अशोक वाजपेयी से पीयूष दईया की बातचीत
अशोक वाजपेयी
अन्तर्ध्वनिहीन कविता टिकाऊ नहीं हो सकती
(समादृत कवि,आलोचक,चिंतक और संस्कृति कर्म सहित विभिन्न कलाओं से गहरे और अभिन्न रूप से जुड़े अशोक वाजपेयी से पीयूष दईया की यह बातचीत उनके द्वारा बोले-लिखे जा रहे आत्म-वृत्तान्त का एक अंश है।)
मटमैली सच्चाई
दिल्ली में देरिदा ने “झूठ” पर एक व्याख्यान दिया था। अम्बर्तो ईको ने एक लम्बा निबन्ध लिखा है जिसमें बताया है कि इतिहास में कैसे-कैसे झूठ बोले गये हैं—बावजूद इसके कि सच का पता था, झूठ का ही वर्चस्व बना रहा। कई उदाहरण हैं। मसलन, यह बात पता थी कि पृथ्वी गोल है, लेकिन इसके बावजूद यह नहीं माना गया और गैलेलियो जैसे वैज्ञानिक को दण्डित किया गया। महाभारत में भी, धर्मयुद्ध जीतने के लिए, अर्धसत्य का इस्तेमाल किया गया है। अन्ततः ‘सत्यमेव जयते’ जैसा सुभाषित स्वप्न ही रहेगा—कभी पूरी तरह से सच नहीं हो पाएगा। साहित्य और कविता में भी यह लागू होगा, हालाँकि, साहित्य में हार-जीत की पदावली में सोचा नहीं जाता। सपने और सच के बीच की दूरी बनी रहेगी : सपने पर सच की छाया है, सच पर सपने की छाया है। सच्चाई मटमैली है—न पूरी तरह से सत्य है, न कभी पूरी तरह से असत्य है। इसी मटमैलेपन से मनुष्य की विशिष्टता है, गरिमा है और इसी से त्रासदी भी है।
सच्चाई के रूपक
मेरी कविताओं में आते और परम्पर विरोधी लगते युग्म, दरअसल, सच्चाई के रूपक हैं। मनुष्य, और कवि की भी सच्चाई, कभी एकरैखिक नहीं होती। एक दिशा में जाने से ऐसा होगा कि उस दिशा में चलते चलेंगे पर बाक़ी दिशाएँ और उनकी सम्भावनाओं से अपने को अलग करते चलेंगे। इतिहास और ऐतिहासिक समय की एकरैखिकता, अपने आप में, साहित्य विरोधी है—इस अर्थ में है कि साहित्य का दिग्बोध, जो उसका लगभग जैविक दिग्बोध है, कई दिशाओं का होगा—वह एकरैखिक नहीं हो सकता। अज्ञेय की प्रसिद्ध कविता का अंश है—‘भीड़ का मत हो डटा रहे/ किन्तु दिग्विद /पांथ के समुदाय से/ तू अकेला मत छूट।’ दिग्विद का पंथ अनेक दिशाओं को जानने वाला पंथ है, उससे लेखक या कवि अपने को अलग नहीं कर सकता, नहीं करना चाहिए।
सम्भावना
मैं पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करता हूँ—तथाकथित तर्कवादियों में मैं भी हूँ। लेकिन एक सम्भावना के रूप में उसे छोड़ भी नहीं सकता। मुझे यह बात बहुत आकर्षित करती है कि यही जीवन एकमात्र जीवन नहीं है, इसी जीवन में कई अनेक जीवन हैं। इस जीवन के इर्द-गिर्द बहुत सारे जीवन हैं जिनमें चाहें तो जब-तब प्रवेश कर सकते हैं, उससे कुछ निस्बत रख सकते हैं। यही समय के बारे में भी है, कि यही हमारा एकमात्र समय नहीं है। और भी समय हैं और उन समयों से संवाद कर सकते हैं, उनको छू सकते हैं, उनमें जा सकते हैं। इस सबमें अपनी अनिवार्य भौतिक नश्वरता को अतिक्रमित करने का उद्यम है, जिसे मैंने पहले कभी पुनर्भव कहा था। ऐसी कविताएँ हैं जिनमें नश्वर अन्त है, लेकिन उसी कविता के बग़ल में दूसरी कविता नश्वर अन्त का अतिक्रमण कर रही है। मैंने अपने पहले कविता संग्रह का नाम रखते हुए संग्रह को ‘शहर अब भी सम्भावना है’ कहा था—‘सम्भावना’ शब्द, एक तरह से, मेरी सारी कविता पर चस्पाँ हो सकता है।
