हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताएं
हरे प्रकाश उपाध्याय
समकालीन कविता में हरे प्रकाश उपाध्याय की उपस्थिति इस मायने में महत्वपूर्ण और अलग से रेखांकित करने योग्य है कि वे अपनी कविताओं के माध्यम से लगातार अपने ही रचे मुहावरों में तोड़फोड़ करते रहे हैं।हाल के वर्षों में उन्होंने छंद के सहारे समय और समाज की विडंबनाओं को एक नए मुहावरे में चित्रित करना शुरू किया है।यह चित्रण सटीक,बेधक और तिलमिला देने वाला है। यहां प्रस्तुत कविताएं इसी का उदाहरण हैं।
हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताएं
यहीं हूँ
कहीं नहीं हूँ
यहीं हूँ
सही हूँ
जहाँ हूँ
बस हूँ
वहीं हूँ
सब जगह नहीं हूँ
इधर हूँ तो इधर ही हूँ
उधर नहीं हूँ
आपकी नजर में माना
माना कहीं नहीं हूँ
पर इधर ही हूँ
जहाँ हूँ वहाँ जैसा भी हूँ
हूँ और सही हूँ
कहीं नहीं हूँ
पर यहाँ हूँ
और कोई शिकायत नहीं
सही हूँ
यहीं हूँ
यहाँ भी दुखता हूँ
गड़ता हूँ सबको
पर फिलहाल यहीं हूँ
जब तक बदले न जग का हाल
तब तक मै भी बेहाल सही हूँ!
जीने के लिए
जीने के लिए आदमी क्या नहीं करता
अल्ल सुबह पार्क में जाकर देखा
कोई मुर्गा है बनता
कोई बंदर सा उछलता
हर किसी के बदन से पसीना टपकता
एक भारी सेठ मिला एक खम्भे से लटकता
हमारा प्रिय भाई
लखनऊ से सुल्तानपुर के लिए
तीन पचपन की ट्रेन है पकड़ता
जीने के लिए आदमी क्या नहीं करता
एक आदमी जीने से हार गया
उसके बहनोई को तार गया
कोई दिल्ली कोई बंगाल गया
कोई घर से बिन बताये ही भाग गया
सुबह शहर के चौराहे पर खड़े हो जाते हैँ साठ लोग
अजब है इस जिंदगी का जोग
किसी को बीमारी पकड़ती
किसी को राज रोग
जीने के लिए आदमी क्या नहीं करता
कोई डेली पैसेंजरी करता
कोई सेठ की मैनेजरी करता
चार लोग मर गये कट कर
सगे भाई बाप के सामने रहने लगे बंटकर
सिगरेट फूंक कर कहता है डब्लू
जिंदगी जियो हटकर
मनोज बाबू दिन में घिन्नाते हैँ
रात में रीता संग सोते हैं सटकर
आदमी जीने के लिए क्या नहीं करता
सेठ जी कह रहे घाटे का सौदा है बिजनेस
अब नहीं पड़ता इसमें परता
पुलिस को धराकर तीन सौ
पाकेट मारने में राधे अब नहीं डरता
भाड़ में जाए साली जिनगी
कह कर
खुद से ही कर लेता मनुआ दरिंदगी !
पर्दा गिरा दो
मत बनो उसकी आवाज़
जिसे चोंच में दबाये है बाज
उसके लिए मत बनो सहारा
जो है किस्मत का मारा
डूब रहा जो
और ढूंढ रहा तिनके का सहारा
आओ मंच पर बैठो
और मालपुआ खाओ
अरे हमारा गाना गाओ
देश तुम्हारा है प्यारे
जो जी में चाहे खाओ - चबाओ
ताकत है तो बिलकुल दिखाओ
फिर जो चाहे सो पाओ
जिनकी लटकी हुई सूरत है
उनके पक्ष लेने की क्या जरूरत है
शक्ति की सत्ता की भाग्य विधाता की
करो आराधना बाघ पर बैठी माता की
देखो कितना तो बढ़िया मुहूरत है
इस समय यही तो जरूरत है
लिखो कविता कालजई
क्या हुआ जो गरीबों की बस्ती उजड़ गई
हक मांगने वालों पर गोली चल गई
ये सब तात्कालिक चीजें हैं भई
आओ मोमबती बुझा दो
अगरबती जला लो
बंद करो लेह- लद्दाख का नाटक
पर्दा गिरा दो
अरे कहा न पर्दा गिरा दो!
