मोहन कुमार डहेरिया की कविताएं
मोहन कुमार डहेरिया
राजनीति,मीडिया और धर्म ने मनुष्य को निर्मम तरीके से नियंत्रित और निर्देशित करना शुरू कर दिया है। यही कारण है कि अब नतीजों और निर्णयों को प्रभावित करना जटिल नहीं रह गया है। मोहन कुमार डहेरिया की कविताएं इस गणित को समझाती हैं कि कैसे सबकुछ धीरे धीरे हाथ से रेत की तरह फिसलता जा रहा है और हम बस अवाक् अकबकाया हुआ सब कुछ घटित होता हुआ देख रहे हैं।जिनकी भूमिका निर्णायक होनी थी वे अब मूकदर्शक बना दिए गए हैं।ये कविताएं एक बेचैन मन की मजबूत और स्पष्ट अभिव्यक्ति है।
मोहन कुमार डहेरिया की कविताएं
बेटी
बेटी नहीं
अब वह एक स्त्री है
एक समय था
पैर पटक-पटककर करती थी चीजों की मांग
मेरी अँगुली पकड़कर विद्यालय जाती
मुझे घोड़ा बनाकर कहती
भूख लगी है घास खा ले
नदी आ गई पानी पी ले
आ रहे राजा के सिपाही पकड़ने
भाग, तेज भाग कड़बस----कड़बस---
तो कभी खुद को महारानी समझ
पैरों को उठाकर सलाम करने को कहती
अच्छी अदाकारी पर
कागज या पत्तों के नोटों का पुरस्कार देती
झुककर गुलाम सा जब लेता यह
खिलखिलाकर हँस पड़ती
जाहिर है एक फूल की श्रेष्ठ अभिनय कला पर
यह एक तितली का ठहाका था
लगता था तब इसी तितली के सहारे
आसानी से पार कर लूँगा मैं
अपने बुढ़ापे के सारे ख़ौफ़नाक जंगल
बह चुका उसके बाद
जीवन की नदी में बहुत सारा पानी
आती है अब वह
विवाह के बाद जब भी तीज-त्यौहारों में घर
कम बात करती है
शब्द होते वेहद चौकन्ने
भाषा साँप की चाल सी घुमावदार
वार्तालाप के बीच दूरदर्शी रहस्मय चुप्पियाँ
बीच-बीच में मुझे छेदती ऐसी नजर
कि अजीब सी थर्राहट से भर जाता शरीर
दुस्वप्नों से लिथड़ जाती रातों में नींद
किसी दुःस्वप्न में देखता
तराजू के दो पलड़ों में बदल गई उसकी आँखें
करती हुई मुझे तौलने की कोशिश
किसी में लगता
धारण कर चुकी उसकी तोते की चोंच जैसी नाक
किसी बनैले जानवर के नथुने का रूप
वेशक बेटियों के बारे में
प्रचलित हैं ढेरों आदर्शवादी खुशनुमा कथन
कि बेटी पिता के आँगन की फुलवारी होती है
कहा जाता
दो परिवारों को ईश्वर का साझा उपहार भी उसे
बेटी नहीं लेकिन अब वह
एक गणितज्ञ है
जीवन के समीकरणों की एक विशेषज्ञ गणितज्ञ।
भीड़
यह एक भीड़ है
मनुष्यों की
कुछ भी कर सकती है
घटिया सिनेमा, फूहड़ टीवी धारावाहिकों को
अटाटूट लोकप्रियता दिला सकती है
हत्यारों को महान राजनेता बना सकती है
राह भटक गए
एक अर्धविक्षिप्त को मुसलमान समझ
मार-मारकर भुर्ता बना सकती है
चुनाव में खड़े होने पर वर्षों बिना अन्न खाए
निरंकुश, बलात्कारी सेना से लड़ने वाली
योद्धा स्त्री की जमानत जब्त करवा सकती है
नदी में गड़े एक धार्मिक झंडे को पाने के लिए
लोक परंपरा का हवाला दे
पत्थरों से एक-दूसरे का सिर फोड़ने में भी इसे दिक्क़त नहीं होती
नई नहीं है यह भीड़
सदियों पहले से
सभी मुल्कों में रहा है इसका वजूद
हमारे देश में पीछा करती थी यह
पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले का
फेंकती उस पर पत्थर, कीचड़ तथा गोबर
कि ज्ञान देने का हक नहीं अछूत को
कर रहा था जब इटली में ब्रूनो
चर्च की दकियानूसी धारणाओं के ख़िलाफ़ वैज्ञानिक मान्यताओं की किताब छपवाने
की कोशिश
छला था इसी भीड़ के एक सदस्य ने
उसे प्रकाशक के वेष में
जिंदा जलाया फिर उसे सबने बीच चौराहे पर
आँखें नहीं होती इस भीड़ की
न मस्तिष्क, न आत्मा
गौरवशाली विरासत नहीं इसके पास
न संवाद की विवेकवान भाषा
तर्क, लोकतंत्र तथा नैतिकता से नहीं इसका सम्बंध
कौन है यह, कहाँ से आई, कहाँ जाएगी
नहीं जानती खुद भी
देखा नहीं गया कभी इसे
हाथ आये दुश्मन के साथ
न्यूनतम करुणा से पेश आते
एकांत में अपने पाप को यादकर फफककर रोते
प्रायश्चित के मूसल से कुचलकर
निखरता है मनुष्य और ज्यादा
नहीं करती ऐसी चीजों में यह विश्वास
यह एक भीड़ है
मनुष्यों के रूप में भेड़ों का झुंड
जिसे राजनेता,धर्मगुरु और मीडिया के एंकर
खुद को चरवाहा बता
चारागाह की जगह बड़ी आसानी से
शेरों की मांद तक पहुँचा देते हैं।
रोना
रो रहा है बीच नदी में असहाय सा
अपनी नाव में घुसते पानी को देखकर
बिलख-बिलखकर एक मल्लाह
कभी-कभी इतने शातिर तरीके से
किए जाते हैं नाव में छेद मरम्मत के बहाने तोड़ी दी जाती पतवारें
कि पता ही नहीं चल पाता देर तक
लोकगीत गाने में मग्न
नाव खेते मल्लाह को कुछ भी
ऐसे में सिर झुकाकर
यात्रियों के प्रहारों को झेलने के अलावा
कोई और चारा नहीं होता उसके पास
परंतु ध्यान रखना
सौजन्य के वेषभूषा में आने वाली धूर्तताओं
मौन की आड़ में छिपने वाले अट्ठाहासों
षडयंत्रों से ही नहीं जीते जाते युद्ध
मनुष्य के आँसू नहीं होते हमेशा हार का प्रतीक
कभी-कभी कोई मार्मिक विलाप भी
वेहद कारगर होता है
किसी यात्रा को पूरा करने के लिए।
मित्र से क्षमा याचना
माफ करना दोस्त
मैं तुमसे कभी न मिल पाऊँगा
अभी-अभी देखा है मैंने तुम्हें
दंगे में मारे गए लोगों, जले हुए घरों को
पर्यटनीय नजरों से देखते हुए
अब न पुकारूँगा
तुम्हारा नाम शरारत से बिगाड़कर
न घूरूँगा रम के पेग के छोटे-बड़े हो जाने पर
न लगाएंगे हम एक-दूसरे की पीठ पर
मन की गाँठों को खोल देने वाले घूँसे
कोई कितना भी झकझोरे
नहीं फूटेंगी मित्रता के ठूँठ में संवाद की कोंपलें
अभी-देखा है मैंने तुम्हें
हाथों की ऊँगलियों में
अपनी आत्मा को हीरे की अँगूठी सा पहनते हुए
यह सच है
रूठना-मनाना मित्रता की दो शैलियाँ हैं
जगज़ाहिर है
कवि विष्णु खरे और चंद्रकांत देवताले का अबोला
न दिखाऊँगा पर तुम्हें
तकलीफों के कोलतार में झुलसे अपने पैरों के तलुए
न साझा करोगे तुम मुझसे
तुम्हारी पीठ पर
विस्फोटक पदार्थ सा बंधा
बेटियों की शादी का बोझ
संभव नहीं हमारा साथ-साथ चलना
अभी-अभी देखा है मैंने तुम्हें
धूर्त भाषाविद के रूप में
एक विलुप्त होती लोक भाषा से लिपटकर
अमरबेल सा खून चूसते हुए
याद न होगा तुम्हें
रेलगाड़ियों, ट्रकों में हमारा कविता पोस्टर चिपकाना
