मनोज कुमार झा की कविताएं

 


मनोज कुमार झा 



मनोज कुमार झा की कविताएं इस मायने में अलग और महत्वपूर्ण हैं कि उनके यहां मनुष्य और जीवन के वे दृश्य और बिंब हैं जो लगभग अलक्षित हैं।वैसी ही जीवटता उनकी कविताओं में है जो हाशिए पर जी रहे थके,हारे,टूटे और रोज रौंदे जा रहे निरीह और निर्बल मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। उनके यहां दुःख है,शोक है,करुणा है लेकिन पराजय लगभग अनुपस्थित है।


मनोज कुमार झा की कविताएं 




पथिको के साथ

कोई घर से निकलता है
                    उग आता है जंगलों में
घर के सांकल पर
                   छूटी हुई हस्तरेखाएं ।
मह मह करने लगा है आत्म-वन
              अश्रुओं में वनफूलों का रस ।

एक देह जो कि दुर्बल मां की कोख में बढ़ा था
घूमता है रक्तस्नात वन में अगोरता बीजों से भरा घड़ा

याद आते गए अकस्मात वे लोग
 जो पथिको के साथ पार करते थे चक्करदार रास्ते
बतियाते रुकते पानी पीते
गाते किसी पक्षी के कंठ से फूटा प्रेमगीत।




आशा 

एक शब्द लिखा - वृक्ष 
उड़ते आए पक्षिगण 
तैयार हुए घोंसले 
दौड़े आए मेघ 
आई समुद्र की आवाजें 
और भी बहुत कुछ ज्ञात अज्ञात 

पूरी पृथ्वी पर पूर्वजों ने गोड़ रखी हैं सुंदर कविताएं 
करते रहो याद 
एक ना एक दिन सुंदर बनेगी दुनिया।






परछाइयों में प्रकाश 

कहा तो यही जा रहा था कि 
         आगे रौशनी नहीं है 
मगर फिर भी लोग आगे गये 
और आगे रौशनी थी

बार बार यही देखा गया है 
कि लोग जब चलते हैं 
तो चलने की परछाइयों में प्रकाश फूटते हैं।




ईरान में मारे गए बच्चे 

न्यूनतम मनुष्य तो हूं ही कि पूछूं 
एक सौ सत्तर बच्चे क्यों मारे गये 

क्या वे न्यूक्लियर बम बना रहे थे?

वे तो दुनिया में अभी आये थे
और उन्हें ये भी नहीं पता था कि
युद्ध क्यों होता है
और क्यों मरते हैं उनमें बच्चे और तितलियां 

वे तितलियों के पीछे भागते बच्चे 
एक दिन अपने देश के हुक्मरानों से भी सवाल पूछ सकते थे 
जिन्हें दूर देश के हुक्मरानों ने हमसे छीन लिया।





न्याय

कल एक कवि को एक चांद मिला
उसने चांद को हाल ही में उठे एक समंदर में रख दिया 

किसी ने बताया था कि जिसका चांद खोया है उसी के आंसुओं से समंदर भी बना है।







सबका भाग

बच्चों की भूख से सीझ रहा चावल 
या बूढ़ी माई की लालसा से

या मुंडेर पर जो बैठा है पंछी 
जूठन की आस में
उसको देखकर डभका है अदहन 

कौन सिझाता चावल को पानी भूख या आग 
एक पेट का नहीं है सब कुछ , सबका अपना भाग।





वे दो मिलकर अकेले थे

पति पत्नी रहते थे 
और कहते थे हम अकेले हैं।

वे कुछ इस से एक थे कि 
कहने लगे थे कि हम अकेले हैं।

वे इस तरह पूरे थे कि अकेले थे।





नागार्जुन के प्रति बार बार 

बाबा!आपको पढ़ने के बाद बार बार जैसे कुछ सूझता है
                                      मन में कुछ टूटता है 
मगर आखर जोड़ना होता जाता कठिन आपको गुनने के बाद 
कैसे कहूँ कालिदास से लेकर कुर्सीदास से
                       कि सच सच बतलाना 

मगर कोसी कछार में अब भी बिलखते हैं लोग
मिटे हैं नहीं अभी वे पुराने रोग 
इसलिए बार बार लौटता हूं आपके आंगन में 
बार बार करने को अंतिम प्रणाम 
लेकिन बार बार,अंतिम प्रणाम से पहले एक और प्रणाम।









मनोज कुमार झा 


तीन कविता संग्रह प्रकाशित तथापि जीवन, कदाचित अपूर्ण और किस्सागो रो रहा है।
एजाज़ अहमद की किताब अ रिफ्लेक्शन ऑन आवर टाइम्स का हिंदी अनुवाद प्रकाशित।
टेरी ईगलटन, फ्रेडरिक जेम्सन, ज़िजेक, चॉम्स्की आदि चिंतकों के लेखों का अनुवाद प्रकाशित।
बच्चों के लिए भी लेखन।दो कविता संग्रह प्रकाशित।
पुरस्कार - भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार एवं भारतीय भाषा परिषद का युवा पुरस्कार।




सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।





Comments

  1. महेश वर्मा6 June 2026 at 02:15

    सुन्दर कविताएँ हैं, शुक्रिया।

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  2. अरुण कमल6 June 2026 at 02:15

    मनोज झा हमारे सर्वोत्तम कवियों में हैं जो जीवन के मसृण तंतुओं को कला में बदल सकते हैं।

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  3. अनामिका चक्रवर्ती6 June 2026 at 02:16

    वाह वाकई शानदार कविताएं
    बहुत-बहुत बधाई झा जी को ✨

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