बलराम कांवट की कविताएं


                            बलराम कांवट
 


महानगरीय जीवन की चकाचौंध और मीडिया के साथ साथ चौबीस घंटे मनोरंजन के अनगिनत चैनल के मायाजाल से पूरा परिदृश्य आक्रांत है।जो खबर में है उसका सच संदेहास्पद है और जो यथार्थ है वह खबर से दूर है।ऐसे समय में बलराम कांवट की कविताएं मनुष्य के विकट जीवन की ऐसी तस्वीर दिखाती हैं जो सुनियोजित तरीके से दृश्य से बाहर कर दिया गया है। कविताओं के साथ जो तस्वीर है वह भी उन्हीं के सौजन्य से है और कविताओं के रंग और प्रभाव को वह और गाढ़ा और असरदार बनाती है।


बलराम कांवट की कविताएं 



बाढ़ में चूल्हा


पहले सुख के दिनों में

जब चूल्हा हँसता था

किसी अनजान राहगीर के अचानक आने का संकेत पाकर

चूल्हे के चहुँओर बैठी

आँखें

दीपदीप देखने लगती थीं

देहरी के पार


इस आकाश से गिरते समुद्र में

जब सारे नक्षत्र

बुझ गए हैं

और आकाश घुस आया है चूल्हे तक

चूल्हे की भीतरी दीवारों पर चटक रही हैं टिमटिम तारों और नक्षत्रों जैसी

अग्नि कणिकाएं

और आँखें देखती हैं

खाली पड़ा

कनस्तर


ना जाने कौन

कितनी दूर से आयेगा इतनी रात गए भूखा प्यासा

क्या खिलायेंगे

कहाँ बिठायेंगे।


टमाटर का स्वाद


दिन भर खलिहान में खटने के बाद

जब शाम ढले

घर लौटते थे किसान

और घर में नहीं होता था कुछ भी रोटी के साथ लगाने को

तो पीछे बाड़ी से तोड़कर लाए गए

दो टमाटरों का स्वाद

सबसे बढ़कर होता था


अब ना

टमाटर में टमाटर है

ना मनुष्य में

मनुष्य


यह हँसने की बात नहीं है लेकिन

ऐसे विध्वंसक दौर में

जब हर चीज की पुनर्प्राप्ति के लिए चाहिए हमें

हज़ारों हज़ार क्रांतियाँ

एक क्रांति

टमाटर के स्वाद के लिए चाहिए।



पहाड़ और दुःख


ना जाने कौन था

जिसने पहली बार अपने दुःखों को बताया

पहाड़ जैसा दुःख

और उसके बाद

सारे मनुष्य तराजू लेकर घूमते रहे पृथ्वी पर

और तोलते रहे

अपने-अपने दुःखों को

पहाड़ों से


मनुष्यों की बनाई इस दुःख भरी दुनिया में

कभी कोई नहीं गया

पूछने

पहाड़ से

उसका दुःख


बहुत ज़ख़्मी और लहूलुहान है पहाड़

और कहना चाहता है

आपको

आपकी भाषा में

मनुष्यों के अहंकार जितना ही बड़ा है उसका ज़ख्म

मनुष्यों जितना ही

भयावह है

उसका दुःख।


बसन्त में आत्मा


बसंत आ गया है

शहर की ऊँची इमारतों के बीच

आत्मा छटपटाती है

मनुष्यों की भीड़ भरी सड़कों पर चलते हुए

पैर माँगते हैं

वही पगडंडियाँ


आँखें माँगती हैं

वही दृश्य

जो मनुष्यों के ग़ैर ज़रूरी दख़ल से दूर

शायद

अब भी मौजूद हो कहीं

धरती पर


मनुष्यों की भाषा में जिसे बीहड़ कहते हैं

उजाड़ कहते हैं

वीरान कहते हैं

निर्जन कहते हैं

बियाबान कहते हैं

आत्मा की भाषा में उसे ही कहते हैं

सबसे सुंदर दृश्य


जिस नदी के किनारे जन्मीं थी मेरी आदिम वृत्ति

आत्मा माँगती है

वही दृश्य

जिसे देखकर उतरी थी

पृथ्वी पर।



मौसम और बीज


मानसून से पहले भी

वैशाख और जेठ में होती हैं कई बारिशें

लेकिन खेतों

और वनों में दबे पड़े बीज

वैसे ही पड़े रहते हैं

अलसाए

जैसे पहले थे


लेकिन जैसे ही समुद्रों से उठता है चौमासे का राग

और घुमड़कर आता है

