विनय सौरभ की कविताएं
विनय सौरभ
बाजार की चमक और अंधाधुंध विकास के बीच संबंधों की छीजती ऊष्मा ने मनुष्य को बिल्कुल अकेला और असहाय बना दिया है।ये और बात है कि इसका एहसास करने की भी फुर्सत किसी के पास नहीं है। विनय सौरभ की कविताएं इस एहसास को मजबूत करने वाली हैं। इनमें अपनी जड़ों से टूटने का दुःख है तो रिश्तों को बचाए रखने की विकलता भी है। मनुष्य और उसके जीवन से जुड़ी हुई जिन जिन चीजों को बहुत चालाक तरीके से नष्ट किया जा रहा है, उनकी बहुत मार्मिक उपस्थिति विनय सौरभ की कविताओं की विशेषता है।
विनय सौरभ की कविताएं
घर
मैं चलता हूँ
या अब मुझे चलना चाहिए
कहता हुआ आता हूँ
घर के दरवाज़े पर
फ़िर कब आ पाऊँगा
या फ़िर मुझे जल्दी आ जाना चाहिए
मेरा झोला ठीक करते हुए
माँ कहती थी, जब वह थी
और दरवाज़े से आँख भर मेरा जाना देखती थी
इस तरह से अपनी नौकरी पर जाने को निकलता हूँ घर से और थोड़ा घर पर ही छूट जाता हूँ
रूलाई बाहर आने से रोकता हूँ
बड़े भाई को कहता हूँ -
फलाँ काम देख लीजिएगा
मौसी के यहाँ चले जाइएगा, सुना है बीमार है
अब वही तो एक बहन बची है माँ की !
याद है गुड़ के अरसे कितना
भेजा करती थी हमारे लिए !
चाहता हूँ बस छूट ही जाए !
कोई छूटी चीज़ याद आ जाए
और भागूँ घर के अंदर
अभिनय करूँ भीतर आते हुए
कि कमरे की खिड़की
शायद खुली तो नहीं रह गयी !
शहर के किराये के घर की चाबी तो
नहीं भूल आया ताखे पर !
जब तक शहर के लिए बस आ नहीं जाती
नज़र बचाकर देखता रहता हूँ घर को।
अपने ही स्टेशन से गुजरना
एक रोज यात्री बनकर गुजरते हो
अपने ही गाँव के स्टेशन से
एक उदासी भीतर फैल जाती है अचानक
खिड़की से बाहर तलाशते हो
कोई चेहरा परिचित दिख जाए!
नये बच्चे दिखते हैं
जिनके बारे में बस एक अनुमान से
भर जाते हो कि ये किस टोले के होंगे!
संताल आदिवासी और दूसरे ग्रामीण
जो धीरे -धीरे रेल के साघारण डिब्बों में
यात्रायें करते हुए अब सहज दिखने लगे हैं
स्टेशन के बनने की शुरूआत के दृश्य
पीछा कर रहे हैं
यहाँ आयी पहली रेल की याद
पुतलियों में बसी है
याद है लोगों का ड्राइवर और गार्ड साहब को
हर्षातिरेक से कंधे पर उठाना
उन्हें माला पहिनाना, मिठाइयाँ खिलाना
उनके हाथों को चूमना, उनके गले लगना
कैसे अविस्मरणीय उत्सव में
बदल गया था वह दिन!
दूर- दराज के इलाके़ से चलकर
लोगों का वह पहली रेल देखने आना
खुली आंखों से उनके
एक सपने का जैसे पूरा होते देखना था
रेल को छूकर गवाह बनने की हसरत कि हाँ, वे भी इस तारीख़ का हिस्सा हैं!
दुमका जाते हुए पीछे छूटते जाते थे
पहाड़, ताड़ और पलाश के असंख्य पेड़
और नदियाँ
और रेल में बैठे लोग उस रोज ऐसे पुलकित थे
जैसे जीवन में पहली बार उन्हें देख रहे हों!
वे ही !
सोचा मिलकर ही कह देंगे कि नहीं आ सके
आपके बेटे के ब्याह में
सारी तैयारी कर रखी थी
पर ऐन वक़्त पर आना मुल्तवी करना पड़ा
फलाना काम आ पड़ा, कोई चारा नहीं था !
जब खगेंद्र ठाकुर मरे पटना में
प्रेम प्रभाकर भागलपुर में
रामनिहाल गुंजन आरा में
उनके अंतिम दर्शन करने आख़िरकार जा ही सकता था
यह ख़्याल आता है अक्सर देर रात गये
या आधी नींद के बीच
जैसे कोई पत्थर आज भी सीने में लुढ़कता रहता है आत्मग्लानि का भार लिए !
