संजय भिसे की कविताएं

 

                                 संजय भिसे 



इस क्रूर और नृशंस समय में सबसे गहरे संकट में मनुष्य और मनुष्यता के साथ वे तमाम जीव हैं जो जीवन की मामूली और मूलभूत आवश्यकताओं और सुविधाओं के लिए निरंतर संघर्ष कर रहे हैं।हिंसा से कोई जगह नहीं बच पा रही। ऐसे में बुद्ध और स्त्री की याद आना स्वाभाविक है।संजय भिसे की कविताएं चीजों को अलग नजरिए से दिखाती हैं जिनमें स्थानीयता भी है और प्रासंगिकता भी।बुद्ध भी हैं और स्त्री भी। जीवन के द्वंद्व की एक अद्भुत लय इन कविताओं में है।



संजय भिसे की कविताएं 



इलहाम

           

अनेक व्याधियों से त्रस्त

दवाईयां खाकर परेशान

पत्नी के सिरहाने बैठ

दबा रहा था उसका सिर 

कनपटी की पिराती हुई नसें


रक्ताल्पता के बावजूद न जाने क्या भरा था उनमें  

हल्के छूते ही तड़पकर जाग उठता था दर्द 


गृहस्थ जीवन के इन वर्षों में

थोड़ा बहुत हाथ ही बंटाता आया हूं मैं 

वही ढोती होती है गृहस्थी का समूचा भार

गृहस्थी के लिए ढोना शब्द

अवश्य ईजाद किया होगा पुरूषों ने

स्त्रियां तो कितनी सहजता से जीती है 

तमाम काम करते हुए 


किसी घर में जब बीमार पड़ता है पुरुष

यह महज एक पारिवारिक सदस्य का बीमार होना है

पर जब बीमार पड़ती है घर में पत्नी या माँ

बीमार हो जाता है समूचा घर


पटरी से उतर जाती है घर की सामान्य दिनचर्या

वृक्ष समेट लेता है अपनी छाँह 

बया की प्रतीक्षा में हिलते रहते हैं

डालियों पर लटके उदास घोंसले 

कलकल बहती हुई नदी हो जाती है विलुप्त 


स्त्रियों के बीमार पड़ते ही हम समझ पाते हैं

घर से हमारा संबंध कितना औपचारिक 

यह औरते ही हैं जिनके मार्फत

हम पहचानते हैं इस संसार को

समझ पाते हैं सृष्टि की अबूझ लिपियां 

उन्होंने नहीं थामी होती हमारी हथेलियां कसकर

तो कितने असहाय होते हम

गोद न होती उनकी तो कहां जाकर रो पाते 

कहां हल्का कर पाते अहम से भरा हृदय


मैं दबा रहा हूं पत्नी की कनपटी की उभरी हुई नसें

तपते हुए माथे पर रख रहा हूं बर्फ की पट्टियां

उसके ना-नुकुर करते हुए भी

गीले तौलिए से पोंछ रहा हूं पसीने से सना शरीर


चाहता हूं घर में लौट आए खोया हुआ घर 

और उसकी हंसी के साथ ही लौट आए स्वास्थ्य 

इस रूग्ण घर का।


मेरा जन्म 

                                     

क्या मेरा जन्म 

उल्हासनगर के सरकारी अस्पताल में

इक्कीस मई उन्नीस सौ छिहत्तर की सुबह 

पौने पाँच के आसपास हुआ


जब मैं रोया

अपने फेफड़ों की ताकत को तौलता

अपने सुरक्षित गर्भगृह से बाहर

इस अथाह संसार में 

खुद को अकेला पाकर


आँखों में चुभती

चमकती रोशनी से डरा


पर क्या मैं इसके पहले जन्म नहीं ले चुका था?


पूरे नौ महीने 

अंधेरे में टटोलता मां को भीतर से

हाथ पाँव पटकता

अँगूठा चूसता मुस्कुराता

एक वृत्त में घूमता


या मैं तब पैदा हुआ था

जब आये थे माता-पिता करीब

एक दूसरे के 

सृजन के आनंद से भरे


और मेरे लिये खोला था गर्भ का द्वार

या इसके भी पहले

जब पहली बार देखा था

पिता ने माँ को माँ ने पिता को


या इससे भी पहले मेरे दादा-लकड़दादी ने

या

उससे भी पहले

जब मनुष्य ने समझी थी

प्रेम की जरूरत

और उसका अर्थ


या इससे भी पहले

जब पहली बार

बाबा आदम और हव्वा ने

चखा था वर्जित फल

 

अज्ञान की परतंत्रता तजकर

चुनी थी ज्ञान के खोज की कंटीली राह  

और उनका अपना मुक्ति पथ 


या इससे भी 

करोड़ों वर्ष पूर्व 


जब पृथ्वी 

जीवन की ललक में डूबी 

अलग हुई थी सूर्य से.. .


एहि पस्सिको 

                

यशोधरा

एहि पस्सिको!