रोजमर्रा
सुबह हुई
और दरवाज़े पर खटखट हुई
जिससे पिछले हफ्ते उधार लिया था
जिसे कल चुकाने का वादा किया था
तंज उलाहने धमकी
यही पहली किरण चमकी!
मिला दोपहर तक का काम
मालिक की बोली
चाकू की तरह छिलती रही चाम
मजूरी उधार रही
चलो काम तो मिला सही
राह में गिरी मिली अठन्नी
यही रही आज की आमदन्नी
भात दिन में मालिक ने खिला दिया
शाम को जगत ने दारू पिला दिया
लुगाई कहीं से कुछ कमा लाई
रोहन को सोहन को एक - एक रोटी खिलाई
जिंदगी ऐसे ही चल रही है भाई
बैंक में खुला है जन धन खाता
उसमें कभी कुछ आता न जाता
खो गई है पासबुक
मगर उसे खोजने की कभी नौबत ही नहीं आई
पता नहीं कहाँ रख दिया है आधार
वोटर लिस्ट से भी नाम कट गया है इस बार
खैर हमें इस सबका क्या करना है सरकार!
चली तो चली आई
एक जंगल से निकली
दूसरे जंगल में आई
जंगल से जंगल तक पहुंची भाई
रोकर बोली नमिता बाई
दुनिया तेरी समझ न आई
हँसता है घेर कर लकड़बग्घा
करे तो करे क्या नमिता बाई
जैसा जेठ वैसा ही माघ
लड़ती है नमिता बाई
कहती है जीवन जंग- लड़ाई
जख्म बहुतेरे खाई है
तब जाके उमर चालीस तक आई है
नोचा - नोची
पकड़ा - पकड़ी
जाले बुने उसी में फंसे मकड़ी
नमिता बाई पीती है दारू
छोड़ के अनगिनत मरद
अब है वह अपनी मेहरारू
अब जो मर्जी उसकी
करने को वही उतारू
दो बोली मीठी सुनके
कहती है हँसके
दिखा साले तू नच के
आज तेरी बारी, रहना तू बचके
नमिता बाई
नया जनम है पाई
जंगल की यह नार
गजबे इसका ब्यौहार
चली तो चली आई
पर्वत पर चढी, पार कर खाई
जमाने भर की चाबुक सहकर आई
आप ही कहो
लौटे तो अब कहाँ लौटे भाई
यह साली नमिता बाई
हँसकर पूछ रही है नमिता बाई!
कहाँ हो
ऐसा आदमी हूँ
कि कोई नहीं पूछता
कि कहाँ हो!
भूल गये सारे नाते रिश्तेदार हैं
दुश्मन की तरह अपने ही सगे परिवार हैं
हाकिम रहता हरदम सिर पर सवार है
ज़िंदगी में मेरे नहीं कोई रविवार है
काम पर जाऊँगा कल भी
कर्जे मेरे सिर पे सवार हैं
भागता रहता हूँ
नींद में भी चलता हूँ
जहाँ होता हूँ वहीं
किसी न किसी की आँखों में गड़ता हूँ
जबकि अपने पसीने पीकर पलता हूँ
भाई साहब! मार लीजिए बेशक मेरी मजूरी
पर मंजूर नहीं इस बंदे को जी हुजूरी
इस धरती पर आदमी मैं इतना गैर ज़रूरी
धरती भी रोती होगी
जो समझती होगी मेरी मज़बूरी
कल कहीं किसी चौक पर मारा जाऊंगा
हस्पताल में लावारिश पुकारा जाऊंगा!
