प्रतापराव कदम की कविताएं
प्रतापराव कदम
जीवन की जटिलताओं और विडंबनाओं को प्रतापराव कदम की कविताएं उस आशा के साथ जोड़ती हैं जिसमें मिट्टी से जुड़ना उम्मीद से जुड़ना है।इन कविताओं में जो खास है वह कहन शैली है। बिना किसी शोर के ये कविताएं अपनी बात पुरजोर तरीके से रखती हैं। धीमी मगर बेहद ठोस आवाज में।
प्रतापराव कदम की कविताएं
बर्फ
बर्फ से वाहियात दूसरी चीज नहीं
लाश के अनुकूल
जिंदगी के बर-खिलाफ।
कैसी खामोश बिछी है
तलहटी से शिखर तक
जड़ का तो पता नहीं
झाड़ के छोर तक है बालिश्त भर।
कैसा जड़ यह संसार
जिंदगी की गरमाहट नहीं
एकरस, नीरस बेजान
कब्रस्तान की तरह एकदम।
सारी जद्दोजहद बर्फ न बनने की
बर्फ न जमने देने की
बतरस, भुज-भर गरमाहट
झाड़ देते संबंधों पर जमी
आंखों में तैरती एक उम्मीद
बर्फ जमी झील में
नजर आती आखिर एक
किश्ती।
गंध
गंध के आधार पर
तय करना मुश्किल कि
देह जो जल रही वह
बूढ़े की है
जवान या बच्चे की
(हालांकि कुछ माहिर इसमें
जात तक बता देते हैं,लिंग भी)
तब तो और मुश्किल
जब दूर दूर तक कुछ नहीं दिख रहा
प्रवचन संस्कृति-उवाच, कानों पर भारी
आँख पर भारी झंडे, डंडे रंग-बिरंगे
सिर भारी कि जो भाषण शोर में
चहलकदमी करते वह कहीं नहीं
जंगल नहीं पर
हरे कच्चे पेड़ जलने की गंध है
जो नजर नहीं आ रहा है, पर है
जैसे रिश्तेदारी
जैसे भ्रष्टाचार, जैसे लाचार
जैसे व्यवस्था का आचार
जैसे वरिष्ठता का शोरबा
तमाम शोर के बाद भी गंध है।
कैफियत
जितना जानते हैं हम
उससे कहीं ज्यादा नहीं जानते
नजर आ रहा है जो
वही नहीं है बस
जो दायरे से बाहर है,
वह भी शामिल है दृश्य में
सच वह ही नहीं होता
वह भी होता है जो कैफियत नहीं देता
चाँद ने कभी नहीं कहा
जिसे आप चरखा कात रही बुढिया बताते हैं
दरअसल बडे-बड़े गड्ढे और खूब ऊँचे पहाड़ हैं
जब इस सत्य को छुआ तुमने
उससे पहले भी वह सत्य ही था
भले ही अनछुआ
अज्ञान की उपज है भय
और भय की उपज माखण्ड
ग्रहों का जोड़ घटाना
रेखाओं में बांचना खुद को
अज्ञान के प्रति भय नहीं
अज्ञान से उपजा भय है
आकाश उतना ही नहीं होता
जितना नजर आता है खिड़की से
हम ही बदलते हैं
जानते जाते हैं जितना
हालाँकि फिर भी होता है बहुत कुछ
अजाना।
चैराहा
खाना-पीना ओढ़ना-बिछाना
सब फुटपाथ
सामने का चौराहा रोजी-रोटी
वह जो खांस-खांस कर बेदम
वह जिसकी पसलियां गिनी जा सकती
वह जिसका पल्ला बेतरतीब
वह जो कालिख छुड़ा रही भगोनी की
लाल बत्ती के इशारे
होते इस तरफ, उस तरफ, चौतरफ
बेदम, पसलियां, पल्ला
उकसाते है दया करुणा और....
