फ़रीद ख़ाँ की कविताएं
फ़रीद ख़ाँ की कविताएं
हमारे नायक
एक साथ सैकड़ों इस्तरी किए चेहरों को देखना
मेरे लिए किसी यातना से कम नहीं था।
इसलिए भाग आया मैं पार्टी से बाहर सांस लेने के लिए।
वहाँ कई चेहरों पर धातु के मज़बूत मुखौटे कसे थे।
मैं ज़्यादातर लोगों को पहचान ही नहीं पा रहा था।
वे मेकअप करके आते तो शायद मैं जान पाता
कि वे हमारे नायक हैं और जिन्होंने
कुछ ऐसे कारनामे किए हैं
जिनकी कशिश में खिंचा चला आया था मैं।
मैंने सोचा था कि उनसे मिलकर बताऊँगा
कि मैं आप जैसा ही बनना चाहता था।
पर वे लोग तो कहीं दिखे ही नहीं,
यहाँ तो सबने अपना मुँह छिपा रखा है।
पिता
मेरे पिता कब दरवाज़ा खोल कर
मेरे भीतर आकर बैठ जाते हैं, पता नहीं चलता।
मैं अपने पिता की तरह ही
भड़क कर फेंक देता हूँ खाने की प्लेटें
और पागलों की तरह पीटने लगता हूँ सर।
कई बार धमकी भरे स्वर में करना चाहता हूँ तलाक देकर
घर से निकाल देने की बातें।
पर मेरी पत्नी नहीं है मेरी माँ की तरह।
वह उठ कर पीट सकती है और
ज़रूरत पड़ने पर निकाल भी सकती है घर से।
वह ‘शाहीन बाग़’ से होकर आई है
और उसे भूत भगाना अच्छे से आता है।
यह देखकर कब निकल जाते हैं
मेरे भीतर से मेरे पिता, पता नहीं चलता।
परिवार
बिखरने की शुरुआत हालांकि पहले ही हो चुकी थी
या कहना चाहिए कि बिखरने को हमेशा
तैयार बैठा था हमारा परिवार
जो आख़िरकार उस बिंदु पर आकर बिखरा
जब एक सदस्य आँधी में उड़ गया।
कुछ लोग उसके पीछे भागे
और कुछ लोग यह कह कर ठहर गए
कि वह तो बचपन से ही बीमार और कमज़ोर था।
दुनिया भर के डॉक्टर भी उसका इलाज नहीं कर पाए।
वह आँधी में अगर नहीं उड़ता तो बाढ़ में बह जाता।
आँधी से बचने के लिए हमारे परिवार ने
जब बंद कर लीं खिड़की दरवाज़े
तो भूकंप के एक झटके में दीवारें ही टूट गईं।
पहचान
जब भरी सभा में हमारे नेता ने नंगे हो कर कहा –
उन्हें कपड़ों से पहचानो
[उन्हें मतलब वह नेता नहीं, उनसे असहमत लोग]
तो एक मामूली आदमी ने भी
सिर्फ़ अपनी जान बचाने के लिए
कपड़े पहनना छोड़ दिया।
उसे हमेशा याद रहता
कपड़ों से पहचानने का आह्वान
और उसका आशय भी
कि पकड़ कर मार डालो उन्हें,
वह देश की बहुसंख्यक पहचान के साथ रहने लगा।
पर उसे इस बात की शंका भी रहने लगी कि अब कहीं
उसकी चमड़ी के रंग से न पहचान लिया जाए उसे
या चमड़ी उधेड़ कर मांस के रंग से
या देह से निकलते रक्त से या हड्डियों से।
राष्ट्र के नाम उपदेश
खाना मांगने वाले भूखों से
वह कहता है कि तुम्हारी कोई मांग है तो
नारे क्यों लगाते हो ? लोगों को क्यों भड़काते हो ?
तुम्हें अहिंसक तरीक़े से भूख हड़ताल करनी चाहिए और
भूख हड़ताल तो तुम घर पर भी कर सकते हो।
रास्ते क्यों जाम करते हो ?
