लीलाधर जगूडी की कविताएं

 

लीलाधर जगूड़ी 

वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी की कविताओं में मनुष्य और प्रकृति के साथ उसकी जिजीविषा भी है। यहां कठिन जीवन का ऐसा संगीत गूंजता है जिसमें परंपरा है तो आधुनिकता भी।
काव्य भाषा से लेकर बिंब तक में पहाड़ की चमक कौंधती है और चकित कर देती है। जीवन के अनदेखे दृश्यों को देखने की ललक और गुम होते हुए को बचा लेने की चाह पैदा करती इन कविताओं में टटकापन है।
यही इनकी विशेषता भी है।


बिना नाव


बिना नाव जैसे बीज नदियां पार कर लेते हैं 

उस तरह किसी के काम आकर 

मैं कहीं जाकर फिर से उगना चाहता हूं 


मैं उगूं और किसी को लगे कि यह तो शब्द है 

भाषा है 

बीजों की तरह उड़कर शब्द भी चले जाते हैं 

किसी दूसरी भाषा में 

इस सफर में फूल और पत्थर भी भाषा बन जाते हैं 

आधे अधूरे व्यंजन भी स्वर पा जाते हैं 


एक टहनी की मधुमक्खियों जैसी उड़ान 

दूर खड़े पेड़ की टहनियों को 

सफल बना देती है 


भूख और मेहनत 

दोनों रचते हैं वसंत 

पैर भी खुरों जैसे ही कुचलते हैं पृथ्वी को।


घास के पूले 


अचरज हुआ घास के पूलों को चलता देखकर 

पूले पर पूले 

छः फुट से भी ऊंचे थे पुलिंदों के सिर 

मजाल कि कोई उन्हें छू ले


इस तरह ऊंचे पुलिंदों की कतारें जा रही थीं 

गांवों की ओर 

जैसे घास की मीनारें खुद चलकर जा रही हों 

जानवरों की नांद तक 


औरतों के दो पैर लेकर चल रहे हैं घास के धड़ 

घास के सिर 

न कमर न गर्दन न पिछवाड़ा 

इतने थिर- सिर छहफुटे गट्ठरों के 

पार कर रहे हैं पहाड़ की धार


कभी उन दो पैरों वाली पीठों पर 

लकड़ी के बोझ आ जाते, कभी पराल के भारे 

कभी घराट ले जाए जाते गेहूं के बोरे


घिसे हुए तलवे और घिसी हुई मैली एड़ियों सहित 

दो पैर स्त्री के दिख जाते हैं बार-बार 


पुराने जूतों जैसे घिसे इन पैरों के सिर पर 

जेठ की दोपहरियों में 

कभी पानी भरे पीतल के बंटे चढ़ जाते हैं 


घास के भारे लकड़ी के गट्ठर 

सिर पर बंटा और जिंदगी का बंटाधार 

बासठ वर्षों से लगातार।


अपने-अपने युद्ध 


कभी दुनियादारी की तरह कभी दुकानदारी की तरह 

चल रहे हैं युद्ध 

युद्धों ने भी बदल लिए हैं फैशन 

मरने वाले मगर पहले की ही तरह 

घर परिवार और दोस्तों को याद करते हुए मरते हैं 


ऐसे समय में घायल जमीन से ऊपर आए हुए 

कीड़े भी सोचते हैं पृथ्वी आकाश और उजाले के बारे में 

जैसे कि समय के बारे में सोच रहे हों 

लेकिन बीच में ही जीमने वालों की तरह कुछ पक्षी आ जाते हैं 


एक से दूसरे अस्तित्व की भूख 

खाओ-कमाओ का प्रसंग फड़- फड़ा पड़ता है 


हर जगह से घाव,घात और मौत के समाचार हैं 

कीड़े कभी भी इस धरती पर अकड़कर नहीं चल पाए 

कीड़ों की मौत भी अपने सारे जीवन को याद करते हुए हुई है 


उनके मरे हुए शरीर में मौजूद है 

अपने को बचा न पाने की आखिरी ऐंठन

जैसे वे अब भी पीछे की ओर जोर मार कर 

आगे की ओर सरक जाना चाहते हों।


आसमान में घास


घास से तुलना करो तो लगता है 

अपमान कर रहे हैं 

बिन बोये उग आने का 

जलकर भी हरियाने का 

हममें से किसी का इतिहास है?


