हरिओम राजोरिया की कविताएं

 

हरिओम राजोरिया 




पूंजी, व्यवस्था और सत्ता तंत्र के मकड़जाल में फंसने वाले लोग कभी उसके चंगुल से निकल नहीं पाते। हरिओम राजोरिया की कविताएं ऐसे ही लोगों की कविताएं हैं जो गुमनामी में जी रहे हैं,मर रहे हैं,खप रहे हैं उस अपराध की सजा भुगत रहे हैं जो उन्होंने किया ही नहीं है।ये कविताएं हाशिए पर बसी उस दुनिया को दिखाती हैं जिसकी तरफ कोई नहीं देखता।जिस पर कोई बात नहीं करता। अखबार और चैनल की खबरों से जो गायब कर दिए गए हैं वे इन कविताओं में हैं।



हरिओम राजोरिया की कविताएं 


चोरों के वर्ग


बड़े चोर अकसर बच जाते हैं

छोटे पकड़े जाते हैं

और कठोर दण्ड पाते हैं 


बड़ों के पास बड़ी जिम्मेदारियां होती हैं

बड़ों की पीठ पर बड़े - बड़ों का होता है हाथ 

बड़े चोरों की समझ वैज्ञानिक होती है

वे चोर को भी मनुष्य ही मानते हैं

और धन अर्जन में 

साधन की पवित्रता को निरा अंधविश्वास 

वे चोरी के गणित , भौतिकी और रसायन के

होते हैं पारंपरिक जानकार 


बड़े चोर पेट के लिए नहीं

इस चराचर के हित साधन के लिए 

करते नहीं करवाते हैं चोरियाँ 

वे सत्ता के अनुचरों के साहचर्य में रहते हैं

बड़े चोरों के पास छोटे चोरों की जमात होती है

वे मामला जमाकर संदर्भ से कट जाते हैं 

बड़े चोरों की एक छुपी हुई 

राजनैतिक हैसियत होती है

बड़े चोरों को उनका बड़प्पन बचा लेता है


बड़े चोरों में देशभक्त जैसा दिखने की कला होती है

छोटे बेचारे छोटे होने की लाचारी के चलते

जीवन में हर वक्त चोर जैसे ही नज़र आते हैं

" चोरी करना पाप है, पुलिस हमारी बाप है "