पांच साल में एकाधिक बार
ऐसे ही होते हम चौराहे पर
इसी तरह उकसाये, बरगलाये जाते
कालिख तो बाद में
महसूस होती चेहरे पर।
स्थानीय
उतना स्थानीय तो होना ही चाहिए
जितना होता है एक पेड़
जड़ें जमीन में और बाहें आकाश की ओर
जितनी होती है एक नदी
उद्गम तक लौटती बार-बार
पर्वत, पठार, मैदान लांघते
बढ़ती जाती जितनी लगातार
वैसा स्थानीय बे-मतलब बे-सबब
जैसा होता है एक डाबरा
अपनी ही दुर्गंध से बेजार
ढूंढ तक नहीं पाता रास्ता।
घर वापसी
किस मजबूरी में
एक किसान झाड़ पर चढ़ गया
ज़हालत की जिंदगी से बेजार
एक ने खुद को गुफा में बंद कर लिया।
घर वापसी के जोर-शोर में
नाचते झूमते गर्राते वे कहने लगे
घर वापसी ही है यह घर वापसी
आदि मानव झाड़ पर ही तो रहता था
कंदरा ही तो घर थी उसका
किसान के चेहरे की इबारत
बांची नहीं किसी ने
कि घर क्या मुंह लेकर जाऊंगा
फसल बर्बाद हो गयी मेरी
तीन बच्चे है मेरे
सूदखोर नौच रहे हैं
घर जाने का उपाय बताएं ?
निरूपाय वह लटक गया गमछा बांध
यह भी घर वापसी ही है घर वापसी
देह तो किराये का मकान है।
विपक्ष में
शुरुआत तो ठीक ठाक करता हूं
पर देर-सवेर
न चाहते भी
पाता हूँ स्वयं को विपक्ष में
दोस्ती रिशतेदारी बिरादरी रसूख
दुहाई दुनियादारी की
परस्पर टिके हैं हम एक दूसरे पर
ढाकों,मत झांको
फटे में पांव तो कतई नहीं।
तीसरा भी है कहीं कोई
बैल के कूल्हे पर बने जख्म सा
पपड़ाता नहीं घाव की
पिरानी की टोंच से लाल हो उभरता है।
इस लाल का, पिरानी घाव का
जिक्र भर करता भी नहीं कि
पाता हूं स्वयं को विपक्ष में।
जटायें जानती है
पेड़ जितने जमीन से उपर
उतनी ही जड़े उनकी सघन गहरी
तीन पेड़ वे, नीम पीपल, बरगद
एक दूसरे से सटे-सटे नहीं
एक दूसरे के लिए जगह बनाते हुए
एक-सी रसद पहुंचाती जड़ें
न जमीन भेदभाव करती
न खाद पानी
एक सी रसद पाते तीनों
छोड़ते नहीं कतई अपना स्वाद-स्वभाव
तीनों आच्छादित वैसे तो
पर बरगद उनमें भारी भरकम
जटायें अहसास कराती यह
वह जितना ऊपर बाहें फैलाता
जटायें उतना जमीन का रुख करती
उससे मिलने के लिए नहीं
उसमें धंसने के लिए आतुर
जटायें जानती है यह
बिना जमीन में धंसे
कोई कैसे उठ सकता है ऊपर
कैसे कोई हो सकता है विशाल ।
फूल ने कहा शुक्रिया
फूल ने ध्यान मेरा खींचा
कहा शुक्रिया
बजाय इसके कह सकता था धन्यवाद
भाषाशास्त्रियों से बेपरवाह
कहा उसने शुक्रिया ही
फूल था वह।
मुझे बीती शाम याद हो आयी
कराह में डूबी कातर आवाज
वह पौधा जिस मिट्टी में खड़ा था
फटी बिवाई सी जगह जगह वह मिट्टी
आंख में, शरीर, चेहरे से
मुरझाना साफ पढ़ा मैंने
कि कुछ ही दिन हैं उसके पास
उसकी कातर आवाज सुनी मैंने
आया मैं अपने से बाहर
तमाम दुनियावी मोह - पाश छोड़
एक डोल पानी लाया मैं
डाला उसकी जड़ों में
हलक से जैसे गटकने की आवाज
वह आवाज सुनी मैंने
मिट्टी की बिवाई में
मल्हम सा रच गया पानी
