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प्रियदर्शन की कविताएं

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                                      प्रियदर्शन   प्रियदर्शन की कविताएं मनुष्य और उसके आसपास की कविताएं हैं जहां जीवन के सामने संकट सबसे गहरा है। दौड़ती भागती जिंदगी और चमक दमक के तमाम उपकरणों के बीच वे लुप्त होती हुई चीजें भी हैं जो बिना किसी शोर के हमारे बीच से गायब हो रही हैं और उनका गायब होना एक सामान्य सी बात लगती है। कोई हैरानी नहीं। कोई शोक नहीं। कोई ग्लानि नही।कवि ही हैं जो उन चीजों को देखते हैं और हमें याद दिलाते हैं कि हम कितना कुछ खोते जा रहे हैं दुनिया को मुट्ठी में कर लेने की गलतफहमी के बीच। 'कुछ अस्फुट सी यादें' और 'कविता विस्मृति की' श्रृंखला की ये दस कविताएं ठहर कर सोचने को बाध्य कर देती हैं और यही इन कविताओं की ताकत है कि ये असर पैदा करती हैं।                             कुछ अस्फुट सी यादें एक पत्ती की याद दिसंबर के कुहासे में कुछ सिकुड़ा-दुबका सा था एक विराट पेड़ मगर सबसे ऊंची शाख पर एक फुनगी हिल रही ...

लीलाधर जगूडी की कविताएं

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  लीलाधर जगूड़ी   वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी की कविताओं में मनुष्य और प्रकृति के साथ उसकी जिजीविषा भी है। यहां कठिन जीवन का ऐसा संगीत गूंजता है जिसमें परंपरा है तो आधुनिकता भी। काव्य भाषा से लेकर बिंब तक में पहाड़ की चमक कौंधती है और चकित कर देती है। जीवन के अनदेखे दृश्यों को देखने की ललक और गुम होते हुए को बचा लेने की चाह पैदा करती इन कविताओं में टटकापन है। यही इनकी विशेषता भी है। बिना नाव बिना नाव जैसे बीज नदियां पार कर लेते हैं  उस तरह किसी के काम आकर  मैं कहीं जाकर फिर से उगना चाहता हूं  मैं उगूं और किसी को लगे कि यह तो शब्द है  भाषा है  बीजों की तरह उड़कर शब्द भी चले जाते हैं  किसी दूसरी भाषा में  इस सफर में फूल और पत्थर भी भाषा बन जाते हैं  आधे अधूरे व्यंजन भी स्वर पा जाते हैं  एक टहनी की मधुमक्खियों जैसी उड़ान  दूर खड़े पेड़ की टहनियों को  सफल बना देती है  भूख और मेहनत  दोनों रचते हैं वसंत  पैर भी खुरों जैसे ही कुचलते हैं पृथ्वी को। घास के पूले   अचरज हुआ घास के पूलों को चलता देखकर  पूले पर पू...

विजय कुमार की कविताएं

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                                                             विजय कुमार    विजय कुमार की कविताओं में महानगरीय जीवन की चमक दमक और उसके बीच लुटती पिसती मनुष्यता का  गहरा अवसाद गूंजता है और अपनी गिरफ्त में ले लेता है।इन कविताओं में उपेक्षित मनुष्य के साथ उसका ढहा, टूटा और उजाड़ संसार नहीं मिटने की जिद में अड़ा उन ताकतों से लड़ रहा है जो सब कुछ को लीलने को आतुर है।चकाचौंध के बीच गहराता यह अंधेरा लगातार गहराता जा रहा है और ये कविताएं उसी अंधकार को दर्ज कर रही हैं। इनमें शोकगीत की मार्मिकता है जो सिर्फ बेचैन नहीं करती, ठहर कर सोचने को विवश कर देती हैं। सबसे खास बात यह कि यहां प्रस्तुत दस कविताएं इसी दुनिया की कविताएं हैं।एक साथ इन्हें पढ़ने पर दृश्य और छवियों का  ऐसा संसार उपस्थित होता है जो पूरे परिदृश्य से गायब कर दिया गया है।   एक छूटा हुआ मकान    नए नए बसते मोहल्ले में वह उम्र दराज मकान है छोटा सा ...

अनामिका की कविताएं

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अनामिका   अनामिका की कविताओं में समय, समाज और संस्कृति अपनी परंपरा और भाषाई विविधता के साथ पूरेपन में मौजूद है।यही कारण है कि इन कविताओं में एक अलग सम्मोहन है। पाठक इनकी कविताओं से गुजरते हुए बहुत कुछ सुनता,गुनता और समेटता हुआ चलता है। समकालीन कविता में लोक के साथ कोमल भाषा शैली और बिंब  की मौलिक ध्वनि इन्हें विशिष्ट और अनिवार्य बनाती रही है। यू ट्यूब पर कांतासम्मित   मेरा उनसे एक अजब तरह का रिश्ता है । जब भी बहुत ज़्यादा थक जाती हूँ, मैं देखती हूँ इनका चैनल , ये मुझको हाथ पकड़कर  एक नई दुनिया में ले जाती हैं , जो दरअसल बहुत पुरानी है- माँ के डाले खट्टे- मीठे  नींबू अचार- सी चटक, क़स्बे की दुनिया- सी  एकदम सरल और सुंदर । ये कितने आराम से बोलती हैं ! इनके स्वर में उमा दी वाला धीरज है। जैसे राजा हर्षवर्धन थे, वैसी वे-  तैयार सब संचित निधियाँ लुटाने को , मुक्तहस्त बाँटने को सारे कौशल , सारे गुर और राज़ सारे  जो गृहस्थी की तपस्या में अर्जित किए थे  या दादी- नानी, बुआ- मौसी, माँ से सीखे थे-  पाकविधियाँ और कढ़ाई- बुनाई के नमूने, केश सज्जा , र...