जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताएं

 

जितेन्द्र श्रीवास्तव 




समकालीन कविता में जितेन्द्र श्रीवास्तव की उपस्थिति इस मायने में महत्वपूर्ण है कि उनकी कविताएं लोक के 'मन के व्याकरण' को बड़ी बारीकी से चित्रित करती हैं।इन कविताओं में एक तरफ मानुष राग है तो दूसरी तरफ अपनी जड़ों से बिछड़ने का विह्वल कर देने वाला दुःख।


जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताएं 



जीवन

भेंट की गई किताबें एक दिन मिलती हैं
उदास सी रद्दी के ढेर में
कुछ तो इस कदर कोरी होती हैं
जैसे उन्हें पलट कर देखा भी न गया हो

उन पर नहीं होता कोई चिह्न
छुवन का

सघन स्पर्श से वंचित
इन किताबों को देखते-पलटते सोचता हूँ:
जो लोग मुझे भूल गए उनको याद करता हूँ
जो मुझे याद करते हैं पता नहीं उनमें से
कितनों को मिलने पर पहचान लूँगा 
बिना किसी कोशिश के


कैसी विडंबना है
स्नेह की अपेक्षा में आईं
उपेक्षित रह गई किताबों की तरह
बीत जाता है अधिसंख्य लोगों का जीवन!



सुंदरता

सुंदर चीजें नहीं होतीं एक जैसी
अलग-अलग होती है सबकी सीरत

चीन्हना पड़ता है हर सुंदर का मन 
उसके ढंग से

सुंदर हैं पहाड़
उतर आते हैं पुतलियों में
खींचती है सुंदरता समुद्र की
रोम-रोम खिल उठता है हृदय की देह का

पहाड़ों पर चढ़कर उतर आते हैं लोग 
हँसते-विहँसते
पर समुद्र में डूबकर कोई लौटा नहीं कभी।




मन का व्याकरण

आप नहीं चाहते मुझको
यह आपकी पसंद
मैं चाहता हूँ आपको 
सब कुछ जानकर भी
यह मेरी पसंद

मन कोई सुचिक्कन वृक्ष नहीं एक झाड़ी है
जिसमें अझुरा जाता है न जाने क्या- क्या

वैसे भी चाहने का कोई 
निर्धारित व्याकरण नहीं होता
प्रत्येक मन के पास होता है उसका 
अपना तर्क और व्याकरण

यही है इसका लोकतंत्र
यही है इसका समाजवाद
चाहें तो आप कर सकते हैं इसकी व्याख्या
अधिनायकवाद की तरह भी।



समय से संश्लिष्ट

समय कई तरह से बदलता है
आपकी उम्मीद से परे बिल्कुल परे भी

जो देह लता की तरह लिपट जाती है 
किसी देह से
एक दिन उसी देह के स्पर्श मात्र से
स्वयं को अपवित्र महसूस करने लगती है

जो आज फूल है 
कल काँटे से अधिक चुभन 
हो सकती है उसमें

समय को आज तक 
बाँध नहीं पाया कोई
रोक भी नहीं पाया उसके बदलाव को

साधो!
समय से संश्लिष्ट कोई दूसरी किताब 
नहीं है दुनिया में।



मृणाल कांति घोष के जादुई जूते

जब भी पहनता हूं जूता
मुझे मृणाल कांति घोष के वे जूते याद आते हैं
जिन्हें सन् 1997 के अक्टूबर में पहनकर गया था मैं 
नौकरी का इंटरव्यू देने अबके प्रयागराज और तबके इलाहाबाद सपनों का समुच्चय संभाले उम्मीदों की गठरी उठाए

सोचता हूं तो अचरज होता है 
पर विश्वास बढ़ जाता है भलमनसाहत पर
कि अब भी हैं ऐसे लोग जिन्हें सुख मिलता है 
औरों का सुख देखकर

मृणाल भी ऐसे ही थे बांग्ला ढंग से हिंदी बोलते हुए
कंप्यूटर साइंस के साथ -साथ  
बांग्ला साहित्य पर रस लेकर बतियाते हुए 
लोगों को अचरज में डालते हुए 
मित्रता को जीते हुए अपनी अकुंठ मुस्कान के साथ

एक दिन जब मैंने उन्हें बताया 
दिल्ली में तो मुश्किल है इसलिए जा रहा हूं इलाहाबाद 
उत्तर प्रदेश के राजकीय महाविद्यालयों के लिए लेक्चरर का इंटरव्यू देने 
आखिर कब तक रहूंगा जे एन यू में  
कहीं तो जाना ही होगा दादा