तुम्हारे सामने खड़ा है तुम्हारा वही सिद्धार्थ

जिसने तुम्हें देखा हमेशा नैन भर

जिसकी देह की स्मृति में दर्ज है

तुम्हारा आरक्त सम्यक स्पर्श


यशो!

समस्त पंचशील,अष्टांगिक मार्ग

दस पारमिताओं और तृष्णा के पार

तुम्हीं खड़ी रही हो मेरी संबोधि बन


आओ हम दोनों मुस्कुराएं

उन कहानियों पर जो फैली है लोगों में

कि तुम सो रही थी जब मैं तुम्हें छोड़ गया


उन्हें क्या पता कि हम दोनों ने 

जी भरके देखा था एक दूसरे को

कौन सोता है आख़िर उस रात 

जब दो प्रेमी विदा हो रहे होते हैं

क्या वो अंतिम घूंट भी नहीं पी लेना चाहते 

अपने प्रेम प्याले का

मैंने जब चूमी थीं राहुल की निद्रित आंखे

उसके पलकों की सरसराहट

आप्लावित करती गई थी मेरा हृदय


जब मैंने खींची थी कंथक की लगाम

उसकी पहली टाप पर मुड़कर देखा था

उस सपनीले गवाक्ष की तरफ

जहां तुम्हारी गोद में सोया हुआ था राहुल

उसकी नन्ही हथेलियों को अपनी हथेली में लिए

तुमने एक वादे के साथ दी थी विदा

कि ज्ञान की नदी मिलते ही

ले आऊंगा तुम्हारे लिए अपनी अंजुरी में ज्ञान जल


तुम्हें पता है कि ये सब क्या कहते हैं

बहुत कठोर थी मेरी धम्म यात्रा

पर तुम्हारे श्रम और अनूठे धैर्य के सामने

यह कुछ भी नहीं यशो

बुद्धत्व की मेरी यात्रा से 

अनमोल है तुम्हारा एकांतिक निश्चय


तुम जानती हो मेरी यशोधरा

बोधिवृक्ष के पत्ते तुम्हारी आँखों की स्मृति थीं

जब जब मैं रोया बोधिवृक्ष के स्कंध से लिपटकर

तुम्हारी देह की सुगंधी ने पुनि-पुनि भरा मुझमें चैतन्य

खाली कटोरे से जंगल के अकेलेपन में

मैंने मौन से कहीं ज़्यादा तुमसे संवाद किया


यह तो पिटक कहते हैं यशो

मैंने तृष्णा के आखेटक मार से अंतिम युद्ध में

गवाह के रुप में पृथ्वी को छुआ

पर यह मैं जानता हूं 

कि मैंने छुआ था तुम्हें धरा

गवाही दी थी तुम्हारे अपार सलोने धैर्य ने

तुम्हीं मेरा यश हो तुम्हीं मेरी धरा


तुम्हारा ये दृढ़ आलिंगन

तुम्हारे अश्रुओं से भीगा हुआ मेरा चीवर

मेरे कांसे में टपकते तुम्हारी आंखों के अनमोल मोती

तुम्हारे छह वर्षों का निस्सीम प्रेम है

जब मैं चखूंगा तुम्हारा अश्रु मिश्रित पिंडपात

मेरे रक्त में हमेशा के लिए 

प्रदीप्त हो जाएगा यशोधरा का अस्तित्व


आगे जम्बूद्वीप में चारिका करते हुए

साकेत, कोशल,मगध,वाराणसी से गुज़रूंगा

देखूंगा जरा-व्याधि-मृत्यु से ग्रस्त जनता

जब-जब क्लांत होगा मेरा मन

जब जब देखूंगा तृष्णा का महासमर

तुम्हारा ये प्रेमळ आलिंगन 

मुझे अविचल रखेगा,यशोधरा।


हिंसा न भवति

                 