कभी धूप बहुत तेज़ होती है
कभी जाड़ा ही आ धमकता है
कभी बारिश और हवा इतनी तेज कि छाता संभाले नहीं संभलता !
इस तरह से कई ज़रूरी मौकों पर जाना टलता रहा !
अब सोचता हूं तो वह सारे बहाने ही थे !
दुश्वारियों से बचने के लिए थोथे कुतर्क थे बस !
अपने कवि होने की मानी पर
शर्मिंदा होता हूं चुपचाप!
ये वही लोग थे जो फ़ोन कर लेते थे कभी भी
और कहते थे-
बस ऐसे ही फोन कर लिया विनय!
बहुत दिनों से तुम्हारा कोई समाचार नहीं मिला था
तुम्हारे पैर का दर्द अब कैसा है?
घर का क्या समाचार है ?
तुम्हारे भाई अब कैसे हैं?
जो जेठ की तपती दोपहरी में
किसी शव यात्रा में शामिल होते हैं
और जरूरत पड़ने पर आँधी- पानी में भी
जानकारी मिलते ही
किसी तरह पहुंच जाते हैं अस्पताल
- वे कौन हैं ?
दुनिया में इन्हीं लोगों ने बचा रखा है
मनुष्यता पर भरोसा
रिश्तों के अर्थ बस इनसे ही बचे हैं
वे सच्चे हितैषी और नागरिक हैं हमारे बीच के
बस वे शब्दों की कारीगरी नहीं जानते !
वे सही समय पर पहुंचते हैं
जहाँ पहुँचना होता है
बदहवास से पसीने से भरा
रूखा चेहरा लिए और अस्त - व्यस्त !
यह कहते हुए कि-
अभी पता चला भाई साहब
और सीधा चला आ रहा हूं ....।
भागलपुर
मूंग के मसालेदार पापड़ इन्हीं तंग गलियों में तैयार होते थे और दूसरे छोटे शहरों - गाँवों में राजस्थानी बीकानेरी के नाम से बिकते थे
सालों बाद एक दिन लौटना होता है
सम्मोहन से भरे इस शहर की उन गलियों में
जब एक लॉज के अपने कमरे की स्मृति और उन पापड़ों के बनने की याद पीछा करती है
पाता हूँ कि वे गलियां अब और तंग दिखने लगी हैं
घर चारदीवारी की जद में घुटते हुए और अपरिचित!
आसपास की ख़ाली ज़मीन पर गोभी की खेती होती थी और जूट के बोरों पर पापड़ सूखते हुए मिलते थे
उन स्मृति चिह्नों की पहचान गड़मड होती जाती है और इतने नए मकान कि दहशत होती है कि सही जगह पर खड़ा हूँ भी या नहीं !
एक सहपाठी का घर था गली के छोर पर
अब वहां कोई और रहता था
एक धोबी मस्जिद गली की नालियों के ऊपर कपड़ों पर इस्तरी लगाता था
अब वहाँ एक चमकता हुआ रेस्टोरेंट था
जिसके दरवाजे शीशे के थे और भीतर नये बच्चों का शोर था
रात नौ से बारह का सिनेमा देख कर लौटते हुए
इस ख़्याल से भरे होते थे कि
इस शहर के बिना जीवन कैसा होगा!
बरसों बाद इस शहर का कोई मिलता है तो उमग कर उसका नंबर ज़ल्दी से नोट कर लेते हैं और अतीत को लेकर नाॅस्टेल्जिक हुए जाते हैं!
एक फ़ोन कॉल की दूरी पर अतीत के किस्से मिलेंगे
यह जानते हुए भी कोई किसी को फ़ोन नहीं करता
पापड़ किसी मशीन पर तैयार होने लगते हैं
उनको बेलती- सुखाती स्त्रियों की एक याद भर रह जाती है
लॉज में रहने वाले लड़कों का कोई पता नहीं मिलता
दो भव्य सिनेमाघरों की जगह नये अपार्टमेंट मिलते हैं और हम भौंचक रह जाते हैं
हम भी कभी इसी स्मार्ट बनते शहर का हिस्सा थे
यह सोचते हुए एक उदासी फैल जाती है भीतर
कनपटी पर बाल सफेद हो आए हैं
एक साइकिल की याद आती है
तीस बरस पहले की अपनी ही छवि के साथ
जिसने इस शहर गलियों में भटकना सिखाया!