प्रेम और करुणा की फसल की
जंगली जानवरों से रात-रात भर रक्षा करना
तुम गोफन थे, मैं उसमें बंधा पत्थर
तुम जनगीत थे, मैं कंठ
अब तुम नारे लगाओगे तो मैं मुट्ठी नहीं तान पाऊँगा
गाओगे जनगीत, ढपली नहीं बजाऊँगा
संभव नहीं तुमसे दुश्मनी का भी रिश्ता
अभी-अभी देखा है मैंने तुम्हें
मनुष्यता की नाव को
दीमक लगी पतवारों से खेते हुए।
खुद के लिए कुछ संकल्प
तय कर लिया है मैंने
जो कुछ भी है मुझमें
होना चाहिए अब सब कुछ
वेहद सुस्पष्ट, एकअर्थी और असरदार
करूँ जब वार्तालाप किसी
धूर्त पूंजीपति या सांप्रदायिक राजनेता से
धनुष के कमान पर चढ़े तीर सी हो मेरी भाषा
शब्दों को भी नहीं होना चाहिए
सौजन्य की तशतरी में
सौप-इलायची सा पेश किये जाते सा
सांत्वना दूँ त्रासदी में दुखीयारे को
तरल संवाद हो यह
एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य से
बहेलिए के चुग्गे सा न हो
उस समय मेरी करुणा
करूँ किसी जनसंगठन का नेतृत्व
आलाकमान न कहलाऊँ
अन्य कार्यकर्ताओं जैसे ही हो मेरे पैर
चरण कमल न कहे उन्हें कोई
वेहद घातक हो सकती है
शीशे सा इतना पारदर्शी होने की मेरी जिद
खुद मेरा परिवार समझ सकता हैं मुझे
हिरणों के बीच घुस आया भेड़िया
मित्रों से मिलने जाने पर संभव है
वे अपने घर का दरवाजा ही मेरे मुँह पर दे मारें
अब जो चाहे हो अंजाम
संकल्प लिया है मैंने मारूंगा अगर
मनुष्यता के किसी शोषक को मुक्का
निकलना ही चाहिए उसके नाक-मुँह से खून
स्पष्ट है, मेरा मुक्का
हाड़-मांस वाले मनुष्य का मुक्का होगा
घास-फूस से बने
किसी बिजुका का नहीं।
बाल प्रवचनकर्ता
रोको
बाल प्रवचनकर्ताओं को
प्रवचन देने से रोको
बंद करो इनका
फूलमालाओं से स्वागत , दंडवत प्रणाम,
पूजा अर्चना करना
सम्मोहित होने की जरूरत नहीं
प्राचीन धर्मग्रंथों के इनके विराट ज्ञान पर
बचो, इनकी प्रशंसा के समुद्र में डूबने से
जिस उम्र में हैं ये और जैसी है
इनके आसपास के बच्चों की दुनिया
ठीक नहीं इनका ऐसा होना
जानने दो इन्हें
कैसे काम करते हैं कम्प्यूटर, ड्रोन
कैसे खेली जाती है -
फुटबाल, क्रिकेट, छुपा छुपाई, कब्बडी
मारने दो एक-दूसरे को धक्का-मुक्की
स्वाभाविक नहीं इनके वस्त्रों में
इतनी भीषण उज्ज्वलता
धरती पर गिरकर
लगने दो कपड़ों में दाग-धब्बे
पतंग भी इन्हें उड़ाना चाहिए
और काटे जब ये दूसरे बच्चों की पतंग
तिनके सा जरूर उड़े
उल्लास और गर्व के आंधी-तूफान में
मत हैरत से देखो इन्हें
तीनों लोकों के ज्ञाता होने पर
व्यर्थ है संस्कृत के श्लोकों को इनके मुँह से
धाराप्रवाह निकलते देख तालियाँ बजाना
संदेह होना ही चाहिए बच्चों की
किसी भी भाषा पर इतनी तेज घुड़सवारी पर
वैसे भी प्रवचन हो या कविता पाठ
बोलते-बोलते बच्चों का बीच में अटक जाना
मासूमियत से यहाँ-वहाँ असहाय ताकना
उसकी सच्ची खूबसूरती है, मनुष्य होना भी अक्षमता नहीं
सोचो, ध्यान से सोचो
किसी बच्चे के सिर पर जटाएँ अच्छी लगती हैं
या मक्खन से मुलायम लहराते बाल ?
