लाल्टू की कविताएं
लाल्टू
अपने समय के प्रतिरोध और उसके लिए बेचैनी को दर्ज करने वाली जो भाषा जो लाल्टू के पास है वह चकित करती है।इन कविताओं में हम समकालीन हिन्दी कविता के बने बनाए मुहावरे से अलग एक नया तेवर देख सकते हैं और यह तेवर बहुत पुराना है।जैसे जैसे समय बदल रहा है, समाज बदल रहा है उसी अंदाज में कविता भी बदल रही है।ये कविताएं इसी बदले हुए समय की कविताएं हैं। बिल्कुल अपने समय के नब्ज पर हाथ रखती हुई।
लाल्टू की कविताएं
प्रतिरोध
अनजान कोई नहीं, यहाँ हर कोई मेरा माँ-जाया है
अनगिनत शिकवे मेरी माँ के आँचल में आ पसरते हैं ,
तितलियाँ हैं चुपचाप रंग बिखेरती,
यहाँ प्यार की लहरें हैं ,
कि हर कोई इंसान है।
मेरे आँसू पोंछती औरत
निरंतर तालियाँ बजाती है कि ज़माना बदलेगा।
यहाँ सड़कों पर घूमते हुए देखता हूँ
हर कोई चीखता कह रहा
कि मार लो जितना मार सकते हो
हर कोई कीड़ा कहलाता नाच रहा है
हर कोई किसी और को खाना खिला रहा है
यहाँ सभी खेल दुरुस्त हैं
कि हर कोई खेल में शामिल है
हर कोई साथ जीता है, साथ मरता है
हाथों के समंदर में एक हाथ मेरा शामिल है,
शामिल कर लो मुझे कि अपनी क़ैद से छूटूँ,
मेरे जिस्म से मेरी रूह को आज़ाद कर दो
यहाँ अनगिनत हाथ उठे हैं
यहाँ फरिश्ते गीत गा रहे हैं,
यहाँ तालियाँ बज रही हैं कि
ज़माना बदलने को है
यहाँ सारी दुनिया, सारी कायनात
तालियाँ बजा रही है।
जीवन सुहावना बाग़ हो न हो
हर पल खुशबूदार फूल खिले हों न हो
बचपन में साथ खेलती बहन हर पल मौजूद हो
दरवाज़े खोलने के लिए
जब कोई जीवन में प्रवेश करे
कि जब जाने के लिए कोई जगह नहीं है
कि खुले आस्मां तले
किसानों के साथ गीत गाती बहन
सीधी खड़ी होकर कहे कि
अब और नहीं, और नहीं सहना
कि नींद समझौतों से आज़ाद हो
पुरानी सोच में क़ैद नहीं रहना।
फिर चाहे घास पर घर हो
कठोर स्वभाव वाले पड़ोसी हों
हमें क्या? कवि कुछ नहीं
कर सकता तो क्या? नदी किनारे
मौसम बहन की पसंद का हो
इतना काफी है
कि मुश्किलों में
एक राहत भरा स्पर्श दे जाए
उसकी याद।
दिशाएँ
उत्तर
ज़ाहिर है कि पहाड़ हैं
पहाड़ों से आगे दूर तक नहीं जा सकते
वहाँ ज़मीं-आस्मां जलते ख़ूँ की बू में सराबोर हैं
पश्चिम
ज़मीं से दूर समंदर
समंदर से आगे दूर तक नहीं जा सकते
वहाँ ज़मीं-आस्मां जलते ख़ूँ की बू में सराबोर हैं
पूरब
पहाड़ भी जंगल भी
जंगल-पहाड़ से आगे दूर तक नहीं जा सकते
वहाँ ज़मीं-आस्मां जलते ख़ूँ की बू में सराबोर हैं
दक्षिण
पहाड़-जंगल-समंदर
आगे दूर कहाँ तक जाओगे
धरती गोल है
ज़मीं-आस्मां हर कहीं जलते ख़ूँ की बू में सराबोर हैं।
दिशाएँ अनेक हैं
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम और अनेकों दिशाओं से
उठे हैं लोग उठे हाथ हैं
ज़मीं-आस्मां-समंदर हर कहीं से
ख़ूँ की बू मिटाने
प्यार की खुशबू खिलाने
क़ैदखानों से उँगलियाँ आज़ाद हो रही हैं
दिशाएँ बेकरार हैं।
['प्यार का कोई कारण नहीं होता
झूठ कभी बेमक़सद नहीं होता' - लाल सिंह दिल]