बहुसमयता का बोध
मैं समय-बोध और काल-बोध को अलग-अलग करना चाहता हूँ। काल-बोध से आशय नश्वरता का बोध है। दूसरा ‘समय-बोध’ है, जिसका सीधा आशय समय से है। यहाँ समय और काल के बीच में वैसे ही भेद कर रहा हूँ जैसे सच और सच्चाई के बीच में भेद करता रहा हूँ। आधुनिक हिन्दी साहित्य में काल-बोध अपेक्षाकृत कम है। मुक्तिबोध में काल-बोध के बजाय समय-बोध प्रबल है—उनके यहाँ मृत्यु या अपनी नश्वरता का तीखा अहसास नहीं है और न उनकी कविता व्यक्त हुआ है। दूसरी तरफ़ निराला में अपनी नश्वरता का बोध है—‘आ रही मेरे दिवस की सांध्य बेला मैं अकेला’। शमशेर बहादुर सिंह के यहाँ काल से होड़ है। हिन्दी में मृत्यु पर अपेक्षाकृत कम कविताएँ हैं। मैंने कुछ लिखी हैं।
हमारे यहाँ काल-बोध शिथिल है, समय-बोध बड़ा प्रबल है। ज़्यादातर कविता और साहित्य से निकलने वाली समय की मोटी-मोटी अवधारणा ऐतिहासिक समय की है, एकरैखिक समय की है। ऐसे बहुत कम कवि या लेखक मिलेंगे जिनमें समय का आवर्त्तन या समय एक आवर्त्त है। अज्ञेय के यहाँ है और थोड़ा इधर-उधर मिल जायेगा। लेकिन ऐसा बोध बहुत कम है। हिन्दी साहित्य ने, जानबूझकर या अनजाने, ऐतिहासिक समय को ही समय मान लिया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। यह समय के बारे में भारतीय चिन्तन की लम्बी परम्परा की अवहेलना करना है। यह समझ में आता है कि परम्परा के अभिप्रायों, अवधारणाओं का पुनराविष्कार तथा प्रश्नांकन हो, लेकिन एक तरह का अज्ञान भी बहुत है। एकरैखिक ऐतिहासिक समय को समय मान लेना जीवन के बहुत सारे स्पन्दनों और लयों को अनदेखा करना है, जो हमारे सामान्य दैनिक जीवन में व्याप्त हैं। छोटे-छोटे अनुष्ठान और बहुत सारी चीज़ें हैं जो समय की ऐतिहासिक धारणा से मेल नहीं खाती हैं और वे साहित्य से भी ग़ायब हैं।
बहुसमयता का बोध ज़रूरी है। हम एक समय में रहते हुए भी कई समयों में रह रहे हैं। किसी भी भारतीय लेखक के लिए बहुसमयता का बोध, मेरे हिसाब से, एक ज़रूरी और पारिभाषिक बोध है जबकि इसका अभाव है। लेकिन इस कारण यह कहना ठीक नहीं होगा कि आधुनिक हिन्दी साहित्य ने महत्त्वपूर्ण या मूल्यवान साहित्य नहीं रचा, वह रचा गया है—इसमें सन्देह नहीं। हाँ, उसके कुछ अभावों की ओर ध्यान नहीं गया है। मैंने अपने स्तर पर थोड़ी-बहुत कोशिश की है कि मैं उत्तराधिकार से अपने को वंचित न करूँ।
समय : काल का प्रतिरोध
दो तरह के एहसास हो सकते हैं। एक एहसास जब मृत्यु का सीधे-सीधे सामना किया और उससे बच गये हों, जैसे कुमार गन्धर्व। मैं यह कहता रहा हूँ कि कुमार गन्धर्व का बाद का संगीत कालच्छाया में रचा गया संगीत है। वह मृत्यु के बहुत निकट पहुँचकर वापस आ गये थे। यह एक निजी अनुभव के चरम पर पहुँचते हुए एक तरह की कालच्छाया है, लेकिन एक रूपक के रूप में सब काल के आँगन में हैं। हम सबको अन्ततः मरना है। लेकिन इसका बोध होना अलग बात है। जैसे इसका बोध है कि संसार में हैं—घर, मोहल्ले, पड़ोस, शहर, देश, अंचल, विश्व, ब्रह्माण्ड में हैं। इसी तरह से हम काल में हैं, काल के दायरे में हैं। जहाँ तक मैं देख पाता हूँ हिन्दी साहित्य में इसका बोध बहुत कम है।
