केतन यादव की कविताएं

 

                               केतन यादव 


संबंधों की ऊष्मा से भरी हुई केतन यादव की कविताएं मित्रता को नए कोण से देखती और दिखाती हैं। इनमें मिलने की विकलता है तो हिसाब चुकता कर लेने का जिगर भी है।इन कविताओं में आपसी संबंध, निजता, रचनात्मकता और सामाजिक सरोकार का धूसर रंग गहरे रूप में मौजूद है।



केतन यादव की कविताएं 


फिर मिलेंगे 

तुम क्या हो ? 

तुम्हारी आवाज़ तुम हो या तुम्हारा देखना 

तुम्हें छूना तुम हो या एक अनबिसरे दुख की गंध 

संपूर्णता में तुम बस अनुपस्थिति में ही मिले

छिपाए हुए ग़लती के ठीक पीछे । 


मैंने हमेशा चाहा मुझे कुछ कहना ही न पड़े

मुझे कुछ समझाना ही न पड़े 

मेरी चुप्पी ही भाषा हो मेरा चेहरा ही विवरण हो

भरोसा ही मेरा दोस्त हो 


हम आखिरी तक दोस्त रहेंगे 

उसने कहा । 


मैं सोचता था मैं मर जाऊँगा 

तो तुम यह खबर सुनते ही मेरी लाश के पास लौट आओगे 

लेकिन मैं झूठा बहाना भी तो नहीं कर सकता था 

कहीं अगली बार तुम सचमुच न आओ ...


हम कल्पना में मिले खून से दोनों लथपथ 

एक दूसरे की संभावित उम्मीदों की हत्या करते 

जिसे एकबार में कभी खत्म ही नहीं किया जा सका

उस हास्यास्पद मुलाकात के लिए 


तुम्हारा मैसेज आता है 

हम मिलगें दोस्त, कभी न कभी जरूर, 

कहीं न कहीं पर 

सारे उधार चुकता कर देने के लिए ।



कोई सवाल नहीं 


क्या तुमने 

सब कुछ आजमा लिया है? 

कितना आश्चर्य चाहिए होता है आँखों में, 

कितनी नमी चाहिए होती है होठों पर , 

कितनी गर्माहट चाहिए होगी शरीर में, 

कितना खाली चाहिए दिल और कितना डूबा हुआ दिमाग 

एक सफल प्यार के लिए अतीत कितना सादा होना चाहिए? 


समय कैसे ले जा सकता है मुझे घड़ी के पार 

बिना मर्ज़ी मैं कितने नये लोगों से बात कर सकता हूँ ? 

दो संबंधों के अंतराल में कितना अंतराल होना चाहिए 

आगे बढ़ने के लिए क्या-क्या नहीं भूलना होता है ? 


वह गाना कैसे भूल सकता हूँ जिसने मुझे सुकून में भी नहीं छोड़ा 

वह छुअन कैसे छोड़ दूँ उसने मुझे आधे रास्ते में खो दिया ‌

मैं उसे कैसे बोलवाऊँ जहाँ मैं हमेशा चुप हो जाता था , 


मैं उसे कैसे माफ़ कर देता 

मैं उसके सामने रोया था ...