यह मेरे वश में नहीं कि मैं अपना जन्मस्थान बदल सकूँ
कि अपने माता-पिता को त्याग कर नए माँ-बाप चुन लूँ
कह सकता हूँ कि
एक बच्चा सरहद पार रोता है तो बेचैन होता हूँ
इतना कि जब मेरा बच्चा रोता है
हर कहीं संगीत सुनता हूँ, हर कहीं कविता जीता हूँ
हर कहीं हूँ मलबे के नीचे आखिरी साँस ले रहा
हर कहीं समंदर की लहरें उछालती हैं मुझे
परवाह है कि विज्ञान का भारत-चीन-अरब उद्गम पहचानें
कि टिंबक्टू का मध्ययुगीन ज्ञान भी मेरा विज्ञान है।
देर-सबेर मेरे मायने तुम्हें समझ आ जाएँगे
कि मेरे ख़यालों की मोरपंखी सजावट है।
आदमी
कभी किसी से जोर से न बोला
इन दिनों कम से कम बोला
ऐसा आदमी क्यों घबराता दिखे है
कुर्सी पर बैठता वह घबराता है
रात सोने से पहले उसे खुद नहीं पता
कि वह किस बारे में परेशां है
कुछ है जो हालफ़िल में बदला सा है
नींद नहीं आती तो उठकर खिड़की से बाहर झाँकता है
जो नहीं जानते उन्हें लगेगा कि वह चाँद तारे देख रहा है
दरअसल वह अपना संतुलन ढूँढता है
उसे पता है कि वह ढेकी पर चढ़ा हुआ है
कूटने को धान का दाना नहीं है
कभी इस कभी उस ओर वह खुद को गिरने से बचाता है
उसे लगता है कि उसे कुछ कहना है
ऐसा सोचते हुए वह और कम बोलता है
उसकी बीवी ने उसके बारे में सोचना बंद कर दिया है
घर के लिए वह महज माहवार पगार लाता कामगार है
रोटी-पानी के अलावा रहने की जगह महफ़ूज़ है
बीवी उसके सामने कपड़े नहीं बदलती
कभी दूर से देखकर लंबी साँस लेती है
उसने मान लिया है कि वह सपने में खोया है
जो उसे अकेले में ही देखना है।
यह हमारे वक़्त की कहानी है
भली कहानी है
आस्मां में चाँद तारों के नीचे ज़मीं पर
हवा पानी के साथ इतिहास बहता है
इसे जीना आदमी की क़िस्मत है।
ध्यान से सुनो तो गले से एक आवाज़ निकलती है
जो कहानी का पाठ है
कहानी में एक वाक्य बार-बार दुहराया जाता है
- मैं कुछ नहीं कर पाया
मेरे वक़्त में हज़ारों बेगुनाह मारे जाते रहे
कुछ नहीं कर पाया
बच्चों का क़त्ल किया गया
मैं कुछ नहीं कर पाया
बीवी चाय का कप ले आती है
जल्दी से चाय लेकर नज़रें झुका लेता है
बीवी कहती है - किया है,
बहुत कुछ किया है
मैं तुम्हारी कहानी का हिस्सा हूँ
हम तुम वक़्त की कहानी हैं
अकेले नहीं – हमारा परिवार
पड़ोस मोहल्ला, हम सब कहानी में हैं
ऐन उस वक़्त कोई पंछी पुकार उठता है
कि ऐसे वक़्त में भी बहार आती है
हमसे अंजान सही उम्मीद दबे कदम आती है
नई शक्लें नए नाम लिए आती हैं
कोई और उस आदमी की जगह लेने आता है
कहानी बनती चली जाती है
बहता चलता है इतिहास।
अनजान
दुनिया से
अनजान रहने का नाटक करता हूँ
मसलन धरती गोल है या नहीं तो क्या
सौ साल बाद किसने जीना किसने मरना
फ़िलहाल खुद से कहता हूँ
कि चादर ओढ़ और सो ले
पड़ोस में आग लगी तो सो सकते
ऐसा सर्वेश्वर ने पूछा था
शायरी पढ़ना छोड़ दे
चाँद पर धब्बे देखने लायक नज़र नहीं रही
कान से कम सुनता हूँ तो किसी की चीख क्यूँकर पहुँचे
अधकचरी समझ का फ़ायदा उठा
कि ज़ेहन उड़ गया सालों पहले