आषाढ़

इन्हीं फुहारों के साथ

खुलती हैं

बीजों की आँख

और चार दिन बाद ही

सारी धरती

घास और फूलों से ढकी हुई दिखाई देने लगती है


बीज कैसे जानता है अपने प्रिय मौसम के बारे में

मौसम कैसे जानता है

बीज का मन।


गीत गाती वृद्धा


एक वृद्धा अकेले में गीत गा रही है

वह बबूल के नीचे

लेटी है

और उसकी बकरियां

मेंड पर चर रही हैं


वह बबूल के फूलों और पत्तियों की झालर से देख रही है आकाश

और अपने दिनों को

याद कर रही है

खाने खेलने और लड़ने झगड़ने के दिन

उन्हीं दिनों में

उसके ब्याहे जाने के दिन

परदेस में नए देवताओं और कुओं को पूजने के दिन

अपनी आँखों से

अपनों के

बिछुड़ने के दिन


वह अपने गीत में

अपने बच्चों के जन्मने और बड़े होने के दिनों को गा रही है

वह अपने बूढ़े होने के

दिनों को गा रही है


वह याद करती है अपनी धरती

अपनी बकरियों

और झाड़ियों को

जिन्हें देखते दुलारते इतनी दूर तक आ गया था

उसका जीवन


अब जाने के दिन हैं


वैसे तो सुख जैसी कोई चीज नहीं है

उसके पास

लेकिन फिर भी

भीगती है

उसकी आँख


अरे मुझे याद करके कौन रोयेगा


फूल रोयेगा

बबूल रोएगा

आकाश रोयेगा।


गोफन


मैं उन दिनों को याद करके

अक्सर उदास होता हूँ

जब गोफन हाथ में लिए खेतों पर जाया करता था

और चिड़ियों को

उड़ाया करता था


मुझे इसका जरा भी भान नहीं था

कि मेरे कंकड़ों और किलकारियों से इतनी नाराज हो जायेंगी चिड़िया

कि वे इतनी दूर निकल जायेंगी आकाश में

कि वापसी का

रास्ता भूल जायेंगी


अगर मालूम होता

मेरे पत्थर इतने नागवार गुजरेंगे उन पर तो मैं उन्हें हरगिज नहीं उठाता

दाने चुगती चिड़ियों पर


ख़ाली आकाश के नीचे

हथेलियों पर दाने लिए भटक रहा हूँ पृथ्वी पर

कहीं से उतरो

आओ

मुझे प्रायश्चित का

एक मौक़ा दो


मुझे माफ़ कर दो

तुम इस बार आना और सारा खेत चुग जाना

मैं तब भी नहीं आऊंगा तुम्हारे पास

तुम्हें उड़ाने

बस आ जाओ


मेरी आँखें

आकाश को देखते देखते थक गई हैं

मेरे खेत

तुम्हारी राह देखते देखते

सूख गए हैं।



आकाशगंगा


चौमासों की साफ़

रातों में

जब छत पर सोते थे

हमें बहुत साफ़ दिखाई देती थी आकाश से गुजरती

एक उजास की

पगडंडी

पगडंडी के हर तरफ़ बिखरे

बेहिसाब

तारों के फूल


हमारे बुजुर्ग

चरवाहे

अपनी भाषा में उसे रामजी की गैल कहते थे

हम बच्चे

ईश्वर को भी समझते थे

आदिम चरवाहा

इसलिए

उस गैल से उस चरवाहे को गुजरते देखने की

लालसा लिए

घंटों घंटों

प्रतीक्षा करते हुए

सोते थे


ईश्वर तो पहले भी नहीं था

लेकिन

एक सुख था

सृष्टि में

हमारे होने के फूल

खिलाता हुआ


हमारा होना तो अभी भी

बना हुआ है

होने के फूल

कहीं खो गए हैं।


आत्मा की धूल


जब आकाश से बरसता है जल

और जल में धुलकर

धूल

वापस बैठती है

धूल पर

तो बहुत साफ़ दिखाई देती है धरती और

धरती के दृश्य


बारिश के बाद

दूर के पहाड़ चलकर आ जाते हैं

बहुत पास

दूर के वृक्ष हो जाते हैं

पास के वृक्ष

वृक्षों के नीचे फरफरी लेते देह सुखाते रोजड़े

उनके पीछे

उनके बच्चे

बिल्कुल साफ़ दिखाई देते हैं आपको

आपकी

आँखों के पास


आत्मा की धूल