उल्टा पुल पर खड़े होकर देखता हूं रेलवे स्टेशन
जो भव्य लेकिन अब पराया लगता है
इस पुल पर गंगा की कछारों की तरफ़ से साइकिल पर केले आते हैं बिकने को
तीस के दो दर्जन खरीदता हूं
और नोनीहाट की बस पकड़ता हूं।
मैं लौटूँगा
तबादले का मतलब
एक शहर के जीवन से
सभी चीजों का छूटना नहीं है
एक शहर से विदा होने का मतलब
स्मृतियों और यादों का समाप्त हो जाना नहीं है
मैं कमान से निकला हुआ तीर नहीं हूँ
जो नहीं लौटूंगा फिर !
मैं लौटूँगा तुम्हारे पास
पर उस तरह से नहीं
जैसे लौटकर आते हैं
हर बरसात में इस देश के कुछ हिस्सों में
प्रवासी पक्षियों के समूह
या जैसे लौट आते हैं
बसंत के महीने में पेड़ों पर नए पत्ते
या शाम आती है जैसे !
नहीं लौटूँगा उस तरह से !
जीवन में उम्मीद और
किनारों पर लहरों की तरह लौटूँगा
मैं तुम्हारी नींद में लौटूँगा
किसी सुंदर सपने की तरह
लौटूँगा तुम्हारी त्वचा और साँस में
हवाओं के साथ
शायद लौटूँ पंछी बनकर और तुम्हारे कमरे के रोशनदान पर बसेरा करूँ ....
बहूँ तुम्हारे रक्त में तुम्हारे कुँए का जल बनकर
बिखरूँ ...
गुनगुनी धूप का टुकड़ा बनकर
सर्दियों के दिनों में तुम्हारी छत पर
देखना, तुम्हारे घर की ख़ाली ज़मीन पर
बनस्पति बनकर उगूँगा
और चौके में आऊँगा तुम्हारे पास
तुलसी की पत्तियाँ बन जाऊँगा तुम्हारे आंगन में
तुम खाँसी की तकलीफ में उबालकर मुझे पीना !
देखना मैं लौटूँगा कुछ ऐसे ही
और वह लौटना दिखाई नहीं देगा !
माँ की शाॅल
माँ की वह शाॅल कपड़ों के बीच रखी है
इस तरह से उसे रोज़ एक बार देख ही लेता हूं
उसे ओढ़े हुए एक तस्वीर है
मेरे ब्याह के बाद की सुबह की
जब रात हुई बूंदाबांदी से छत भीगी हुई थी
और फोटोग्राफर ने शहर वापस लौटने से ठीक पहले मुझसे कहा था -चलिए ऊपर, माँ की एक अकेली तस्वीर खींच देते हैं
एक बार वह कह रही थी-
बढ़िया शाॅल है
यह मौसी पर भी अच्छी लगेगी
लेकिन उसने जाने किस संकोच में नहीं कहा होगा कि एक मौसी के लिए भी ले लेना
मौसी सुदूर देहात में रहती थी
दिक्कतों से भरे उसके जीवन को हम जानते थे
जाड़े की साँझ को एक बार मैं घर लौटा
देखा, लकड़ियाँ जलाकर माँ आग ताप रही थी
घर के अंदर आते हुए सबसे पहले उसे यही बताया कि एक ऐसी ही शाॅल मौसी को देकर आ रहा हूँ
एकाएक माँ का गला भर आया
वह कुछ बोल नहीं पा रही थी
मुझे लगा कि वह कुछ और पूछेगी
पर वह कोई गीत गाने लगी
जो अक्सर वह सोते समय या एकांत में
या भावुक होने पर गाती थी
दो दिन बाद जब मैं अपने काम पर निकल रहा था उसने मौसी के बारे में जानना चाहा कि उस भेंट में वह कैसी थी, क्या कह रही थी
वह तो ले भी नहीं रही थी
कहा -"दीदी को ही अच्छी लगेगी,
हम देहात में रहते हैं, इतना बढ़िया शॉल ओढ़कर कहां जाएंगे !"
माँ ने इतना भर कहा-
शुरू से ही संतोषी रही हमारी यह बहिन !
यह कहते हुए जब सुना तो लगा कि
भाई-बहन यादों में कभी बूढ़े नहीं होते
उनकी संवेदना का कोई भी रूप हमें जीवन के अंजान क्षितिजों की तरफ ले जा सकता है !
और संभव है कि वह एक शाॅल ही हो !
वे दिन और रात की तरह सच हैं
वे हर एक शहर में हैं
काम पर जाती हुईं
काम से लौटती हुईं
शोहदों और लफ्फ़ाज़ों के अनंत शोर से
अपने को बचाने की कोशिश में भरी हुईं
वे दिन और रात की तरह सच हैं
हमारी दुनिया में
साधूजनों की वाणियों उनके लिए परोसी शालीनता और अखबारों में दर्ज़ क्रूरताएँ भी हैं अपनी जगह
उनके सपनों अकेलेपन और संघर्षों के अनंत किस्से लिखते रहे हैं शहरों के कवि !