यह जो बेफ़िक्री से हल्की सीटी बजाता 

मुंबई के उपनगरीय स्टेशन के पेशाबघर में

तुम्हारे ठीक बगल में खड़े होकर पेशाब कर रहा है

बस अभी थोड़ी देर पहले लोकल ट्रेन से उतरा है

मामूली-सी बात पर भीड़ भरी लोकल में

एक अनजान यात्री की हत्या करके आया है


इसके हाथों मे कंपकंपाहट नहीं

चेहरे पर कोई शिकन नहीं

आपसी धरपकड़ की हांफ भी बाकी नहीं सांस में

रक्तचाप मेडिकल की मानक सीमाओं के भीतर

नब्ज़ भी स्वस्थ्य शरीर के लिए आवश्यक


थोड़े देर पहले के आपराधिक श्रम से थका 

यह आराम से वड़ापाव भी खा सकता है अभी

अपनी पानी की बोतल का पानी दे सकता है 

यदि आपको बात करते या खाते हुए ठसका लगे

यह इस हद तक मासूम दिख रहा है फ़िलवक्त

जैसे कि हिंदी कविता में रिवाज़ है कहने का

वह किसी ईश्वर की तरह शांत दिख रहा है 

ठीक उसी की तरह मंद-मंद मुस्कुरा भी रहा है


आप यह कल्पना भी नहीं कर सकते

यह वही शख़्स है जो थोड़ी देर पहले 

चलती हुई लोकल में लंबा-सा चाकू लिए खड़ा था

बस मामूली नोंकझोंक में बिफरकर

उसने चला दिया हथियार सामनेवाले यात्री पर

बहते हुए रक्त, यात्री की चीख फिर लड़खड़ाकर गिरने ने

ज़रा भी नहीं झकझोरा इसे

एक ईंट नहीं खिसकी इसके अंतर्मन के दीवार की

पछताना तो बहुत दूर की बात है 

हम इतनी उम्मीद भी कैसे लगा सकते हैं आज के दौर में

कि कलप उठें होंगे इसके प्राण पल भर के लिए


इस देश में सच्चे अर्थों में आख़िरी बार 

शायद अशोक ही पछताया कलिंग की हिंसा के बाद 

अहिंसा कायरता का नाम है अब

आक्रामकता ने ढंक ली है पूरी पृथ्वी

आज अपराध बोध जैसी बचकानी बातों की 

कोई टीआरपी नहीं ख़बरों के गुर्राते प्राईम टाइम में


मचमच तो रोज़ की बात है लोकल ट्रेन में

एक-दूसरे को भोत हुआ तो हुल देने 

स्टेशन पर उतर तेरेको देखता हूं से ज़्यादा

किसी को पड़ी नहीं रहती मुंबई की भीड़ में

अगले दिन किसको याद रैनी है शकल

फिर काम पे पहुंचने से ज़्यादा क्या ही पड़ा है किसी को


इसके अंदर ऐसा क्या था ज्वलनशील 

जिसने मामूली घर्षण से इतनी जल्दी पकड़ ली आग

अपने साथ धू-धू करते हुए जला दी 

एक निरपराध यात्री की घर लौटती जिंदगी

कैसे उछलकर दूर जा गिरा सभ्यता का ढक्कन

खौल रही थी न जाने कब से भीतर

दमित हिंसा की सांस्कृतिक केटली


अब यह शायद फ़िक्रमंद घरवालों को फोन करेगा

कि वह लौट रहा है, देर हो जाएगी, थोड़ा काम था अर्जंट

हो सकता है 

मां की दवाई के लिए केमिस्ट की दस दुकानें छान मारे

हो सकता है 

भोली पत्नी इसके लिए वटसावित्री या करवाचौथ करे

हो सकता है 

बेटी फादर्स डे पर हाथ से ग्रीटिंग कार्ड बनाए

और बोल्ड अक्षरों में लिखे बेस्ट पापा


निम्नमध्यवर्गीय या मध्यवर्गीय कॉरपोरेट कारकून

यह इतना घरेलू और विनम्र कि आप कैसे जान पाएंगे

इसके भीतर उग रही थी हिंसक बेल

जो मूलाधार से ऊपर बढ़ती रही सुषुम्ना से लिपट

फोड़कर बाहर आ चुकी है अब 

इसके विवेक का सहस्त्रार


आख़िरकार कब समझ पाएंगे

हर एक में भर दी गई है अपार घृणा

अब आसमान से सीधे उतरती है यह

हमारे हाथों में पैबस्त स्क्रीन पर

आंखों के रास्ते इसने बदल दिया है

मस्तिष्क की संवेदन तंत्रिकाओं का जाल

घातक स्लीपर सेल जो ध्वस्त कर रहा है विवेक

जिसने हृदय में घोल दिया कालकूट विष

अहमन्यता की हद तक सांस्कृतिक दंभ


धीरे-धीरे हमारे साथ रम गई है क्रूरता

बन चुकी है अब हमारे घर-परिवार का हिस्सा

यह हमारे साथ ही सोती है उठती है चलती है

घात लगातार इंतज़ार करती है मौके का

बस फिर इस आदमी के मार्फत निकाल लेती है चाकू

एआई जनित भावविहीन आदमी की तरह

जिसके लिए मनुष्यता और संवेदनशीलता बस डेटा है

या केवल शब्दों का बड़बड़ाता समुच्चय

बना दी गई है जीवन की अर्थवत्ता एक निरथर्कता


कितने दुख की बात है

कि जब हमारी कविता ने पहचान ली थी 

इस आदमखोर पशु की दबी आहट

कवि कुमार अंबुज के आगाह करने के बाद भी

हमने इस क्रूरता की जड़ में नहीं डाला मठ्ठा

और आख़िरकार आ ही गई यह 

अफ़सोस हमें इसके आने का सच में पता नहीं चला।


जो डूबा सो पार

                                         

