वंदना राग की कहानी
वंदना राग
'कौशिकी' में इस सप्ताह पढ़िए वंदना राग की कहानी 'बूढ़े की खुजली '। उनकी कहानियों पर टिप्पणी है महत्वपूर्ण कवि और कथाकार उमा शंकर चौधरी की।
वन्दना राग अपनी कहानियों में अपने समकाल को रचती हैं। हमारे समय के जो अंतद्वंद्व हैं वही उनकी कहानियों के विषय हैं। यहां साम्प्रदायिकता की समस्या से लेकर बाजार, बाजारवाद और मानसिकत गुलामी का विषय बहुत प्रमुख रूप में आया है। यहां सिर्फ स्त्री की चिंता नहीं है बल्कि यहां एक स्त्री की निगाह से देखे गए समाज में व्याप्त विषमताओं को पकड़ने की कोशिश है। एक स्त्री का सजग मन है यहां। चूंकि एक लेखिका सजग निगाह से इस समाज को देखने-समझने का प्रयास कर रही है तो निश्चितरूपेण समाज को देखने का एक नया नज़रिया यहां व्याप्त है। मनोविश्लेषणात्मक स्तर पर समस्याओं को समझना, उसे विश्लेषित करना वन्दना राग की कहानियों की एक खास विशेषता है। वे अपने पात्रों के करीब जाकर उसके साथ चलकर उसका निर्माण करती हैं। उनके पात्र अपनी सामान्य हरकतों से, सामान्य व्यावहारों से कहानी को एक बड़े विमर्श की ओर ले जाते हैं। और इस तरह वन्दना अपनी कहानियों में छोटी-छोटी घटनाओं से, सामान्य पात्रों से भी बड़े विमर्श का दरवाज़ा खोल देती हैं।
वन्दना राग की एक बड़ी खासियत उनकी भाषा है। वे अपने लेखन में भाषा को लेकर काफी सजग हैं। उनके यहां भाषा और शब्दों के चयन में परिपक्वता है। भाषा ही उनकी कहानियों को सघन बनाती है। यह कहानी ‘बूढ़े की खुजली’ समाज में व्याप्त एक छद्म संस्कार को प्रश्नांकित करती है। महामारी के उपरान्त जो अकेलापन समाज के एक हिस्से में बदकिस्मती से आया है उसके दो छोर पर दो पात्र हैं। एक छोर पर एक बूढ़ा है और दूसरे छोर पर एक छोटा बच्चा। यहां दोनों एक-दूसरे के अकेेलेपन को पुष्ट करता है। यह समाज जो संस्कारित होने का ढोंग करता है वह उस अकेलेपन को समझ नहीं पाता। ‘खुजली’ के प्रतीक के द्वारा वन्दना ने कहानी के भीतर एक खास किस्म की करुणा को पैदा करने की कोशिश की है। बूढे़ की खुजली, बूढे़ का दुख उदय प्रकाश की कहानी ‘तिरिछ’ के उस बूढ़े से इसे जोड़ देता है। दोनों कहानियां इस समाज के चमक-दमक के बीच अजनबीयत और अकेलेपन को समझने की एक सफल कोशिश है। वन्दना की यह कहानी मनोविश्लेषणात्मक ढंग से लिखी महीन बुनावट की कहानी है जिसे बहुत ही संवेदनशील मन से पढ़ने की जरूरत है।
- उमा शंकर चौधरी
बूढ़े की खुजली
विदेशी फिल्मों में दिखाए जाने वाले बूढ़ों की तरह दिखता था वह । दुबला । खूब लंबा । और खूब गोरा। उसके कमर के नाप की पैंट मिलती कैसे होगी यह सोचने वाली बात थी। इतनी छोटी नाप एक वयस्क की पैंट रेंज में मिलती कहाँ से होगी? वह हर वक्त काली पैंट, काले जूते , काली जुराबें और सर्दियों में काली शर्ट के ऊपर काला लंबा कोट डाले रखता था। सर पर सोला हैट जैसा कुछ। हैट भी काला । और गर्मियों में पूरी बाजुओं की सफेद शर्ट और हैट भी। वही काला वाला।
एक बार किसी सरकारी स्कूल का बच्चा उसे देखकर अपनी स्कूल बस पर चढ़ना भूल गया था और बस उसे वहीं बस स्टाप पर छोड़ आगे चली गयी थी। बच्चा शायद पाँचवीं छठी का छात्र था , वह चुपछाप मुग्ध हो उसे देखता ही रहा था।
थोड़ी देर बाद उसने पूछा था, फोरेनर हो?
