स्मिता सिन्हा की कविताएं

 


                                 



                                स्मिता सिन्हा 



पूरी दुनिया आज जिस युद्ध, संघर्ष और तनाव से गुजर रही है उसमें स्त्रियों और बच्चों की जिंदगी बद से बदतर हो गई है। एक घने हाहाकार के बीच सब कुछ झुलस रहा है। स्वप्न हो या उम्मीद , नींद हो या न्याय सब ख़तरे में है।जो आंदोलन और प्रदर्शन हो रहे हैं वे हक के लिए हैं और हक की किसी को परवाह नहीं है।स्मिता सिन्हा की कविताओं में हमारे समय का यह धूसर सच बिना किसी लाग लपेट के दर्ज है।


स्मिता सिन्हा की कविताएं 


इतना कि हम उसे जीवन कह सकें

क्या है यह कि 
हर बार सब कुछ ख़त्म होने के बाद भी कुछ न कुछ बचा रहता है 
इतना कि हम उसे जीवन कह सकें

कैसा समय है यह कि 
शहर के गिर जाने के बाद भी 
उसका नाम बचा रहता है 
नक्शे पर खिंची रेखाएँ काँपती नहीं 
सीमाएँ अपनी जगह अड़ी रहती हैं

कैसी जिद है यह कि 
धुएँ से ढँके आकाश के नीचे भी 
सूरज रोज़ लौट आता है 
नदियाँ अपना रास्ता नहीं भूलतीं 
और हवा कितनी भी भारी हो 
चलती रहती है

कैसी बची हुई गरमाहट है कि 
राख में एक छोटी-सी आँच बची रहती है इतनी कि कोई उसे कुरेदे तो 
फिर से आग हो सके

कैसा शरीर है मनुष्य का कि 
भूख बची रहती है 
और इसी से रोटी का अर्थ भी बचा रहता है प्यास बची रहती है 
और इसी से पानी की कीमत भी

कैसी स्मृति है यह कि 
टूटे घरों के बीच घर शब्द नहीं टूटता 
किसी जेब में चाबी बची रहती है 
किसी स्मृति में एक पूरा आँगन 
जस का तस

कैसी थकान है यह कि
आँखों में थोड़ी-सी नींद बची रहती है 
और सिरहाने कुछ अधूरे सपने 
जो अभी हार मानने को तैयार नहीं

कैसा विश्वास है यह कि 
त्योहारों के नाम बच रहते हैं 
भले ही दीये बुझ चुके हों 
कैलेंडर में तारीख़ें 
अब भी उत्सव की तरह दर्ज रहती हैं

कैसी जिजीविषा है यह कि 
भाषाएँ नहीं मरतीं 
वे टूटे वाक्यों में भी 
अपनी साँस बचाए रखती हैं 
और शब्द अपनी थकान के बावजूद 
अर्थ तक पहुँच ही जाते हैं

कैसी जिद है स्मृति की कि 
इतिहास हर बार खुद को 
लिखने का रास्ता ढूँढ़ लेता है 
और स्मृति सबसे जिद्दी चीज़ की तरह बनी रहती है

और यह कैसा बचा हुआ मनुष्य है कि 
सब कुछ छिन जाने के बाद भी 
बचा हुआ इतना भर होता है कि 
उससे फिर से कुछ शुरू किया जा सके…



आँकड़ों के समय में आँसू

आप रो सकते हैं
और यह रोना अब किसी एक देश
किसी एक व्यवस्था
या किसी एक घटना तक सीमित नहीं रहा
यह रोना वैश्विक है
गहरा है
और सभ्यता के उस मोड़ पर खड़ा है
जहाँ मनुष्य ने अभूतपूर्व प्रगति भी की है और उतनी ही अभूतपूर्व असंवेदनशीलता भी

