अश्विनी कुमार की कविताएँ
अश्विनी कुमार
बाज़ार के बढ़ते दबाव के बीच जीवन की जटिलताओं और विडंबनाओं ने मनुष्य को स्वार्थी, कठोर,एकाकी और तटस्थ बना दिया है।वह हर जगह एक सुरक्षित किनारा खोजता है जहां कछुए की तरह खुद को एक खोल में छिपा सके। अश्विनी कुमार की कविताएं ऐसे ही समय और समाज की कविताएं हैं जहां युद्ध एक रोमांच है और हत्या एक खबर।ये कविताएं नई भाषा, शैली और नए बिंब के माध्यम से अपने समय की गवाही देती हैं।
अश्विनी कुमार की कविताएं
शहर में जंगल
मेरे शहर के बीचोबीच एक जंगल था।
धीरे-धीरे पेड़ कम होते गए,
लेकिन उनके ठूँठों पर आज भी कभी-कभी
बूढ़े गिद्ध उतर आते हैं।
वे अपनी चोंच से कुरेदते हैं
बचे हुए जंगल की अस्थियों का स्वाद।
कहते हैं, सभ्यता के विकास के लिए
सबसे पहले जंगलों का ख़त्म होना ज़रूरी है,
फिर नदियों का सूख जाना,
और सपनों का आँकड़ों में बदल जाना।
रात को जब सायरनों की आवाज़
फ़र्नीचर बाज़ार की गलियों में खो जाती है,
मैं अपनी मेज़ पर झुका हुआ
पुराने नक्शों में खोजता रहता हूँ—
थोड़ी-बहुत हरियाली
जो अब केवल काग़ज़ पर बची रह गई है।
सुबह होने तक
शहर फिर से सामान्य दिखने लगता है।
दुकानों के शटर खुल जाते हैं,
मेट्रो स्टेशनों पर भीड़ उतरने लगती है,
और लोग उसी सहजता से जीते हैं
जिस सहजता से मोहनजोदड़ो की नर्तकी
इतिहास के रिसते घावों को
अपने नग्न ताँबे के शरीर के भीतर
चुपचाप छिपाए खड़ी रहती है।
किसी को दिखाई नहीं देता
कि शहर की भुतही गुफ़ाओं में
अब भी काई की तरह चिपकी हुई हैं हरित क्रांति की क्रूरताएँ।
लालटेनों के बिना गाँव
(कवि मंगलेश डबराल की स्मृति में)
उन दिनों मेरे गाँव के मंदिरों, मस्जिदों और गिरजाघरों में
सिर्फ़ लालटेन जलाने का रिवाज़ था।
हमारे गाँव की औरतें
धुंधली दोपहर की धूप में अपने नाखून काटते हुए
चिड़ियों और चींटियों के लिए दुआएँ माँगती थीं।
मुझे याद है, जब भी पहाड़ों में लू बढ़ जाती,
सूरज के सातवें घोड़े पर सवार वह अपने गाँव लौट आता था,
धीरे-धीरे, राग मलकोश में अपनी कविताएँ सुनाता,
और बारिश नंगे पाँव
सीढ़ियाँ चढ़ खेतों और जंगलों में बरसने लगती।
अँधेरी काँच-रातों में उसका चेहरा
सुनहरी धान की बालियों-सा चमकता था।
बच्चे उसकी परछाइयों में साँप-सीढ़ी खेलते,
और बूढ़े पुरानी साड़ियों के टुकड़ों से
गायब होते देश के झंडे साफ़ करते रहते थे।
मैं आज भी उसकी लालटेनों को याद करता हूँ,
जैसे किसी भूली हुई भाषा को—
जिसमें पहाड़ों की ढलानें थरथराती हैं,
और पृथ्वी अपनी पगडंडियों को पहचानती है।
मेरी भाषा में मेरी हत्या
मैं आजकल भय से
अपने लोहार मित्र के घर छिपा रहता हूँ।
मालूम नहीं कब
मेरे गालों की हड्डियाँ उभर आईं
और सारे बाल सफ़ेद हो गए।
उसकी लोहे की दुकान में
अचानक एक दिन दंगाइयों की भीड़ चली आती है—
बिना किसी गाजे-बाजे,
बिना किसी चेतावनी के।
