प्रियदर्शन की कविताएं

 

                                   प्रियदर्शन 

प्रियदर्शन की कविताएं मनुष्य और उसके आसपास की कविताएं हैं जहां जीवन के सामने संकट सबसे गहरा है। दौड़ती भागती जिंदगी और चमक दमक के तमाम उपकरणों के बीच वे लुप्त होती हुई चीजें भी हैं जो बिना किसी शोर के हमारे बीच से गायब हो रही हैं और उनका गायब होना एक सामान्य सी बात लगती है। कोई हैरानी नहीं। कोई शोक नहीं। कोई ग्लानि नही।कवि ही हैं जो उन चीजों को देखते हैं और हमें याद दिलाते हैं कि हम कितना कुछ खोते जा रहे हैं दुनिया को मुट्ठी में कर लेने की गलतफहमी के बीच। 'कुछ अस्फुट सी यादें' और 'कविता विस्मृति की' श्रृंखला की ये दस कविताएं ठहर कर सोचने को बाध्य कर देती हैं और यही इन कविताओं की ताकत है कि ये असर पैदा करती हैं।


                            कुछ अस्फुट सी यादें


एक पत्ती की याद


दिसंबर के कुहासे में

कुछ सिकुड़ा-दुबका सा था एक विराट पेड़

मगर सबसे ऊंची शाख पर

एक फुनगी हिल रही थी

एक ठहरी हुई ऋतु के विरुद्ध

यह एक पत्ती का विहंसता प्रतिकार था

पत्ती हमेशा नहीं रहेगी

पीली पड़ जाएगी

मुरझा जाएगी

एक दिन गिर जाएगी

लेकिन यह विहंसता हुआ पल

मेरी स्मृति में बना रहेगा

शाखा की निस्पंदता के विरुद्ध

मौसम की निठुरता के विरुद्ध

अपनी वध्य निरीहता के साथ

एक मासूम की पत्ती द्वारा

रचा गया वह पल।




एक दीवार की याद


दीवार थी

लेकिन वह

रास्ता नहीं रोक रही थी

सहारा दे रही थी

दोस्त जैसी थी

इस दीवार पर पीठ टिका कर बैठने का

सुस्ताने का अपना सुख था

यह बहुत पुरानी दीवार थी

इतनी पुरानी कि इसकी ईंटों पर घास उग आई थी

इस पर लगी काई भी सूख गई थी

दीवार का रंग हरा हो गया था

दीवार दूर से निष्प्राण-निश्चेष्ट लगती थी

लेकिन उसमें बहुत सारा जीवन था

दौड़ती-भागती गिलहरियां थीं

चढ़ती-उतरती चींटियां थीं

कुछ चिड़ियां भी थीं

जो आती-जाती

दीवार पर अपनी उड़ान अपने निशान छोड़ जाती थीं

दीवार में आवाज़ें भी थीं

जिन्हें कान लगाकर सुनना पड़ता था

जीवन की आवाज़ें

लेकिन यह देखने-सुनने के लिए

ज़रूरी था

कि हम दीवार को दीवार न मानें।


कुछ चिड़ियों की याद


वे उड़ती थीं

तो उनके साथ आसमान उड़ने लगता था

यह बहुत पुरानी बात है

एक आंगन था जहां से बनता था यह दृश्य

इस आंगन में चिड़ियां

छींटे हुए दाने चुगने के लिए

उतरती थीं इस तरह

कि यह आंगन उनका ही है

वे अपनी फड़फड़ाहट से आंगन को आसमान कर देती थींं

और आसमान को अपने पंखों में बदल डालती थीं

उसे लिए-लिए उड़ती जाती थीं

यह बिल्कुल पलों में घटित होता शाश्वत था

जो कभी ख़त्म होने का नाम नहीं लेता था

लेकिन क्या त्रासदी है कि एक दिन इसे भी ख़त्म होना था

पहले आंगन ख़त्म हुआ