लोककल्याण की चिंता में डूबी उनकी गतिविहीन पत्थरनुमा आँखों को सुंदर कहा जाएगा
या तितलियों सी इधर-उधर मंडराती
वे लगेंगी ज्यादा खूबसूरत
इस बात पर भी ध्यान जाए
कड़कड़ाती ठंड में
बच्चों का अत्यंत अल्प वस्त्रों में प्रवचन देना
शारीरिक इन्द्रियों पर उनकी विजय है
या कोई मनोवैज्ञानिक विकृति ?
अब इससे पहले कि
इन प्रवचनकर्ताओं को पूरी तरह लगने लगे
दुनियावी मक्कड़जाल की तरह
अपने आत्मीय जन,
सारे शिक्षा संस्थान, खेल मैदान, पुस्तकालय
या वे हमेशा के लिए मान लें एक खास किस्म के
मजहवी लिबास के पिंजड़े में रहना
जन्नत की ओर उड़ान की तैयारी है
रोको ,
दुनिया के सारे बाल प्रवचनकर्ताओं को
बालक हो या बालिकाएँ,
ऐसे सारे मक्कड़जालों में कीड़ों सा फंसने,
सारी उन्मादी उड़ानों में
मूर्ख परिंदों सा शामिल होने से
हर हालत में रोको।
उनके बारे में एक जरूरी कथन
एक ही नजरिये से
उन्हें हमेशा नहीं देखा जाना चाहिए
चोट लगने पर
उनके भी जख्मों से बहता था खून
युद्ध में परास्त होने पर
भागकर भटकते जंगल-जंगल
माँगते खौफ के कंबल में खुद को छिपाकर
गाँव वालों से खाद्य सामग्री
हमेशा दूसरों के बच्चों के ही नहीं काटे उन्होंने सिर
तशतरी में पेश किए जाते रहे
उनके पिताओं के आगे
उनके खुद के भी कटे हुए सिर
कई बार अट्ठाहास करते सैनिकों की
कतारों के बीच से गुजरकर
सौंपना होता था विजेता को उन्हें भी
अपनी खूबसूरत पत्नी या बहन को
भले ही हो वह उनके ही धर्म का
औलाद की चाह किसे नहीं होती
लिहाजा जाते थे वे भी माथा टेकने
दुर्गम पहाड़ों, तपते रेगिस्तानों को पार कर
मजारों और ऋषियों के पास
तलवारों के दम पर
प्रेम उनसे भी नियंत्रित नहीं हो पाया
रतिक्रिया का शिखर आने के पहले ही
धोखा दे जाती थी कभी-कभार
उनकी भी यौन क्षमताएँ
सुबह निकलते
नजरें झुकाए आलीशान कमरे से बाहर
दिन भर महसूस होता
झड़ ही नहीं पा रही उनकी पीठ में धंसी
हिजड़े पहरेदारों की काँचनुमा हँसी की किरचें
उनके बारे में यह कहा जाना
कि प्यास लगने पर
जिंदा घोड़े के जिस्म की नसों में
दाँतों को धंसाकर
पी जाते थे उसका सारा खून
एक बर्बर अतिश्योक्ति है
हैं जैसे आज हम सब
तरह-तरह के गुणों-दुर्गुणों से भरे
वे भी थे
स्पष्ट है, उन्हें सिर्फ आक्रांता सा नहीं
एक आम मनुष्य की तरह देखा जाना चाहिए।
पुरस्कार
पुरस्कार,
आते ही हो तुम लोगों की जिंदगी में
शायद कभी मेरे जीवन में भी आओ
बहुत सोच-समझकर लेकिन आना
जब मेरे जीवन में हो आमद
किसी मदारी के आज्ञाकारी बंदर सी
कृतिम न हो तुम्हारी चाल
तुम्हारा खुद का खुद्दार शिल्प होना चाहिए
मेरे पक्ष में तुम्हारी अनुशंसा भी न हो
सर्वोच्च न्यायालय के
मुख्य न्यायाधीश के अंतिम फैसले सी
यानी बचा रहे उसके खिलाफ
कहीं न कहीं अपील करने का अवसर
जब दिया जाएगा तुम्हें मुझे
तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज सकता है हॉल
पर ध्यान रखना
सुनाई न दे मुझे वह गड़गड़ाहट
किसी मनुष्य, नदी या पहाड़ के शोकगीत की