पहले वे मेरी भाषा में भद्दी-भद्दी गालियाँ देते हैं,
फिर मेरी ही भाषा में मेरी हत्या कर देते हैं
और दीवाली के दीयों में बचे तेल में मेरी लाश जला देते हैं।
सड़ते पान और कसैली की गंध से
पड़ोसियों के घर भर जाते हैं।
लोग कहते हैं अगले दिन उगता सूरज
कुछ ज़्यादा लाल दिख रहा था।
पुराने सितार वाला घर
मिट्टी-रंगी सुबहों में मेरा घर
किसी पुराने सितार की तरह बजने लगता है।
उसके हर दरवाज़े और खिड़की से
उदास कैक्टस के फूलों की महक फैलने लगती है।
सड़क पर नाइट शिफ्ट से लौटते लोग
अपनी-अपनी भाषाओं में गुनगुनाते हुए गुज़रते हैं,
मानो बूढ़ी तितलियों का आख़िरी झुंड
अब भी हवा में किसी भूली हुई स्मृति-सा मंडरा रहा हो।
सूरज डूबने के बाद
मैं घर लौटता हूँ,
दरवाज़े पर दस्तक देता हूँ—
नीचे आओ
और मुझे भीतर आने दो।
हिंसा का स्वाद
मेरा बचपन रसोईघर में गुज़रा,
हिंसा के स्वाद के बारे में सोचते हुए।
मुझे याद है, ढलती दोपहर की सुनसान कॉलेज कैंटीन में
मैंने उसे इस तरह छुआ था,
जैसे वह मोनालिसा की तस्वीर हो।
क्लोरोफिल की तीखी गंध
उसके काँपते शरीर में फैल रही थी,
स्याही की तरह, जो सोख़्ते कागज़ में
धीरे-धीरे उतरती है।
सुना है, कुछ प्रेमी
एक-दूसरे को सबसे क्रूर,
सबसे छलपूर्ण तरीक़ों से नष्ट करते हैं।
वह भारी साँसों में कराहती है,
मानो कोई गर्भवती शार्क
भूमिगत पार्किंग में फँसी हो।
अचानक धरती काँपने लगती है,
सारी आलीशान इमारतें एक-एक कर गिरने लगती हैं,
सभी प्रवासी सुरक्षा-कर्मी
मलबे में दबकर मर चुके हैं,
कुछ फूल बेचने वाले शायद अब भी बचे हैं।
मैं देखता हूँ, चींटियों का एक झुंड
धूप से झुलसे बच्चों के पुराने खिलौने
अपने सिर पर उठाए हुए
श्मशान घाट की ओर जा रहा है।
आजकल मैं उसके शरीर में
खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करता,
जिससे पाइनएप्पल दही जैसी गंध आती है।
फिर भी मैं उसे खो देने के भय से आतंकित हूँ।
क्या मेरा भविष्य भी इतना ही सुंदर और सुरक्षित होगा—
या उससे भी अधिक?
सैनेटोरियम में ऑर्किड्स
मेरे पुरखों के घर के खंडहरों के भीतर
एक सैनेटोरियम है,
उसकी जर्जर लाल ईंटों में
औपनिवेशिक यातना की सड़ी हुई गंध अब भी कैद है।
उन दीवारों के भीतर
एक सम्मोहक अँधेरा पसरा है—
वह केवल अँधेरा नहीं,
बल्कि चेतना की भीतरी दरारों में खुलता
एक अद्भुत तिलिस्म है,
जहाँ स्मृतियाँ अपने ही रक्त को
मोटी छिपकलियों की तरह चाटती रहती हैं।
अपने अस्तित्ववादी प्रेमी हाइडेगर को खोजती
वो उतरती है उस मायावी सुरंग में,
जहाँ हर कदम पर
पिशाचों के शव पड़े मिलते हैं—
आधे सड़े, आधे जागते हुए,
एक विचित्र कंकालीय सौंदर्य ।
पागलपन की दवाओं के अभाव में
हाइडेगर अस्पताल के बिस्तर पर अर्धचेतन पड़ा है;
शायद अब भी सूचियाँ बना रहा है—
अच्छा शरणार्थी, बुरा शरणार्थी,
अच्छा नागरिक, बुरा नागरिक—
अपने हत्यारे मित्रों के लिए।