फिर वह दूसरे अन्य लोगों से कहता है कि
देख लो इन पेटुओं को,
अब बचा ही नहीं कुछ भी खाने को।
इनके पास अगर कुछ है तो बस नारा है लगाने को।
इन नारा लगाने वालों की वजह से ही राष्ट्र का वातावरण दूषित है।
ऐसे वातावरण में बेहतर है कि तुम सब घर पर ही रहो।
कम खाओ, कम पियो, संभव हो तो कम जीयो।
ताक़तवर लोग
ताकतवर लोग सबसे अधिक डर कर रहते हैं।
वे अपनी पूरी ताक़त झोंक देते हैं
ताकत के प्रदर्शन में।
उन्हें सबसे ज़्यादा पता होता है
भय में जीने के बारे में।
वह अपने प्राचीन इतिहास का बंकर बना कर रहते हैं
और रात – रात भर पहरे देते हैं अपनी स्मृतियों पर।
जब भी चलते हैं वे, तो झुण्ड में चलते हैं
और गुर्रा कर बातें करते हैं।
वे काट खा सकते हैं किसी भी बात पर।
वे मूत सकते हैं किसी भी माथ पर।
वे परिवहन के नियमों का
कर सकते हैं उल्लंघन,
पीट सकते हैं ठेला लगाने वालों को
और किसी भी चौराहे पर खड़े होकर
उतार सकते हैं कपड़े।
उनके आतंक से पैदा होता है
एक अन्य ताकतवर झुण्ड
जो अपने बंकर में रात रात भर,
देता है पहरे और जंगली जानवरों की तरह
घात लगा कर नज़र रखता है अँधेरे में
आते जाते लोगों पर।
कमज़ोर लोग
चूंकि कोई व्यक्ति ताक़तवर लोगों की तरह
धूर्त न हो सका इसलिए कमज़ोर है।
चूंकि कोई व्यक्ति ताक़तवर लोगों की तरह
कमज़ोर न हो सका, इसलिए कमज़ोर है।
चूंकि कोई व्यक्ति ताक़तवर लोगों की तरह
डरपोक न था इसलिए कमज़ोर है।
चूंकि कोई व्यक्ति ताक़तवर लोगों की तरह
सरकार में न था इसलिए कमज़ोर है।
कमज़ोर लोगों से डर कर ही
ताक़तवर लोगों की सुरक्षा बढ़ाई जाती है।
ताक़तवर लोगों की एकता क़ायम रखने के लिए
शक की सूई बनाई जाती है।
शक की सूई घुमाने के लिए ही
बनाये जाते हैं कमज़ोर लोग।
पर्यटकों की नज़र से बचाने के लिए
खड़ी की जाती हैं दीवारें,
जहाँ – जहाँ भी रहते हैं कमज़ोर लोग।
कमज़ोर लोगों की बातों से
ताक़तवर लोगों की
दुनिया भर में बदनामी होती है।
इसलिए हर ताक़तवर आदमी सोचता है
कि उसके देश में कमज़ोर लोग न होते
तो कितना अच्छा था।
पर चूंकि हुकूमत करने को
बहुत ज़रूरी होते हैं कमज़ोर लोग
इसलिए मेहनत और लगन से
बनाये जाते हैं कमज़ोर लोग।
उन्हें नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाता है और
सब्र के मीठे फल का इंतज़ार करवाया जाता है.
उनकी मेहनत की हर रोटी किनारे से
कुतर ली जाती है थोड़ी – थोड़ी।
जो दूसरों की कमाई नहीं खा सकते
वह होते हैं कमज़ोर लोग।
फ़रीद ख़ाँ
जन्म – 29 जनवरी 1975.