फिर छींटे हुए दाने ख़त्म हुए

फिर चिड़िया गुम हुई

फिर आसमान ग़ायब हो गया

और अंत में हम भी नहीं बचे।

मैं भी नहीं

यह कोई और है

जो मुझे याद करता हुआ

लिख रहा है यह स्मृति।




आख़िरी दिन घर की याद


एक-एक कर होते गए कमरे ख़ाली

एक-एक कर भरता गया सूनापन

हमने एक-एक दरवाज़ा बंद किया

हर जगह अंधेरा पैठता चला गया

शाम हो चुकी थी

लेकिन यहां रोशनी की ज़रूरत नहीं थी

फिर भी चलते-चलते आंगन में जलता

एक छोटा सा बल्ब जलता ही

छोड़ आए थे हम।

किसके लिए छोड़ा था वह बल्ब?

वह भी बुझा दिया होता तो क्या होता?

क्या वह हमारी टिमटिमाती उपस्थिति थी

जो अब भी जाने को तैयार नहीं थी?

क्या वह बहुत मद्धिम सी रोशनी

बचा कर रख सकती थी हमारी याद?

क्या हम ही बचा कर रख सकते थे

इस घर की अंतिम याद?

पता नहीं, लेकिन वह बल्ब

अब भी जैसे जलता है मेरे भीतर

बहुत से घर बदले

बहुत सी सड़कों पर चला

लेकिन वह घर साथ-साथ

चलता है मेरे भीतर।


मां की आख़िरी निगाह की याद


मां को अंतिम बार पुकारा था

इकत्तीस बरस पहले

वह पुकार हलक में अब भी

अटकी हुई है

मां को अब याद नहीं करता

करता हूं तो एक बाढ़ सी आ जाती है

ऐसी बाढ़ जो इन इकत्तीस बरसों को बहा ले जाए

तब ऐसे सफेद बाल नहीं थे मेरे

ऐसी थकी चाल नहीं थी मेरी

मैं एक युवा बेटा था

जिसके सामने उसकी मां मर रही थी

और वह रो नहीं सकता था

क्योंकि मां को मालूम नहीं पड़ने देना था

कि वह नहीं रहने वाली है।

क्या उसे मालूम हो गया था?

हमेशा के लिए आंखें मूंद लेने से पहले

उसने पलक भर देखा था

जैसे कह रही हो- निश्चिंत रहो

ऐसा ही है जीवन इतना भर ही है

लेकिन कहां रह सका निश्चिंत

जीवन भर पीछा करती रहीं

तमाम तरह की अनिश्चितताएं।

लगभग नींद में चलते हुए

निकल गए ये तमाम वर्ष.

कभी-कभी

जैसे अभी-अभी

वह आख़िरी निगाह याद आ जाती है

तो एक सन्नाटा सा खिंच जाता है

ऐसा ही है जीवन इतना सा ही है जीवन।




                     कविताएं विस्मृति की


एक


धीरे-धीरे भूलता जा रहा हूं सबकुछ

अब बहुत पुराने चेहरे याद नहीं आते

बहुत सारे नाम अजनबी लगते हैं

कोई सहसा मिल जाता है

और देखकर खिल जाता है

तो सोचना पड़ता है कि यह कौन है

कब मिला था और किससे मिला था

अगर जीवन एक सिलसिला था

तो वह टूट रहा है

कुछ छूट रहा है

हर लम्हे के साथ

कोई चला जा रहा है

छुड़ा कर अपना हाथ

परिचितों की परिधि में

अपरिचय का व्यास

बड़ा होता जा रहा है

जैसे जीवन के वृत्त को

काट और बांट रही हो एक

खिंची हुई रेखा

आंखें भूलने लगी हैं

किसे देखा किसे नहीं देखा

अचानक कोई आ जाता है याद

अपने चले जाने के बाद।

एक धक्क सी लगती है सीने में

एक हूक सी उठती है कलेजे में

इसे तब क्यों नहीं पहचाना था?

क्या ऐसा समय भी कभी आना था?


