राजेश जोशी की कविताएं और बातचीत
राजेश जोशी
'कौशिकी' का लगभग एक वर्ष पूरा हो रहा है और यह अवसर खास है। पचासवीं पोस्ट के रूप में इस सप्ताह पढ़िए वरिष्ठ कवि राजेश जोशी की बारह कविताएं और ताजा बातचीत जिसे संभव किया है अजय महताब ने।समकालीन कविता को जीवन से जोड़ने और इसके मुहावरे को रचने और बदलने में जिन कवियों ने अपनी उम्र लगा दी उनमें राजेश जोशी का नाम प्रमुख है।आज भी उतनी ही सक्रियता से वे मुस्तैद हैं और उनकी कविताएं अपने समय की तमाम चुनौतियों से सीधे मुठभेड़ करती हुई उनकी आवाज़ बनी हुई हैं जिनकी आवाज को दबाने की तमाम कोशिशें व्यवस्था की तरफ से अलग-अलग मोर्चे पर जारी है।
राजेश जोशी की कविताएं
मैं अलक्षित हूँ कवि कह गया है
मैंने निराला को नहीं देखा ,
बहुत पास होते हुए भी मैं निराला से नहीं मिल पाया !
नहीं देखे को देखने की कोशिश के इस वृत्तांत में
मैं भटक रहा हूँ बरसों से !
26 जनवरी 1961 की सुबह उस कड़़कती सर्दी में ,
मैं इलाहाबाद में ही था ,
मेरे बड़े भाई की शादी थी
और ज़ीरो रोड की किसी धर्मशाला में रूकी थी बारात
जहाँ गई रात ,उसका चैकीदार मगन होकर केशव की
रामचंद्रिका का कोई पद गा रहा था
मँझले भाई आश्चर्य से भरे सुन रहे थे उसे ,
वो बी.ए. के छात्र थे
उनके लिये केशव कठिन काव्य के प्रेत थे ।
सुबह सुबह संगम पर जाने को हम दारागंज की गली के पास से गुजरे थे
किसी ने कहा भी था कि यही गली है जहाँ महाकवि रहते हैं
पिता ने दोनों हाथ जोड़कर उस दिशा में प्रणाम भी किया था
पता नहीं किसको !!
कई बरस बाद मुझे लगा कि वो प्रणाम महाकवि के लिये ही रहा होगा
लेकिन पिता ने अपने पिता को वचन दिया था
कि वो कभी कविता नहीं लिखेंगे ।
पिता इकलौते थे इसलिए उनके पिता दो बातों से डरते थे
कि बेटा स्वतन्त्रता आंदोलन में न शामिल हो जाये
और यह भी कि कहीं वह कवि न हो जाये
कवि हो जाना अच्छा नहीं माना जाता था उन दिनों
कामकाजी लोगों के समाज में !
मेरे पिता कविता नहीं लिखते थे
लेकिन किसी समय ,किसी शहर में लेखकों के किसी सम्मेलन में
उन्होंने ज्योतिष के अपने ज्ञान के लिये
निराला के हाथ का एक छापा किसी तरह ले लिया था
निराला के हाथ के छापे वाला काग़ज़ ,एक फाइल में
बहुत संभालकर रखा था पिता के पास
निराला के शताब्दी वर्ष में पिता ने वह अमानत सौंप दी थी
मुझे !
मैंने कोर्स की किताब में निराला की सिर्फ एक कविता पढ़ी थी -भिक्षुक
मैं विज्ञान का छात्र था पर कभी कभी तुकबंदी करके कविता भी लिख लेता था
पिता की तरह मैं किसी वचन से नहीं बँधा था
मैं लेकिन कवि नहीं चित्रकार होना चाहता था
शहर में लेकिन ऐसी कोई सुविधा नहीं थी !
दो ,तीन दिन बाद ही हम इलाहाबाद से लौट आये
हालांकि लौटते समय एक दुर्घटना होते होते बच गई
हमारी बस जमुना के पुल से टकरा गई थी ।
रास्ते के तरह तरह के किस्सों को लिये ,
हम वापस लौट आये
सारे किस्सों के बीच पर पता नहीं कैसे
मेरे दिमाग़ के किसी कोने में एक कील सी गड़ी रही
कि इतने पास से गुजरते हुए भी
मैंने निराला को नहीं देखा !
मैं जो देख सकता था ,
नहीं देख पाया की अजीब सी निराशा थी
मैं मिल सकता था,पर नहीं मिल पाया
रह रह कर यही बात मेरे मन को कौंचती थी
मैं भूल जाना चाहता था,भूल जाने के लिये कितना कुछ नहीं किया मैंने
पर इस वाक्य से पीछा नहीं छुड़ा पाता था
कि मैंने निराला को नहीं देखा
कि इतने करीब हो कर भी मैं महाकवि से नहीं मिल पाया !
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इस बात को बीते,बीत गये कई बरस !
कई बरस बाद मैं फिर इलाहाबाद गया
और कुछ लेखकों के साथ दारागंज में उस घर तक भी गया
जहाँ निराला रहते थे कभी
उस कमरे में एक तखत था और महाकवि की एक छड़ी टिकी हुई थी दीवार से
मैं बहुत देर तक उस कमरे को देखता रहा,सोचता रहा
इतने छोटे से कमरे में कैसे संभव हुई होगी इतनी बड़ी कविता
किस कोने में बैठ कर राम ने शक्ति की आराधना की होगी
क्या उस समय भी उसी तरफ़ थी शक्ति जिधर अन्याय था ?
मैं दोस्तों से बचता बचाता हर कोने में जा जा कर झांक रहा था
कि फिर कहीं कुछ अदेखा न रह जाये कि मैं निकल जाऊँ
और बाद में पता पड़े कि निराला तो वहीं थे
मैंने ही ढंग से नहीं देखा
लेकिन थक हार कर मैं निकल आया दोस्तों के साथ
और मैंने निराला को नहीं देखा !
कुछ ही दूर पर था रामकृष्ण जी का नया घर ,
हम सब उसी तरफ चल पड़े
रामकृष्ण जी याने निराला के अकेले पुत्र
और वो भी अब तक काफी बूढ़े हो चले थे
वो एक कुर्सी पर बैठे थे और उनके पीछे की खुली अलमारी में
निराला का एक उघाड़े बदन वाला फोटो रखा था मढ़ा हुआ
जब सब रामकृष्ण जी से बातें करने लगे
और रामकृष्ण जी भी यादों में गोता लगाते हुए जाने कहाँ निकल गये
मैं वहीं बैठा रहा तट पर जहाँ कुछ लोग
अपनी नाव बाँधने की कोशिश कर रहे थे
और कोई मना कर रहा था लगातार
कि अपनी नाव इस ठाँव मत बाँधो
मैं कुछ नहीं सुन रहा था
मैं सिर्फ रामकृष्ण जी को देख रहा था
मैं रामकृष्ण जी को देखता और फिर उनके पीछे रखे
निराला के फोटो को देखता
फोटो को देखता और फिर रामकृष्ण जी को देखता
कितना समय बीता मुझे नहीं पता
मैं रामकृष्ण जी में निराला को ढूंढ रहा था
प्रणाम करके वहाँ से निकलते हुए जाने क्यों लगा
कि मैंने कहीं बहुत दूर से देखा निराला को धुंध में जाते हुए
इस भ्रम में सच नहीं था,पर सच जैसा जो था,जितना था
मन को बिल्कुल सच लगता था !
उस आभासी सच से लेकिन निकल कर बाहर आना पड़ा मुझे
और एक बार फिर मैं निराला को बिना देखे चला आया !
कितना मुश्किल था अनदेखे को
बार बार देखने की लालसा का खेल !