पटना में जन्मे और पले बढ़े। पटना विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में एम ए। पटना इप्टा के साथ जुड़ कर रंगकर्म। लखनऊ के भारतेंदु नाट्य अकादमी से नाट्य कला में दो वर्षीय प्रशिक्षण। पिछले कई वर्षों से मुम्बई में फ़िल्म और टीवी के लिए व्यवसायिक लेखन। डॉक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी के साथ "उपनिषद गंगा" नामक धारावाहिक का लेखन। फ़िल्म ‘पटना शुक्ला’ में सह-लेखक।
कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित हुईं जिनमें कृत्या, दो आबा, कथादेश, तद्भव, समावर्तन, आलोचना, अक्षर, समालोचन, इंडियन लिटरेचर (साहित्य अकादमी), उद्भावना, माटी, हंस, वनमाली कथा, आदि प्रमुख हैं।
"लिखनी होगी एक कविता" संपादक : प्रेमचंद सहजवाले (2013), "पांचवां युवा द्वादश" संपादक : निरंजन श्रोत्रिय (2017), "दूसरी हिंदी" संपादक : निर्मला गर्ग (2017), “प्रतिरोध में कविता” संपादक : रणजीत वर्मा (2021) और “कंटीले तार की तरह” संपादक : संजय कुंदन (2021) आदि कविता-संचयनों में कविताएँ। साइकिल का जनतंत्र, संपादक : यादवेन्द्र। Dervish in the city of Merchants, Translated And Edited by Kumar Krishan Sharma. PERENNIAL, Translated And Edited by Sourav Roy & Tuhin Bhowal.
प्रकाशित पुस्तक : ‘अपनों के बीच अजनबी’ [कथेतर गद्य], वाम प्रकाशन। गीली मिटटी पर पंजों के निशान [कविता संग्रह], सेतु प्रकाशन। मास्टर शॉट [कहानी संग्रह], लोकभारती प्रकाशन। Stranger In My Own Land, Translated by Jerry Pinto, Left Word Publication.
अंग्रेजी, मलयाली, मराठी. पंजाबी और नेपाली में कविता और कहानी का अनुवाद और प्रकाशन।
संपर्क - kfaridbaba@gmail.com
सभी तस्वीरें pinterest से साभार।







फरीद खां की बेहतरीन कविताएं कौशिकी के माध्यम से पढ़ने को मिली।
ReplyDeleteनए राष्ट्र की आक्रमकता को जिस तरह से इनमें चिह्नित किया गया है, वह इन कविताओं की ताकत है।
पिता और परिवार, दोनों ही कविताएं पितृसत्ता और एक संवेदनशील व्यक्ति के बिखरने की दास्तां को बयान करती है।
पिता कविता को मैं फरीद खां की काव्यात्मक उपलब्धि के रूप में हमेशा अपनी स्मृति में रखना चाहूंगा।
फरीद भाई इन कविताओं के लिए बहुत बधाई।।
कौशिकी के माध्यम से लगातार अच्छी कविताएं पढ़ने को मिल रही है।
अत्यंत प्रभावी कविताएँ । आप दोनों को बधाई।
ReplyDeleteफरीद खां जी की कविताएं सच बयां करते हुए समाज को नंगा करती सी लगती है। इस नंगई का अर्थ है हमारे आस-पास का खरा चेहरा।
