पायल भारद्वाज की कविताएँ
पायल भारद्वाज
अपने समय के स्याह सच को दर्ज करने वाली पायल भारद्वाज की कविताओं में प्रतिरोध और जिजीविषा एक साथ मौजूद है।इसमें स्त्री की सशक्त उपस्थिति नए समय के नए मुहावरों को अपनी बुलंद आवाज़ में दर्ज करती है। व्यवस्था के दमन और अन्याय को इन कविताओं में बहुत गहराई से महसूस किया जा सकता है।
पायल भारद्वाज की कविताएं
धूर्तता से आगे
कमीनेपन की कोई हद नहीं होती,
वह हर बार अपनी ही बनाई हुई
एक और हद लाँघ जाता है
उसके पास हर क्रूरता के लिए
एक नया तर्क होता है,
हर छल के लिए
एक नया चेहरा
वह पहले भाषा को घायल करता है,
फिर सच को,
फिर मनुष्यता को
मुस्कुराते हुए पीठ में खंजर उतारता है,
और सबसे आगे खड़ा मिलता है
मरहम बाँटने वालों की कतार में
सत्ता का चरित्र बना कमीनापन
क़ानून की धार लिए होता है
व्यवस्था का मुखौटा लगाकर
राजदंड की तरह उठता है
और जन-गण-मन को
घायल करने का हथियार बन जाता है।
अँधेरे के बीच
उनसे लड़ना कैसे संभव हो
जिनके लड़ने के कोई नियम नहीं,
कोई सिद्धांत नहीं,
जिनके गिरने का कोई स्तर नहीं
वे स्वयं को धार्मिक कहेंगे,
मगर धर्म का हर संभव पतन करेंगे
वे देशप्रेम के नारे लगाएंगे,
मगर संविधान का उल्लंघन करेंगे
देवी कहकर स्त्री को
तार-तार करेंगे उसकी अस्मत,
छीन लेंगे उसका मनुष्यत्व
वे जहाँ भी, जैसे भी मौका पाएंगे
तोड़ेंगे हर उस अवधारणा को
जिसकी रक्षा के नाम पर
करते हैं दूसरों को प्रताड़ित
नैतिकता की दुहाई देकर
अनैतिकता के कीर्तिमान रचेंगे,
वे अपने स्वार्थ की वेदी पर
हर मूल्य की बलि चढ़ाएँगे
और हर परिभाषा, हर संदर्भ
अपने पक्ष में बदल लेंगे
वे बेच खाएँगे ईश्वर को,
लूट लेंगे मंदिर-मस्जिद,
तोड़ देंगे हर गिरिजाघर
क़ैद कर देंगे हर उस मनुष्य को
जो सोचता है उनसे अलग
कैसे लड़ा जाएगा उनसे!
उनके दोहरेपन की कोई सीमा नहीं,
धूर्तता उनका स्वभाव है
और क्रूरता उनका अस्त्र
मगर लड़ना तो पड़ेगा, साथी!
कि लड़े बिना कुछ नहीं मिलता
लड़ना तो पड़ेगा,
बचाने को देश और दुनिया
बचाने को अपनी मनुष्यता,
मरना तो पड़ेगा, साथी!
कि जीया जा सके।
पतन का पूर्वराग
भ्रम की
प्रतिमाएँ ढहती हैं जब,
चरमराने लगती हैं कुर्सियाँ
डोलने लगते हैं सिंहासन
बिखर जाते हैं
सत्ता के गढ़े हुए
सारे प्रतिमान
बढ़ती बौखलाहटें,
बिलबिलाते अहंकार
और ऊँची, और निर्मम
होती जाती है
आदेशों की आवाज़
सारे मुखौटे उतर जाते हैं
बचती है केवल नग्न क्रूरता
असहमति के दरवाज़े पर
पहरे बिठाकर
लगाई जाती हैं हथकड़ियाँ
न्याय और मानवता को
मगर
इतिहास गवाह है!