ऊंचाइयों और घनत्व में भी 

मात दे रही हैं बहुमंजली इमारतें 

किसी समय के आसमान छूते पेड़ों को 

ये आसमानी मोहल्ले बौना बनाते जा रहे हैं 


रात जैसी लम्बी कहानी और कविताएं 

छोटे छोटे शीर्षकों, उपशीर्षकों जैसे चांद तारे 

झूठ मूट ही पास आ गए लगते हैं 

लोहे,ईंट गारे, सीमेंट से बने घरों में 


चिड़ियों की उड़ानों से भी ऊपर चली गई छतें 

गिरती बारिश 

सौ मंजिल की ऊंचाई पर ही छू लेती है जमीन 

वहीं आसमान में ही उग आती है घास 

बौछारों - सी कंगूरों पर लटकी हुई 

कहीं दूर से ही असली जमीन को निहारती हुई।


दुःख की बात 


निरर्थकताओं को सार्थकता में बदलने के लिए 

हम संघर्ष करते हैं 

बदहालियों को खुशहालियों में बदलने के लिए हम संघर्ष करते हैं 

क्योंकि कमियां जब अभाव बन जाती हैं तो वे बीमारियां बन जाती हैं 

और बीमारी में भी हम संघर्ष करते हैं 


कोई डॉक्टर नहीं बताता कि क्या क्या अभाव है किसी के जीवन में 

वे सिर्फ उन जगहों के बारे में पूछते हैं जो दुःख रही होती हैं 

या जानलेवा दर्द उठा रही होती हैं जिससे हम संघर्ष करते हैं 


मौत से फिर कभी हम बाद में मरते हैं 

और फिर मौत को ही जिम्मेदार ठहराते हैं अपनी मौत का 

हम मरने के बाद भी काफी संघर्ष करते हैं 


आज शरीर विज्ञान में हो रहे अनुसंधान की एक खबर पढ़ी 

उस दवा के सेवन से अब आदमी बूढ़ा नहीं होगा 

यह कितने दुःख की बात है कि आदमी जवान रहेगा और मर जाएगा।


तब पता नहीं था 


वक्त और समय भी थे काल की चपेट में 

तब भी अपने को अभिव्यक्त करना चाहते थे हम


समय और प्रेम की आपसदारी जानते हुए भी 

जब सबकुछ, सबकुछ की चपेट में था 

तब भी हम खुद को व्यक्त करने के संघर्ष से गुजर रहे थे 


सपाट और उद्विग्न समय के हम हमेशा रहने वाले रहे

बस कह नहीं पाए पर हम कहने वाले रहे 


बिना पहिए के पैदल रास्ते वाला प्रेम था हमारा

कभी सीमित भूखे, कभी सीमित तृप्त 

जहां बसेरा बना लेते डेरा बन जाता था 


तब पता नहीं था कि एक दिन हमारी इच्छाएं 

शादी के रजिस्ट्रार और आवास-विकास आयुक्त में बदल जाएंगी 


समय जैसा समय रोज गंवाते हुए 

निरर्थकता की सार्थकता ढूंढते हुए 

समाज कल्याण तक पहुंचते पहुंचते 

जिंदगी की छलांगें आग की लपटों जैसी याद आती हैं 


पत्थरों ने हथियार बनकर हमारे लिए 

जानवरों और पेड़ों का शिकार किया 

मालूम नहीं था कि इस कारीगरी के बल पर 

एक दिन हम किसी फैक्ट्री के दरवाजे पर खड़े होंगे 


हिरना गाड़ी हो या बैलगाड़ी 

भैंसा गाड़ी हो या कुत्ता गाड़ी

हर गाड़ी को घोड़ा शक्ति तक लाने के लिए 

हमें पता नहीं था कि हम कार के कारखानों और 

रिजर्व बैंक की ओर तीर छोड़ रहे हैं 


गति,मति और हुनर ने हमारी बहुत धुनाई की है 

हमें नहीं पता था कि हम कोड़ों को इंजेक्शन में 

घोड़ों को इंजिन में और पहियों को टायर में 

बदलने के कगार पर पहुंचेंगे 


ऋतुओं और मौसमों में समय परिक्रमा करता हुआ लगता है 

जबकि पुराना समय बताते हैं नक्षत्रों को भी पार कर चुका है 

मछलियों और मक्खियों को मारते हुए हमें नहीं पता था 

कि एक दिन हम समुद्रों और आसमानों को पार कर चुकेंगे 