ReplyDeleteफ़रीद ख़ाँ की कविताएं आज के मुश्किल समय को सामने लाती हैं। इनमें आज के खंडित नायकत्व को एक अलग अंदाज़ में बेपर्द करने की कोशिश दिखती है। इनमें आम आदमी की पीड़ा,बेबसी, असुरक्षा की भावना को सहज अभिव्यक्ति मिली है। इनमें परिवार के टूटने -बिखरने का मार्मिक चित्रण किया गया है। आंधी में खिड़कियों को बंद करते ही भूकंप में दीवार ढह जाती है। भय और असुरक्षा सब जगह है। इनमें एक अल्पसंख्यक का दर्द भी दिखाई देता है। इन कविताओं में कमज़ोर और ताक़तवर के बीच अंतर को भी लक्षित किया गया है। एक जगह शाहीन बाग़ से हो आई एक औरत के अंदर के साहस को भी दिखाया गया है। सबसे बड़ी बात है कि फ़रीद ख़ाँ की कविताएं शब्दजाल से नहीं,जीवन की सहज उपस्थिति से वेधक बनी हैं। उनको बधाई एवं शुभकामनाएं।
ReplyDeleteफ़रीद ख़ाँ की कविताएँ हमारे समय के सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय संकटों का तीखा और बेचैन कर देने वाला दस्तावेज़ हैं। इन कविताओं में सत्ता, भय, पहचान, परिवार और मनुष्य की विडंबनाओं को जिस निर्भीकता और व्यंग्यात्मक तीक्ष्णता के साथ अभिव्यक्त किया गया है, वह समकालीन कविता में उनकी अलग पहचान निर्मित करता है। ‘हमारे नायक’ में मुखौटों के पीछे छिपे चरित्रों की पहचान का संकट हो, ‘पहचान’ में बहुसंख्यक हिंसा का भयावह यथार्थ, ‘राष्ट्र के नाम उपदेश’ में व्यवस्था का निर्मम पाखंड, या ‘कमज़ोर लोग’ में ताक़त और शोषण की संरचना का विश्लेषण—हर कविता अपने समय के अँधेरे को उजागर करती है। विशेष रूप से ‘पिता’ जैसी कविता निजी जीवन और सामाजिक बदलाव के द्वंद्व को जिस मार्मिकता और व्यंग्य के संतुलन के साथ रखती है, वह उल्लेखनीय है। फ़रीद ख़ाँ की कविताएँ केवल प्रतिरोध की कविताएँ नहीं हैं, बल्कि वे पाठक को भीतर तक विचलित करते हुए यह सोचने के लिए विवश करती हैं कि हम किस समाज में रह रहे हैं और किस तरह धीरे-धीरे मनुष्यता को खोते जा रहे हैं।
ReplyDeleteफरीद जी की कविताएं सम-सामयिक हैं और उद्वेलित भी करती हैं. वो बड़ी-बड़ी बातों के बजाय खरी-खरी बातें कहने को तरजीह देते हैं. यह एक रचनाकार के लिए रचनाकार बने रहना की आवश्यक शर्त है जिसका पालन वो अपनी रचनाओं में हमेशा करते रहे हैं.
ReplyDeleteकविताएं पढ़ी है। आपका चयन इस बात का तस्दीक करता है कि कविताएं अच्छी हैं। विविधता तो होनी ही चाहिए।
ReplyDeleteस्वागत है। फ़रीद खां की कविताएँ मैं पढ़ता रहा हूँ। वह सत्ता की चालों पर बारीक पकड़ रखने वाले एक सशक्त व जनपक्षधर कवि हैं।
ReplyDeleteकमाल है
ReplyDeleteफ़रीद की कविताओं में दर्ज निराशा परिवार, समाज और देश के दरकते विन्यास को प्रतिध्वनित करती है। बाहरी दबाव से बचने के लिए जो परिवार अपने घरों की खिड़कियां बंद करेगा, भीतरी उबाल से उसकी दीवारें निश्चित ही भरभरा जाएंगी। जो समाज ताक़तवर लोगों की कुंठा का जाप करेगा और कमज़ोर लोगों की फौज खड़ी करेगा, उसे बिखर जाने से भला कौन रोक सकता है। जो देश अपने रहवासियों के अधिकारों को रिड्यूस करता हो और उनकी पहचान का संकट खड़ी करता हो, उसे बेपर्द होने में कितनी देर लगेगी भला। हमारे नायक, पहचान, राष्ट्र के नाम उपदेश, ताक़तवर लोग, कमज़ोर लोग जैसी कविताओं में फ़रीद ने सामूहिक आशंका और फ़िक्र को आवाज़ दी है। फ़रीद के सहज शब्द कितने वजनदार और असरदार हैं, उनकी कविताएं इसकी तस्दीक करती हैं।