मेरे पिता साइबेरिया के शिविरों से लौटने के बाद
इन खंडहरों में रेगिस्तानी ऑर्किड्स लगा गए थे।
उनकी गंध अब क्लोरोफ़ॉर्म की तरह फैलती है,
और उसी गंध में हम सब कुछ भूल जाते हैं—
धूप, करुणा,
यहाँ तक कि साइकिलों के ब्रेक की आवाज़ भी।
वो महसूस करती है—
शरीर भी स्मृति है,
स्मृति भी शरीर,
दोनों बासी मछलियों की तरह एक-दूसरे में गलते हुए।
प्रेम एक आवारा घोड़ा है,
जिस पर सवार होकर
हम अपने भीतर के हिंस्र पशुओं से बचना चाहते हैं।
हाइडेगर पीड़ा में चीखता है, समुद्री पक्षियों पर
मानो वे ईश्वर के विरुद्ध किसी षड्यंत्र में शामिल हों।
नर्सें और डॉक्टर हताश होकर वायलिन बजाने लगते हैं।
वो स्वप्न देखती है—
एक गुलाब के भीतर दूसरा गुलाब,
एक मधुमक्खी के भीतर दूसरी मधुमक्खी।
प्रवासी चाँद एक उन्मत्त तानाशाह की तरह हँस रहा है।
युद्ध फिर निकट आ रहा है;
भयानक भैंसों जैसे टैंकों के पहियों तले
ठंडे लोहे से कुचले जाते विद्रोही तिलचट्टे ।
सफ़ेद दस्ताने पहने लड़के और लड़कियाँ
खरीदारी के थैलों के साथ
मृतकों की अंत्येष्टियाँ कर रहे हैं पिज़्ज़ा की दुकानों में ।
बड़ी, बड़ी, अशुभ आँखों वाली
ऑर्किड्स की एक नई प्रजाति
फिर से खिलती है खंडहरों में।
और मैं बरसों से बीमार बूढ़ी माँ के घने जंगल-जैसे बालों को
जंग लगी कैंची से काटता हुआ,
स्कूल का वर्णमाला-गीत
एक मोनोलॉग की तरह गा रहा हूँ।
क्या अस्तित्व सचमुच इतना अश्लील भ्रम है,
और सैनेटोरियम युद्ध के दिनों में अंतिम शरणस्थल?
ज़िराफ़ों का शहर
बैंगनी गर्मी में मेरा शहर ज़िराफ़ों से भर जाता है—
अपनी सुराहीदार गर्दन उठाए
वह फुटपाथ की दीवारों पर लिखी ग्रैफ़िटी में
चे ग्वेरा की कहानियाँ ढूँढ़ता रहता है।
पता नहीं आजकल पुराने क्रांतिकारियों को
किन-किन नामों से पुकारा जाता है;
अपने माथे का पसीना पोंछते हुए
ज़िराफ़ सोचता है—
आख़िर क्रांति भी एक ग्रैफ़िटी भर रह गई है।
पता नहीं आजकल ऐसा क्यों है कि
रात होते ही मेरी खिड़कियों के शीशे चटकने लगते हैं;
घबराहट में मैं ग्लूटेन-फ़्री शहद का एक जार खोलता हूँ
और अपने भीतर बची कीमोथेरेपी का स्वाद
धीरे-धीरे चखने लगता हूँ।
शायद आक्रमणकारी शहर में आ गए हैं—
भगोड़े ज़िराफ़ों को पकड़कर फाँसी पर चढ़ाने।
आजकल मेरे देश में
दीवारों पर सिर्फ़ बकरियों की तस्वीरें रह गई हैं,
लेकिन उन्हें पढ़ने के लिए गर्दन उठाने वाले जानवर
कम होते जा रहे है।
क्या दुःख की भी कोई सुगंध होती है?
क्या दुःख की भी कोई सुगंध होती है?
मेरी खिड़कियों पर बिखरे हरसिंगार के फूलों जैसी,
किसी आदिम मांसल गंध की तरह।
दुःख का अपना कोई शरीर नहीं,
न कोई भाषा,
न कोई अतीत,
न कोई वर्तमान,
वह बस एक सुगंध है।
कभी-कभी मैं अपने दुःख को स्पर्श करता हूँ,
मानो वह मेरी अदृश्य छाया हो,
रक्तरंजित पक्षियों की तरह
भीतर निरंतर फड़फड़ाती हुई।
क्या सुगंध भी दुःख है,
जिसका अपना कोई अस्तित्व नहीं?