उस अनदेखे को देखने के लिये
मैं कभी शमशेर की कविता में घुसता चला जाता
और कभी रामविलास शर्मा की साहित्य साधना में
कभी कुछ देखकर भी कुछ अनदेखा रह जाने का अहसास लिये
हर बार वापस लौट आता ।
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सत्तर के दशक में आपातकाल के आसपास के दिन थे
जब त्रिलोचन भोपाल आ गये
उनकी कोई बात बिना निराला और तुलसी के पूरी ही नहीं होती थी
वो निराला से निकल कर तुलसी के पास चले जाते और कभी
तुलसी से छूटकर निराला के पास चले जाते
निराला के बारे में उनके पास दर्जनों किस्से थे
कितना सच था उनमें और कितनी गप्प थी ,
कहना मुश्किल था
पर सच और गप्प से बने उन किस्सों में
एक सजीव निराला को देखने का सुख था
एक दिन जब मेरे कमरे में आसन जमाये त्रिलोचन सुना रहे थे
हिन्दी के सुमनों के प्रति वाली कविता और पंक्ति दर पंक्ति
समझाते जाते थे उसका अर्थ
मुझे लगा कि बस अब
बस अब .....बस अब ....
कुछ ही समय में अचानक निकल कर आयेंगे निराला
कहते हुए
कि मैं ही बसन्त का अग्रदूत........
पर ऐसा हुआ नहीं .......
पर हुआ सा लगा मुझे अचानक
सुनते सुनते मैं कहीं खो गया और त्रिलोचन
किसी ओर कविता की तरफ मुड़ गये.......
दूर से आती हुई आवाज़ में एक पंक्ति सुनाई दी मुझे....
मैं अलक्षित हूँ,यही कवि कह गया है.........
मैंने मन ही मन कहा-नहीं......
मैंने निराला को देखा
अनदेखे निराला को देखा !
निराला के हाथ का छापा मेरी टेबल पर रखे काँच के नीचे रखा था
पिता के खुशख़त में लिखा था जिसके नीचे निराला का पूरा नाम
सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला
पिता की और निराला की दोनों की ही स्मृतियाँ थीं उस काग़ज़ पर
मुझे ज्योतिष का न ज्ञान था ,न उसमें विश्वास
लेकिन फिर भी मैं हाथ के उस छापे में बनी लकीरों में
बार बार कुछ ढूंढता रहता था
क्या ढूंढता था मैं
मुझे खुद भी नहीं पता....... !!
26.8.22 से 9.1.23
(यह कविता पूर्व में 'प्रसंग 'के कविता अंक में प्रकाशित हो चुकी है । लेकिन प्रकाशित प्रारूप में कुछ छोटे -छोटे बदलाव मुझे ज़रूरी लग रहे थे,यह संशोधित प्रारूप है ।)
दाहिना हाथ
मेरा दाहिना हाथ सो गया है
सिर के नीचे उसे तकिया बनाकर मैं सो गया था
लगता है सिर के भीतर ताक झाँक करते
किसी सपने को देखते देखते
कहीं खो गया है
अभी दिनभर के कई काम निपटाने हैं मुझे
और यह है कि उठने का नाम ही नहीं ले रहा है
उठ पगले ! उठ
और याद रह गया हो कोई सपना
तो उठ,
उसको डायरी में लिख डाल !
फिर फुर्सत में कभी
सपने को बूझने का खेल खेलेंगे !
तुम ढूंढ लिये गये हो
मैंने छिपने की जितनी जगहें ढूंढी थीं
उन सारी जगहों को लेकिन तुम जान चुके हो
इसलिए अब एक ही विकल्प बचा है मेरे पास
कि मैं अपने ही भीतर कहीं जाकर छिप जाऊँ
यह बहुत कठिन भी नहीं
लेकिन मैं इन दिनों थोड़ा भुलक्कड़ हो गया हूँ
कोई भी चीज़ कहीं रख कर भूल जाता हूँ
और फिर ढूंढता फिरता हूँ उसे यहाँ वहाँ
लेकिन डर लगा मुझे
कि कहीं अपने भीतर,अपने को छिपा आऊँ
और भूल जाऊँ कि कहाँ छिपा कर आया हूँ
तो फिर कहाँ ढूंढता फिरूँगा मैं अपने आप को
सारी उम्र अपने आप को ही ढूंढते निकल जायेगी
तभी एक दूसरे विकल्प ने कुंडी खड़खड़ाई
कहा कि तुम ढूंढ लिये गये हो
और अब कहीं भी छिपना बेकार है
बेहतर है कि अब छिपना छोड़ दो
और छिपन छुपव्वल का यह खेल
खत्म करो !
नदी का नेग
गाँव जाते या गाँव से लौटते हुए
रास्ते में मिलती थी एक नदी
थोड़ी सी बरसात होते ही उफन जाती
और रास्ता रोक कर जैसे कहती
पहले नेग दो
फिर पार करने दूंगी पुल
मैं कहता यह पुल नहीं
सिर्फ रपटा है
अभी थोड़ी देर में उतर जायेगा पानी
पुल बन जायेगा तो रास्ता रोकने को
ज़्यादा ऊँची लहर की ज़रूरत पड़ेगी तुमको
कहाँ से लाओगी इतना पानी
कैसे रोक पाओगी हमारा रस्ता ?
एक दिन नदी पर पुल बन गया
फिर नदी ने कभी रास्ता नहीं रोका
कभी नेग नहीं माँगा
हम नदी से बतियाना ही भूल गये
फिर गाँव आते जाते कभी
नदी का नेग नहीं चुकाया ।
परछाईं
सूरज कहीं भी हो मेरे आगे या पीछे
मेरी परछाईं को हमेशा मुझसे
लम्बा कर देता है
मुझे यह कतई पसंद नहीं
कि मेरी परछाईं मुझसे लम्बी हो
बस सूरज जब सर पर आ जाता है
मेरी परछाईं मेरे पैरों के पास सिमट जाती है
पसंद तो मुझे यह भी नहीं
लेकिन इस खेल में यही एक जगह है
जहाँ मैं
अपनी परछाईं से जीत पाता हूँ ।
मेरे पुराने चेहरे के नुकूश
मैंने कहा रूको ज़रा
उसने कहा मैं रूक नहीं सकता
मैं तो हमेशा चलते रहने का श्राप ढो रहा हूँ
सात घोड़ों वाला वो करतब बाज,सात घोड़ों के बावज़ूद
एक ही जगह कदमताल करता रहता है हमेशा
वो ही मेरा मालिक है
और तुम जिस पृथ्वी पर खड़े हो
वो उसी के चारों ओर चक्कर लगा रही है
युगों से,बल्कि जब से पैदा हुई है तभी से ।
मैं एक चोर हूँ
मेरा बस एक ही काम है
मैं जड़ और चेतन दोनों की उमर को
चुराता रहता हूँ लगातार ।
मेरे चलने से उड़ती धूल से अटी हुई हैं
कई सभ्याताएँ,शहर,गलियाँ,सड़कें
और न जाने कितनी ही चीज़ें
बीच बीच में लोग आते रहते हैं
मिट्टी को कुरेद कुरेद कर हटाते रहते हैं
खोजते रहते हैं मिट्टी के नीचे दबे
अपने अतीत को
उन चीज़ों में ढूंढते रहते हैं वो
मेरे पुराने चेहरे के नुकूश !!
चुप कोई नहीं है
इस समय जो भी बोल रहा है उसे गलतफहमी है
कि बस वो ही बोल रहा है
और बाकी सब चुप हैं
चुप लेकिन कोई नहीं है
अपनी सामर्थ्य में ,अपनी अपनी जगह ,
सब बोल रहे हैं लगातार !