बूढ़े ने उसे देख ऐसे सर हिलाया था, जिसका अर्थ हाँ भी हो सकता था और ना, भी। बच्चा कुछ भी नहीं समझा और खुश होकर बोल उठा,-तुम रूसी हो न , तुमने करामाती कोट पहन रखा है न? शायद बच्चे ने गोगोल की कहानी किसी संक्षेपित संस्करण में पढ़ रखी थी । या बच्चों की इसी नाम की फिल्म देख रखी थी। या हो सकता हो उसने अपने सपने में ऐसा कोई किरदार देखा होगा और चमत्कृत हो गया होगा।
बूढ़े ने बस अपनी मांसपेशियों में बोर होने पर उठने वाला खिंचाव पैदा किया और बच्चे से अलग देखने लगा।
बच्चा जब बहुत देर तक उसके जवाब का इंतजार कर थक गया तो उलटे कदमों से घर की ओर लौट पड़ा।
बूढ़ा भी थोड़ी देर बाद उसके पीछे चल पड़ा और दोनों दिल्ली की सर्दियों में कोहरे की चादर में लिपटी सड़कों पर लोप हो गए।
अगले दिन सुबह बच्चा फिर बस स्टॉप पर था। बूढ़ा भी एक टेकवे चाय के कप के साथ। बच्चा बूढ़े को देख फिर मंत्रबिद्ध सा खिंचा चला आया। वह उसका ध्यान आकर्षित करने के लिए उसकी आँख में आँख डालने की कोशिश करने लगा। एक क्षण को आँखें मिलीं भी , लेकिन बूढ़े की आँखों में लाल डोरियाँ देख बच्चा थोड़ा डर गया। वह बस स्टॉप पर बैठे बैठे ही थोड़ा आगे घिसट गया।
फिर बेचैन हो पूछने लगा , बताओ न तुम फोरेनर हो?
अचानक फिर बस स्टॉप पर हलचल हुई और लोग उठकर बस में चढ़ने लगे।
बच्चा बैठा रहा।
बूढ़ा अपने होंठों से कप हटाते हुए बोला ,-जा तेरी बस आ गयी।
न मुझे स्कूल नहीं जाना है, मुझे तुमसे बात करनी है।
स्कूल से लौटकर आना तब बात करेंगे , जा !
बच्चा अनमने भाव से उठकर बस में चढ़ गया।
कन्डक्टर बूढ़े को शक की निगाह से देखने लगा, बूढ़े ने उसकी नज़र ताड़ ली और अपनी जांघों को रगड़ रगड़ खुजलाने लगा। कन्डक्टर थोड़ा डर गया लेकिन फिर ‘मुझे इससे क्या’ वाले भाव से यात्रियों को हाँकने लगा।
शाम को जब बच्चा कंकपाते हुए स्कूल से लौटा और बस स्टॉप पर बूढ़े को ढूँढने लगा उसे बूढ़ा कहीं नहीं मिला। बच्चा अपने जूते से जमीन को ठोकर मारते हुए बस स्टॉप के पीछे बसे टाइप 4 क्वार्टर्स की रेल्वे कॉलोनी में चला गया।
उसके बाद बूढ़ा बस स्टॉप के बगल में लगे मुग़लकालीन बरगद के पीछे से नमूँदार हुआ और फिर गहराती शाम की दुरंगी बैगनी रोशनी में गुम हो गया।
बच्चा रात भर सो नहीं पाया। जाने किस गम में रोता रहा । उसके परिवार वाले पहले तो उसे चुप करने आए फिर भी जब वह नहीं माना तो ब्रेड के दो पीस चाय के कप के साथ उसके लिए छोड़ गए।
बच्चा आँख बंद किए पड़ा रहा। फिर एक छोटी बच्ची आयी और उसे झकझोर कर जगाने लगी,भईया भईया उठो , खाना खा लो, पापा कह रहे हैं।
पापा ?
