विनय सौरभ की कविताएं

 

                              विनय सौरभ 


बाजार की चमक और अंधाधुंध विकास के बीच संबंधों की छीजती ऊष्मा ने मनुष्य को बिल्कुल अकेला और असहाय बना दिया है।ये और बात है कि इसका एहसास करने की भी फुर्सत किसी के पास नहीं है। विनय सौरभ की कविताएं इस एहसास को मजबूत करने वाली हैं। इनमें अपनी जड़ों से टूटने का दुःख है तो रिश्तों को बचाए रखने की विकलता भी है। मनुष्य और उसके जीवन से जुड़ी हुई जिन जिन चीजों को बहुत चालाक तरीके से नष्ट किया जा रहा है, उनकी बहुत मार्मिक उपस्थिति विनय सौरभ की कविताओं की विशेषता है।


विनय सौरभ की कविताएं 




घर

मैं चलता हूँ 
या अब मुझे चलना चाहिए
कहता हुआ आता हूँ 
घर के दरवाज़े पर

फ़िर कब आ पाऊँगा
या फ़िर मुझे जल्दी आ जाना चाहिए
मेरा झोला ठीक करते हुए 
माँ कहती थी, जब वह थी 
और दरवाज़े से आँख भर मेरा जाना देखती थी

इस तरह से अपनी नौकरी पर जाने को निकलता हूँ घर से और थोड़ा घर पर ही छूट जाता हूँ

रूलाई बाहर आने से रोकता हूँ
बड़े भाई को कहता हूँ -
फलाँ काम देख लीजिएगा   
मौसी के यहाँ चले जाइएगा, सुना है बीमार है
अब वही तो एक बहन बची है माँ की !

याद है गुड़ के अरसे कितना 
भेजा करती थी हमारे लिए !

चाहता हूँ बस छूट ही जाए ! 
कोई छूटी चीज़ याद आ जाए
और भागूँ घर के अंदर

अभिनय करूँ भीतर आते हुए 
कि कमरे की खिड़की 
शायद खुली तो नहीं रह गयी !  
शहर के किराये के घर की चाबी तो
नहीं भूल आया ताखे पर !

जब तक शहर के लिए बस आ नहीं जाती
नज़र बचाकर देखता रहता हूँ घर को।



अपने ही स्टेशन से गुजरना

एक रोज यात्री बनकर गुजरते हो
अपने ही गाँव के स्टेशन से
एक उदासी भीतर फैल जाती है अचानक

खिड़की से बाहर तलाशते हो
कोई चेहरा परिचित दिख जाए!
नये बच्चे दिखते हैं
जिनके बारे में बस एक अनुमान से
भर जाते हो कि ये किस टोले के होंगे!

संताल आदिवासी और दूसरे ग्रामीण
जो धीरे -धीरे रेल के साघारण डिब्बों में
यात्रायें करते हुए अब सहज दिखने लगे हैं

स्टेशन के बनने‌ की शुरूआत के दृश्य
पीछा कर रहे हैं
यहाँ आयी पहली रेल की याद
पुतलियों में बसी है

याद है लोगों का ड्राइवर‌ और गार्ड साहब को 
हर्षातिरेक से कंधे पर उठाना
उन्हें माला पहिनाना, मिठाइयाँ खिलाना
उनके हाथों को चूमना, उनके गले‌ लगना

कैसे अविस्मरणीय उत्सव में 
बदल गया था वह दिन!

दूर- दराज के इलाके़ से चलकर 
लोगों का वह पहली रेल देखने आना
खुली आंखों से उनके
एक सपने का जैसे पूरा होते देखना था
रेल को छूकर गवाह बनने की हसरत कि हाँ, वे भी इस तारीख़ का हिस्सा हैं!

दुमका जाते हुए पीछे छूटते जाते थे
पहाड़, ताड़ और पलाश के असंख्य पेड़ 
और नदियाँ
और रेल में बैठे लोग उस रोज ऐसे पुलकित थे 
जैसे जीवन में पहली बार उन्हें देख रहे हों!



वे ही !

सोचा मिलकर ही कह देंगे कि नहीं आ सके 
आपके बेटे के ब्याह में 
सारी तैयारी कर रखी थी 
पर ऐन वक़्त पर आना मुल्तवी करना पड़ा 
फलाना काम आ पड़ा, कोई चारा नहीं था !

जब खगेंद्र ठाकुर मरे पटना में 
प्रेम प्रभाकर भागलपुर में 
रामनिहाल गुंजन आरा में
उनके अंतिम दर्शन करने आख़िरकार जा ही सकता था 
यह ख़्याल आता है अक्सर देर रात गये 
या आधी नींद के बीच 
जैसे कोई पत्थर आज भी सीने में लुढ़कता रहता है आत्मग्लानि का भार लिए !

