नरेश चंद्रकर की कविताएं

 

नरेश चंद्रकर 

नरेश चंद्रकर की कविताओं में मिटते हुए की जो टीस है वह बहुत गहरी है। स्मृति, जीवन, रिश्ते और श्रम के सौंदर्य के बीच आवाजाही करती उनकी कविताओं में दधीचि और मुक्तिबोध एक साथ उपस्थित हैं।


नरेश चंद्रकर की कविताएं 



ऋषि दधीचि की तस्वीर से प्रेरित


बहुत शालीन नहीं है वह तस्वीर 
राजसी ठाठ दिखाई नहीं देते हैं 
ना रईसी नज़र आती है उनमें 

हड्डियों को याद है वे हुए थे 

रक्त और मज्जा में सुनाई देती है आज भी 
उनकी रुकती हुई सांसे 
धड़कनों का हिसाब 
भुजा की शिराओं में 
एक अति प्राचीन लिपि में लिखा 
फड़क रहा है 

महसूस करने पर उन पर लिखा 
पूरा शिलालेख हमारी नसों में 
बांचा जा सकता है 

यूं पूर्णतः अनुपलब्ध नहीं हुए हैं वे 
अभी भी जब कोई हारने लगता है 
हारती है आंखें 
हारते हैं हाथ 
हार मान लेती है किसी की तकलीफ 
पिशाची ताकत से

हिलती है उनकी तस्वीर आंखों में 
वे सामने होते हैं 
अपना पूरा शरीर त्यागते हुए

आख़िर तो वे मेरे पूर्वज हैं 
परन्तु देखो मेरे काम
सब की तरफ पीठ किए बैठा हूँ 

तेज बारिश में जिनके सामान भीगे 
उन्हें अनदेखा कर रहा हूँ 
आंखों के सामने हुई दुर्घटना में 
जो रक्त बहा
वह मेरे ग्रुप का है और
मैं अनदेखा कर रहा हूं 
असुरों के आतंक आज भी हैं 
पर सब अनदेखा कर रहा हूँ 

मैं इतना लुक्खा हो गया हूँ कि
किसी को कुछ देता नहीं हूँ 
पूर्वजों की साख लुट रही है 

और मैं अपनी हड्डियां तो छोड़ो
नाखून तक बचाता फिर रहा हूं !!


आत्मकथाएं


सही सोचा था कभी ---
आत्मकथाएं बोलतीं हैं 
जीवन के बाद तक बोलती हैं 
अधूरी और थकी रहकर भी 
बुलाती रहती है कई दिनों तक 

अंतिम पृष्ठ तक 
सुनाई दे जाती है उनमें 
आवाज़ें
पराजयें 
प्रेम और प्रार्थनाएं 
दुख और परेशानियां 

सोचता हूं ----
आत्मकथाएं ही तो है 
एलबम में रखी
घर की तमाम स्त्रियों की तस्वीरें !!




बातचीत

एक तिलिस्मी पिटारा है यह
ये जब होने लगती है तो 
खोई हुई चीजें मिल जाती है 

बातें करते हुए ही 
कालीदास को पहली पंक्ति मिली थी 
अभिज्ञानशाकुंतलम की

शेक्सपीयर ने खोज लिये थे
अनेक पात्रों के नाम

बातचीत करते हुए 
व्लादिमीर मायाकोवस्की को मिली थी 
उनकी यह महान पंक्ति ----
"पतलून पहना बादल" 

चुप क्यूं रहे कोई
मारी जाती है इससे ताकत
चुप तो नहीं रहते---
जोर से गिरते हुए जलप्रपात
बरसती हुई बारिश

पेड़ कहां चुप रहते हैं 
पत्तियां बोलती रहती है 
बक बक बक बक हवा से 

अकेले बातचीत कर लेते थे 
खुद से ही
महाकवि मुक्तिबोध !!