जितना कसता जाता है शिकंजा
उतनी ही साफ़ सुनाई देती है
उसके भीतर की चरमराहट
जितनी ऊँची उठती है दीवार,
उतनी ही गहरी
उसकी नींव में
उतरती जाती है दरार।
वे डरते हैं बाग़ी स्त्रियों से
वे सबसे ज़्यादा स्त्रियों की बग़ावत से डरते हैं
वे जानते हैं,
स्त्री जब विद्रोह करती है
तो केवल अन्याय का प्रतिकार नहीं करती,
वह न्याय और अन्याय का पूरा व्याकरण बदल देती है
उन्हें इसी परिवर्तन से भय है
इसलिए सबसे पहले वे उसकी देह पर पहरा बिठाते हैं,
फिर उसकी भाषा पर,
फिर उसके ज्ञान पर,
और अंततः उसके आत्मविश्वास पर
वे मानते हैं,
सोचती हुई स्त्री सबसे बड़ा संकट है
सो उसकी बुद्धि को प्रतिभा नहीं, उच्छृंखलता कहते हैं
उसके प्रश्नों को दुराग्रह,
तर्कों को अहंकार,
असहमति को भटकाव,
और उसकी सशक्त उपस्थिति को
संस्कृति और राष्ट्र के विरुद्ध षड्यंत्र घोषित कर देते हैं
स्त्री जब अपने अनुभवों को विचार में बदलती है,
और विचारों को संगठन में,
तो हिलने लगती हैं सदियों से खड़ी अजेय दीवारें
वह प्रेम करती है, पर समर्पण नहीं करती
वह साथ चलती है, पर अधीन नहीं रहती
वह करुणा रखती है, पर अन्याय को क्षमा नहीं करती
वह अपनी बेटियों को डर नहीं,
विरासत में
दृष्टि देती है
वे जानते हैं,
एक शिक्षित स्त्री केवल अपना जीवन नहीं बदलती,
वह आने वाली पीढ़ियों की कल्पना बदल देती है
वे युगों से उसे तुच्छ सिद्ध करने की कोशिश करते आए हैं
मगर उनकी कोशिशों के पार
जब-जब स्त्रियों ने स्वयं पर भरोसा किया है
साम्राज्य हिले हैं,
परिभाषाएँ बदली हैं,
भाषाएँ बदली हैं,
मनुष्य होने के अर्थ तक बदल गए हैं
वे इन्हीं बदलते हुए अर्थों से डरते हैं
वे जानते हैं,
जब स्त्रियाँ जाग जाती हैं,
तो बड़े-बड़े साम्राज्यों की नींद उड़ जाती है।
परतों के पार
धीरे-धीरे
सारे खोल चटक जाते हैं
उतर जाती हैं
सब परतें
बाहर झाँकने लगती है
भीतर जमी सीलन
धीरे-धीरे सरकने लगता है
ओढ़ा हुआ झूठ
सामने आ ही जाता है
अकाट्य सत्य
नंग धडंग, निर्लेप
एक अति के बाद
विघटित हो ही जाती है
हर चीज़
जन्म लेती है
एक नयी प्रासंगिकता
हर अप्रासंगिकता की गोद से
हर प्रारब्ध के अंत में
छुपा होता है
एक और प्रारब्ध
तत्पर, अडिग, अपरिहार्य।
अनंतिम अर्धविराम
मृत्यु से पहले
मृत्यु से बढ़कर
कई मृत्यु हैं संसार में
स्वप्न दीपों का बुझ जाना
अन्तर्मन का सूनापन
विश्वास की टूटन
प्रेम का निर्वासन
मृत्यु केवल देह का पतन तो नहीं
जीवन में होती हैं
कितनी ही
अदृश्य मृत्यु
एक अनदेखी चिता
साथ चलती है
जीवन भर
कुछ उपस्थितियों
कुछ अनुपस्थितियों के साथ
कुछ उपलब्धियों
और कुछ अनुपलब्धियों के बीच
एक अनचीन्ही
अनकही यात्रा पर
रेखाओं का जाल है संसार
एक जुड़ती है
एक छूट जाती है
मृत्यु भी एक रेखा ही तो है
या कोई बिंदु
कोई अंतिम वाक्य नहीं
न कोई विराम
केवल एक अनंतिम अर्धविराम।
अकेले ही
क्या है तुम्हारे पास
जिजीविषा के अतिरिक्त?
एक दिन थम जाएगी
बाहरी आवाज़ों की गूँज
प्रशंसाएँ लौट जाएँगी
अपने-अपने घर
आश्वासन
अपने अर्थ खो देंगे
कोई कंधा
तुम्हारे भीतर की दूरी
तय नहीं करेगा।
तुम्हें अकेले ही पार करनी होंगे
अपने दुर्दिन,
अपनी सबसे घनी रातें
आख़िर कब तक
उधार के विश्वास के आश्रय में
चला जा सकता है?
एक समय आता है
जब लौटना पड़ता है
अपने ही भीतर
उस अँधेरी सुरंग में
जहाँ किसी की आवाज़ साथ नहीं जाती,
जहाँ कोई किसी के लिए
रास्ता नहीं बनाता
वहीं
अपनी ही राख़ में
टटोलनी होती है
कोई बची हुई चिंगारी
इसलिए पूछती हूँ-
क्या है तुम्हारे पास
जिजीविषा के अतिरिक्त?
