वाज़दा ख़ान की कविताएं

वाज़दा ख़ान 

वाज़दा ख़ान की कविताओं में हमारे समय का वह अंधकार दर्ज है जिसमें कुछ नहीं सूझता।यह चारों तरफ फैल चुका है और सब कुछ को अपने में समेटने की कोशिश कर रहा है। अपने समय और समाज को जब वे देखती हैं तो कला की आंख से कुछ छुप नहीं पाता।रंग और शब्द मिलकर एक नया अर्थ बताते हैं और यही इन कविताओं की विशेषता है।


गठरी

अपने बचपन की पोटली उठाये
मैं जब चली थी
पोटली, दादी मां का पिटारा नहीं थी
कि मैं उसे खोलती
और उसमें से परियां निकलतीं
घोड़े पर सवार राजकुमार निकलता
और तो और खुद को
राजकुमारी समझने की भूल करती

उन गठरियों में तो
अतिरिक्त और बेहद अतिरिक्त
सावधानी या असावधानी से बरती
जाने वाली तमाम क्रूरतायें, टोका-टाकी और
उपेक्षायें दर्ज हैं

जिन्होंने हमें बेहद क्रूर, अन्धेरी भरी ठण्डी
अव्यावहारिक दुनिया दी,
अब वे हमसे सुन्दर दुनिया मांगते हैं
कहां से लाऊंगी वह इतिहास
आने वाली नस्लों के लिये
जिसमें पढ़ती हूं गार्गी, मैत्रेयी, ललयद।

जिसमें दर्ज हो एक उन्नत सभ्यता
जो बनी हो संवेदनाओं से,
अंखुआते रंगों से
और उस प्रकाश से
जो जोखिम भरे रास्तों पर चलने के
बावजूद आत्मा को
भीतर आलोकित रखता है।



अन्धेरे का अर्थ

अन्धेरा, सिर्फ नीला या काला
नहीं होता, यह मैंने रंगों को
बरतने के बाद कुछ कुछ जाना।

यह बात दीगर है यदि हरे रंग की
भरमार है तो अन्धेरा
हरापन लिये होगा

यदि पीले रंग की भरमार है तो
अन्धेरा पीलापन लिये होगा।

वैसे हम यह कैसे ठीक ठीक
तय कर सकते हैं कि हर अन्धेरे का अर्थ
काला होता है

अन्धेरे का अर्थ, लाल भी हो सकता है
जो हमारी देह की, अन्धेरी शिराओं में
बहता है।

बरतते हैं उसे जब हम
उजाले में
तब सही सही पहचान पाते हैं
पर सही सही पहचान पाने के लिये
अन्धेरों में उतरना उतना ही जरूरी है
जितना कि उजाले में बरतना।


टीस

कई बार कितना कुछ भरा होता है
हमारे भीतर
सघन अर्थों के साथ
कहीं उड़ेल देने को आतुर हम
मगर जब वे सघन अर्थ
हलक में ही अटक जाते हैं
तब शुरू होती है इक टीस

उतरती है उन पेड़ों की पत्तियों पर
जहां बहुत सी चिड़िया
आपस में बैठक ध्वनि के
अमूर्त चित्र बनाती हैं

फिर वही टीस पत्तियों के हरेपन में उतरती है
और भी कई रंग की टहनियों
और फूलों में उतरती हैं

कई-कई दिन तक खिले रहते हैं फूल
टीस के बावजूद।
बहुत बार देखा है नीले आकाश में उगे
पलाश की लाल रंगतों में
उभरी टीस को
जो अपनी जड़ों को देखना चाहते हैं
पेड़ से सटे-सटे, उसका हिस्सा बने-बने।
जो मुमकिन नहीं

जब तक कि वे मुरझा कर
कदमों में न गिर जायें।
आखिर मिट्टी की जड़ों और
आसमान में खिले फूलों के बीच
ऊंचाइयां (दूरी) जो बहुत होती हैं।