जैसा कोई सद्वाक्य दोहराते हुए

वे जुलूस की शक्ल में आँखें झुकाए

भरे बाजार से गुज़ारे जाते हैं ।


मोक्ष 


मोक्ष प्राप्ति के 

अनेक सुन्दर विकल्प खुले हैं

भगदड़ मचे और सम्हलने से पहले ही

पंछी अनन्त की उड़ान पर निकल जाए

मोक्ष तो मिले पर लाश न मिले

निगमकर्मी इस अधम शरीर को 

पुराने टायरों की सहायता से जलाएं 


सूर्य उत्तरायण हों और प्राण निकल जाएं

दम घुटे पर प्रियजनों को खबर न लगे

मोक्ष मिल जाए पर मृत्यु प्रमाणपत्र न मिले

मोक्ष मिले और किसी को पता ही न चले

मरते वक्त दिन का प्रकाश हो

भले ही भीतर गहन अंधकार पसरा हो


पवित्र नदी में स्नान करके मरने पर

मोक्ष की संभावनाएं बढ़ जाती हैं

' नारायण ' भर कहने से मरते वक्त

अजामिल को मोक्ष मिल गया था

अब नारायण की जगह

जय श्री राम कहने का 

एक सुन्दर विकल्प भी है आपके पास


मरना तो सबको ही है

पर मोक्ष सबके लिए नहीं है

भगदड़ में मरने से परिवार को

मुआवजा भले ही न मिले

मोक्ष मिलने की प्रबल आशंका हैं ।


कोई शर्मिंदा नहीं है

न मै , न तुम , न वो

जो मरे उनकी किस्मत थी

मोक्ष प्राप्त होना था उन्हें

घायलों की गलती थी कि वे

गणना में शामिल न हो सके और

नरकगामी हो गए

न मोक्ष मिला और न मुआवजा ।

पैसा


श्रम रहित पैसा अकेला नहीं आता

विचारहीनता , क्रूरता , चारित्रिक दुर्वलता और

संवेदनहीनता साथ लाता है


झूठा जान पड़ता है संसार

सताता है परलोक का भय

गुप्त और अँधेरे रास्तों से 

होता हुआ आता है पैसा

और धमनियों में धीरे - धीरे

बहने लगता है कुटिलता का काला जहर 


जिन-जिन हाथों से होकर गुजरता 

छोड़ जाता है अपनी रंगत 

भय , कालापन , अहंकार , प्रमाद

अपने 'स्व' का होता है अतिरिक्त विस्तार

षड्यंत्रकारी होने का जागता है संस्कार

कल्पनाशीलता के क्षरण की होती है शुरूआत


श्रम रहित पैसा फुसफुसाता नहीं

सिर चढ़कर बोलता है

भीतर ही भीतर सुलगता और सुलगाता है

धीरे - धीरे अकेलेपन की ओर ले जाता है

सबकुछ होने के बाबजूद आदमी

निपट अकेला ही रह जाता है

कुलीनता से उपजा दोमुंहापन

मनुष्यता के रेशों को चुन - चुन कर खाता है 


पहले आप पैसा पकड़ते हैँ 

फिर पैसा आपको जकड़ लेता है

पैसा अपना रास्ता खुद बनाता है

फिर आपके भीतर उतर जाता है

धीरे-धीरे आता है पैसा

और धारे-धीरे भीतर से 

आपको तोड़ता ही चला जाता है 

जैसे जंग लग चुकने के बाद

धीरे-धीरे नष्ट होता जाता है लोहा


बहुत पैसा जमा हो जाता है जब

तो पैसे वाले के भीतर

सूख जाता है निर्मलता का जल

कीच भर बची रह जाती है

तूफान से भी तेज रफ्तार से 

बढ़ता हुआ आता है पैसा

तो आपकी हर अच्छाई को

अपने साथ वहा ले जाता है


और जब आप

इस पैसे से संचालित होने लगते हैं 

तो अपना मूल रास्ता भूल जाते हैं ।

रास्ता


कोई नहीं भूल पाता 

स्कूल जाने का रास्ता

लौट-लौट आता है फिर - फिर

स्वप्न में बजती है पहली घंटी 

और कांधे पर बस्ता टांगे आँखें भींचते 

आप दौड़ पड़ते हैं नींद में


सपनों में एक न एक दिन

जरूर आता है स्कूल जाने का रास्ता

कड़कड़ाती ठंड में 

नंगे पैरों में कंकड़ों की चुभन 

और रास्ते पर पड़े 

बमूल के कांटों की उपस्थिति

समय को लांघकर पीछे देखता हूं

तो स्कूल जाने का रास्ता

सुनसान और बहुत अकेला दिखाई पड़ता है 

जैसे आज भी कर रहा हो

किसी बच्चे के लौटने का इंतजार


ऐसा नहीं ऐसा था कभी

स्मृति में दर्ज रास्ते से तो 

बिल्कुल ही बदल गया

जैसे-जैसे समय बदला

कस्बे शहरों की नकल पर चल पड़े