दो


लेकिन सबकुछ कोई कैसे सहेज कर रखे

यादों की संदूक में जगह कम होती जाती है

उड़ती जाती हैं स्मृतियां कपूर की तरह

बस बची रहती है उनकी गंध

जो याद दिलाती है

कि बीत गए कितने पल कितने छिन

कितने घंटे कितने दिन

कितने हफ़्ते कितने माह

कितने बरस, बस आह!

कभी-कभार यह संदूक खुलता है

कपड़े उलटे-पलटे जाते हैं

दीमक खाई कोई झालर मिलती है

कोई अनचीन्हा पत्थऱ भी मिलता है

किस बचपन में किस नदी से उठा कर लाए थे इसे?

अचानक वह नदी कौंध जाती है

स्मृति की गहरी झील में गिरता है

एक पत्थर

और कुछ सोई पड़ी यादें जाग जाती हैं।




तीन


मगर जो हम भूलना चाहते हैं

उसे भूल नहीं पाते

हमारी ग़लतियां हमारे साथ चलती रहती हैं

हमारे गुनाह हमारा पीछा करते रहते हैं

किसी ज़माने का कोई पुराना ज़ख़्म बना रहता है

कभी झेला हुआ अपमान भी ढीठ की तरह तना रहता है

कोई अनकिया प्रेम भी विहंसता हुआ साथ चलता है

कोई छूटा हुआ दोस्त हाथ में लिए हाथ चलता है

वही है जो बहुत सारे दुखों पर मरहम मलता है

कुछ ठीक से समझ में नहीं आता

क्या याद रखा जाए किसे भुलाया जाए

यह भी अक्सर अपने हाथ नहीं होता

हम खुद को भी भूलते जाते हैं

अचानक पुरानी तस्वीरों में पाते हैं

यह तो कोई और है खिलखिलाता हुआ

उससे बहुत अलग जो अब इन्हें देख रहा है

कुछ अनमना, कुछ सोचता, समझ न पाता हुआ।


चार


क्या ऐसा भी समय आएगा

जब मैं सबकुछ भूल जाऊंगा?

न नाम याद रहेगा न काम

न अपने लोग और न अपने रास्ते?

अपने भीतर भटकता रहूंगा

खोजता हुआ अपना ही पता

पूछता हुआ अपना ही नाम?

या यह भी चला जाएगा

अनुभव के दायरे के पार

कुछ न महसूस कर पाने

के शून्य में घिरा

क्या मैं मैं ही रहूंगा

या बची रहेगी एक देह कातर-क्लांत

दूसरों पर निर्भर?

इस खयाल को लिखना भी

डरावना है

इसे यहीं स्थगित करते हैं।




पांच


असली यंत्रणा किसमें है?

सबकुछ याद रखने में?

या सबकुछ भूल जाने में?

या यह महसूस करने में

कि सब छूटता जा रहा है

फिसलता जा रहा है?

कि काल अबाध गति से चलता जा रहा है?

अपनी बेबस स्मृति की थाह लेना?

यह पहचानना कि बहुत कम चीज़ें बची रहती हैं

कि जो भी आता है अपनी मृत्यु साथ लिए आता है।

हर रिश्ते की तय होती है मियाद

भले वह आता रहे या न आए याद।

या इन सबसे मुक्त होकर

विस्मृति के किसी अतल अंधकार में

खुद को खो देना?

स्मृतियों की अपनी यंत्रणाएं होती हैं

विस्मृति की अपनी।




प्रियदर्शन


जन्म: 24 जून, 1968

अंग्रेज़ी में एमए (प्रथम श्रेणी)

बीजे (प्रथम श्रेणी)


किताबें

1 ज़िंदगी लाइव (उपन्यास)

2 बारिश, धुआं और दोस्त (कहानी संग्रह) 

3 उसके हिस्से का जादू (कहानी संग्रह)

4 हत्यारा और अन्य कहानियां (कहानी संग्रह)

5 सहेलियां और अन्य कहानियां (कहानी संग्रह)

6 यह जो काया की माया है (कविता संग्रह)

7 नष्ट कुछ भी नहीं होता (कविता संग्रह) 

8 ग्लोबल समय में गद्य (आलोचना) 

9 ग्लोबल समय में कविता (आलोचना) 

