेता
मेरी एक छोटी सी कली
खोल देती है प्रेम की सँकरी गली
यहां तक आते-आते लडखड़़ा गई है मेरी जुबान
जानता हूं कि बोल गया हूँ जरूरत से कुछ ज्यादा
पर क्या करूँ यह ऐसी ही भाषा का समय है
कि ऐसे ही बोलकर बड़े-बड़े बोल
महँगे दामों पर बिक गए मेरे बहुत से दोस्त
पर जबान ने लडखड़़ाकर बिगाड़ दिया मेरा काम
ऐसे वक्त पर जो लडखड़़ा जाती है यह जुबान
दुनिया की दुकान में क्या इसका भी कोई मूल्य है श्रीमान?
पगडंडी
दूर-दूर तक फैले हुए घास के हरे-भरे मैदान के बीच
चाँदी के तार जैसी चमकती यह लकीर
अनंत पदचापों और पदाघातों का अनुभव
समेटे हुए है अपनी स्मृति में
शौर्य के घोड़े पर सवार योद्धा हों
या सफलता के आकांक्षी कर्मवीर
नई राहों के अन्वेषी जीनियस हों
या शॉर्टकट से मंजिल पाने के अभिलाषी मीडियॉकर
एक-एक की पदचाप को पहचानती यह लकीर
जानती है रौंदी हुई घास के एक-एक तिनके की पीर
एक-एक पदचाप से
राहगीर की सफलता-विफलता को
भांप लेने वाली यह रजत रेखा
क्या कभी विचलित भी होती है इस सवाल से
कि क्या कसूर था घास का
सिवाय इसके कि वह
किसी की महत्वाकांक्षा, सहूलियत
या दंभ के रास्ते में थी
पर घास तो पहले से थी
उसे रौंदकर रास्ता बनाने वाले
बहुत बाद में आए
फिर इनके आने की सजा
घास क्यों पाए?
चाँदनी रात में लांग ड्राइव
तुम्हारे साथ लांग ड्राइव पर न जाता
तो पता ही न चलता
कि तुम कितने प्यारे दोस्त हो चाँद भाऊ
गजब का है तुम्हारा सहकार
कि जिस गति से चलती है मेरी कार
उसी के मुताबिक घटती बढ़ती है तुम्हारी रफ़्तार
एक्सीलरेटर पर थके पैर ने जब भी सोचा
कि रुक कर ले लूँ थोड़ा दम
तुमने भी तुरंत रोक लिए अपने कदम
गति अवरोधक पर
या सड़क के किसी गड्ढे में
जब भी लगा मुझे झटका
तुम्हें भी हिचकोले खाते देखा मैंने
नहीं, ये छोटी-मोटी बातें नहीं हैं चाँद भाऊ
तुम्हें क्या पता कि हमारी दुनिया में
हमेशा इस फ़िराक में रहते हैं दोस्त
कि कब आपके पाँव थकें
और वे आपको पछाड़ सकें
आपदा-विपदा तक को
अवसर में बदलने को छटपटाते लोग
ताड़ते रहते हैं कि कब आप खाएँ झटके
और वे आपकी तमाम संभावनाएँ लपकें
इसीलिए मैं अक्सर इस दुनिया को ठेंगा दिखा
तुम्हारे साथ निकल जाता हूं लांग ड्राइव पर
लेकिन आजकल पेट्रोल बहुत महँगा है चाँद भाऊ
और लांग ड्राइव एक सपना
क्या ऐसा नहीं हो सकता
कि किसी दिन मेरी कार को अपनी किरणों से बांधकर
झूले की तरह झुलाते हुए लांग ड्राइव पर पर ले चलो
और झूलते-झूलते, झूलते-झूलते
किसी बच्चे की तरह थोड़ी देर सो जाऊँ मैं।
अरुण आदित्य
प्रकाशित कृतियाँ :
रोज ही होता था यह सब ( कविता संग्रह )
धरा का स्वप्न हरा है ( कविता संग्रह )
उत्तर वनवास ( उपन्यास )
पुरस्कार-सम्मान:
-दुष्यन्त पुरस्कार ( मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी)
-अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान
-बेकल उत्साही सम्मान
-आयाम सम्मान
असद जैदी द्वारा संपादित 'दस बरस', कर्मेंदु शिशिर द्वारा संपादित 'समय की आवाज़' और संजय कुंदन द्वारा संपादित 'गहन है यह अंधकारा' में कविताएँ संकलित.
