विजय राही की कविताएं

 

विजय राही 

विजय राही की कविताओं में मनुष्य की उन कोमल भावनाओं की गंध महसूस की जा सकती है जो जीने के लिए जरूरी हैं। जीवन और मृत्यु के बीच प्रेम की अलग रंगत लिए ये कविताएं देर तक स्मृति में गूंजती हैं।


चाह

दुनिया मतलब से प्रेम करती है
पर मुझे तुमसे कोई मतलब नहीं 
दुनिया धन से प्रेम करती है
मुझे तुम्हारे धन की भी लालसा नहीं

मेरे घर में किसी चीज़ की कमी नहीं  
मुझे कोई काया रोग भी नहीं 
फिर मैं क्यों रोती हूँ।



फूल-दिल 

जब तक गुलशन में रहते हैं
खिले-खिले रहते हैं
डाली से अलग होते ही मुरझा जाते हैं
मर जाते हैं फूल-दिल लोग।




स्मृतियाँ

बीत जाते हैं दिन-महीने
साल दर साल गुज़र जाते हैं
आते-जाते रहते हैं मौसम
गर्मी आती है चली जाती है

बारिशें आती हैं चली जाती हैं 
हाड़ कँपाने वाली सर्दियाँ आकर चली जाती हैं 
परन्तु मैं इनसे बाहर नहीं निकल पाता

गर्मियों के बाद
किसी से बिछड़ने का ताप सताता है 
बारिश के बाद तक होती‌ रहती है
अनवरत इन आँखों से बारिश 
और सर्दियों के बाद भी कँपकँपाती है
किसी के बदन की छुअन मुझे ।




यात्रा

बच्चा बस की सीट नीचे मिट्टी खा रहा है
उसकी माँ उसको बार-बार डाँट रही है
कान पकड़ कर खड़ा कर रही है उसे
लेकिन वह फिर बैठ जाता है और मिट्टी खाता है 

एक गाँव है उसी रास्ते पर 
जिससे वह बस गुज़र रही है
कोई रहता था बरसों-बरस पहले वहाँ
तेज़ी से धड़कता है मेरा मन उसके लिए 
उछल कर खिड़की से कूदना चाहता है
लेकिन मैं उसे पकड़ कर बिठा देता हूँ 

मिट्टी खाता हुआ बच्चा मुझे देखकर मुस्कराता है 
मैं भी उसको देखकर मुस्कराता हूँ।

मृत्यु से पहले

याद आती है वह जगह जहाँ से प्रेम शुरू हुआ
और इंतज़ार भी याद आता है 

मैं वापस जाना चाहता हूँ वहाँ
एक बार मृत्यु से पहले
स्मृतियों के जंगलों में रुकना चाहता हूँ
किसी भटके हुए राहगीर की तरह 
जिसे देती है रात्रि में शरण
कोई आदिवासी स्त्री।




जल

स्मृतियों का जल भरा है
मेरी आँखों की सुराहियों में

यह जल टपकता रहता है
लगातार मेरी आँखों की देह से
भले ही यह टपके भी नहीं
तल से इसका रिसना कम नहीं होगा

यह जल देखते-देखते जल जाएगा 
रिस जाएगा तल से अकस्मात् 
मौन चीत्कार के साथ 

लेकिन बची रहेगी
छूटती पपड़ियों के साथ टूटती-सी
सुराहियों की इसकी देह

सूख चुकी काई के बीच
रह जाएगा ताकता कोई निर्निमेष
मृत जल का उजला‌ अवशेष।




मुक्ति 

शहर के कवियों ने 
उसकी मृत्यु पर कविताएँ लिखीं
और मुक्ति पाई।












विजय राही

विजय राही का जन्म 03 फ़रवरी, 1990 को बिलौना कलॉ, लालसोट, दौसा, राजस्थान में हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के सरकारी स्कूल से, स्नातक राजकीय महाविद्यालय, दौसा से एवं स्नातकोत्तर शिक्षा हिन्दी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय से हुई।
हिन्दी-उर्दू के साथ-साथ राजस्थानी भाषा में समानान्तर लेखन। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं, ब्लॉग्स और वेबसाईट्स पर कविताएँ-ग़ज़लें, आलेख प्रकाशित। कविताओं का अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी, पश्तो, मराठी, नेपाली और मंदारिन में अनुवाद। दर्जन भर साझा संग्रहों में कविताएँ प्रकाशित। दूरदर्शन और आकाशवाणी पर कविताओं का प्रसारण। राजस्थान साहित्य अकादमी-उदयपुर, रज़ा फाउंडेशन, इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर- नई दिल्ली, विदेश मंत्रालय, नई दिल्ली में कविता पाठ।
पहला हिन्दी कविता संग्रह ‘दूर से दिख जाती है बारिश’ राजकमल प्रकाशन समूह, नई दिल्ली से प्रकाशित । 
सम्प्रति—
राजकीय महाविद्यालय, कानोता, जयपुर में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (हिन्दी) के पद पर कार्यरत।
मोबाईल नंबर +919929475744
ईमेल vjbilona532@gmail.com


कला: देवीलाल पाटीदार 













Comments

  1. जीवन की ज़रूरी संवेदना की मार्मिक कवितायें

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  2. नेहा नरूका25 January 2026 at 16:13

    सुंदर कविताएं. विजय लोक संवेदना के कवि हैं. लोक में जो जो है वह सबकुछ उनकी कविता के विषय हैं. बच्चे का मिट्टी खाना, बहन के ससुराल जाना, पैसे को लेकर हेय भाव, फूल जैसे मन, जल की महता... बड़ी सहजता है वह इन बातों, दृश्यों और अनुभूतियों को कविता में ले आते हैं.

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  3. अमर दलपुरा25 January 2026 at 16:14

    अच्छी कविताएँ।

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  4. बहुत अच्छी कविताएं हैं।

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  5. बहुत सुंदर कविताएं। गांव की मिट्टी की सौंधी सुगंध के कवि हैं विजय राही।

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  6. बहुत शुक्रिया शंकरानंद जी आपका। आपने बहुत मेहनत और मन से इन कविताओं को प्रकाशित किया है। सुंदर पोस्टर और वीडियो के अलावा देवीलाल पाटीदार जी की कला का संयोजन भी बहुत सुंदर लग रहा है। इसके लिए भी आभार। कविताएँ पढ़ने और पसंद करने वाले सभी साथियो‌ का भी शुक्रिया 💐

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  7. पद्मराग मणि31 January 2026 at 18:52

    "मुक्ति" कविता - तीन पक्तियों में दिखलाती समाज की संवेदना!

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