तुम्हीं कहो मैं कहाँ डूब जाऊँ

तुमसे इश्क़ के बाद


मैं उल्हासनगर की धरती का बाशिंदा

जहाँ केमिकल उत्सर्जन ने

मृत कर दी है मेरी वालधुनी नदी

जिसे उल्हास नदी भी कहते हैं आमजन

एक विराट पेंटिंग है सुधीर पटवर्धन की उल्हासनगर

जिसमें तैर रहा है नीला गंदला रसायन 

मेरा मोहेनजोदड़ो मर रहा है मुझमें


इस महादेश में सच में उल्टी हो गई है सारी धार

बीसवीं सदी के सारे सपने

हक़ीक़त बनते-बनते हो गए दास्ताँ 

सो गए तमाम दास्तानगो


मेरे पास इतिहास की ओट भी नहीं

कोई भ्रम भी नहीं बहलाने को

पुराने क़िलों की चुप दीवारें नहीं

भूली बिसरी दीवाने शायर की कोई मज़ार नहीं

कहाँ जाकर पढ़ूँ मैं अपने इश्क़ का फातिहा

विलाप करने के लिए कोई जंगल नहीं बस्ती नहीं


तुम रूठकर कहाँ जा बैठी हो

किस एकांत में तमाम सिरे काटकर

तुम्हारे नाम की अनुगूंज बेरंग लौट आती है

डाकिया शायद पहुँचाता तुम तक मेरा ख़त 

पर वो पाब्लो नेरूदा की प्रेम कविताएँ रटने लगा

और एक दिन मर गया ख़तों भरी साइकिल चलाता हुआ


मेरे अकेलेपन का गवाह ये चाँद है

सतीश कालसेकर की चर्च की घंटियों वाली कविता है

भुजंग मेश्राम की नशे में डूबी आँखें

उसके उलगुलान और अबूझमाड़ का आक्रोश

जयंत पवार के साथ बिताई हुई छटाँक भर रात

और मरीन ड्राइव पर उसके पास फफककर रोता हुआ मैं


तुम तंत्र की किस मौन साधना में रत हो

किन शाबर मंत्रों की विचित्रता में 

आ-जाओ और मेरी अचल देह पर बैठकर

जगाओ मुझमें शेष रह गए शिव को

बदल दो मेरी शव हो चुकी समस्त चेतना को

 

मैं विक्षिप्त भटक रहा हूँ पूरे ब्रम्हांड में

तुम्हारे साथ की स्मृति अपने सीने से लगाए

मैं यह नहीं होने दूँगा

कि कोई काट ले तुम्हारी देह 

और मैं रह जाऊँ साबुत

तुम्हारे साथ बिखर जाना है मुझे-भी 

इस अंतरिक्ष में


मैं थोड़ा-थोड़ा गिरूँगा तुम्हारी गलती हुई स्मृति के साथ

थोड़ा मरीन ड्राइव के समुद्र में

थोड़ा गेटवे ऑफ इंडिया से चर्चगेट के रास्तों में

थोड़ा पुणे के सिनेमाघर में

थोड़ा बेंगलुरु के वीरान कैफ़े में

थोड़ा मांडवी के दर्या सगंम में

थोड़ा उल्हासनगर स्टेशन के ब्रीज पर

थोड़ा चांदीबाई कॉलेज की केमिस्ट्री लैब में


अंत में थोड़ा-सा ठोस बचा हुआ

शामिल हो जाऊँगा उस मोर्चे में

जिसमें संविधान के पन्ने पताका बनकर फहर रहे होंगे


वो घिसी हुई बदरंग नीली कमीज़ 

जिसे पहनकर मैंने चूमा था तुम्हें

बाणगंगा से सर्पिलाकार मरीन ड्राइव उतरती हुई टैक्सी में

दिसंबर के आसमान में घुल जाएगी


तुमसे इश्क़ के बाद 

चैत्यभूमि के तोरण के नीचे खडे़ होकर

मैं गाऊँगा वो गीत

जिसमें शामिल होगा मुक्ति का पथ

जिसमें शामिल होगी 

नई दुनिया की सम्यक गाथा।


मन की सिटकिनी      

                           

जो निश्चय कर चुका चले जाने का

उसे लौटाना आसान नहीं


मनाना बहुत कठिन 

जिसने मनुहार की तरफ फिरा ली पीठ


गुहार बेकार का खलल 

जिसने कान न देने का फैसला कर लिया


देख कर भी नहीं देख सकती है आंख

जिसने दृश्य से मन में बना ली दूरी


कभी आमना-सामना नहीं हो सकता

जिसने जानकर हर बार बदल दिया रास्ता 


कभी नहीं पहुंच सकता संदेश

जिसने ब्लॉक कर दिया मोबाइल नंबर


कुछ भी याद नहीं दिला सकते

जिसने पोंछ ली स्मृतियों की अपनी स्लेट


उससे मिलकर कभी नहीं मिल सकते

जिसने बंद कर ली भीतर से मन की सिटकनी।


पिताजी का पहला और आख़िरी कवि सम्मेलन

                                                        