मेरा वहां होना

उस शहर आने को कहा सभी ने 
जवाब हमेशा एक ही रहा --- 
बाहर निकलना नहीं होता है अब
कभी कोई प्रसंग होगा तब आऊंगा

एक समय था वहां 
साइकिल से मित्रों के घर जाता था
जलेबी चखी थी वहीं पहली बार
मित्रो के साथ ईरानी चाय पी चुका
घर भी था वहीं 
माँ बघारती थी अरहर की दाल रोज

स्मृतियों के पर्दे उड़ते हैं 
उस शहर की रौशनी में 

हँसी आ जाती है लोगों को
जब कहता हूं ---
याद है मुहल्ले के नाम वहां के सभी

खैर,आखिरी चिट्ठी तक बट चुकी है 
मेरे नाम आई हुई
वर्षों पहले

अब तो 
कम ही लोग बचे हैं 
कम ही हैं वे आवाजें 
जो जानती है मैं वहां था !!



आँगन एक याद
(नए बन रहे मकानों को देखकर)


बातचीत में 
बहुत बार दिखा आँगन 

मेरे ससुराल के घर में था
बोगनवेलिया के फूल बरसते थे
वहाँ रखे पानी भरे ड्रम पर 
कहीं से उड़ती हुई आती थी
मोगरे की गंध

ज्ञानरंजन की कहानी याद आती थी:
अमरूद का पेड़
जो लगा था कहानी के आँगन में 

आसमान से सीधे उतरती थी 
बारिश की फुहारें 
बिल्लियां 
धूप की महीन किरणें 
कटी पतंगें 
उसमें निपटते थे अनेक घरेलू काम
घर का एक अभिन्न सदस्य था वह

अब वैसे ही 
नहीं दिखाई देता है 
कभी घर जाने पर
जैसे घर के बुजुर्ग 

जा चुकी 
एक पीढ़ी है आँगन !!



जीवन प्रमाणपत्र


इसके लिए नहीं दिखाने पड़े
कोई कागज़ पत्तर 

यूं ही चलते हुए गया और लौट आया
ऑनलाइन बनाना होता इसे तो
झपकनी पड़ती केवल अपनी आँखें 

और कहा जाता ---
बस हो गया

इतना आसान है 
कुछ गवाएं बिना ही हो जाता है 

कहना भी नहीं पड़ता---
मैं जीवित हूँ 

इस समय सबसे आसान है 
जीवन प्रमाणपत्र 

हो भले ही 
जीना कठिन !!



प्रेम


सही है तुम्हारा कहना ---

अतीत की प्रेम-कथा हो या
आज की कोई
रहती है प्रताड़नाएं उनमें छिपी

असमानताएं भी खड़ी मिलती हैं रास्ते में 
फिर चाहे फिल्लौरी के आगे
या भगत सिंह के 
गूंजते जरूर है गीत हवा में 
 ज़ुल्म-ओ-सितम के 

प्रेम है ही 
उस चिड़िया का नाम 

जो घोंसला बना ले धमनियों में हमारी।


इसीलिए गया था

वहां नहीं गया था 
कविता की पहली पंक्ति जुगाड़ने 

मकई गेहूं जवारी बाजरे चने के
पिसते आटे की 
उड़ती हुई गंध थी वहां 
और आटा भी लेना था मुझे 

इतनी पुरातन गंध
और कहां मिल सकती थी मुझे 
जो शिराओं में दौड़ते 
रक्त को भी याद रहे 

इसीलिए गया था वहां 
और भी जाता रहूंगा 
जब भी लगेगी भूख---

आटे की गंध की
और 
रोटी के काम में व्यस्त 
हाथों को देखने की भूख !!



रास्ते बुहारनेवालियाँ

वे अभी खड़ी हैं
झुकेंगी तो पूरी देह झुकेगी

उनकी रीढ़ की हड्डी झुकेगी दर्द के साथ
हाथ झुकेंगे, 

स्तन झुकेंगे पृथ्वी की तरफ

आँखें झुक जायेंगी धूल कणों पर
व्यर्थ वस्तुओं पर, 

वे बुहारने लगेंगी महानगर के रास्ते देर रात में भी
अगली सुबह के लिए
धुली सुबह के लिए

उन्हें पगार में बँधी न देखें
वे हैं, 
महानगर के विशाल घर की स्त्रियाँ

उनके धैर्य में बँधी हैं 
दुनिया को घर जैसा बनाने की तरकीबें

वे सिर्फ कुछ नहीं हैं 
हजार लाख करोड़ हैं

वे पृथ्वी को दुर्गन्ध से बचा सकती हैं

कभी नाराज़ हों
तो बुहार ले जा सकती हैं आकाश से तारे और फेंक सकती हैं

ब्रह्माण्ड के काले कुहों में !!