बच्चा बिस्तरे पर किसी ताकतवर शूरवीर की तरह उठ खड़ा हुआ।
पापाsss पापा ssss ! वह और ज़ोर ज़ोर से सुबकने लगा।
तुम्हारे नहीं भईया ,मेले पापा भईया। मेले पापा । बच्ची पूरी संवेदना से सच बोली।
बच्ची के पापा कमरे में आए , बच्ची उनसे लिपट गयी।
मेले पापा आ गए। मेले पापा आ गए।
बच्चा, बच्ची के पापा को देख चुप हो गया। डर गया शायद।
टाइप 4 कॉर्टर के उस छोटे से कमरे में चुप्पी छा गयी। कुकर की कर्कश सीटी ने इस चुप्पी को तोड़ा और एक अर्धजवान औरत ने कमरे में प्रवेश किया।औरत दिखने में आकर्षक थी लेकिन उसके चेहरे पर पशोपेश वाला भाव था।
कुकर बंद होने के बाद वह कुकर की आवाज़ में ही चीखी,-इस बलाय को ले तो आए हैं आप लेकिन अब हमसे नहीं संभलता। इसके पापा को डेड किए हो गया न दस साल!
यह सुन छोटी बच्ची के पापा सर्द ढंग से औरत की ओर मुड़े और बोले ,10 नहीं 4 साल हुआ है भईया भाभी दोनो को गए।
एकदम बेअक्ल हो!
ठीक है, चारे साल सही लेकिन ई लाट साहब तो ऐसे कलपते हैं जैसे 9 साल के नहीं अभी तक पाँचे साल के हैं। माई बाप के डेड करने के बाद से बढ़े ही नहीं। देखिए हाइट कितना बढ़ गया है, चेहरा खिल रहा है, लेकिन ई खुद ही नहीं समझते हैं , बच्चे ही बने रहते हैं। उसी पाँच साल पर ठहर गए हैं।
छोटी बच्ची के पापा ने मानो यह सब सुना नहीं,
वे रूहों की दुनिया में पहुँच गए,
अनाथ सिर्फ ई नहीं हुआ है। हम लोगिन भी हुए हैं। समझ रही हो? एक तरह से हम भी अनाथ हुए हैं। एक अनाथ ही दूसरे अनाथ का दर्द समझ सकता है। तुम क्या समझोगी? किसी का लाश भी हम नहीं जला सके , समझती हो इसका परिणाम?मुक्ति नहीं मिली है उनलोगों को । अब समझो हम पित्तर के साथ रह रहे हैं।पित्तर को नाराज नहीं करना चाहिए। दया करो इसपर भाई , ई बालक है। ऊ दिन भूल गयी? याद करो ! दहशत का दिन। लग रहा था पूरा दुनिया खतम हो जाएगा।
भूलो मत।
हम कैसे भूल जाएंगे? का समंझते हैं हमको? बुड़बक? सब समझते हैं हम, गलती हमारा नहीं था । हम नहीं मारे हैं उनको, कीड़ा मारा है। इतना लंबा रास्ता मारा है। काहे गए गाँव?
तो कहाँ रहते ?
तुम पनाह नहीं न दी?
अरे पेट में बच्चा था उनका , उस समय देखभाल कर पाते हम? छोटी बच्ची की माँ चीखी।
सबलोग गाँव थोड़ी न भागा? लोग तो हिम्मत बांध कर दिल्लीये में ना रहा। लड़ाई ईया कीड़ा से।
कीड़ा?
वायरस था वो!
इस पर अफ़वाह के संसार से एक रूह फिर चिल्लाई,
तुम भी सरकार के साथ मिल गयी थी छोटी बच्ची की माँ ,तुम भी। बोल रही थी कुछ नहीं होगा, कीड़ा ही ना है, उससे इतना क्या डरना?
अगर तुम लोग पनाह दिए होते उनको तो डेड नहीं करता लोग।
किसी और ने सुना हो या न सुना हो, सब सुन लिया छोटी बच्ची के पापा ने और घर के दूसरे कमरे में चले गए, दरवाज़ा बंद कर लिया।
जाने क्यों छोटी बच्ची की माँ फिर रोने लगी। अपराध बोध से कत्तई नहीं। दुख से भी नहीं। राहत से भी नहीं।
फिर ?
