शचीन्द्र आर्य की कविताएं

 

शचीन्द्र आर्य 




जीवन के बहुत मामूली लगते जटिल प्रश्नों और विषयों को कविता में बहुत सादगी और मार्मिकता से दर्ज करने वाले शचीन्द्र आर्य की कविताओं में एक तरफ प्रश्नाकुलता है तो दूसरी तरफ तंद्रा तोड़ देने वाली विकलता। पीछे छूटती चीजों और यादों के मोह की बेचैनी हो या कुछ न बता पाने की आत्मस्वीकृति।इन कविताओं एक अलग ही मानुष राग है जिसे पढ़ कर अपने समय को, विकास को,चकाचौंध को और उस चकाचौंध के पीछे छिपे गहन अन्धकार को महसूस किया जा सकता है।






शचीन्द्र आर्य की कविताएं




उनका कुछ न पूछना


पता नहीं यह कैसे हुआ,

उन्होंने कुछ भी पूछना लगभग बंद सा कर दिया ।  


जो पहले सवाल हुआ करते थे, अब वह सवाल नहीं हैं ।

कहाँ गए थे, क्यों गए थे, आज क्या हुआ वहाँ ?  


अब कुछ भी नहीं पूछा जाता ।


मैं अचानक से बड़ा नहीं हो गया हूँ,

न मैं कहीं सराय में नहीं रह रहा हूँ ।

घर में माता-पिता के साथ रहता हूँ ।


उन्होंने कब से यह सवाल नहीं पूछे याद नहीं आता ।

उनका ख़ुद को इस भूमिका से पीछे कर लेना, दिख नहीं पाया ।  


ख़ुद को देखता हूँ तो लगता है,

एक वक़्त आया होगा, मैंने ही बताना 

बंद कर दिया होगा ।



जुगनू


मुझमें भी अगर एक परदा होता,

तो अपने भीतर लगा देता किसी खिड़की के मानिंद ।


इस परदे के न होने से मेरे अंदर फैल गया बाहर का अँधेरा ।


लेकिन तब, उस अँधेरे में, पहली बार, मुझे पता चला,

मुझमें भी थे कुछ रौशनी के कण, जो तब टिमटिमा रहे थे ।



          याद
 


बहुत सारी बातें 

जो कहीं नहीं लिखीं, जिन्हें नहीं लिख पाया 

क्या वह एक दिन, एक रात 

या ऐसे ही किसी मोड़ पर याद बनकर दिख जाएंगी ? 


मुझे यह सवाल ही लगा, 

जिसे पूछता हूँ इधर अपने भीतर । 

बहुत बार 

आहिस्ते से अपने ही कान में । 

या मन में । 

या किसी खाली कागज को घूरते हुए । 

या उसी कागज़ पर टकटकी लगाए हुए । 


कोई जवाब नहीं सूझता । 


पीछे जिन दिनों को नहीं लिख पाया, 

क्या वह मुझे कभी याद नहीं आ पाएंगे ? 

या 

इन दिनों को यादों का न बन पाने की याद 

क्या मुझमें किसी 

याद की तरह रह पाएगी ?




