फ़रीद ख़ाँ की कविताएं

 

फ़रीद ख़ाँ 


फ़रीद ख़ाँ की कविताओं में हमारे समय का वह यथार्थ है जो जटिल और उन्माद से भरा हुआ है। यहां सब कुछ इतना विकृत और विद्रूप है कि पहचाने हुए चेहरे को भी पहचान पाना असंभव प्रतीत होता है। यहां हर चेहरे पर मुखौटा है और व्यवस्था इसी मुखौटे के सहारे एक तरफ तो मारने के उपाय करती है तो दूसरी तरफ बचा लेने का दिखावा करते हुए मसीहा बन जाना चाहती है। धर्म और पूंजी के गठजोड़ से जो नया समाज रचा जा रहा है उसमें सारी हिदायतें और सारे सुझाव कमजोर लोगों के लिए हैं जो हाशिए के भी हाशिए पर धकेल दिए गए हैं। बाकी जगह वे ताकतवर लोग लूट चुके हैं जो नीति नियंता हैं और हर अवसर का फायदा उठाने के लिए घात लगाकर बैठे हुए हैं।



फ़रीद ख़ाँ की कविताएं



हमारे नायक 


एक साथ सैकड़ों इस्तरी किए चेहरों को देखना 

मेरे लिए किसी यातना से कम नहीं था।  

इसलिए भाग आया मैं पार्टी से बाहर सांस लेने के लिए। 


वहाँ कई चेहरों पर धातु के मज़बूत मुखौटे कसे थे। 

मैं ज़्यादातर लोगों को पहचान ही नहीं पा रहा था। 

वे मेकअप करके आते तो शायद मैं जान पाता 

कि वे हमारे नायक हैं और जिन्होंने 

कुछ ऐसे कारनामे किए हैं 

जिनकी कशिश में खिंचा चला आया था मैं। 


मैंने सोचा था कि उनसे मिलकर बताऊँगा 

कि मैं आप जैसा ही बनना चाहता था। 

पर वे लोग तो कहीं दिखे ही नहीं,

यहाँ तो सबने अपना मुँह छिपा रखा है।


पिता 


मेरे पिता कब दरवाज़ा खोल कर 

मेरे भीतर आकर बैठ जाते हैं, पता नहीं चलता। 


मैं अपने पिता की तरह ही 

भड़क कर फेंक देता हूँ खाने की प्लेटें

और पागलों की तरह पीटने लगता हूँ सर। 

कई बार धमकी भरे स्वर में करना चाहता हूँ तलाक देकर 

घर से निकाल देने की बातें। 


पर मेरी पत्नी नहीं है मेरी माँ की तरह।

वह उठ कर पीट सकती है और 

ज़रूरत पड़ने पर निकाल भी सकती है घर से।

वह ‘शाहीन बाग़’ से होकर आई है

और उसे भूत भगाना अच्छे से आता है।  


यह देखकर कब निकल जाते हैं 

मेरे भीतर से मेरे पिता, पता नहीं चलता।


परिवार 


बिखरने की शुरुआत हालांकि पहले ही हो चुकी थी 

या कहना चाहिए कि बिखरने को हमेशा 

तैयार बैठा था हमारा परिवार 

जो आख़िरकार उस बिंदु पर आकर बिखरा  

जब एक सदस्य आँधी में उड़ गया। 

कुछ लोग उसके पीछे भागे 

और कुछ लोग यह कह कर ठहर गए 

कि वह तो बचपन से ही बीमार और कमज़ोर था। 

दुनिया भर के डॉक्टर भी उसका इलाज नहीं कर पाए। 

वह आँधी में अगर नहीं उड़ता तो बाढ़ में बह जाता। 


आँधी से बचने के लिए हमारे परिवार ने 

जब बंद कर लीं खिड़की दरवाज़े 

तो भूकंप के एक झटके में दीवारें ही टूट गईं।


पहचान 


जब भरी सभा में हमारे नेता ने नंगे हो कर कहा – 

उन्हें कपड़ों से पहचानो 

[उन्हें मतलब वह नेता नहीं, उनसे असहमत लोग]

तो एक मामूली आदमी ने भी 

सिर्फ़ अपनी जान बचाने के लिए 

कपड़े पहनना छोड़ दिया। 


उसे हमेशा याद रहता 

कपड़ों से पहचानने का आह्वान 

और उसका आशय भी 

कि पकड़ कर मार डालो उन्हें,

वह देश की बहुसंख्यक पहचान के साथ रहने लगा। 

पर उसे इस बात की शंका भी रहने लगी कि अब कहीं 

उसकी चमड़ी के रंग से न पहचान लिया जाए उसे

या चमड़ी उधेड़ कर मांस के रंग से 

या देह से निकलते रक्त से या हड्डियों से।   


राष्ट्र के नाम उपदेश 


खाना मांगने वाले भूखों से 

वह कहता है कि तुम्हारी कोई मांग है तो 

नारे क्यों लगाते हो ? लोगों को क्यों भड़काते हो ?

