गार्गी मिश्रा की कविताएं

 

गार्गी मिश्रा 


स्त्री की यातना और तकलीफ़ तब और बढ़ जाती है जब दोहरे चरित्र के पितृसत्तात्मक समाज में एक तरफ उसे माथे पर बिठाकर पूजा जाता है तो दूसरी तरफ वह पैरों की जूती बना दी जाती है या कहें तो रौंद दी जाती है।हम जिस समाज में रह रहे हैं वहां स्त्रियां कितनी सुरक्षित हैं यह जानना हो तो अख़बारों और चैनलों की ख़बरों को देखिए।उन लोगों की टीका-टिप्पणी देखिए जो हर मोर्चे पर फैसले सुनाने को आतुर हैं।गार्गी मिश्रा की कविताएं स्त्री की यातना के साथ उसके संघर्ष को भी चित्रित करती हैं और बहुत मार्मिकता से चित्रित करती हैं। प्रतिरोध का मौलिक और अद्भुत स्वर इन कविताओं की विशेषता है।



गार्गी मिश्रा की कविताएं


 


मिट्टी की आँख
 

कुम्हारटोली का कारीगर 
पुआल, नदी की मिट्टी और भूसी सानता है
ताकि एक ऐसी अपलक दृष्टि गढ़ सके 
जो बिना रोए अंधेरे को देख सके

वह ऊंट के बालों वाली कूची को गीले कोयले में डुबोता है
और ऐसी पुतलियाँ बनाता है 
जो शहर की डामर वाली सड़कों को निगल सकें

लेकिन बाँस के शामियाने के ठीक बाहर
एक लड़की तेज़ कदमों से चलती है
उसकी गर्दन दरांती की तरह झुकी हुई है
और वह आधी रात के सन्नाटे में 
गुजरती गाड़ियों की आवाज़ के बीच अपने कदम गिनती है

बताओ, देवताओं को गढ़ने वाले शिल्पी
उस प्रतिमा को तो तुमने पीतल के दस चमचमाते हाथ दे दिए
पर बस स्टॉप पर खड़ी तुम्हारी बेटी अपने दोनों हाथ अंदर समेट लेती है
अपनी पसलियों को एक अदृश्य, सहमी हुई ढाल में छुपाते हुए?

वार्निश के नीचे मिट्टी की वह आँख सूखकर सख्त हो जाती है
वह सब कुछ देखती है
सायरन थम जाने के बाद भी, वह अपनी नज़रें नहीं फेरती।



राख 

मिट्टी का बर्तन सुलगते कोयलों पर झूल रहा है
और हर ताल पर अपने मुँह से सफेद धुआँ उगल रहा है 
एक औरत अपने पोरों पर अंगारों को साधे नाच रही है
उसकी साड़ी का घेरा जमे हुए धुएँ के बीच घूम रहा है

भीड़ इस उन्माद पर तालियाँ पीटती है
इसे ईश्वरीय भक्ति कहती है
पर दो गलियाँ छोड़कर 
रास्ता नुकीले जबड़ों की तरह संकरा हो जाता है
सूती लिबास और पसीने में भीगी, घर लौटती एक औरत से
कहा जाता है कि अपने सीने में यह आग उसने खुद लगाई थी

लोबान और धूप के इस मुल्क में
जुनून तभी तक पूजनीय है 
जब तक वह किसी वेदी पर बंधा हो

जब वही जुनून दो रोटी की तलाश में सड़क पर उतरता है
तो वे उसकी जुबान बुझाने के लिए पानी ले आते हैं,
और उसकी आँखों में झोंकने के लिए गर्म राख।



दसवाँ हथियार 

त्रिशूल नीचे की ओर तना है
 महिषासुर के सीने में गड़ा हुआ
चक्र घूम रहा है
तलवार पर सोने का पानी चढ़ा है
कमल बिना मिट्टी के खिला है
और शंख में समंदर का शोर है

नौ हाथों में वे हथियार हैं 
जो उन देवताओं ने गढ़े
जिनका खून कभी ठंडे फर्श पर नहीं बहा