आंखों में जान आयी
शरीर में सिहरन
उसके अपनत्व को महसूसा मैंने।
यह बीते शाम की बात थी
और आज सुबह
फूल ने कहा शुक्रिया ।
प्रतापराव कदम
कपड़ों में कबूतर,एक तीली बची रहेगी, कहा उसने और हॅंसा,बीज की चुप्पी,उसकी आंखों में कुछ, चयनित कविताएं (कविता संग्रह)यह बाजार काल (गद्य संग्रह)कलम कैमरे की आंख की तरह (आलोचना)
कवि मुनि क्षमासागर और नेपाल मूल की कवयित्री सीतारानी देवी की कविताओं का चयन एवं संपादन क्रमश:"चिड़िया लौट आई है" व "चींटी के पग नैऊर बाजे". देशभर की सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित, कुछ का अन्य भाषाओं में लिप्यंतरण। समाज, साहित्य,संचार, शिक्षा, बाजार, ज्वलंत विषय पर नियमित लेखन। अनेक प्रतिनिधि कविता संकलनों में शामिल. लेखन कर्म पर कुछ वि. वि. में शोध कार्य।
शरद जोशी पुरस्कार(सा.अ , संस्कृति वि.म.प्र.) बागीश्वरी पुरस्कार,शरद बिल्लौरे स्मृति सम्मान, राष्ट्रीय अहिल्या सम्मान,जनकवि ठाकुर पुरणसिंह स्मृति सूत्र सम्मान (बस्तर,छ.ग)सुधा बिन्दु सम्मान (गोरखपुर,उ.प्र.)संत सिंगाजी सम्मान,अनंत गोपाल शेवडे़ सम्मान (विदर्भ, महाराष्ट्र)
पत्राचार -11 शकुन नगर, खंडवा (म.प्र.)450001
मोबाइल -8718057089
सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।





इन कविताओं में प्रतापराव कदम जीवन की विडंबनाओं, सामाजिक विसंगतियों और मनुष्य की जिजीविषा को बेहद सहज लेकिन तीखे ढंग से सामने रखते हैं।
ReplyDeleteमिट्टी, पेड़, बर्फ, गंध और फूल जैसे साधारण बिंबों के माध्यम से उनकी कविता हमारे समय के असाधारण सच को आवाज़ देती है।
कदम जी बहुत कम कविताएं लिखते है लेकिन जो कविताएं लिखते है
ReplyDeleteवह हमें आकर्षित करती हैं।
बर्फ से वाहियात दूसरी चीज़ नहीं—
ReplyDeleteलाश के अनुकूल,
ज़िंदगी के बरख़िलाफ़।
पाठक के दिमाग़ से मुक्केबाज़ी करती ये पंक्तियाँ पहली ही कविता में मुझे अपने प्रभाव में ले लेती हैं। बर्फ को ‘वाहियात’ कहने का भाव इससे पहले किसी कविता में मैंने नहीं पढ़ा। ग़ज़ब का रचनात्मक बिंब है। इन पंक्तियों को पढ़ते हुए मैं हतप्रभ रह गया
इन कविताओं में मृत्युबोध तो लगा, लेकिन वह भी एक नए प्रभाव और नए दृष्टिकोण के साथ उपस्थित लगा। प्रतापराव कदम ने इन कविताओं में मृत्यु को देखने के दृष्टिकोण को बदलते नज़र आये मुझे ।
इन कविताओं से गुजरते हुए मुझे लगा कि ये रचनाएँ भाव से दृश्य, दृश्य से बिंब और बिंब से संवेदना की ओर विचरती हुई भीतर एक गहरा एहसास पैदा करती हैं। इन कविताओं से मुझे जो एहसास लगातार होता रहा, उसे प्रतापराव कदम की इन पंक्तियों के माध्यम से कहूँ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी—
पेड़ जितने ज़मीन से ऊपर,
उतनी ही जड़ें उनकी सघन, गहरी...
अभिनंदन, कवि प्रताप भाई!