हमें नहीं पता अभी हम में कितनी छलांगें बाकी हैं 

अचानक से भी ज्यादा जल्दी छलांगता आ जाता है भीतर का बाघ 

अभिव्यक्ति में खुशी का भी हिरन की तरह शिकार करना पड़ता है।


गनीमत है 


फिलहाल गनीमत है 

कि पूरी दुनिया एक ही शहर में नहीं रहती

अगर रहती होती 

तो पूरी दुनिया में फैला हुआ होता एक ही शहर 

और तब भी हम उसे घूम न पाते 


एक खराब बात और होती 

कि पूरी दुनिया एक ही शहर की रहने वाली होती 

और इस तरह हम कभी किसी दूसरे शहर नहीं जा पाते 


चाहे किसी भी जगह हम मर रहे होते 

पर पता एक ही शहर का होता 


फिलहाल गनीमत है कि जब एक शहर बदलते हैं 

तो छोड़ने के लिए भी और पाने के लिए भी 

एक और शहर कहीं होता है 


छोड़ने के बाद पाना , एक और दुनिया पाने के बराबर है 

जहां किस्मत बदले या न बदले 

शहर थाना और ठिकाना तो बदल जाता है 


कई कई दुनियाओं वाली एक दुनिया के बावजूद 

गनीमत है कि हम एक ही शहर के रहने वाले नहीं हैं 

इसी से दुनिया में अभी देखने लायक अनदेखा 

बहुत कुछ बचा हुआ है।


पहाड़ों के पहाड़ 


हरे सेब लाल पीले हुए गुस्से से नहीं मिठास से 

और उतर आए मैदानी शहरों में पहाड़ी छोकड़ों से 

झलक मांओं की धमक पिताओं की 

कुछ चोट खाए सपने दादियों के 

कुछ बचपन से ही कठोर पड़ गए हैं 

बहुत ओले झेल चुके दादाओं जैसे 


सीजन खत्म हुआ 

छंटे सेब बिक जाते हैं 

छूटे फिंक जाते हैं 

लड़के भी कई घरों में कई दुकानों में लग जाते हैं 

वहीं के वहीं बूढ़े और दागदार हो जाते हैं 

पहाड़ों से आए सेब जैसे कभी के लाल-पीले छोकड़े 

गुफाओं जैसे टोकरे भर-भर 

पहाड़ों जैसे पहाड़ों के किस्से सुनाते हुए।





लीलाधर जगूड़ी

जन्म : 1 जुलाई, 1940; धंगण गाँव (सेम मुखेम), टिहरी (उत्तराखंड)।

 प्रकाशित कृति‍याँ : ‘शंखमुखी शिखरों पर’, ‘नाटक जारी है’, ‘इस यात्रा में’, ‘रात अब भी मौजूद है’, ‘बची हुई पृथ्वी’, ‘घबराए हुए शब्द’, ‘भय भी शक्ति देता है’, ‘अनुभव के आकाश में चाँद’, ‘महाकाव्य के बिना’, ‘ईश्वर की अध्यक्षता में’, ‘ख़बर का मुँह विज्ञापन से ढका है’, ‘जि‍तने लोग, उतने प्रेम’ और ‘कविता का अमरफल’ (कविता-संग्रह); ‘मेरे साक्षात्कार’, ‘प्रश्न व्यूह में प्रज्ञा’ (साक्षात्कार)।

प्रौढ़ शिक्षा के लिए ‘हमारे आखर’ तथा ‘कहानी के आखर’ का लेखन। ‘उत्तर प्रदेश’ मासिक और राजस्थान के शिक्षक-कवियों के कविता-संग्रह ‘लगभग जीवन’ का सम्पादन। अनेक देशी और विदेशी भाषाओं में कविताओं के अनुवाद।

सम्मान : ‘जि‍तने लोग उतने प्रेम’ को व्यास सम्मान, साहित्य अकादेमी पुरस्कार; पद्मश्री सम्मान; रघुवीर सहाय सम्मान; भारतीय भाषा परिषद, कलकत्ता का सम्मान; उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का नामित पुरस्कार; साहित्य अकादेमी की फ़ेलोशिप ‘प्वेट एट रेजिडेन्स’ के अन्तर्गत वर्तमान संग्रह का संयोजन।

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन।




Comments

  1. स्वप्निल श्रीवास्तव27 December 2025 at 18:24

    बहुत दिनों बाद जगूड़ी जी की कविताएं पढ़ने को मिली.
    धन्यवाद कौशिकी जिसके माध्यम से हम हिंदी कविता. का सफर तय कर रहे हैँ।

