हेमंत देवलेकर की कविताएं


हेमंत देवलेकर 


हेमंत देवलेकर की कविताओं में मनुष्य और उसकी जीने की जद्दोजहद के साथ प्रेम की चिंता भी मौजूद है।एक अंधी दौड़ में बदल चुके इस समय में मनुष्यता खतरे में है। भरोसा, समर्पण और प्रतिरोध जैसे शब्दों के अर्थ बदल दिए गए हैं।इन कविताओं में हमारा धड़कता है।





मालगाड़ियों का नेपथ्य 

रेलवे स्टेशन की समय सारणी में
कहीं लिखा नहीं होता उनका नाम
प्लेटफार्म पर लगे स्पीकरों को
उनकी सूचना देना कतई पसंद नहीं
स्टेशन के बाहर खड़े साइकल रिक्शा, ऑटो, तांगे वालों को
कोई फर्क नहीं पड़ता उनके आने - जाने से
चाय- नमकीन की पहिएदार गुमठियां
कोने में कहीं उदास बैठी रहती हैं
वजन बताने की मशीनों के लट्टू भी
कहां उनके लिए धडका करते हैं
आधी नींद और आधे उपन्यास में डूबा बुकस्टॉल वाला
अचानक चौक नहीं पड़ता किताबों पर जमी धूल हटाने के लिए
कौन उनके लिए प्लेटफॉर्म टिकट निकालता है -
हाथों में फूल - माला लिए आता है?

माल गाड़ियों के आने - जाने के वक़्त
पूरा स्टेशन और पूरा शहर तकरीबन
पूरी तरह याददाश्त खोए आदमी- सा हो जाता है

इतनी बड़ी उपेक्षा का ज़ख्म पसीने से छुपाए
भारी भरकम माल असबाब के साथ
वे ढोती हैं दुनिया की ज़रूरतें
और ला- लाकर भरती हैं हमारा खालीपन

एक्सप्रेस ट्रेनों की खातिर
हमेशा ही रोका गया उनका रास्ता
हरा सिग्नल उनको हक़ की तरह नहीं
दया की तरह मिला

जब जब मालगाड़ी को देखो
वह मज़दूरों के काफ़िले - सी लगती है
रोज़ दुनिया बनाने की जद्दोज़हद में
दुनिया में अपनी हिस्सेदारी से बेखबर।



नई भूख

भूख से तड़पते हुए भी
आदमी रोटी नहीं मांगता
वह चिल्लाता है - "गति गति"

तेज़... और तेज़
इससे तेज़ क्यों नहीं ?
कभी न स्खलित होने वाली वासना है - गति

हमारे पास डाकिए की कोई स्मृति नहीं' बची
दुनिया के किसी भी कोने में
पलक झपकते पहुँच रहा है सब कुछ

सारी आधुनिकता इस वक़्त लगी है
समय बचाने में --
जो स्वयं ब्लैक होल है

हो सकता है किसी रोज़
हम बना लें समय भी
मगर क्या तब भी
होगा हमारे पास इतना समय
कि किसी उलटे पड़े छटपटाते कीड़े को
सीधा कर सकें।




यह देश

यह देश अपना ही है
बिल्कुल अपना
लेकिन इतना भी अपना नहीं
कि हर कहीं थूकते फिरो
और वह सरेआम बेइज्जत होता रहे

यह देश दूसरों का भी है
बेशक सभी दूसरों का
लेकिन इतना भी दूसरों का नहीं
कि कहीं बहता हुआ नल दिखे
और आप मुँह फेर चलते बनें।


प्रेम में भाषा

ये प्रेम के शुरुआती दिन हैं।
इन दिनों से ज़्यादा संवेदनशील
और दुविधापूर्ण कुछ भी नहीं
कैसी अजीब बात है कि
इन दिनों का सारा दारोमदार टिका है भाषा पर।

कितनी सतर्कता से चुनना पड़ते हैं शब्द
जैसे वे शतरंज के मोहरे हों
शब्दों के अर्थ से ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है आशय
इन्हीं दिनों समझने लगा हूँ