सब बोल रहे
लेकिन लोगों की बात दूसरों तक पहुँचे
इससे पहले ही आवाज़ के सारे पुल
तोड़ दिये गये हैं ।
इतना झूठ , इतना झूठ ,इतनी बार
बोला जा रहा है
कि वो लगभग सच जैसा लगने लगे
हालांकि लोग उस पर यक़ीन नहीं करते
लेकिन जब तक लोग झूठ को झूठ कहें
एक और झूठ उनके बीच दाग दिया जाता है ।
लोगों ! प्यारे लोगों !!
अपने लोगों पर यक़ीन करो
चुप कोई नहीं है
इतने कायर नहीं हुए हैं लोग
कि किसी भी ताकत की गीदड़ घुड़की से डर जायें
लोग गुस्से से भरे हैं
लेकिन गुस्से के बाहर आने के सारे दरवाजें
बन्द हैं !
सड़कें दरक गई हैं
पुल धसक गये हैं
सट्टा बाज़ार में इतना शोर है
कि किसी की आवाज़ किसी तक नहीं पहुँच रही !!
समय और सच
समय का सच लिखना आसान नहीं था
कई तथ्य और विवरण खड़े थे
रास्ता रोक कर
कहा उन ने
‘ तुम नहीं लिख सकते हमारे बिना
इस समय का सच ‘
कोशिश भी करोगे
तो निर्गुण हो जायेगा समय
और सच
हो जायेगा अमूर्त !!
( नामवर जी का व्याख्यान सुनते हुए )
एक प्रेम कविता की तलाश में
मैं कई दिनों से भूखा प्यासा
प्रेमिका के घर की आड़ी तिरछी गलियों में भटक रहा हूँ
लेकिन उसका घर है कि कहीं मिल ही नहीं रहा
जानता हूँ प्रेम कविता का
यह मुहावरा बहुत बासी हो चुका है
लेकिन क्या करूँ मेरे दायें पाँव का घुटना
उमर के साथ साथ बहुत दर्द करने लगा है
मैं हड्डी रोग के विशेषज्ञ के पास गया था
हम सहपाठी थे बचपन के
और वो मेरी फितरत से अच्छी तरह वाकिफ़ था
उसने बिना किसी संदर्भ के कहा
कि दक्षिणपंथी राजनीति के पागलपन और क्रूरता का
तुम्हारे घुटने की तकलीफ़ से
कोई ताल्लूक नहीं है !
दुनिया के अनेक मुल्कों में जब से
दक्षिणपंथी राजनीति का दबदबा बढ़ा है
सोशल मीडिया पर घुटने के दर्द की दवाओं
और तरह तरह के तेलों का विज्ञापन बढ़ गया है
कैसी विडम्बना है !!
मैंने मन ही मन कहा
प्रेम कविता में जब चाँद ,नदी ,समुद्र या परिन्दों को
आना चाहिये था
और पथ को प्रेमिका के घर के द्वार की तरफ
मुड़ जाना चाहिये था
मुझे कैसी उटपटांग सलाहें दी जा रही हैं
क्या हालत हो गई है इस मुल्क की
कि एक कवि के लिये ढंग की एक प्रेम कविता लिखना भी
मुमकिन नहीं रहा !!
आवारा कुत्तों का आतंक
सड़क पर आवारा कुत्तों का आतंक बढ़ गया है
मैंने नगर निगम के स्ट्रीट डाॅग पकड़ने वाले
विभाग के अधिकारी से कहा
अधिकारी थोड़ा मजाकिया व्यक्ति था ,बोला
कमाल है साहब ! अर्थशास्त्री तो कह रहे हैं
कि हमारी पूंजी आवारा हो गयी है
और आपको आवारा कुत्तों की पड़ी है !
मैंने कहा लेकिन जनाब !
कुत्ते हर आते जाते आदमी पर गुर्राते हैं
यहाँ तक कि कभी कभी तो काटने को झपटते हैं
अधिकारी फिर मुस्कुराया ,बोला
शक्ति की हर संरचना गुर्राहट से भरी है
सड़क छाप नेता तक गुर्रा रहे हैं
सड़क के कुत्तों को भी थोड़ा तो हक़ है
इस लोकतन्त्र में गुर्राने का !
तो लोग क्या करें ?
अपनी खीज को दबाते हुए मैंने कहा
अरे वो ही , उसने सहजता से कहा ,
जो हमेशा से लोग करते आये है
पागल और आवारा कुत्तों के साथ
यह भी कोई पूछने की बात है !!
टूटना
पेड़ से पत्ते का टूटना दिखता है
शीशे के टूटने की आवाज़
होती है
धरती पर इस समय सबसे ज़्यादा
टूट रहे हैं सम्बंध
जिनकी कोई आवाज़ नहीं !
अब तुम उड़ सकते हो....
पूरे तेरह दिन बाद मैं अस्पताल के उस विशाल तिलिस्म से
बाहर आया
छुट्टी देते हुए मुझे , डाक्टर ने कहा:
नाउ यू आर फिट टू फ्लाई .......अब तुम उड़ सकते हो
मेरी बाँछें खिल गयीं
लेकिन जैसे ही मैंने अपने पंख खोले
अपनी काॅलर बोन के पास दिखा मुझे एक चीरे का निशान
वहाँ एक छोटा सा यंत्र फिट था मेरी चमड़ी के नीचे
डाक्टर ने कहा: यह तुम्हारी धड़कनों को नियन्त्रित रखेगा
एक सीमा के बाद न यह उनको बढ़ने देगा ना कम होने देगा !
उड़ने की यह कैसी स्वतन्त्रता थी ?
जिसमें एक यंत्र लगातार मुझ पर नियंत्रण रखे था
मुझे लगा , मेरे पंख बाँध कर जैसे कोई मुझसे कह रहा है
अब तुम उड़ सकते हो ,तुम उड़ने के लिये स्वतंत्र हो
उड़ो ........
मुल्क के सबसे अच्छे अस्पताल से तुम्हें छुट्टी दे दी गयी
ऊपर नीचे होने वाले पलंगों से मैं नीचे उतर आया
मेरे हाथों में बने केन्यूला की मोटी सूई और पट्टियों को
खींच खींच कर निकाल दिया गया
थमा दिया गया अस्पताल छोड़ने का प्रमाण पत्र
अपने अपने काम पर चले गये सारे डाक्टर,
चले गये नर्सें ,वार्डब्वाय और तीमारदारी में लगे तमाम लोग
उड़ान भरने के लिये मुक्त कर दिया गया मुझे
डाक्टर ने हँसते हुए कहा....... अब तुम उड़ सकते हो
पंख खोलो और उड़ जाओ
मैं बाहर जाने की इतनी हड़बड़ी में था
कि मैंने डाक्टर की हँसी पर ध्यान ही नहीं दिया
उस हँसी के पीछे छिपा था जो नहीं कहा गया
कि अब उड़ो बच्चू .......हमारे नियन्त्रण में रहेगी अब
तुम्हारी हर एक उड़ान .....!
यह कैसा तिलिस्म था
बाहर निकलने की हर कोशिश के बावज़ूद
मैं बाहर नहीं जा पा रहा था
मैं जिस दरवाजे से बाहर निकला
वह दरवाजा समय के एक दूसरे गलियारे में खुलता था
मैं लगातार गलियारों से गलियारों में भटक रहा था
उड़ने के लिये ऊपर देखता तो आसमान की जगह
हर बार छत से टकरा जाती थी मेरी निगाह
कहीं कोई दरवाजा नहीं था , कोई खिड़की नहीं थी
मैं कहाँ से बाहर निकलता
मैं भरना चाहता था लम्बी उड़ान
लेकिन एक भयावह दुःस्वप्न ने बाज़ की तरह
उड़ने से पहले ही दबोच लिया मुझे
लाखों लोगों की देह में घुस चुका था एक वायरस
और देश का हर जोड़ दुख रहा था
कराह में बदल गयी थी हवा
वहाँ कोई डाक्टर नहीं था जो लोगों को
बाहर जाने का प्रमाण पत्र देता , जो कहता
कि अब तुम उड़ सकते हो .......