तो दादा ने बहुत गौर से मेरी बाहरी तैयारी का परीक्षण किया यह कहते हुए कि सब्जेक्ट तो आप जानिए जितेंदर 
और यह वाला जूता मत पहनकर जाइए बिल्कुल फॉर्मल नहीं है 
मैं ले आया हूं एक हफ्ते पहले ही एक जोड़ी नया जूता 
अपने इंटरव्यू के लिए आप उसे ही पहनकर जाइए 
और फिर उन्होंने पॉलिश करके वे जूते मुझे दिए 
जो इस तरह आए मेरे पैरों में जैसे खरीदे ही गए हों मेरे लिए

उन जूतों में कोई जादू था जैसे
वह नौकरी मिली मुझे तबके उत्तर प्रदेश के पर्वतीय संवर्ग में 
जो अब है उत्तराखंड एक अलग राज्य
वहीं मैंने पहली बार चखा स्वाद अपनी कमाई की रोटी का
 जाना घनत्व हवा का पानी का और प्यार का

वह जादू ही था शायद मृणाल के प्रेम का
कि कुल पांच पदों में से एक पद मिला मुझ अकिंचन को भी
किसी आठवें आश्चर्य की तरह

जे एन यू छूटा तो छूट गया रोज का संपर्क 
पर नहीं छूटा नेह का धागा
मृणाल चले गए अमेरिका 
बहुत सारे कंप्यूटर विशेषज्ञों की तरह रोजगार में उन्मेष पाने 
पर उन्हें बहुत प्यार था मातृभूमि से अपने लोगों से

वे आते रहते थे बीच - बीच में अपने देश और अपने बंगाल और अपने जे एन यू 
इस बार भी आए थे अपनी बीमारी से ठीक होकर 
फिर अमेरिका जाने और फिर -फिर भारत आने के लिए
पर धरी रह गईं योजनाएं 
पीछे छूट गया परिवार और छूट गए साथी - संघाती 

मृणाल हार गए जीवन 
बस गए हमारी स्मृतियों के जीवित कोटर में 
वे रहेंगे वहां हमारे रहने तक 
बादलों की तरह कभी छाए हुए कभी बरसते हुए

अब सुबह शाम दोपहर रात जब भी पहनता हूं जूता 
याद आते हैं मृणाल याद आता है उनका बड़प्पन 
याद आते हैं उनके वे जादुई जूते 
जिन्होंने संवारी थी कभी मेरी जिंदगी।



जरूरी

जब थीं 
बिखर जाती थीं जुल्फें
कभी इच्छा के अनुकूल कभी प्रतिकूल

अब कितना भी चाहूं
संभव नहीं कर सकता उनका बिखरना
किसी रूप में 
 
साधो!
बिखरने के लिए 
जरूरी है होना भी।


ओ मेरे देश!

यह बीतते वसंत की एक खिली हुई सुबह है
गाछों की नरम नई पत्तियों पर
उतर रही है धूप आहिस्ता - आहिस्ता 

बीत चुके हैं दिन
पतझड़ के लगभग- लगभग

आप चाहें तो 
कह सकते हैं इसे मदमय प्रात 
पर खाली पड़ा है वह खेल का मैदान 
जो भरा रहता है किशोरों और युवाओं के कलरव से
सुबह के इस वक्त

मलय समीर रोज सुस्ताता है यहां
उसके गुजर जाने के बाद भी बची रहती है उसकी सुगंध
कुछ लोगों को दिखते हैं उसके पदचिह्न भी कभी- कभी 

पर अचानक कहां चले गए सब ! 
किस ओर?
 
नहीं दिख रहे कहीं 
सुबह में भ्रमण करने वाले 
प्रौढ़ और बुजुर्ग
और आगे की यात्रा के लिए 
फेफड़ों में दम भरती स्त्रियां 

क्या पूरी तरह खाली हो गई है 
अरावली की पहाड़ी पर बसी यह
पूरी की पूरी बस्ती एकाएक?

यह कैसा संकेत है नक्षत्रों के आंगन से!
क्या बताएगा कोई खगोलशास्त्री?
या लोग प्रतीक्षा करेंगे किसी नजूमी की?

ओह! एकाएक उठा है यह धूल का बवंडर पश्चिम से
यह भीषण ग्रीष्म के आने की आहट है या हुंकार कोई!

