विजय राही की कविताएं
विजय राही विजय राही की कविताओं में मनुष्य की उन कोमल भावनाओं की गंध महसूस की जा सकती है जो जीने के लिए जरूरी हैं। जीवन और मृत्यु के बीच प्रेम की अलग रंगत लिए ये कविताएं देर तक स्मृति में गूंजती हैं। चाह दुनिया मतलब से प्रेम करती है पर मुझे तुमसे कोई मतलब नहीं दुनिया धन से प्रेम करती है मुझे तुम्हारे धन की भी लालसा नहीं मेरे घर में किसी चीज़ की कमी नहीं मुझे कोई काया रोग भी नहीं फिर मैं क्यों रोती हूँ। फूल-दिल जब तक गुलशन में रहते हैं खिले-खिले रहते हैं डाली से अलग होते ही मुरझा जाते हैं मर जाते हैं फूल-दिल लोग। स्मृतियाँ बीत जाते हैं दिन-महीने साल दर साल गुज़र जाते हैं आते-जाते रहते हैं मौसम गर्मी आती है चली जाती है बारिशें आती हैं चली जाती हैं हाड़ कँपाने वाली सर्दियाँ आकर चली जाती हैं परन्तु मैं इनसे बाहर नहीं निकल पाता गर्मियों के बाद किसी से बिछड़ने का ताप सताता है बारिश के बाद तक होती रहती है अनवरत इन आँखों से बारिश और सर्दियों के बाद भी कँपकँपाती है किसी के बदन की छुअन मुझे । यात्रा बच्चा बस की सीट नीचे मिट्टी खा...