आप युद्धों पर रो सकते हैं
उन युद्धों पर जो अब
सिर्फ़ सीमाओं पर नहीं लड़े जाते
बल्कि बच्चों की स्मृतियों
स्त्रियों के शरीरों
और शहरों की आत्मा पर लड़े जाते हैं
जहाँ मिसाइलें गिरने से पहले भाषा गिरती है
और संवाद की जगह हथियार ले लेते हैं
यूक्रेन हो, ग़ाज़ा हो, सूडान हो
या किसी भूले हुए अफ्रीकी देश का गृहयुद्ध
दुनिया हर बार रणनीतिक हितों के नाम पर इंसानी पीड़ा को आँकड़ों में बदल देती है

आप वैश्विक पूँजीवाद पर रो सकते हैं
जहाँ विकास की रफ्तार तेज़ है
लेकिन न्याय की गति थमी हुई
जहाँ कुछ कॉर्पोरेट घरानों की संपत्ति
देशों के बजट से बड़ी हो चुकी है
और करोड़ों लोग अब भी पानी, भोजन और गरिमा के लिए संघर्षरत हैं
यह वह व्यवस्था है
जिसमें श्रम सस्ता होता गया
और जीवन और भी सस्ता

आप लोकतंत्र पर रो सकते हैं
क्योंकि वह अब सिर्फ़
चुनावों तक सिमटता जा रहा है
जहाँ बहुमत की आवाज़ को नैतिकता का पर्याय मान लिया गया है
और अल्पमत, असहमत
और हाशिए पर खड़े लोग
धीरे-धीरे अदृश्य किए जा रहे हैं
लोकतंत्र अब नागरिक नहीं
उपभोक्ता पैदा कर रहा है

आप जलवायु संकट पर रो सकते हैं
क्योंकि यह संकट भविष्य का नहीं
वर्तमान का है
जंगल जल रहे हैं
नदियाँ मर रही हैं
मौसम उग्र हो चुका है
और फिर भी वैश्विक नेतृत्व
सम्मेलन और घोषणाओं से आगे नहीं बढ़ पा रहा
धरती कराह रही है
लेकिन बाज़ार अभी भी मुनाफ़ा गिन रहा है

आप सूचना के इस युग पर भी रो सकते हैं
जहाँ जानकारी बहुत है
पर समझ कम
जहाँ सच को एल्गोरिद्म तय करते हैं
और झूठ को बार-बार दोहराकर
सामान्य बना दिया जाता है
यह वह समय है जब प्रोपेगैंडा हथियार है
और चुप्पी सबसे सुरक्षित रणनीति
यह रोना भावुकता नहीं है
यह एक बौद्धिक और नैतिक प्रतिक्रिया है
उस वैश्विक व्यवस्था के प्रति
जो इंसान को साधन मानती है
लक्ष्य नहीं

और शायद सबसे ज़्यादा रोने की वजह यह है
कि इतनी पीड़ा के बीच भी
दुनिया नॉर्मल बने रहने का अभिनय कर रही है…



वह कमरा जो मेरे होने से डरता था

(मेरे और मेरे बीच की एक दीवार)

वर्जिनिया ने कहा था
"एक स्त्री को अपने लिए एक कमरा चाहिए।"
पर मैंने जब भी
अपने नाम की तख्ती
किसी दरवाज़े पर टाँगनी चाही
दीवारों ने भाषा बदल ली।

कभी कहा
यह कमरा तुम्हारा नहीं,
तुम्हारा किरदार है।
कभी कहा
यहाँ रहना है तो
अपने होने को
थोड़ा कम कर दो।


मैं कम करती रही
अपने शब्दों की धार,
अपने स्वप्नों की ऊँचाई,
अपने ही भीतर
अपने होने का विस्तार।

मैंने कभी जोर से दरवाज़ा नहीं खोला,
डर था कि आहट भी
अभिमान बन जाएगी।
मैंने साँस रोकी
ताकि कोई कह न दे
देखो,
यह अपनी ही बातों में डूबी है।

मैंने दूसरों के लिए
कमरे सजाए
दीवारों पर उनकी तारीफ़ें,
खिड़कियों से उनकी रोशनी।
और खुद?
दरवाज़े की ओट में बैठी
एक धुंध-सी हो गई।

वर्जिनिया,
तुमने जब कमरा कहा था,
तब क्या तुम भी जानती थीं
कि असली क़ैद
छत और दीवार से नहीं
आँखों से होती है?