तुम्हें अहिंसक तरीक़े से भूख हड़ताल करनी चाहिए और 

भूख हड़ताल तो तुम घर पर भी कर सकते हो।

रास्ते क्यों जाम करते हो ? 

फिर वह दूसरे अन्य लोगों से कहता है कि

देख लो इन पेटुओं को, 

अब बचा ही नहीं कुछ भी खाने को। 

इनके पास अगर कुछ है तो बस नारा है लगाने को। 

इन नारा लगाने वालों की वजह से ही राष्ट्र का वातावरण दूषित है। 

ऐसे वातावरण में बेहतर है कि तुम सब घर पर ही रहो। 

कम खाओ, कम पियो, संभव हो तो कम जीयो।


ताक़तवर लोग 


ताकतवर लोग सबसे अधिक डर कर रहते हैं। 

वे अपनी पूरी ताक़त झोंक देते हैं  

ताकत के प्रदर्शन में। 

उन्हें सबसे ज़्यादा पता होता है 

भय में जीने के बारे में। 

वह अपने प्राचीन इतिहास का बंकर बना कर रहते हैं 

और रात – रात भर पहरे देते हैं अपनी स्मृतियों पर।  


जब भी चलते हैं वे, तो झुण्ड में चलते हैं  

और गुर्रा कर बातें करते हैं। 

वे काट खा सकते हैं किसी भी बात पर।

वे मूत सकते हैं किसी भी माथ पर।  

वे परिवहन के नियमों का 

कर सकते हैं उल्लंघन, 

पीट सकते हैं ठेला लगाने वालों को 

और किसी भी चौराहे पर खड़े होकर 

उतार सकते हैं कपड़े। 


उनके आतंक से पैदा होता है 

एक अन्य ताकतवर झुण्ड 

जो अपने बंकर में रात रात भर, 

देता है पहरे और जंगली जानवरों की तरह 

घात लगा कर नज़र रखता है अँधेरे में 

आते जाते लोगों पर।  


कमज़ोर लोग 


चूंकि कोई व्यक्ति ताक़तवर लोगों की तरह 

धूर्त न हो सका इसलिए कमज़ोर है। 


चूंकि कोई व्यक्ति ताक़तवर लोगों की तरह 

कमज़ोर न हो सका, इसलिए कमज़ोर है। 


चूंकि कोई व्यक्ति ताक़तवर लोगों की तरह 

डरपोक न था इसलिए कमज़ोर है।


चूंकि कोई व्यक्ति ताक़तवर लोगों की तरह 

सरकार में न था इसलिए कमज़ोर है। 


कमज़ोर लोगों से डर कर ही 

ताक़तवर लोगों की सुरक्षा बढ़ाई जाती है। 


ताक़तवर लोगों की एकता क़ायम रखने के लिए 

शक की सूई बनाई जाती है। 

शक की सूई घुमाने के लिए ही 

बनाये जाते हैं कमज़ोर लोग।


पर्यटकों की नज़र से बचाने के लिए 

खड़ी की जाती हैं दीवारें, 

जहाँ – जहाँ भी रहते हैं कमज़ोर लोग।


कमज़ोर लोगों की बातों से 

ताक़तवर लोगों की 

दुनिया भर में बदनामी होती है। 

इसलिए हर ताक़तवर आदमी सोचता है 

कि उसके देश में कमज़ोर लोग न होते 

तो कितना अच्छा था। 

पर चूंकि हुकूमत करने को 

बहुत ज़रूरी होते हैं कमज़ोर लोग

इसलिए मेहनत और लगन से 

बनाये जाते हैं कमज़ोर लोग। 


उन्हें नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाता है और  

सब्र के मीठे फल का इंतज़ार करवाया जाता है. 