कामगरों की बस्तियां पीछे धकेल दी गईं 

और रास्तों को निर्दयता से कूटकर 

काले डामर से नया रूप दिया गया


चबूतरे पर सुपारी कुतरता 

याद आता है चिड़चिड़ा बूढ़ा 

जिसे अगर छेड़ा गया तो

वह आपके पिता के पिता का भी

कच्चा चिट्ठा खोल कर रख देगा

उसी रास्ते पर दिखाई पड़ता है 

स्कूल के मैदान में खड़ा 

अकेला एक महानीम का पेड़

एक घाटी जो कटते - कटते पूरी ही कट गई

चबूतरों पर खुले में नहाती स्त्रियां

और कुल्हड , दियों के अवों से उठता धुंआं

नए रास्ते पर चलते हुए

एक पूरा संसार दृश्य रूप में दिखाई पड़ता है


नए सिरे से फिर से बने 

इस नए रास्ते पर चलते हुए

पुराने रास्ते के चिन्ह खोजता हूँ 

और गुजर गए समय की एक धुन को

सीटी पर गुनगुनाने में

अपने आप को असफल पाता हूं ।


इंतजार


न्याय का अभिनय चल रहा है 

शिक्षक पानी और लस्सी सर्व कर रहे हैं 

प्रत्येक सेक्टर में तैनात हाथ में ट्रे लिए खड़े हैं

दर्शक दीर्घा को छः सेक्टरों में बांटा गया है

माता - बहिनों , ग्रामीणों , अधिकारियों

और पार्टी कार्यकर्ताओं की 

बैठने की अपनी स्वायत्त जगह है


एक लोक गायक इस तपोभूमि में पैदा हुए अवतारों

का वंदन कर रहा है अपने गीत में

जन सुनवाई के लिए हुजूर आने को ही हैं

लाभार्थियों और हितग्राहियों का 

कच्चा वोट अभिनय के ताप से 

नए सिरे से पकाया जा रहा है

पहले से तैयार दरखास्तें ली जा रही हैं 

जनतंत्र पर पेशाब करने आ रहे हैं हुजूर

राजतंत्र की नए सिरे से वापसी हो रही है

जन भावना की झबरीले वालों वाली पिलिया (कुतिया)

हुजूर की गोद में एक मीठी झपकी ले रही है


शिक्षा पर एक गीत मातृ शक्ति की ओर से

इस गीत से पहले गीत की बड़ी भूमिका 

राय सैरा भी नृत्य की तैयारी में है

रमतूला बजाने वाला दयाराम पुत्र साधुराम बोला

कि उसे मुख्यमंत्री वाले कार्यक्रम के तीन हजार अभी

नहीं मिले और कलेक्टर साहिबान रिटायर हो गए हैं

उधर लोक गायक फिर टेर लगा रहा है -

"आई है मेरे देश में आजादी फूल बन के "

जबकि आजादी कम हो रही है

आजादी जा रही है

आजादी सिर्फ गीतों में बची है ।


परम श्रद्धेय इस गर्म धूप में 

प्रजा के लिए आ रहे हैं 

हरभजन पाल आए हैं भजन मंडली के साथ

हुजूर के लिए अपनी लोकभाषा में

स्तुति फॉर्म में नया स्वागत गीत बना कर लाए हैं

गाने के बीच में घोषणाएं चल रही हैं

अनुभाग स्तर के सारे अधिकारी सजक हैं 

तथा कान खड़े कर -कर के 

हुजूर के आने का इंतजार कर रहे हैं ।


सिर्फ़


आज हम सिर्फ़ राणा सांगा 

अर्थात् संग्राम सिंह जी की बात करेंगे

कल हमने औरंगजेब की बात करी थी

हमें खेद है कि हमने कब्र भी खोदी

पर भलीभांति खोद नहीं पाए

हमारी खुदाई में आस्था है 

इसलिए आज सिर्फ़ आस्था की बात करेंगे

तुम अगर न्याय अथवा न्याय मांगने की बात करोगे

तो हम सिर्फ़ इतिहास में हुए अन्याय की बात करेंगे

हम सिर्फ़ बात करेंगे 

क्योंकि हम सिर्फ़ बात ही कर सकते हैं


हमें ग़ल्त - सल्त इतिहास पढ़ाया गया

हालांकि हम कल भी नहीं पढ़ते थे 

और आज भी नहीं पढ़ते

हमें अपने इतिहास पर गर्व है और गर्व रहेगा

इसलिए हम तुम्हारे वर्तमान पर थूकते हैं ।


टकनेरी


आज अखबार में फूलबाई का किस्सा पढ़ा 

रामकिशन आदिवासी की पत्नी फूलबाई 

" सरकार ने फूलबाई का स्वस्थ प्रसव करवाया "


हाईरिस्क पर थी फूलबाई 

शासन ने बहुत पहले उसे चिन्हित कर लिया था

कलेक्टर साहिबान ने टकनेरी की फूलबाई को

( ग्राम पंचायत बरखेड़ा जागीर का एक गांव )