समय के भीतर अदृश्य है समय
सत्य होकर भी परछाइयाँ पूरा सत्य नहीं होतीं 

असमय उठी है यह आंधी
तितर - वितर हो गई हैं चीजें
बचे हुए गुलमोहर के फूल झड़ गए हैं धरा पर
लग रहा है जैसे घासों ने ओढ़ ली है फूलों की ओढ़नी

पर क्या लिखा है 
अभी- अभी आई हवा की पाती में
कोई खुशखबरी है या चेतावनी उसमें?

सुनो, ओ मेरे देश 
उसे पढ़ो और सुनाओ !

सुनाओ, ओ मेरे प्राणों से प्रिय देश!

करोड़ों करोड़ हृदय व्यग्र हैं 
तुम्हारी ओर अपना कान लगाए।



चश्मा

वो जो मेरा चश्मा छूट गया कहीं या गिर गया सरे राह
जिसे बनवाया था मैंने बहुत शौक से
जिसके फ्रेम को पसंद किया था कई दर्जन फ्रेमों के बीच से
उसे अब पहनता होगा शायद कोई और लेंस बदलवा कर
या क्या पता लेंस भी आ गया हो उसे बिल्कुल फिट
हो सकता है उसकी आँखों की रोशनी भी हो मेरी तरह
जिसमें धुँधला रही हों चिह्नी जानी चीजें भी असमय

इस समय पाने वाले की नाक पर 
चढ़ा होगा वह इस तरह 
जैसे बना ही हो उसी के लिए

अब यह मेरी लापरवाही हो या पाने वाले का भाग्य
लेकिन समीकरण इस कदर बदल गया है 
कि किसी दिन पूरी तरह पहचान कर भी 
कह नहीं पाउँगा उसे अपना

उसे…
जो कभी मेरा था 
पुतलियों के सबसे करीब ।




सत्य

जो दूर हुआ
वो दूर ही था

उसको पास समझना
भ्रम था भारी

अच्छा है, मन सहज रहा
सुख तब भी था जब बँधी थी अँकवारी
सुख अब भी है जब खाली है अँकवारी।



बदलाव 

जब हमसे छूट जाता है एक शहर 
और हम रहने लगते हैं किसी और दिल पसंद शहर में
और याद करते हैं अपने पुराने शहर को 
तो याद करते हैं उसके पुरानेपन को
उसका नयापन पैदा करता है उदासी का कोई अयाचित रसायन
जबकि उस शहर के नए लोग खुश हो रहे होते हैं 
शहर के पुनर्नवा होने पर 

कभी- कभी उनकी प्रसन्नता अखरती है 
स्मृति का शहर खोज रहे लोगों को
 
जब हम देखने जाते हैं अपना कॉलेज
तो दरअसल देखने जाते हैं अपने ग्रेजुएशन के दिनों को सहपाठिनों को ले जा रहे रिक्शों के पीछे-पीछे
मुस्कुराते-लजाते सायकिल चलाने वाले दिनों को
जो बैठे होते हैं कहीं
हमारी पुतलियों के किन्हीं कोनों में समय की धूल से ढके
लेकिन सच में वे डूब चुके होते हैं 
बाद के दिनों के मटमैले सरोवर में
वहां उग आई होती हैं विस्मरण की जलकुंभियां

हम हसरत से ढूंढते हैं वह दीवार
जिस पर लिखी थी प्यार की पहली इबारत
या जिसकी ओट में खड़े हुए थे कभी प्रिय की प्रतीक्षा करते हुए 
लेकिन उसे ढक चुकी होती हैं करीने से बना दी गई दुकानें
जिस प्रकार ढक लेते हैं तरह- तरह के झाड़- झंखाड़
इतिहास और इतिहास से जुड़ी धूसर हो रही जगहों को

हमें सब कुछ बदला- बदला-सा लगता है 
हम गहरी उदासी की बेनूर रजाई ओढ़े लौट आते हैं 
अपने सपनों के नए शहर में

हम पुराने के प्रेम में विह्वल भूल जाते हैं 
कि हर शहर में बदल जाता है बहुत कुछ
खड़े हो जाते हैं कंक्रीट के कुछ और नए जंगल 
पुरानी गलियां बिला जाती हैं नए रास्तों में
हमारी स्मृतियों में खड़े प्रेम की ओट बने सघन पेड़
पता नहीं कब हटा दिए जाते हैं अवरोध मानकर 
किसी नवनिर्माण की योजना में