दूसरों के जैसे होना भी

काजल की डिबिया में
बन्द देह
रचती है एक लम्बा काला आकाश
ढूंढती है उसी काले आकाश में
अपने रंग, जाने किन किन माध्यमों,
गहराइयों, दरारों में से होती

असम्भव सम्भावनाओं के द्वार पर
पड़ी रेखा का एक टुकड़ा उठाती है
देह के खुले पड़े एक सिरे से, दूसरे को सिलने के लिये
मगर वह अपरिचितपन से लिपटी
स्लेटी रंगतों में स्थिर है

कितना जरूरी है कुछ दूसरे के जैसे भी होना
कि काजल की डिबिया में
बन्द देह में ढूंढ सकें खुद ही 
रंगों के वन-उपवन
ढूंढ सकें
सूक्ष्म अनन्त रूप रचनायें।


हम

इन्द्रधनुषी रंग
प्रकृति की वक्राकार रेखायें, प्रमेय, निर्मेय
और हरीतिमा से बनी तस्वीर हम
आंखों में जिनकी खिलते हैं
असंख्य सूर्य, चांद और सपने

माथे पर टांक लेना 
कभी सुदूर पर्वत की रश्मियां
कभी पंख लगाकर
परियों सा, सफेद झक्क आसमान में
शिशु की तरह कुलांचे मारना

कभी जमीन पर चित्त लेटकर सितारों को
आपस में बातें करते देखना
ऐसा सोचना ही कितना मनमोहक बना देता है 

उतरने लगती है धीरे-धीरे
एक स्वप्निल शाम आंखों में
जो कागज पर लिखे अक्षर की स्याही से भी
ज्यादा काली होती,
ढलने लगती है धीरे-धीरे रात में

और हम सोचने लगती हैं
कोई ऐसा संसार
जहां रात न होती हो।


चांद प्रेरणा

जिस तरह समुद्र में आता है उछाल
चन्द्रमा के घटते बढ़ते रूप के साथ
ठीक वैसे ही, मन की सतहों पर 
उतरता है जब कोई चांद
उसकी रौशनी में संवेदनायें किस कदर
हरी भरी हो जाती हैं
कि जन्मने लगती हैं नये नये रूपों में।

चांद मुक्तिबोध की
कविता को पढ़ते हुये भी
उतर सकता है
कभी स्वामीनाथन के रहस्यमयी
खामोश चित्रों को जीते हुये भी।
कभी कुमार गन्धर्व के किसी
आलाप की तान पर 
दिन को बरतते हुये भी।

कभी स्वप्न में सीमोन द बोऊआर
की जीवनी को दोहराते हुये,
तो कभी पगडण्डियों पर चुपचाप अकेले
चलते हुये
कभी रात के अन्धेरे में स्त्रियों के लिये
समय समाप्त हो जाने वाली सीमा के 
पार होते ही अदृश्य सायरन की गूंज से
घबरा कर घर की ओर लौटते हुये भी
कभी भीड़ भरी सड़क को भय की
तरह महसूस करते हुये भी।

और तब उन सारी ध्वनियों के 
अर्थ भी, समझ में आने लगते हैं
जो चिड़िया की आवाज के संग
वर्तुल घूम रही हैं पृथ्वी के इस छोर से उस छोर तक।

उन सारे दृश्यों के अर्थ भी 
खुलने लगते हैं नये नये सन्दर्भों में,
जो भीतर परत-परत जमा अमूर्त दृश्यों को
ठेल-ठालकर बना लेते हैं अपनी जगह
और दम साधकर बैठी दुश्चिन्ताओं
के साथ, हाथ मिलाते
छेड़ देते हैं इक बहस
अनुभव और कड़वी सच्चाइयों के बीच।