उनकी मेहनत की हर रोटी किनारे से 

कुतर ली जाती है थोड़ी – थोड़ी। 


जो दूसरों की कमाई नहीं खा सकते

वह होते हैं कमज़ोर लोग।







फ़रीद ख़ाँ

जन्म – 29 जनवरी 1975. 

पटना में जन्मे और पले बढ़े। पटना विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में एम ए। पटना इप्टा के साथ जुड़ कर रंगकर्म। लखनऊ के भारतेंदु नाट्य अकादमी से नाट्य कला में दो वर्षीय प्रशिक्षण। पिछले कई वर्षों से मुम्बई में फ़िल्म और टीवी के लिए व्यवसायिक लेखन। डॉक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी के साथ "उपनिषद गंगा" नामक धारावाहिक का लेखन। फ़िल्म ‘पटना शुक्ला’ में सह-लेखक।

कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित हुईं जिनमें कृत्या, दो आबा, कथादेश, तद्भव, समावर्तन, आलोचना, अक्षर, समालोचन, इंडियन लिटरेचर (साहित्य अकादमी), उद्भावना, माटी, हंस, वनमाली कथा, आदि प्रमुख हैं। 

"लिखनी होगी एक कविता" संपादक : प्रेमचंद सहजवाले (2013), "पांचवां युवा द्वादश" संपादक : निरंजन श्रोत्रिय (2017), "दूसरी हिंदी" संपादक : निर्मला गर्ग (2017), “प्रतिरोध में कविता” संपादक : रणजीत वर्मा (2021) और “कंटीले तार की तरह” संपादक : संजय कुंदन (2021) आदि कविता-संचयनों में कविताएँ। साइकिल का जनतंत्र, संपादक : यादवेन्द्र। Dervish in the city of Merchants, Translated And Edited by Kumar Krishan Sharma. PERENNIAL, Translated And Edited by Sourav Roy & Tuhin Bhowal.   

प्रकाशित पुस्तक : ‘अपनों के बीच अजनबी’ [कथेतर गद्य], वाम प्रकाशन। गीली मिटटी पर पंजों के निशान [कविता संग्रह], सेतु प्रकाशन। मास्टर शॉट [कहानी संग्रह], लोकभारती प्रकाशन। Stranger In My Own Land, Translated by Jerry Pinto, Left Word Publication.  

अंग्रेजी, मलयाली, मराठी. पंजाबी और नेपाली में कविता और कहानी का अनुवाद और प्रकाशन।

संपर्क - kfaridbaba@gmail.com




सभी तस्वीरें pinterest से साभार।



Comments

  1. बसंत त्रिपाठी22 May 2026 at 20:37

    फरीद खां की बेहतरीन कविताएं कौशिकी के माध्यम से पढ़ने को मिली।
    नए राष्ट्र की आक्रमकता को जिस तरह से इनमें चिह्नित किया गया है, वह इन कविताओं की ताकत है।

    पिता और परिवार, दोनों ही कविताएं पितृसत्ता और एक संवेदनशील व्यक्ति के बिखरने की दास्तां को बयान करती है।

    पिता कविता को मैं फरीद खां की काव्यात्मक उपलब्धि के रूप में हमेशा अपनी स्मृति में रखना चाहूंगा।

    फरीद भाई इन कविताओं के लिए बहुत बधाई।।

    कौशिकी के माध्यम से लगातार अच्छी कविताएं पढ़ने को मिल रही है।

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  2. विनोद दास22 May 2026 at 21:33

    अत्यंत प्रभावी कविताएँ । आप दोनों को बधाई।

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  3. पद्मराग मणि22 May 2026 at 22:32

    फरीद खां जी की कविताएं सच बयां करते हुए समाज को नंगा करती सी लगती है। इस नंगई का अर्थ है हमारे आस-पास का खरा चेहरा।

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  4. चंद्रेश्वर22 May 2026 at 22:45

    फ़रीद ख़ाँ की कविताएं आज के मुश्किल समय को सामने लाती हैं। इनमें आज के खंडित नायकत्व को एक अलग अंदाज़ में बेपर्द करने की कोशिश दिखती है। इनमें आम आदमी की पीड़ा,बेबसी, असुरक्षा की भावना को सहज अभिव्यक्ति मिली है। इनमें परिवार के टूटने -बिखरने का मार्मिक चित्रण किया गया है। आंधी में खिड़कियों को बंद करते ही भूकंप में दीवार ढह जाती है। भय और असुरक्षा सब जगह है। इनमें एक अल्पसंख्यक का दर्द भी दिखाई देता है। इन कविताओं में कमज़ोर और ताक़तवर के बीच अंतर को भी लक्षित किया गया है। एक जगह शाहीन बाग़ से हो आई एक औरत के अंदर के साहस को भी दिखाया गया है। सबसे बड़ी बात है कि फ़रीद ख़ाँ की कविताएं शब्दजाल से नहीं,जीवन की सहज उपस्थिति से वेधक बनी हैं। उनको बधाई एवं शुभकामनाएं।