मैं चीख रहा था
प्यारे देश मैं तुम्हारे लिये कुछ नहीं कर सकता
समय के इस गलियारे में भटकते हुए न तुम
बाहर निकल पा रहे हो न मैं
दर्द से टीसते हुए हमारे जोड़ों की कोई दवा नहीं ,
कोई इलाज नहीं
हमारा कोई चारःसाज़ नहीं , कोई ग़मगुसार नहीं
किसी भी दिलासा का लगता है कोई अर्थ नहीं
मैंने चिल्ला कर कहा ......
मुझे उड़ने के लिये मेरा आकाश दो
समय के इस गलियारे से , इस अस्पताल से
बाहर जाने का रास्ता बताओ .......
मुझे रास्ता बताओ
मैं और मेरा देश समय के आड़े तिरछे इस गलियारे से
बाहर जाना चाहते हैं !
मेरी धड़कनों में धड़कते देश को कब तक नियन्त्रण में रख पायेगा
तुम्हारा यह छोटा सा पेस मेकर !!
राजेश जोशी
18 जुलाई, 1946 को नरसिंहगढ़, मध्य प्रदेश में जन्म।
प्रकाशित कृतियाँ : ‘समरगाथा’ (लम्बी कविता); ‘एक दिन बोलेंगे पेड़’, ‘मिट्टी का चेहरा’, ‘धूपघड़ी’ (दोनों संग्रहों का संयुक्त संग्रह), ‘नेपथ्य में हँसी’, ‘दो पंक्तियों के बीच’, ‘चाँद की वर्तनी’, ‘जि़द’, 'उल्लंघन' ,‘गेंद निराली मीठू की’ (बच्चों के लिए), ‘प्रतिनिधि कविताएँ’, ‘कवि ने कहा’ (कविता-संग्रह); ‘सोमवार और अन्य कहानियाँ’, ‘कपिल का पेड़’, ‘मेरी चुनी हुई कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह); ‘क़िस्सा-कोताह’ (आख्यान); ‘जादू जंगल’, ‘अच्छे आदमी’, ‘पाँसे’ और ‘सपना मेरा यही सखी’, ‘ब्रह्मराक्षस का नाई’ (बच्चों के लिए) (नाटक); ‘हमें जवाब चाहिए’ (नुक्कड़ नाटक); ‘पतलून पहिना बादल’ (अब ‘ब्लादीमिर मायकोव्स्की की कविताएँ’ शीर्षक से प्रकाशित), भर्तृहरि की कविताओं की अनुरचना : ‘भूमि का यह कल्पतरु’ (अनुवाद); ‘एक कवि की नोटबुक’, ‘एक कवि की दूसरी नोटबुक : समकालीनता और साहित्य’ (आलोचनात्मक टिप्पणियाँ और नोटबुक), ‘कविता का शहर : एक कवि की नोटबुक’ (भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में कविता और शहर के सम्बन्ध पर लिखा गया मोनोग्राफ़)।
कविताएँ अनेक भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनूदित।
सम्पादन : ‘इसलिए’ (प्रकाशन-सम्पादन, 1977-83), ‘नया पथ’ के निराला शताब्दी अंक के साथ पाँच अंक, ‘वर्तमान साहित्य’ का कविता विशेषांक (1992), त्रिलोचन के कविता-संग्रह ‘ताप के ताए हुए दिन’ (1980), ‘नागार्जुन संचयन’ (साहित्य अकादेमी, 2005), ‘मुक्तिबोध संचयन’ (भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, 2015)।
पुरस्कार : ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’, ‘श्रीकान्त वर्मा स्मृति सम्मान’, ‘पहल सम्मान’, ‘शमशेर सम्मान’, ‘मुक्तिबोध पुरस्कार’, ‘माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार’, ’शिखर सम्मान’, ‘मुकुटबिहारी सरोज स्मृति सम्मान’, ‘निराला स्मृति सम्मान’, ‘कैफ़ी आज़मी अवार्ड’, ‘प्रो. आफ़ाक़ अहमद स्मृति अवार्ड’, ‘जनकवि नागार्जुन स्मृति सम्मान’, ‘शशिभूषण स्मृति नाट्य सम्मान’ आदि।
ईमेल : rajesh.isliye@gmail.com
"आप कविता के नाम पर कुछ भी नहीं लिख सकते"
राजेश जोशी से अजय महताब की बातचीत
अजय महताब :- आप लंबे समय से भोपाल जैसे शहर में रह रहे हैं । भोपाल अपना एक सांस्कृतिक महत्व ज़रूर रखता है मगर एक आधुनिक शहर में रहकर कविता के संवेदनात्मक पक्ष को जिलाए रखना कितना चुनौतिपूर्ण रहा ?
राजेश जोशी :- अब यही तो परेशानी है कि लोग केवल उत्तराखण्ड के साथियों को ही पहाड़ी मानते हैं। मंगलेश डबराल पहाड़ी कहलाते हैं जबकि हम भी पहाड़ी हैं। हमारा इलाका विंध्याचल की पहाड़ियां हैं । नरसिंहगढ़ का पूरा इलाका विंध्य की पहाड़ियों से घिरा हुआ है । हमारा बचपन पहाड़ों में बीता । ‘एक दिन बोलेंगे पेड़’ में जो पहाड़ शीर्षक कविता है वह उन्हीं अनुभवों का प्रस्तुतिकरण है । आगे भी ‘उल्लंघन’ में ‘इसलिए तो तुम पहाड़ हो’ कविता उन्हीं अनुभवों का विस्तार है । जहां तक इलाके का सवाल है तो भोपाल मैदानी है मगर उतना ही मैदानी नहीं है । इसकी अपनी सुंदरता है । ये दिल्ली जैसा तो बिल्कुल भी नहीं है । ये शहर किसी को अपनी विशालता से डराता नहीं है,संवेदनाओं को मारता नहीं है । यहां रचनात्मकता के लिए स्पेस होता है ।
अजय महताब :- आपके लेखन की शुरुआत कब हुई ? उस समय की परिस्थितियों को आप किस तरह पूर्व की परिस्थितियों से अलगाते हैं ? क्या विशेषता थी आपके दौर की कविताओं में ? अस्सी के दशक की कविताएं पूर्ववर्ती कविताओं से अलग नज़र आती हैं ?
राजेश जोशी :- हमने 1972-73 के आस-पास लिखना शुरू किया । जिस समय की आप बात कर रहे हैं उस समय देखा गया कि कविताओं में पहले के मुकाबले काफी सारे परिवर्तन आए हैं । सबसे बड़ा परिवर्तन यह था कि इससे पहले की जो कविता थी यानि कि जो नक्सलबाड़ी आंदोलन से प्रभावित कविताएं आ रही थीं। मतलब 1972 के बाद की कविताएं उसमें ये दिखता है कि कविता किस ज़मीन से उठ रही है। किस ज़मीन की यह कविता है और कवि कहां,किस ज़मीन से बिलोंग करता है मतलब स्थानीयता नज़र आती है।दूसरा उसमें उस तरह की आक्रामकता नहीं थी,जैसा उसके पहले की कविताओं में दिखाई देती थी । एक अर्थ में कहा जा सकता है कि ये कविता मतलब 73-74 के आस-पास जो कविता आ रही थी इसके पद होरिजेंटल एक्सिस यानि क्षैतिज धरातल के पद थे, ऊर्ध्व अक्षीय पद नहीं थे जैसे नई कविता में ऊंचाई-गहराई, इस तरह के पद मिलते हैं । इसलिए इसमें ऐसा पहली बार हुआ कि नायकों की जगह चरित्रों का आना शुरू हुआ । इसमें नायक नहीं थे । जैसे, धूमिल की कविता में मोचीराम है, पटकथा में हिंदुस्तान है । इसके बनिस्बत, यहां उस तरह का नायक नहीं जो ऊंचाई से बोलता है,किसी को संबोधित करता है । इसके चरित्र हमारे आस-पास के थे।और जो सबसे खास बात यह थी कि इसने आम बोलचाल की भाषा को अपना आधार बनाया । तो उस तरह अगर देखें तो यह कविता पहले की सारी कविताओं से ज़्यादा जनतांत्रिक थी ।
अजय महताब :- तो क्या आपको और आपके समकालीन कवियों को ऐसा लगा कि उस वक्त की कविता अपनी जनतांत्रिकता खो रही थी ?