पर दसवाँ हाथ खाली है
उसमें कोई गदा नहीं

वह खुला हुआ हाथ आगे बढ़ता है
मानो सड़क की बुझी बत्तियों के जलने की भीख मांग रहा हो

वह किसी क्लिनिक की उतरी हुई कुंडी की तलाश में है
वह आधी रात और सुबह के बीच के उस शांत पहर को छूना चाहता है
जहाँ एक औरत बारिश में भीगी घास की महक में सांस ले सके
बिना यह सोचे कि पीछे से आती किसकी परछाईं उसकी रीढ़ की हड्डी नाप रही है
जो एक हथियार जो देवता उसके लिए गढ़ना भूल गए
वह बस खुली, बेखौफ़ हवा थी। 



खेला 

सफेद कोरा थान और सिंदूरी किनारे में लिपटी हुई 
नीली पड़ी कलाइयों को गोल घुमा कर 
मर्दों की लंबी उम्र की दुआएँ बुदबुदाते हुए
वे माथे पर सिंदूर ऐसे मलती हैं मानो गालों पर लहू रिस आया हो

पर उस लाल लेप के नीचे
ठंडी हड्डियाँ हैं जो लोहे जैसी सख्त हैं 

एक औरत बिना लिखी भाषा को पढ़ने का सपना देखती है
किसी ऐसे आदमी से प्यार करने का
जो दहेज में उसका आत्मसमर्पण न मांगे 
और मलमल पर काढ़े गए दायरों से परे 
किसी सरहद को पार करने का अधिकार

जब वह बोलती है
तो उसके शब्दों को पत्थर कहा जाता है
जब वह चुप रहती है
तो उसकी शराफ़त की कसमें खाई जाती हैं

उसने अपने माथे से लाल गर्द पोंछ दी है
उस गर्द के नीचे का नंगा माथा इतना चौड़ा है
कि उस पर एक ऐसे मुल्क का नक्शा बन सके
जहाँ वह साँस लेना भूल चुकी है।


लिनेन के कुरते वाला असुर

पंडाल के असुर की खाल हरी है और दांत प्लास्टर के हैं
उसकी आँखें चोट खाए अनार जैसी लाल रंगी गई हैं
बच्चे उसकी बनावटी दहशत पर हँसते हैं और उंगलियाँ उठाते हैं

पर असली दरिंदे के हाथ में कोई मुड़ी हुई तलवार नहीं होती
वह कलफ लगा कुरता पहनता है
 कफ़ ठीक करता है
हाथ में चांदी का सिक्का लिए कतार में खड़ा रहता है
और पूजा समिति के लोगों को देखकर मुस्कुराता है

वह पुजारी के आगे सिर झुकाता है
प्रसाद का पेड़ा लेता है
और घर जाकर अपनी बीवी के कपड़ों की लंबाई नापता है
उसकी देरी का एक-एक मिनट गिनता है
और उसकी हंसली की हड्डियों के इर्द-गिर्द बंदिशों की बाड़ लगाता है

कागज़ और गत्ते का यह राक्षस 
तो हर अक्टूबर में मर जाता है

पर लिनेन के कुरते वाला वह असुर सालों साल ज़िंदा रहता है
अपने उन्हीं हाथों से देवताओं पर फूल चढ़ाता हुआ
जो किसी पिंजरे को ताला लगाना बखूबी जानते हैं।


अड़चन 

उन्होंने प्लाईवुड और चमकीली पन्नी से एक महल खड़ा कर दिया
जो नाले के गंदे पानी में गिरे किसी सितारे की तरह चमक रहा है
अंदर, देवी एक नकली बाघ की पीठ पर तनी खड़ी हैं
उनके गले में गुड़हल की माला टंगी है 
जो फटे हुए मखमल की तरह दिखती है

बाहर, फटी हुई प्लास्टिक की पन्नी पर एक औरत सो रही है
अपनी बच्ची को घुटनों के बीच भींचे हुए
उसकी एक आँख हमेशा खुली रहती है
 नाली के किनारे पहरा देती हुई