वर्जिनिया,
जब तुमने कहा
"एक स्त्री को अपने लिए एक कमरा चाहिए,"
तब शायद तुम जानती थीं
यह कमरा कोई ईंटों का बना कोना नहीं,
यह नाम का वह कोरा पृष्ठ है
जिस पर स्त्री
पहली बार
खुद को लिखती है…



जूतों की चरमराहट

वह ऊँची आवाज़ में  
क्रांति की बात करता है 
संघर्ष की बात करता है 
और फ़िर निश्चेष्ट होकर बैठ जाता है 
वह देखता है 
हर रोज़ होती आत्महत्याओं को 
रचे जा रहे प्रपंचों को 
वह हर रोज़ गुजरता है 
अपनी उफ़नती सोच की पीड़ा से 
किंतु प्रमाणित नहीं कर पाता 
अपने शब्दों को 
वह हर रोज़ बढ़ाता है एक क़दम 
उस अमानुषी पत्थर की ओर 
फ़िर एक क़दम पीछे हो लेता है 
वह अपने और ईश्वर के बीच 
नफ़रत को बखूबी पहचानता है 
और पहचानता है हवाओं में 
देह व आत्माओं की मिली जुली गंध 
वह देखता है 
सभ्यता के चेहरे पर पड़े खरोंचों को 
वह देखता है 
सदी के नायकों को टूट कर 
बिखरते बदलते भग्नावशेषों में 

वह अकेला है , विखंडित 
इतनी व्यापकता में भी 
अभी जबकि 
जल रहे हैं जंगल , गेहूँ की बालियां 
टूट रहे हैं सारसों के पंख 
कैनवास में अभी भी 
सो रहा है एक अजन्मा बच्चा 
और उसकी माँ की चीखें 
कुंद होकर लौट रही हैं 
बार बार उसी कैनवास में 
अभी जबकि हो रहे हैं 
हवा पानी भाषा के बंटवारे 
और समुन्दर के फेन से 
सुषुप्त हैं हमारे सपने 
उसे थामना है इस थर्राई धरती को 
और चस्पा करने हैं मुस्कान के वो टुकड़े 
जिसमें बाकी हो कुछ चमकीला जीवन 
अभी जबकि बाकी है उसके जूतों में चरमराहट 
उसे लगातार दौड़नी है अपने हिस्से की दौड़...



कालातीत 

तुम्हारी कविताओं में 
सिर्फ़ सूखे हुए दरख्तों की बात थी 
जबकि यह उनपर नये पत्तों के आने के दिन थे 
बात थी तो सिर्फ़ उस प्यासे अंबर की 
जबकि यह उसके तुष्ट होकर खूब खूब बरसने के दिन थे 

मुझे इस बात का प्रयोजन कभी समझ नहीं आता कि 
तुम्हारा हर एक शब्द 
अपने सभी अर्थों में विलोम ही क्यों रहा ! ! 

अब तुम यह न कहना कि 
दुःख की गठरी में 
निकृष्ट सा पड़ा सुख 
सबसे अधिक बंजर होता है 

जबकि मैंने हर एक रिक्ति को 
अपनी तमाम विषमताओं को भेद कर 
पार जाने की चाह में 
उन्मुक्त ही देखा है हमेशा ........