    ReplyDelete
  2. चंद्र प्रभा तिवारी27 December 2025 at 18:25

    साहित्य जगत की अनूठी पत्रिका
    साधुवाद 💐💐
    बहुत कुछ पढ़ने को मिला।

    ReplyDelete
  3. जीवन के जरुरी सरोकारों को अपनी महत्वपूर्ण रचनाओं में बहुत प्रभावी ढंग से व्यक्त करने वाली विचारणीय व मर्मस्पर्शी रचनाओं से हिंदी के प्रतिष्ठित कवि श्री लीलाधर जगूडी जी ने अपनी खास पहचान बनाई है ।
    कवि की महत्वपूर्ण कविताएं जीवन की सार्थकता के लिए जीने का आह्वान करती हैं उनकी हर कविता में एक सूत्र वाक्य लिखा हुआ है जैसे कविता दुख की बात की यह पंक्ति बहुत विचारणीय है कि यह कितने दुख की बात है कि आदमी जवान रहेगा और मर जाएगा ! इसी तरह कविता गनीमत है की यह पंक्ति कि छोड़ने के बाद पाना एक और दुनिया पाने के बराबर है इसी तरह दुनिया को देखने लायक अनदेखा बहुत कुछ बचा हुआ है ।
    बिना नाव के बीजों की जीवन यात्रा व किसी भाषा के शब्दों की जीवन यात्रा के लिए सचमुच किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है !
    बहरहाल
    बहुत अर्थपूर्ण विचारणीय कविताओं के लिए आदरणीय श्री जगूडी जी को व कौशिकी के इस महत्वपूर्ण पटल पर इन उल्लेखनीय कविताओं की प्रभावी प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं।
    मुकेश तिरपुडे

    ReplyDelete
  4. माताचरण मिश्र27 December 2025 at 23:25

    लीलाधर जी जगूड़ी हिन्दी कविता के वरिष्ठ कवि हैं, जीवन की सहज छोटी छोटी बातों को वे अपनी कविता में डाल देते हैं,,🙏

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  5. डॉ उर्वशी28 December 2025 at 07:33

    कौशिकी में प्रस्तुत लीलाधर जगूड़ी की ये कविताएँ समकालीन हिंदी कविता में जीवन, श्रम, प्रकृति और समय के जटिल संबंधों को अत्यंत सघन और मानवीय दृष्टि से रचती हैं। इन कविताओं में पहाड़ सिर्फ भूगोल नहीं, बल्कि श्रम की थकान, स्मृति की परतें और जिजीविषा की दृढ़ता बनकर उपस्थित है—चाहे वह बिना नाव बीजों का नदी पार करना हो, घास के पूलों में ढकी स्त्रियों की देहहीन होती श्रमशील आकृतियाँ हों या ‘दुःख की बात’ में आधुनिक विज्ञान और मृत्यु के बीच का विडंबनापूर्ण सच। जगूड़ी की भाषा सहज होते हुए भी गहरी दार्शनिक अर्थछवियाँ रचती है, जहाँ छोटी-छोटी घटनाएँ व्यापक सामाजिक, आर्थिक और सभ्यतागत प्रश्नों में बदल जाती हैं। ‘गनीमत है’ और ‘तब पता नहीं था’ जैसी कविताएँ आधुनिक विकास, विस्थापन और आकांक्षाओं की आलोचना करती हुई मनुष्य की सीमाओं और संभावनाओं को एक साथ उजागर करती हैं। कुल मिलाकर ये कविताएँ संवेदना, विचार और अनुभव का ऐसा संतुलित संयोजन हैं जो पाठक को केवल प्रभावित नहीं करता, बल्कि उसे अपने समय और जीवन पर पुनर्विचार के लिए विवश करता है।

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  6. फूलचंद गुप्ता28 December 2025 at 07:34

    अच्छी कविताएं।

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  7. मांघीलाल यादव28 December 2025 at 16:32

    लीलाधर जगुड़ी जी की कविताएं पहाड़ी लोकगीत हैं इनमें पहाड़ों के जनजीवन को स्पष्ट देखा जा सकता है।
    पहाड़ी लोकसंस्कृति से ओतप्रोत हैं ये कविताएं।
    इन कविताओं में लोकभाषा की सुघड़ता देखते ही बनती हैं।
    कौशिकी का यह उद्यम सराहनीय है इसे जारी रखें।
    संभव हो तो कवि लेखक का पूरा पता और व्हाट्स ऐप नंबर जरूर देवें।
    🙏🌷🙏

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  8. अर्पण जामवाल28 December 2025 at 16:32

    सुंदर कविताएं।

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