मिलने का मन


अब तुमसे मिलने का मन नहीं करता ।


कभी जब हम मिलते हैं,

तुम उन्हीं पीछे छूटी चुकी बातों से अपनी बात शुरू कर देते हो ।

बहुत कोशिश की मैंने । बहुत साथ दिया तुम्हारा ।


तुम्हारे साथ वक़्त वहीं रुका हुआ सा दिखता रहा ।

कितनी कोशिश करूँ,

सब किसी अनपढ़ी किताब में जस का तस, थम सा गया ।


अब तो लगता है,

ऐसा करते हुए हम एक-दूसरे को कुरेद रहे हों जैसे ।


हद तब हो गयी,

जब मिलने पर एक पल ऐसा आया, 

जब लगा, अब हम ठीक से एक-दूसरे को सांत्वना तक नहीं दे पा रहे ।

तुम्हारे साथ अतीत में खड़े रहकर सामने कुछ भी दिखाई नहीं देता ।


हम अतीत के सहचर थे, इस बात को अब याद नहीं रखना चाहता ।

न यह कहना चाहता हूँ, तुमसे मिलने की हर बात को अब टाल देना चाहता हूँ । 


इस टाल जाने में, 

पिछले दिनों को भुला देने की कोशिश 

सिर्फ़ इतनी सी है, कि पुरानी बातों को अपने अंदर दोहराते हुए 

किसी सूख चुकी रोटी की तरह टूट रहा होता हूँ,

जिसे न कोई चिड़िया खा पाती है, न कोई कुत्ता ही उस पर मुँह मारता है । 


मैं कभी निरर्थक होना भी चाहता था, तो भी कभी ऐसा नहीं होना चाहता था ।



          पाण्डुलिपि


उसने बहुत मेहनत से अपनी दोनों पाण्डुलिपियों को तैयार किया ।

एक-एक पंक्ति को तीन तीन बार पढ़ा । विषयों की भाषा को जाँचा ।

भाषा की संगति, वाक्यों की तारतम्यता से ज़्यादा उसने लय को साधा ।


जब वह संतुष्ट हो गया,

तब उसने उन्हें दो अलग-अलग प्रकाशकों को भेज दिया ।  


दोनों तरफ़ से बहुत दिन बीते कोई जवाब नहीं आया ।

वह यही सोचता, बड़े प्रकाशक हैं, संपादक महोदय अभी व्यस्त होंगे ।

मौका लगते उसकी पाण्डुलिपि पढ़कर उस पर ज़रूर कुछ कहेंगे ।


अरसा बीत जाने के बाद भी उन्होंने कुछ नहीं बताया ।

वह उनके जवाब का इंतज़ार करता रहा । करता रहा ।


उसे ख़ुद पर किसी बड़े लेखक की संस्तुति का इंतज़ार था ।


उसे लगने लगा, जब तक वह ख़ुद को असंपादित नहीं मानेगा,

तब तक संपादक उस पर कुछ काम करके उसे प्रकाशन योग्य नहीं मानेंगे ?  


वह समझ गया था, हर लेखक यहाँ लेखक होने से पहले एक पाण्डुलिपि था ।




प्रेम पर कुछ काल्पनिक बातें

  

कभी-कभी सोचता हूँ इस प्यार पर 

जिसे प्रेम कहने की कोशिश सिर्फ़ लिखने में ही रह जाती है 

यह कोशिश कभी उससे बाहर आई हो, ऐसा लगता नहीं है ।


इस लगने में ही लगता है, जैसे अपने अंदर जिसे प्रेम के रूप में देखता हूँ 

या किसी क्षण महसूस करता हूँ 

वह आपस में इतने अलग लगने लगते हैं । 


इस बारे में पता है, मुझे कब पता चलता है ? 

जब तुम मेरे पास होती हो । 


तुम्हारे आने से पहले मेरे पास सिर्फ़ प्रेम था । 

तुम्हारे जाने के बाद सिर्फ प्रेम होता है । 


किसी को भी तो साझा नहीं करता था उसे, 

अपने में ही रखता था सब । 

कभी मन में, किसी अखबार की तह में, 

किसी परत के नीचे, किसी पेड़ की भुरभुरी मिट्टी वाली जड़ में, 

किसी पंछी की चोंच में, कागज़ की कतरन में, जेब की सिलाई में ।


तुम्हारे जाने के बाद भी इसे किसी से भी तो साझा नहीं करता,  

अपने में ही सब रखता हूँ ।   


जब तुम आई, जैसे सब बदल गया

पहले जैसा कुछ भी नहीं रहा । 

जब-जब तुम आई, 

पहले जैसा कुछ भी नहीं रह गया ।


यह भी जो मुझे लगता है, यह तब लगता है, जब तुम नहीं होती हो । 


इतने जवान साल जब तुम नहीं थी, 

कोई स्पर्श नहीं था, कोई साथ नहीं था, कोई परछाईं नहीं थी, 

कोई नमी नहीं थी, कोई टेढ़े-मेढ़े दांतों वाली मुस्कान नहीं थी, 

मन में कोई आवाज़ नहीं थी, कहीं कोई घृणा नहीं थी । 


किसी कोने में तब कुछ नहीं था । तब सिर्फ़ प्रेम की कल्पना थी । 

इस कल्पना में ही सब था । 

एक भरी पूरी दुनिया थी, छुअन थी, परछाईं थी, साथ था, 

हवा में उड़ता हुआ मैं था । तुम नहीं थी, यह स्याही और कागज़ था । 


अब तुम हो । बाहर कुछ भी नहीं है । तुम भी नहीं । 

तुम भी मेरे अंदर जैसी हो वैसे मेरे बाहर नहीं हो । 


हो सकता है, बिलकुल ऐसे ही 

मैं भी जैसा तुम्हारे अंदर रह गया या छूट गया हूँ, 

बाहर वाले से बिलकुल भी मेल न खाता, बाहर पड़ा रहता हूँ । 


इस अंदर और बाहर में ही यह प्रेम है, 

जो प्यार बनकर बचा हुआ रहे, यही चाहता हूँ । 


बस इसे अपनी कल्पना कहूँ या कह दूँ, तुम बता दो ।



         चिड़ियाघर की सैर


याद नहीं करना पड़ता, 

हमारे नाना कैसे चला करते थे । 

मामा भी बिलकुल उन्हीं की देखा देखी चलना सीखे होंगे  

कोई भी रास्ता हो, 

पथरीला, खुरदरा, रेतीला, बलुहा    

सब पर नंगे पैर ही चलना है 


पर चलना कैसे है?