लोकतंत्र 

हम कुछ नहीं करते 
सिवाय उन गलियारों में झांकने के 
तमाम अधूरे प्रश्नों के बदले 
सिर्फ एक पूरे प्रश्न का उत्तर 
ढूँढ़ने के बजाय 
हम निकल जाते हैं 
सिर झुकाए थके कदमों के साथ 
उन चौखटों के बाहर 
हम कुछ नहीं करते 
जब हमारे कई ज़रूरी सवालों के सामने 
वे खड़े करते जाते हैं 
जाने कितने गैरजरूरी सवाल 
और हम उनमें ही उलझ कर रह जाते हैं 
हम तब भी कुछ नहीं करते 
जब वे हमारे मुँह पर ही पलट देते हैं आईना 
और खुद नकाब पहन निकल जाते हैं 
लगातार करते जाते हैं वे खारिज 
हमारी माँगे ,हमारे धरने ,
हमारी भूख ,हमारी विवशता ,
हमारी आत्महत्या ,हमारे सपने 
और अपने किये वो तमाम वादे 
हम तब भी कुछ नहीं करते 
सिवाय चौक चौराहों पर ठुंसी सी पड़ी 
उस भीड़ का हिस्सा बनने के 
बेवजह के चिंतन व विमर्शो के साथ 
इन अनियमितताओं के साथ संतुलन बनाने के 
हम कुछ भी नहीं करते 
जबकि हम 
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं।



चीखो

चीखो 
कि हर कोई चीख रहा है 
चीखो 
कि मौन मर रहा है 
चीखो 
कि अब कोई और विकल्प नहीं 
चीखो 
कि अब चीख ही मुखरित है यहाँ 
चीखो 
कि सब बहरे हैं 
चीखो 
कि चीखना ही सही है 
चीखो 
बस चीखो 
लेकिन कुछ ऐसे 
कि तुम्हारी चीख ही 
हो अंतिम 
इतने शोर में...



ऊब

दरअसल हम एक ऊब के साथ
रहने को अभिशप्त है
कुछ कहने
और चुप रह जाने के बीच की ऊब
कुछ करने
या यूं ही निर्लिप्त बने रह जाने
के बीच की ऊब 

हम दृश्यों में होकर
अपने आसपास के
किरदारों से ऊब सकते हैं
नींद में होकर
अपने सपनों से भी ऊब सकते हैं
आस्था में बने रहकर
अपने ईश्वर तक से भी ऊब सकते हैं

दीमक बने चाटते
एक दिन हम
किताबों के अंबार से ऊब सकते हैं
ऊब सकते हैं
मौसमों, खुशबूओं, स्मृतियों से भी
यहाँ तक कि
हम अपने प्रेम तक से भी
ऊब सकते हैं

तो क्या ऐसे ही
ऊबती होगी मिसिसीपी जैसी नदियां भी 
पानी के बढ़ते भार से
ऊबते होंगे एमाजोनिका जैसे पेड़ भी  
अपनी विशाल पत्तियों की छाँव से
तो क्या ऐसे ही ऊबते रहेंगे हम
चरमराती लोकतांत्रिक व्यवस्था से
या कि भ्रष्ट होती सत्ता की निर्लज्ज हँसी से

इस ऊब के साथ
हम धर्म और शास्त्रों की व्याख्या तो कर सकते हैं
लड़ सकते हैं विचारधाराओं की लम्बी लड़ाई
भाषा और व्याकरण की बहस में भी पड़ सकते हैं
पर नहीं बन सकते एक औसत इंसान
जो रोक सके जंगल की बढ़ती उस आग को
जिसमें झुलस रहा है
एक कस्बा, एक गाँव, एक शहर और एक पूरा देश।



यह दृश्य नहीं, आरोप है...

सड़क के किनारे
जीवन पड़ा नहीं होता
बस इतना होता है
कि उसे उठाने वाला कोई नहीं होता...
पत्थर पर बैठा वह आदमी
बीड़ी नहीं पीता
वह हर कश के साथ
अपने भीतर की जलन
थोड़ी-थोड़ी बाहर छोड़ता है...
उसकी आँखों में बेफिक्री नहीं
एक थका हुआ भरोसा है
कि जो नहीं बदला अब तक
वह शायद बदलेगा भी नहीं...