कभी धूप बहुत तेज़ होती है 
कभी जाड़ा ही आ धमकता है 
कभी बारिश और हवा इतनी तेज कि छाता संभाले नहीं संभलता !

इस तरह से कई ज़रूरी मौकों पर जाना टलता रहा !
अब सोचता हूं तो वह सारे बहाने ही थे ! 
दुश्वारियों से बचने के लिए थोथे कुतर्क थे बस ! 

अपने कवि होने की मानी पर 
शर्मिंदा होता हूं चुपचाप!

ये वही लोग थे जो फ़ोन कर लेते थे कभी भी 
और कहते थे- 
बस ऐसे ही फोन कर लिया विनय! 
बहुत दिनों से तुम्हारा कोई समाचार नहीं मिला था 
तुम्हारे पैर का दर्द अब कैसा है?
घर का क्या समाचार है ?
तुम्हारे भाई अब कैसे हैं?

जो जेठ की तपती दोपहरी में 
किसी शव यात्रा में शामिल होते हैं 
और जरूरत पड़ने पर आँधी- पानी में भी 
जानकारी मिलते ही 
किसी तरह पहुंच जाते हैं अस्पताल
      - वे कौन हैं ?

दुनिया में इन्हीं लोगों ने बचा रखा है 
मनुष्यता पर भरोसा 
रिश्तों के अर्थ बस इनसे ही बचे हैं 
वे सच्चे हितैषी और नागरिक हैं हमारे बीच के 
बस वे शब्दों की कारीगरी नहीं जानते !

वे सही समय पर पहुंचते हैं 
जहाँ पहुँचना होता है 
बदहवास से पसीने से भरा 
रूखा चेहरा लिए और अस्त - व्यस्त !
यह कहते हुए कि-
अभी पता चला भाई साहब 
और सीधा चला आ रहा हूं ....।



भागलपुर

मूंग के मसालेदार पापड़ इन्हीं तंग गलियों में तैयार होते थे और दूसरे छोटे शहरों - गाँवों में राजस्थानी बीकानेरी के नाम से बिकते थे 

सालों बाद एक दिन लौटना होता है 
सम्मोहन से

बरसों बाद इस शहर का कोई मिलता है तो उमग कर उसका नंबर ज़ल्दी से नोट कर लेते हैं और अतीत को लेकर नाॅस्टेल्जिक हुए जाते हैं! 

एक फ़ोन कॉल की दूरी पर अतीत के‌ किस्से मिलेंगे 
यह जानते हुए भी कोई किसी को फ़ोन नहीं करता

पापड़ किसी मशीन पर तैयार होने लगते हैं 
उनको बेलती- सुखाती स्त्रियों की एक याद भर रह जाती है 
लॉज में रहने वाले लड़कों का कोई पता नहीं मिलता 
दो भव्य सिनेमाघरों की जगह नये अपार्टमेंट मिलते हैं और हम भौंचक रह जाते हैं
हम भी कभी इसी स्मार्ट बनते शहर का हिस्सा थे 
यह सोचते हुए एक उदासी फैल जाती है भीतर 

कनपटी पर बाल सफेद हो आए हैं 
एक साइकिल की याद आती है
तीस बरस पहले की अपनी ही छवि के साथ 
जिसने इस शहर की गलियों में भटकना सिखाया! 
 
उल्टा पुल पर खड़े होकर देखता हूं रेलवे स्टेशन 
जो भव्य लेकिन अब पराया लगता है 

इस पुल पर गंगा की कछारों की तरफ़ से साइकिल पर केले आते हैं बिकने को 
तीस के दो दर्जन खरीदता हूं 
और नोनीहाट की बस पकड़ता हूं।



मैं लौटूँगा

तबादले का मतलब
एक शहर के जीवन से 
सभी चीजों का छूटना नहीं है 

एक शहर से विदा होने का मतलब 
स्मृतियों और यादों का समाप्त हो जाना नहीं है 

मैं कमान से निकला हुआ तीर नहीं हूँ 
जो नहीं लौटूंगा फिर !

मैं लौटूँगा तुम्हारे पास 
पर उस तरह से नहीं 
जैसे लौटकर आते हैं 
हर बरसात में इस देश के कुछ हिस्सों में 
प्रवासी पक्षियों के समूह

या जैसे लौट आते हैं 
बसंत के महीने में पेड़ों पर नए पत्ते 
या शाम आती है जैसे !

नहीं लौटूँगा उस तरह से !