जब खुद से छिपने की शुरूआत हुई
धरती की क़िस्मत कि साथ
इसे भी खत्म होना है
दर्ज़नों मशीनों ने मुझे पढ़ने की कोशिश की
और तमाम हकीमों ने नुस्खा बताया
कि आँखें मूँद रख
दरवाज़े खिड़कियाँ कुछ न खोल
कि हक़ीक़त बड़ी बीमारी है
जाने किस रास्ते अंदर आ बैठे
और बोलियाँ सुनाई पड़ जाएँ
कि निशाने तय किए जाने को
नन्ही जानें बिक रही हैं
अनजान रहने का नाटक करता हूँ
हक़ीक़त महज एक सपना है
दरअसल मर चुका हूँ
जीने का नाटक करता हूँ।
जागने पर क्या दिखेगा
जैसे मेरी माँ नहीं, बेटी है
अभी कल की जन्मी
अँगड़ाई लेना सीख रही
धरती लिपटती है मुझ से
घबराता उसका माथा थामता हूँ
कितनी नाज़ुक, नर्म, हल्के-से ताप की गठरी है
धीमे चलता हूँ, कहीं टकरा न जाए
खला में तारों के टुकड़े बिखरे पड़े हैं
कभी भी ठोस-द्रव-गैस हर तरह की टक्कर कहीं से आ सकती है
उसे गीत गाकर सुलाता हूँ
उसके चेहरे पर अंजान महाकाश से आती रोशनी देखता हूँ
रोती है बेचैन होता हूँ
पुचकारता हूँ आगे पीछे चलता हूँ दोलता हूँ
अनकही कहानियों में से चुनिंदा उसे सुनाता हूँ
इस तरह धरती को प्यार करते देख किसान गर्दन उठाकर देखते हैं
फसल रोपते हुए वे धरती के गीत गाते हैं
गर्म हवाएँ थोड़ी देर थमी रहती हैं
बादल रिमझिम संगीत बन बरसते हैं
किसानों को अंदेशा है कि मैं धरती की नज़ाकत से घबरा रहा हूँ
वे भरोसा देते हैं कि मेरा प्यार सह लेगी
उन्होंने उकेरी हैं जीवन-गाथाएँ धरती की त्वचा पर
हवाएँ बहती हैं हिसाब के साथ कि प्यार उफन रहा है
धीमी बयार और तेज झोंके जब जैसा सही है
देखो, फिलहाल नींद में है
जैसे मैंने दुलार कर सुला दिया हो
पलकें भारी हो आई हों
और सपनों में आरोह-अवरोह चल रहा है
यही वक्त है कि मैं सो लूँ
कौन जानता है कि जागने पर क्या दिखेगा
क्या धरती रहेगी क्या मैं रहूँगा
मोतियों की थाल लिए आस्मां रहेगा
कुछ कहा नहीं जा सकता
सब कुछ धुँआ- धुँआ है
फ़िलवक़्त मैं और धरती
नींद के दोलन में दोल रहे हैं।
एक लफ्ज़
कागज़ात, कंप्यूटर-स्क्रीन, अजीबोगरीब अल्फाज़ से भरे हैं
दिनभर इनको देखता हूँ और उनके नाम ढूँढता हूँ
तड़पता हूँ कि क्या खाक और क्या खास है
कोई हर्फ़ सही बैठ जाए
कोई मानीखेज लफ्ज़ कहीं आँख झपकाए
कोई तो मिसाल सही बन जाए
ज़हन थक जाता है
जिस्म के हर पोर में थकन घर कर जाती है
खिड़की दरवाजों से हवा आकर थकी हुई नींद को जगाती है
कि कहीं कोई मेरा हाथ थामने है बेसबर
कि कुछ बचा रह गया है मेरे लिए कहीं
उठता हूँ अनचीन्हे हर्फों की तलाश में
अचानक चारों ओर से आते हैं बोसे
गुदगुदी सी होती है कि कोई सही हर्फ होगा आखिर
शब्दकोश में कोई सही शब्द
फिर साथ शर्मिंदा होते हैं
कि अब तक कितना कुछ नहीं महसूस किया
कि मछलियों को ज़रूरत है हवा की
कि किसान लहलहाती फसलें देखने के लिए आतुर हैं
कि कोई बेतहाशा इतिहास में सच ढूँढ रहा है
नींद में ख़त लिखा जाता है ख़त पढ़ा जाता है
कि तैर रही हैं मछलियाँ
किसान गीत गा रहे हैं