फुटपाथ पर पसरी वह बाँह
बिस्तर कम
ढाल ज़्यादा है
जिसमें एक पिता
अपने बच्चे को
दुनिया की कठोरता से बचाता है
खुद टूटते हुए...
औंधा पड़ा वह आदमी
सिर्फ़ शराब में नहीं टूटा
वह शायद उन रास्तों में बिखरा है
जहाँ लौटने की कोई जगह नहीं बची...
तीन छोटे हाथ
उसे हिला नहीं पा रहे
वे दरअसल
अपनी उम्र से भारी
एक सच को उठाने की कोशिश में हैं...
वह औरत
मूँगफली नहीं खा रही
वह अपनी भूख को
धीरे-धीरे बहला रही है
ताकि सवाल
गले तक न आ जाएँ…

यहाँ कोई जल्दी नहीं है
क्योंकि यहाँ
समय भी ठहर-ठहर कर चलता है
और कल
सिर्फ़ एक टलता हुआ भ्रम है...
फुटपाथ पर बसा यह घर
घर नहीं
जीते रहने की आदत है
जहाँ चूल्हे की आग
रोटी से पहले
उम्मीद को तपाती है
और हर दिन
राख में उँगलियाँ डालकर
थोड़ी-सी ज़िंदगी टटोली जाती है...
सड़े फलों के ढेर से
चुनती वह लड़की
दरअसल फल नहीं चुनती
वह बची हुई दुनिया में से
अपने हिस्से का कल खोजती है
जो हर बार
किसी और की छोड़ी हुई चीज़ों में
टुकड़ों-टुकड़ों में मिलता है...

और वह आदमी
मक्खियाँ उड़ाते हुए भी जानता है
कि वे लौटेंगी
जैसे दुख लौटते हैं
हर रात के बाद...



युद्ध में औरतें 

(i)

वे अपनी माँ के लिए
रो रहे है
वे रो रहे हैं
अपने पिता व भाइयों के लिए
भूख से बेहाल
वे रो रहे
बूंद भर पानी के लिए
रोते रोते थक कर
वे रो रहे है 
आँख भर नींद के लिए....


(ii)

छिपकली की कटी दुम सी
छटपटाती माँ दोनों हाथों में
अपनी संतान की क्षत-विक्षत देह समेटती
कोसती है उस आकाश को
जहाँ से होती है खून की बारिश
और बारिश में भीगता
एक बाज उस माँ के सिर पर
मंडराता रहता है लगातार
चारों पहर रात-दिन

माँ अपने बाकी बच्चों को
कलेज़े में छिपाकर 
बाज की नजरों से दूर
पृथ्वी में कहीं गहरे समा जाना चाहती है.......



(iii)

अभी जबकि 
उनके सपनों में
रंग-बिरंगी तितलियाँ
उड़ रही होंगी
दौड़ रहे होंगे
हिरन कुलांचे मारते
उड़ते कपास के पीछे
भाग रहे होंगे नन्हें कदम 
जगमगा रहे होंगे
जाने कितने सितारे उनके सपनों में

अभी जबकि
दूध-मलाई की नदियों में
डूब उतर रहे होंगे वे
गुनगुना रहे होंगे
माँ की लोरियों को
धीमे-धीमे बंद आँखों से
अभी जबकि
उन्हें मालूम भी नहीं था
सोने और उठने का समय
अभी जबकि
उन्हें मालूम नहीं थी
प्रेम और पीड़ा की परिभाषा

तुमने उनकी नींदों पर
युद्ध का बिस्तरबंद सजा लिया.....


(iv)

यहाँ यातनायें है
हत्यायें हैं
क्रूरता है
सिहरन है
विक्षिप्ति है
यहाँ युद्ध है

यहाँ हैं योनियों में सिमटी
क्रोआती बोस्नियाई औरतें
यहाँ हैं फिलिस्तनी - इजराइली औरतें
यहाँ हैं बांग्लादेशी व ईरानी औरतें 

यहाँ हैं खून में सनी औरतें
जबरन गर्भवती होती औरतें
जिबह होती औरतें
जो घसीटी जा रही हैं टॉयलेट में
तहखानों और छावनियों में
जो धकेली जा रही सरहदों के पार
बेची खरीदी जा रही हैं जानवरों की तरह

औरतें जो वहशियों से खुद को
बचाने के लिए
नदी में डूब रही हैं
जमीन में क़ब्र बनाकर
छिप रही हैं

औरतें जो हर युद्ध में
किसी बंदूक की 
गोली की तरह चल रही हैं
तो कभी
इस्तेमाल हो रही हैं
किसी बम में बारूद की तरह....