दूसरी तरफ़, यह कहना चाहिए कि काल को अन्ततः जितना सम्भव है, समय द्वारा ही स्थगित किया जाता है—यहाँ समय काल की अभिव्यक्ति होने के बजाय उसका प्रतिरोध बन जाता है। समय काल को रोकता है, थामता है।
निजता का स्वीकार
हम सबका निजी समय अलग, विशिष्ट और अद्वितीय है, लेकिन फिर भी हम समय का कुछ न कुछ साझा करते हैं। लेकिन इस साझेपन और इससे सम्भव होते सम्प्रेषण को अगर इतना महत्त्व देने लगें और उसका साहित्य और विचार में इतना वर्चस्व हो जाये कि इस बात की सुध तक न रहे कि आपका एक निजी समय है, जो अद्वितीय ही नहीं बल्कि कई अर्थों में असम्प्रेषणीय भी है, तो ठीक नहीं है। दुर्भाग्य से, हमारे साहित्य में, यही हुआ है—ख़ासकर प्रगतिशील, जनवादी दौर में। जहाँ यह मान लिया गया कि जो कुछ साझा किया जा सकता है वही सच्चाई है और जो कुछ साझा नहीं किया जा सकता है, वह अगर सच्चाई है भी, तो उसका साहित्य में कोई महत्त्व नहीं है। आख़िर निजीपन की—हमारे साहित्य में, हमारी निजता की इतनी अप्रतिष्ठा क्यों है? निजता का एक स्वीकार यह है कि लगे कि हाँ इस लेखक का एक निजी मुहावरा, निजी शैली है—इसकी प्रशंसा होती है, लेकिन लेखक निज के जीवन पर ध्यान दें और उसको चरितार्थ करने की चेष्टा करें, तो उसकी निन्दा होगी। दशकों तक मेरी निन्दा होती रही कि मेरा निजता पर आग्रह है—यह अर्थ निकाला गया कि मैं सामाजिक यथार्थ की अवहेलना कर रहा हूँ, जबकि यह सही नहीं था।
काल कोष से शब्द
मानवीय जीवन का एक ध्रुवान्त काल है। अन्ततः यह ध्रुवान्त भी एक जैसा नहीं हो सकता। मरते हुए व्यक्ति का अपना अनुभव है, जितना भी हो, वह उसको कभी व्यक्त नहीं कर पाता। इसके लिए समय ही नहीं मिलता। आख़िर वह अनुभव कहाँ जाता है? वह कहाँ बचता है? मैंने ऐसी कल्पना की है कि काल के पास भी एक कोष होगा, कि काल एक कोष है, जिसमें सहस्त्रों अद्वितीय अनुभवों का संग्रह है। इस संग्रह से एक शब्द उठा लिया। कोरोना के दौरान लिखी गयी एक कविता का अंश है : ‘‘मैं इस तरह लिखता हूँ/ काल कोष से उठाता हूँ शब्द।’’। उस समय सभी पर कालच्छाया कुछ ज़्यादा ही काली होकर बैठ गयी थी।
कवि की मुश्किल
हर कवि के सामने यह मुश्किल आती है कि उसके लिखने का एक तरीक़ा, एक ढर्रा बन जाता है। वह जैसे ही लिखने बैठता है वैसे ही वह ढर्रा अपने आप काम करने लगता है। यह समस्या आती है कि कई बार ऐसे अनुभव होते हैं जो उन ढर्रों से ठीक से बँध नहीं पाते—उनकी विशिष्टता और ब्यौरे ठीक उसी तरह से व्यक्त नहीं किये जा सकते जैसे पहले करते आये हैं, जिसका अभ्यास रहा है। यह अभ्यास बिल्कुल छूटता भी नहीं है, क्योंकि आप ही ने उस तरह की कविता लिखी है, किसी और ने नहीं लिखी है। एक दिन आप तय करते हैं कि पहले की तरह लिखी गयीं कविताएँ भाड़ में जायें, अब मैं बिल्कुल नये क़िस्म की कविता लिखूँगा। ऐसा कई कवियों ने किया है और अच्छी कविता भी लिखी है। लेकिन ऐसा करना बहुतों के लिए सम्भव नहीं होता। मेरे लिए भी सम्भव नहीं है।
भूमिका, कालच्छाया, काव्य-संवेदना