यह कोई छिपी हुई विद्या नहीं है   

पंजों पर सारा भार वहन करते जाना 

और 

एड़ी का तो सहारा भर लिया करते 


इस दृश्य को एक बार आँख बंद करके देखिये-

अपना ध्यान धोती पहने एक वृद्ध के घुटने के नीचे आती धोती पर रखिए 

उनके घुटने के आसपास की त्वचा 

टमाटर और बैंगन की तरह सिकुड़ती है और वापस उसी तरह फैल जाती है, जैसे वह थी 


वह मिट्टी की कच्चे रास्ते पर तेज़ी से चलते दिखाई देंगे ।  

वह तेज़ इसलिए नहीं चल रहे कि वह तेज़ चलना चाहते हैं 

वह तेज़ इसलिए चल रहे हैं 

क्योंकि 

इतने सालों बाद तलवों की खाल अब बूढ़ी हो चुकी है 

और अब वह 

ज़मीन की तपिश को पुराने दिनों की तरह 

देर तक भीतर पहुँचने से नहीं रोक सकते । 


वह थोड़े और बूढ़े होते 

और 

चलना एक दम बंद कर देते, 

ऐसे दिन हमारी स्मृतियों में नहीं आए । 


तबसे स्मृतियों में मामा की चाल है । 

मामा चलते हुए बिलकुल नाना लगते हैं ।

हम उन्हें चलता हुआ देखते हैं तो देखते रह जाते हैं । 

एक छह फुट से भी लंबा नौजवान, 

अपने पंजों के बल 

सारे शरीर का भार डाले आगे बढ़ता जा रहा है ।


रेतीली मिट्टी में हमने इन छापों को देखते हुए उनका पीछा किया है 

तब वह कभी कंगारू की चाल ओढ़े हुए लगते, कभी लगता सरस बन उड़ते चलते


वह कभी एक साथ इतना नहीं चले

कि चलते-चलते वह दिल्ली आ जाते

हम दिल्ली में उन्हें चिड़ियाघर दिखलाते 

तब वह जान पाते किस-किस से 

मिलती-जुलती है उनकी चाल नाना के सिवाय।



              शहराती बातें: डायरी से कुछ अधूरे सफ़े



(एक) 


नमक भर जगह


कमरे में बैठा, दीवार को टकटकी लगाकर देख रहा था ।

दीवार खुरदरी थी । बावजूद पलस्तर उस पुताई के नीचे छिपा हुआ था ।

बत्ती बंद थी । रौशनी तब भी खिड़की को चीरती हुई कूलर के पीछे से आ जा रही थी ।

 

कम उजाले में भी उसने

बहुत धीरे से अपनी डायरी खोली ।

पन्ने भी उतनी ही धीमी गति से वह पलट रहा था ।

कुछ पन्नों बाद खाली पन्ना दिखा ।

 

कलम उठाकर उस जगह करीने से लिखा -   

जगह में सिर्फ नमक भर जगह चाही थी, वह भी नहीं मिली ।


(दो) 


मेट्रो रेल में नींद


सोते हुए लग रहे कितने सारे लोग, 

कितनी सारी आंखों में देखने से बच जाते हैं ।

कोई तो देख पाता, उस हद तक, 

जब देखती है, एक आंख दूसरी आँख में । 

कोई नहीं देखता एक दूसरे को ।

सब इसी नींद में खोए से, 

उनींदे से इस सफर से गुजर जाना चाहते हैं ।


ऊंघते हुए, इसी नींद के सहारे,

कितने लोग अपना सफर पूरा कर जाते हैं ।


(तीन) 


सड़क सा खाली मन 


मन खाली कहाँ रह पाया सड़क की तरह 

भरी रहीं बातें भरी बसों की तरह मन में

जो सरपट दौड़ती

रही खाली सड़क पर ।









शचीन्द्र आर्य 


हिंदी के कवि, लेखक और शिक्षक हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए., बी.एड. और एम.एड. करने के बाद शिक्षा विभाग (CIE) से 'आधुनिकता और शिक्षा की अंतःक्रिया' विषय पर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।


उनका कविता-संग्रह 'क़ुतुब मीनार खड़े-खड़े थक गया होगा' गाँव और शहर की स्मृतियों के ताप में रची कविताओं का संग्रह है। इन कविताओं में अनुभव केवल पृष्ठभूमि नहीं, एक जीवित स्मृति-स्थल है। इनमें अतीत कभी पूरी तरह बीतता नहीं; वह वर्तमान की परतों से झाँकता रहता है और रोज़मर्रा के जीवन को एक अलग नज़र से देखने का सलीक़ा देता है। गाँव से शहर तक आई स्मृतियाँ यहाँ नए संबंध गढ़ती हैं और पुराने संबंधों को परखती भी चलती हैं। इसी संग्रह पर उन्हें 2025 का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार मिला।


गद्य में उनकी डायरी 'दोस्तोएवस्की का घोड़ा' आत्मकथ्य, विचार और अवलोकन को एक साथ साधती है। उनकी रचनाएँ हंस, पहल, तद्भव, आलोचना, वागर्थ और समकालीन भारतीय साहित्य सहित हिंदी की अनेक प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। वे जनसत्ता और दैनिक हिंदुस्तान के लिए भी लिखते रहे हैं। शिक्षा और समाज की अंतःक्रिया, गाँव और शहर की आधुनिकता का द्वंद्व, स्मृति और अतीत की उपस्थिति तथा बदलते मानवीय संबंध उनके लेखन के स्थायी सरोकार हैं।


उनसे [shachinderkidaak@gmail.com] पर संपर्क किया जा सकता है।








सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।
















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