लोग होंठों से शंख लगाए बगल से गुज़रते हैं
रात की हवा में शुभ की कामने कहते हुए
पर उस शंख की गूँज से बच्ची के कटोरे में 
रोटी का एक निवाला भी नहीं गिरता

बच्ची कोई अवतार नहीं है
वह तो बस एक अड़चन है
उस वीआईपी रास्ते में
जहाँ बड़ी गाड़ियाँ खड़ी होती हैं
पुआल और मिट्टी से बनी जगदंबा के दर्शन करने के लिए।


नदी का फ़ैसला

दसवें दिन, वे मिट्टी की माँ को 
कंधे पर उठाकर नदी की ओर ले जाते हैं
ढ़ाक की थाप सीने में अटकी घबराहट की तरह धड़कती है

वे उसे नदी में विसर्जित कर देते हैं
उसका उतरता हुआ रंग देखते हैं
गलती हुई पीली उंगलियाँ
और बहता हुआ मुकुट
जो किसी खाली तश्तरी की तरह तैरता चला जाता है

वे जयकारे लगाते हैं कि अगले बरस फिर आना
पर नदी कोई जयकारा नहीं लगाती

नदी सिर्फ मिट्टी, पुआल की हड्डियाँ और ज़हरीले रंग समेटती है
और उन्हें मालवाहक नावों के पेंदे के नीचे दबा देती है

नदी को वे दूसरे जिस्म भी याद हैं
जिन्होंने पतझड़ के आने का इंतज़ार नहीं किया था
वे, जिन्हें बिना ढोल-नगाड़ों और बिना सिंदूर के बहा दिया गया
जिनके नाम सुबह के अख़बार की स्याही में धुल गए

नदी की तलहटी 
मिट्टी की देवी 
और जान बचाकर भागती उस लड़की के बीच कोई फ़र्क नहीं करती।


दोपहर का व्याकरण 

एक लड़की यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में बैठी है
जहाँ घूमते पंखे से छन कर आती पीली रोशनी
उसकी कॉपी पर धारियाँ बना रही हैं 

वह एक समीकरण हल करती है
जिसमें वह एक नई दुनिया रचती है

खुली खिड़की से लाउडस्पीकर का शोर छनकर आता है 
कुँवारी वीरांगनाओं के गुणगान गाता हुआ एक बैंड
पर उस लड़की को न तो कोई युद्ध चाहिए
न ही कुँवारेपन का तमगा

वह तो बस दोपहर तीन बजे कॉलेज के फाटक से बाहर निकलना चाहती है
सड़क किनारे भुट्टा खरीदकर खाना चाहती है 
इतना हँसना चाहती है कि पसलियाँ दुखने लगें
और उस मर्द से बेखौफ़ मोहब्बत करना 
जो उसके सपनों को माचिस के बजाय हवा दे सके

वह किसी महाकाव्य का अस्त्र नहीं बनना चाहती
वह बस दिन के उजाले की एक आम बाशिंदा होना चाहती है
जिसकी हँसी को शर्म के तराजू पर न तौला जाए
और जिसका ज़िंदा बच जाना कोई चमत्कार न कहलाए।









गार्गी मिश्रा 

जन्म: 1988, वाराणसी, उत्तर प्रदेश। हिंदी साहित्य से जुड़ी देश की प्रमुख
पत्रिकाओं और वेब पत्रिकाओं में कविताओं, गद्य, अनुवाद का निरंतर प्रकाशन।
पत्रिकाएँ जिनमें पूर्व में कविताएँ, गद्य व अनुवाद प्रकाशित हुए: कथा देश, पाखी, अहा ज़िंदगी, वनमाली कथा, सदानीरा, हिंदवी, समालोचन, सम्मुख, कृति बहुमत, मेरा रंग। 
संपर्क : 9696781097, gargigautam07@gmail.com







सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।

















Comments

  1. अलग-अलग बिंबों के माध्यम से रची गईं ये कविताएँ मुझे अनूठी लगीं। स्त्री को देवी के रूप में पूजने के आडंबर का पर्दाफाश करती हुई भी ये कविताएँ लगी, कविताओं की यह विशेष भाव और उसमें गुंथी संवेदनाएं मन को भा गई ।
    कवि गार्गी मिश्रा जी हार्दिक अभिनंदन!