जीवन में उम्मीद और 
किनारों पर लहरों की तरह लौटूँगा

मैं तुम्हारी नींद में लौटूँगा 
किसी सुंदर सपने की तरह

लौटूँगा तुम्हारी त्वचा और साँस में 
हवाओं के साथ 

शायद लौटूँ पंछी बनकर और तुम्हारे कमरे के रोशनदान पर बसेरा करूँ ....
बहूँ तुम्हारे रक्त में तुम्हारे कुँए का जल बनकर

बिखरूँ ...
गुनगुनी धूप का टुकड़ा बनकर 
सर्दियों के दिनों में तुम्हारी छत पर 

देखना, तुम्हारे घर की ख़ाली ज़मीन पर 
बनस्पति बनकर उगूँगा 
और चौके में आऊँगा तुम्हारे पास

तुलसी की पत्तियाँ बन जाऊँगा तुम्हारे आंगन में 
तुम खाँसी की तकलीफ में उबालकर मुझे पीना !

देखना मैं लौटूँगा कुछ ऐसे ही 
और वह लौटना दिखाई नहीं देगा !



माँ की शाॅल

माँ की वह शाॅल कपड़ों के बीच रखी है 
इस तरह से उसे रोज़ एक बार देख ही लेता हूं 
उसे ओढ़े हुए एक तस्वीर है
मेरे ब्याह के बाद की सुबह की 
जब रात हुई बूंदाबांदी से छत भीगी हुई थी 
और फोटोग्राफर ने शहर वापस लौटने से ठीक पहले मुझसे कहा था -चलिए ऊपर, माँ की एक अकेली तस्वीर खींच देते हैं
 
एक बार वह कह रही थी-
बढ़िया शाॅल है
यह मौसी पर भी अच्छी लगेगी 
लेकिन उसने जाने किस संकोच में नहीं कहा होगा कि एक मौसी के लिए भी ले लेना

मौसी सुदूर देहात में रहती थी 
दिक्कतों से भरे उसके जीवन को हम जानते थे 

जाड़े की साँझ को एक बार मैं घर लौटा 
देखा, लकड़ियाँ जलाकर माँ आग ताप रही थी 
घर के अंदर आते हुए सबसे पहले उसे यही बताया कि एक ऐसी ही शाॅल मौसी को देकर आ रहा हूँ 

एकाएक माँ का गला भर आया 
वह कुछ बोल नहीं पा रही थी 
मुझे लगा कि वह कुछ और पूछेगी
पर वह कोई गीत गाने लगी 
जो अक्सर वह सोते समय या एकांत में
या भावुक होने पर गाती थी

दो दिन बाद जब मैं अपने काम पर निकल रहा था उसने मौसी के बारे में जानना चाहा कि उस भेंट में वह कैसी थी, क्या कह रही थी 

वह तो ले भी नहीं रही थी
कहा -"दीदी को ही अच्छी लगेगी, 
हम देहात में रहते हैं, इतना बढ़िया शॉल ओढ़कर कहां जाएंगे !"

माँ ने इतना भर कहा-
शुरू से ही संतोषी रही हमारी यह बहिन ! 

यह कहते हुए जब सुना तो लगा कि 
भाई-बहन यादों में कभी बूढ़े नहीं होते 
उनकी संवेदना का कोई भी रूप हमें जीवन के अंजान क्षितिजों की तरफ ले जा सकता है !

और संभव है कि वह एक शाॅल ही हो !



वे दिन और रात की तरह सच हैं

वे हर एक शहर में हैं 
काम पर जाती हुईं 
काम से लौटती हुईं

शोहदों और लफ्फ़ाज़ों के अनंत शोर से 
अपने को बचाने की कोशिश में भरी हुईं

वे दिन और रात की तरह सच हैं 
हमारी दुनिया में 

साधूजनों की वाणियों उनके लिए परोसी शालीनता और अखबारों में दर्ज़ क्रूरताएँ भी हैं अपनी जगह

उनके सपनों अकेलेपन और संघर्षों के अनंत किस्से लिखते रहे हैं शहरों के कवि !

कहा गया है ओस की तरह हैं उनकी इच्छाएँ 
जो कठिन मेहनत और दुख की आँच में सूख जाती हैं

लंबी उम्र जीती हैं उनमें से बहुत कम 
प्रसवास्था में मर जाती हैं 
या छोटी- मोटी बीमारियों में 

और हरेक शहर की छोटी - संकरी गलियों में 
उनके किराए के घर 
अनगिनत स्मृतियों की गंध से 
देवताओं के फोटुओं से 
सस्ती अगरबत्ती की बची हुई खूशबुओं में तिरते हुए।


दो औरतों की नियति कथा 

यह उन दो स्त्रियों की नियति कथा है 
जो गाँव बदर कर दी गयीं- जिनके बारे अब कहा जा रहा है कि अकेली थीं वे इस संसार में 
उनके भीतर अकेलेपन का एक गहरा कुआँ था जिसमें वे हमेशा गिरी रहीं !