लेकिन तमाम वर्षों - मौसमों के बदलने के बावजूद
अगर पुराने शहरों में कुछ नहीं बदलता 
तो बस मर्दाना कमजोरी का चमकीला विज्ञापन
वह बस अड्डे से लेकर 
महाविद्यालय विश्वविद्यालय की दीवारों तक
अपनी पुरानी चमक के साथ करता है 
शहर में आने वाले हर नए - पुराने का स्वागत।










जितेन्द्र श्रीवास्तव

देवरिया (उत्तर प्रदेश) में जन्मे और जे एन यू, नई दिल्ली से उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले प्रतिष्ठित कवि-आलोचक जितेन्द्र श्रीवास्तव इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के मानविकी विद्यापीठ में हिंदी के प्रोफेसर हैं। पूर्व में इग्नू के पर्यटन एवं आतिथ्य सेवा प्रबंध विद्यापीठ और इग्नू के ही अंतरराष्ट्रीय प्रभाग के निदेशक रह चुके हैं। 

इन दिनों दूसरी बार इग्नू के कुलसचिव हैं।

हिन्दी के साथ-साथ भोजपुरी में भी लेखन प्रकाशन। इन दिनों हालचाल, अनभै कथा, असुन्दर सुन्दर, बिल्कुल तुम्हारी तरह, कायान्तरण, सूरज को अँगूठा, जितनी हँसी तुम्हारे होंठों पर, काल मृग की पीठ पर, उजास , कवि ने कहा, बेटियाँ, रक्त-सा लाल एक फूल, स्त्रियाँ कहीं भी बचा लेती हैं पुरुषों को (कविता); तेरे खुशबू में भरे ख़त (कहानी) भारतीय समाज, राष्ट्रवाद और प्रेमचंद, शब्दों में समय, आलोचना का मानुष-मर्म, सर्जक का स्वप्न, विचारधारा, नए विमर्श और समकालीन कविता, उपन्यास की परिधि, रचना का जीवद्रव्य, कहानी का क्षितिज, कविता का घनत्व, आस्था और विवेक, आलोचना के नए क्षितिज (आलोचना); प्रेमचंद कहानी समग्र, प्रेमचंद: स्त्री जीवन की कहानियां, प्रेमचंद: दलित जीवन की कहानियां, प्रेमचंद: दलित एवं स्त्री विषयक विचार, प्रेमचंद: स्वाधीनता की कहानियां, प्रेमचंद : किसान जीवन की कहानियां, प्रेमचंद: हिन्दू - मुस्लिम एकता संबंधी कहानियां, शोर के विरुद्ध सृजन सहित कुछ अन्य पुस्तकों का संपादन। गोदान, रंगभूमि और ध्रुवस्वामिनी जैसी कुछ कालजयी पुस्तकों की पुर्नप्रस्तुति के लिए उनकी संक्षिप्त भूमिकाएँ भी लिखी हैं।

कई कविताओं का अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ है। लम्बी कविता सोनचिरई की कई नाट्य प्रस्तुतियाँ हो चुकी हैं। कई विश्वविद्यालयों के कविता केन्द्रित पाठ्यक्रमों में कविताएँ शामिल हैं। कविताओं पर देश के कई महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों में दस से अधिक शोधकार्य हो चुके हैं और कुछ हो रहे हैं।

साहित्यिक पत्रिका 'उम्मीद' का संपादन किया है और 'नयी उम्मीद' का संपादन कर रहे हैं।

अब तक कविता के लिए 'भारत भूषण अग्रवाल सम्मान' और आलोचना के लिए 'देवीशंकर अवस्थी सम्मान' सहित हिन्दी अकादमी दिल्ली का 'कृति सम्मान', उ.प्र. हिन्दी संस्थान का 'रामचन्द्र शुक्ल पुरस्कार, उ. प्र. हिन्दी संस्थान का 'विजयदेव नारायण साही पुरस्कार', भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता का 'युवा पुरस्कार', 'डॉ. रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान', 'परम्परा ऋतुराज सम्मान', गोपालकृष्ण रथ स्मृति सम्मान, स्पंदन कृति सम्मान और किफलक यापनचित्र नेशनल पोएट्री अवार्ड (कोलकाता)ग्रहण कर चुके हैं।