बात सुनता हमारी तो
यह ससुर हरे प्रकाश किस अकड़ में रहता है
न दुआ-सलाम न भैया-चाचा कहता है
दो कौड़ी का कवि है, झूठे बहादुर बनता है
कम से कम आकर वीकेंड पर मिल जाता
छूता पैर हमारे तो दिल हमरा खिल जाता
झुके सही तो जिनगी में का नहीं मिल जाता
आदमी को झुक-दब-सह कर रहना चाहिए
दुःख-दरद-बेमारी है तो हमसे कहना चाहिए
धारा जैसी बहे, उसी तरह ही तो बहना चाहिए
उसके सिर पर न जाने रहता है कौन सा भूत सवार
सच सोच समझ कर बोला करो कहा हमने कई बार
अपनी सनक में चौहद्दी मगर तोड़ देता है वह हर बार
दुर्गत सारी हुई नगर नगर से भगाया गया है
जख़्म खाकर पीठ पर मगर कहाँ संभल पाया है
अंगारे लिए ज़ुबान पर घूमता बौराया हुआ है
बात सुनता हमारी तो हम उसे आदमी बना देते
पैदल नापता है रास्ते, एक साइकिल दिला देते
पहुँच ऊपर तक हमारी, उसे हाकिम से मिला देते।
आपका प्रिय कवि नहीं हूँ
हाशिये पर ढकेल दिये गये लोगों के बीच
कहीं हूँ
मै आपका प्रिय कवि नहीं हूँ
जब कुछ लिखता हूँ
बहुसंख्य लोगों की आँखों में
चुभता हूँ
लिखने के एवज में
पीठ पीछे की गाली सुनता हूँ
जब हो जाएगी रात
होगी मेरी कविता पर बात
कहेंगे लोग हिकारत से
हरे प्रकाश भी है नीची जात
मेरी कविता खाएगी
खाए -पीये लोगों की महफ़िलों में लात
पर मेरी कविता से डरेंगे लोग
उससे बचेंगे लोग
खा - पीकर उसे नहीं पढ़ेंगे लोग
पर मेरी कविता उनका पीछा करेगी
वह उनसे सवाल करेगी
कवि को तुम कुएँ में ढकेल दोगे
मगर कविता तुम्हारे सिर चढ़ेगी
आपका प्रिय कवि नहीं हूँ
सबसे पीछे छूट गया हूँ
इसीलिए शायद आपकी आँखों में
आपकी चेतना में तीर सा धंसता हूँ
जो मन में आए कहता हूँ
बेलिहाज हूँ
बेखौफ आपकी सफलता पर हँसता हूँ!
कविता नहीं लिखता हूँ
अन्याय की तस्वीर खींचता हूँ!