ReplyDeleteबहुत कुछ अपने में समाई हुई कविताएं लगी जिनमें अपना समय नेपथ्य में हँस रहा है। अभिनंदन कवि फ़रीद खां ।
ReplyDeleteफ़रीद खां अपनी कविताओं में समय,समाज और सत्ता का वो चेहरा बेनक़ाब करते हैं जिनकी असलियत डरावनी व भयानक है।
ReplyDeleteकौन हैं 'हमारे नायक' इनके चेहरे इस्तरी किये हुए और मज़बूत मुखौटों के पीछे छिपे हैं इन जन नायकों का चरित्र इतना संदिग्ध है कि इन्हें फाॅलो नहीं किया जा सकता न इन्हें आदर्श माना जा सकता है।
'पिता' कविता संकेतों में आगाह करती है कि स्त्री अब सहने,झेलने, प्रताड़ित होने को तैयार नहीं।पिता की पीढ़ी बीत चुकी, मां ने सह लिया जितना सहना था अब बहू का ज़माना बदल चुका है। फिर भी हाल ही में घटित ट्विशा कांड भुलाए नहीं भूलता एक सक्षम युवती प्रताड़ित होकर मारी जाती है या मार दी जाती है समाज का इससे विकृत चेहरा और क्या होगा।
परिवार, पहचान जैसी कविताएं एक जाति विशेष के संकटग्रस्त जीवन को लक्षित कर उनके भीतर घर कर गये भय व असुरक्षा को व्यक्त करती हैं।
' राष्ट्र के नाम उपदेश '
साफ़ है -
'कम खाओ,कम पियो,संभव हो तो कम जियो'
बाक़ी क्या रहा.....? जन साधारण इंसान नहीं केवल एक मतदाता है, उपेक्षित,निरीह,निरापद।
ताक़तवर लोग और कमज़ोर लोग ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जिनके पास ताक़त है वे 'डर कर रहते हैं'
डर भी एक नहीं अनेक तरह के। इसी डर से उबरने के नाना प्रकार के उपाय ये निरंतर जारी रखते हैं।
कमज़ोर लोग धूर्त नहीं हैं, डरपोक नहीं है इसलिए कमज़ोर हैं।
कमज़ोरों के अपने नैतिक मूल्य हैं, संस्कार हैं, शालीनता है जिनका निर्वाह करते -करते एक दिन समाप्त हो जाते हैं।
बेहद महत्त्वपूर्ण कविताएँ। फ़रीद ख़ाँ शब्दों पर बिना कोई आवरण चढ़ाए अपनी बात कहते हैं। इस तरह उनमें अभिधा की ताक़त दिखाई देती है।
ReplyDelete
ReplyDeleteफरीद की कविताओं से गुजरना अपने समय की धड़कन से गुजरने जैसा है। वस्तुतः हमारे समय की चेतना की माँग की तरह हैं ये कविताएँ। इतनी अच्छी कविताओं को पढ़वाने के लिए आभार। इन कविताओं के कई पाठ की जरूरत है। हर पाठ में कविताऐं और खुलतीं हैं और पाठक की आवाज़ बनती जातीं हैं। पहली कविता में स्त्री किए हुए चेहरे और उनसे मिलने की आकाँक्षा जिसने मिलने कवि पार्टी में गया था। दूसरी कविता में पिता के माध्यम से पुरूष प्रधान समाज और भूत भगाने की व्यंजना बहुत प्रभावशाली तरीके से आपनी बात रखने में सक्षम है।