तरह
और हाँ, कार्यक्रम में
किसी महामहिम को मत बुला लेना
सरकारी प्रोटोकॉल का मैं नहीं आदी
रटे रटाए वाक्य,
मंच पर चढ़ने-उतरने की रिहर्सल
लाल कपड़े सी हैं मेरे लिए
कर सकता हूँ देख जिन्हें
सांड की तरह तत्काल चिंदी-चिंदी
आते ही हो लोगो के जीवन में
शायद कभी मेरे जीवन में भी आओ
लेकिन सावधान
मैं एक दो धारी तलवार हूँ
जिस तरफ से भी करोगे सम्मानित
हमेशा जोखिम बना रहेगा तुम्हारे लिए।
मौत से एक वार्तालाप
धन्यवाद मौत
मेरे दोस्त को ऐसे ले जाने के लिए
वाह ! क्या अदभुत था तुम्हारा हुनर
एकाग्रता भी ऐसी विलक्षण
कि चूस डाला उसके जीवन रूपी फूल का पूरा रस
पर टूटी नहीं एक भी पंखुड़ी
न नष्ट हुए रंग, सुगंध
कायम रही फूल की मर्यादा
पहली बार लगा मुझे
मधुमक्खी भी हो सकती है मौत
यह तो बताओ
कैसे हो गई इतनी शालीन, करूणावान
क्या अहसास था तुम्हें
कपड़ों के गट्ठों से लदी साइकिल चलाते-चलाते
चूर-चूर हो चुके थे मेरे दोस्त के घुटने
नहीं मिलता था
उन पर भिलमा गर्म कर लगाने से भी आराम
दिन भर फेरी लगाने के बाद
बोहनी तक नहीं होती थी उसकी कई बार
घिर जाता तब आशंकाओं में
कि कट तो नहीं जाएगा
स्कूल से उसके बच्चों का नाम
मर तो नहीं जाएँगे भूख से तड़प-तड़पकर
कभी-कभी तो ऐसा भी होता था
किसी के भी विवाह में वह
शामिल हो जाता मात्र लुंगी बनियान पहनकर
जानता हो मानो
बदल चुका हो जब पूरा शरीर ही घाव में
तो उसे अब क्या ढंग के कपड़े पहनाना
मैं बहुत शुक्रगुजार हूँ तुम्हारा
अपने पैरों के पंजों को गद्दीदार बनाने
बेआवाज़ चलकर आने के लिए
अन्यथा तुम्हें सामने पाकर
क्या-क्या नहीं झेलते लोग
छेद डालता किसी को सूखी खाँसी का भाला
दिन-रात दहकती
किसी के माथे पर रखी ठंडे पानी की पट्टियाँ
छटपटाता कोई अधकटे गले वाले बकरे सा
बीमारी के बूचड़खाने में वर्षों
ओ मौत
मेरी डालों ने भी तो ताउम्र किया
एक से एक विकट आँधियों का सामना
जीर्ण-शीर्ण होते रहे मेरे पत्ते
पर कोताही नहीं की थके-मांदे,
पसीने में तर-बतर लोगों को छाँव देने में
लिहाजा आए जब मेरा भी वक्त
ध्यान रखना
जिस तरह बदला तुमने मेरे दोस्त के लिए
अपनी आमद का मुहावरा
कुछ वैसा ही करना मेरे भी लिए।
मोहन कुमार डहेरिया
जन्म: 01.07.1958, बड़कुही, जिला - छिंदवाड़ा , मध्यप्रदेश
प्रकाशन: कहाँ होगी हमारी जगह, उनका बोलना, न लौटे कोई इस तरह, इस घर में रहना एक कला है, चरण कमलों के दौर में (कविता-संग्रह)। मराठी, उड़िया तथा नेपाली में कविताओं के अनुवाद। कभी-कभार कहानी तथा समीक्षा लेखन भी। ' कहाँ होगी हमारी जगह ' कविता-संग्रह पर बरकत उल्लाह विश्वविद्यालय ,भोपाल के अंतर्गत एक छात्रा द्वारा लघु शोध प्रबंध। कविता गुजरात विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल।
सम्मान: सुदीप बनर्जी, शशिन यादव सम्मान
सम्प्रति: सरकारी नौकरी से सेवा निवृत
नई पहाड़े कॉलोनी , महाराजा टैंट हाऊस के पास , गुलाबरा , छिंदवाड़ा , जिला - छिंदवाड़ा 480001 मप्र