नरेश चन्द्रकर

जन्म हैदराबाद में

(1) बातचीत की उड़ती धूल में (2002) (2) बहुत नर्म चादर थी जल से बुनी (2004) (3) अभी जो तुमने कहा (4) नए शब्द सुनूंगा (कविता-संग्रह) (5) लौट चुकी बारिशें (2021) (6) सुनाई देती थी आवाज़(2023 ) (चयनित कविताएं) (7) धरती के वचन (कानजी पटेल की कविताओं का गुजराती से अनुवाद)
(1) साहित्य की रचना-प्रक्रिया(1995) (2) चली के जंगलों से पाब्लो नेरुदा का गद्य (2007) (3) जन बुद्धिजीवी एडवर्ड सईद का जीवन व रचना-संसार(2022) (4) कागज़ पर लिखी बातचीत (2023 ) (5) कुछ कवि कुछ किताबें (2023 ) (गद्य पुस्तकें) 
कविता में अपने विशिष्ट योगदान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित मंडलोई कविता-सम्मान 2008 आलोचना पुस्तक साहित्य की रचना-प्रक्रिया के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार (गुजरात, 1996) (सम्मान)
रेख्ता के हिंदवी प्लेटफार्म पर और कवियों की सूची में शामिल एक कवि । विभिन्न देशी-विदेशी भाषाओं मैं कविताओं के अनुवाद और कविताओं पर पोस्टर 
वडोदरा में रहते हैं ।

E mail : nareshchandrkar@gmail.com     
0986736618


सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।






Comments

  1. स्वप्निल श्रीवास्तव21 April 2026 at 07:13

    कुछ कवि कम लिखते हैं लेकिन अच्छा लिखते हैं
    नरेश जी की कविता आत्मकथाये. आँगन. बातचीत पसंद आयी. अद्भुत है रास्ते बुहारनेवालियां कविता.

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  2. चंद्रेश्वर21 April 2026 at 08:06

    प्रिय कवि मित्र नरेश चंद्रकर की कविताएं सन् 1980 के दशक से ही हिन्दी की स्तरीय पत्र - पत्रिकाओं में पढ़ता आ रहा हूं। अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में मैं वल्लभ विद्यानगर, गुजरात में था, रिसर्च के सिलसिले में। नरेश उन दिनों संभवतः बड़ौदा में आ गए थे। उनके कुछ कविता संग्रह भी पढ़ने को मिले हैं। वे लगातार कविताएं लिखते हुए भी समकालीन हिंदी कविता में अपनी वह जगह हासिल नहीं कर पाए हैं, जिसके वे हक़दार हैं। इसके लिए हिन्दी कवियों की खेमेबाजी मुख्य हैं। बहरहाल,वे जीवन के बदलते संदर्भ और संवेदनाओं को बहुत ही शांत और कुशल शिल्पी की तरह अपनी कविताओं में प्रस्तुत करते रहते हैं। वे अपने जिए गए यथार्थ को कविताओं में दुबारा प्रस्तुत करते हैं तो उनमें एक नयी चमक पैदा हो जाती है। वे अपनी कविताओं में 'मुखर वाग्मिता' से भरसक परहेज़ करने की कोशिश करते हैं। उनकी कविताओं में आए चरित्रों, रूपकों,बिम्बों और प्रतीकों को रोज़मर्रा के सामान्य जीवनानुभवों से ही लिया गया है। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए एक आत्मीय तरलता की अनुभूति होती है। वे अपने कवि बन जाते हैं। उनको हमारी शुभकामनाएं।

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  3. बहुत अच्छी कविताएं हैं। स्मृतियों में आवाजाही करती ये कविताएं पाठकों से सीधे संवाद करती हैं।नरेश जी को बहुत कम पढ़ा है लेकिन जब भी रू-ब-रू हुआ ,मन प्रसन्न हुआ।

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  4. मांघी लाल यादव21 April 2026 at 08:24