कहा गया है ओस की तरह हैं उनकी इच्छाएँ
जो कठिन मेहनत और दुख की आँच में सूख जाती हैं
लंबी उम्र जीती हैं उनमें से बहुत कम
प्रसवास्था में मर जाती हैं
या छोटी- मोटी बीमारियों में
और हरेक शहर की छोटी - संकरी गलियों में
उनके किराए के घर
अनगिनत स्मृतियों की गंध से
देवताओं के फोटुओं से
सस्ती अगरबत्ती की बची हुई खूशबुओं में तिरते हुए।
दो औरतों की नियति कथा
यह उन दो स्त्रियों की नियति कथा है
जो गाँव बदर कर दी गयीं- जिनके बारे अब कहा जा रहा है कि अकेली थीं वे इस संसार में
उनके भीतर अकेलेपन का एक गहरा कुआँ था जिसमें वे हमेशा गिरी रहीं !
अब वे गाँव बदर कर दी गई हैं तो ज़ाहिर है एक दिन उनके किस्से में लोगों को वह तरलता नहीं मिलेगी
जिनके बारे में सबसे पहले घोषित हुआ कि वे अव्वल दर्जे की वेश्यायें थीं
प्रमाण में यह बताया गया कि वे लड़कियों स्त्रियों से हंसी-ठट्ठा करती थीं, लेकिन मर्दों को देखकर ख़ामोशी में पड़ जाती थीं
डर था मुर्गियों में फैले उस वायरस की तरह कि एक दिन गाँव की सारी स्त्रियों को वेश्या बना डालेंगीं वे मात्र दो स्त्रियाँ !
वे सिर्फ दो स्त्रियाँ थीं और गांव के सीमांत पर एक किराए के मकान में रहती थीं
कयास यह भी था वे पाकिस्तान से भेजी गई खुफिया औरतें हैं जिन्हें यहाँ की औरतों का चरित्र और ईमान नष्ट करने के वास्ते भेजा गया है
यहाँ आपका विस्मय वाजिब है भाई साहब !
गाँव की सारी औरतों का चरित्र और ईमान कैसे नष्ट हो सकता था
वे संपन्न थीं और दोनों शाम भरपेट भोजन करती थीं
उनके पास उनके पति थे मर्यादाओं से घिरी एक शालीन समाजिकता थी
अब वे दो औरतें जिन्हें गाँव बदर कर दिया गया है, कैसे कह सकते हैं कि वे वेश्यायें या खुफिया ही थीं ?
क्या एक स्त्री का जिन्दादिल होना और किराए के मकान में अकेली रहना उसके वेश्यापन या खुफिया होने के लक्षण हैं ?
तो उस आदमी को आप वेश्यागामी कहेंगे जो उन औरतों से थोड़ी दूर, अकेले उन्हीं की तरह, एक किराए के मकान में रहता था ?
संभव है वे दो औरतें यहाँ एक नई जिंदगी शुरु करने यहां आई हों और हम उन्हें जल्दीबाजी में वेश्यायें कह बैठे हो !
वे वेश्यायें होतीं तो नियमित रूप से अखबार नहीं मँगाती !
वे वेश्यायें या संदिग्ध भी कहाँ थीं
जब किसी ने उन्हें धंधा करते हुए नहीं देखा !!
सुना तो यह भी गया कि वे दोनों बहनें थीं
एक लंबी उम्र पार करने के बाद भी अनब्याही थीं और पुरुषों से घृणा करती थीं
लेकिन इस दुनिया में अब वे सिर्फ दो औरतें थीं
अकेली थीं जवान थीं
विडंबना है
अकेली और जवान औरतों के बारे में कुछ भी कहने से इस समाज का मुंह स्वाद से भर जाता है !
वे गाँव बदर के कहाँ गईं कोई नहीं जानता....
तय है वे जहाँ से आयी होंगी वहाँ से उनके सारे निशान मिटाये जा चुके होंगे
यहाँ वे अपनी पहचान ढूँढ़ने आई होंगी और हमने उन्हें शीघ्रता में वेश्यायें कह दिया !
गाँव बदर के बाद वे वेश्यायें कहाँ गई होंगी
वे फिर किस दिशा में कौन से नगर को जाएँगी और कहाँ बसेंगी...!
और जहाँ क्या निश्चित है कि
उन्हें वेश्यायें ना कहा जाए ?