हरे प्रकाश उपाध्याय
कुछ समय पत्रकारिता के बाद अब जीविकोपार्जन के लिए प्रकाशन का कुछ काम
बिहार के एक गाँव में जन्म। अभी लखनऊ में वास।
पाँच किताबें-
चार कविता संग्रह -
1. खिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएं
2. नया रास्ता
3. काली मुसहर का बयान
4. हर जगह से भगाया गया हूँ
एक उपन्यास- बखेड़ापुर
अनियतकालीन पत्रिका 'मंतव्य' का संपादन
पता -
महाराजापुरम
केसरीखेड़ा रेलवे क्रॉसिंग के पास
पो- मानक नगर
लखनऊ -226011
मोबाइल - 8756219902
सभी तस्वीरें pinterest से साभार।








बढ़िया।
ReplyDelete"कविता नहीं लिखता हूं
ReplyDeleteअन्याय की तस्वीर खींचता हूं|"
ग़ौरतलब यह है कि तस्वीर कहीं और से नहीं खींची जा रही,अपितु यहीं से और यहीं का होकर | 'यहीं का होकर' यही दूसरा पक्ष ही तस्वीर को और अर्थवान बनाती है एवं कविता को मौजू| कवि जब कहता है कि 'सब जगह नहीं हूं/इधर हूं तो इधर ही हूं/उधर नहीं हूं|' शाब्दिक ही सही ऐसी पक्षधरता रीढ़विहीन दौर में विश्वास और भरोसा पैदा करती है गर इसकी परिधि कवि के वास्तविक स्वभाव तक हो तो यही भरोसा समर्थ विश्वास में तब्दील होता है|सच पूछिए तो इस कविता का सम्यक मुहाना 'कहां हो', 'बात सुनता हमारी तो' कविता में संगम पाता है| मसलन -'बात सुनता हमारी तो/हम उसे आदमी बना देते' कवि बख़ूबी समझ रहा है 'आदमी' बनने का हुनर|बावजूद दूर है क्योंकि उसके पास रीढ़ है -इधर हूं तो इधर ही हूं/उधर नहीं हूं|' ऐसे में यांत्रिक युग में भी कवि का घाटे का सौदा होकर रह जाना लाज़मी है| पर कवि को ज़रा भी मलाल नहीं है, उसे भरोसा है कि उसकी सृजनात्मकता 'आदमी' नहीं 'इंसान' बनाती है|ऐसे में कवि हरे प्रकाश उधर नहीं इधर ही रहकर रोजमर्रा के प्रत्येक लेयर को देखना चाहते हैं अपनी नंगी आँखों से, उसकी तस्वीर खींचना चाहते हैं| यह उपक्रम चलता रहे अनवरत --
कवि को बधाई|
हरे प्रकाश की भाषा बेजोड़ है
ReplyDeleteउनकी अपनी पीढ़ी के वे समर्थ कवि हैं
ये कविताएँ बहुत कुछ कहती हैं!
मंच पर आरूढ़ होने और माल पुआ जीवी लोगों के लिए सदैव एक चुनौती रहे हैं हरे प्रकाश।
बधाई उनको!
युवा कवि हरे प्रकाश जी की कवितायें फेसबुक पर बिल्कुल नये तेवर व अंदाज़ में आयीं. समकालीन कविता में तुकबंदी कहकर बौद्धिक कवि जिन चीजों को हिकारत से देख रहे थे, उन्हें हरे भाई ने चुनकर दुलारा और अपनी हालिया कविताओं में जमकर प्रयोग किया. पाठकों से संवाद करती उनकी ऐसी कविताओं ने उनके चाहने वालों को नये अस्वाद का एहसास दिया.कौशिकी में प्रस्तुत कविताएँ भी उसी अंदाज़ की हैं तुक वाली, टेढ़ी मेढ़ी, किन्तु जो पाठकों में मन में सीधे प्रवेश करती है. इनमें धार भी है और मार भी. आम लोगों के दुख दर्द में शामिल ये कविताएं एक ही नज़र में और यूँ कहूँ दूर से ही पहचान ली जाती हैं कि ये हरे प्रकाश की कविताएं हैं. उन्हें हार्दिक बधाई 💐
ReplyDeleteहरे प्रकाश उपाध्याय की कविताएं हमेशा पढ़ने को प्रेरित करती हैं।
ReplyDeleteहरे प्रकाश जी सर्वथा एक अलग किस्म के कवि हैं,इनमें कविता लेखन की मौलिकता बची हुई है।
ReplyDeleteइनकी हरेक कविता समाज की विद्रूपताओं को बयां करती है।
आपके द्वारा चयनित सभी आठ कविताएं चुपचाप नहीं रहतीं बल्कि विरोध दर्ज करने पर आमादा होती हैं।
आप दोनों को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं।
🙏🌸🙏
हरेप्रकाश हमारे सर्वोत्तम कवियों में शुमार किए जाते हैं।इनकी कविता गरीबों,सबसे कमजोर लोगों की आवाज है।हरेप्रकाश जीवन को सहज भाषा में मूर्त्त करते हैं।
ReplyDeleteबहुत बढ़िया !