मैं शब्द चुनता हूँ एकदम अपनी भावना के नजदीक के
लेकिन बहुत नज़दीक के भी नहीं
क्योंकि यह कोई निशानेबाज़ी नहीं है
एक असमाप्त मैराथन है

प्रेम करते हुए पता चलता है
कि व्यंजना का जादू भी होता है शब्द में
कोई असंगत शब्द अचानक पर्यायवाची लगने लगता है।
अगर भाषा की तमीज़ सीखनी हो
तो प्रेम करके ज़रूर देखो।



भरोसा

दुनिया कोरस में विलापती है
" अब किसी का भरोसा नहीं रहा"

दुनिया पर एक आकाशवाणी गिरती है
"अब किसी का भरोसा नहीं रहा "

मैं लगभग अनिश्चय में
किसी सड़क पर अपनी गाड़ी दौड़ाता हूं
तभी कहीं से कोई आवाज़
मेरी ओर लपकती है
"भैया, स्टैंड!!!"

वह आवाज़ जैसे
दुनिया की दुआओं का कोरस हो

आश्चर्य से सोचता रहा
अपने जीवन की आपाधापी में खोए
उस अपरिचित आदमी को
मेरी गाड़ी का खुला हुआ स्टैंड कैसे दिखा होगा

भरोसा अभी भी बचा हुआ है, मैंने कहा
और एक दुर्घटना होने से बच गई।



उनका घर

आग बरसाती दोपहर में
तगारियां भर भर कर
माल चढ़ा रहे हैं जो ऊपर
घर मेरा बना रहे हैं ।

जिस छत को भरते हैं अपने हाड़ और पसीने से
वे इसकी छांव में सुस्ताने कभी नहीं आएंगे

इतनी तल्लीनता से एक एक ईंट की,
रेत मसाले की कर रहे तरी
वे इस घर में घूंट भर पानी के लिए नहीं आएंगे

दूर छांव में खड़े हो देखता हूं
वे सब पक्षियों की तरह दिन रात
जैसे अपना ही घोंसला बनाने में जुटे हुए
उनको शुक्रिया कहने का ख्याल भी मुझे नही आयेगा

एक दिन
सीमेंट चूने गारे से लथपथ
यूं चले जायेंगे वे, जैसे थे ही नहीं

मुझे तसल्ली होगी कि उन्हें
मेहनताना देकर विदा किया
लेकिन उनका बहुत - सा उधार
इस घर में छूट जाएगा।



प्रतिरोध

अंधेरा कितना भी डरावना हो
एक अद्भुत बात है उसमें
आँखों की पुतलियाँ फैल जाती है इतनी
कि निगल सकती हैं उसे पूरा

( चकाचौंध में यह कुव्वत कहाँ??)



समर्पण

प्रेम सबको बहा ले जाता है -
नदी को भी
सिर्फ़ एक शब्द है नदी के जीवन में
-- 'समर्पण'

प्रेम से ज़्यादा श्रमसाध्य कोई काम नहीं

जब हमें नदी के पानी में
नदी का पसीना दिखाई देगा
समुद्र के खारेपन के बारे में
बदल जायेगी हमारी धारणा

हम उसे भी एक शीशी में भरकर ले आयेंगे।






हेमंत देवलेकर 

जन्म दिनांक : 11 जुलाई 1972

वर्ष 2000 के आसपास
रंगकर्म तथा कविता की शुरुआत

1) पहला कविता संग्रह
"हमारी उम्र का कपास" राधाकृष्ण प्रकाशन द्वारा। वर्ष 2023 (पुनर्प्रकाशित)
2) दूसरा कविता संग्रह *गुल मकई* बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित। वर्ष 2017
3) तीसरा कविता संग्रह *प्रूफ़ रीडर* राधाकृष्ण से प्रकाशित। वर्ष 2025
4) बच्चों पर केंद्रित कविताओं का निरंतर लेखन।


1) सौरभ रॉय द्वारा चयनित अनुदित अंग्रेज़ी संचयन *पेरेनियल* में शामिल
2) 2000 के बाद की युवा कविता संचयन में शामिल। संपादक श्री राजेश जोशी एवं सुश्री आरती।
3) आमिर हम्ज़ा के संपादन में कवियों के गद्य 'क्या फ़र्ज़ है कि मिले सबको जवाब एक सा " में शामिल।