इस बीच तीन-चार चीज़ें बहुत तेजी से बदलीं। नया निज़ाम आया। नया पूँजीवाद, याराना पूँजीवाद शुरू हुआ। हर तरह के मूल्य की अवमानना होने लगी। ज्ञान मात्र को हास्यास्पद मानने की लोकप्रिय प्रवृत्ति बन गयी। अज्ञान का महिमा-मण्डन होने लगा। इनके चलते कविता इनको अलक्षित करे, यह मेरे लिए सम्भव नहीं रहा। इस विमानवीयकृत दृश्य को ठीक से समझने-व्यक्त करने के लिए अभी तक जो साधन व उपकरण मेरे पास थे, वे अपर्याप्त लगने लगे। मुझे एहसास हुआ कि उनमें कुछ न कुछ और जोड़ना पड़ेगा। एक व्यक्ति, एक नागरिक और एक आलोचक के रूप में मुझे लगा कि इस सार्वजनिक अध:पतन के समय में मुझे बौद्धिक भूमिका भी निभाना चाहिए—पहले से कर रहा था, लेकिन वह अधिक प्रबल हुई। इस भूमिका का दबाव भी मेरी कविता पर था कि सिर्फ़ बौद्धिक स्तर पर प्रतिरोध करूँ और कविता में ऐसा प्रतिरोध व्यक्त न हो तो ये दुराव होगा। इन सबका सम्मिलित प्रभाव पड़ना शुरू हुआ।
इस बात को शायद बहुत लक्षित नहीं किया गया है कि कोरोना काल में मनुष्य कालच्छाया में था—डरा हुआ, सहमा-सकुचा हुआ, घरों में बन्द, निस्सहाय, लाचार, दयनीय, दूसरों के बिना निरुपाय महसूस करता हुआ, लेकिन सदियों से उसकी सहचर प्रकृति पूरी तरह से उससे उदासीन थी। वह खिलखिला रही थी—उसकी हरी पत्तियाँ चमक रही थीं, उसके फ़ूल वैसे ही खिल रहे थे। मनुष्य का प्रकृति से यह अलगाव है या कहें प्रकृति की मनुष्य के प्रति उदासीनता को इतने तीखेपन से मैंने पहले अनुभव नहीं किया था। भारत में प्रकृति को लेकर बनी अवधारणाएँ प्रकृति के साहचर्य, सान्निध्य और उसकी मांगलिक उपस्थिति की रही हैं, जबकि पश्चिम में प्रकृति के ईविल को भी दर्ज किया गया है। जैसे, रॉबर्ट फ्रॉस्ट ने अपनी कविताओं में। भारत में ऐसा नहीं हुआ है। मैंने इस पर भी कुछ कविताएँ लिखने की कोशिश की। जहाँ तक मैं जानता हूँ, यह ऐसा पक्ष है जो हिन्दी कविता में नहीं आया है। बहुत लोगों की कोरोना काल में लिखी दूसरे क़िस्म की कविताएँ हैं—मनुष्य की मनुष्य के प्रति क्रूरता की। इस तरह के बहुत सारे मार्मिक चित्र हैं, लेकिन मनुष्य के प्रति प्रकृति की उदासीनता पर किसी का कोई ख़ास ध्यान नहीं गया। मेरी काव्य-संवेदना इतनी व्यग्र-व्याकुल हुई कि उसने मुझे इस ओर धकेला—मैं अपनी नागरिक व आलोचक भूमिका को भी इस परिस्थिति से जोड़ूँ और उसे सम्बोधित करूँ। ऐसा उल्टा नहीं हुआ—अगर मैं कवि न होता तो मैं ऐसा तथाकथित सार्वजनिक बुद्धिजीवी भी न हुआ होता, न वैसा नागरिक होता जैसा मैं हूँ। मेरे लिए अपने कवि की काव्य-संवेदना केन्द्रीय है। मैं उसे कितना विस्तृत कर सकता हूँ, कितना गहरा सकता हूँ, कितनी ऊँचाई पर ले जा सकता हूँ यह मेरी क्षमता, प्रतिभा और प्रयत्न पर निर्भर करता रहा है।
सपाटबयानी और सरोकार
हिन्दी आलोचना में मैंने ‘सपाटबयानी’ शब्द का प्रयोग शायद पहले-पहल किया था। उस समय भी मैं सपाटबयानी को पूरी तरह से ख़ारिज नहीं करता था, बल्कि कुछ मुक़ामों पर शायद सपाटबयानी ज़रूरी होती है—यह भी मेरी धारणा थी। उस समय मुझे ख़ुद सपाटबयानी का इस्तेमाल करने का अवसर नहीं आया। उसका एक कारण यह था कि मैं सरकारी नौकरी में था, इसलिए प्रखर सत्ता विरोध की सपाटबयानी करने का मेरा अधिकार बहुत सीमित था। हाँ, चुटकी