वह अब मेरे आसपास नहीं हैं,
फिर भी उसकी गंध
मेरी स्मृतियों में पहाड़ी शाम की धूप की तरह
धीरे-धीरे पिघलती रहती है,
और मैं
अपने शरीर की छत पर
जंगली पॉपी के फूल चुनता रहता हूँ।
अश्विनी कुमार
अश्विनी कुमार समकालीन भारतीय कविता के प्रमुख कवि, राजनीतिक वैज्ञानिक और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ में प्रोफ़ेसर हैं। उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ ओक्लाहोमा से पीएचडी प्राप्त की। उनकी रचनाएँ देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और संकलनों में प्रकाशित हुई हैं तथा अनेक भारतीय और अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में अनूदित होकर व्यापक रूप से चर्चित रही हैं। इन दिनों वे हिंदी में भी सक्रिय रूप से सृजनरत हैं। उनकी रचनाएँ हिंदी की प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं—तद्भव, पाखी, हंस , माटी, समालोचन , कृति बहुमत और युववार्ता—में प्रकाशित हो चुकी हैं । उनकी कविता स्मृति, भाषा, अस्मिता और विस्थापन के जटिल अनुभवों का संवेदनशील अन्वेषण करती है। उनकी काव्य-दृष्टि में व्यक्तिगत और राजनीतिक, अतियथार्थ और ऐतिहासिक, सहज रूप से एक-दूसरे में गुंथे दिखाई देते हैं। वे अपनी विलक्षण, बिंबप्रधान, ट्रांसग्रेसिव और अत्याधुनिक सुर्रियल काव्यभाषा के लिए विशेष रूप से पहचाने जाते हैं। प्रख्यात उत्तर-औपनिवेशिक चिंतक और सामाजिक सिद्धांतकार आशीष नंदी अश्विनी कुमार की काव्य-संवेदना को एक “अदृश्य टाइपराइटर” से उपजी रचना-शक्ति के रूप में देखते हैं, जो स्मृति, स्थान और कल्पना के बहुआयामी संसार का सृजन करती है। उनकी कविताएँ महाकाव्यों, मिथकों और किंवदंतियों की सबवर्सिव पुनर्कल्पना के माध्यम से हर प्रकार के वर्चस्व पर प्रश्न उठाती हैं, विशेषतः उत्पीड़ित लैंडस्केप्स और अनुभवों के संदर्भ में जो लंबे समय से हाशिए पर रहे हैं। उनका नवीनतम कविता-संग्रह ‘मैप ऑफ मेमोरीज़’ (2025) शीर्षक से प्रकाशित हुआ है।
अपने मौलिक लेखन के अतिरिक्त, अश्विनी कुमार ने संपादक, अनुवादक और साहित्यिक क्यूरेटर के रूप में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने रिवर्स गोइंग होम, सेंट ऑफ रेन और रिवर ऑफ सॉन्ग्स जैसे काव्य-संकलनों का संपादन किया है। इन संकलनों के माध्यम से उन्होंने भारत की एक दर्जन से अधिक भाषाओं के कवियों को अंग्रेज़ी के साझा मंच पर लाकर बहुभाषी साहित्यिक संवाद को सशक्त बनाया है। अश्विनी कुमार इंडियन नॉवेल्स कलेक्टिव के सह-संस्थापक हैं, जो भारतीय उपन्यासों की क्लासिक कृतियों के अनुवादों को लोकप्रिय बनाने की एक महत्वपूर्ण पहल है। वे रेड रिवर के साथ हमिंगबर्ड्स चैपबुक कविता-श्रृंखला का संपादन भी करते हैं। वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, यूनिवर्सिटी ऑफ हाइडेलबर्ग और यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स जैसी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विज़िटिंग स्कॉलर के रूप में कार्य कर चुके हैं। साथ ही, वे नियमित रूप से द इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू, फाइनेंशियल एक्सप्रेस, आउटलुक इंडिया, स्क्रॉल और द प्रिंट सहित अनेक प्रमुख प्रकाशनों में स्तंभ, लेख और विचार-निबंध लिखते हैं।
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नरेंद्र पुण्डरीक
ReplyDeleteअश्वनी कुमार की कविताएँ समकालीन हिंदी कविता का नया पन्ना खोल रही है.
अश्विनी जी की कविताएं एक गहरी नज़र लिए उपस्थित होती हैं,और सामने एक दृश्य घटित होता हुआ दिखाई देने लगता। वर्तमान में हो रही घटनाओं का लेखा है इनमें।
ReplyDeleteअश्विनी भाई की कविताएँ भारतीय कविता का वैश्विक स्वर हैं!