10 ख़बर-बेख़बर (पत्रकारिता विषयक)

11 नए दौर का नया सिनेमा (फिल्म) 

12 इतिहास गढ़ता समय (विचार) 

13 दुनिया मेरे आगे (संस्मरण)

14 भारत की घड़ी (विचार)

15 आपकी जेलें टूट जाएंगी एक दिन (ट्विटर ग़ज़लें)

16 क्या ये शहर तुम्हारा है? (संस्मरण)

17 चयनित कविताएं

18 जो हिंदुस्तान हम बना रहे हैं

19 बेटियां मन्नू की


अनूदित किताबें

उपन्यास ‘ज़िंदगी लाइव’ का अंग्रेज़ी में अनुवाद 

कविता संग्रह ‘नष्ट कुछ भी नहीं होता’ का मराठी में अनुवाद


अनुवाद

1 सलमान रुश्दी का ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रेन’ (आधी रात की संतानें)

2 अरुंधती रॉय का ‘द ग्रेटर कॉमन गुड’ (बहुजन हिताय) 

3 रॉबर्ट पेन का उपन्यास ‘टॉर्चर्ड ऐंड डैम्ड’ (क़त्लगाह)

4 ग्रीन टीचर (हरित शिक्षक)

5 के बिक्रम सिंह की किताब ‘कुछ ग़मे दौरां’

6 पीटर स्कॉट की जीवनी

7 अचला बंसल का थैंक्स एनीवे (बहरहाल धन्यवाद- मृदुला गर्ग और स्मिता सिन्हा के साथ) 


संपादन

बड़े-बुज़ुर्ग (कहानी संग्रह)


सम्मान

स्पंदन सम्मान 2008

टीवी पत्रकारिता के लिए हिंदी अकादमी, दिल्ली का सम्मान, 2015

कुछ पुरस्कारों को लेने से इनकार

पता- ई-4, जनसत्ता सोसाइटी, सेक्टर 9, वसुंधरा, गाज़ियाबाद, 201012

ईमेल- priyadarshan.parag@gmail.com

फोन- 9811901398


सभी पेंटिंग: वाज़दा ख़ान 

Comments

  1. चंद्रेश्वर2 January 2026 at 20:18

    बहुत ही उल्लेखनीय कविता श्रृंखला। मुख्य धारा से इतर कवियों को भी कभी कभार स्पेस देना यह दर्शाता है कि आप मुख्य धारा की संकीर्ण मानसिकता वाले मठाधीशों से अलग सोच लेकर कार्य कर रहे हैं। प्रियदर्शन मेरे प्रिय कवि और लेखक हैं, पत्रकार भी। हमारी बधाई एवं शुभकामनाएं लीजिए।

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  2. शिव कुमार पराग2 January 2026 at 20:18

    'दीवार में आवाज़ें भी थीं/ जिन्हें कान लगाकर सुनना होता था'. बहुत बढ़िया. प्रतिष्ठित कवि, लेखक, पत्रकार, आलोचक श्री प्रियदर्शन जी को हार्दिक बधाई!

    ReplyDelete
  3. प्रभा मुजुमदार2 January 2026 at 20:19

    बहुत शानदार।

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  4. ममता जयंत2 January 2026 at 20:20

    जीवन से जुड़ी अच्छी कविताएँ! साधुवाद।

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    Replies
    1. प्रियदर्शन3 January 2026 at 08:42

      शुक्रिया

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  5. अनामिका चक्रवर्ती2 January 2026 at 20:20

    बेहतरीन कविताएं

    हार्दिक बधाई

    ReplyDelete
  6. देवेन्द्र चौबे2 January 2026 at 20:21

    महत्वपूर्ण।

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  7. विशाखा2 January 2026 at 21:04