इनके लिए सब बात का इलाज दारू है! पता नहीं हमारी जिनगी कब सुधेरेगी। सोच सोच कर रोती रही। बी रुके रोती रही।
****
अगले दिन बच्चा और भी अनमना होकर स्कूल की बस पकड़ने उठा। और चाय बिस्कुट खाता हुआ बस स्टॉप पर पहुँच गया।
आज वह बूढ़ा उसे दिख गया। बच्चे के चेहरे पर उदास मुस्कुराहट की हल्की रेखा खिंच गयी।
दिल्ली की रेलेम पेल शुरू हो चुकी थी। ऐसा घना कुहासा था कि हाथ पर हाथ नहीं सूझता था। सरकार कह रही थी, हरियाणा में पराली जलायी जा रही है, इसलिए दिल्ली में कुहासा बढ़ गया है। कुछ लोग सरकार की बात मान रहे थे, कुछ सरकार को गाली दे रहे थे।
बदइंतजामी साली! सरकार की ..... !
बच्चा चुपचाप जाकर बूढ़े के पास बैठ गया। लेकिन आज बोला कुछ नहीं।बूढ़े ने ही पहल की।
क्यों आज उदास हो?
बच्चा कुछ नहीं बोला।
बूढ़े ने प्यार से उसके सर के बालों में हाथ फेरा।
बच्चा चिहुँक गया। इतने दिनों से किसी ने उसके बालों में इस तरह प्यार से हाथ नहीं फेरा था।
बस आयी, थोड़ी देर रुकी और चली गयी।
बच्चा वहीं बैठा रहा।
बूढ़ा भी बैठा रहा।
थोड़ी देर बाद बूढ़ा उठा , उसने प्यार से बच्चे का हाथ थामा और आने वाली एक बस पर बच्चे को चढ़ाया , खुद चढ़ा और लोधी गार्डन पहुँच गया।
वहाँ सबसे सुंदर फूलों की क्यारी के पास की बेंच पर दोनों बैठ गए। सामने लोधी वंश की एक इमारत खड़ी थी।
बूढ़े ने बोला, उदास नहीं होना चाहिए।
बच्चा बोला,
मेरे ममी पापा मर गए।
बूढ़े ने कहा , कब ?
चार साल पहले।
बूढ़े ने अपने पेट पर से शर्ट उठाई और ज़ोर ज़ोर से खुजलाने लगा।
सामने बहुत अमीर टाइप दिखने वाले लोग जिनमें ज़्यादा उम्रदराज थे टहल रहे थे। वे बूढ़े को संशय और घृणा से देखने लगे।
डिस्गस्टिंग!
बच्चा भी शर्मा गया।
उसने बूढ़े से पूछा , आपको कोई प्रॉब्लेम है?
बूढ़े ने कहा , हाँ! मैं ज़्यादा बोल नहीं पाता , चार साल पहले मेरी जीभ पर भयंकर ज़ुल्म हुआ था, उसके बाद ही मुझे खुजली होने लगी। जाने कैसे, शरीर के किसी भी भाग में खुजली होने लगती है, कभी भी। बहुत डाक्टरों को दिखाया पर कोई फायदा नहीं हुआ।
अरे,
बच्चा जो मंत्रबिद्ध सा बूढ़े की ओर खिंचा चल आया था, समंझ नहीं पा रहा था वह अब क्या करे,
तभी बूढ़ा अपनी शर्ट को ठीक से पैंट के भीतर खोंसता हुआ बोला,
मेरे घर चलोगे?
बच्चा बेज़ार हो चुका था। उसका रेल्वे कॉलोनी जाने का मन नहीं था, कितना चिल्लाती थी चाची। और चाचा सिर्फ दारू पीते थे। उसे अपनी ममी पापा की बड़ी याद आती थी। जब वे लोग ओखला में रहते थे, नया नया स्कूल में उसका नाम लिखाया था। पापा फैक्ट्री से लौटते वक्त उसके लिए कितने चॉकलेट और मैगी के पैकेट लाते थे। फिर माँ को कहते थे, सब बनाओ बाबू के लिए। कभी कभी वे लोग चाचा के घर भी जाते थे। उन दिनों चाचा चाची उसको कितना प्यार करते थे। घर का चिराग, बाबू घर का चिराग है ,कहते थे।
उन्ही दिनों पता नहीं कैसा अजीब बुखार फैला था, कि लोग पटापट मरने लगे थे ।
एक दिन पापा आकर बोले, फैक्ट्री बंद हो गयी है।
फिर बोले, रमेशवा घर खाली करने को कह रहा है।
फिर बोले गाँव जाना होगा, सामान बांध लो।
माँ रोते रोते समान बांधने लगी , तब तक अड़ोस पड़ोस के सब लोग सामान बांध कर रोड पर आ गए थे ।
तब पापा बोले, बाबू को छोटे के यहाँ रख देना होगा।
बहुत लंबा जाना है। पैदले जाना है। कोई सवारी भी नहीं चल रही।
माँ बोली,-ऐसे कैसे? अपने लाल को कैसे छोड़ दें?