लेना, कुछ व्यंग्य भाव से कहना, कुछ अपना मज़ाक़ बनाना मेरे सार्वजनिक वक्तव्यों का गुण था, लेकिन ये पहलू कविता में नहीं आते थे, आलोचना में भी कम ही थे। लेकिन इधर की स्थिति में एक तरह की दृश्यता का बहुत आतंक-सा हो गया है। मानो जो दिखता नहीं, वह नहीं है। किसान दिखता नहीं, तो नहीं है या कोई और वंचित दिखता नहीं, तो नहीं है। इस दृश्यता में बहुत मौक़ा या ज़रूरत नहीं है कि कुछ कोशिश करें—जो दृश्य है वह आपकी कोशिश के बिना ही प्रकट है। इस दृश्यता का सामना कविता कैसे करे? इस अर्थ में नहीं कि उसका विरोध कैसे करे, बल्कि इस अर्थ में कि वह कैसे वैसी ही दृश्यता, यानि तुरन्त समझ में आ सकने वाली बात, कैसे करे। इधर की कुछ कविताओं में मैंने यह कोशिश है, सपाटबयानी का सहारा लेते हुए। लेकिन ऐसा नहीं है कि मेरे बुनियादी सरोकार स्थगित हो गये हों—वे बने हुए हैं और उन्हीं में रसे-पगे इस तरह का कुछ करने की प्रक्रिया है।
सजीव उपस्थिति
शायद ही कभी ऐसा भाव जागता हो कि मैं कुछ नया कर रहा हूँ या कुछ अलग कर रहा हूँ। जब ऐसा कर रहा होता हूँ या करने की सोचता हूँ तब वह एक प्रवाह में ही आता है। यह बैठकर नहीं सोचता हूँ कि अब ऐसा करना है, वैसा करना है। जाहिर है, करते हुए या करने के बाद यह समझ में आता है कि इस कविता में शायद कुछ नया हो गया, कुछ नयी बात जुड़ गयी, या मैंने कुछ नयी विधि या नया तरीक़ा खोज लिया। ऐसा कभी-कभी लगता है, ज़्यादातर वह भी नहीं लगता। मेरी चिन्ता यह होती है कि कविता एक सजीव उपस्थिति बनी कि नहीं बनी। नहीं बनी, तो उसको छोड़ देना चाहिए। अगर किसी हद तक बन गयी, तो रख लेता हूँ। व्यक्ति कभी भी पूरी तरह से सफल नहीं हो सकता, विफलता उसकी घुट्टी में है। वह कभी-कभी सफल होता है, पर, ज़्यादातर विफल ही होता है—भले व्यक्ति को इसका पता हो या न हो।
मेरा काव्य-स्वभाव
मेरे काव्य-स्वभाव के सन्दर्भ में अन्वेषण और रचना, दोनों, रहते हैं। अन्वेषण में शायद कहीं ज्ञान शामिल है और रचना में कहीं अपूर्वानुमेयता अधिक है। असल में, दोनों पूरी तरह से अलग प्रक्रियाएँ नहीं हैं। कम से कम मेरे यहाँ। ऐसा बहुत ही कम हुआ होगा कि मैंने पहले से दिमाग़ में कुछ सोचकर लिखना शुरू किया हो। कविता लिखते हुए सोचना, लिखने की प्रक्रिया ही सोचने की प्रक्रिया बन जाती है। अक्सर कविता लिखते हुए कुछ खोजने भी लगते हैं—वह खोज ही कविता के प्रवाह को दिशा दे देती है, कि वह कहाँ जायेगी। ज़्यादातर वक्त तो ऐसे होते हैं कि कविता लिखने के बाद थोड़ा अचरज भी होता है कि अच्छा ये है! कविता पूरी तरह से अपूर्वानुमेय न हो पर काफ़ी हद तक होती है। मेरा गद्य भी वैसा ही होता है। गद्य लिखते हुए कुछ सोचा कि अब यह लिखना है, लेकिन लिखते हुए कहाँ से क्या बात याद आ जायेगी, उसमें आगे और क्या हो जायेगा, यह अनिश्चित रहता है।
टी.एस. इलियट ने मेटाफिजिकल कवियों के बारे में लिखते हुए यह कहा था कि उनके लिए विचार और इन्द्रियबोध या ऐन्द्रियता की दूरी नहीं है। मैं अलग से विचार करके कविता नहीं लिखता। या कि कविता की काया से बाहर कोई विचार अलग से सूझे और उसको मैं कविता में टाँक दूँ : ऐसा कभी नहीं हुआ।