कोष

अक्सर महसूस होता है जैसे
रिक्त हो गया हो भीतर रंगो व रेखाओं का कोष
और तब जगत होती सदिच्छाएं अनिच्छायें
जीवन के सार तत्व के साथ जिन पर
तमाम टीका महाभाष्य लिखे गए हैं आदिकाल से
विषुवत रेखा के ठीक बीचो-बीच से
अपनी उन्मत्तता व विश्रांति में गुजरती
नश्वरता में भटकती याद दिलाती रहतीं हैं कि
नया शब्दकोश गढ़ना होगा कुछ नए रंग लाने होंगे
मोक्ष की प्रतीक्षा किए बिना

शून्य पर टिकी संवेदनाएं अनुभूतियां और स्वप्न
अक्षय कोष बनाने के लिए
वहीं से चलना शुरू करेंगी
जहां से पृथ्वी पर अंधेरा काले रंग के साथ प्रारंभ हुआ और
अग्नि, जल, वायु, आकाश, पृथ्वी के अपने रंग बनते गए

क्रमश: रंगों का कतरा कतरा लेकर
प्रभाववादी शैली में उतर जाऊं या फिर अभिव्यंजना(वाद)
में डूब जाऊं या फिर सल्वाडोर डाली की ‘पिघलती घड़ियां’ लेकर
अपने समय से बाहर छलांग लगा दूं
मर जाने का मेरे कुछ तो असर होगा?

मसरूफियत के इस दौर में केवल
‘मोनालिसा’ की उदास मुस्कुराहट ही तो नहीं भरी है
एडवर्ड मुंक की ‘द क्राय’ भी उतनी तीव्र अनुभूतियों में
अंकित है जितना कि रोडिंन का ‘द किस’ मूर्ति शिल्प

बहरहाल अक्षांश व देशांतर रेखाओं के साथ घूमती
नश्वरताएं अनश्वर हो जाने की चाह में
अपनी समूची जीवंतता के साथ उभरती हैं
जरा सा पृथ्वी पर
जरा सा समंदर के नमक में
और जरा सी चिड़िया की आवाज में

कि जहां जीवन है वहां ईश्वर है
जहां मृत्यु है वहां ईश्वर है मगर हम
यह सब नहीं देख पाते अपने-अपने स्वर्ण मृग के अलावा
ना जीवन, ना मृत्यु और ना ही ईश्वर।


काजल की डिबिया

एक बड़ी सी काजल की डिबिया
जिसमें से नानी, दादी, मायें आंजती
रही आंखों में काजल 
जो हृदय के भीतर कहीं दबा
लाल रंग की रोशनी में घुलता जाता है

रोशनी शनै: शनै: धुंधली होती
अनदेखी परछाइयों में बदलती
परछाइयां कभी मेरे आगे चलतीं
कभी पीछे, कभी दायीं तो कभी
बायीं ओर

कई बार ऐसा होता है कि
बरतने के बाद, डिबिया पर
कसकर ढक्कन न लगा पाओ
तो कमबख्त लाल रंग की रोशनी के साथ
लाल रक्त कणिकाओं 
में घुलता जाता है
धकिया देता परे पारदर्शी जल 
और श्वेत रक्त कणिकाओं को

दरअसल काजल की डिबिया को
लेकर जन्मी देह, सुनहरा रंग
कहां से आये

क्या बन्द कर लूं सूरज को
उसी काजल की डिबिया में
जिसे आंजती रही मायें, दादी, नानी
आंखों में काजल
गठियाती रहीं आंचल में धरोहर सा।


विस्फोट

क्या विस्फोट अचानक होता है?
नहीं, बिल्कुल नहीं
तैयार होती है इक अदृश्य जमीन 
उसके पीछे सदियों तक
पक-पक कर लाल हो जाती है जब

सूरज चमकता रहता है जब आठों पहर
नसों में, आंखों में और
आसमान में भी
तब होता है विस्फोट

ठीक इसी तरह उतरता है
विस्फोट कैनवस की सबसे
भीतरी सतह पर सूक्ष्म सघनतम रूपों में

विस्फोट का अर्थ यह नहीं कि
आवाज गूंज जाये सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में
कुछ विस्फोट इतने चुप होते हैं
कि कहीं कुछ बदलता नहीं
न ही कुछ दिखायी देता है