राजेश जोशी :- नहीं ! मूल्य के स्तर पर तो हिन्दी की कविता हमेशा जनतांत्रिक ही रही । कविता तो जनतांत्रिक मूल्यों की ही कविता है मगर मूल्यगत आधार पर जनतांत्रिक होना और व्यवहार के आधार पर जनतांत्रिक होना दोनों दो बातें हैं। इसलिए हम नई कविता तक आते-आते भी देखते हैं कि गद्य की भाषा कुछ और है और कविता की कुछ और । कविता की भाषा थोड़ी विशिष्ट है मतलब एलिट या अभिजात है जो तत्सम शब्दों से भरी है मगर गद्य की भाषा तो प्रेमचंद की भाषा है जो सामान्य जीवन है और आम जनता की भाषा है ।
अजय महताब :- तो ये फर्क यहां मिटा ?
राजेश जोशी :- ये फर्क तो प्रगतिवाद में ही मिटना शुरू हो जाता है मगर फिर भी कुछ मिटना शेष रह जाता है । प्रगतिवाद में भी अगर आप नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं को देखें तो वहां भी काफी सीधी-सादी बोलचाल की भाषा काफी हद तक मिल जाती है मगर वहां भी कहीं-कहीं तत्सम बना रहता है । पहली बार ऐसा लग रहा था कि मूल्यगत आधार पर ही नहीं बल्कि व्यवहार के आधार पर भी कविता जनतांत्रिक हो रही थी । यानि अपनी भाषा में, अपने शिल्प में यानि तमाम अपने जीवन के बिल्कुल जो क्षितिज धरातल है उसमें आस-पास के लोग, आस-पास के दृश्य थे । उसमें कहीं कोई नायक नहीं था बल्कि चरित्र आ रहे थे, बिल्कुल साधारण चरित्र । तो ये अंतर कहीं-न-कहीं उससे पहले की कविताओं से इन कविताओं में था ।
अजय महताब :- छोटे-छोटे बिम्ब,छोटे विषयों को शीर्षक बनाकर कविताएं लिखने का विचार कहां से आया ? कविताओं को पढ़कर ऐसा लगता है कि ये उपेक्षित वस्तुएं थीं जिनको कविताओं ने स्थान दिया ?
राजेश जोशी :- इसमें कहा ये जाना चाहिए कि एक बड़ा काम इस दौर की कविताओं में हुआ ।छूटी हुई चीजें समेटने की कोशिश हुई। इसके पहले की कविताओं ने प्रगतिवाद को लगभग किनारे कर दिया था । नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल वगैरह सब किनारे हो गए थे । नयी कविता या उसके बाद भी, यहां तक कि नक्सलबाड़ी आंदोलन के समय की कविताओं में भी मुक्तिबोध का नाम तो सुनाई देता है मगर नागार्जुन वगैरह का उस तरह से महत्व नहीं होता । इस कविता ने पुनः प्रगतिवाद को स्थापित करने की कोशिश की और इसलिए कहीं-न-कहीं इसने उस कविता से अपने संबंध जोड़ने की कोशिश की पर इसमें और उसमें यह अंतर आया कि यदि प्रगतिवाद की कविता को आप देखेंगे तो उसमें एक पद मिलेगा- “देखा है” । जैसे- “बादल को घिरते देखा है”, “मैंने जीवन देखा है” वगैरह । तो वो जो देखना होता है वह जीवन से थोड़ा दूर होता है । मगर ये वाली कविता एक तरह से शामिल आदमी की कविता है । मतलब प्रगतिवाद से संबंध बनाते हुए भी ये उससे थोड़ी आगे की कविता है ।
अजय महताब :- तो क्या हम यह मान सकते हैं कि दूर से देखने पर जीवन से जुड़ी कई चीजें उपेक्षित रह जाती हैं जिनको कि इस कविता ने उठाया और प्रयोग में लाया ?
राजेश जोशी :- वो सारी उपेक्षित चीज़ें तो इस कविता में आईं क्योंकि ये तो शामिल आदमी की कविता थी । इसलिए इसमें जो आस-पास का जीवन था वो इसमें आ रहा था । ये देखना वाली कविता नहीं थी ।ये तो शामिल आदमी की कविता थी इसलिए उसके लिए सारी चीज़ें आस-पास थीं । सारे साधारण लोग आस-पास थे,सारे साधारण दृश्य आस-पास थे ।इसलिए इसमें बहुत छोटी-छोटी चीज़ें आती हैं, साधारण चरित्र आते हैं,दृश्य आते हैं । जैसे अरुण कमल “कल्याणी” कविता में कहते हैं- “उसके लिए नल लगा दो, क्योंकि वह गर्भवती स्त्री है ।” इस तरह के बहुत सारे साधारण दृश्य इन कविताओं में आपको दिखाई दे जाएंगे जो जीवन के दृश्य हैं । तो यह एक अंतर है ।
अजय महताब :- अशोक वाजपेयी ने 80 के दशक को “कविता की वापसी” का दशक कहा है तो यह वापसी किस तरह से हुई जबकि आप कहते हैं कि मूल्यगत और व्यवहारिक दोनों ही स्तर पर कविता हमेशा ही जनतांत्रिक मूल्यों पर खरी उतरती रही तो कविता फिर गई कहां थी जो उसकी वापसी की ज़रूरत पड़ी । इस वापसी को जरा समझाएं ।
राजेश जोशी :- पता नहीं अशोक जी ने क्या सोचकर वापसी शब्द का प्रयोग किया यह मैं नहीं जानता मगर मैं इससे पूरी तरह सहमत नहीं हो पाता हूं । वापसी नहीं हो रही थी दरअसल बुनियादी रूप से कई चीज़ें जो कविता में छोड़ दी गई थीं,जिनको नहीं छूआ गया था, उनको छूने की कोशिश की जा रही थी । और कविता को अधिक जनतांत्रिक बनाने की कोशिश की जा रही थी । जब बदली तो सारे कवियों की कविताओं में बहुत परिवर्तन दिखाई पड़ा……
अजय महताब :- परिवर्तन तो अशोक जी की कविताओं में भी दिखाई पड़े । उनकी 80 के पहले की कविताएं तथा 80 के बाद की कविताओं में शिल्पगत तथा विषयगत दोनों तरह के खासे परिवर्तन परिलक्षित होते हैं ।
राजेश जोशी :- ना सिर्फ उनमें बल्कि बहुत सारे लोगों में, जो लिख रहे थे । 80 के बाद उन सबकी कविताएं बदलीं । 80 के बाद का जो पूरा परिदृश्य है उसमें ऐसा नहीं था कि केवल हमीं लोग कुछ ऐसा कर रहे थे बल्कि सबकी कविताओं में घर परिवार,जीवन के दृश्य मिल जाएंगे । इसका असर यह हुआ कि जब कविता बदली तो सारे कवि उसमें बदले । शुरू-शुरू में कुछ लोगों को ऐसा लगा और कुछ ने आरोप लगाए कि ये कविताएं बहुत मुलायम हैं और ये क्रांति की धार को कम करने की कोशिश कर रही हैं पर ऐसा नहीं था क्योंकि जब तक जीवन को जानेंगे नहीं तब तक क्रांति कैसे करेंगे क्योंकि क्रांति तो जीवन से जुड़ने,उससे संबंध बनाने से होती है ।
अजय महताब :- जीवन को जानना मतलब जड़ों को जानना और शायद अपनी ज़मीन की ओर लौटना होता है । ज़मीन से बात स्थानीयता पर चली आएगी । आपने शुरुआत में भी स्थानीयता की चर्चा की मगर मेरे मन में फिर एक सवाल आता है कि एक कवि के लिए स्थानीयता का कितना महत्व होता है ?