सात कोरस
मेरे कविता संग्रह ‘अपना समय नहीं’ में सात कोरस शामिल हैं। जब मैंने इन कोरस कविताओं को लिखना शुरू किया तब सोचा कि हमारे समय और हमारे देश में एक भयानक यूनानी नाटक जैसा हो रहा है। मैं नाटककार नहीं हूँ, नाटक नहीं लिख सकता, लेकिन मैं क्या कर सकता हूँ? मैंने सोचा, मैं यह मानकर चलूँ कि ऐसा नाटक हो रहा है—सब जानते ही हैं कि वैसा नाटक हो रहा है। कविताओं में अज्ञातकुलशील कोरस-पात्रों की ओर से कुछ कहा जाये। मैंने इतना भर ढाँचा सोचा। यूनानी नाटक में कोरस आता है—वह जो हो रहा है उस पर टिप्पणी करता है और जो होने वाला है उसका कुछ पूर्वाभास देता है। जो हमेशा होता आया है, उसकी भी कुछ बात करता है। यूनानी नाटक में कोरस के ऐसे ही कई मिले-जुले काम हैं। मैंने इतना भर सहारा लिया और एक कोरस कविता लिखी गयी। फिर दो, फिर तीन। ऐसे सात कोरस हो गये। मुझे लगा, अब काफ़ी हो गये, बन्द करो। बाद में सूझा कि चूँकि ये कोरस हैं इनका कोई नाट्य पाठ हो, तो शायद अधिक प्रभाव पड़ सकता है। एम.के. रैना पुराने मित्र हैं। एक ज़माने में मैंने—लगभग पचास वर्ष पहले—उन्हें एक कार्यशाला करने के लिए भोपाल बुलाया था। कहा था कि वे कविताओं का नाट्य-पाठ करें। उन्होंने एक घंटे का कार्यक्रम तैयार किया था, जिसका शीर्षक मैंने दिया था—‘कोहरे में आदमी का धब्बा’। यह विनोद कुमार शुक्ल की कविता की पंक्ति है—‘कोहरे में आदमी का धब्बा आदमी की तरह’। पाठ में कई कवियों की कविताएँ थीं। मुझे उनका कविताओं का नाट्य-पाठ याद था, इसलिए उनसे कहा कि इन कोरस कविताओं को देखिए। उन्होंने कहा, “यह बहुत अच्छा प्रस्ताव है, हम कुछ करते हैं।” उन दिनों वे कुछ युवा अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के साथ एक कार्यशाला कर रहे थे, उसी में इन कविताओं की नाट्य प्रस्तुति तैयार हुई। उन्होंने बुलाया, एक बार आप देख लीजिए। मैं गया भी। दिल्ली में ‘अक्षरा थिएटर’ में इन कोरस कविताओं के नाट्य मंचन की कुछ प्रस्तुतियाँ हुईं। इस मंचीय प्रस्तुति को लेकर मेरा अपना ख्याल यह बना कि यह पहले से कोरस है और नाटक नहीं हो रहा है—इसमें यह एक धारणा है कि आप नाटक जानते हैं, नाटक आपके सामने हो रहा है और कोरस के पात्र तो सिर्फ़ आकर उस नाटक की विडम्बनाओं और उसकी फलश्रुति के बारे में दर्शकों को कुछ बता रहे हैं, अपने बारे में भी बता रहे हैं। लेकिन ऐसा करने के लिए भी दृश्य-कल्पना चाहिए, कुछ दृश्य-विधान चाहिए। दो-चार चीज़ें चाहिए। रैना ने अपने ढंग से सोचा। मुझे लगा, ठीक है : यह भी एक तरीक़ा है।
काव्य-नाटक
मेरी कविताओं में नाट्य सम्भावनाएँ छुपी हुई हैं, इसका कोई एहसास मुझे नहीं रहा है, हालाँकि एक ज़माने में यह दबी-छुपी आकांक्षा पाली थी कि एक काव्य-नाटक लिखूँ। यह वह ज़माना था जब ‘अंधा युग’ बड़ा सफल हुआ था। दुष्यन्त कुमार का ‘एक कण्ठ विषपायी’ और नरेश मेहता का ‘संशय की एक रात’ नाट्य प्रयोग की तरह इतने सफल नहीं हुए, जितना ‘अंधा युग’ हुआ। मैंने भी लिखने का सोचा था, लेकिन शायद गम्भीरता से नहीं। कभी लिखा भी नहीं। मैं यह चाहता था कि बिना किसी पौराणिक ऐतिहासिक चरित्र को लिए लिखूँ, अगर सम्भव हो तो। मसलन, टी.एस. इलियट ने ‘मर्डर इन कैथरेड्रल’ लिखा जो ऐतिहासिक चरित्र पर था, लेकिन उनके दूसरे काव्य नाटक आधुनिक चरित्रों के साथ हैं, उनमें कोई पौराणिक ऐतिहासिक चरित्र नहीं हैं।