मोबाइल- 6268539927
ईमेल- mohankumardeheria@gmail.com
सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।






डहेरिया जी की कविताएँ बहुत अच्छी हैं। वह अच्छों में भी अच्छे कवि हैं। सलाम और शुक्रिया!
ReplyDeleteमोहन डहेरिया मेरे प्रिय कवियों में से हैं। इन साहसिक, सारगर्भित कविताओं के लिए बधाई।
ReplyDeleteमेरे बहुत पुराने साथी जिनसे मेरी अक्सर बात चीत होती है निश्चित रूप से उनकी कविताएं जबरदस्त हैं।
ReplyDeleteगहरे और साफ अर्थों से भरी मोहन कुमार डहेरिया की कविताएं कभी तो भावनाओं की झड़ी से नहला देती हैं, कभी संवेदनहीनता के रेगिस्तान में खड़ा कर देती हैं। कभी दिली रिश्तों की ठोस ज़मीन पर खड़ा कर देती हैं, कभी दरक चुके बेहद क़रीबी संबंधों से मिले आघात का सामना करा देती हैं। डहेरिया इंगित करते हैं कि सादगी और ईमान भरा जीवन उस भले मल्लाह की तरह होता है जो खुद की नाव पर सुरक्षित सवारियों की घात का शिकार होता है। लोभ-लाभ में पड़े लोग उस भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं जिन्हें शातिर तंत्र भेड़ों की तरह हांक ले जाता है, अपने क्रूर यज्ञ की समिधा बना डालता है। बचपन को बेचने, नौनिहालों को जमूरे की तरह नचाने के खेल से चिंतित मोहन कुमार डहेरिया दिमाग़ी मकड़जाल से देश का भविष्य बचाने की अपील करते हैं। ग़लत के प्रतिकार और उचित के पक्षपोषण के लिए अपने लिए संकल्प लेने की जरूरत पर ज़ोर देते हैं। 'बेटी' की बानगी जरूर चौंकाती है। लेकिन आघात यदि अनुभवजन्य हो तो मोहन कुमार डहेरिया के शब्दों में ही कहा जा सकता है, 'एक ही नजरिये से/उन्हें हमेशा नहीं देखा जाना चाहिए'
ReplyDeleteमोहन कुमार डहेरिया की ये कविताएँ हमारे समय की बेचैनी, विडंबना और मनुष्यता के लगातार क्षरण का ऐसा सघन दस्तावेज हैं, जहाँ प्रतिरोध और करुणा एक-दूसरे के समानांतर चलते हैं। ‘बेटी’ में आत्मीय रिश्ते का बदलता गणित, ‘भीड़’ में विवेकहीन सामूहिकता का भयावह चेहरा, ‘रोना’ में छल के विरुद्ध आँसू की नैतिक शक्ति, ‘मित्र से क्षमा याचना’ में टूटती मित्रता के भीतर बची मनुष्यता और ‘बाल प्रवचनकर्ता’ में बचपन को विचारधारात्मक साँचे में ढालने के विरुद्ध बेहद जरूरी हस्तक्षेप—ये कविताएँ पाठक को केवल विचलित नहीं करतीं, उसे अपने समय और अपने भीतर झाँकने के लिए बाध्य करती हैं। ‘पुरस्कार’ में सम्मान की संस्थागत चमक के प्रति संशय और ‘मौत से एक वार्तालाप’ में मृत्यु को भी करुणा और गरिमा के मुहावरे में देख पाने की दृष्टि डहेरिया की काव्य-संवेदना की व्यापकता बताती है। उनकी भाषा सीधे वार करती है, लेकिन वह केवल आक्रोश की भाषा नहीं; उसके भीतर गहरी मानवीय करुणा, आत्मालोचन और नैतिक बेचैनी है। यही कारण है कि इन कविताओं को पढ़ना महज कविता पढ़ना नहीं, अपने समय के अँधेरे में मनुष्यता की बची हुई रोशनी को पहचानना है।
ReplyDeleteकविताएं बहुत अच्छी है।अभिनंदन!