कुछ कविताएँ पंजाबी, मराठी, गुजराती, तेलुगु, असमिया और अंग्रेज़ी में अनूदित.
संपर्क:
202, ज्ञानखंड-1, फ्लैट-एफ2,
इंदिरापुरम, गाजियाबाद ( उप्र )
पिन-201014
adityarun@gmail.com
सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।











धन्यवाद, प्रिय कवि अरुण आदित्य से विश्व कविता दिवस पर मिलाने के लिए।
ReplyDeleteअरुण आदित्य की यह कविता “कालीन” समकालीन कविता की उस धारा का सशक्त उदाहरण है, जहाँ सौंदर्य के भीतर छिपे हुए यथार्थ को बेनकाब किया जाता है। यह कविता केवल एक वस्तु—कालीन—का वर्णन नहीं करती, बल्कि उसके बहाने पूरे सामाजिक-सांस्कृतिक ढाँचे की परतें खोल देती है।
ReplyDelete🔶 1. विषय-वस्तु और केंद्रीय संवेदना
कविता का मूल कथ्य है—संपन्नता और सुरुचि के पीछे छिपा हुआ श्रम, शोषण और रक्त।
कालीन यहाँ एक प्रतीक है—
बाहरी सौंदर्य, वैभव और प्रतिष्ठा का
और उसके नीचे दबे हुए श्रमिकों के दर्द का
“गर्व की तरह होता है इसका बिछा होना”—यह पंक्ति ही कविता की दिशा तय कर देती है। कालीन केवल सजावट नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन है। पर उसी के नीचे “बहुत सारी गंदगी” छिपी है—यह गंदगी केवल भौतिक नहीं, नैतिक भी है।
🔶 2. प्रतीक और रूपक का प्रयोग
अरुण आदित्य की शक्ति उनके प्रतीकों में है—
कालीन → संपन्नता का मुखौटा
ऊन → दिखने वाला श्रम
खून → अदृश्य शोषण
“ऊन से नहीं जनाब, खून से”—यह पंक्ति पूरी कविता का टर्निंग पॉइंट है। यहाँ कवि ने एक झटके में यथार्थ का अनावरण कर दिया है।
कबीर, अबीर, भल्लू और मल्लू—ये केवल नाम नहीं, बल्कि हाशिये पर खड़े अनगिनत श्रमिकों का प्रतिनिधित्व हैं।
🔶 3. यथार्थ और विडंबना
कविता का सबसे तीखा पक्ष उसकी विडंबना है—
“साक्षरता अभियान के मुखिया” के घर में वही कालीन
दीवार पर लिखा—“मुझे पढ़ने दो, मुझे बढ़ने दो”
यहाँ कवि व्यवस्था की पाखंडपूर्ण नैतिकता पर करारा व्यंग्य करता है।
जो लोग शिक्षा, क्रांति, संवेदना की बात करते हैं, वे भी उसी शोषण-चक्र का हिस्सा हैं।
🔶 4. भाषा और शिल्प
अरुण आदित्य की भाषा अत्यंत सरल, बोलचाल की और संवादधर्मी है।
“जनाब” जैसे संबोधन कविता को आत्मीय भी बनाते हैं और व्यंग्यात्मक भी
कोई जटिल अलंकार नहीं, बल्कि सीधे-सीधे चोट करने वाली अभिव्यक्ति
कविता का शिल्प क्रमशः खुलता है—
वस्तु का वर्णन
उसके भीतर छिपे यथार्थ का उद्घाटन
सामाजिक विस्तार
और अंत में एक प्रश्न
यह संरचना पाठक को धीरे-धीरे भीतर खींचती है।
🔶 5. आलोचना पर भी आलोचना
कविता का एक रोचक पक्ष यह है कि वह केवल समाज नहीं, बल्कि आलोचक और कवि को भी नहीं छोड़ती—
कवि फूल-पत्तों में “वानस्पतिक गंध” खोजता है
आलोचक “मानुष गंध” की तलाश में प्रश्न उछालता है
यहाँ कवि यह संकेत देता है कि बौद्धिक विमर्श भी कभी-कभी वास्तविक पीड़ा से दूर एक ‘वक्तव्य’ बनकर रह जाता है।
🔶 6. अंतिम प्रश्न की शक्ति
“ऊन-खून और खंडित सपनों के बीच / हम कहाँ हैं?”