लेकिन शुरुआत हो चुकी होती है कहीं
बहुत गहरे, बहुत भीतर।


लोग

छोटे लोग जमीं पे उगते हैं
दूब की तरह बढ़ते हैं
पैरों तले रौंदे जाते हैं और ख़ामोश मौत
मर जाते हैं

बड़े लोग आकाश में उगते हैं
आकाश में ही रहते हैं, ज़मीन
क्या होती है
ये वो नहीं जानते हैं

बचे मंझले
ये उगते तो हैं
बढ़ते भी हैं लतर की तरह 
मन की तमाम सतह पर परत-दर-परत
स्वप्नों को विकसित करते 
जूझते रहते हैं स्वयं से
मगर अन्तरिक्ष से आगे नहीं जा पाते।

और त्रिशंकु सा बन
ख्वाहिशों के साथ
स्वयं भी स्वप्नों के 
केन्द्र बिन्दु बन जाते हैं।




                                            
वाज़दा ख़ान    
                                    
एम. ए. (चित्रकला), डी. फिल.             

कई एकल, सामूहिक प्रदर्शनियां व कार्यशालाओं में भागेदारी 2024 : At A memory square Triveni gallery नई दिल्ली 2022 : And Yet ललित कला एकेडमी, नई दिल्ली 
2021: बिटवीन टाइम्स (ऑनलाइन), आर्ट बीट्स फाउंडेशन, पुणे 
2021: नोन-अननोन (ऑनलाइन), डॉम पोलोनिज्नी, रॉक्लॉ, पोलैंड 
2021: द अदर साइड: ए ब्लैंक जर्नी (ऑनलाइन), पंच रोठी, द इंटरनेशनल आर्टिस्ट ग्रुप ऑफ इंडिया, कोलकाता
2012: अनएन्डिंग सॉन्ग, उड़ीसा आर्ट गैलरी, भुवनेश्वर
2006: फेमिनिज्म विदिन, कैनवस आर्ट गैलरी, दिल्ली
2001: शेड्स ऑफ लाइफ, निराला आर्ट गैलरी, इलाहाबाद
इसके साथ ही दिल्ली, गुरुग्राम, जयपुर, नागपुर, लखनऊ, कानपुर समेत अनेक जगहों पर सामूहिक प्रदर्शनियों में सहभागिता।
कई आर्टिस्ट कैम्प व कार्यशालाओं में भागेदारी।
कविता संग्रह 2022: खड़िया सूर्य प्रकाशन मंदिर बीकानेर 2022 : जमीन पर गिरी प्रार्थना
2009: जिस तरह घुलती है काया, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली
2015: समय के चेहरे पर, शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली
नया ज्ञानोदय, हंस, दोआबा, बहुवचन, साक्षात्कार, उत्तर प्रदेश, युवा संवाद, इंडिया टुडे, संचेतना, उद्घोष, कथाक्रम, परिकथा, वागर्थ, आजकल, इन्द्रप्रस्थ भारती, पाखी, संडे पोस्ट, जनसत्ता, प्रभात खबर समेत सभी प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में कविताएं व रेखांकन प्रकाशित।
कला विषय पर अनेक लेख पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित।
प्रसिद्ध कथाकार ममता कालिया, राजी सेठ व ग्राफिक्स कलाकार श्याम शर्मा से बातचीत (साक्षात्कार)
कुछ कविताओं का अंग्रेजी, पंजाबी व कन्नड़ में अनुवाद।
अनेक पुस्तकों के कवर डिजाइन।
सम्मान व पुरस्कार
2020: स्पन्दन ललित कला सम्मान, मध्यप्रदेश
2019: शताब्दी सम्मान, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन
2016: रश्मिरथी पुरस्कार (सम्पूर्ण कलाओं के लिये)
2010: हेमन्त स्मृति कविता सम्मान (जिस तरह घुलती है काया) 
2002: त्रिवेणी कला महोत्सव पुरस्कार
फेलोशिप
2017-18: सीनियर फेलोशिप (चित्रकला), संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार
2004-05: गढ़ी ग्रान्ट, ललित कला अकादमी, दिल्ली