ReplyDeleteइन कविताओं को पढ़ते हुए लोक और विश्व के बीच एक सामंजस्य और तनाव दोनों दिखता है। अश्विनी कुमार की कविताओं की भूमि उर्वर है और कई तनावों को अपने भीतर विन्यस्त किये हुए है। इन कविताओं के लिए मेरी ओर से कवि को बधाई और प्रस्तुति के लिए आपको साधुवाद।
ReplyDeleteअश्विनी कुमार की कविताएँ एक विशिष्ट और साहसी काव्य-स्वर के रूप में उभरती हैं, जहाँ स्मृति, हिंसा, विस्थापन, भाषा, इतिहास और सत्ता के अंतर्संबंध अतियथार्थवादी बिंबों के माध्यम से अभिव्यक्त होते हैं। उनकी कविता का संसार सीधी यथार्थवादी प्रस्तुति के बजाय स्वप्न, मिथक, इतिहास और वर्तमान की परतों को एक-दूसरे में इस तरह गूँथता है कि पाठक लगातार अर्थ की नई संभावनाओं से टकराता है। "शहर में जंगल", "मेरी भाषा में मेरी हत्या" और "सैनेटोरियम में ऑर्किड्स" जैसी कविताएँ केवल सामाजिक-राजनीतिक समय का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि मनुष्य की आंतरिक विखंडित चेतना का भी कलात्मक आख्यान हैं। उनकी भाषा अत्यंत बिंबप्रधान, बहुसांस्कृतिक और वैश्विक संदर्भों से संपन्न है, जिसमें मोहनजोदड़ो से लेकर हाइडेगर, चे ग्वेरा और लोक-स्मृतियाँ एक ही काव्य-परिदृश्य में उपस्थित हो जाती हैं। कहीं-कहीं बिंबों की अत्यधिक सघनता और वैचारिक घनत्व कविता को दुरूह अवश्य बनाते हैं, किंतु यही जटिलता उनकी रचनात्मक पहचान भी है। कुल मिलाकर, अश्विनी कुमार की कविताएँ समकालीन हिंदी कविता को नई संवेदना, नई काव्य-भाषा और नए सौंदर्यबोध से समृद्ध करती हैं तथा पाठक को अपने समय के हिंसक, विडंबनापूर्ण और अस्थिर यथार्थ पर गहरे स्तर पर विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं।
ReplyDelete"और लोग उसी सहजता से जीते हैं
ReplyDeleteजिस सहजता से मोहनजोदड़ो की नर्तकी
इतिहास के रिसते घावों को
अपने नग्न ताँबे के शरीर के भीतर
चुपचाप छिपाए खड़ी रहती है।"
यहां "सहजता " को उलटबांसी की तरह पढ़ना चाहिए। एक बेधक पीड़ा की तरह! पूरी कविता सभ्यता समीक्षा का एक बेचैन कर देने वाला पाठ बन जाती है । बदलते समय अनवरत चलने वाला पर्यवेक्षण एक लेखकीय टूल की तरह लगभग हर जगह मौजूद है ।
मुझे लगता है कि अश्विनी कुमार का कवि सुनाता बहुत कम और दिखाता बहुत अधिक है । यहां दिखना भी असीम है । इस असीम को दिखाने में बिंब के अर्थ - वलयों को,उनकी चाक्षुषता को यहां देखा जा सकता है -
"अँधेरी काँच-रातों में
उसका चेहरा सुनहरी धान की बालियों- सा चमकता था।"
लेखक का रचनात्मक हस्तक्षेप हमें जीवन के कितना निकट ले जाता है।इन कविताओं में यह देखा जाना महत्वपूर्ण है । ये कविताएं हमारे अवस्थिति-बोध और विवेक को पैना करती हैं।
हार्दिक बधाई अग्रज और प्रिय कवि..
दुनिया को देखने का सबका अपना अपना ढंग होता है,लेकिन कोई रचना 'जीवन को देखने' के हमारे ढंग को बदल दे,यह उसका हासिल है ।
इतनी अच्छी कविताओं के लिये अश्विनी जी को बधाई. ये अलग मिजाज़ की कविताएं हैं
ReplyDeleteस्वप्निल श्रीवास्तव
अश्विनी कुमार से मिलना हुआ है। पढ़ता भी रहा हूँ। सरलीकरण के शिकार हिंदी कवियों को पढ़ना चाहिए ऐसी कविताएँ जहाँ यथार्थ बिंबों में ढलकर काव्यात्मक विस्तार पाता है और सार्वभौमिक हो जाता है।
ReplyDeleteबहुत अच्छी कविताएं हैं ये। क्या ही संयोग है कि आज दिन में इस कवि की कविताएं 'हंस' जुलाई '26 अंक में पढ़ रहा था।उनका पता हमारे ही भूगोल के आसपास का था।
ReplyDeleteबहुत बढ़िया कविताएं
ReplyDeleteवर्तमान की पगडंडी से अतीत में ले जाती कविताएं जहां खड़ा होकर कवि तटस्थ भाव से दो कालों की संधि को देखता है निस्पृह।सुख की तरह दुख की भी अपनी एक गंध होती जो इतनी तीखी होती कि काल की बेड़ियों और हवाओं के तालों में भी कैद नही होती।