अनिल गंगल की कविताएं
अनिल गंगल
अनिल गंगल की कविताओं में हमारे समय का यथार्थ बहुत ठोस और खुरदरे रूप में दर्ज है।इन कविताओं में जीवन के अनेक रंग हैं लेकिन केंद्र में मनुष्य और उसकी संवेदना को कुरेद कर रख देने वाली वह बेचैनी है जो कसीदे लिखने से इनकार करती है। प्रतिरोध की ये ऐसी कविताएं हैं जहां फुसफुसाना चीख से ज्यादा कारगर है।
अनिल गंगल की कविताएं
क़सीदे
क़सीदे लिखने वाले लोग
अक्सर सच से थोड़ी दूरी पर बैठते हैं-
इतनी दूरी पर
जहाँ से चेहरा साफ़ दिखे
पर झुर्रियाँ नहीं।
वे शब्दों को इत्र की तरह छिड़कते हैं
और इतिहास को एक चमकदार आईने की तरह
दीवार पर टाँग देते हैं
जिसमें हर चेहरा थोड़ा अधिक सुंदर दिखाई देता है।
क़सीदे में राजा हमेशा उदार होता है
हाकिम हमेशा न्यायप्रिय
और विजेता हमेशा धर्मात्मा-
भले ही गाँव के कुएँ में
अब भी तलवार की जंग उतर रही हो।
क़सीदे लिखने वाले जानते हैं
कि वे सच को रेशमी कपड़े में लपेट रहे हैं
लेकिन रेशम की सरसराहट
सिक्कों की खनक से कम मोहक नहीं होती।
और धीरे-धीरे
क़सीदे इतने ऊँचे स्वर में गाए जाते हैं
कि सच्चाई किसी अँधेरे कमरे में बैठी
अपनी बारी का इंतज़ार करती रह जाती है।
मगर इतिहास की एक आदत है-
वह देर से बोलता है
पर जब बोलता है तो क़सीदों की स्याही
सबसे पहले फीकी पड़ती है।
स्वप्नदृश्य
नींद के भीतर एक दरवाज़ा खुलता है-
पर वहाँ कोई कमरा नहीं होता
केवल रंग होते हैं
जो किसी चित्रकार की स्मृति से छूट कर
हवा में तैर रहे होते हैं।
कभी एक नीला वृत्त धीरे-धीरे फैेलता है
और उसमें डूब जाती है समय की आवाज़
कभी एक सीढ़ी आकाश से उतरती है
पर उसका अंतिम पायदान
किसी भूमि को नहीं छूता।
चेहरों की जगह धुंध है
नामों की जगह कुछ अधूरे शब्द-
जैसे भाषा स्वयं अपने अर्थ भूल गई हो।
मैं चलता हूँ
पर रास्ते मेरे चलने से पहले ही
ग़ायब हो जाते हैं।
और अंत में बस एक कंपन बचता है-
नींद और जागरण के बीच
जहाँ स्वप्न किसी दृश्य की तरह नहीं
बल्कि एक अनकहे अनुभव की तरह
धीरे-धीरे घुल रहा होता है।
क़िस्सागो
वह आदमी
जिसे लोग बस एक बूढ़ा क़िस्सागो समझते थे
दरअसल वक़्त की जेब से गिर पड़े
अनगिनत दिनों का रखवाला था।
उसकी आँखों में
धूल भरे रास्तों की लंबी यात्राएँ थीं
और उसकी आवाज़ में ऐसे शहरों की गूँज
जिन्हें नक़्शों ने कभी याद नहीं रखा।
वह जब बोलता
तो सिर्फ़ कहानी नहीं कहता था-
वह खोए हुए लोगों को फिर से
दुनिया में लौटा देता था
मिट चुके घरों की चैखटों पर
फिर से धूप रख देता था।
उसके क़िस्सों में राजा भी थे, फ़कीर भी,
बाग़ भी थे, वीरानियाँ भी
और हर कहानी के बीच एक अदृश्य पुल होता
जिससे हो कर सुनने वाला अचानक
अपने ही अतीत में पहुँच जाता।
लोग कहते-
‘यह सब तो कल्पना है’
क़िस्सागो मुस्कराता और अपनी झुर्रियों में छिपी
एक और सदी खोल देता
क्योंकि वह जानता था-
दुनिया अक्सर सच को भूल जाती है
और तब कहानियाँ ही उसे धीरे-धीरे याद दिलाती हैं।
रात के आख़िर में जब सब लोग सो जाते
क़िस्सागो अपनी आख़िरी कहानी
हवा के हवाले कर देता-
ताकि कहीं कोई अकेला आदमी उसे सुन कर
थोड़ा कम अकेला हो जाए।
अश्वत्थामा हतो हतः’
कुरुक्षेत्र की धूल अब भी
कभी-कभी हमारे फेफड़ों में भर जाती है
जब कोई आधा-सच धर्म का वस्त्र पहन कर
राजसभा में खड़ा होता है।
कहा गया था-
‘अश्वत्थामा हतो हतः’
और उसके बाद धीमी आवाज़ में जोड़ा गया था-
‘नरो वा कुंजरो वा’
युद्ध उसी क्षण
थोड़ा और पवित्र घोषित कर दिया गया
और झूठ थोड़ा और धार्मिक।
धर्मराज के मुख से निकला वह आधा वाक्य
सदियों से राजनीति के विद्यालयों में पढ़ाया जा रहा है-
कैसे सच को मार कर
उसे धर्म का तिलक लगाया जाता है।
आज भी जब कोई मंत्री या कोई पुरोहित
या कोई समाचार-वाचक कहता है-
‘सत्य यही है...’