परिवार कविता में परिवार हमारे समय का पूरा समाज है और समकालीन विडम्बना खुलकर सामने आती है। पहचान कविता राजेश जोशी की कविता मारे जाऐेगे का वृहत्तर पाठ है। उन्हें कपड़ों से पहचानो/ [उन्हें मतलब वह नेता नहीं, उनसे असहमत लोग]/....../सिर्फ़ अपनी जान बचाने के लिए/कपड़े पहनना छोड़ दिया। पंक्तियों में समकाल का बड़ा आयतन दिखाई देता है। राष्ट्र के नाम उपदेश कविता जब कवि यह लिखता है कि -ऐसे वातावरण में बेहतर है कि तुम सब घर पर ही रहो/कम खाओ, कम पियो, संभव हो तो कम जीयो। तब हमारा यथार्थ और हमारे समय की सत्ता का षडयंत्र खुलकर सामने आ जाता है। ताक़तवर लोग कविता वह शाश्वत उद्घाटित करती है जो कहता है - ताकतवर लोग सबसे अधिक डर कर रहते हैं फिर कविता बहुत बारीकी से उनकी प्रविधि को प्रकाशित करती है।इसी के आगे की कविता है कमज़ोर लोग। इस कविता में चूंकि कोई व्यक्ति ताक़तवर लोगों की तरह/धूर्त न हो सका इसलिए कमज़ोर है.....डरपोक न था इसलिए कमज़ोर है.....सरकार में न था इसलिए कमज़ोर है....जो दूसरों की कमाई नहीं खा सकते लिखकर कवि ने उस आख्यान को रच दिया है जो मनुष्यता के बरक्स अमानवीय संस्कृति के पोल खोलने में सक्षम है। कौशिकी हमारे समय की महत्वपूर्ण कविताओं को रेखांकित करने में सफल है और साहित्य के सरोकार की जीवित बचाने का सार्थक प्रयास कर रही है। पुनः आभार।
फ़रीद ख़ाँ की कविताओं के प्रस्थानक
ReplyDelete-सेवाराम त्रिपाठी
कौशिकी के माध्यम से फ़रीद ख़ाँ की कविताएं पहली बार पढ़ रहा हूँ।इनमें कोई तामझाम नहीं है। इनका लहज़ा भी सधा हुआ है।इन कविताओं में प्रतिरोध के विविध रूप हैं और अंधेरे समय का खूंखार यथार्थ और सघन परछाइयाँ भी विद्यमान हैं।कविताएं भले ही छोटी - छोटी हैं लेकिन उनके ‘ ‘ लोकेशन ‘ और ‘ नैरेटिव ‘ का पता हर कोई आसानी से समझ लेता है। उनका कथ्य एकदम खुला हुआ है।कविताओं को पढ़ते हुए उसमें आतंक, मज़बूरी और हमारे समय ,समाज और जीवन की अनेक त्रासदियां सहज ही देखी जा सकती हैं । और उसमें पिरोया हुआ त्रास भी।
ये कविताएं हमारे समय का विखंडित कोलॉज बनाती हैं। और यातना का मूर्त रूप पेश करती हैं।इनमें जनतंत्र और मनुष्यता के चिंदी चिंदी रूप असानी से देखे जा सकते हैं। ज़िंदगी में अल्प संख्यकों के यथार्थ के बड़े वीभत्स रूप हैं। इनमें अभिव्यक्त गहन पीड़ा ,संत्रास और सिसकियों को और भीतरी - भीतर रिस रहे गुस्से को भी गंभीरता से समझा जा सकता है। इनमें लगातार एक असहायता चिपकी हुई है। और हमारे समय की सर्वव्यापी संकीर्णता और बौनापन भी, यही नहीं आंतरिक दुःखों के दहानें भी ।कवि इनका ज़िक्र करता है और असहमति को सत्ता व्यवस्था द्वारा लगभग ‘ सीलबंद ‘ करने की कोशिश की वास्तविकताओं को भी परखता और उजागर करता है।इन कविताओं में कितनी घुटन और बेचैनी है और न जाने कितनी कश्मकश है।