1984 में जब इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई

और सारे देश में फैली एक ही शोक की लहर

मेरी दादी जो इंदिरा गांधी की उस समय से प्रशंसक थी

जब उसे पता चला था कि नेहरू की बेटी है इंदिरा

बहुत दुखी हुई और स्वाभाविक था कि मेरे पिता

अपनी माता यानी मेरी दादी के लाडले बड़े बेटे

परिवार और पड़ोस डूब गए शोक में


कुछ दिनों तक घर में दोपहर वक्त 

मोहल्ले की एकमात्र दुकान के दोपहर में बंद हो जाने पर

जो बिल्कुल सटी है घर की दिवार से

लाया जाता रहा सुबह का अख़बार

जिसे सुनाते थे पिताजी पढ़कर

और मेरी दादी-चाचा-माँ सुना करते


महीनों चले ऐसे ही शोकग्रस्त माहौल में 

हमारे मोहल्ले के छोटे विद्यालय के प्रांगण में

शाम ठीक सात बजे से

विराट कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ

जिसमें मुंबई के कई बड़े कवियों को आना था – 

ऐसी घोषणा थी

हमारे मामूली मोहल्ले में 

जहां स्थानीय नगरसेवक का आना भी एक घटना है

यह थी एक अनोखी बात और जाहिर था 

कि संगीत व कला प्रेमी पिता सुनने ज़रुर जाते


मेरे पिता जिनका अभी-भी मीठा है गला

सीखा है थोड़ा शास्त्रीय संगीत

जिन्होंने बनायी थी अपनी 'सम्यक कव्वाली गायन पार्टी'

मोहल्ले में कई बार बजाया था तबला 

हाथ में घूंघरू बांधकर

गाई थी कई कव्वालियां और भीमगीत


एक दिन हम भाई बहनों के बढ़ते कद 

छोटे होते गंदे कपड़ों को देख

बंद कर दिया पिताजी ने गाना

और फर्निचर बनाने लगे तीन नंबर मार्केट की एक दुकान में

फटा हुआ तबला बंद हो गया

घर के एकमात्र छोटे कपाट में 

पिताजी तबले की तरह ही चुप हो गए


ठीक सात बजे के आसपास जब शुरु हुआ कवि सम्मेलन 

बहुत भीड़ मची थी ग्राऊंड में 

मैं खड़ा था सबसे आगे 

अपने कुछ दोस्तों के साथ एक कोने में 

उस तरफ जहां कुर्सियां रखी हुई थी 

सम्माननीय अतिथियों के लिए


अब यह बताने की आवश्यकता तो नहीं है

कि सम्माननीय अतिथि शहर के लीडर और सेठ ही थे

मंच, उस पर बिछा गद्दा, खादी पहने कवि, डायरियां 

माईक में घुसकर लाउडस्पीकर से फैलती कविताएं


पर मेरे मोहल्ले के 

बिरहा-कजरी-चैती-गीत-कव्वाली के शौकिन लोगों को 

नहीं समझ आई तुकों की बूंदाबांदी

इधर की नई कविताएं अतुकांत

बात यहां तक बढ़ आई कि 

स्थानीय कलाकार को भी दिया जाए मौका 

और बुजुर्ग-युवा सब कार्यकर्त्ताओं ने 

ढकेला मेरे पिता को मंच पर भीड़ से खींचकर


'भाऊदास!अब तुमको गाना ही पड़ेगा!'

 

दुबले-पतले पिता धकियाए गए मंच पर 

घबराए पिता ने वहीं लिखा एक गीत 

बातर्ज ‘बस्ती-बस्ती पर्वत-पर्वत गाता जाए बंजारा'

'अपना पराया यहां न कोई हमसब हैं भाई-भाई'