और अन्त में
जिसके पास विज्ञापन की सबसे अच्छी भाषा थी
... वह बचा
... वह औरत बची,
जिसके पास सुन्दर देह थी
और जो दूसरों के इशारे पर रात-रात भर नाचती रही
कुछ औरतें और मर्द
जिनमें ख़रीदने की हैसियत थी
और वे सारे लोग बचे
जो बेचने की कला जानते थे!
विनय सौरभ
जन्म 22 जुलाई, 1972 को नोनीहाट, संथाल परगना, झारखंड । टी. एन. बी. कॉलेज भागलपुर से स्नातक और भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा। पिछले तीन दशक से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, संस्मरण, लेख आदि प्रकाशित होते रहे हैं।पहला कविता संग्रह 'बख्तियारपुर' प्रकाशित।
राजभाषा विभाग एवं राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार के 'युवा लेखन पुरस्कार', कादंबिनी का युवा लेखन पुरस्कार, 'कवि कन्हैया स्मृति सम्मान', 'सूत्र सम्मान', 'बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान' से सम्मानित ।
सम्प्रति झारखंड के सहकारिता विभाग में कार्यरत ई-मेल : nonihatkakavi@gmail.com
सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।





विनय सौरभ की कविताएँ समकालीन हिंदी कविता में स्मृति, लोक और मनुष्यता की गहन उपस्थिति का सशक्त उदाहरण हैं। उनकी कविता का केंद्र कोई असाधारण घटना नहीं, बल्कि साधारण जीवन के वे क्षण हैं जिनमें घर, माँ, गाँव, रिश्ते, बिछोह, अपराधबोध और बदलते समय की पीड़ा एक साथ धड़कती है। वे बाज़ारवाद और तेज़ी से बदलते सामाजिक परिवेश के बीच क्षीण होती मानवीय ऊष्मा को अत्यंत संयमित, आत्मीय और मार्मिक भाषा में व्यक्त करते हैं। 'घर', 'अपने ही स्टेशन से गुजरना', 'माँ की शॉल' और 'मैं लौटूँगा' जैसी कविताओं में स्मृति केवल अतीत का मोह नहीं, बल्कि मनुष्य की पहचान और संवेदना का आधार बनकर उभरती है। वहीं 'दो औरतों की नियति कथा' जैसी कविता सामाजिक पूर्वाग्रहों, स्त्री-विरोधी मानसिकता और सामूहिक निर्ममता पर तीखा प्रश्नचिह्न लगाती है। उनकी भाषा सहज, बोलचाल के निकट और अलंकारिक आडंबर से मुक्त है, किंतु इसी सादगी में गहरी काव्यात्मकता और भावात्मक शक्ति निहित है। विनय सौरभ की कविताएँ पाठक को केवल भावुक नहीं करतीं, बल्कि उसे अपने समय, समाज और संबंधों के प्रति अधिक संवेदनशील तथा आत्मालोचक बनने के लिए प्रेरित करती हैं।
ReplyDeleteविनय सौरभ की कविताएं बहुत समय से पढ़ता रहा हूं। अनेक बार किसी पत्रिका में कविताएं साथ साथ भी प्रकाशित हुई थी।
ReplyDeleteयहाँ प्रस्तुत कविताएँ भाव और दृश्य की कविताएं लगी मुझे। विनय की किसी भी कविता की कोई सी पंक्ति उठा कर जाँचता हूँ तो उसमें अर्थ की नई ही गंध मिलती है जैसे घर कविता की ही ये पंक्तियां --
चाहता हूँ बस छूट ही जाए !
कोई छूटी चीज़ याद आ जाए
और भागूँ घर के अंदर......
और ये कविताएं अति सहज पंक्तियों के रूप में है और मन की टीस व्यक्त करती ये पंक्तियां यह उदाहरण देखिए
जब खगेंद्र ठाकुर मरे पटना में
प्रेम प्रभाकर भागलपुर में
रामनिहाल गुंजन आरा में
उनके अंतिम दर्शन करने आख़िरकार जा ही सकता था
यह ख़्याल आता है अक्सर देर रात गये
या आधी नींद के बीच
जैसे कोई पत्थर आज भी सीने में लुढ़कता रहता है आत्मग्लानि का भार लिए !,......
मुझे ये कविताएं आत्मग्लानि की आँच में तपकर मनुष्यता का असली अर्थ पहचानती हुई लगी इनकी सबसे बड़ी शक्ति यह लगी कि यह उपदेश नहीं देती है और ये कविताएं मुझे अच्छा इंसान बनना सिखाती रही ।
अभिनंदन कवि विनय
विनय तफ़सीलो के कवि हैँ
ReplyDeleteजीवन की छोटी छोटी घटनाओं को.