राजेश जोशी :- मुझे कई बार ऐसा लगता है । हालांकि पता नहीं यह कहना शायद अतिशयोक्ति होगी कि पहले की कविताओं और यहां तक कि नक्सलबाड़ी आंदोलन के बाद की कविताओं को अगर देखें तो यह पता नहीं चलता कि कवि किस ज़मीन से खड़ा होकर बात कर रहा है । मतलब यही पता नहीं चलता है । तो इस कविता ने कवि को स्थानीयता से जोड़ दिया । और स्थानीयता कवि के लिए इतनी महत्वपूर्ण है कि स्थानीय हुए बगैर आप यूनिवर्सल नहीं हो सकते । यानि यदि आपके पांव ज़मीन पर नहीं है तो फिर आपका सर भी कहीं नहीं है । आपके पांव तो ठोस ज़मीन पर होने चाहिए ना । हवा में तो कुछ हो नहीं सकता ना ! स्थानीयता आपकी पहचान है । स्थानीयता इस अर्थ में भी आवश्यक है कि आप स्थानीय होकर ही ग्लोबल हो सकते हैं ।
अजय महताब :- अब तक हिंदी कविता ने अपनी विकास यात्रा में कई दशकों का सफर तय किया है । यदि हम प्रस्थान बिंदु के रूप में छायावाद को लें तो छायावाद से होकर प्रगतिवाद, प्रयोगवाद,नयी कविता,साठोत्तरी कविता,अकविता से होकर समकालीन कविता के सफर का इतिहास हमारे सामने है । इतनी प्रवृत्तियां, इतने आंदोलन, इतने सारे नामकरण । अभी भी नब्बे के दशक का विमर्श लौंग नाइंटीज के नाम से चला । क्या लगता है, समकालीन कविता से बदलकर फिर कोई नामकरण होगा या वर्तमान कविता समकालीन के नाम से ही आगे के दशकों में भी जानी जाती रहेगी ?
राजेश जोशी :- नामकरण का तो ऐसा संकट है कि इतने नामकरण हो चुके हैं आंदोलनों के पहले से ही कि साठोत्तरी कविता के समय से ही कहा जाने लगा था कि यह कोई नामकरण नहीं है यह एक समय को सूचित करता है । फिर आठवां दशक यानि 70 से 80 के बीच, फिर नौंवा दशक फिर लौंग नाइंटीज की हम बात करने लगे पर कविता ऐसे होती नहीं। जब भी समाज में बड़े परिवर्तन होंगे कविता बदलेगी । जैसे 90 के बाद जब नई तकनीक आई, सोवियत रुस का विघटन हुआ तो पूरी दुनिया प्रभावित हुई । जिस क्रांति से पूरी दुनिया मतलब हमें ताकत मिली थी वह क्रांति विफल हो गई । यह पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा परिवर्तन था ।
एक तो यह बड़ी घटना हुई फिर दूसरी चीज़ है कि पूरी टेक्नोलॉजी बदल गई । तो बहुत तेज़ गति की चीज़ें आईं । बहुत तेज़ी से परिवर्तन हुए । अब जैसे मोबाइल फ़ोन का आना हो या घरों में कंप्यूटर का लगना या फिर प्लास्टिक मनी मतलब कार्ड का आना या फिर बिल गेट्स का विंडो आना ये बहुत बड़े पैमाने पर परिवर्तन थे । तो हमको यह देखना चाहिए कि 90 के बाद जो कविताएं हैं उनमें कुछ चीज़ें पहले की कविताओं से अलग हैं । हालांकि वो इतनी स्पष्ट दिख नहीं रही हैं मगर वो नज़र आएंगी । जो स्पष्ट दिख रही हैं वो हैं कि पहली बार ऐसा हुआ कि जो स्वर दब कर रह गए थे कविता में वो उभरकर सामने आए । जैसे खास तौर पर दलित स्वर और स्त्री कविता के स्वर, आदिवासी आवाज़ों का उभार । ये ऐसी आवाज़ें हैं जो 90 के पहले की कविताओं में दिखाई नहीं देती थीं । यानि स्त्री कवि कम होती थीं मगर आज स्त्री-विमर्श एक बड़ा विमर्श है । आज पुरुषों के साथ लिखने वाली लेखिकाओं की संख्या काफी ज़्यादा है । तो ये हुआ और साथ-साथ दलित-विमर्श भी आया । मराठी वगैरह में दलित-विमर्श पहले ही हो गया था मगर हिंदी में बाद में बाद में आया ।
अजय महताब :- अच्छा ! दलित-विमर्श से याद आया दादा , ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता ‘ठाकुर का कुआं’ भी तो शायद 90 के समय ही लिखी गई थी । क्या वह कविता दलित-विमर्श की प्रमुख कविता मानी जा सकती है ?
राजेश जोशी :- निश्चय ही ! ओमप्रकाश वाल्मीकि कहानीकार के साथ अच्छे कवि भी थे । उनकी कहानियों और कविताओं के साथ उनकी आत्मकथा भी महत्वपूर्ण काम है । इनके साथ और भी बहुत सारे लोग आए । तुलसी राम आए । उनकी आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ बहुत बहुत महत्वपूर्ण काम है । इनसे हमें समाज की अंदरूनी स्थितियों का पता चलता है ।
अजय महताब :- इक्कीसवीं सदी का तीसरा दशक चल रहा है । इस बीच जो कविताएं आ रही हैं उन्हें देखकर या पढ़कर क्या लगता है ? अपनी पूर्ववर्ती कविताओं की तुलना में गुणात्मक रूप से ये कविताएं कितनी समृद्ध हुई हैं या आशाओं पर कितनी खरी उतर रही हैं ?