और सुनाया अपने तरन्नुम में

दे पीटीं तालियां मोहल्ले के लोगों ने खुशी के मारे झूमते


मेरी दादी की सखी पड़ोसन बाहर निकली

भाऊदास है न! कहती

जिसने लाउडस्पीकर से सुनी गूंजती पिता की आवाज़

और मैं खड़ा था एक अजीब प्रसन्नता से भरा देखता

सफेद गद्दे, दूधिया रोशनी के बीच पिताजी को गीत सुनाते

जिसमें पिताजी ने की थीं एकता की बातें

जैसा कि मुझे बाद में मालूम हुआ बड़ा होने पर 


कवि सम्मेलन के दूसरे दिन

मेरे स्कूल के सरजी ने जांगिड़ टीचर जी को बताई यह बात

जो भीड़ में खड़े होकर सुन रहे थे कविताए

फिर जांगिड़ टीचर जी देखने लगीं मुझे गौर से 

अपनी उन बड़ी-बड़ी आंखों से पलकें झपकती

जिनका ज़िक्र मेरे मोहल्ले के शोहदे हमेशा करते

उनके चेहरे का आश्चर्य, कुतूहल और प्रशंसा अब तक याद है


कवि सम्मेलन के बाद पिताजी को मिली

भूरे रंग की एक डायरी,एक पेन और एक पुष्पगुच्छ

स्थानीय को दिया गया अवसर ही बहुत था 

मानदेय की तो कोई बात ही नहीं

जिनमें से पुष्पगुच्छ को रखा गया

स्टील के ग्लास में पानी डालकर मुरझा जाने तक 

फर्नीचर बनाते हुए प्लाईवुड पर निशान खींचते 

मुझे नहीं मालूम कहां गिर पड़ा पेन

जो हमेशा रहता था पिता के कान पर खोंसा हुआ


लेकिन वह भूरी डायरी 

पिताजी के लिखे गीतोंवाले पन्नों के बाद

बनिये का हिसाब लिखे जाने के काम आई

और उसका मोटा गत्ता 

वॉलपीस के लिए उपयोग में लाया गया 

मेरे स्कूल के हस्तकला पीरियड में


जब देखते पिताजी 

मेरी पत्रिकाओं में छपी कविताएं

मेरी और दोस्तों की प्रकाशित कुछ पुस्तकें

तो मेरे मित्रों गीत चतुर्वेदी, विशाल वाटवाणी को 

फिर-फिर सुनाते 

कई बार सुनाया हुआ वाकया

बच्चों जैसी पुलक और आंखों की चमक के साथ


कि कैसे लिखा था उन्होंने गीत

सुनाया था तरन्नुम में 

बिना तबले की थाप और घूंघरू के

कि उस समय कैसा अंधेर मचा था दिल्ली में

कि अब तो दिल्ली का माहौल उससे भी बदतर 

कि अब कुछ कहना भी कठिन हो गया

कि ज़माना बदल गया देखते-देखते

कि अब नहीं होते हैं वैसे कवि सम्मेलन


हम सबसे नज़रें चुराकर 

वे देखते किसी और दुनिया की तरफ़

फिर अचानक कनखियों से ताकते

तबले वाले छोटे बंद कपाट को 

अचानक एकदम से चुप हो जाते 

फिर तेज़ी से घर से बाहर चले जाते।



संजय भिसे

हिंदी की सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, कहानियां,लेख एवं मराठी से हिंदी अनुवाद प्रकाशित

प्रकाशित कृतियां- डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ( चित्रमय चरित्र का हिंदी अनुवाद) , जब मैंने जात छुपाई (मराठी के प्रख्यात दलित कथाकार बाबूराव बागुल की कहानियों का हिंदी अनुवाद), बुद्ध का जनवादी धर्म ( अविनाश सहस्त्रबुद्धे की मराठी पुस्तक का अनुवाद) , सर्वोत्तम भूमिपुत्र : गोतम बुद्ध ( आ.ह.सालुंखे ) की पुस्तक का हिंदी अनुवाद, डॉ बाबासाहब आंबेडकर के 101 विचार ( हिंदी अनुवाद), महामानव ( डॉ बाबासाहब आंबेडकर के चित्रमय चरित्र का हिंदी अनुवाद),डॉ.बाबासाहब आंबेडकर के नेतृत्व में किया गया महाड़ के चवदार तालाब का सत्याग्रह (आर.बी.मोरे की पुस्तक का हिंदी अनुवाद)

पुरस्कार- 'जब मैंने जात छुपाई' पुस्तक के हिंदी अनुवाद के लिए महाराष्ट्र साहित्य अकादमी का 'बाबूराव विष्णु पराडकर सम्मान' (2006)





सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।






Comments

  1. चंद्रेश्वर3 October 2026 at 09:44

    आज सुबह-सुबह ही संजय भिसे की कविताएं पढ़ गया। वे अपनी अभिव्यक्ति में इतने सरल-सहज हैं कि उनकी कविताएं पढ़ते हुए कहीं से मेरे जैसे पाठकों को भाषिक स्तर पर कोई कठिनाई नहीं महसूस होती है। उनमें एक सहज प्रवाह है। वे अपनी इन कविताओं के ज़रिए अपने पाठकों से संवाद करते हैं,वह भी ईमानदार होकर। उनकी कविताओं में आत्मीयता के साथ गहरे पैठने पर ही पता चलता है कि वे मूलतः प्रेमराग और मनुष्य धर्म के ही कवि हैं। उनकी कविताओं में जहां मुंबई की लोकल ट्रेन में हत्या का प्रसंग आता हो या फिर अन्य एक कविता में बुद्ध और यशोधरा के जीवन के प्रसंग हों - सबमें जीवन लय में विन्यस्त क्रूरताओं एवं स्नेहिल राग तत्व को भी प्रत्यक्ष करने की कोशिश की गई है। कविताओं में उल्हासनगर के उल्लेख से मेरी पुरानी स्मृतियां जाग गईं। मैं हिन्दी के विद्वान प्रोफ़ेसर डॉ. दशरथ सिंह से मिलने 1987 में उल्हासनगर गया था। उन दिनों मैं वल्लभ विद्यानगर, गुजरात में प्रोफ़ेसर डॉ. शिवकुमार मिश्र के निर्देशन में इप्टा आंदोलन पर शोधकार्य कर रहा था। उसी वर्ष कवि मित्र रमन मिश्र की मुंबई में शादी हुई थी। अब वे मुंबई में परिदृश्य प्रकाशन के मालिक भी हैं। संजय भिसे हिन्दी के समकालीन कवियों के बीच अपनी कविताओं के ज़रिए एक अच्छे कवि नज़र आते हैं। कौशिकी लगातार बेहतरीन काम कर रही है। शंकरानन्द स्वयं एक अच्छे कवि हैं। उनकी हिन्दी समकालीन कविता में कवियों की पहचान एवं चयन करने की दृष्टि अब तक निष्पक्ष रही है। बस,उनपर किसी पटना , दिल्ली के गुटबाज़ या मठाधीश की कुदृष्टि न पड़े,न ही वे उनकी ग़लत सलाहियत के शिकार हों।