और गुबार लिए ना जाने कहाँ-कहाँ भटक रहा है आदमी

क्यों नहीं गिरती

कहीं से

कोई बूँद

क्यों नहीं दिखती चीजें

ठीक

आँखों के पास।



अविश्वास


मेरे सामने एक घौंसला है

घौंसले के बाहर

शाख़ पर बैठी

चिड़िया


मैं जब जब उसे देखता हूँ

वह वहीं

शाख़ पर बैठी रहती है

लेकिन जैसे ही हटती हैं मेरी आँखें

वह झट से

घौंसले में पहुँचती है

अपने बच्चों के पास


वह वापस आने के लिए

फिर से मेरी आँखों के हटने की

प्रतीक्षा करती है

मैं जितनी बार खेलना चाहता हूँ यह खेल

हर बार खेल में

जीतना चाहती है


सोचो कितना नाज है

नन्हीं चिड़िया को अपनी होशियारी पर

कितना प्यार

अपने घर

और बच्चों से


कितना ज़्यादा अविश्वास

पृथ्वी पर

एक आदमी की

आँखों पर।






बलराम कांवट


गांव टोकसी, गंगापुर सिटी, राजस्थान में जन्म। 

जयपुर, दिल्ली और पुणे से पढ़ाई की। 

पुणे फ़िल्म संस्थान से पटकथा लेखन का कोर्स किया। 

दिल्ली विश्वविद्यालय से विशाल भारद्वाज की फ़िल्मों पर पीएच.डी.। 

तद्भव, समालोचन, हंस, परिकथा, पाखी, वागर्थ, कथन आदि विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित। 

भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार के तहत एक उपन्यास ‘मोरीला’ अनुशंसित एवं प्रकाशित। 

मुख्यतः जलवायु आपात और पारिस्थितिकी विमर्श से संबंधित लेखन।

संपर्क -7976412030




सभी तस्वीरें बलराम कांवट के सौजन्य से।



Comments

  1. केशव तिवारी5 September 2026 at 15:10

    बेहतरीन कवितायें।कवि को बधाई l

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  2. अनुराधा ओस5 September 2026 at 15:11

    सुंदर कविताएं।

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  3. अर्चना लार्क5 September 2026 at 15:12

    कमाल की कविताएं। कवि को बहुत बधाई 🌺

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  4. अच्छी कविताऍं।

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  5. सुंदर सच्ची कविताएं

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  6. चरण सिंह पथिक5 September 2026 at 21:05

    बढ़िया कविताएँ।

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  7. विनोद पदरज5 September 2026 at 21:05

    सुंदर सच्ची सादगी भरी कविताएं।

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  8. बहुत ज़रूरी कविताएं हैं। बलराम इन दिनों बहुत सुंदर लिख रहे हैं। उन्हें पढ़ना हर बार सुख देता है। कुछ कविताएं जैसे 'गोफन', 'आकाशगंगा', 'अविश्वास', 'बाढ़ में चूल्हा' लंबे समय तक याद रहेंगी। बहुत बधाई और शुभकामनाएँ। इन कविताओं को पढ़वाने के लिए कौशिकी का आभार।

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  9. सोहन लाल6 September 2026 at 19:36

    खूब स्वागत। धरती को सहेजने और इसे सुंदर बनाने के लिए ज़रूरी कविताएँ।

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  10. आरसी चौहान6 September 2026 at 19:37

    प्रकृति से जुड़ी हुई शानदार कविताएं।

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