सेहत की टोकरी और स्वच्छता किट करी 

फूलबाई को प्राप्त हुए पुत्ररत्न को सीईओ मैडम ने

पालने में झुलाया साथ में फ़ोटो भी खिंचवाई 

अखबारनवीसों ने फूलबाई के वृत्तांत को

बहुत तफ़सील में लिखा और सचित्र छापा 


टकनेरी गांव की कीर्ति चहुंदिस फैल गई

घास का गट्ठर सिर पर धरे हांफते - बतियाते 

भेलसा रोड से बाजार की तरफ आतीं

उस रात जाने - पहचाने चेहरों वाली

अनेक फूल बाइयाँ को मैंने सपने में देखा

नींद टूटी तो मेरा गला सूख रहा था


आजादी से पहले रेल्वे स्टेशन का नाम 

'टकनेरी' ही हुआ करता था

फिर हमारे शहर का नाम 

' पछार' से अशोकनगर कर दिया गया

तो रेलवे स्टेशन का नाम भी 

टकनेरी से अशोकनगर हो गया

मूक शहर बोल ही नहीं पाते कभी

आप जो चाहो नाम बदलकर रख दो 

नाम बदल दिए जाने पर पुराने नाम

स्मृति के दरवाजे की साँकल 

गाहे - बगाहे खटखटाते रहते हैं


टकनेरी भले ही पार्श्व में चला गया

पर इस नाम से रिश्ता बराबर बना रहा

यहां एक छोटी - सी सुन्दर नदी बहा करती थी

जिसकी धार साल भर नहीं टूटती थी

जो समय के साथ गंदे नाले में तब्दील हो गई

पहले मोहल्ले के लड़कों के साथ टकनेरी जाता

तो घर लौटकर बहुत मार खाता 

हम किताबों में पढ़ा करते थे कभी -

 ' भारत में सात लाख गांव हैं ' 