दरख्तों ने ईजाद की है इक नई ज़बान।
आखिरी कविता
जीवन में कुछ आम बातें रही होंगी, कुछ लोग, आम दोस्त,
भाई-बहन, परिवार। ऐसे लोग सालों तक
अचानक चौंकते होंगे, पेड़ की डाल पर पत्तों के काँपने
या बारिश की पहली बूँद बदन पर आ टपकने पर।
सड़क किनारे शोकेस में टँगी कमीज़ देख कर या
खबरों में किसी दुर्घटना के जिक्र पर। लंबी साँस लेकर सोचते होंगे कि
उसे भूल बैठे थे। शाम को बेवजह यू-ट्यूब पर कोई गीत सुनते हुए
कोई रंग दिख जाना, हवा में उसकी आवाज़ की कंपन का होना।
अनकहा मुहावरा याद आ जाना।
उसे मार डाला गया। यह सोचते ही थर-थर काँपते होंगे लोग।
काँपती होंगी दीवारें, खयाल काँपते होंगे, कोई उठ खड़ा होगा,
कोई बैठ गया होगा। कोई सोचता होगा कि यह कैसे संभव है कि
वह नहीं है, पर मैं हूँ। किसी ने उसे बेहद प्यार किया होगा। वह
सरहद पर मारा गया वह गली में मारा गया वह मैदान में मारा गया
वह कहाँ मारा गया। वह जंग में मारा गया। दुश्मन की फौजों ने
उसे निहत्था धर दबोचा। ग़लती उसकी कि वह नहीं जानता था कि वह
जंग में शामिल था। उसके मुहावरे उसके हथियार थे। वह अपनी लड़ाई में
सूरज और चाँद को इस्तेमाल करता था। वह प्यार का इस्तेमाल करता था।
दुश्मन ने उसे टेढी आँखों से देखा तो वह हर कहीं दिखा।
उसे मारने की गरज में उन्होंने कई औरों को मारा।
उसके मरने के तुरंत बाद उस पर दर्जनों कविताएँ लिखी गईं।
यह उस पर लिखी गई आखिरी कविता है।
लाल्टू ( हरजिंदर सिंह)
जन्म -१० दिसंबर १९५७, कोलकाता
हरजिंदर सिंह हैदराबाद में सैद्धांतिक प्रकृति विज्ञान (computational natural sciences) के प्रोफेसर हैं. उन्होंने उच्च शिक्षा आई आई टी (कानपुर) तथा प्रिंसटन (अमरीका) विश्वविद्यालय से प्राप्त की है.
एक झील थी बर्फ़ की, डायरी में २३ अक्तूबर, लोग ही चुनेंगे रंग, सुंदर लोग और अन्य कविताएँ, नहा कर नहीं लौटा है बुद्ध, कोई लकीर सच नहीं होती, चुपचाप अट्टहास,कौन देखता है कौन दिखता' , अधूरी रहना कविता की नियति है सहित अब तक तेरह कविता संग्रह प्रकाशित।संभावना प्रकाशन से नया कविता संग्रह 'इन दिनों कैसी कविता लिखोगे लाल्टू?'शीघ्र प्रकाश्य।कविता संग्रहों के साथ कहानी संग्रह, नाटक और बाल साहित्य आदि भी प्रकाशित.
हावर्ड ज़िन की पुस्तक ’A People’s History of the United States’ के बारह अध्यायों का हिंदी में अनुवाद. जोसेफ कोनरॉड के उपन्यास ’Heart of Darkness’ का ’अंधकूप’ नाम से अनुवाद, अगड़म-बगड़म (आबोल-ताबोल), ह य व र ल, गोपी गवैया बाघा बजैया (बांग्ला से अनूदित), लोग उड़ेंगे, नकलू नडलु बुरे फँसे, अँग्रेजी से अनूदित आदि. बांग्ला, पंजाबी, अंग्रेज़ी से हिंदी कहानियाँ, कविताएँ भी अनूदित.
सैद्धांतिक रसायन (आणविक भौतिकी) में 100 शोधपत्र अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित.
laltu10@gmail.com
सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।





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