वह कैसी शिकायत होगी जिसकी कोई माफ़ी हो 

वह कैसा विछोह होगा जहाँ कोई सवाल न बचे 


वह कैसा प्रेम होगा 

जिसमें कोई खालीपन की मौत न मरे

वह कैसी जिंदगी होती है 

जिस पर किसीका भी हक़ न बचा रहे।



कवि मित्र


वे आम मित्रों से बिल्कुल जुदा होते 

उन्हें अधलिखी अधबनी कविता दिखाई जाती 

और कभी-कभी अपनी मौलिकता बचाई भी जाती है

पहले प्रयोग की होड़ में पत्रिकाओं में आ जाने तक। 

हम उनके साथ मंच और नेपथ्य दोनों साझा करते 

पुरस्कृत और अपुरस्कृत दोनों जीवन 

कविता हो जाने के बाद पहले पाठक की बेचैनी बाँटते हुए

वे ही कहते कि अभी वो बात बनी नहीं यार

कवि मित्र के साथ हम रचनात्मक तनाव एक कश में खींचकर 

सारे जन-सरोकार धुआँ-धुआँ कर लेते

शराब पीते और बड़बड़ाहट बुदबुदाहट में भी कवि ही बने रहते

कवि मित्र पूरी तरह मित्र नहीं हो पाते कभी 

और फिर एक दिन मित्र भी नहीं रहते।


चुप्पी 

अबोलेपन में अधिक रखूँगा भीतर तुम्हे

पूरे दंभ के साथ पराजय नहीं स्वीकारूँगा 

तुमसे बड़ी हो चुकी है तुम्हारे प्रति हुई भावना की गरिमा

तुम मेरी जुबान छीन सकते हो 

मेरी चुप्पी नहीं 


बोलना फिर भी कुछ जगह छोड़ेगा अंतराल के लिए ही सही 

चुप्पी इस तरह भर जाएगी कि कोई जगह नहीं बचेगी भाषा में 

और तुम कह नहीं सकोगे —

कि तुमने बोलना चाहा था, पकड़ना चाहा था थरथराता कोई शब्द 

हेडफोन की गूँज के पार आकर जो बोलेगी चुप्पी 

वह बहुत सारा बोलना नहीं बोल पाएगा कभी 

और तुम कह नहीं सकोगे —

कि हम दोनों को बोलने ने नहीं चुप्पी ने मारा है 


भाषा की लाश मिल भी जाएगी कही‌

चुप्पी को आख़िरी इच्छा में भी छू नहीं सकोगे तुम 


मैं बोलने में से चुप्पी की तरह निकल जाऊँगा

भाषा में कोई नामोनिशान नहीं।



कि कोई दोस्त नहीं 


जितने दिन बुरे बीते पिता ने यारबाज़ी पर मढ़ दिया

हर नयी आदत का स्रोत वे ही समझे गये 

कोई भी उनकी उपस्थिति के कारण पर नहीं गया 

उस कमी पर नहीं गया जिससे ज़रूरत हुई उनकी 


जैसे-जैसे जन्मदिन बीतते गए 

लोग बढ़ते गये और दोस्त कम 

कुछ सोशल मीडिया पर मिलकर जुड़ गये

कुछ शहर में रहकर अजनबी होते गए


कभी वे इतने अधिक अपने थे 

कि उस क्षण को झुठलाना कोई हादसा बन उठे

बहुत सारा दिन बाँटना था उनके साथ 

इतने पास थे कि वादा भी नहीं था 

सोचा भी नहीं था 

कि कभी उनके बारे में सोचना भी पड़ेगा 


कितना फूलकर कहता था मैं 

कि यार है वो मेरा

क्या कहूँ माँ को जब वह पूछती है उसे

कैसे कह दूँ कि वो तो पराया हो गया माँ

कैसे कह दूँ कि पहचानता नहीं है अब


सबसे लड़कपन सुख में रहे वे 

सबसे बेसुध दुख में रहे

कितनी ही विफलताओं को हँसी में उड़ा गये

और सबके चले जाने के बाद भी बचे रहे वे

कैसे कह दूँ कि वे अतीत हो गये 


पहचानते सब हैं 

पता नहीं जानना क्यों नहीं चाहते ? 

जिन दोस्तियों के लिए बर्बाद हुआ हरदम 

कैसे कहूँ कि अब मेरा कोई दोस्त नहीं ...

मुझे दोस्त बनके दगा न दे 


उसे अब सामने से देखना चाहता हूँ मैं 

जिसे तुम्हारी मुझसे अधिक जरूरत है 


यह कैसा जुर्म-ओ-फरेब है 

शिकारी को बचाने की जिम्मेदारी भी 

जहाँ शिकार की ही होगी 


वह कौन सा सवेरा है 

जिसकी रात भी मेरी रात नहीं 

वह कौन सा है आसमान 

जो मेरे सिर पे नहीं छत ही नहीं 

वो कैसा वो कि जिसमें वो ही नहीं । 


प्यार के लिए भरोसे की जरूरत रही 

भरोसे के लिए राज़-ओ-नियाज़ की

कितनी कम जगहें रहीं दुनिया जहान में 

दुख दफनाने के लिए 

जहाँ कब्र तो हो मगर चौहद्दी नहीं 


मैं तुम्हारे और मेरे बीच की 

वर्षों की दूरी को 

दो शब्दों के अंतराल में 

कम करने की कोशिश करता रहा 

और अर्थ बढ़ता गया 

दूरी बढ़ने के साथ ही साथ 


लगा कि कितने कम शब्द हैं 

दोस्ती की भाषा में प्यार को पुकारने के लिए

कितनी ज़्यादा तेज हवा है

कि हमारे बीच कोई ठोस वजह ही नहीं 


भाषा कभी किसी दिन 

लबालब चुप हुआ करती थी

कि मैं तुम्हें सोच भी लेता था 

तो मेरी याद आ जाती थी तुम्हें 


इतना वसंत तो नहीं आना था 

कि कितने उजाड़ के बाद भी एहसास ही न हो


इतने क़रीब तो तुम्हें होना था ही नहीं 

कि बारहा कहना पड़े हम दोस्त ही तो हैं । 






केतन यादव

जन्म : 18 जून 2002 गोरखपुर में। 

शिक्षा : बी. कॉम (2020) हिंदी से एम ए(2022) , वर्तमान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शोध छात्र 