अब वे गाँव बदर कर दी गई हैं तो ज़ाहिर है एक दिन उनके किस्से में लोगों को वह तरलता नहीं मिलेगी 
जिनके बारे में सबसे पहले घोषित हुआ कि वे अव्वल दर्जे की वेश्यायें थीं 

प्रमाण में यह बताया गया कि वे लड़कियों स्त्रियों से हंसी-ठट्ठा करती थीं, लेकिन मर्दों को देखकर ख़ामोशी में पड़ जाती थीं 

डर था मुर्गियों में फैले उस वायरस की तरह कि एक दिन गाँव की सारी स्त्रियों को वेश्या बना डालेंगीं वे मात्र दो स्त्रियाँ !

वे सिर्फ दो स्त्रियाँ थीं और गांव के सीमांत पर एक किराए के मकान में रहती थीं

कयास यह भी था वे पाकिस्तान से भेजी गई खुफिया औरतें हैं जिन्हें यहाँ की औरतों का चरित्र और ईमान नष्ट करने के वास्ते भेजा गया है 

यहाँ आपका विस्मय वाजिब है भाई साहब ! 
गाँव की सारी औरतों का चरित्र और ईमान कैसे नष्ट हो सकता था
वे संपन्न थीं और दोनों शाम भरपेट भोजन करती थीं
उनके पास उनके पति थे मर्यादाओं से घिरी एक शालीन समाजिकता थी

अब वे दो औरतें जिन्हें गाँव बदर कर दिया गया है, कैसे कह सकते हैं कि वे वेश्यायें या खुफिया ही थीं ?

क्या एक स्त्री का जिन्दादिल होना और किराए के मकान में अकेली रहना उसके वेश्यापन या खुफिया होने के लक्षण हैं ?

तो उस आदमी को आप वेश्यागामी कहेंगे जो उन औरतों से थोड़ी दूर, अकेले उन्हीं की तरह, एक किराए के मकान में रहता था ?

संभव है वे दो औरतें यहाँ एक नई जिंदगी शुरु करने यहां आई हों और हम उन्हें जल्दीबाजी में वेश्यायें कह बैठे हो !

वे वेश्यायें होतीं तो नियमित रूप से अखबार नहीं मँगाती !

वे वेश्यायें या संदिग्ध भी कहाँ थीं 
जब किसी ने उन्हें धंधा करते हुए नहीं देखा !!

सुना तो यह भी गया कि वे दोनों बहनें थीं 
एक लंबी उम्र पार करने के बाद भी अनब्याही थीं और पुरुषों से घृणा करती थीं 

लेकिन इस दुनिया में अब वे सिर्फ दो औरतें थीं 
अकेली थीं जवान थीं

विडंबना है
अकेली और जवान औरतों के बारे में कुछ भी कहने से इस समाज का मुंह स्वाद से भर जाता है !

वे गाँव बदर के कहाँ गईं कोई नहीं जानता....

तय है वे जहाँ से आयी होंगी वहाँ से उनके सारे निशान मिटाये जा चुके होंगे 

यहाँ वे अपनी पहचान ढूँढ़ने आई होंगी और हमने उन्हें शीघ्रता में वेश्यायें कह दिया !

गाँव बदर के बाद वे वेश्यायें कहाँ गई होंगी
वे फिर किस दिशा में कौन से नगर को जाएँगी और कहाँ बसेंगी...!

और जहाँ क्या निश्चित है कि 
उन्हें वेश्यायें ना कहा जाए ?


और अन्त में

जिसके पास विज्ञापन की सबसे अच्छी भाषा थी

... वह बचा

... वह औरत बची, 
जिसके पास सुन्दर देह थी 
और जो दूसरों के इशारे पर रात-रात भर नाचती रही

कुछ औरतें और मर्द

जिनमें ख़रीदने की हैसियत थी 
और वे सारे लोग बचे 
जो बेचने की कला जानते थे!






विनय सौरभ 

जन्म 22 जुलाई, 1972 को नोनीहाट, संथाल परगना, झारखंड । टी. एन. बी. कॉलेज भागलपुर से स्नातक और भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा। पिछले तीन दशक से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, संस्मरण, लेख आदि प्रकाशित होते रहे हैं।पहला कविता संग्रह 'बख्तियारपुर' प्रकाशित।

राजभाषा विभाग एवं राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार के 'युवा लेखन पुरस्कार', कादंबिनी का युवा लेखन पुरस्कार, 'कवि कन्हैया स्मृति सम्मान', 'सूत्र सम्मान', 'बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान' से सम्मानित ।

सम्प्रति झारखंड के सहकारिता विभाग में कार्यरत‌ ई-मेल : nonihatkakavi@gmail.com




सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।








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