सात लाख में एक नाम टकनेरी भी


टकनेरी अब तो पहचान में ही नहीं आता

हर व्यक्ति की समग्र आई. डी. को

आधार से जोड़ दिया गया है

और गांव मुख्यधारा में आ गया है

गांव वालों को लाभार्थी कहा जाने 

सब अलग - थलग सा हो गया

प्रशासन के काम भी बढ़ गए

और टकनेरी जैसे गांवों की मुश्किलें भी ।


सिनेमा


सिनेमा की बात चलने पर

दांत मिसमिसाने लगते पिता

सिनेमा उनके लिए एक बुरा स्वप्न था

बच्चों के बिगड़ने की फुल गारंटी 

जिस दोस्त के साथ सिनेमा देखने भागता 

उस दोस्त के पिता नहीं थे


दोस्त मां के साथ किराना दुकान पर बैठता

हिसाब - किताब और दुकानदारी की 

बहुत व्यवहारिक समझ थी उसके पास

सिनेमा की रंगीन दुनिया हमें अपनी ओर खींचती

और मौका हाथ लगते ही

हम सिनेमाघर की तरफ भागते 

दुकान और स्कूल के बाद मित्र थका होता

पर उसकी जेब में पर्याप्त पैसे होते थे

सिनेमा की दो- तीन रील निकलने के बाद ही

कुर्सी पर सिर लटका कर वह सो जाता

मैं सिनेमा के साथ उसे सोता हुआ देखता


सिनेमा में सिनेमा के तरह के सुख - दुःख थे

जो बहुत अलग से थे हमसे 

सिनेमा का संसार सिनेमा का संसार था

जहां मारधाड़ थी अन्याय का प्रतिकार था

प्यार , घृणा , अहंकार , रोना - धोना , चीत्कार

जो बहुत अलग था पर हमें रोमांचित करता था

हम जो सचमुच के भय के साथ रहते थे

सिनेमा के आरोपित भय से भयभीत नहीं होते थे

सिनेमा ने हमें नए तरह से 

सपने देखना सिखाया

सिनेमा का गाना और नाचना देखकर आते

तो थोड़े - थोड़े हम भी रंगीन हो जाते


हम सिनेमा की कहानी को 

अपनी तरह से पकड़ते

और स्कूल के दोस्तों को अपनी तरह से सुनाते

सिनेमा से लौटकर मैं पिताजी के थप्पड़ खाता

पर सिनेमा के जादू के सामने

उनकी पिटाई को कुछ कमतर ही पाता 


सिनेमा के अंत में जब राष्ट्रगान बजता

तो मैं दोस्त को एकदम से जगा देता

उसे लग़ता चलो एक काम पूरा हुआ 

रास्ते भर मैं उसे छूटी हुई कहानी सुनाता

दोस्त जिन्दगी से भले ही न हारा हो

पर नींद के आगे हार जाता 

सिनेमा देखने का अपूर्व उत्साह

ठीक से न देख पाने की हताशा में बदल जाता

जितने तेज कदमों से हम सिनेमा पहुंचते

उतनी ही धीमी चाल से घर को लौटते ।

सामीप्य 


स्कूल जाने से पहले

घर का कोई काम अधूरा नहीं छोड़तीं

सुबह का अखबार पढ़ता हूँ

और भाग - भाग कर 

तुम्हें काम करता हुआ देखता हूँ 


नया तो कुछ भी नहीं हो रहा कहीं

फिर भी एक झूठी उम्मीद में

अखबार में खो जाता हूँ

पता नहीं यह पढ़ना ही होता है या

तुम्हारी गतिशील उपस्थिति को

बहुत पास से महसूस करना 

बीमारी से आये खालीपन और रिक्तता को

तुम जीवन के उल्लास से भर देती हो 


हर एक सुबह को तुम

मेरा नया दिन बना देती हो

समय की इस भागमभाग में भले ही

तुम एक काम की तरह से ही सही

जब मुझे चूमती हो

तो इस चूमने में

और तुम्हारे भौतिक समीप्य में

छुपा हुआ अनुराग महसूस करता हूँ


इस विपरीत समय में

जैसे इस क्षण को हम दोनों ने

क्षण भर के लिए रोक लिया हो ।




हरिओम राजोरिया 

जन्म : 8 अगस्त ,1964 , अशोकनगर ( मप्र )

1985 से लिखना प्रारंभ किया । 1993 में "यह एक सच है"कविता पुस्तिका प्रकाशित । हंसीधर ( 1997 ) , " खाली कोना " ( 2006 ) , " नागरिक मत " ( 2014 ) , " मैं गायक बनना चाहता था " ( 2024 ) कविता संग्रह प्रकाशित । अनेक भाषाओं में कविताओं के अनुवाद प्रकाशित। 

रंगकर्म से सक्रिय जुड़ाव । नाट्य लेखन , कहानी और नाट्य संगीत पर भी काम। सातवीं कक्षा में रामलीला से अभिनय की शुरुआत। रामलीला और एक दर्जन से ज्यादा नाटकों के लिए गीत लेखन । बच्चों के थिएटर की 18 नाट्य कार्यशालाओं का संचालन । मध्यप्रदेश इप्टा के अध्यक्ष तथा मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष मंडल के सदस्य । 

मप्र लोक निर्माण विभाग में 40 वर्ष नौकरी करने के बाद मार्च , 2026 में सेवानिवृत्त।

संपर्क : 9425134462, 700084830





सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।












Comments

  1. ख़ुदेजा़ ख़ान8 August 2026 at 15:46

    चोरों का वर्ग,मोक्ष,पैसा, रास्ता, इंतज़ार, सिर्फ़, टकनेरी इन तमाम कविताओं में हरिओम राजोरिया सत्ता का वो चेहरा उजागर करते हैं जिसने अपने धन, बल, तंत्र से ऐसी विषम परिस्थितियां निर्मित कीं जिनसे सर्वप्रथम उसका हित सधता हो। लोकहित के नाम पर किये जा रहे कर्मकाण्डों में विसंगतियां तो हैं ही , संवेदनहीनता भी है।
    बड़े चोरों को पकड़ा नहीं जाता, छोटे चोर को बख़्शा नहीं जाता।आस्था की भगदड़ में मरने वाले मोक्ष प्राप्त करते हैं और बेमौत मरने वालों को मुआवज़ा भी नहीं मिलता। अकूत सम्पत्ति का मालिक नैतिकता को तिलांजलि दे देता है और मेहनतकश, करदाता बना रहता है। जगहों के नाम बदलकर कस्बों को शहर में तब्दील कर दिया जाता है, समस्याएं ज्यों की त्यों बनी रहती हैं। चिलचिलाती धूप में नेता का इंतज़ार करती बेहाल जनता का कोई पुरसा हाल नहीं होता। इतिहास बदल देने से उसकी सच्चाई नहीं बदलती।
    ये सारे विरोधाभास कविताओं में पंक्ति दर पंक्ति दर्ज होते जाते हैं और एक आम आदमी की विवशता को उजागर करते हैं।