ReplyDelete21 वीं सदी के आरंभ से ही समकालीन कविता की दुनिया में सक्रिय युवा कवि हरे प्रकाश उपाध्याय उन कुछ गिने-चुने कवियों में शुमार हैं, जिन्हें मैं बराबर पढ़ता रहा हूं। वरिष्ठ कवि अरुण कमल सही लिखते हैं कि वे अपनी पीढ़ी के सर्वोत्तम कवि हैं। अपने नए कविता संग्रह 'हर जगह से भगाया गया हूं' से उन्होंने अपने कहन के अंदाज़ को बदला है। कविता के शिल्प में जोखिम उठाकर इस तरह की तोड़ -फोड़ करने वाले अपनी पीढ़ी के युवा कवियों में वे शायद अकेले हैं। वे जन सरोकार धर्मी कवि हैं। उनकी कविताएं कमज़ोर की जुबान हैं। उनकी कविताओं में जन गण की व्यथा-कथा दर्ज हुई है। कौशिकी के सफल संपादन के लिए बधाई और शुभकामनाएँ।
ReplyDeleteहरे प्रकाश उनकी आवाज़ हैं जिनके पैर जमीन पर टिके हैं। जो चौराहों पर खड़े हैं, जो फुटपाथों पर बैठे हैं, जो मैदान में डटे हैं, जो खेतों में जुते हैं, जो खदानों में धंसे हैं, जो कारखानों में घुसे हैं...हरे उनकी व्यथा को हूबहू उतार दे रहे हैं। ऐसी कविताई कि बगैर किसी अटकाव के दिल में उतर जाए। सरल-सहज शब्दों से सटीक संधान का कौशल हरे को विशिष्ट दर्जे का कवि बनाता है। इस प्यारे कवि को कभी व्यक्तिगत बधाई नहीं दी, लेकिन दिख जाए कहीं तो इनकी कविताएं बगैर देरी किए पढ़ता हूं।
ReplyDeleteहरे प्रकाश जी अपने ढंग के अकेले कवि हैं।उनकी सरल,सहज कविताएं सीधे पाठक के हृदय में उतरती है।भाषा की सादगी और कहन के अंदाज में वह अपना सानी नहीं रखते। सरल शब्दों से तीखा प्रहार करता उनका कवि पारंपरिक शिल्प को तोड़ते हुए कविता का नया मुहावरा गढ़ रहा है।
ReplyDeleteशुभकामनाएं!
कवि समय के तमाम अंतर्विरोधों की पड़ताल करता है। शैली सहज है । भावबोध उम्दा। बधाई।
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ReplyDeleteहरे प्रकाश उपाध्याय पूरे दमख़म के साथ कविता में अपनी उपस्थिति तो दर्ज कराते ही हैं साथ में उन सब उपेक्षितों को भी साथ में लेकर चलते हैं जो व्यवस्था के शिकार हैं, किसी न किसी रूप में दबे- कुचले,शोषित -पीड़ित हैं, कमतर - कमज़ोर हैं या हालात के मारे हैं ,इन सबकी नुमाइंदगी बख़ूबी करते हैं यानि अपना कवि धर्म निभाते हैं।"यहीं हूं" कहकर अपनी ज़िद और प्रतिरोध भी जता देते हैं। ख़ुद से मुठभेड़ करने का ये तरीक़ा उन सवालों के जवाब हैं जो सीधे - सीधे किये न जाकर , तंज़ की सूरत में महसूस कराये जाते हैं। यही चुभन इन कविताओं की शक्ल में बाहर निकली है।
कहन का अंदाज़ सरल होते हुए भी पैना है। एकदम से समझ आकर अपनी धमक से चेताने वाला।
बहुत ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति और सम्प्रेषण।
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ReplyDeleteहरेप्रकाश ने विगत 2 वर्षों में समाज के निचले पायदान पर खड़े,शोषित-प्रताड़ित आम जन की पीड़ा और संघर्ष को दिल में सीधे उतर जाने वाली सहज-सरल,लयात्मक भाषा में वाणी दी है, वह उसके कवि का नया उत्कर्ष है और उसकी पीढ़ी के कवियों के बीच सर्वथा अलग पहचान देता है. इन कविताओं का आस्वाद अनूठा है. हरे की नवीनतम कविताओं को पढ़ाने के लिए 'कौशिकी' का आभार.