राजेश जोशी:- अचानक बड़ा भारी संकट खड़ा हो गया है। लघु पत्रिकाएं एकदम से बहुत कम हो गईं ।लेखक संगठनों के जो आंदोलन थे सोवियत संघ के विघटन के बाद कहीं-न-कहीं थोड़े कमज़ोर और शिथिल पड़े । तो बहुत सीधे तौर पर हम परिस्थितियों को सीधे-सीधे रेखांकित नहीं कर पा रहे हैं । जो चेंजेज हुए हैं वो कहां तक सही हैं, कहां उनमें गड़बड़ियां हैं, विचारधारात्मक रुप से वे कितनी सही हैं, कहां तक उनकी प्रतिबद्धता है हम अभी भी इसपे बात नहीं कर पा रहे हैं जोकि करना चाहिए । इक्कीसवीं सदी में जो कविता आ रही है या 90 के बाद जो कविता आई है , उसमें जो परिवर्तन आए हैं उसको लेकर एक अच्छे-खासे क्रिटिकल मतलब आलोचनात्मक संवाद की ज़रूरत है । बल्कि मैं तो कहूंगा कि आलोचनात्मक संवाद की आवश्यकता है क्योंकि जब बहुत सारे परिवर्तन होते हैं तो अच्छी चीज़ों के साथ बहुत सारा औसत भी आता है । वो आएगा ही क्योंकि वो हुआ है कि फेसबुक आ गया है और इसमें बहुत सारी चीज़ें आ रही हैं। फेसबुक पर जो चाहता है अपनी कविता डाल देता है और बहुत सारे लाइक इट हो जाते हैं । कोई संपादक नहीं, कोई आलोचक नहीं है जो उसको देखें कि भाई साहब ये क्या है, किस तरह की कविता है, कहां से आ रही है ! तो ये एक अराजक स्थिति है ।
अजय महताब :- अच्छा ! कुछ लोगों का मानना है कि ये जनतांत्रिक स्पेस है और मित्र लगातार अपनी कविताएं फेसबुक पर उड़ेले जा रहे हैं । कुछ फेसबुक मित्र तो हर रोज़ एक नई कविता या ग़ज़ल या गीत डाल देते हैं । आख़िर रचना प्रक्रिया जैसी भी तो कोई चीज़ है । अच्छा हुआ दादा ! आपने ये चर्चा इसी वक्त छेड़ी । यही मेरा अगला सवाल था कि इस तरह की रचनात्मकता को आप किस तरह देखते हैं ?
राजेश जोशी :- हां ! कुछ लोगों का मानना है कि फेसबुक एक डेमोक्रेटिक स्पेस है । ये सबके लिए है मगर मेरा मानना है कि ये एक अराजक स्पेस है । इसमें कोई भी, मतलब कुछ भी डाल सकता है । साहित्य का तो एक अनुशासन होता है ना । मतलब जैसे फिजिक्स का अनुशासन है, केमिस्ट्री का अनुशासन है वैसे ही लिटरेचर यानि साहित्य का भी तो एक अनुशासन है ना । तो उस डिसिप्लिन में आपको ये छूट नहीं दी जा सकती कि कुछ भी करते रहें । आप कविता के नाम पर यानि कुछ भी नहीं लिख सकते, नहीं डाल सकते । साहित्य के डिसिप्लिन में हमेशा एक क्रिटिकल इन्क्वायरी की ज़रूरत रहती है ।
अजय महताब :- जिस वक्त आपलोग लिख रहे थे और जैसा कि आपने पहले भी बताया है कि उस वक्त छपने का संकट था । पत्रिकाएं कम थीं, प्रकाशक कम थे । अभी तो मतलब छोटे-बड़े इतने प्रकाशक हो गए हैं, पत्रिकाएं हो गई हैं कि छपने का संकट अब रहा नहीं । क्या ये एक कारण है या यही कारण है कि लोग कविताओं पर उतनी मेहनत नहीं कर रहे जितनी आपलोग करते थे ?
राजेश जोशी :- नहीं ऐसे कवि तो हमेशा से रहेंगे, काफी होंगे । उस वक्त भी रहे थे मगर उस वक्त आलोचक सतर्क थे, पत्रिकाओं के संपादक सतर्क थे, छापने वाले सतर्क थे तो चीज़ें छनकर आती थीं कि क्या उसमें से अच्छा है,क्या उसमें से सार्थक है और क्या नहीं है । तो ऐसी उस दौर में गुंजाइश बनी रहती थी मगर यहां प्रॉब्लम ये हो रहा है कि इन सब चीजों को चेक करने वाला,इनपर निगाह रखनेवाला वो ही खत्म हो गया । अब जो चाहता है,अपनी किताब छपवा सकता है नहीं तो फेसबुक है ही । तो इससे आलोचना का बहुत ज़्यादा नुकसान हुआ है । आलोचना में बहुत ज़्यादा कमी आई है । तो आलोचना में कमी और संपादकों की कमी ने हमारे लिए ये संकट पैदा किया है कि हम जो बहुत सारा काम हो रहा है उनमें से बेहतर,उनमें से श्रेष्ठ को छांट सकें । ये जो बेहतर को छांटने का काम होता था हर समय वो इस समय हो नहीं पा रहा है । बहुत सारे रेखांकित होते थे, अब भी हो रहे हैं मगर वो काम ठीक से नहीं हो पा रहा ।
अजय महताब :- जब मुक्तिबोध का समय था, जिस वक्त वो लिख रहे थे । एक आक्रोश नज़र आता था । कई बार कविता चीख पड़ती थी । एक बेचैनी,एक आक्रोश का कुछ ऐसा माहौल बना था कि उस बेचैनी और छटपटाहट से धूमिल भाषा पर संयम नहीं रख पा रहे थे । 2014 के बाद स्थितियों में कितनी गिरावट आईं, कितनी विसंगतियों का सामना समाज कर रहा है । तो उस तरह की छटपटाहट और बेचैनी अभी की कविताओं में दिखती हैं कि नहीं ? यदि दिखती भी हैं तो किस तरह ?
राजेश जोशी :- मैं नहीं मानता कि वो बेचैनी और छटपटाहट नहीं है । आपको बहुत सारे कवि ऐसे मिल जाएंगे जिनमें वो गुस्सा,वो आक्रोश आपको दिखेगा लेकिन असल समस्या ये है कि हम उन्हें रेखांकित नहीं कर पा रहे । अभी कुछ समय पहले बच्चा लाल उन्मेष की बड़ी अच्छी कविता आई थी व्यवस्था पर, आक्रोश से भरी हुई ,जिसमें वह चुनाव के समय नेताओं के हथकंडों की बात कह रहा है, मगर कुछ समय बाद गायब । यानि ये कमी रचना में नहीं है । कमी कहीं-न-कहीं उस आलोचक,उस संपादक में है जो रेखांकित करता था । वो रेखांकित करने का जो दायित्व था वरिष्ठों के पास वो काम कहीं-न-कहीं कमज़ोर हुआ है । ये भी बात है कि अभी बहुत सारी चीज़ें परिदृश्य में दिख रही हैं । बहुत सारा लिखा जा रहा है, सोशल मीडिया पर प्रकाशित हो रहा है । पहले भी लिखा जाता था मगर कम-से-कम वो प्रकाश में नहीं आता था । अभी क्या है कि जो छंटाई होनी चाहिए, कहीं-न-कहीं वो नहीं हो पा रही है । इसलिए जो बहुत सारा अच्छा नहीं है, औसत है या औसत से भी नीचे है वो भी आपकी नज़र में आ रहा है । और ये मात्रा इतनी अधिक है कि जो उसमें से श्रेष्ठ है आप उसको रेखांकित नहीं कर पा रहे । हालांकि जो अच्छा दिखेगा वो कहीं-न-कहीं रेखांकित होगा ही और हो भी रहा है मगर ये काम जितनी तेज़ी से होना चाहिए उतनी तेज़ी से नहीं हो पा रहा जैसा 80 के दशक में होता था ।
अजय महताब :- तो हमें उम्मीद है कि आगे चलकर स्थितियां बदलेंगी । समकालीन कविता पर बेहतर आलोचनात्मक बातचीत होगी और उसका मूल्यांकन होगा । हमारी बातचीत आगे भी जारी रहेगी । एक बार फिर आपके साथ बैठना होगा । मगर आज काफी सारे सवालों के जवाब मैं लेकर जा रहा हूं ।