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  2. सत्यकेतु17 October 2026 at 23:16

    अभी जबकि देश में दुर्गापूजा की धूम है, जगह जगह पंडाल सजे हैं। महंगी सजावट और प्रदर्शनकारी भक्ति का शोर है, गार्गी मिश्रा ने समानांतर दुनिया की तस्वीरें रखकर सवालों की झड़ी लगा दी है। मिट्टी, पुआल, भूसी और केमिकल से निर्मित प्रतिमाओं में वे सारी खूबियां दर्शायी गई हैं जिसकी चाह में हजारों-लाखों लोग हाथ जोड़े खड़े हैं। मुश्किल है कि प्रतिमाओं की सुंदर किन्तु निर्जीव आंखें उन अनर्गल क्रियाओं को नहीं देख पातीं, जो उन्हीं पंडालों में या आसपास घटित होती रहती हैं। गार्गी ने बड़ी सूक्ष्मता से उन बिकारों को रेखांकित किया है जो प्रदर्शनकारी भक्ति और भावशून्य व्यवहार के मेल से पैदा होती है। स्त्री शक्ति के आराधन और कन्या पूजन के महा अनुष्ठान के समानांतर स्त्रियां, युवतियां, किशोरियां, बच्चियां भय, विषाद और तनाव से ग्रस्त हैं। देवी हथियारों से लैस हैं लेकिन बगल में खड़ी स्त्री असहाय है। यह बड़ी विडंबना है कि कन्या पूजने वाले हाथ कुछ ही देर बाद असंतुलित और अनियंत्रित हो जाते हैं। जिस देश की करोड़ों की आबादी दो जून की रोटी के लिए तरसती हो, वहां पंडालों की भव्यता पर करोड़ों निछावर करना मनुष्य का सरासर अनादर करना है। गार्गी इस तथ्य को इंगित करती हैं कि देवी इसलिए पूज्य हैं कि वह बोलतीं नहीं। बोलती स्त्री समाज को पसंद नहीं, इसलिए किसी कोने में सुरक्षित नहीं। भक्ति, शक्ति और नियति के विरोधाभास को सधे अंदाज में प्रस्तुत करती गार्गी मिश्रा की कविताएं यथार्थपरक प्रतिरोध का बेहतर उदाहरण हैं।

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  3. डॉ उर्वशी18 October 2026 at 09:35

    गार्गी मिश्रा की कविता ‘लिनेन के कुरते वाला असुर’ पितृसत्ता के सभ्य आवरण में छिपी क्रूरता को बेनकाब करती है। देवी-पूजा और स्त्री-दमन के अंतर्विरोध को कविता गहरी संवेदना और धारदार प्रतिरोध के साथ उभारती है। यह उस असुर की पहचान है, जो पुतलों में नहीं, हमारी सामाजिक चेतना में जीवित है।

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  4. अष्टभुजा शुक्ल18 October 2026 at 12:54

    गार्गी मिश्रा की ये कविताएँ हमारे वक्त की बहुत मार्मिक आख्यान हैं।इन्हें पढ़ते हुए एक कराह उठती है जो समूचे परिदृश्य को आच्छादित कर लेती है।ये न केवल सांस्कृतिक दृष्टि से आज की कविताएँ हैं, बल्कि इनमें युगों की पीड़ा महसूस की जा सकती है।इन कविताओं के लिए कवि सहित कौशिकी को हार्दिक शुभकामनाएं।

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  5. ललन चतुर्वेदी18 October 2026 at 13:03

    बहुत अच्छी कविताएं हैं।
    प्रासंगिक भी।

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  6. जयप्रकाश18 October 2026 at 13:40

    *बेह्तरीन*💐

    अपनी प्रत्येक कविता में सरल भाषा और स्पष्ट तेवर लिए गार्गी मात्र स्त्री की यातना का रोना नहीं रोतीं, बल्कि सामाजिक-धार्मिक ढोंग के खिलाफ एक बेहद सशक्त, विचारोत्तेजक और मौलिक प्रतिरोध का स्वर बुलंद करती हैं.... !

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