ReplyDeleteहरे प्रकाश उपाध्याय से काफी पुराना परिचय है, उनकी रचनाशीलता में विषयबोध, हमेशा कुछ अलग और कौतुहल भरा रहता है वे हमेशा समाज की उन जगहों और चीजों पर निगाह डालते हैं जहाँ अमूमन कम ही लोग जाते हैं, मुझे हरे भाई की सबसे ज्यादा ताकतवर कविता " बुराई के पक्ष में ", लगती है,यह कविता जिन्हें हम बुरा मानते हैं उनके पक्ष में लें जाती है !
प्रस्तुत कविताओं में भी विषय,भाषा, तेवर,शिल्प के साथ कवि की अल्हदा दृष्टि इन्हें न सिर्फ पठनीय बनाती है बल्कि सरोकार के साथ सार्थक करती है ,! " यहीं हूँ कविता में साधारण जन के जीवन सच्चाई है जहाँ एक तंज में बात कही है, इसी तरह " जीने के लिये " कविता में भी कवि सारे समाज में दिख रही बुराई, कमियों, विषमताओं के प्रति रोष जाहिर करते हुए व्यंजना के विस्तारित स्वर को प्रक्षपित करता है, कि जीने के लिये काम पर जाने से लेकर हर परेशानी
में मुंबतिला हैं, इस कविता के वृत्त में अनेक चित्रात्मक विवरण हैं जहाँ जीने में मसरुफ लोग दूसरे के दुखों से परेशानियों से कोई मतलब नहीं रखते वे जी रहे हैं बस कि जीने के लिये जीना है, यह कविता अभिधा में चित्र खींचती है और व्यंजना में अर्थ के रंग भरती है !
खुद अपने नाम पर केंद्रित कविताओं में कवि ने अपनी आलोचना करते हुए अपनी शख्सियत को बयां किया जिसमें अपने बेलाग स्वभाव और अकड़ की शब्दकशीदी की है !
हरेप्रकाश की कविताओं और उनके व्यक्तित्व को सामने लाती ये कविताएं कवि की अंतस की सच्चाई है और सच के स्वीकृति की कविताएं है !
मित्र हरे प्रकाश को बहुत बधाई स्नेह और शुभकामनायें ! कौशिकी का आभार अच्छे कवि के चयन के लिये !
हरे प्रकाश अपनी कविताओं में कथ्य के साथ उसकी भाषा का भी सृजन करते हैं। इन कविताओं एक बारीक व्यंग्य हौ जो आमजन की आवाज़ में अपनी वकालत स्वंय करता है। जिसके तर्क तथा कथित को अनुत्तरित कर देते हैं। समर्थ प्रतिरोध और व्यापक मूल्य सृजन की क्षमता से भरी इन कविताओं को उपलब्ध करवाने के लिए कोशिकी का आभार। - प्रदीप मिश्र, इन्दौर
ReplyDeleteइधर हूँ तो इधर ही हूँ, यह बात सिर्फ़ कविता का वाक्य नहीं, हाल के दिनों में कवि ने इसे साबित भी किया है। हाशिये पर ढकेल दिए गए लोगों के पक्ष में खड़ा रहा कवि।
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