तो मुझे सुनाई देता है उस वाक्य का शेष हिस्सा
जो हमेशा धीरे कहा जाता है-
‘नरो वा कुंजरो वा’
द्रोणाचार्य अब भी अपना धनुष छोड़ देते हैं
हर युग में हर बार
जब आधा सच पूरे सत्य की तरह बोला जाता है।
और युद्ध
फिर से शुरू हो जाता है।
धीमी आवाज़ में फुसफुसाने वाले
धीमी आवाज़ में फुसफुसाने वाले लोग
अक्सर सबसे ऊँची सच्चाइयाँ कहते हैं-
इतनी ऊँची
कि उन्हें चिल्ला कर कहना
उनके अर्थ को छोटा कर देता है।
वे भीड़ में नहीं गरजते
न मंचों पर मुट्ठियाँ तानते हैं
वे बस किसी कोने में खड़े हो कर
समय के कान में एक वाक्य रख देते हैं
और फिर सदियाँ उसे दोहराती रहती हैं।
धीमी आवाज़ में फुसफुसाने वाले
कभी-कभी डरपोक समझ लिए जाते हैं
पर वे जानते हैं-
कि शब्द अगर बहुत शोर में बोले जाएँ
तो अपना रास्ता भूल जाते हैं।
इसलिए वे रात की तरह बोलते हैं
धीरे...
जैसे पत्तों के बीच से गुज़रती हवा।
उनकी आवाज़ किसी पत्थर पर नहीं लिखी जाती
पर वह लोगों की नींद में उतर जाती है
और सुबह किसी बेचैनी की तरह जगाती है।
धीमी आवाज़ में फुसफुसाने वाले दरअसल
दुुनिया के सबसे धैर्यवान लोग होते हैं-
वे जानते हैं कि सत्य का बीज शोर में नहीं
मिट्टी की ख़ामोशी में उगता है।
और एक दिन जब इतिहास बोलता है
तो लोग हैरान होते हैं-
कि यह गूँज किसने शुरू की थी...
जबकि कहीं बहुत पहले किसी ने बस
धीमी आवाज़ में फुसफुसाया था।
जल, जंगल और ज़मीन
वे कहते हैं-
यह नदी अब हमारी है
इसके किनारे हमारे नक़्शे में दर्ज़ हैं
इसके पानी पर हमारे काग़ज़ों की मुहर है।
पर नदी हँसती है-
काग़ज़ की मुहर से क्या किसी ने पानी बाँधा है कभी ?
वे कहते हैं-
यह जंगल अब आरक्षित है
यहाँ पेड़ों की गिनती है
यहाँ हवा भी नियमों में बँधी है।
पर जंगल की पत्तियाँ रात भर सरसराकर पूछती हैं-
किस किताब में लिखा है कि हवा
किसी की जागीर होती है ?