    प्रिय भाई सादर प्रणाम।
    आशा है आप सपरिवार स्वस्थ और प्रसन्न होंगे।
    आप कौशिकी के माध्यम से कविता के लिए एक महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। इसे जारी रखिएगा।
    नरेश चंद्रकर की अच्छी कविताओं का चयन आपने किया है।
    इन कविताओं में अदम्य जिजीविषा है जो सर्वथा उल्लेखनीय है।
    आप दोनों को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं।
    🙏🌸🙏

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  5. प्रभा मुजुमदार21 April 2026 at 09:16

    उत्कृष्ट।

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  6. अरुण कमल21 April 2026 at 10:18

    नरेश चंद्रकर की कविताओं के लिए आभार । नरेश विलक्षण कवि हैं ,प्रशांत पर भँवरों-उद्वेलनों से भरे।शुभ।

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  7. ब्रज श्रीवास्तव21 April 2026 at 11:30

    दधीचि, जीवन प्रमाण पत्र, इसीलिये गया था, बुहारने वालियाँ, बातचीत, अदभुत कविताएं हैं। नरेश जी सुगठित कविता लिखते हैं। विषय बिलकुल आसपास के और संश्लिष्ट भाषा के साथ हमें चमत्कृत करते हैं।

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  8. ख़ुदेजा ख़ान21 April 2026 at 12:28

    नरेश चंद्रकर जी की कविताएं स्व से गुज़रने का अवसर प्रदान करती हैं।
    स्वार्थपरता की दौड़,होड़ और भीड़ में "और मैं अपनी हड्डियां तो छोड़ो
    नाखून तक बचाता फिर रहा हूं" विघटित होते समाज का कटु सत्य है ये।
    एल्बम में रखी तमाम स्त्रियों की तस्वीरें आत्मकथाएं ही हैं जिन्हें बांचा जाए तो कहानी दर कहानी एक उपन्यास निकलकर सामने आ जाएगा।एक प्रचलित मुहावरा है -'बात करने से बात बनती है' बातचीत कविता इस सिलसिले का एक ठोस सूत्र प्रस्तुत करती है।
    "आंगन एक याद"
    जा चुकी
    एक पीढ़ी है आंगन
    इस पंक्ति में युग परिवर्तन का स्पष्ट चेहरा दिखाई देता है।
    "प्रेम" जो घोंसला बना ले धमनियों में
    प्रेम की शक्ति तथा प्रभाव की सशक्त मिसाल।

    अन्य कविताएं भी अपने कहन और अंदाज में प्रभावशाली हैं।इस तरह की कविताओं को पढ़ना, पाठक के दिन और समय दोनों को सार्थक कर देता है।

    ReplyDelete
  9. अनिता रश्मि21 April 2026 at 14:52

    👍👍
    बहुत अच्छी कविताएँ।

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  10. बोधिसत्व21 April 2026 at 17:45

    नरेश भाई हिन्दी के अनमोल कवि हैं! सड़क बुहारने वाली स्त्रियों पर ऐसी मारक कविता लिख पाना नरेश भाई ही संभव कर सकते हैं! आँगन वाली कविता भी बहुत अर्थपूर्ण है!

    इनको पढ़वाने के लिए कौशिकी का आभार! नरेश भाई को अच्छी कविताओं के लिए बधाई!

    सभी अनिवार्य कविताएँ हैं!

    ReplyDelete
  11. निरंजन श्रोत्रिय21 April 2026 at 19:32

    बढ़िया कविताएं

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  12. विजय राही21 April 2026 at 19:33

    सुंदर कविताएं। बहुत बधाई और शुभकामनाएँ नरेश जी को

    ReplyDelete
  13. अभिलाष दवे21 April 2026 at 19:34

    अतिसुन्दर।

    ReplyDelete
  14. अच्छी कविताएं

    ReplyDelete
  15. हरीश चंद्र पाण्डे22 April 2026 at 05:33

    जीवन प्रमाणपत्र हासिल करना आसान होगया है ,भले ही जीना कठिन।या प्रेम चिड़िया का धमनियों में घोंसला बनाना या रास्ता बुहारते वालियों की जीवन -जांगर वृत्ति।ये सब संवेदनशील दृष्टि की अभिव्यक्तियां हैं। नरेश चंद्रकर जी को बधाई व कौशिकी के प्रति आभार।

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  16. सीमा सिंह22 April 2026 at 07:18

    बहुत अच्छी कविताएँ
    आँगन एक याद ,जीवन प्रमाण पत्र , प्रेम सभी कविताएँ जीवन में स्मृतियों को साथ लिए चलती हैं । कवियों और कहानीकारों के नाम और उनके लिखे को इस तरह भी याद किया जा सकता ।
    कौशिकी को आभार 💐

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  17. राजा सिंह22 April 2026 at 07:48

    नरेश चन्द्रकर की कवितायें प्रभावित करती है.