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  5. डॉ उर्वशी22 May 2026 at 22:51

    फ़रीद ख़ाँ की कविताएँ हमारे समय के सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय संकटों का तीखा और बेचैन कर देने वाला दस्तावेज़ हैं। इन कविताओं में सत्ता, भय, पहचान, परिवार और मनुष्य की विडंबनाओं को जिस निर्भीकता और व्यंग्यात्मक तीक्ष्णता के साथ अभिव्यक्त किया गया है, वह समकालीन कविता में उनकी अलग पहचान निर्मित करता है। ‘हमारे नायक’ में मुखौटों के पीछे छिपे चरित्रों की पहचान का संकट हो, ‘पहचान’ में बहुसंख्यक हिंसा का भयावह यथार्थ, ‘राष्ट्र के नाम उपदेश’ में व्यवस्था का निर्मम पाखंड, या ‘कमज़ोर लोग’ में ताक़त और शोषण की संरचना का विश्लेषण—हर कविता अपने समय के अँधेरे को उजागर करती है। विशेष रूप से ‘पिता’ जैसी कविता निजी जीवन और सामाजिक बदलाव के द्वंद्व को जिस मार्मिकता और व्यंग्य के संतुलन के साथ रखती है, वह उल्लेखनीय है। फ़रीद ख़ाँ की कविताएँ केवल प्रतिरोध की कविताएँ नहीं हैं, बल्कि वे पाठक को भीतर तक विचलित करते हुए यह सोचने के लिए विवश करती हैं कि हम किस समाज में रह रहे हैं और किस तरह धीरे-धीरे मनुष्यता को खोते जा रहे हैं।

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  6. फरीद जी की कविताएं सम-सामयिक हैं और उद्वेलित भी करती हैं. वो बड़ी-बड़ी बातों के बजाय खरी-खरी बातें कहने को तरजीह देते हैं. यह एक रचनाकार के लिए रचनाकार बने रहना की आवश्यक शर्त है जिसका पालन वो अपनी रचनाओं में हमेशा करते रहे हैं.

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  7. ललन चतुर्वेदी23 May 2026 at 05:57

    कविताएं पढ़ी है। आपका चयन इस बात का तस्दीक करता है कि कविताएं अच्छी हैं। विविधता तो होनी ही चाहिए।

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  8. विजयशंकर चतुर्वेदी23 May 2026 at 05:58

    स्वागत है। फ़रीद खां की कविताएँ मैं पढ़ता रहा हूँ। वह सत्ता की चालों पर बारीक पकड़ रखने वाले एक सशक्त व जनपक्षधर कवि हैं।

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  9. कमाल है

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  10. सत्यकेतु23 May 2026 at 09:06

    फ़रीद की कविताओं में दर्ज निराशा परिवार, समाज और देश के दरकते विन्यास को प्रतिध्वनित करती है। बाहरी दबाव से बचने के लिए जो परिवार अपने घरों की खिड़कियां बंद करेगा, भीतरी उबाल से उसकी दीवारें निश्चित ही भरभरा जाएंगी। जो समाज ताक़तवर लोगों की कुंठा का जाप करेगा और कमज़ोर लोगों की फौज खड़ी करेगा, उसे बिखर जाने से भला कौन रोक सकता है। जो देश अपने रहवासियों के अधिकारों को रिड्यूस करता हो और उनकी पहचान का संकट खड़ी करता हो, उसे बेपर्द होने में कितनी देर लगेगी भला। हमारे नायक, पहचान, राष्ट्र के नाम उपदेश, ताक़तवर लोग, कमज़ोर लोग जैसी कविताओं में फ़रीद ने सामूहिक आशंका और फ़िक्र को आवाज़ दी है। फ़रीद के सहज शब्द कितने वजनदार और असरदार हैं, उनकी कविताएं इसकी तस्दीक करती हैं।

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