राजेश जोशी :- बिल्कुल ! अच्छी बातचीत रही । आपको भविष्य के लिए शुभकामनाएं ।
अजय महताब
उड़िसा के एक छोटे-से गांव में जन्म
स्नातकोत्तर के दिनों में साहित्यिक पत्रिका ‘पंख’ के कुछ अंकों का सम्पादन तथा डेढ़ दशक से प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘परिकथा’ में संपादन-सहयोग ।
शिक्षा :- स्नातकोत्तर
प्रकाशन :- नया ज्ञानोदय, परिकथा,पाखी, नया पथ, वर्तमान साहित्य, जनपथ, उत्तर प्रदेश, सुखनवर, समसामयिक सृजन, अभिनव इमरोज़ आदि पत्रिकाओं में कविताएं, कहानियां, समीक्षाएं प्रकाशित।
‘लिखनी ही होगी एक कविता’ ( समकालीन कवियों का साझा संकलन, बोधि प्रकाशन )
‘जमशेदपुर एकादश’ ( 11 कवियों का साझा संकलन, समीक्षा प्रकाशन )
‘विश्व सिनेमा में स्त्री’ ( संपादन : विजय शर्मा, अनुज्ञा बुक्स )
‘सत्यजित राय का अपूर्व संसार' ( दो खंडों में , संपादन : विजय शर्मा, पुस्तक नामा )
आदि पुस्तकों में संकलित ।
संपादित : ‘मांदर पर थाप’ आदिवासी-विमर्श की प्रतिनिधि कहानियों का संकलन ।
सम्मान-पुरस्कार : नंद कुमार उन्मन स्मृति साहित्य सम्मान, 2025 ,गार्गी मंजू सम्मन, 2024
संप्रति : अध्यापन
मोबाइल: 7766892854
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आज सुबह सोकर उठा तो मोबाइल हाथ में आते ही मेरे फ़ेसबुक वॉल पर प्रख्यात समकालीन हिन्दी कवि राजेश जोशी का नाम 'कौशिकी' के पेज़ पर फ़्लैश किया। मैं राजेश जोशी की कविताएं सन् 1980 से ही पढ़ता रहा हूं।
ReplyDeleteउनकी कविताओं का सिर्फ़ चार-साढ़े चार दशक पुराना एक पाठक ही नहीं, बल्कि प्रशंसक भी रहा हूं। आज उनकी कविताएं और इंटरव्यू एक सांस में ही पढ़ गया। वे सही कह रहे हैं कि उनकी पीढ़ी की कविताएं जीवन में शामिल कवियों की कविताएं हैं। वे भाषा एवं व्यवहार के धरातल पर भी जनतांत्रिक हैं। राजेश जोशी जितने अच्छे कवि हैं,उतने ही अच्छे गद्यकार भी। आज की उनकी कविताओं में निराला पर लिखी गई उनकी कविताओं ने गहरे स्तर पर मेरे मर्म का स्पर्श किया। मैं संवेदित हुआ। सन् 1983 में मैं भी जब दूसरी बार इलाहाबाद गया था तो जैन कालेज, आरा में बीए, हिन्दी (आनर्स) का विद्यार्थी था। मैं भी दारागंज के उस मकान में गया था, जहां मुझे उनके सुपुत्र रामकृष्ण त्रिपाठी से मुलाक़ात हुई थी। उन्होंने मुझसे बहुत कम बातचीत की थी और कहा था कि निराला को समझना हो तो उनका रचा साहित्य पढ़ सकते हैं। बहरहाल, बाक़ी कविताएं भी हमारी समझ का विस्तार करती हैं। उनमें आज का जटिल समय प्रतिबिम्बित दिखाई देता है। राजेश जोशी की कविताएं अपने पाठकों से सीधे संवाद करती हैं। वे कठिन बिम्बों,प्रतीकों और रूपकों से बचते हैं। उनकी कविताओं में बातें क़िस्सा गोई की शैली में सामने आती हैं , जैसे गांव में अलाव के पास बैठकर कोई बुजुर्ग रोचक ढंग से उन्हें सुना रहा हो। वे समकालीन हिन्दी कविता के एक उस्ताद कवि भी हैं। उनसे और उनकी कविताओं से हिन्दी जगत में प्यार करने वालों की बहुत बड़ी तादाद है। वे उन कुछ गिने-चुने कवियों में हैं जिन्होंने समकालीन हिन्दी कविता को लोकप्रिय बनाने का काम किया है। मेरी पीढ़ी के कवियों ने उनसे बहुत कुछ सीखा है। वे अभी अस्सी साल के युवा कवि हैं। वे शतायु हों। हमारी शुभकामनाएं उनके साथ हैं।
बहुत दिनों बाद राजेश जोशी की कविताएं पढ़ी।
ReplyDeleteबहुत कुछ याद आ गया।
अच्छी कविताएं।
ReplyDeleteराजेश जोशी की कविताएं समकालीन हिंदी कविता की ध्वजा है। आरम्भ से मैं उनकी कविताएं मेरी चेतना , सौंदर्य दृष्टि बनाती रही है।
ReplyDeleteये कविताएं आत्मीय, विचारोत्तेजक और रूपक-प्रधान लगी । प्रत्येक कविता लगी कि वे साधारण जीवन-दृश्य से आरम्भ होकर व्यापक मानवीय अर्थों तक पहुँच रही हैं,किसी कविता में स्वर धीमा नहीं लगा ।
अहा ये कविताएं !!
अभिनंदन कवि राजेश जी
यह समय ऐसा है जब बोल सभी रहे हैं लेकिन सुन कोई नहीं रहा है। क्योंकि दूसरों तक बात पहुंचने से पहले संपर्क के सारे सूत्र तोड़ दिए जा रहे हैं, हटा दिए जा रहे हैं। जिन्हें चुप रहना चाहिए और काम करना चाहिए, वे अत्यधिक वाचाल हैं और झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं। झूठ को बार-बार बोलकर सच बना देने के इस घनघोर समय में सच पर टिके लोग संकट में हैं। शोर और बड़जोर से भारी उधेड़बुन में है। छिपने के सारे ठिकाने अधिसूचित कर लिए गए हैं, खुद को भीतर छुपा लेने की सुविधा तो है लेकिन साथ ही चेतना के कुंद होने का डर भी। इसलिए बेहतर है कि छिपने की कोशिश न की जाए और बोलने के सारे खतरे उठाए जाएं। सिद्ध कवि राजेश जोशी की कविताओं को पढ़ते हुए यह सूरतेहाल और सलाह हासिल होता है जिसे वह लगभग गपशप के अंदाज़ में बयां करते हैं। हम सभी प्रकृति से, ज़मीन से, संपर्कों से, गहरे अहसास से किस कदर कट गए हैं, 'नदी का नेग' इसे बड़ी सहजता से सामने रखती है। व्यक्ति और परछाई के द्वंद्व में समय और सच फंसा हुआ है। एक प्रेम कविता की तलाश में, आवारा कुत्तों का आतंक, अब तुम उड़ सकते हो कविताओं में राजेश जी देश-दुनिया की हक़ीक़त, आदमी की फ़ितरत, वैचारिकी के संकट, अव्यवस्था के स्थायीकरण की परतें ऐसे खोलते हैं जैसे साथ चलते सच दिखा रहे हों। महज छह पंक्तियों की कविता 'टूटना' में एक कवि और संवेदनशील इंसान के भीतर का हाहाकार महसूस किया सकता है। दानवी दंभ में फंसी दुनिया में बेआवाज़ टूटते संबंध वैश्विक आपदा साबित हो रहे हैं। निराला पर लिखी कविताएं मर्मस्पर्शी और बहुकोणीय हैं। संवादी और जनतांत्रिक मूल्यों के संवाहक कवि राजेश जोशी का साक्षात्कार भी उतना ही खुला और सुथरा है।
ReplyDeleteशानदार, जानदार, यादगार कविताएँ 🙏
ReplyDeleteअजय महताब जी को बहुत बधाई !!
बहुत अच्छी कविताएँ और बहुत सार्थक बातचीत।
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