    सिनेमा और समीप्य
    इन दो कविताओं में विगत की सुन्दर स्मृतियां और अनुभूति की गहनता है। जो सामयिक चिंताओं से परे कुछ राहत देती हैं।

    ReplyDelete
  2. सत्यकेतु8 August 2026 at 20:51

    बग़ैर परिश्रम के मिले पैसे की संगति कितनी ख़राब हो सकती है, इसे हरिओम राजोरिया बेलौस बताते हैं। श्रमहीन पैसा जिसे व्यवहार में घूस या रिश्वत कहा जाता है, उसे स्वीकार करने वाला व्यक्ति विचारहीन, क्रूर, दुष्चरित्र और संवेदनहीन हो जाता है। चोरी से हासिल पैसा अच्छे अच्छों का दिमाग़ ख़राब कर देता है, उसे स्वभाव से ग़लीज़ बना देता है। लेकिन वह इतना बड़ा कलाकार होता है कि लोगों की नज़र में, ख़ासकर उसकी कमाई से लाभ पाने वालों की नज़र में वह बड़ा ईमानदार, देशभक्त, कर्मनिष्ठ और अत्यंत ज़िम्मेदार होता है। ऐसे लोग मोक्ष के प्रति भी आश्वस्त होते हैं। प्रशंसकों में ऐसों के धर्मात्मा होने की एकराय होती है, क्योंकि धन और धर्म की जुगलबंदी पुराणों-दंतकथाओं, श्रुतियों में दर्ज होती है। लेकिन जैसे चोरों में वर्गभेद होता है, वैसे ही मोक्ष प्राप्त करने वालों की भी कैटेगरी होती है। इस भेद को दर्शाने के क्रम में हरिओम राजोरिया व्यवस्था की खामियों, प्रशासनिक काइयांपन और राजनैतिक धीमठपने की पोल खोलते हैं जो आम श्रद्धालुओं/लोगों को 'न मोक्ष मिला न मुआवजा' के दोराहे पर खड़ा कर देते हैं। न्याय का अभिनय करने वाले कितनी बेमुरौव्वती से अन्याय का रथ हांकते हैं, यह 'इंतजार' कविता में बखूबी दर्ज है। राजनैतिक सभा समारोहों में, शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थानों के कार्यक्रमों में बुद्धिजीवियों, कलाकारों की जो दुर्गति होती है, उसको प्रत्यक्ष देखा, महसूस किया जा रहा है। पाठ्यक्रमों से सच गायब हो रहा है, झूठ रोपने के लिए कब्रें खोदी जा रही हैं, कल्याणकारी योजनाएं दिखावे की भूलभुलैया में फंसी हुई है। पटरी से उतरी व्यवस्था का सटीक और सहज अंकन हरिओम राजोरिया ने किया है। स्मृतियों के रेशे भी सलीके से खोले हैं।

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  3. हरिओम राजौरिया की इन कविताओं की विशेषता लगी कि ये व्यंग्य करती हैं और मनुष्य को याद रखती ये समस्त कविताएं

    ‘चोरों के वर्ग’, ‘मोक्ष’, ‘पैसा’, ‘इंतजार’ और ‘सिर्फ़’ बढ़िया कविताएं लगी।

    राजनीति से लबरेज कविताएं जैसी हरिओम लिखते हैं,दूजा कोई नहीं


    अभिनंदन कवि भाई

    ReplyDelete

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