राष्ट्र का चेहरा कट्टरता - क्रूरता और नफ़रत से लबालब है।’ हमारे नायक ‘ कविता का यह अंश पढ़ें - “एक साथ सैकड़ों इस्तरी किए चेहरे को देखना /मेरे लिए किसी यातना से काम नहीं था /इसलिए भाग आया मैं पार्टी से बाहर साँस लेने के लिए/”हमारे जीवन में परिवारों का बड़ा महत्व है।परिवार टूट बिखर रहे हैं। इसका मार्मिक अंश पढ़ें-” आंधी से बचने के लिए हमारे परिवार ने /जब बंद कर लीं खिड़की दरवाज़े/ तो भूकंप के एक झटके में दीवारें ही टूट गईं/”
हमारे जीवन में कितना पोरसा दुःख है जिसे शब्दों में पूरी तरह से बाँधा नहीं जा सकता। उसे ठीक से थाहा भी नहीं जा सकता।’ राष्ट्र के नाम उपदेश’ राष्ट्र के नाम संदेश का ही नया रूपांतरण है।अब वो निरंतर खोखला होता जा रहा है और हास्यास्पद भी।”देख लो इन पेटुओ को /अब बचा ही नहीं कुछ भी खाने को /इनके पास अगर कुछ है तो बस नारा है लगाने को /इन नारा लगाने वालों की वजह से ही राष्ट्र का वातावरण दूषित है/ऐसे वातावरण में बेहतर है कि तुम सब घर पर ही रहो/ कम खाओ ,कम पियो ,संभव हो तो कम जियो/”
फ़रीद ख़ाँ की कविताओं की दुनिया दहशतगर्दी का प्रतिकार करती हैं।समय समाज और परिवेश का कच्चा चिट्ठा भी खोलती हैं।’ कमज़ोर लोग’ कविता का यह हिस्सा देखें - “ चूँकि कोई व्यक्ति ताकतवर लोगों की तरह/धूर्त न हो सका इसलिए कमज़ोर है.. पर चूँकि हुक़ूमत करने को/बहुत ज़रूरी होते हैं कमज़ोर लोग/इसलिए मेहनत और लगन से/बनाए जाते हैं कमज़ोर लोग/”
फ़रीद जी की कविताएं हमारे समय का यथार्थ, आख्यान और प्रतिआख्यान भी रचती हैं। इस तरह की निरंतरता की दुआ करता हूँ।
Ooo
(24/5/2026)
पहली बार फरीद खां की कविताओं से गुजर रहा हूं। फरीद खां की छोटी-छोटी कविताएं हमें सोचने, समझने एवं विचार- विमर्श करने के लिए बाध्य करती हैं तथा संघर्ष को जन्म देती हैं। जैसे--वह कौन है जो हमें नैतिकता का पाठ पढ़ाता है? हमें सोचना होगा, अपने हिस्से की लड़ाई लड़नी होगी, जब - तक सांसों में सांस हैं।इन्हीं पंक्तियों के साथ फरीद खां को बहुत-बहुत बधाई।
ReplyDeleteबढ़िया कविताएँ।
ReplyDeleteफ़रीद ख़ाँ अनूठे कवि हैं जिनकी कविताओं में अपना समय तो है ही व्यक्ति का निजी जीवन भी है।भाषा का नयापन आकर्षित करता है अपनी सरलता के बावजूद ।फरीद आशान्वित करते हैं।
ReplyDeleteअपने समय की धार्मिक और राजनीतिक विद्रूपताओं को उघाड़ती कविताएं हैं।इनमें पित्रसत्ता की बेड़ियों और व्यवस्था की व्यूहता से लड़तींऔरतें हैं।पिता कविता की संरचनात्मकता और तार्किकता बहुत ही अच्छी है। इन कविताओं की उद्गमता को राजनैतिक छलों और मुखौटों में लक्षित किया जा सकता है अत्यंत सुविचारित कविताएं हैं। बहुत-बहुत बधाई।
ReplyDeleteअपने समय के सच को अभिव्यक्त करती बेहद जरूरी कविताएं।
ReplyDeleteप्रिय कवि को बधाई।
कौशिकी टीम का आभार।