ReplyDeleteबधाई ।
ReplyDeleteअच्छी कविताएं। बधाई।
ReplyDeleteमोहन कुमार डहेरिया जी की ये कविताएँ विषय और संवेदनाओं का एक महत्वपूर्ण द्वार खोलती नज़र आईं मुझे। जैसे इस कवितांश को पढ़कर अभिव्यक्ति का समग्र अंदाज़ क्या होता है, यह मुझे समझने को मिला—
ReplyDelete“बेटी नहीं, लेकिन अब वह
एक गणितज्ञ है,
जीवन के समीकरणों की एक विशेषज्ञ गणितज्ञ।”
‘बेटी’ कविता बेटी की भावनाओं को तेज करती हुई कविता लगी मुझे। इसी तरह ‘भीड़ की ताक़त’ को देखने के भाव से उपजी कविता भी संवेदनाओं की नमी से लबरेज़ लगी। मोहन डहेरिया जी की प्रत्येक कविता—चाहे वह ‘मित्र से क्षमा याचना’, ‘रोना’ हो अथवा ‘मित्र से क्षमा याचना’—इनमें समय की गूँज कविता का विषय बनकर आई है और मोहन डहेरिया की दृष्टि कविताओं में एक अद्भुत संसार रचती है। जैसे इन पंक्तियों को पढ़कर चकित हुआ—
माफ करना दोस्त
मैं तुमसे कभी न मिल पाऊँगा
अभी-अभी देखा है मैंने तुम्हें
दंगे में मारे गए लोगों, जले हुए घरों को
पर्यटनीय नजरों से देखते हुए.....
‘पुरस्कार’ शीर्षक कविता अथवा ‘बाल प्रवचनकर्ता’ कविता ऐसी रचनाएँ लगीं, जो विषय में अनूठी हैं और साथ ही रचनात्मक संवेदनाओं से परिपूर्ण भी हैं।
कविताएँ पढ़कर बहुत समृद्ध हुआ।
अभिनंदन कवि मोहन कुमार डहेरिया 🌷
मोहन कुमार डहेरिया की कविताएं पहले भी पढ़ी हैं। शब्दों को मोतियों सा पिरोने का उनका हुनर प्रशंसनीय है। बहुत सुंदर कविताएं। कवि को हार्दिक बधाई।
ReplyDeleteडहेरिया जी की कविता बहुत दिनों बाद पढ़ी. उन्हें बधाई।
ReplyDeleteयह अच्छा है कि आप उन कवियों को भीं प्रकाशित कर रहे हैं जो दृश्य से ओझल हो रहे हैं
मोहन डहेरिया जी हमारे समय के बेहतरीन कवि हैं। यहाँ प्रस्तुत कविताएं इस बात की ताकीद करती हैं।
ReplyDeleteये कविताएँ अपने आशय में गहन और बहुपरत हैं। इनमें अनुभूति , विचार और संवेदना आपस में बखूबी गुँथे हुए हैं। समय के कई कोण हम यहाँ देख सकते हैं।
यूं तो सारी कविताएँ ही बहुत अच्छी हैं - पर ' मित्र से क्षमायाचना ' अदभुत है। भीतर तक मर्माहत कर गई।
मोहन डहेरिया जी को बहुत सारी शुभकामनाएं और बधाई।