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  18. कितनी सुंदर और अपनी सी लगती कविताएं हैं नरेश जी की। पूर्वजों की याद, आंगन की स्मृति, छूट गए शहर की बात, झाड़ू लगाती औरतों का ज़िक्र सब कुछ मन में दृश्य सरीखे उतरते जाते हैं। बहुत बधाई उन्हें।

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  19. लग रहा है जैसे कौशिकी और कवि मित्र शंकरानन्द ने मेरी इन कविताओं पर हैलोजन लाइट का प्रकाश किया हैं आज। इसके लिए प्रसन्न हूँ और
    कोशिकी के पाठकों और कविताओं पर अपने विचार साझा करने वाले प्रिय और वरिष्ठ कवि मित्रों के प्रति मैं हृदय से कृतज्ञ हूँ और हार्दिक धन्यवाद व्यक्त करता हूँ

    आभार

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  20. रामदुलारी शर्मा22 April 2026 at 11:24

    बहुत अच्छी कविताएं।

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  21. राजेश सक्सेना22 April 2026 at 11:59

    नरेश चंद्रकर जी की इन कविताओं में अतीत का गौरवभाव , स्मृतियों का अविरल प्रपात लगातार रूपांकित होकर बहता है, जबकि वर्तमान विदरूपताओं पर कवि की कविताओं में एक बैचेनी और असहाय होने की पीड़ा दिखाई देती है !
    एक तरफ दधिची की हड्डीयों का गौरव गान है,तो दूसरी तरफ स्मृतियों के आँगन का भावुक संवेदनापरक बोध है, रास्ते बुहारने वाली श्रमजीवी महिलाओ के प्रति कृतज्ञ भाव का प्रकटीकरण है !
    इन कविताओं में जीवन की जरूरी आवाजों के स्पन्दन के स्वर सुनाई देते हैं, नरेश चंद्राकर जी को बधाई एवं चयन, सम्पादन के लिए आपका आभार।

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  22. बहुत अच्छी कविताएं। कितनी कांव कांव है कविता के क्षेत्र में,उसके बरक्स एक कवि -गहरी टटकी भीतर तक पैठ जाने वाली कविताएं लिखता हुआ चुपचाप।

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  23. लीलाधर मंडलोई22 April 2026 at 17:32

    बंधुवर बधाई...
    कविताओं की तासीर जुदा है।एक कवि के भीतर सामाजिक सरोकार,द्वंद और विडंबना का चित्रलोक।

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  24. सेवाराम त्रिपाठी23 April 2026 at 22:29

    नरेश चंद्रकर की कविताओं का कैनवास

    -सेवाराम त्रिपाठी

    कविता लिखने वाले अनेक कवि हैं।कवियों के समूह में से किसी कवि की परछाइयां, आवाज़ ,स्वायत्तता और उनकी रचनात्मक भंगिमा से ही उसका वैशिष्ट्य तलाशा जा सकता है,हालांकि कभी - कभी संभ्रम भी होता है कि यह किसकी रचना है।नरेश चंद्रकर की दो कविताएं मेरी स्मृति में हैं।ये दोनों कविताएं प्रेम में पगी कविताएं हैं- पहली ‘ प्रेमिका के हाथ ‘ और दूसरी ‘ तुम उपस्थिति को अर्थ देती हो’।प्रेम पर अनेक कवियों ने लिखा है। अभी भी लिख रहे हैं और आगे भी लिखेंगे।लेकिन चंद्रकर जी ने अपनी प्रेमिका के हाथ को कोई कैसे अनुभव करता हैं। इसे दर्ज़ किया है और उसकी उपस्थिति को क्या अर्थ देता हैं. और उसे कैसे दर्ज़ करता है। इसी से उसका पता चलता है।उसी प्रकार उनकी एक कविता ‘ बंजारिन के हाथ से बने कपड़े के झोले ‘ है।उस पूरे परिदृश्य को वो कैसे अनुभव करते हैं- “चित्त भेदती यह कैसी दुष्कर कला /खरीदते हुए/ दिखें बार-बार झोले के साथ-साथ /कटी - फटी गहरे चीरे लगी /कलाकार की उंगलियाँ/” कोई बिना सूक्ष्म अवलोकन से यह संभव ही नहीं कर सकता।इसे पढ़ते हुए मुझे निराला की ‘ तोड़ती पत्थर ‘ कविता स्मरण आती रही।उसमें “श्याम तन ,भर बंधा यौवन /नत नयन प्रिय, कर्म - रत मन/गुरु हथौड़ा हाथ/ करती बार - बार प्रहार /सामने तरु - मालिका अट्टालिका /प्राकार/”