यही कविता का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है।
यह प्रश्न केवल व्यवस्था से नहीं, पाठक से भी है।
हम उपभोक्ता हैं?
सहभोगी हैं?
या मौन दर्शक?
यह प्रश्न कविता को सक्रिय नैतिक हस्तक्षेप बना देता है।
🔶 7. समकालीन संदर्भ में महत्व
यह कविता आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है—
बाल श्रम
असंगठित मजदूरों का शोषण
उपभोक्तावादी संस्कृति
कविता हमें याद दिलाती है कि हर सुंदर वस्तु के पीछे एक अदृश्य कहानी होती है—जो अक्सर दर्द से भरी होती है।
🔶 समापन
अरुण आदित्य की यह कविता सौंदर्य और शोषण के द्वंद्व को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है।
यह कविता न तो केवल भावुक है, न केवल वैचारिक—यह दोनों के बीच एक संतुलित, तीखी और ईमानदार अभिव्यक्ति है।
यह कविता पढ़ने के बाद कालीन केवल कालीन नहीं रह जाता—
वह एक प्रश्न बन जाता है,
और वह प्रश्न देर तक हमारे भीतर गूंजता रहता है।
बहुत सुन्दर कविताएं, कालीन कविता में ऐर्श्वरय और शानो शौकत की दुनिया के पीछे छुपे दर्द और सच को वैसे ही समझाया गया है जैसे कालीन के नीचे छुपती है धूल, मिट्टी और गंदगी!
ReplyDeleteलोटे "कविता में मनुष्य की दुर्बल और अवसरवादी वृत्ति पर गहरी अभिव्यंजना
के कटाक्ष हैं,!
झोपडी के किस्से,आंखे और डर जैसी कविताओं में भी कवि ने सामाजिक विषमताओं के चित्रणात्मक अभिव्यक्ति के साथ प्रस्तुति की है!
यूँ भी अरुण भाई की कविताएं अपने बनाव में अलग असर के साथ आती हैं जिनमें रैटारिक की वृत्ति नहीं होती बल्कि वे अपने विषयों और प्रयोगो में
अनूठे विन्यास रचते हैं !
कौशिकी के चुनाव व संचयन को बधाइयां, अरुण भाई को भी बहुत बधाइयां 🌷🌷🌷🌷
धन्यवाद राजेश जी।
Deleteअरुण आदित्य की कविताएँ अच्छी लगीं—भावप्रवण एवं विचारसंपन्न।
ReplyDeleteधन्यवाद अग्रज कवि। आपकी टिप्पणी मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
Deleteइन कविताओं के लिए बहुत बहुत बधाई।
ReplyDeleteबहुत सुंदर कविताएं।
ReplyDeleteबेहतरीन।
ReplyDeleteबहुत अच्छी कविताएँ।
ReplyDeleteबहुत बधाई
ReplyDeleteकविताओं में मार्मिकता भी है और समुचित कटाक्ष भी।
अच्छी कविताएं हैं 👌
ReplyDelete