    चंद्रेश्वर
    लखनऊ

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  2. डॉ उर्वशी3 October 2026 at 10:42

    संजय भिसे की कविताएँ अपने समय की हिंसा, विस्थापन, प्रेम, स्मृति और मनुष्यता की गहरी पड़ताल करती हैं। उनकी काव्य-दृष्टि का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे बड़े प्रश्नों को रोजमर्रा के जीवन के मामूली दिखने वाले प्रसंगों से जोड़कर देखते हैं। ‘इलहाम’ में पत्नी की बीमारी के बहाने स्त्री के अदृश्य श्रम और उसके बिना घर के अर्थहीन हो जाने का मार्मिक बोध उभरता है। ‘एहि पस्सिको’ बुद्ध और यशोधरा के संबंध को त्याग की प्रचलित कथा से आगे ले जाकर प्रेम, धैर्य और स्त्री के मौन योगदान की नई व्याख्या देती है। ‘हिंसा न भवति’ हमारे भीतर सामान्यीकृत होती क्रूरता और संवेदनहीनता को भयावह ढंग से सामने रखती है। ‘जो डूबा सो पार’ में प्रेम, पर्यावरण, स्मृति, शहर और सामाजिक मुक्ति एक-दूसरे में घुल जाते हैं। वहीं ‘पिताजी का पहला और आखिरी कवि सम्मेलन’ निजी स्मृति को सामाजिक इतिहास में बदल देती है। सहज भाषा, स्थानीय बिंब, आत्मीयता और वैचारिक बेचैनी इन कविताओं को विशिष्ट बनाते हैं। भिसे मूलतः मनुष्य और मनुष्यता के कवि हैं।

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  3. अत्यंत सुंदर, भावपूर्ण और विचारोत्तेजक रचनाएँ।इस बेहतरीन काव्य-सृजन के लिए संजय भिसे जी का कोटि-कोटि साधुवाद।

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  4. अरुण आदित्य3 October 2026 at 13:37

    मन की सिटकनी खोलती सुंदर कविताएँ । संजय जी को बधाई।

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  5. ललन चतुर्वेदी3 October 2026 at 13:38

    अच्छी, प्यारी और संवेदना से भरी कविताएं हैं।

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  6. शेषनाथ पांडे3 October 2026 at 13:40

    Sanjay Bhise मैंने अभी पढ़ने के लिए खोला। सरसरी तौर पर पढ़ रहा था लेकिन हर कविता रोक रही थी। ठहरा रही थी। मेरा जन्म का क्या सुंदर इमेजिनेशन और इमोशन्स हैं। दिल खुश हो गया। हिंसा न भवति में कितनी ज़रूरी और ध्यान देने वाली स्थापना है कि "शायद अशोक ही पछताया कलिंग हिंसा के बाद." सारी कविताएं ज़रूरी और मर्म के लेयर्स को स्पंदित कर रही हैं। मोहब्बत संजय भाई को। 🌹 कौशिकी को भी बधाइयां।

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  7. घनश्याम3 October 2026 at 19:53


    मैं पहली बार संजय भिंसे की कविताओं से रूबरू हुआ। गहरे रूप में प्रभावित कर गई सारी कविताए!। हमारे समय की जरूरी आवाज सुनाई देती है इन कविताओं में। 'सिर्फ 'मन की बात' कहने वाला जन की बात नहीं करता। परन्तु यहाँ मन की बात स्वजन की बात से चलती हुई जन-जन की बात और जन-गण-मन की बात तक और उससे भी परे बहुत-कुछ को समेटती उस पार तक पहुँचती है जिसके बारे में, बकौल बच्चन, यही कहा जा सकता है कि "इस पार प्रिय! तुम हो, मधु है, उस पार न जाने क्या होगा?" ? इन कविताओं में जो परिवार-बोध, इतिहास-बोध, समकालबोध है वही इनका सौंदर्यबोध है। कविता को जनबोध से अलग-थलग नहीं किया जा सकता है। कविता का जनबोध ही युगबोध की कविता होती है। कवि की काव्यदृष्टि तीक्ष्ण और काव्यकला 'कला जीवन के लिए' सिद्धांत पर केन्द्रित है जिसका आधार बहुत ठोस और सुदृढ़ है। कवि और संपादक दोनों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