कविता में बदलने का हुनर उनके पास है।
कितनी अच्छी कविताएं। साधारण चीज़ों को कितनी गहराई से देखते हैं जो सच में बहुत बड़ी होती हैं।
ReplyDeleteविनय सौरभ की कविताएं मूलत: रिश्तों का रूहानी ताना बाना हैं जिनकी दरकन को वह स्मृतियों के महीन धागों से तुरपते दिखाई देते हैं। कमाल यह है कि उनकी यह रफूगीरी समेटती कम है, उधेड़ती ज़्यादा है। स्मृतियों का लेंस थमाकर विनय उन दिनों और जगहों का दिग्दर्शन कराते हैं जो अमूमन भुलाए जा चुके होते हैं। यह दृश्यांकन मर्म को छूता है, बिछोह जगाता है, ग्लानि से भरता है। ग्रामीण गंध से भरे कस्बों के शहरीकरण के वाशिंदों की दोतरफा तकलीफ को विनय बहुत तफसील से उकेरते हैं। स्मार्ट होते शहर की अंतर्कथा उदासी भरी है, विकास और सुविधा की भव्य इमारतें पराएपन का अहसास कराती हैं...और ऐसे में याद आती हैं असुविधाओं से भरी वे गलियां, वे पगडंडियां जहां रिश्ते सुबह से शाम तक खिले होते थे। 'घर', 'मैं लौटूंगा', 'मां का शॉल' कविताओं से गुजरना अपने अतीत के सामने खड़ा होने जैसा है। 'वे दिन और रात की तरह सच हैं', 'दो औरतों की नियति कथा' पूर्वाग्रहों के अंगार पर सीझते स्त्री जीवन का गहन चित्रांकन है। 'वे ही!' सिकुड़ती सामाजिकता पर महीन व्यंग्य है। सहजता से बड़ी बात कहना विनय की खूबी है।
ReplyDelete-सत्यकेतु
विनय सौरभ की कविताएँ अपनी सी लगती हैं। यह कविताओं की विशिष्टता है।
ReplyDelete"अपने ही स्टेशन से गुजरना" पढ़ते हुए विनोद कुमार शुक्ल की कविता "सोचा था" की याद आ गई।
:पद्मराग मणि
"बख़्तियारपुर" फेम कवि विनय सौरभ की कवितायें बीत रहे वक़्त में संबंधों के परिस्थितिजन्य क्षरण की अनकही दास्तां हैं, जिन्हें पढ़ते हुए हम अंदर तक आर्द्र हो उठते हैं. लगता है, अरे यह तो हमारी कविता है, हमारे साथ घटित वाकया है. इनकी कविताओं में स्मृतियाँ पुनर्जिवित हो उठती हैं. पंक्तियां बातें करने लगती हैं. हम उनकी कविताओं के पात्र बन जाते हैं. हरेक शब्द बूंद बूंद हमारी धमनियों में सलाइन की तरह उतरने लगते हैं. विनय जी की अपनी भाषा है, अपना कहन है, जिससे हम इत्तीफाक हुए बिना नहीं रह पाते हैं. एक दर्द, एक टीस, संवेदन के रूप में हम महसूस करते हैं. उनकी कविताओं में बाज़ारवाद को आईना दिखाने का हुनर है. आदमी में आदमियत भर देने की बेचैनी है. प्रत्येक कविता कवितागोई से लबरेज़ है. और इसके लिए मित्र को हार्दिक बधाई. शंकरानंद जी के प्रति आभार कि आपने कौशिकी को पाठकों के ज़ेहन में उतार दिया है!