वे कहते हैं-
यह ज़मीन विकास के लिए है
यहाँ सड़कें उगेंगी
यहाँ इमारतें आसमान को छुएँगी।
पर ज़मीन चुपचाप याद करती है
नंगे पैरों की वह आहट
जो सदियों से उसकी देह पर चलती आई थी।
वे लोग जिनके पास न नक़्शे थे
न क़ानून की मोटी किताबें-
वे सिर्फ़ इतना जानते थे कि जल पिया जाता है
जंगल से साँस ली जाती है
और ज़मीन पर रोटी उगाई जाती है।
अब वे लोग
धीरे-धीरे हाशिये पर लिखे जा रहे हैं
जैसे इतिहास की किसी पुरानी पंक्ति में
धुंधला पड़ता हुआ शब्द।
और फिर भी कहीं दूर पहाड़ियों में
एक आवाज़ अब भी उठती है-
यह जल हमारा है
यह जंगल हमारा है
यह ज़मीन हमारी है।
क्योंकि जिसने इन्हें बचाया है सदियों से
वही जानता है-
धरती को माँ कहना सिर्फ़ एक मुहावरा नहीं
एक ज़िम्मेदारी है।
अशोक स्तम्भ के शेर
अशोक स्तम्भ के शेर
अब भी चारों दिशाओं में मुँह किए खड़े हैं-
एक पुरानी चेतावनी की तरह।
उनकी आँखों में सदियों की धूप जमा है
और दाँतों के बीच इतिहास की ख़ामोशी पसरी हुई है।
वे दहाड़ते नहीं अब
क्योंकि उन्हें मालूम है-
दहाड़ों से ज़्यादा ख़तरनाक हो चुकी हैं
सभ्यताओं की मुस्कानें।
उनके नीचे खुदे शब्द धूल से ढँकते-उघड़ते रहते हैं
जैसे न्याय कभी दिखाई देता है
कभी सत्ता की उँगलियों से ढँक दिया जाता है।
कभी-कभी लगता है-
वे पत्थर के शेर नहीं
चार दिशाओं में रखे गये चार सवाल हैं-
कि क्या इस देश में धर्म अब भी करुणा है
या केवल झंडों पर लिखा हुआ
एक ऊँचा शब्द ?
कि क्या राज्य अब भी मनुष्यता की रक्षा करता है
या केवल अपने ही नागरिकों से डरता है ?
अशोक स्तम्भ के शेर आज भी चुप हैं
पर उनकी चुप्पी में
एक धीमी दहाड़ पलती रहती है
जो शायद किसी दिन इतिहास की नींद तोड़ कर पूछेगी-
कि जिनके नाम पर यह चिन्ह खड़ा किया गया था
क्या वे सचमुच अब भी इस देश में रहते हैं ?
अन्नप्राशन
जब पहली बार चावल का वह छोटा-सा दाना
बच्चे के होठों को छूता है
तो लगता है मानो पृथ्वी अपनी पूरी हरियाली
एक कौर में समेट कर उसके मुँह में रख रही हो।
माँ की उँगलियों में हल्की-सी थरथराहट होती है
जैसे वह सिर्फ़ अन्न नहीं
पूरी दुनिया की भूख और उसे मिटाने की प्रार्थना
बच्चे को सौंप रही हो।
बच्चा अभी नहीं जानता
कि यह चावल कितने खेतों की धूप है
कितनी बारिशों की स्मृति है
कितने किसानों की झुकी हुई पीठ
और फटी एड़ियों का इतिहास है।
वह तो बस मुस्कुरा कर अपनी छोटी-सी जीभ से
उस दाने को छूता है-
और घर में एक प्राचीन उत्सव की तरह
हँसी फैेल जाती है।
कौन जानता है
कि इसी पहले कौर के साथ उसके जीवन में
भूख भी जन्म लेती है-
और उसे भरने की अनंत कोशिश भी।
अन्नप्राशन दरअसल एक संस्कार ही नहीं
मनुष्य होने की पहली दीक्षा है-
जहाँ एक दाना धीरे-धीरे पूरा ब्रह्माण्ड बन जाता है।
अनिल गंगल
जन्म : 1954, खुर्जा (बुलंदशहर) उ. प्र.
शिक्षा : एम. ए., बी. एड.
लेखन व प्रकाशन : 1972 में आरम्भिक कविताएँ 'लहर', 'बिंदु', 'भंगिमा' में प्रकाशित. विभिन्न प्रतिष्ठित एवं अव्यावसायिक पत्रिकाओं में अनेक कविताओं का प्रकाशन.
छह कविता संग्रह प्रकाशित.
अनेक विदेशी कविताओं, लेखों व कहानियों के हिंदी में अनुवाद.
सम्मान व पुरस्कार : कविता संग्रह 'स्वाद' पर राजस्थान साहित्य अकादमी का 'सुधींद्र पुरस्कार' एवं राजस्थान जनवादी लेखक संघ का 'अंतरीप सम्मान'.
सम्पर्क : B-104, गाला सेलेस्टिया, वैष्णोदेवी सर्किल के पास, एस. पी. रिंग रोड, बालाजी विंड पार्क के सामने, अहमदाबाद-382481(गुजरात)
मो. 8233809053
सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।








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