ई-मेल: vazda.artist@gmail.com


सभी पेंटिंग: देवीलाल पाटीदार 

देवीलाल पाटीदार का कला कर्म बहुआयामी है।वे सिरेमिक में उत्कृष्ट और नायाब काम करते हैं, मूर्ति शिल्पी हैं, चित्रकार हैं और लोक कलाओं के गर्भ से निकली उनकी आकर्षक सृजन प्रक्रिया एक जीवित संग्रहालय बन गई है। पाटीदार आदिवासी सृजन समूहों की दिशा से आए हैं जिनके लिए कला सायास नहीं जीवन शैली का हिस्सा है।इन अर्थों में पाटीदार की कला रोमानी नहीं नैसर्गिक है।

S.M.-17,BLOCK -4
SAHYADRI ENCLAVE,
BHADBADA ROAD,
BHOPAL.462003
 Ph. No.- 0755-2773431/ M- 9424417339
Email; devilalpatidar81@gmail.com









Comments

  1. डॉ उर्वशी17 January 2026 at 04:49

    वाज़दा ख़ान की कविताएँ समकालीन जीवन के उस बहुस्तरीय अँधेरे को दर्ज करती हैं, जो केवल सामाजिक या राजनीतिक नहीं, बल्कि संवेदनात्मक, स्मृतिक और देहगत अनुभवों तक फैला हुआ है। चित्रकला की पृष्ठभूमि से आई उनकी काव्य-दृष्टि रंग, रेखा, प्रकाश और छाया को महज़ रूपक नहीं रहने देती, बल्कि उन्हें विचार और अनुभव की संरचना में बदल देती है। ‘गठरी’, ‘काजल की डिबिया’ और ‘विस्फोट’ जैसी कविताएँ स्त्री-देह, स्मृति और इतिहास के बीच उपस्थित अदृश्य हिंसाओं को गहरे आत्मसंघर्ष के साथ सामने लाती हैं, जबकि ‘अंधेरे का अर्थ’ और ‘कोष’ अंधकार को एक सक्रिय, बहुअर्थी सत्ता के रूप में पुनर्परिभाषित करती हैं। उनकी कविताओं में कला, दर्शन और जीवन एक-दूसरे में घुलते हुए ऐसे प्रश्न उठाते हैं जिनके उत्तर आसान नहीं, लेकिन जिनसे टकराए बिना समय की सच्ची पहचान संभव नहीं। इस अर्थ में वाज़दा ख़ान की कविता अनुभव की सजगता, स्त्री चेतना और कलात्मक विवेक का एक सघन और विचारोत्तेजक दस्तावेज़ है।

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  2. प्रभा मुजुमदार17 January 2026 at 05:45

    बेहतरीन।

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  3. मुख्तार अहमद17 January 2026 at 05:45

    बेहद उम्दा! वाज़दा जी; बधाई एवं शुभकामनाएं।

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  4. अरुण कमल18 January 2026 at 21:04

    वाज़दा विलक्षण कवि हैं।अप्रतिम ।अभिनंदन।

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  5. पद्मराग मणि19 January 2026 at 05:03

    सारी कविताएँ अच्छी हैं।

    मुझे गठरी और विस्फोट अच्छी लगी। सरल और गहरी।

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  6. नर्मदेश्वर सिंह19 January 2026 at 22:16

    बहुत सुंदर।

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  7. प्रदीप मिश्र19 January 2026 at 22:16

    सार्थक पोस्ट।

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  8. तरसेम गुजराल19 January 2026 at 22:17

    बढ़िया।

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  9. नामदेव19 January 2026 at 22:17

    बढ़िया 👍

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  10. लवली गोस्वामी20 January 2026 at 01:00

    Behad sunder kavita hai 💐

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  11. गोकरण सिंह20 January 2026 at 01:01

    वाह, अद्भुत 💖🙏💖

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