बाबू बोले , इतना दूर नहीं संभलेगा तुमसे, पेट वाले का भी चिंता करना है।
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बूढ़े ने अपनी जेब से एक चमकीला मोबाईल निकाला और बच्चे को दिखा कर बोला, ऊबर बुक करता हूँ। बच्चा मोबाईल देखकर वैसे तो हमेशा किलक उठता था, आज मायूसी से सर हिला कर रह गया,-अपने घर ही ले चलो। मुझे तुम बहुत अच्छे लगते हो, बल्कि तुम मुझे अपने घर ही में रख लो तो मेरे लिए बहुत अच्छा होगा।
बूढ़े ने निस्संगता से हाँ कह दिया और सफ़दर जंग एन्क्लैव की एक शानदार बिल्डिंग में उतरा।
बच्चे के साथ उसे ऊबर से उतरते देख एक बड़ी स्टाइलिश औरत ने पूछा, मिस्टर तलवार, फिर किसी को पकड़ लाए?ऐसे तो नहीं चलेगा, हमें सोसाइटी की मीटिंग बुलानी पड़ेगी।
बूढ़े ने बड़ी नफासत से स्टाइलिश औरत पर एक मुस्कान फेंकी और अपना पिछवाड़ा खुजलाने लगा।
औरत ,ओ माइ गॉड , ओ माइ गॉड करके भागी।
बूढ़ा बच्चे को निर्देश देता हुआ आगे बढ़ गया।
बच्चे के लिए ऐसे मोहल्ले, ऐसी सोसाइटी में आने का पहला अनुभव था। वह चमत्कृत हो संगमरमरी स्वच्छता और उजाले को देख रहा था।
जब बूढ़ा पहली मंज़िल के अपने घर में पहुंचा तो उस ने दरवाज़ा एक अलग तरह की चाभी से खोला। बच्चा इतनी नई बातों को एक साथ आत्मसात करने में थक गया और घर में रखे गद्देदार सोफ़े पर धंस गया । फिर जब बूढ़े ने उसके सामने दो लाल सेब लाकर रखे तो वह अपने आसपास की अनजानी सी तरलता को देख हिचक हिचक कर रोने लगा।
बूढ़ा उसे रोते हुए बस देखता रहा। जब बच्चा थक कर चुप हुआ तब उसने उससे पूछा,
घर अच्छा लगा तुम्हें?
बच्चे ने सेब में दांत गड़ाते हुए कहा,-हाँ।
यहाँ रहना चाहोगे?
बच्चे ने जाने क्या सोच कहा, नहीं।
फिर बूढ़े के इशारे से ‘क्यों’ ‘पूछने पर बच्चे ने कहा , चाचा चाची गुस्सा करेंगे।
तुम्हारे चाचा चाची को क्या पसंद है?
क्या उन्हें खूब सारा पैसा पसंद आएगा?
अगर चाची को पैसे दिए जाएँ तो?
बच्चे को याद आया, चाची कहा करती थी, -इतना कम पैसा मिलता है आपको उसमें एक और जना पालने के लिए छोड़ गए इसके अभागे माई बाप।
बच्चे ने तब कहा, पैसे दोगे तो दोनों मान जाएंगे। उन्हें पैसे की दिक है।
बूढ़े ने कहा , अच्छा।
इतने में बच्चा आराम से घर को देखने दाखने लगा।
एक जगह उसने देखा एक खूबसूरत सी टेबल पर एक अंग्रेज़ औरत और इंडियन मर्द के बीच में लगभग 5 साल का एक गदबदा बच्चा सजीली फ्रेम के अंदर बैठा मुस्कुरा रहा है। तीनों बड़े सुंदर लग रहे थे।
उसने बहुत हिचकते हुए बूढ़े से पूछा, ये लोग कौन हैं?