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  8. संजय भिसे की ये कविताएँ अपनी सादगी से मुझे मोह गई।इन में जीवन की बेहद सूक्ष्म संवेदनाएं मुझे विषय और भावों में दिखी और सामाजिक यथार्थ की गहरी समझ नजर आई ।

    कई कविताएं आत्मीय मानवीय संबंधों का अनूठी दुनिया मुझे दे गई हैं, कवि को पहली बार पढ़ा है फिर भी आकर्षित हुआ । कविताएं बहुत गद्यायात्मक मगर उतनी ही आकर्षक लगी ।

    अभिनंदन कवि संजय भिसे 🌷

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  9. गणेश विसपुते4 October 2026 at 15:31

    संजय, कमाल की कविताएं हैं। खासकर अपने ही जन्म के रहस्य की इतिहास की लम्बी रेखा पर इन्वेस्टिगेशन करनेवाली कविता। अद्भुत अनुभव है इन्हें पढ़ना।

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  10. शानदार कविताएँ हैं, ज़िंदा कविताएँ, साँस लेती और धड़कती हुई। मध्यमवर्गीय होना असाधारण होना भी है, हर कविता यह कहती है। एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न, बहुत बड़े संसार को समेटती हुई ये कविताएँ कहीं चौंकाने का सायास प्रयत्न न करते हुए भी बहुत जगह चौंकाती हैं । मेरा जन्म, कविता व्यष्टि से समष्टि का विस्तार रखती है। इल्हाम और एहि पास्सिको कविताओं में एक स्त्रीवादी पुरुष कवि के दर्शन होते हैं, स्त्री के साहस धैर्य और प्रतीक्षा को सर्वोपरि मानते हुए कविताएँ लिखने वाला वह कवि, जिसकी अभी कविताओं और पूरी दुनिया को सबसे अधिक आवश्यकता है।

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  11. संजय भिसे की कविताओं का यह संसार गहरे जीवन द्रव्य से भरपूर है।विषयों की विविधता और यथार्थ का यह बोध एक सुदृढ़ आत्मीय आधार पर निर्मित है ।कवि को बहुत बधाई।

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  12. आशुतोष दुबे4 October 2026 at 19:36

    सुन्दर कविताएं। अंतिम कविता ख़ास तौर पर मार्मिक है और उसमें विष्णु खरे जैसा वह टच है जिसमें वर्णन एक बिन्दु तक आते आते, बिना किसी प्रत्यक्ष जतन के, बहुत स्पर्शी हो जाता है। संजय की कविताओं में सहज मनुष्यता की स्मृति, उसके पुनर्वास का प्रयत्न तो है ही, उसके सामाजिक क्षरण का क्षुब्ध संज्ञान भी है। इन कविताओं में वह वैविध्य भी है जो हमें एक कवि के सुविस्तृत संसार में लिए चलता है।

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  13. सुंदर कविताएं, जो अपने आसपास को देखने और सवाल करने का साहस देती हैं।

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  14. बहुत बढ़िया कविताएँ, शानदार, बहुत बधाई कवि को और पढ़वाने के लिए शंकरानन्द जी का धन्यवाद

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  15. हरगोविंद पुरी4 October 2026 at 21:47

    इस ब्लॉग में संजय हिस्से किस सात कविताएं हैं। बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती हुई इन कविताओं में जीवन की दैनंदिनी है
    हर दिन लिखी जाने वाली डायरी की तरह, जिसमें हर दिन देखा जाता है लेखा जोखा।
    इन कविताओं को पढ़ने के बाद निश्चित रूप से यह कविताएं तमाम लोगों के बीच में बैठकर पढ़ी जाना चाहिए और यह कविताएं बहुत गंभीर परिचर्चा भी मानती है विमर्श के लिए बहुत अच्छी कविताएं।
    कविताओं में सचित्र वर्णन है हमारे समय को ऐसे दर्ज किया जैसे हम कोई एल्बम देख रहे हों।
    इलहाम से लेकर पिता की पहले और आखिरी कवि सम्मेलन
    तक की कविताओं में एक दृश्य चित्र है।
    भाषा तो जबरदस्त है परंतु सबसे महत्वपूर्ण मुझे जो लगा इन कविताओं का कंटेंट बिल्कुल अलग तरह से लिखी गई इन कविताओं पर किसी की प्रतिक्षाया नहीं।
    बहुत ही गंभीर कविताएं हैं जो एक संवाद स्थापित कर सकती हैं। इन कविताओं पर निश्चित रूप से बातचीत होना चाहिए।
    तीन चार बार इन कविताओं को पढ़ चुका हूं परंतु इन कविताओं से निकल नहीं पा रहा हूं।
    एक बेचैनी पैदा हो गई है जिसे मैं शब्द नहीं दे पा रहा हूं।
    मेरी कोशिश रहेगी अबकी बार में किसी बैठक में कविताओं पर चर्चा करूं और लोगों के बीच में पाठकों के बीच में इन कविताओं को लाऊं।
    भाई संजय जी को बहुत-बहुत मुबारकबाद।

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