ReplyDeleteविनय सौरभ की कविताएं पढ़ना कुछ और ज़्यादा संवेदनशील होना है; कुछ और ज़्यादा मनुष्य होना है। उनकी कविताएं पढ़ते हुए ख़ुद को, ख़ुद की स्मृतियों को सहेजते चलना है; जो कुछ जीवन की आपाधापी में विस्मृत हो रहा है, उसे फिर से महसूस करना है। विनय सौरभ कविताएं नहीं लिख रहे होते हैं,वे बहुत ही सलीके से,एक हुनर के साथ जीवन और अपने आसपास को ही नए तरीके से सृजित कर रहे होते हैं। वे अपनी पीढ़ी के कवियों में अन्यतम कवि हैं। उनकी कविताएं हिन्दी की समकालीन कविता को संपन्न बनाती हैं। उन्हें बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं। 'कौशिकी' एक इतिहास बना रही है। इसके लिए युवा कवि शंकरानन्द को भी बधाई।
ReplyDeleteचंद्रेश्वर, लखनऊ
विनय सौरभ अपने परिवेश में उपस्थित दृश्यों का गहराई से अवलोकन करने वाले कवि हैं। स्थानीयता इनकी कविताओं की विशेषता है।ये कविताएं इसलिए असरदार होती हैं कि यहां सहजता है,दूर की कौड़ी पकड़ने की कोई कोशिश नहीं है।कवि शब्दों के आडंबर से बहुत दूर है।सरल सहज लिखकर भी अच्छी कविताएं रची जा सकती हैं। बातों ही बातों में हृदय को छूने वाली कविताएं उतर जाती हैं।
ReplyDeleteमैं तो मानता हूं कि कविताएं ऐसी ही होनी चाहिए।
विनय की कविताएँ न केवल छूटती जा रही चीज़ों को पकड़ती हैं वरन वे उस टीस को पकड़ती है जो कवि के भीतर शायद बहुत समय तक चलती है और फिर कविता में आकर एक सशक्त वार करती है।
ReplyDeleteअभी के कंक्रीट होते समय में विनय सौरभ जी की कविताएं नमी का एहसास कराती हैं ।
ReplyDeleteख़ुदेजा ख़ान
ReplyDeleteज़िन्दगी के नाज़ुक अहसास हों कि रिश्तों की नरम - गरम आंच,
सामाजिक दायित्व बोध हो या स्त्री समाज को देखने की घिस चुकी रवायतें।
ये तमाम विरोधाभास यदि जीवन के अनिवार्य अंग हैं तो ये ख़ूब गहनता से विनय सौरभ की कविताओं में गुंफित हुए हैं।
मनुष्य अपने जीवन में अतीत को नहीं छोड़ पाता और बात जब शहर की हो तो वो 'भागलपुर' की ही नहीं किसी भी शहर की गलियां, नुक्कड़, लेंड मार्क आदि नाॅस्टेल्जिक करने की क्षमता रखते हैं।
रिश्ता अपने घर से, किसी ख़ास व्यक्ति से, कोई जगह से, छूट जाने पर भी अक्सर एक कसक की तरह बचे रहते हैं। इन सबमें वापस लौटना, सबसे ज़्यादा महसूस होना है।
'मैं लौटूंगा' कविता ऐसी ही अनुभूति को व्यक्त करती है।
समय छीज रहा हो या व्यक्ति, संबंधों की उष्मा खींच ही लेती है।
घर, मां की शाॅल, वे ही,
इन कविताओं में अपना लगाव दर्शा देते हैं।
स्त्री संवेदना से सराबोर कविताएं -
'वे दिन और रात की तरह सच हैं '
'दो औरतों की नियति कथा'
' अंत में '
स्त्री के अस्तित्व पर लगे प्रश्नचिन्हों के जवाब तलाशती हैं और उनके पक्षधरता की पहल करती हैं।
विनय सौरभ सूक्ष्म अनुभूतियों के कवि हैं जो अपनी सहज भाषा से अनछुए मर्म को उद्घाटित करते हैं।
विनय सौरभ हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि होकर कविता के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनकी कविताओं में जमीन से सीधा जवाब है उनकी स्मृति में घर, दोस्त, अपना शहर, और वह बहुत सारी चीजें जो बचपन में देखीं हैं उन सभी का गहरा प्रभाव उनकी कविताओं में देखने को मिलता है। यह कविताएं हृदय से निकली हुई कविता हैं इन्हें जबरदस्ती नहीं लिखा गया जिस तरह से अपने आप उगने वाले बाबूल खरपतवार और घास अपने आप उगते हैं ठीक इसी प्रकार उनकी कविताएं निकलती हैं।
ReplyDeleteरिश्तो को बचाने की कोशिश हमेशा उनकी कविताओं में आती हैं जो इस कठिन समय में हमें अपनी जमीन से जोड़ती हैं।
घर, अपने रेलवे स्टेशन से गुजरा, वे ही,भागलपुर और मेरा लौटना इत्यादि बहुत शानदार कविता हैं।
रिश्तो की बुनियाद पर उनकी बहुत गहरी पकड़ है और यही उनकी बहुत बड़ी ताकत है।