 मौलिक नाटक लेखन और रूपांतरण भी : 'चिड़ियाघर', 'क़िस्सा बुद्धिनगर का', *भुलवा भुलक्कड़, बिरसा मुंडा आदि


1) मप्र साहित्य सम्मेलन का वागीश्वरी सम्मान, वर्ष 2020
2) कविता के लिए स्पंदन युवा सम्मान, भोपाल वर्ष 2017
3) कविता के लिए राज्यस्तरीय शशिन सम्मान, जबलपुर वर्ष 2019

वर्तमान में विहान ड्रामा वर्क्स, भोपाल में सौरभ अनंत के निर्देशन में रंगकर्म में सक्रिय। अभिनय गीत लेखन, संगीत सृजन तथा प्रशिक्षण कार्यक्रमों में सक्रिय। 250 से अधिक गीत संगीत का सृजन। 

ई मेल hemantdeolekar11@gmail.com
मोबाइल नं 7987000769

भोपाल




सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।


Comments

  1. आशीष दशोत्तर7 February 2026 at 01:24

    बहुत प्रभावी कविताएं।

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  2. देवेश पथ सारिया7 February 2026 at 01:24

    ये कविताएं अनदेखे को महसूस कर उसे रेखांकित और रोशन करती हैं।

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  3. क्या ही कहा जाए इनके लिए. सुंदर विचार और तैरते शब्द घेर लेते हैं

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  4. बहुत महत्वपूर्ण दो काव्य संग्रहों गुल मकई व हमारी उम्र का कपास पढ़ने के बाद यह कह सकता हूं कि आम आदमी के कठिन जीवन की विसंगतियों को, जीवन में अधिकाधिक धन प्राप्ति की लालसा और उसके उत्पन्न कठिनाईयों को, आसपास वातावरण के पात्रों व विचारों को , साधारण जीवन व प्रकृति के असाधारण खूबसूरत बिंबों को उन्होंने अपनी कविताओं में इतने शानदार ढंग से चित्रित किया है कि कविताएं मन के तारों को बरबस झंकृत करती हैं । उनकी रचनाओं की मनमोहक और प्रभावी शब्दों की शानदार जादूगरी बार बार चमत्कृत करती है ।यह देश, प्रेम में भाषा , व भरोसा यह महत्वपूर्ण कविताएं ऊसर जीवन की आपाधापी में सुंदर व संवेदनशील रंगों की सहज उपस्थिति को साकार करती हैं महत्वपूर्ण रचनाओं के लिए प्रिय कवि को बहुत बहुत शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं।

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  5. हरगोविंद पुरी7 February 2026 at 17:20

    बहुत ही जबरदस्त कविताएं जिसमें मनुष्यता मौजूद है
    उसके एहसास मौजूद है
    मौजूद है समय की चुनौतियां
    सजग प्रहरी की तरह कविताएं हैं।

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  6. निशा मोटघरे7 February 2026 at 17:20

    मजदूरों के काफिले और मालगाडी सच एक से लगते है ।

    उपेक्षा से निराश ना होकर, बेखबर होकर जिम्मेदारी की हिस्सेदारी में मग्न हैं ।

    जिंदगी की जद्दोजहद में
    किसके हिस्से क्या आया,

    स्वीकार कर सभी यह,
    दिल ने मुझे, और मैने दिल को समझाया।

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  7. आशु मनदीप7 February 2026 at 17:21

    बहुत सुंदर Sirji... कितनी सहजता से अपने मोस्ट neglected गाड़ी.. maal gadi ke अस्तित्व पर रोशनी डाली है ...एक मज़दूर के काफ़िले सी ... बहुत ही सुंदर रचना।

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  8. वीणा सिन्हा7 February 2026 at 17:22

    कितने अलग ढंग से सोचते हो ❤️

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  9. प्रेरणा7 February 2026 at 17:23

    Hemant ji, aap writing se itna gehra jude hai, ki me kya bol sakti hun aapko. Bas likhte rahiye.

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