भ्रम
हमने उजाले की खोज में
एक दौड़ शुरू की
पर हम जिस धरती पर खड़े थे
उसके दोनों छोर अँधेरे में खुलते थे
हम जिस पैमाने पर चल रहे थे
उसका शून्य हमें स्वीकार नहीं था
मौन हमें कायरता लगा
तटस्थता अपराध
सो हम एक छोर से भागे
और दूसरे की ओर दौड़ पड़े
दौड़ते-दौड़ते भूल गए
कि छोर बदल लेने से
अँधेरा समाप्त नहीं होता,
अक्सर और गाढ़ा हो जाता है
हम भूल गए
कि उजाला वहाँ कहीं नहीं था
अँधेरे से भागते हुए हम
अँधेरे की परिधि में ही थे
हमारे सामने एक ही रात के कई चेहरे थे
हमारी मुट्ठी में एक ही रंग के कई रूप
और हम उन्हें
अपना चुनाव कहते थे।
जंतर-मंतर (20 जुलाई 2026)
कैसा लगता है
एक भयावह दिन बीतने के बाद
रोतीं-सिसकतीं
प्रतिकार करतीं
मार खातीं,
चीखतीं बदहाल लड़कियाँ
सिर फूटे लहुलुहान लड़के
डरते, दौड़ते-भागते
बचते-बचाते
गिरते-पड़ते,
फिर उठते
लड़ते-भिड़ते
बर्बर तानाशाहों से
चोटों के निशान
बेहोश, कोई बेजान
सूजी हुई आँखें
लावारिस जूते-चप्पल
धुँआ, आँसू, ख़ून
कैसे उतरते हैं दारुण दृश्य आँखों से
बंद होते ही पलकें
तैरने लगते हैं सामने
कितनी करूणा, कितना दु:ख
उमड़ता हुआ हृदय
उफनता हुआ ग़ुस्सा, खीझ और चिढ़
ज्वाला सा धधकता
कुछ टूटता
कुछ सिकुड़ता सा भीतर
पसरता अवसाद
कैसे आती है नींद
ऐसे भयावह दिन के बाद।
पायल भारद्वाज
जन्मतिथि- 26 अगस्त 1987
निवास स्थान- खुर्जा, उत्तर प्रदेश
तेरहवें द्वादश में कविताएँ संकलित
वागर्थ, समकालीन जनमत, समावर्तन, कृति बहुमत, किस्सा कोताह, सदानीरा, हिंदवी, स्त्री दर्पण, अनहद कोलकाता, मेरा रंग आदि पत्रिकाओं व वेब पोर्टल्स पर कविताएँ प्रकाशित
payalbhardwajsharma1987@gmail.com
सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।






सत्ता के क्रूर चेहरे और मौजूदा दौर की विद्रूप सचाई को बहुत बेलाग भाषा में प्रस्तुति करती ऐसी दमदार कविताओं के पायल को सलाम!
ReplyDeleteसमय से मुठभेड करती पायल की ये कविताएं पाठकों को रोकती हैं और सोचने को विवश ही नहीं करती हैं बल्कि भीतर तक झकझोरते है, आंदोलित करती हैं। बागी स्त्रियों की भाँति ये कविताए अपनी सशक्त अभिव्यक्ति के चलते लम्बे समय तक स्थायी प्रभाव छोड़ने में सक्षम और समर्थ हैं। समय, समाज और सत्ता का चरित्र जिस रूप में चित्रित हुआ है वह चिंताकुल करने वाला है। प्रभावपूर्ण और प्रवाहपूर्ण भाषा में जीवन और जगत की जटिलताओं को काव्य-रूप में इतनी सहज प्रखरता से समेटना, अभिव्यक्त करना सचमुच बड़ी बात है। बहुत दिनों बाद ऐसा लगा कि स्त्री स्वर सत्ता के प्रतिरोध में मुखर होकर क्रांति का आगाज कर रहा है। इन कविताओं के माध्यम से सुखद एहसास कराने के लिए रचनाकार और सम्पादक दोनों को लख-लख बधाई एवं शुभकामनाये!
ReplyDeleteबहुत अच्छी कविताएँ हैं 🙌
ReplyDeleteशानदार कविताएँ..सारी पढ़ लीं।
ReplyDeleteबहुत सुंदर कविताएं ...बधाई।
ReplyDeleteयथार्थ को घोलकर जैसे लावा बना दिया गया हो! एक से बढ़कर एक कविताएँ। बेहतरीन प्रस्तुति।
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