    फ़िलहाल कौशिकी में नरेश चन्द्रकर की कुछ कविताएं पढ़ रहा हूँ- जैसे - ऋषि दधीचि की तस्वीर से प्रेरित, आत्मकथाएं, बातचीत, मेरा वहाँ होना, आंगन एक याद, जीवन प्रमाणपत्र, प्रेम, इसलिए गया था और रास्ते बुहारनेवालियां।नरेश चंद्रकर कोई ताम- झाम नहीं रचते।उनकी कविताएं सपाट लग सकती हैं लेकिन उनमें जीवन की जद्दोजहद और विराट अन्वितियों का वैभव है।इनमें जीवन के छोटे - छोटे कोने हैं।इच्छाओं का कच्चापन, आधा अधूरापन लग सकता है लेकिन इनमें यथार्थ, सपनें और उम्मीदों का एक बड़ा संसार जीवंत है।आत्मकथाएं कविता का यह अंश - “ सही सोचा था कभी -/आत्मकथाएं बोलती हैं/ जीवन के बाद तक बोलती हैं/अधूरी और थकी रहकर भी/ बुलाती रहती हैं कई दिनों तक/”मलिका अमर शेख की आत्मकथा मैं बरबाद होना चाहती हूँ - पढ़कर पूरी की है।इस कविता ने दस्तक दी।उसी प्रकार बातचीत कविता का यह संसार देखें - “चुप क्यूं रहे कोई /मारी जाती है इससे ताक़त /चुप तो नहीं रहते- /जोर से गिरते हुए जलप्रपात/ बरसती हुई बारिश /पेड़ कहां चुप रहते हैं/ पत्तियां बोलती रहती हैं/ बक बक बक हवा से/”सोचिए हमारे समय में जो चुप्पी पसरी हुई है। आगे क्या होगा और वह कैसा रुख अख्तियार करेगी।’ मेरा वहाँ होना ‘ कविता का यह रूप देखें- “अब तो /कम ही लोग बचे हैं /कम ही हैं वे आवाज़ें /जो जानती हैं मैं वहाँ था।”जीवन प्रमाण पत्र कविता बहुत अर्थ गर्भी है। मसलन -”कहना भी नहीं पड़ता- /मैं जीवित हूँ /इस समय सबसे आसान है/ जीवन प्रमाणपत्र/ हो भले ही /जीना कठिन/”अंतिम कविता ‘ रास्ते बुहारनेवालियाँ ‘ बहुत मार्मिक और संवेदित करने वाली कविता है। जैसे” उनके धैर्य में बंधी हैं /दुनिया को घर जैसा बनाने की तरकीबें/वे सिर्फ़ कुछ नहीं है /हजार लाख करोड़ हैं /वे पृथ्वी को दुर्गंध से बचा सकती हैं/”
    इन कविताओं को पढ़ते हुए हम सहज और बिना गणित किए हुए लिखी जा रही कविताओं पर विश्वास कर सकते हैं। इनका आकर्षण मुझे प्रीतिकर लगा।
    000
    (23/4/2026)

    ReplyDelete
  25. मीरा गौतम26 April 2026 at 15:55

    हार्दिक बधाई कवि श्री को और आपका आभार, बहुत ख़ूबसूरत चयन है कविताओं का , सादर।

    ReplyDelete

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