बूढ़ा उसके पास आता हुआ बोला, मेरा बेटा, मेरी बहू और मेरा पोता।
सब चार साल पहले मर गए।
बच्चा चुप, काटो तो खून नहीं सा चुप।
चार साल पहले उसके अपने माँ पापा मर गए और इधर इस बूढ़े के भी सब मर गए।
बूढ़े ने उसे प्यार से अपने पास बड़े सोफ़े पर बिठाते हुए कहा,
कितना अच्छा होता न, अगर तुम भी मर जाते अपने माँ बाप के संग और मैं अपने बेटा बहू और पोते के संग?
लेकिन ऐसा होता नहीं। ज़िंदगी ऐसे चलती नहीं है।
मेरे सब यहीं इसी साफ सुथरे घर में मर गए, और तुम्हारे माँ बाप सैफ्टी के लिए कहीं जाते हुए रोड पर मर गए और एकसाथ तुम और मैं , दोनों अनाथ हो गए।
वह भयानक दौर था। मैंने बहुत कोशिश की सोसाइटी वाले एक दूसरे की मदद करें, हमने आक्सिजन की पूरी व्यवस्था कर रखी थी , हमने दवा वगैरह भी जमा कर ली थी। हम पूरे खिड़की दरवाज़े बंद रखते थे कि वायरस कहीं से घर में ना आए। लेकिन हमारे सारे प्लान फ़ेल हो गए। हमारी सोसाइटी में एक नेता है, पहले हमारी उससे बहुत दोस्ती थी। लेकिन पता नहीं उन दिनों उसे क्या हुआ, उसने धीरे धीरे बाहर मार्केट में हमारे स्टॉक में से कई सिलिन्डर बेच दिए। मेरे परिवार को जब जरूरत हुई तो एक भी सिलिन्डर उन्हें नहीं मिला।
मेरा पूरा परिवार खत्म हो गया!
मैंने जब उस नेता के खिलाफ एफ आई आर किया तो एक दिन उसके लग्गू भग्गू आए और मुझे समझाने लगे, एफ आई आर वापस लो, अखबारबाज़ी बंद करो ।
उन्होंने मेरा जवाब भी नहीं सुना और मेरे हाथ बांध कर मेरे मुँह पर इतनी लातें मारीं कि मेरे जीभ का एक टुकड़ा कट कर गिर गया।
फिर बूढ़े ने बच्चे को अपनी जीभ दिखाई। वह दाईं तरफ से कट कर छोटी हो गयी थी।
बच्चा कटी जीभ देखकर बिल्कुल नहीं डरा ना असमंजस में पड़ा।
वह बहादुरी से अपने तन्तु को बूढ़े के तंतुओं से मिला रहा था।
चलो, तुम्हारे घर चलें।
बूढ़ा घर का लॉक लगाते हुए बोला।
तुम्हारे चाचा चाची से बात करने।
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नीचे उन्हें बहुत सारे लोग मिले, जैसे वे सब बूढ़े का ही इंतज़ार कर रहे थे।
एक ने पूछा, मिस्टर तलवार , हू इस ही?
बूढ़े ने बेधड़क जवाब दिया, माई ग्रैन्चाइल्ड।
फिर एक बर्तन खुरचने पर आने वाली आवाज़ बोली, अच्छा? मतलब नहीं सुधरे तलवार जी ?
एक बूढ़े की हमउम्र औरत बोली, वायरस ने तो दिमाग खराब कर दिया है तलवार का ।अरे हम सब भुगते हैं... लेकिन ये तो.. एकदम ही। कहीं से भी रद्दी उठा लाता है और कहता है, ग्रैन्चाइल्ड..... !