(v)
उनकी आँखों में जाने
कितनी आँखों का डर है
बेबस सहमी सी आँखें
कातर मेमने सी आँखें
जिसे जबरन ले जाया जा रहा हो
जिबह करने के लिए

उनके हाथों में जाने
कितने हाथों की छटपटाहट है
बेतरह कसे हुए हाथ
निस्तेज और शिथिल पड़ते हाथ

अरे! वो मैडलीन है
नहीं नहीं! इरयाना
अरे नहीं! रसूना सैद
वह तुम हो, नहीं मैं हूँ
हाँ मैं ही हूँ

देखो मेरे पैर लड़खड़ाने लगे है
मेरी आवाज घुट रही है
मुझे घसीटा जा रहा है
जाने कितने देश व सरहदों के पार

देखो गिद्धओं के झुण्ड
कैसे नोच रहे मेरी देह को
योनी से टपकते खून को
 कैसे चाट रहे ये जोंक लपलप

देखो मेरे होठों पर
एक प्रार्थना कितनी ख़ामोशी से टिकी है
और ठंडी नजरों से
इन्तजार कर रही हूँ मैं
अपनी मृत्यु का।



स्मिता सिन्हा 

अर्थशास्त्र में एमए और बीएड के साथ, नई दिल्ली स्थित आईआईएमसी से पत्रकारिता की शिक्षा प्राप्त। पंद्रह वर्षों से अधिक समय से पत्रकारिता और विश्वविद्यालय स्तर पर अध्यापन का अनुभव। 

सेतु प्रकाशन समूह से दो काव्य-संग्रह ‘बोलो न दरवेश’ तथा ‘रुंधे कण्ठ की अभ्यर्थना’ प्रकाशित हैं। साथ ही पेंगुइन स्वदेश से अनुदित पुस्तक 'तिलक: साम्राज्य का सबसे बड़ा शत्रु' और 'टीपू सुल्तान ' भी प्रकाशित है। 

पिछले पाँच वर्षों से सेतु प्रकाशन समूह में कार्यरत।




सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।


















Comments

  1. रामदुलारी शर्मा1 August 2026 at 17:54

    बहुत अच्छी कविताएं।

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  2. आनंद गुप्ता1 August 2026 at 17:54

    बेहतरीन कविताएं पढ़ने को मिली। कवि को बधाई।💐

    ReplyDelete
  3. सत्यकेतु1 August 2026 at 20:45

    अवरुद्ध नदियों की दशा बयां करतीं स्मिता सिन्हा की पंक्तियां कितनी तो प्रवाहमय हैं। बोझिल हवा का खाका खींचतीं ये लाइनें मलयानिल की सुगंधि से भरी हुई हैं। खूनी बरसात से बदरंग आसमान की नीलिमा स्मिता की पंक्तियों में उतरकर ज़मीं पर ठंडी होती धड़कनों में धीमी आंच भरने की कोशिश करती हैं। आंकड़ों के समय में आँसू, जूतों की चरमराहट, कालातीत, लोकतंत्र, चीखो, ऊब जैसी एक से बढ़कर एक कविताएं हैं जो विकट समय में फंसी ज़िदगी की चिंता और मनुष्यता को बचाए रखने की उम्मीद से भरी हैं। यह दृश्य नहीं, आरोप है...स्मिता की दृष्टिसंपन्नता, वृहद अवलोकन क्षमता और गहन संवेदनशीलता को बेहतर रूप से सिद्ध करती है। यही वो स्तर है जिससे कोई रचनाकार पाठकों में भरोसा पैदा करता है। युद्ध में औरतें शृंखला की कविताएं सभ्यता के पराभव की मार्मिक दास्तां हैं। वह कमरा जो मेरे होने से डरता था...घर-घर का हाल-ए-बयान है, हमारे आगे रख दिया गया आईना भी।

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