संपर्क: हिन्दी संकाय, मानविकी विद्यापीठ, इग्नू, मैदान गढ़ी, नई दिल्ली- 68

मोबाइल नं. : 09818913798

ई-मेल: jitendra82003@gmail.com








सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।














Comments

  1. वंदना गुप्ता30 May 2026 at 07:56

    जितेंद्र जी की कविताओं में जीवन के विविध रंग समाये हैं। वो छोटी छोटी बातें , बदलाव, कसक, दुख, सुख सभी को जगह देती हैं कविताएँ। कम शब्दों में बड़ी बात कहना जितेंद्र जी की कविताओं की खूबसूरती है। मनुष्य जीवन में आते हर उतार चढ़ाव के साथ अनेक स्मृतियाँ भी कविताओं में स्थान पा लेती हैं जब कोई कवि उन्हें अनुभूत करता है। समय की चाल हो या सिर के बाल, जूतों की याद के बहाने एक कालखंड को जीना हो या किताबों की उपेक्षा की भाँति जीवन की उपेक्षा की ओर ध्यान आकर्षित करना हो जैसा कि हम रोज देख रहे हैं लेकिन महसूस नहीं कर पाते और यदि कोई महसूस कर भी ले लेकिन शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाता तब ये कविताएँ वो माध्यम बनती हैं। चश्मा हो या सत्य कविता दोनों जीवन दर्शन का बोध कराती हैं। शहर के पुरानेपन को याद करने का नॉस्टेल्जिया कविता में बखूबी उतरता है तो विकास की आंधी में नयेपन की चकाचौंध को भी दर्ज करता है। सभी कविताएँ जीवन के यथार्थ से उपजी कविताएँ हैं। सहजता से अपनी बात कहती हैं और चुप हो जाती हैं। अब वो पाठक के अंतस् में बोलना शुरू करती हैं यही तो कविता का उद्देश्य होता है जिसमे कविताएँ सफल हैं। बेहतरीन कविताओं के लिए जितेन्द्र जी को साधुवाद।

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  2. स्वप्निल श्रीवास्तव30 May 2026 at 07:57

    सभी कविताएं अच्छी हैं लेकिन मृणाल कांति के जूते. लाजबाब है।

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  3. फ़रीद खां30 May 2026 at 07:57

    बहुत बढ़िया कविताएं हैं। बहुत बहुत बधाई।

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  4. ब्रज नंदन30 May 2026 at 07:58

    जीवन के इर्दगिर्द घूमती और अनदेखे, अनजाने पहलुओं को एकबारगी सामने खड़ी कर देती कविताएँ–आत्मीयता में सराबोर। आभार साझा करने के लिए।

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  5. जितेन्द्र श्रीवास्तव30 May 2026 at 08:39

    जितेंद्र अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली कवि हैं।

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  6. चंद्रेश्वर30 May 2026 at 09:43

    जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताएं विचारधारा से नियंत्रित होकर नहीं, वे जीवन के गहरे सरोकारों और संवेदनाओं से जुड़कर लिखी जाती हैं। यही वजह है कि उनकी कविताओं में जीवन की तरलता दिखाई देती है। यहां तरलता भावप्रवणता के अर्थ में है। वे अपनी कविताओं में अपने निजी जीवन संघर्षों को भी सामाजिक परिप्रेक्ष्य प्रदान करने की कला में निपुण दिखाई देते हैं। वे अपने अतीत की ओर बार बार लौटने की कोशिश करते हैं। वे अपने जनपद और अपनी ज़मीन को बराबर स्मृतियों में बसाए रहते हैं। उनकी काव्य भाषा में एक तरह की मोहक सरलता है। वे कविताओं में कहन में भी और अंतर्वस्तु के स्तर पर भी सहज बोध को लेकर सामने आते हैं। मैं उनकी कविताओं का एक लंबे अरसे से पाठक रहा हूं। पुरबिया मन और मिज़ाज वाले इस कवि को बधाई और शुभकामनाएँ।

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  7. सुधांशु वर्मा30 May 2026 at 10:24

    भाई साहब नमस्कार,
    आप एक ऊंच स्तर के कवि और चिंतक हैं आपकी कविताएं काफी तार्किक होती हैं।🙏🙂

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  8. मांघी लाल यादव30 May 2026 at 10:27

    जितेन्द्र श्रीवास्तव जी मेरे प्रिय कवि लेखक आलोचक हैं,कई वर्षों की जान पहचान है।
    वे अपनी पीढ़ी के अग्रणी कवि हैं,इनकी कविताओं में जरा भी बनावटीपन नहीं है।
    कोमलता,सचाई और बुनियादी सरोकार उनकी कविताओं की विशेषता हैं।
    उनकी काव्य वस्तु में यथार्थ दिखाई देता है और काव्य संवेदना गहराई तक पहुंच जाती है।
    अच्छी कविताओं के लिए आप दोनों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।
    🙏🌸🙏

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