बूढ़ा डटा रहा।
हल्की हल्की ठंडी हवा बहने लगी।
मौसम अब ठंडे से सुहाने की ओर बढ़ने लगा था।
बूढ़े ने दमदार आवाज़ में बोला, ऐ टाइगर गाड़ी निकाल।
बच्चे ने देखा एक चमचमाती बड़ी गाड़ी आकर बूढ़े के सामने खड़ी हो गयी।
बूढ़े ने अपना हैट ठीक किया और बच्चे को बोला ,- गाड़ी में बैठो।
फिर उसने खुरचते बर्तन वाली आवाज़ की आँख में आँख डालते हुए अपनी पैंट के भीतर सामने से हाथ डाल दिया और ज़ोर ज़ोर से खुजली करने लगा।
वहाँ खड़े बकने वाले लोग थू थू करते हुए लौटने लगे।
रास्कल ! थू , खुरचता बर्तन चिल्लाया।
वायरस . तुम सब वायरस थू ! बूढ़ा गाड़ी में से चिल्लाया,
फिर, उसने बच्चे को अपने कलेजे में भींच लिया और मेरा बच्चा.... मेरा बच्चा , माइ ग्रैन्चाइल्ड माइ .... ग्रैन्चाइल्ड बोलते हुए अपनी आँखें पोंछने लगा।
और गाड़ी रेल्वे कॉलोनी की ओर दौड़ पड़ी।
वंदना राग
वंदना राग , मूलतः सिवान जिला बिहार की हैं ।
१९९९ में इनकी पहली कहानी हंस पत्रिका में आई और फिर लिखने का सिलसिला चल पड़ा ।हंस, कथादेश, पहल, नया ज्ञानोदय जैसी अनेक पत्रिकाओं में इनकी कहानियाँ प्रकाशित हुई हैं ।
इनके 4 कहानी संग्रह,-यूटोपिया, हिजरत से पहले, खयालनामा और मैं और मेरी कहानियाँ प्रकाशित हो चुके हैं।
उपन्यास ,- बिसात -पर - जुगनू कुछ वर्षों पहले आया जिसमें लुप्त हो रही कला की विधा,पटना कलम पर विशद वर्णन और चिंतन है । इनका दूसरा उपन्यास सरकफंदा इसी वर्ष राजकमल प्रकाशन से आया है।
इन्होंने ई. जे. हॉब्सबॉम की किताब ,-ऐज ऑफ कैपिटल का हिन्दी अनुवाद- पूंजी का युग शीर्षक से किया है। इसके अलावा अनेक कविताओं , कथाओं तथा कथेतर गद्य का अनुवाद कर चुकी हैं।
अपने कहानी संग्रह यूटोपिया के लिए इन्हें पहला कृष्ण प्रताप सम्मान मिला है ।
बिसात पर जुगनू के लिए लाडली मीडिया सम्मान मिला है ।
हाल ही में इन्हें बिहार राजभाषा परिषद का महादेवी वर्मा सम्मान मिला है ।
सभी पेंटिंग: वाज़दा ख़ान






वंदना राग की कहानी ‘बूढ़े की खुजली’ समकालीन भारतीय समाज के उस गहरे घाव को उघाड़ती है, जो महामारी के बाद अकेलेपन, अविश्वास, अमानवीयता और कथित संस्कारों के ढोंग से बना है। बूढ़े और बच्चे के बीच पनपता संबंध करुणा, असुरक्षा और मानवीय अपनत्व की उस महीन रेखा पर चलता है, जहाँ समाज की निगाहें लगातार संदेह और घृणा से भरी हैं। ‘खुजली’ का प्रतीक केवल शारीरिक विकार नहीं, बल्कि उस नैतिक और सामाजिक बेचैनी का संकेत है जिसे सभ्य समाज स्वीकार नहीं करना चाहता। वंदना राग की भाषा संयमित, संवेदनशील और गहरे मनोवैज्ञानिक तंतुओं को छूती हुई है; छोटे-छोटे दृश्य बड़े सामाजिक विमर्श रचते हैं। यह कहानी महामारी, सत्ता, मध्यवर्गीय पाखंड और विस्थापन के बीच मानवीय रिश्तों की संभावना को तलाशती है और अंततः बताती है कि असली संक्रमण वायरस का नहीं, बल्कि करुणा-विहीन समाज का है।
ReplyDeleteअच्छी कहानी।
ReplyDeleteबूढ़े की खुजली बहुत अच्छी कहानी है।
ReplyDeleteअच्छी कहानी।
ReplyDeleteकहानी पढ़ ली है। वंदना जी प्रिय कथाकार हैं। बधाई। अच्छा किया कि अब आप कहानियां पोस्ट कर रहे हैं।आशा है, अन्य विधाएं जैसे व्यंग्य, डायरी,समीक्षा आदि को भी जगह मिलेगी।अभी तक का ट्रैक रिकॉर्ड उत्तम है।
ReplyDeleteशुभकामनाएं!