स्मृति और पूर्वजों की उपस्थिति
मैंने बहुत पहले यह कविता-पंक्ति लिखी थी, ‘‘हम अपने पूर्वजों की अस्थियों में रहते हैं।’’ शायद हर कवि जब लिखना शुरू करता है, तो वह इस मोहक भ्रम में अपने को डालता है कि वही पहला कवि है। जैसे बाक़ी सब जो हुए हैं उनको वह पोंछकर मिटा देगा। हम में से कोई भी बिना पूर्वजों के कवि नहीं हो सकता। एक स्तर पर कविता लिखना अपने पूर्वजों के होने का एहतराम भी होना चाहिए। मेरे हिसाब से, कविता मात्र, एक तरह से, कृतज्ञता ज्ञापन भी है। जोजफ़ ब्रोडेस्की ने कहा था, ‘‘हम सिर्फ़ अपने समकालीनों के अनुमोदन के लिए नहीं लिखते। हम अपने पूर्वजों के अनुमोदन के लिए भी लिखते हैं।’’ यह मैंने हाल में पढ़ा, तब तक मैं अपने तईं यह तय कर चुका था कि पूर्वजों की उपस्थिति का सम्बन्ध अपनी स्मृति से है। एक स्तर पर जातीय स्मृति से है, जिसका विद्रूप हमारे समय में है, जबकि आप पूर्वजों के बीच में चुन रहे हैं, आपके पूर्वजों ने क्या किया, क्या नहीं किया, इसकी दुर्व्याख्या कर रहे हैं, जो जातीय स्मृति का विद्रूप है। दूसरी तरफ़, आप अपने पूर्वज चुनते हैं—क्या कबीर आपका पूर्वज है या तुलसीदास आपका पूर्वज है, या दोनों आपके हैं, बल्कि संस्कृत काव्य भी आपका पूर्वज है, इत्यादि। हमारी बहुत सारी कविता पूर्वजों की उपस्थिति से शून्य कविता है।
मैं यह मानता रहा हूँ कि कविता के टिकाऊ होने का सबसे टिकाऊ आधार यह होगा कि एक कवि की आवाज़ में उसके पहले के कितने कवि बोलते हैं। यह बोलना कोई सीधा-सीधा अनुकरण करना नहीं है, बल्कि उस तत्त्व को जो किसी पूर्वज के साथ रहा हो, उसका अपने ढंग से पुनराविष्कार करना है। मैं ऐसा करने की कोशिश करता रहा हूँ, लेकिन इसका हिन्दी साहित्य में कोई विशेष महत्त्व नहीं हुआ। इस ओर कोई ध्यान भी नहीं देता है। सिर्फ़ यह कहते हैं कि मेरी कविताओं में पुरखे बहुत आते हैं। क्यों आते हैं, इसका क्या औचित्य है, इसका क्या आशय है—इसकी कोई बात किसी को समझ में नहीं आती।
हम एक ऐसे समय में पहुँचते जा रहे हैं जहाँ हमारी स्मृति को और सीमित करने के बहुत सारे साधन आ गये हैं। एक अनन्त वर्तमान हमारे ऊपर लाद दिया गया है—हम उसी में मगन हैं, उसी में तुष्ट-सन्तुष्ट हैं। आज की बहुत सारी युवा कविता में—अपने आप में अच्छी-बुरी जैसी है—पूर्वजों की उपस्थिति की कोई अन्तर्ध्वनि नहीं है। अन्तर्ध्वनिहीन कविता टिकाऊ नहीं हो सकती। वह थोड़े दिन चलेेगी और धीरे-धीरे तिरोहित हो जायेगी। अन्तर्ध्वनिहीन कविता का मतलब है ऐसी कविता जो एक तरह से अख़बार की ख़बर जैसी ज़िंदगी बसर करेगी। वह आज है, कल भुला दी जायेगी।
स्मृति का सीमित होना, जातीय स्मृति की दुर्व्याख्या, विस्मृति का सुनियोजित विस्तार भयानक है। बहुत सारे लेखकों-कवियों का बहुत कम पढ़ा-लिखा होना भी एक तथ्य है। यह सब मिलकर जो कविता पैदा करेंगे, वह अन्तर्ध्वनिहीन होगी—उसमें ऐसा बहुत कम होगा जो याद करने लायक़ बचेगा।