कविता की भाषा उसके प्रतीक बिल्कुल सहज कोई बनावटी पन नहीं।
हमारे समय में पढ़े जाने वाले महत्वपूर्ण कवि।
कौशिकी को बहुत-बहुत बधाई इतनी अच्छी कविताएं लाने के लिए।
विनय सौरभ की कविताएँ पढ़ते हुए बार-बार यह अनुभव होता है कि वे केवल कविताएँ नहीं लिखते, वे अपने जीवन की सबसे साधारण दिखने वाली घटनाओं में मनुष्य की सबसे गहरी संवेदनाओं को बचाए रखने का काम करते हैं। उनकी कविता में घर है, माँ है, गाँव है, स्टेशन है, शहर है, स्मृतियाँ हैं, आत्मग्लानि है, स्त्रियों का दुःख है और मनुष्यता के लगातार क्षीण होते जाने की चिंता भी। लेकिन इन सबके बीच सबसे अधिक जो चीज़ दिखाई देती है, वह है एक अत्यंत सजग और भावुक मनुष्य की उपस्थिति।
ReplyDeleteविनय सौरभ से जितनी भी व्यक्तिगत मुलाकातें हुई हैं, हर बार यही महसूस हुआ कि उनकी कविताओं का मनुष्य और सामने बैठा हुआ मनुष्य अलग-अलग नहीं हैं। उन्हें जितना पढ़ा है, उससे कहीं अधिक उन्हें बातचीत में उनकी कविताओं के भाव के निकट पाया है। लिखे हुए और जिए हुए के बीच बहुत कम लोगों में ऐसी संगति दिखाई देती है। उनकी सहजता, रिश्तों के प्रति अनुराग और मनुष्यता के प्रति गहरा भरोसा उनकी कविताओं की तरह ही उनके व्यक्तित्व में भी स्वाभाविक रूप से उपस्थित है।
शायद इसी कारण उनकी कविताएँ पाठक को प्रभावित करने का प्रयत्न नहीं करतीं, बल्कि धीरे-धीरे उसके भीतर घर बना लेती हैं। वे बताती हैं कि बदलते समय में भी मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी उसकी संवेदना, स्मृति और संबंध ही हैं, और इन्हें बचाए रखना ही कविता का सबसे बड़ा नैतिक दायित्व है।
ReplyDeleteकभी चिलचिलाती कभी कुनकुने धूप का एहसास जगाती कविताए
विनय सौरभ की कविताएं मैंने पहले भी पढ़ी हैं, ये नौ कविताएं भी बिल्कुल जीते जागते आसपास से निकली हुई-सी ही हैं। न कोई गूढ़ बिम्ब, न शब्दों का खेल, न गैरजरूरी बनावट। सरल भाषा और सुलगती-सुगबुगाती अनुभूति। इन कविताओं में गांव-षहर हैं, मित्र-पड़ोस के लोग हैं, मां है, यादें हैं, और साधारण जिन्दगी जीती हुई स्त्री भी है। पहली कविता ’’घर’’ की पंक्तियां ’’कोई छूटी चीज याद आ जाए/ और भागूं घर के अन्दर’’ घर की कसक को सार्थक करती हैं। इसी तरह ’’वे ही’’ कविता की अन्तिम पंक्तियां ’’वे सही समय पर पहुंचते हैं ...... यह कहते हुए कि/ अभी पता चला भाई साहब/ और सीधा चला आ रहा हूं।’’ ऐसी अनौपचारिकताएं फोन करके काम चला लेने वाले समय में अब बिरले ही दिखती हैं। ’’भागलपुर’’ कविता इंगित करती है कि बस एक शहर कोई होता है अपना आत्मीय हर किसी के लिए।
अगली कविता ’’मैं लौटूँगा’’ असल में इन पंक्तियों से शुरू होती है - ’’जीवन में उम्मीद और/ किनारों पर लहरों की तरह लौटूँगा’’ जिसकी अन्तिम पंक्तियां ’’देखना मैं लौटूँगा कुछ ऐसे ही/ और वह लौटना दिखाई नहीं देगा’’ स्मृतियों में लौटने की आकांक्षा-सी व्यक्त करती हैं। विनय की सातवीं कविता ’’वे दिन और रात की तरह सच हैं’’ मर्म को छूती है तो अगली कविता ’’दो औरतों की नियति कथा’’ सोेचने को मजबूर करती है। इनमें से अन्तिम छोटी-सी कविता ’’और अन्त में’’ खत्म नहीं होती, रूकी हुई है इस प्रतीक्षा में कि इसे जैसे और आगे जाना हो।
ये कविताएं कभी चिलचिलाती कभी कुनकुने धूप का एहसास जगाती हैं।
विनय सौरभ जी की कविताएँ बेहतरीन कविताएँ हैं जो अपने समय को दर्ज करती हुई बिलकुल अपनी अपनी सी लगती है और अंत आते आते अंतर्मन को हौले से छू जाती हैं। ये सभी कविताएँ सच्ची और ईमानदार कविताएँ हैं जो किसी भी चीज, रिश्ते, बातें, लोग, घर सभी के प्रति संवेदनशील होना सिखाती हैं। विनय जी को बहुत बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं।
ReplyDeleteसुषमा सिन्हा