    बहुत अच्छी कविताएं स्मृति को जीवंतता प्रदान करती।

    ReplyDelete
  8. डॉ उर्वशी2 January 2026 at 22:05

    प्रियदर्शन की यह कविता-श्रृंखला स्मृति और विस्मृति के बीच फंसे समकालीन मनुष्य की गहन, करुण और दार्शनिक पड़ताल है, जहाँ जीवन की सबसे साधारण दिखने वाली चीज़ें—पत्ती, दीवार, आंगन, चिड़ियाँ, बल्ब और मां की अंतिम निगाह—अस्तित्व के गहरे प्रश्नों में बदल जाती हैं। ये कविताएँ उस तेज़ रफ्तार समय के विरुद्ध खड़ा एक शांत प्रतिरोध हैं, जिसमें मनुष्य बिना शोर किए बहुत कुछ खोता चला जा रहा है और खोने की यह प्रक्रिया सामान्य, स्वाभाविक और लगभग अनदेखी होती जा रही है। प्रियदर्शन स्मृति को किसी भव्य अतीत की तरह नहीं, बल्कि क्षणभंगुर, नाजुक और विहंसते हुए पलों की तरह रचते हैं, जो मिट जाने के बावजूद भीतर जीवित रहते हैं और मनुष्य की संवेदनशीलता को बचाए रखते हैं। ‘कविताएं विस्मृति की’ में भूलना केवल याददाश्त का क्षरण नहीं, बल्कि पहचान, संबंध और अनुभव के टूटने का संकेत बन जाता है, जहाँ कवि यह प्रश्न उठाता है कि असली यंत्रणा सब कुछ याद रखने में है या सब कुछ भूल जाने में। सरल, पारदर्शी और गहन अर्थवत्ता से भरी भाषा में लिखी ये कविताएँ पाठक को विचलित नहीं करतीं, बल्कि भीतर ठहरने, देखने और सुनने का विवेक देती हैं और यह याद दिलाती हैं कि मनुष्य होने का अर्थ केवल आगे बढ़ना नहीं, बल्कि उन खोती हुई चीज़ों के प्रति सजग रहना भी है, जिनसे मिलकर जीवन मनुष्य के लिए रहने योग्य बनता है।

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  9. प्रदीप मिश्र2 January 2026 at 22:09

    बहुत आभार। बेहतरीन कविताओं का पाठ उपलब्ध करवाने के लिए।

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  10. अहा,कितनी सहज,शालीन और अर्थ गर्भित प्रियदर्शन जी की कविताएं है। उनकी कविताओं पर शुरू से ही मैं जान छिड़कता रहा हूं। शुभकामनाएं उन्हें 🌷

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  11. इरा श्रीवास्तव3 January 2026 at 06:20

    अच्छी कविताएं। बधाई प्रियदर्शन जी को और आपको।

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  12. मधुसूदन आनंद3 January 2026 at 07:10

    बहुत सुंदर ।

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  13. नंदा पांडे5 January 2026 at 08:32

    भावपूर्ण कविताएं।

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  14. जयमाला5 January 2026 at 08:32

    कितनी सुन्दर पंक्तियाँ हैं !
    बधाई भैया !

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  15. नीलम वर्मा5 January 2026 at 08:33

    बहुत सुन्दर कविता। 👍👍

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  16. सरिता खोवाला6 January 2026 at 20:16

    बेहतरीन कविताएं।

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  17. सारिका भूषण6 January 2026 at 20:17

    बहुत सुंदर कविता।

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  18. श्रद्धा सुनील6 January 2026 at 20:17

    इन दिनों कवि तो बहुत हैं जो बेहतरीन लिखने की काव्य कुशलता में पर्याप्त निपुण हैं लेकिन प्रियदर्शन जी की खासियत है कि वह जितना संवेदनशील लिखते हैं वैसे ही सहृदय विनम्र और सच्चे मनुष्य भी हैं ।।।

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  19. लीलाधर मंडलोई7 January 2026 at 08:52

    बहोत जुदा वस्तु, कहन और शिल्प की प्रासंगिक कविताएं।

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  20. राजेश जोशी8 January 2026 at 18:25

    प्रियदर्शन जी की ये कविताएं उनके कवि मन में हमारे समय की उहापोह, उदासी और उम्मीद का पता देती हैं।
    इन कविताओं के लिये शंकरानंद को भी बधाई।

    ReplyDelete

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