प्रकाशन : आलोचना, समालोचन,तद्भव,पक्षधर,वागर्थ , कृतिबहुमत , साखी, समकालीन जनमत , समावर्तन ( युवा कवि स्तम्भ) वनमाली ( युवा पीढ़ी विशेषांक), समय के साखी, जनसंदेश टाइम्स, हिंदुस्तान, अमर उजाला आदि पत्र पत्रिकाओं एवं वेब माध्यमों आदि पर कविताएँ प्रकाशित।

एक चरवाहे का गीत नाम से कविता संग्रह इसी वर्ष राजकमल प्रकाशन समूह से प्रकाशित 

संपर्क - 208 , दिलेजाकपुर , निकट डॉ एस पी अग्रवाल, गोरखपुर -273001 उत्तर प्रदेश।

ईमेल - yadavketan970@gmail.com




Comments

  1. इधर चेतन की कविताएं हमें आकर्षित कर रही है. उनकी कविताओं का मुहावरा बेहद सहज है. वे अपने आसपास से कविताओं के विषय खोज लेते हैं. उनकी कविताओं का अंदाज पूरबिया है. उसमें स्थानीयता मौजूद है

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  2. केतन यादव की कविताएं रोकती हैं।

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  3. केतन यादव की कविताएँ भाषा में भले ही सहज हों, लेकिन उनमें अर्थ की कई परतें हैं। ये कविताएँ अपने समय से गहरा संवाद करती हैं। केतन युवा पीढ़ी के भविष्योन्मुखी कवि हैं, जिनकी कविताएँ समय के साथ निरंतर अधिक परिपक्व और गहरी होती जा रही हैं। कवि को हार्दिक बधाई और इन कविताओं को प्रकाशित करने के लिए कौशिकी को धन्यवाद।

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  4. केतन की कविताओं का भाव और भाषा का नया पन ध्यान खीचता है. कविता समय की धारा के विपरीत खड़ी है.

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  5. केतन को पहली बार पढ़ा। कविताओं की तासीर शांत और सहज है। हरी घास पर बैठकर चुपचाप सुनते रहिए, गुनते रहिए।

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  6. केतन को पहले भी पढ़ा है और आज पढ़ते हुए यह विचार पुख्ता हुआ कि उनकी कविताओं में सामर्थ्य है। वे कहन के अनोखे ढंग से प्रभावित करते हैं।एक बार उनकी छोटी कविताओं को पढ़ते हुए मैंने कहा था कि भाई! तुम्हारी कुछ कविताएं तो मंत्र सी हैं।
    कविता में जितना कहना जरूरी होता है,केतन उतना ही कहते हैं। प्रभावी कविताएं हैं।

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  7. सत्यकेतु22 August 2026 at 20:20

    केतन की कविताई का रंग अलहदा, ढंग जुदा है। नई बुनावट, नई सजावट, नए स्वाद के तोष से भरी ये कविताएं केतन के रचाव की बहुस्तरीयता की पुरज़ोर वकालत करती हैं। सही ट्रैक पर पर्याप्त गति में दौड़ती कविताओं में पार्श्व का तफ्सील चित्रांकन आकर्षित करती हैं। कवि के रूप में केतन के सधे कदम और सजग प्रयाण की बानगी पेश करती हैं। दोस्ती की दास्तां, नज़दीकियों के नखरे, पराजित प्रेम की गूंज, सवालों भरे बिछोह, डूबा हुआ जुड़ाव, खाली खाली-सा अलगाव के तंतुओं को भावुक किंतु सतर्क कारीगरी से चिह्नित-अंकित करते केतन आश्वस्ति का रिबन थमाते हैं। संबंधों की मुखर चुप्पी की पोर-पोर में धंसे सवालों, शिकायतों की लड़ी बनाते हैं। चालाकियों से भिड़ंत में भी अनकहे जुड़ाव की गुंजाइश छोड़ते हैं।

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  8. अरुण आदित्य22 August 2026 at 21:48

    केतन की काव्य-दृष्टि और उनका मुहावरा समकालीनों में उन्हें विशिष्ट बनाता है। बधाई।

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  9. नरेश चन्द्रकर22 August 2026 at 22:48

    केतन यादव की ये कविताएं पढ़ते समय उनमे जो प्रेम की गरिमापूर्ण अनुभूति है, मित्रता के जो भाव संवेदना में डूबकर आए हैं साथ ही जो कवि के हृदय स्पर्श को विषय में घोलते हैं यह सब मुझे अनूठा लगा ।

    लगभग सभी कविताओं में प्रेम की प्रगाढ़ भावना संवेदनाओं में गूँथी हुई है जो केतन यादव की निजी पहचान लगी मुझे। और कहने का अंदाज उनकी इस पंक्ति में बहुत सुंदर लगा
    हम दोनों को बोलने ने नहीं चुप्पी ने मारा है

    कविता के भाव में एक युवापन भी लगा।
    अभिनंदन कवि

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