अशोक वाजपेयी
अशोक वाजपेयी ने छः दशकों से अधिक कविता, आलोचना, संस्कृतिकर्म, कलाप्रेम और संस्था-निर्माण में बिताये हैं। उनके 20 कविता-संग्रह प्रकाशित हैं : उन्होंने विश्व कविता और भारतीय कविता के हिन्दी अनुवाद के और अज्ञेय, शमशेर, मुक्तिबोध, भारत भूषण अग्रवाल की प्रतिनिधि कविताओं के संचयन संपादित किये हैं और 5 मूर्धन्य पोलिश कवियों के हिन्दी अनुवाद पुस्तकाकार प्रकाशित किये हैं। उनकी कविताओं के पुस्तकाकार अनुवाद अंग्रेजी, फ्रेंच, पोलिश, मराठी, बांग्ला, गुजराती, उर्दू, राजस्थानी में प्रकाशित है। कविता के लिए उन्हें दयावती मोदी कवि शिखर सम्मान, साहित्य अकादेमी पुरस्कार, कबीर सम्मान, शक्ति चट्टोपाध्याय पुरस्कार, कटमनिट्ट रामकृष्णन् पुरस्कार आदि मिले हैं। अशोक वाजपेयी ने भारत भवन भोपाल, महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, रजा फाउण्डेशन आदि अनेक संस्थाओं की स्थापना और उनका संचालन किया है। वे मध्य प्रदेश शासन में शिक्षा और संस्कृति सचिव, छत्तीसगढ़ शासन के संस्कृति सलाहकार, केन्द्रीय ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष रहे हैं। उन्होंने कविता के अलावा साहित्य, हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत, आधुनिक चित्रकला आदि पर हिन्दी और अंग्रेजी में लिखा है। फ्रेंच और पोलिश सरकारों ने उन्हें अपने उच्च नागरिक सम्मानों से अलंकृत किया है। वे ‘समवेत’, ‘पहचान’, ‘पूर्वग्रह’, ‘बहुवचन’, ‘समास’, ‘अरूप’ आदि पत्रिकाओं के संस्थापक और संपादक रहे हैं। कई दशक अपने घरू प्रदेश मध्य प्रदेश में बिताने के बाद वे 1992 से दिल्ली में रहते हैं।
पीयूष दईया
तीन कविता-संग्रह और अनुवाद की दो पुस्तकें।
चार चित्रकारों के साथ पुस्तकाकार संवाद।
एक लम्बी कहानी ‘कार्तिक की कहानी‘ प्रकाशित।
साहित्य, संस्कृति, विचार, रंगमंच, कला और लोक-विद्या पर एकाग्र पच्चीस से अधिक पुस्तकों और पाँच पत्रिकाओं का सम्पादन.
सम्प्रति - रज़ा फ़ाउण्डेशन की एक परियोजना ‘रज़ा पुस्तक माला’ से सम्बद्ध और शास्त्रीय संगीत व नृत्य पर एकाग्र पत्रिका ‘स्वरमुद्रा’ का सम्पादन.
सम्पर्क - todaiya@gmail.com
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गूगल से साभार







बहुत बढ़िया बातचीत। कौशिकी बहुत सुंदर साहित्यिक सामग्री की सुंदर प्रस्तुति कर रही हैं। बधाई एवं शुभकामनाएं।
ReplyDeleteकितनी 'रिच' बातचीत, फिर से पढ़ता हूं।
ReplyDeleteबेहतरीन बातचीत। एक बार में सुबह ही पूरा पढ़ गया हूं। आदरणीय अशोक वाजपेयी हमारे समय के सबसे अधिक अधीत साहित्यकार हैं। बधाई एवं शुभकामनाएं।
ReplyDeleteअशोक वाजपेयी जी की ढर्रे वाली बात बड़ी अच्छी लगी... कवि के मन को अक्सर ही कुछ समय के बाद लगने लगता हैं कि अपनी शैली से बाहर निकला जाये ये तभी सम्भव हैं जब आप दूसरों को ज्यादा से ज्यादा पढोगे गुनोगे... हलांकि मोल खरीद कर पढना आजकल कम होता जा रहा हैं.. हम लोगों ने एक घेरा बना लिया हैं उन्ही को पढ़ रहे है और उन्ही को सपोर्ट कर रहे है जो आपके बनाये घेरे में फिट बैठतें है।
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